ॐ नमः शिवाय
(युद्ध खण्ड)
॥ तारकाक्ष, तंडिमाली एवं कमलाक्ष का तप करके त्रिपुर बसाना ॥
सूतजी बोले-हे शौनक! नारदजी ने ब्रह्माजी से कहा- हे पिता! अब आप मुझे यह बताइये कि सदाशिवजी ने दैत्यों का किस प्रकार नाश किया ?
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! जब स्कन्द ने तारकासुर का वध करके देवताओं को आनन्द प्रदान किया, उस समय तडिम्माली, तारकाक्ष तथा कमलाक्ष नाम तारक के तीनों पुत्र कठिन तपस्या में प्रवृत्त हो गये। वे मेरे ध्यान में पहिले एक पाँव से खड़े रहे, फिर सौ वर्ष तक केवल जल पीकर तप करते रहे। एक सहस्र वर्ष तक वे अंगूठे के बल खड़े रहे ।
उस समय मैंने उनसे जाकर कहा-हे तारक के पुत्रो! मैं तुम्हारे तप से अत्यन्त प्रसन्न हूँ, तुम अपनी इच्छानुसार वर माँगो। तब तीनों दैत्यों ने मुझसे यह कहा-हे ब्रह्मन्! यदि आप हमसे प्रसन्न हैं तो हमको यह वर दीजिये कि हम किसी के हाथ से न मारे जाँय। तब मैं उनसे बोला कि तुम मुझसे यह वरदान मत माँगो; इसके अतिरिक्त अपनी इच्छानुसार कोई भी वस्तु माँगो।
यह सुनकर उन तीनों दैत्य-पुत्रों ने विचारकर कहा कि आपकी यदि यही इच्छा है तो इसी स्थान पर एक नगर की स्थापना हो, जहाँ आपकी मूर्ति स्थित हो। इसके अतिरिक्त हम तीनों के लिए अलग-अलग एक-एक नगर और तैयार हो जाय, जो एक-एक सहस्त्र कोस के अन्तर पर हो। वे तीनों नगर हर प्रकार से समान हों। जो कोई उन तीनों नगरों को एक ही बाण से नष्ट करे, वही हमारा वध करने में समर्थ हो।
मैंने यह सुनकर कहा-अच्छा, तुम्हारी इच्छानुसार यही होगा। फिर मैंने उसी समय मयदानव को बुलाकर एक से तीन नगर निर्माण करने की आज्ञा दी और वहाँ से चला गया।
हे नारद! मयदानव ने मेरी आज्ञानुसार तीनों नगरों का निर्माण किया। प्रत्येक नगर सौ-सौ योजन बड़ा था। उनमें स्वर्ग से भी अधिक आनन्द था। मैंने क्रम से तीनों भाइयों को तीनों नगर बाँट दिये। वे तीनों अपने-अपने नगर में आनन्दपूर्वक निवास करने लगे। तीनों लोकों में ऐसी कोई वस्तु न थी, जो उन लोगों को उपलब्ध न हो। उनके पास असंख्य सेना थी।
प्रत्येक के घर में शिवालय बने हुए थे, जिनमें सब लोग शिवजी का पूजन करते थे। प्रतिदिन हवन एवं यज्ञ हुआ करते थे। वे तीनों दैत्य भी शिवजी के परमभक्त थे। वहाँ यह नियम था कि कोई व्यक्ति बिना शिवजी की पूजा किये भोजन नहीं कर सकता था, क्योंकि उन तीनों दैत्यों ने वहाँ इस बात की घोषणा करवा दी थी कि सबलोग नित्य नियम से शिवजी का पूजन करें।
इसके अतिरिक्त उन नगरों में वेद, पुराण के मत के प्रतिकूल कभी कोई भी बात धर्म के विरुद्ध नहीं होने पाती थी। वहाँ ब्राह्मण रात-दिन शिव के नाम का जप किया करते थे। जब उन दैत्यों का तेज बढ़ने लगा, तब देवता लोग घबराकर बहुत दुःखी हुए। उनके शरीर में जैसे आग लग गयी। उस समय सब मिलकर मेरी शरण में आये तथा बोले- हे ब्रह्मन्! अब सब देवता त्रिपुर के तेज से जले जाते हैं।
हे नारद! मैंने देवताओं के ऐसे वचन सुनकर कहा-हे देवताओ! उन्होंने मेरी आराधना तथा कठोर तप करके मुझसे इस प्रकार का वरदान प्राप्त किया है। मैं उनको वेद के विरुद्ध कैसे मार सकता हूँ। वे शिवजी की कृपा द्वारा अनेक प्रकार के आनन्द प्राप्त करते हैं। शिवजी के भक्तों पर किसी भी शस्त्र का प्रभाव नहीं हो सकता। उनकी आराधना को त्यागने से प्रत्येक व्यक्ति नष्ट हो जाता है। मैं तुमलोगों को इसी वर्णन के अनुसार एक इतिहास सुनाता हूँ।
हे देवताओ! रावण जो शिवजी का परमभक्त हुआ है, उसका कोई भी वध न कर सका, विष्णुजी का चक्र भी कुंठित होकर रावण का सिर काटने में असमर्थ रहा, उस समय आकाशवाणी हुई कि हे विष्णु! यदि रावण किसी कारणवश शिवजी की सेवा छोड़कर उनके विरुद्ध हो जाय, तो निःसन्देह शिवजी उसकी सहायता न करेंगे। इसलिए तुमको यही उचित है कि अवतार लेकर शिवजी का नाम जपो।
जब शिवजी प्रसन्न होकर तुमको अपना बाण देंगे, तब उसी बाण से तुम्हारे हाथों रावण की मृत्यु होगी। यह सुनकर विष्णुजी ने शिवजी की बड़ी पूजा की। तब शिवजी ने प्रसन्न होकर रावण की उत्तम बुद्धि को नष्ट कर दिया। उस समय विष्णुजी ने भी रामचन्द्र का अवतार लेकर शिवजी की तपस्या की तथा शिवजी से वह बाण प्राप्त किया, जो प्रलय करनेवाला था।
इस प्रकार उसी बाण द्वारा रावण का वध करके उन्होंने सीता को प्राप्त किया। इसका तात्पर्य यह है कि हम सब मिलकर शिवजी की शरण में चलें और उनके चरण पकड़कर उन्हें प्रसन्न करें तथा उनकी महिमा का वर्णन करें। यह निश्चय कर मैं, समस्त देवताओं सहित शिवजी के पास पहुँचा।
हम सबने पग-पग पर जय-जयकार तथा बड़ी स्तुति की और यह कहा-हे प्रभो! जब-जब देवताओं पर कोई संकट पड़ा है, तब-तब आपने ही उनका दुःख दूर किया है। अब आप हम पर पुनः दया-दृष्टि कीजिये।
॥ त्रिपुरासुर से व्याकुल होकर देवताओं का ब्रह्मा की शरण में पहुँचना ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! देवताओं ने शिवजी से कहा-हे सदाशिव! आप हमारे दुःखों को दूर कीजिये। इस समय दैत्यों ने अत्यन्त बल एवं तेज प्राप्तकर, हम सबको बहुत दुःखी कर रखा है। अब हमसे यह कष्ट सहे नहीं जाते, इसीलिए हम आपकी शरण में आये हैं। यह सुनकर शिवजी बोले-हे देवताओ! मुझे तुम्हारा सब दुःख कष्ट मालूम हो गया है; लेकिन त्रिपुर के असुर बड़े धर्मात्मा एवं दाता हैं, इन्हीं गुणों के कारण वे सब आनन्दपूर्वक रहते हैं।
संसार में पुण्य के समान और कोई अन्य वस्तु इतनी आनन्ददायक नहीं है। जब तक उनका पुण्य बुद्धि पर है, तब तक वे मारे नहीं जायेंगे। हमको यह उचित नहीं है कि हम अपने भक्तों को व्यर्थ ही नष्ट कर दें। इसके साथ ही हमसे तुम्हारे कष्ट भी नहीं देखे जाते; क्योंकि जो हमारी शरण में आता है, हम उसकी अवश्य ही रक्षा करते हैं। इससे तुमको अब यही उचित है कि तुम विष्णु के पास जाकर अपने सब दुःखों को कहो।
हे नारद! यह सुनकर सब देवता शिवजी के आदेशनुसार विष्णुजी के पास गये। उन्होंने स्तुति करने के पश्चात् अपने दुःख उनसे कहे तथा हर प्रकार से विष्णुजी की पूजा में प्रवृत्त हुए। तब विष्णुजी ने देवताओं की विनती सुनकर वेद एवं शास्त्रों के अनुसार यह उत्तर दिया-हे देवताओ! सनातन से शिवजी की भक्ति एवं पूजा पुण्य प्रदान करनेवाली है।
शिवजी की पूजा होनेवाले स्थान पर कोई दुःख या कष्ट नहीं रह सकता। देवताओं ने यह सुनकर दुःखी हो, निवेदन किया-हे देवताओं के स्वामी! इस समय हम सब दुःखी तथा अधीर हैं। यह बात स्पष्ट है कि जब तक त्रिपुर के असुर जीवित रहेंगे, हमको कभी भी शान्ति नहीं मिलेगी।
अब आप ही बताइये कि हम सब कहाँ जायें? या तो आप हम सबको बिना मृत्यु के मार डालिये या त्रिपुर का नाश कीजिये। इन दोनों कामों में से एक काम करके आप हमारे कष्टों को दूर कीजिये, जिससे आपको भी प्रसन्नता हो। हम सब शिवजी के आदेशानुसार ही प्रसन्न होकर आपके पास आये थे।
यह कहकर सब देवता चुप हो गये। तब विष्णुजी ने शिवजी की आज्ञा का विचारकर सोचा कि किसी न किसी प्रकार इन देवताओं का दुःख अवश्य दूर करना चाहिए। फिर शिवजी का ध्यान धरकर उन्होंने यज्ञगणों को स्मरण किया। तब यज्ञ के भीतर से मखपति उत्पन्न होकर विष्णुजी की स्तुति करने लगे।
उस समय विष्णुजी देवताओं से बोले-हे देवताओ! अब तुम सब इनकी पूजा करो। देवताओं ने उसी समय प्रसन्न होकर शंखनाद किया तथा मख अर्थात् यज्ञ करके मखपति का ध्यान धरते हुए, उनकी पवित्र स्तुति की। तब मखपति प्रसन्न होकर विष्णुजी की स्तुति करने लगे। उस समय विष्णुजी ने देवताओं से कहा-हे देवताओ! त्रिपुरासुर तुम्हारे ऐसे प्रयलों द्वारा नहीं मारे जा सकते। जिनके दर्शनमात्र से ही पाप नष्ट हो जाते हैं, मखपति उनका क्या कर सकता है ? वे शिवजी के वरदान द्वारा ही संसार में सबसे अधिक आनन्द भोग कर रहे हैं।
हे देवताओ! संसार में ऐसा कौन है, जो शिवजी के भक्त का विनाश कर सके? शिवजी ने केवल संसार की भलाई के निमित्त ही अवतार लिया है। उनके एक ही अंश की पूजा के फलस्वरूप देवताओं ने कैसा पद प्राप्त किया है, इसे तुम जानते हो। ब्रह्मा ने भी उनकी सेवा करके ही यह पद पाया है तथा मुझको भी पालन करने की शक्ति तथा बड़ाई उन्होंने ने प्रसन्न होकर प्रदान की है। इसीलिए हम कहते हैं कि त्रिपुरासुर केवल शिवजी की पूजा करने से ही मारे जा सकते हैं।
हे नारद! विष्णुजी ने यह कहकर समस्त देवताओं सहित शिवजी के पूजन का आयोजन किया। उसी समय एक करोड़ पार्थिव लिंग मिट्टी से बनाकर प्रथम प्राणप्रतिष्ठा एवं आवाहन करके पश्चात् उनकी अक्षत, चन्दन, सुगन्ध, पुष्प एवं बेल-पत्रों से पूजा की। इस प्रकार विष्णुजी शिवजी के ध्यान में मग्न हुए। तब शिवजी के प्रसन्न होने से त्रिशूल, गदा आदि लिये हुए असंख्य भूत-प्रेतों की सेना प्रकट हुई।
उस समय विष्णुजी ने उन्हें देखकर यह कहा कि तुम सब तुरन्त त्रिपुर का नाश कर दो अर्थात् तीनों नगरों को जलाकर भस्म कर डालो। इस प्रकार संसार में तुम्हारी कीर्ति फैलेगी। विष्णुजी का ऐसा आदेश सुनकर भूतों की सेना वायुवेग से चली तथा त्रिपुर में पहुँचकर चारों ओर फैल गयी; जब वह नगर के भीतर पहुँची, तब शिवजी की लीला से जलकर तुरन्त भस्म हो गयी।
हे नारद! जिनके मन में शिवजी की ढूढ़ भक्ति है, उनके निकट संकट आकर स्वयं ही नष्ट हो जाते हैं। देवताओं ने यह हाल देखकर विष्णुजी के पास जाकर सब वृत्तान्त सुनाया तथा वे यह सोचने लगे कि किस उपाय से त्रिपुर का नाश किया जाय; क्योंकि अभिचार अर्थात् हठधर्मी से भी शिवजी के भक्तों को कोई कष्ट नहीं पहुँचाया जा सकता। वास्तव में शिव की भक्ति के ही कारण वे सब दैत्य बच गये हैं।
यदि शिवजी हमारी सहायता करें, तब हम शत्रुओं के इन अत्याचारों से मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए हमें कोई ऐसा उपाय करना चाहिए, जिससे ये दैत्य धर्म से भ्रष्ट हो जायँ। उस स्थिति में शिवजी स्वयं ही उनको नष्ट कर देंगे।
विष्णुजी ने यह विचारकर देवताओं से कहा-हे देवताओ! अब तुम सबलोग अपने घरों में जाकर शिवजी के नाम का जप करो तथा दिन-रात पार्थिव पूजन करके उनकी स्तुति करो। विष्णुजी के ऐसे वचन सुनकर समस्त देवता अत्यन्त प्रसन्न हो, अपने-अपने घरों को गये।
॥ विष्णु अवतार मुण्डी का त्रिपुर को शिष्य बनाना ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! देवताओं को विदा करने के पश्चात् विष्णुजी ने शिव-पूजन किया। फिर माया द्वारा अपने शरीर से एक ऐसा मनुष्य उत्पन्न किया, जिसका सिर मुड़ा हुआ था। वह मैले वस्त्र पहने तथा वस्त्र से अपने मुख को ढके हुए 'धर्म-धर्म कहता हुआ विष्णु के सम्मुख आ खड़ा हुआ और हाथ जोड़ अर्हणवचन बोला। उसने कहा-मुझको क्या आज्ञा है ?
तब विष्णुजी बोले-तुम हमारे शरीर से उत्पन्न हुए हो, इसलिए हमारा काम भली-भाँति पूर्ण करो। तुम हमारे रूप हो। विष्णु ने यह कहकर एक बहुत बड़ा ग्रंथ जिसमें सोलह सहस्त्र श्लोक थे, उसके रचना की; उसमें निम्नलिखित बातें थीं। वह ग्रन्थ छल एवं झूठ से भरा हुआ था। उसमें कोई ठीक धर्म नहीं लिखा था।
वह वेद, शास्त्र एवं पुराणों के विरुद्ध था, जिसको पढ़कर किसी प्रकार का आनन्द प्राप्त नहीं होता था। उसमें वेद, पुराण एवं शास्त्रों की बहुत ही निन्दा लिखी हुई थी। उसमें वर्णाश्रम धर्म का भी खूब खण्डन किया गया था, जिसके अनुसार चलने से नरक में स्थान मिलने में कुछ भी देर न लगे।
उसमें सब बातें कुमति एवं संशय की थीं। उसके मानने से शौच, तप आदि सब नष्ट हो जाते थे। विष्णु ने उस पुस्तक को उसे देकर कहा कि तुम त्रिपुर में जाकर सबको यह पुस्तक पढ़ा दो। वहाँ के निवासी वेद एवं पुराण के समान ही सब कार्य करते हैं। इसलिए तुम वहाँ जाकर इस मत का सबको उपदेश दो, जिससे वे सब धर्मभ्रष्ट होकर, शिवजी की पूजा करना छोड़ दें।
जब तुम अपना यह काम पूर्ण कर लो, तब अपने शिष्यों सहित तब तक मरुस्थल में वास करो जब तक कि कलियुग न आवे। तुम वहाँ गुप्त रूप से रहा करना। जब कलियुग का आरम्भ हो जाये तब तुम मेरे इस उपदेश को भली-भाँति प्रसिद्ध करना। तुम्हारा पद निश्चय ही ऊँचा बना रहेगा।
हे नारद! मुण्डी ने विष्णुजी की यह आज्ञा प्राप्तकर अपने बहुत से शिष्य किये। तब विष्णुजी ने कहा- अब तुम यहाँ से विदा हो जाओ। हमारा एक नाम 'अर्हण' है, तुम उसका स्मरण करते रहना। फिर तुमको कोई भय न रहेगा। इस प्रकार विष्णुजी के आदेशानुसार मुण्डी अपने शिष्यों सहित वहाँ से चलकर त्रिपुर पहुँचा।
वहाँ उसने अनेक चेटक दिखाकर बहुत से लोगों को अपना शिष्य बना लिया। वहाँ ऐसा कोई भी न था जो मुण्डी के पास जाकर शिष्य बने बिना, अपना पुराना धर्म-विश्वास लेकर घर लौट आवे। हे नारद! तुम भी शिवजी की लीला से मुण्डी के शिष्य हुए; क्योंकि उसमें देवताओं का कार्य बनता था। फिर तुमने त्रिपुरासुर के पास जाकर मुण्डी की ऐसी प्रशंसा की त्रिपुर भी मुण्डी के शिष्य हो गये। मुण्डी ने त्रिपुरासुरों से यह प्रण करा लिया कि हमारी आज्ञा किसी दशा में भी अमान्य न की जाय।
यह बात मान लेने के पश्चात् मुण्डी ने अपने मुख पर से वस्त्र हटाकर त्रिपुर को अपना शिष्य बनाया तथा मंत्र दिया। फिर अनेक प्रकार के कर्त्तव्य तथा अकर्त्तव्य कार्य बता दिये। त्रिपुरा के शिष्य बन जाने के पश्चात् फिर कोई ऐसा व्यक्ति न रहा, जो मुण्डी का शिष्य न बना हो।
॥ मुण्डी के उपदेशानुसार त्रिपुर का नास्तिक होना ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! त्रिपुरा को चेला बनाने के पश्चात् मुण्डी ने उन्हें कई आदेश देते हुए कहा- हे त्रिपुर! हमारा मत सब मतों से उत्तम है, जिसको नारद ने भी माना है। इस मत के ये मार्ग हैं कि यह संसार असाध्य है, इसका आदि अन्त कुछ भी नहीं, न तो इसका कोई कर्त्ता ही है और न बनानेवाला ही। सनातन से यह इसी प्रकार चला आ रहा है।
समय आने पर यह स्वयं ही प्रकट होता है तथा इसी प्रकार समयानुसार अदृश्य हो जाता है। समय पाकर ही अच्छा-बुरा कार्य हो जाता है। ब्रह्म से लेकर घास-मिट्टी तक, जितने प्राणी हैं, वे सब मृत्यु के समान हैं। जीव ही ईश्वर है, जो अपने इस शरीर में वर्तमान है। इसके अतिरिक्त संसार का और कोई स्वामी नहीं है। ब्रह्मा आदि जो देवता बहुत प्राचीन हैं, वे भी अमर नहीं हैं। वे सब मृत्यु के वश में हैं।
इनमें से कोई तो विलम्ब में तथा कोई शीघ्र मरता है, लेकिन सबकी मृत्यु निश्चत है। यह निश्चत है कि समस्त शरीरधारी नष्ट हो जायेंगे। वे दुःख-सुख भोगकर पुनः जन्म लेंगे। समस्त जीव एक ही समान बराबरी का पद रखते हैं। उनमें न तो कोई छोटा है, न कोई बड़ा। भोग एवं भोजन आदि समस्त कार्यों में सब समान हैं। सवारी चाहे किसी प्रकार की हो, समान है।
जिस प्रकार हम मृत्यु का भय करते हैं, उसी प्रकार ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश को भी मृत्यु का भय है। समय के चक्र से कोई न बचेगा। इसलिए हे त्रिपुर! तुम यह सत्य जानो कि हममें तथा उनमें कुछ बड़ाई-छोटाई नहीं है। हम सब ही समान हैं। इसी प्रकार जाति की बड़ाई-छोटाई का विवाद है।
वेद एवं शास्त्र आदि सब झूठे तथा निष्फल हैं। केवल सब धर्मों से उत्तम धर्म हिंसा का त्याग कर अहिंसा को अपनाना है। उससे बढ़कर दूसरा कोई और धर्म नहीं है। दूसरों को दुःख पहुँचाने से बड़ा पाप संसार मैं कोई और नहीं है।
हे त्रिपुर! चार प्रकार के दान सब दानों से बड़े हैं। एक रोगी को औषध देना, दूसरा भयभीत को अपनी शरण में लेकर अभयदान देना, तीसरा भूखों को भोजन कराना और चौथा विद्यार्थी को विद्यादान देना। शरीर को उत्तम औषधों से आरोग्य बनाये रखना चाहिए। नर्क तथा स्वर्ग सब इसी संसार में हैं।
जहाँ आनन्द प्राप्त होता है, वह सब स्वर्ग है तथा जहाँ दुःख मिलता है, वही नरक है। दुःखों से वासनारहित मुक्त हो जाना ही परम मोक्ष है। वेदों ने प्रवृत्ति एवं निवृत्ति के दो मार्ग कहे हैं। उनका तात्पर्य यह है कि जीवों को दुःख पहुँचाना प्रवृत्ति धर्म है तथा उन पर दया एवं कृपा रखना निवृत्ति धर्म है। जो जीवों को मारकर तथा तिल, यव एवं घृत अग्नि में डालकर स्वर्ग प्राप्ति की इच्छा रखते हैं, वह उनकी सबसे बड़ी मूर्खता है।
हे नारद! इस प्रकार मुण्डी ने त्रिपुर को अपने धर्म के विषय में बताया, जिसको त्रिपुरासुरों ने ठीक समझा। तब वे सब अपने नये गुरु की आज्ञानुसार पुराने मत को छोड़ नये मत में प्रवृत्त हुए। फिर मुण्डी ने अपने मत की आज्ञा सुनाते हुए कहा-हे त्रिपुर! जब तक मृत्यु न आवे, तब तक आनन्दपूर्वक खूब मौज से विहार करो।
यदि कोई भिक्षुक या याचक कोई वस्तु माँगे तथा उसको वह वस्तु न दी जाय अथवा यदि कोई भिखारी अपना मनोरथ पूर्ण किये बिना लौट जाय तो उसे न देनेवाले का सब धन द्रव्य नष्ट हो जाता है। अपने शरीर का, जो गीदड़ तथा कुत्ते आदि के ग्रास से अधिक नहीं, कोई भी लोभ या मोह नहीं करना चाहिए। मृत्यु के पश्चात् जिस शरीर को कीड़े आदि खा डालेंगे उसी शरीर के भोग के लिए इतनी सामग्री एकत्र करना व्यर्थ ही है।
देखो, जब ब्रह्मा आदि ने परस्पर एक दूसरे की सन्तान से विवाह कर लिया, तब तो उनका धर्म उसी प्रकार बना रहा; लेकिन अन्य लोगों के लिए गोत्र में विवाह करना बहुत बड़ा पाप ठहराया गया है और चार वर्ण बनाकर भाइयों के अलग अलग वर्ण कहे गये हैं, यह बुद्धि के विरुद्ध बात है। तुमको यही उचित है कि सबके साथ बराबर का व्यवहार रखो।
हे नारद! सब असुर इसी प्रकार की अनेक बातें सुनकर वेद के विरुद्ध हो गये और सब स्त्रियाँ पतिव्रत धर्म त्याग, स्वतन्त्र एवं कुपथगामिनी हो गयीं। जिसने जिसके साथ इच्छा की, भोग-विलास किया। सब कों से अधिक चेटक ने प्रचार प्राप्त किया। किसी स्त्री को बांझ से सन्तानवती कर दिया और किसी स्त्री के पति को जीवित कर दिया, किसी की आँखों में सिद्ध अञ्जन आदि लगाकर पृथ्वी के नीचे की सब वस्तुएँ दिखा दीं तथा कभी सिद्धों के देश को प्रकट करके दिखाया।
इस प्रकार मुण्डी ने माया एवं छल द्वारा सब नर-नारियों को अपने वश में कर लिया। यहाँ तक कि त्रिपुर से लेकर छोटे-छोटे असुर तक प्राचीन धर्म का त्याग कर, अर्हण के धर्म को अपना धर्म समझने लगे। वे देव-पूजन तथा पितृ-कर्म सब कुछ भूल गये। केवल यही एक धर्म शेष रह गया कि सबने रात्रि को भोजन करना बन्द कर दिया।
॥ त्रिपुर द्वारा शिव पूजन आदि का त्याग ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! इस प्रकार त्रिपुर में वेद के विरुद्ध नास्तिक मत स्थापित हो गया। इस कारण वहाँ के निवासियों से लक्ष्मी रुष्ट हो गयीं तथा चारों ओर दरिद्रता ही दरिद्रता फैल गयी।
हे नारद! इन सब बातों का मूल कारण तुम्हीं थे। उन तीनों भाइयों ने शिवजी की पूजा को छोड़ दिया, जिससे देश में उपद्रव होने लगे। तब देवताओं ने उन सबकी यह दशा देख, आनन्द में मग्न हो, इन्द्र को साथ ले, मेरे पास आकर सब वृत्तान्त कहा। तब मैं भी सब लोगों को लेकर विष्णुजी के निकट गया।
वहाँ पहुँचकर स्तुति करने के पश्चात् उनसे यह कहा-हे विष्णुजी! आपके बताये हुए उपाय से बहुत लाभ हुआ अर्थात् आपके रूप अर्हण ने शिष्यों सहित त्रिपुर में जाकर, नारद को शिष्य बनाने के उपरान्त, सबको अपने मत में मिला लिया है। अब यह निश्चित है कि आप त्रिपुर को अवश्य जला देंगे।
तब विष्णुजी बोले-हे देवताओ! शिवजी देवताओं के इस कार्य को अवश्य पूरा करेंगे। यह कहकर तथा हम सबको साथ लेकर विष्णुजी शिवजी के पास गये तथा देवताओं सहित उनकी स्तुति करने लगे।
उन्होंने विनय की-हे प्रभु! अब आप देवताओं को आनन्द प्रदानकर, दैत्यों का विनाश करें। यह सुनकर शिवजी बोले-हे देवताओ! हम तुम्हारे कार्य को समझ गये हैं। अब त्रिपुर शीघ्र ही नष्ट हो जायेंगे । शिवजी के ऐसे आश्चर्यजनक वचन सुनकर देवता अत्यन्त प्रसन्न हुए। हे नारद! जो इस चरित्र का पाठ करेगा या सुनेगा, उसके भी सब मनोरथ पूर्ण होंगे।
॥ शिव जी का पुत्र को गोद में लेकर नृत्य करना ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! तब उसी समय गिरिजा अपने पुत्र को दिखाती हुई, जय-जय शिव, जय शम्भु स्तुति करती हुई, शिवजी के पास आयीं और बोलीं- हे स्वामी! अपने पुत्र षडानन का खेल देखिये। शिवजी ने गिरिजा से लेकर लड़के को गोद में बैठा लिया तथा प्रसन्न होकर नृत्य करने लगे। यहाँ तक कि सब देवता भी इतने मग्न हो गये कि वे शिवजी के साथ नृत्य करने लगे।
इसके पश्चात् गिरिजा षडानन को साथ लिये हुए भीतर घर में चली गयीं। देवताओं ने अनेक प्रकार से स्तुति की तथा सब कष्ट कह सुनाये, लेकिन शिवजी ने कुछ न सुना। तब मैं तथा विष्णुजी आदि सबलोग शिवजी के द्वार पर बैठकर परस्पर कहने लगे कि हम क्या करें, कहाँ जायँ और किससे कहें ?
अब हमारी नौका को कौन पार लगायेंगे? शिवजी से थोड़ी सी आशा थी, वे हमारे कष्टों पर कोई ध्यान न देकर घर में चले गये। शायद हमसे उनकी सेवा में कोई अपराध हो गया है। इसके पश्चात् देवताओं ने निश्चय किया कि हमलोग यहाँ से चलकर अपनी स्त्रियों सहित शिवजी के घर में चलें।
शिवजी देवताओं का यह विचार जान गये, उन्होंने तुरन्त गणपति को वहाँ भेज दिया, उन्होंने डंडों से मारकर सबलोगों को बाहर निकाल दिया। यह देखकर कश्यप मुनि ने धैर्यपूर्वक कहा कि शिवजी ने यह क्या किया जो दया को त्यागकर, हमें ऐसा दंड दिया है ?
फिर उन्होंने जाकर विष्णुजी से सब वृत्तान्त कहा कि हमारा मनोरथ किसी प्रकार पूरा न हुआ तथा अब तक का सब परिश्रम व्यर्थ ही गया। उस समय विष्णुजी ने यह कहा-तुम सबलोग धैर्य रखो, शिवजी अवश्य ही तुम्हारे दुःखों को दूर करेंगे। तुदपरान्त विष्णुजी ने सबको शिवजी का एक मन्त्र, जिसमें दस सहस्त्र अक्षर हैं, बताकर कहा कि इसका चौदह करोड़ बार जाप करो। इससे शिवजी प्रसन्न होकर तुम्हारा मनोरथ पूर्ण करेंगे।
हे नारद! सब देवता विष्णुजी से वह मन्त्र लेकर जप करने लगे तथा शिवजी के प्रकट होने की बाट देखने लगे। तब शिवजी देवताओं के उस जप से प्रसन्न होकर प्रकट हुए और बोले- हे विष्णु एवं हे ब्रह्मा! हम तुम्हारी दृढ़ता से प्रसन्न हैं। तुम अपनी इच्छानुसार हमसे वर माँगो।
तब सब ने प्रसन्न होकर शिवजी की स्तुति की तथा यह कहा-हे सदाशिवजी! आप त्रिपुरासुर के तीनों पुरों का नाश करें। देवता यह कहकर पुनः स्तुति करने लगे। तब शिवजी ने प्रसन्न होकर कहा-ऐसा ही होगा। तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होगी। यह कहकर शिवजी ने असुरों पर कुपित होकर अपना बाण छोड़ दिया।
उस बाण ने सूर्य के समान प्रकाशवान् होकर सब दैत्यों को नष्ट कर डाला, जो शेष बचे, उन सबको त्रिपुरासुर ने अमृत कुण्ड में, जो वहाँ था, डाल दिया, जिससे वे पुनः जीवित हो उठे तथा लौहशरीर होकर बादल के समान गरजने एवं बिजली के समान चमकने लगे। तब शिवजी ने विष्णु से तथा मुझसे यह कहा कि तुम दोनों बछड़ों का रूप धारण कर, वहाँ जाकर सब अमृत को पी लो, दैत्य तुमको नहीं जान पायेंगे।
शिवजी की ऐसी आज्ञा पाकर मैं तथा विष्णु बछड़े बन, दोपहर दिन चढ़े, वहाँ जा पहुँचे। वहाँ हमको किसी ने नहीं देखा। तब वहाँ से विष्णु तथा मैं दोनों लौटकर, शिवजी की स्तुति करने लगे उस समय सब असुर शिवजी की लीला से अन्धे हो गये। हमने शिवजी की स्तुति में उनका विराटरूप वर्णन किया।
उस समय शिवजी बोले-हे देवताओ! अब तुम किसी प्रकार की चिन्ता मत करो। तुम शीघ्र ही सिद्धि को प्राप्त करोगे।
हे नारद! शिवजी यह कहकर चुप हो गये और हमलोग वहीं बने रहे। इतने ही में गणों के राजा नन्दी अपने गणों सहित वहाँ आये। देवताओं ने उन्हें वहाँ देखकर अत्यन्त शुभ माना तथा उनसे विनय की-हे शिलादि मुनि के पुत्र नन्दी! तुम कोई ऐसा उपाय करो जिससे त्रिपुर एक में मिल जायँ। यह सुनकर नन्दी ने उत्तर दिया-हे देवताओ! शिवजी ने तुमको आज्ञा दी है कि तुरन्त एक रथ बनाओ तथा सारथी, बाण, धनुष आदि सब ठीक करके रखो।
मुझको निश्चय है कि शिवजी अवश्य शीघ्र ही त्रिपुर का नाश करेंगे। यह कहकर नन्दी अपने घर चले गये। तब देवताओं ने अत्यन्त प्रसन्न होकर शिवजी का जय-जयकार किया। इन्द्र ने तुरन्त ही विश्वकर्मा को बुलाकर शिवजी की आज्ञा सुनायी। फिर विष्णु तथा मैंने विश्वकर्मा का आदर करते हुए कहा कि तुम शिवजी के सारथी होना। इसके अतिरिक्त तुम शीघ्र ही धनुष एवं बाण भी तैयार कर लो। विश्वकर्मा ने यह सुनकर सदाशिवजी का ध्यान किया तो उनके मन मैं रथ निर्माण करने की युक्ति बैठ गयी।
॥ विश्वकर्मा द्वारा निर्मित रथ पर चढ़कर शिव का त्रिपुर के विनाशार्थ प्रस्थान ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! विश्वकर्मा द्वारा निर्मित उस रथ का विस्तार मानो सम्पूर्ण सृष्टिभर के समान था। उसमें सूर्य दाहिना चक्र तथा चन्द्रमा बायाँ चक्र इसी प्रकार बारहों सूर्य तथा सोलहों कला वृद्मामान थीं। सभी पर्वत एवं वर्ष, मास, तिथि रथ के खण्ड बने। चारों वेद उस रथ के घोड़े तथा व्यास आदि घोड़ों को चलानेवाले हुए।
धर्म-कर्म के शास्त्र, पुराण एवं न्यायशास्त्र ये सब उसके मुख हुए। आश्रम, वर्ण आदि उसके अंग हुए। गंगा आदि नदियाँ तथा चारों सागर चॅवर लेकर रथ के चारों और खड़े हुए। लोकालोक पर्वत आदि उसकी सीढ़ियाँ हुए। प्रणव चाबुक, विष्णुजी बाण तथा हिमाचल धनुष हुए। यहाँ तक कि ब्रह्मा से लेकर तृण तक सब उस रथ में विद्यमान थे।
इस प्रकार वह सब सामग्री पूर्णरूप से तैयार हो गयी, तब वह रथ शिवजी के द्वार पर ले जाकर खड़ा किया गया। उस समय शिवजी बाहर आये। उनको देखकर सबने विनती की-हे महादेव! अब आप रथ में आरूढ़ हों तथा त्रिपुर का नाश करके तीनों लोकों को आनन्द प्रदान करें। तब शिवजी ने तुरन्त गणपति को बुलाकर उनकी पूजा की। फिर वे रथ पर आरूढ़ होकर आकाश एवं पृथ्वी को कंपाते हुए चल दिये।
सब ने जय-जयकार किया। पृथ्वी उस रथ का भार न सहकर काँपने लगी। इस प्रकार शिवजी अपनी सेना सहित देवताओं को आनन्दित करते हुए वहाँ से चले। उस समय शिवजी के इस आश्चर्यजनक चरित्र से त्रिपुर एकत्र हुए। तब शिवजी ने उचित समय जानकर अपने धनुष में विष्णुपति अस्त्र को लगाकर तथा अपने तेज को उसी अस्त्र में स्थापित कर दिया, जिससे धनुष-बाण दोनों ही प्रकाशवान् हुए।
सृष्टिभर में प्रकाश ही प्रकाश फैल गया। तब शिवजी ने उस समय मन में यह विचार किया कि मैं तीनों पुरों को जला दूँ। उस समय विलम्ब हुआ जानकर विष्णुजी, मैं तथा इद्र ने, उनकी बहुत प्रकार से विनती की।
॥ शिवजी द्वारा त्रिपुर को भस्म करना ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! तब देवताओं ने कहा-हे शिवजी! अब आप त्रिपुरों को नष्ट करने में विलम्ब मत कीजिये। आपके इस तेज से तीनों लोक जल रहें हैं। यह सुनकर शिवजी ने प्रसन्न हो, तुरन्त वही अस्त्र त्रिपुर को लक्ष्य करके छोड़ दिया। उसके छोड़ने से भीषण शब्द हुआ। ऐसा प्रतीत होता था, जैसे प्रलयकाल के बादल गरज रहे हों। उस अस्त्र में से निकली हुई अग्नि से तीनों लोक जलाने लगे धरती काँपने लगी, पर्वत जल उठे, शेषनाग पृथ्वी को सिर पर न रख सके, नदियों का जल सूख गया, दिग्पाल एवं कूर्म-जो पृथ्वी का भार सँभाले हुए हैं, बलहीन हो गये तथा सब मुनि एवं सिद्ध ध्यान छोड़कर आश्चर्यचकित हुए।
उसी समय शिवजी द्वारा छोड़े गये बाण के पहुँचते ही वे तीनों पुर जलकर भस्म हो गये। तदुपरान्त वह बाण उन सबको जलाकर, शिवजी के पास लौट आया। इस प्रकार बाण के उस भीषण प्रहार से त्रिपुर में कोई प्राणी जीवित न रहा। सब दैत्य शिवजी के हाथ से मरकर मुक्ति पा गये। वे सभी शिवजी के गण हुए; क्योंकि उनमें भक्ति का बीज शेष था और भक्ति का बीज कभी नष्ट नहीं होता।
उस समय शिवजी का स्वरूप ऐसा भयानक था, जिसे देखकर प्रतीत होता था कि प्रलय होने में अब कोई देर नहीं है। मैं तथा विष्णुजी उस महातेज के कारण शिवजी को अच्छी प्रकार नहीं देख सकते थे। यह देख मैंने तथा विष्णुजी ने दूर से ही उनकी स्तुति की।
हे नारद! सबसे पहिले विष्णुजी ने शिवजी की स्तुति की तथा कहा-हे शिवजी! अब आप क्रोध को शान्त करें। फिर मैंने भी उनकी स्तुति की। इसके पश्चात् लोकपाल, देवता, सिद्ध, नाग, मुनि तथा वेदों ने अपनी-अपनी स्तुति को युक्ति के अनुसार काव्यरूप में गाया तब ऐसी अनेक प्रकार की स्तुति सुनकर शिवजी प्रसन्न हुए। इस प्रकार हम सब शिवजी को प्रसन्न पाकर, उनकी सेवा करने लगे।
॥ अर्हण द्वारा शिवजी की स्तुति एवं विष्णु की आज्ञा से मरुस्थल में वास करना ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! उस समय शिवजी हम सब पर अत्यंत प्रसन्न होकर बोले कि तुम सबलोग अपनी-अपनी इच्छानुसार वर माँग लो। तब देवताओं ने यह कहा-हे महादेव! आपने त्रिपुर को नष्ट करके हम देवों को बड़ा आनन्द प्रदान किया। हम सब आपकी कृपा से कृतार्थ हो गये।
हे शिवजी! इसी प्रकार जब-जब हम पर कोई कष्ट पड़े, तब-तब आप उसे दूर किया कीजिए तथा अपनी भक्ति हम सबको प्रदान कीजिए। यह सुनकर शिवजी ने ॐ कहकर, हम सबको प्रसन्न किया। उस समय नृत्य एवं गायन का बहुत बड़ा उत्सव हुआ। उसी समय अर्हण ने भी अपने चारों शिष्यों सहित वहाँ उपस्थित होकर शिवजी को प्रणाम किया तथा अन्य सब देवताओं को भी दंडवत् की।
फिर नम्र होकर शिवजी से इस प्रकार कहा-मैंने आपकी आज्ञानुसार ही बिना सोचे-विचारे इस मत का प्रचार किया, सो मुझ पर आप ऐसी कृपा करें, जिससे मुझे ऐसे दुष्कर्म का कोई पाप न लगे। अब आप मुझे आज्ञा दीजिए कि मैं क्या करूँ, तथा किस स्थान पर वास करूँ। यह भी बताइये कि अपनी इस पुस्तक का, जिसमें कि सोलह सहस्त्र श्लोक हैं, क्या करूँ ?
मेरे शिष्यों के लिए आपकी क्या आज्ञा है ? यह सुनकर विष्णुजी ने शिवजी की आज्ञानुसार यह कहा-हे अर्हण! तुम शिष्यों सहित मरुस्थल में जाकर वास करो। कलियुग के आने तक अपना मत किसी पर प्रकट मत करना। तुमको कोई पाप नहीं लगेगा। जब कलियुग का आरम्भ हो, तब तुम इधर-उधर अपने मत का प्रचार करना तथा समस्त स्त्री-पुरुषों का मन अपने अधीन करना; जिससे सबलोग महापापी हो जायँ।
कलियुग पापों का बीज है, इसलिए तुम्हारा यह मत कलियुग में अच्छी प्रकार चलेगा और उस समय सब लोग सत्य मार्ग त्यागकर, कुमार्ग पर चलने लगेंगे। यह कहकर विष्णुजी ने शिष्यों सहित अर्हण को वहाँ से विदा किया।
हे नारद! इस प्रकार जब कलियुग आयेगा, तब अर्हण मरुस्थल से निकलकर अपने मत को प्रकट करेगा। हे नारद! मयदानव भी यद्यपि त्रिपुर में था, वह शिवजी की कृपा से जीवित ही बचा रहा। उसने भी शिवजी की स्तुति कर, हम सबको भी प्रणाम किया।
तब शिवजी ने मयदानव की स्तुति सुनकर कहा-हे मयदानव! तुम निर्भय होकर रसातल में वास करो। शिवजी की आज्ञानुसार मयदानव वहाँ जाकर रहने लगा। सब देवता मयदानव पर शिवजी की यह कृपा देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुए।
हे नारद! जो मनुष्य इस चरित्र को सुनेगा या सुनावेगा, उसके सभी मनोरथ पूर्ण होंगे।
॥ शिवभक्ति के कारण मयदानव का अग्नि से बचना एवं दैत्यों का आचार्य बनना ॥
ब्रह्माजी के मुख से त्रिपुर की कथा सुनने के पश्चात् नारदजी बोले-है ब्रह्माजी! अब आप कृपा करके यह बताइये कि मयदानव त्रिपुर के साथ क्यों नहीं जला? यह सुनकर ब्रह्माजी बोले-हे नारद! मयदानव शिवजी का परम भक्त था, इसीलिए वह इस अग्नि से न जलकर बचा रहा। अब मैं तुम्हें इसके विषय में बताता हूँ। कश्यप की स्त्रियों में एक दनु नाम की स्त्री थी।
उसके गर्भ से साठ लड़के, जो बड़े वीर-धीर थे, उत्पन हुए। वे तीनों लोकों में बहुत ही बुद्धिमान थे। उनमें से एक मय भी था। उसने शिवजी का भक्तिपूर्वक बड़ा तप किया तथा अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्तकर, पंचाक्षरी मंत्र का भली-भाँति ध्यानपूर्वक जाप किया।
वह गर्मियों में अग्नि में तपकर, वर्षा में खुले वन में रहकर तथा शीतकाल में जल के भीतर बैठकर कठिन तपस्या करता रहा। उसने शिवजी की मिट्टी की मूर्ति बनाकर उसकी पूजा की तथा चावल, बिल्वपत्र और प्रत्येक रंग के सुगन्धित पुष्प चढ़ाए। वह स्थिर होकर दृढ़ आसन एवं ध्यान से श्वास रोक कर बैठ गया।
तब शिवजी ने प्रकट होकर उससे वर माँगने के लिए कहा; उसने शिवजी के इस वचन को नहीं सुना। यह देखकर शिवजी ने अपनी मूर्ति को मय के ध्यान से खींच लिया। उस समय मय ने आश्चर्यचकित होकर नेत्र खोल दिये तो देखा कि सामने शिवजी खड़े हैं। उनका महागौर शरीर, भस्म लगाये, भाल पर चन्द्रमा विराजमान एवं अपने मुख्य स्वरूप तथा मुख्य लक्षणों से सुशोभित है।
ऐसा सुन्दर स्वरूप देखकर मयदानव उठ खड़ा हुआ तथा सिर झुका, शिवजी को प्रणाम कर, स्तुति करते हुए बोला-हे नाथ! मैं क्या वरदान माँगूँ ? आप तो स्वयं ही सब कुछ जानते हैं।
हे नारद! शिवजी ने मय के मुख से, ऐसे वचन सुनकर कहा-हे मय! हम तुमको तुम्हारे हृदय की इच्छानुसार ही यह वरदान देते हैं कि तुम सब दैत्यों के आचार्य होकर सदैव निर्दोष रहोगे। जिस प्रकार देवताओं में विश्वकर्मा हैं, उसी प्रकार दैत्यों में तुम होगे। तुमको जरा-मृत्यु प्राप्त न होगी। हम तुमको कभी नष्ट न करेंगे। यह कहकर शिवजी ने मय के शरीर को स्पर्श किया जिससे उसे अत्यन्त आनन्द प्राप्त हुआ।
मय भी उनको प्रणाम कर अपने घर लौट आया। तब समस्त दैत्यों ने शिवजी के वरदान के कारण मय को अपना आचार्य बनाया। हे नारद! मयदानव का यह चरित्र अत्यन्त पवित्र है। यह सुनने तथा सुनानेवाले को मय के समान ही कर देता है। उसकी बुद्धि कभी नष्ट नहीं होती। जो मनुष्य इसका पाठ करता है, उससे कभी कोई पाप नहीं होता तथा अन्त में वह मुक्ति प्राप्त करता है।
॥ इन्द्र द्वारा शिवजी के ऊपर वज्र प्रहार ॥
इतनी कथा सुनाकर सूतजी बोले-हे शौनक! इस चरित्र के सुनने के पश्चात् नारद ने ब्रह्माजी से कहा-हे पिता! अब आप मुझे शिवजी के अन्य चरित्रों के विषय में बताइये।
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! तुमको तथा तुम्हारी बुद्धि को धन्य है, जो तुम्हें शिवजी में इतनी भक्ति है। मैंने वेदों को बहुत ही छाना है तथा उनसे जो कुछ भी शिक्षा प्राप्त की है, उसका मूल तुमसे वर्णन करता हूँ।
हे नारद! पहिले प्रत्येक मनुष्य असंख्य जन्मपर्यन्त हमारी पूजा करके विष्णुजी की भक्ति प्राप्त करता है। फिर बहुत जन्मों तक विष्णुजी की उपासना करने के पश्चात् शिवजी की प्रीति उत्पन्न होती है। तुम निःसंदेह शिवजी के परम भक्त हो। अब मैं तुम्हें शिवजी का चरित्र सुनाता हूँ। तुम ध्यानपूर्वक सुनो। किसी समय एकबार इन्द्र एवं समस्त देवताओं ने शिवजी के दर्शन के लिए एक सभा की। उसमें ग्यारह रुद्र, बारह सूर्य, आठ वसु, तेरह विश्वेदेवा, उनचास पवन, समस्त दिक्पाल तथा उपदेव आदि उपस्थित थे।
ऐसे समाज को अपने साथ लेकर इन्द्र बड़े उत्सव के साथ, रजोगुण धारण किए हुए, शिवजी के दर्शनार्थ चले। उनको संसार में केवल शिवजी के दर्शन से ही यश प्राप्त करना स्वीकार था। उस समय शिवजी ने अपनी लीला द्वारा अपना भयंकर रूप बनाया तथा अवधूतों के समान होकर वे इन्द्र के नगर में प्रकट हुए।
उन्हें देखकर इन्द्र ने पूछा-तुम कौन हो? ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे तुम शिवजी के सेवकों में से कोई हो। यदि यह सत्य है, तो तुम हम को शिवजी के निवास-स्थान का पता बताओं। इस प्रकार इन्द्र ने कई बार पूछा उन्हें कोई उत्तर न मिला।
यह देखकर इन्द्र बहुत क्रोधित हुए तथा शिवजी को धमकाते हुए बोले-अरे, तू भूत तो नहीं है, जो उत्तर नहीं देता? अब मैं तुझे वज्र से मार डालता हूं। यह कहकर इन्द्र ने अपना वज्र शिवजी पर चलाया, जो शिवजी की गद्रन में जा लगा। शिवजी मन की शक्ति एवं प्रभाव को स्थिर रखने के लिए नीलकंठ हो गए अर्थात उन्होंने अपने कण्ठ में श्याम-चिन्ह धारण कर लिया।
उस समय वज्र भी जलकर भस्म हो गया तदुपरान्त शिवजी का तेज इतना भभक उठा कि चारों ओर दाह फैल गया और सब देवता स्त्रियों सहित जलने लगे। यह दशा देखकर सब कुपित हुए। तब बृहस्पति ने सदाशिव का ध्यान किया और पहिचाना कि ये शिवजी ही हैं। उस समय वे शिवजी की स्तुति करते हुए इन्द्र से बोले-हे इन्द्रदेव! यह जो सम्मुख खड़े हैं, वे स्वयं सदाशिव ही हैं। तुम दंडवत् कर इनकी स्तुति करो।
हे नारद! तब इन्द्र, बृहस्पति तथा समस्त देवता शिवजी की स्तुति करते हुए इस प्रकार बोले-हे महाराज! आप हमारा यह अपराध क्षमा करें। हम तो आपके दर्शनों के लिए ही जा रहे थे, आपने स्वयं कृपा करके गुप्त-रीति से, बिना किसी परिश्रम के हम सबको दर्शन दिये। शिवजी ऐसी उत्तम एवं बृहत् स्तुति सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और बोले-है देवताओ! हम बहुत प्रसन्न हैं। अब तुम अपनी इच्छानुसार वरदान माँगो।
शिवजी के ऐसे वचन सुनकर देवगुरु ने कहा-हे शिवजी! अब आप क्रोध दूर करके इन्द्र की रक्षा करें तथा आपके भालपर जो तेजरूप नेत्र है, उसकी तीक्ष्णता दूर हो जाय। यह वचन सुनकर शिवजी बोले- हे बृहस्पति! उस अग्नि को जो हमारे नेत्र से निकल गयी है, अब हम किसी प्रकार अपने भाल में स्थान नहीं दे सकते। हम इस तेज को बहुत दूर फेंक देंगे, जिससे इन्द्र को कष्ट नहीं होगा। तुमने इन्द्र को जीवनदान दिया है, इसलिए आज से तुम्हारा नाम जीव प्रसिद्ध होगा।
यह सुनकर बृहस्पति एवं इन्द्र आदि अत्यन्त प्रसन्न हुए। तब शिवजी ने उस तेज को अपने हाथ से समुद्र में फेंक दिया तथा अन्तर्धान हो गये।
॥ शिवजी के तेज द्वारा जलन्धर की उत्पत्ति तथा उसके चरित्रों का वर्णन ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! जब शिवजी ने अपने नेत्र के तेज को दूर फेंक दिया, तब वह सुरनदी सागर में गिर पड़ा तथा एक बालक के रूप में प्रकट होकर अत्यनत भयानक रुदन करने लगा। उसके शब्द से पृथ्वी काँपने लगी। वह शब्द चारों ओर फैल गया। सबलोग आश्चर्य करने लगे। पर्वत चलायमान हुए तथा समुद्र सूख गये।
तब सब देवता एवं मुनि आश्चर्यचकित हो, मेरे पास आकर बोले-हे ब्रह्मन्! यह कैसा शब्द है। और कहाँ से आ रहा है ? आप इसको दूरकर, देवताओं को आनन्द प्रदान कीजिये। मैंने उनसे कहा-हे देवताओ! मैं स्वयं भी इस शब्द को सुनकर आश्चर्यचकित हूँ, तुम सबलोग अब अपने-अपने घर को जाओ। जहाँ से यह शब्द आता है, मैं वहाँ जाकर पता लगाता हूँ।
इस प्रकार समझाकर मैंने उन सबको विदा कर दिया तथा स्वयं उस शब्द को ढूँढ़ते हुए समुद्र तट पर आया। वहाँ मैंने यह देखा कि एक अत्यन्त सुन्दर बालक पड़ा हुआ है। उसे देखकर मैंने निश्चय किया कि वह शब्द अवश्य ही इस बालक का है। मुझको आते हुए देखकर सागर अपने उस पुत्र सहित मेरे पास आया तथा प्रणाम करने के पश्चात् उसने उस लड़के को मेरी गोद में डाल दिया और स्वयं खड़ा रहा।
मैंने उससे पूछा-हे सागर! यह पुत्र किसका है ? सागर ने उत्तर दिया-हे ब्रह्मन्! यह बालक मुझमें उत्पन्न होने से मेरा ही है। अब आप इसका नामकरण संस्कार कीजिये। हम दोनों में परस्पर यह वार्ता हो ही रही थी कि उस लड़के ने मेरी दाढ़ी पकड़ कर इस प्रकार खींचा कि मेरी आँखों से आँसू निकल पड़े।
तब मैंने समुद्र से कहा-हे समुद्र! तेरा यह पुत्र अत्यन्त बलशाली होकर तेरे यश को समस्त संसार में फैलायेगा। इसने मेरी दाढ़ी को इतनी जोर से पकड़ा है कि मेरी आँखों से आँसू बहने लगे, इसलिए इसका नाम जलन्धर होगा। अब यह जहाँ से उत्पन्न हुआ है, वहीं चला जाये।
हे नारद! यह कहकर मैंने शुक्र को बुलाया तथा एक बड़े उत्सव का आयोजन किया। फिर उसका राज्याभिषेक करके ब्राह्मणों को बहुत दान दिया। जालन्धरी नगरी उसकी राजधानी हुई। उस समय समुद्र ने बड़ी धूमधाम से उत्सव की रीतियाँ पूर्ण कीं।
इसके पश्चात् मैंने जलन्धर से कहा-हे जलन्धर! तुम्हारे कुल के गुरु शुक्र होंगे। इतना कहकर वहाँ से मैं अन्तर्धान हो गया। तब जलन्धर जालन्धरी नगरी को बसाकर वहीं निवास करने लगा। समुद्र उसे देखकर बहुत प्रसन्न था, उसने दैत्यों के राजा कालनेमि को बुलाकर अपने पुत्र की शक्ति का वर्णन किया। कालनेमि उसे सुनकर कुलसहित अत्यन्त प्रसन्न हुआ तथा अपनी पुत्री का विवाह जलन्धर के साथ करने की इच्छा की।
तदुपरान्त शुक्र की सम्पति से दोनों का विवाह बड़ी धूमधाम से सम्पन्न हुआ। जलन्धर वैसे तो स्वयं ही बहुत बलवान् था, उस पर शुक्र की सहायता मिलने पर उसने फों को जीतकर आधीन कर लोकों को सब लिया। उसने पुत्रवत् प्रजा का भली-भाँति पालन किया। जो दैत्य पाताल लोक में भाग गये थे, वह सब भी जलन्धर की आज्ञा पाकर निर्भय हो, उसके समीप आ पहुँचे।
जलन्धर ऐसा राजा हुआ कि उसके राज्य में कभी कोई पाप नहीं होता था। तीनों लोकों में कभी किसी ने उसकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं किया। उसने सब लोगों से अपने-अपने वर्ण के अनुसार धर्म-कर्म कराया, जिससे कोई कुमार्ग पर अग्रसर न हुआ। इस प्रकार उसका प्रताप एवं तेज तीनों भुवनों में फैल गया।
॥ जलन्धर का राहु के संबंध में शुक्र से वार्त्तालाप ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! एकबार जलन्धर अपनी सभा में बैठा हुआ था। सब वीर, दैत्यों के अधिपति तथा समस्त देवता आदि उसके चारों ओर अपने-अपने स्थान पर बैठे हुए थे, इतने में बिना शीश का राहु उस सभा में आ उपस्थित हुआ। उसको देखकर जलन्धर ने शुक्र से अत्यन्त आश्चर्य के साथ पूछा-हे गुरु! इसका सिर किसने काटा है ?
शुक्र बोले-हे जलन्धर! इसके विषय में, मैं तुम्हें एक पुरातन कथा सुनाता हूँ। जब देवता एवं दैत्यों ने परस्पर युद्ध किया तथा देवता परास्त हुए, उस समय दैत्यों के राजा बलि थे। राजा बलि शिवजी के अनन्य भक्त थे। उस समय सब देवता दैत्यों से हार कर, विष्णुजी की शरण में गये।
विष्णुजी ने देवताओं पर कृपा करके यह कहा-हे देवताओ! तुम सब जाकर दैत्यों से मेल कर लो तथा समुद्र के दोनों किनारों का भली-भाँति मन्थन करो। जब उस समुद्र में से अमृत की उत्पत्ति होगी, तब ही अमृत को तुम सबको पिलाकर, दैत्यों के साथ छल करोंगे। इस प्रकार जब तुम अमृत पान कर लोगे तब दैत्यों पर प्रबल हो जाओगे।
यह सुनकर देवताओं ने दैत्यों के राजा बलि के पास आकर मित्रता स्थापित की। तदुपरान्त दैत्य एवं देवता दोनों मन्दर गिरि को उखाड़कर समुद्र तट पर ले गये। वहाँ वासुकि नाग को मन्दर गिरि में डालकर, मन्दर गिरि को मथानी बनाया यह अच्छा नहीं हुआ।
अब तुम इसका फल अवश्य भोगोगे। जलन्धर की यह आज्ञा पाकर घम्मर दूत वहाँ से चलकर इन्द्र की सभा में जा पहुँचा। वहाँ उसने अहंकार में भरकर इन्द्र के सम्मुख अपना मस्तक नत नहीं किया तथा इस प्रकार कहने लगा-हे इन्द्र! समुद्र के पुत्र जलन्धर ने तुमको यह सन्देशा भेजा है कि तुमने समुद्र से जो रत्न निकाल लिये हैं, उन सबको हमें सौंप दो तो सब बात ठीक हो जायगी; क्योंकि दिन का भूला हुआ यदि रात को लौट आवे तो वह भूला नहीं कहाता है।
इसलिए तुम शीघ्र ही हमारी शरण में आओ। अन्यथा तुम इसका फल शीघ्र ही प्राप्त करोगे। यह सन्देश सुनकर इन्द्र जलन्धर को बड़ा बलवान एवं पराक्रमी समझ, मन में भयभीत हुए, लेकिन ऊपर से क्रोधित होकर बोले-हे दूत! तुम हमारी ओर से जलन्धर को यह उत्तर देना कि पहिले किसी समय पहाड़ों ने हमारे लोक में उड़कर उसको नष्ट-भ्रष्ट कर दिया था तथा यहाँ के असंख्य निवासियों को मार डाला था। उस समय हमने पर्वतों के पंख काट डाले थे तथा जो शेष रह गये थे, वे डूबकर समुद्र में छिप गये थे।
समुद्र ने शरण देकर उनकी रक्षा की थी। इसके अतिरिक्त समुद्र ने हमारे शत्रुओं को अनेक बार अपनी शरण दी है। दैत्यों को भी समुद्र ने ही छिपाया था। इसी अपराध के कारण हमने समुद्र का मन्थन किया तथा उसके रत्न निकाल लिए। पहले भी देवताओं का एक और शत्रु उत्पन्न हुआ था, जिसका नाम शंखासुर था। उसकी रक्षा समुद्र भी न कर सका।
इसलिए जलन्धर को चाहिए कि वह इस प्रकार बुद्धिहीन होकर दुर्विचार में न पड़े। संसार में ऐसा कौन देवता या दैत्य है जो हमसे शत्रुता करके पार पावे ? संभवतः उसने अभी हमारे बल एवं प्रताप के विषय में किसी से सुना नहीं है। हमने बड़े-बड़े अनेक दैत्यों को अपने छोटे भाई की सहायता से मार डाला है।
यदि जलन्धर अपनी भलाई चाहे तो वह इतने हाथ-पैर न फैलावे। यदि वह इस बात को नहीं मानेगा तो उसके हाथ दुःख एवं लज्जा के अतिरिक्त और कुछ न लगेगा।
हे नारद! दूत ने इन्द्र के ऐसे वचन सुनकर कहा-हे इन्द्र! तुम व्यर्थ ही अहंकार मत करो, क्योंकि जलन्धर ने संसारभर का राज्य प्राप्त किया है। अब तुमको उचित है कि गर्व त्यागकर, सब रत्न जलन्धर को अभी सौंप दो तथा स्वयं चलकर, जलन्धर की छाया में आनन्दपूर्वक रहो। यदि तुमने ऐसा नहीं किया तो तुमको बहुत ही कष्ट उठाना पड़ेगा।
दूत के ऐसे वचन सुनकर इन्द्र ने क्रोधित होकर उत्तर दिया-हे दूत! हमने जो तुमसे पहिले कहा है, तुम वही जाकर जलन्धर से कह दो फिर जो ईश्वर करेगा, उसे देखा जायेगा। इन्द्र ने यह कहकर दूत को वहाँ से विदा कर दिया तथा स्वयं क्रोध एवं भय की दशा में चिन्तारूपी समुद्र में डूब गये। उधर दूत ने जलन्धर के पास पहुँचकर इन्द्र के कहे हुए शब्द विस्तारपूर्वक कह सुनाये। उन्हें सुनकर जलन्धर क्रोधाग्नि से जल उठा तथा आवेश में उसके ओठ फड़कने लगे।
॥ जलन्धर का देवताओं से युद्ध ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! अपने दूत द्वारा इन्द्र के वचन सुनकर, जलन्धर ने अन्यन्त क्रोधित होकर समस्त देवताओं को परास्त करने का उद्योग किया। उसने दैत्यों की एक विशाल सेना एकत्र की। उसमें राक्षस, दैत्य एंव दानव करोड़ों की संख्या में एकत्र हो गये। शुम्भ-निशुम्भ के समान उस वीरों की सेना में अनेक वीर थे। कालनेमि भी अन्य वीरों सहित उसमें सम्मिलित हुआ। ऐसी बलशाली अपार सेना लेकर जलन्धर देवलोक जीतने को चल दिया। उस समय पृथ्वी काँपने लगी । वे दैत्य मार्ग में गरजते हुए देवलोक में जा पहुँचे।
उन्होंने देवलोक को चारों ओर से घेर लिया। जलन्धर नन्दनवन में जाकर ठहर गया। उस समय इन्द्र जलन्धर की उस विशाल सेना को देखकर अत्यन्त क्रोधित हुए। तदुपरान्त वे अपने गुरु बृहस्पति की आज्ञा लेकर, देवताओं की सेना लिये हुए नगर से बाहर निकल आए। तब दोनों सेनाओं में परस्पर युद्ध होने लगा, अनेक प्रकार के शस्त्र चलने लगे और देवता एवं दैत्य बड़े उत्साह के साथ एक दूसरे पर प्रहार करने लगे।
रक्त की नदियाँ बहने लगीं, दोनों ओर के बड़े-बड़े वीर योद्धा कट मरे, युद्धस्थल में उनके शवों का ढेर लग गया। हाथी, घोड़े, रथ, प्यादे, देवता एवं दैत्य मरने लगे। देवताओं के हाथ से जिन दैत्यों की मृत्यु हुई, उनको असुरगुरु शुक्रजी अपनी मृतसंजीवनी विद्या की शक्ति द्वारा जीवित कर देते थे अर्थात् शुक्र मंत्र से जल पढ़कर मरे हुए दैत्यों के मस्तक पर छिड़कते थे जिससे वे जीवित हो उठते थे।
इसी प्रकार बृहस्पति भी द्रोणाचल से जीवनदान देनेवाली औषधि लाकर देवताओं को जीवित कर देते थे। निदान देवता तथा दैत्य पुनः युद्ध करने लगते थे। इस प्रकार कोई विजय प्राप्त नहीं कर सका। जब जलन्धर ने यह देखा कि देवता मरकर पुनः जीवित हो जाते हैं तो वह अत्यन्त क्रोधित हुआ।
उसने शुक्राचार्य से बहुत विनती करके पूछा-हे गुरु! हमने अनेक देवताओं को मारा, वे सब जीवित हो उठे। हम तो अब तक यही जानते थे कि संजीवनी विद्या का ज्ञान केवल आप ही रखते हैं, अन्य कोई नहीं जानता। यह सुनकर शुक्र ने कहा-हे जलन्धर! एक मृतकों को जीवित करनेवाली परम औषधि द्रोणगिरि पर है। बृहस्पति उसे लाकर देवताओं को जीवित कर देते हैं। यदि तुमको विजय की इच्छा है, तो द्रोणगिरि को जड़ से उखाड़कर समुद्र में डलवा दो।
यह सुनकर जलन्धर ने प्रसन्न होकर, द्रोणगिरि को जड़ से उखाड़कर समुद्र में डाल दिया। फिर युद्ध क्षेत्र में आकर घनघोर युद्ध करने लगा। उस समय उसने अपने हस्तकौशल एवं वीरता से शत्रुओं को परास्त कर दिया । हे नारद! इस प्रकार युद्ध में जो दैत्य मारे जाते थे, उनको शुक्र तुरन्त जीवित करने लगे; बृहस्पति जब देवताओं को मरा हुआ देखकर पुनः द्रोणगिरि पर औषधि लेने गये, तो वहाँ उन्होंने पर्वत को ही नहीं देखा। यह देखकर बृहस्पति ने अत्यन्त चिन्तित होकर समझा कि जलन्धर ने उस पर्वत को नष्ट कर दिया है।
तब वे लौटकर देवताओं से बोले-हे देवताओ! अब तुम युद्ध करना बन्द कर दो। जलन्धर महापराक्रमी है। देखो, इसने द्रोणगिरि को मूल से खोद डाला है। अब तुम समय को देखते रहो और इसकी अधीनता स्वीकार कर लो। गुरु के ऐसे वचन सुनकर समस्त देवता युद्धस्थल से भाग चले। जिसको जहाँ स्थान मिला, वह वहीं जा छिपा। जब दैत्यों ने देवताओं को इस प्रकार भागते हुए देखा, तो प्रसन्नता से भरकर घोर सिंहनाद किया और विजय के बाजे बजने लगे।
तदुपरान्त जलन्धर देवताओं के नगर में चला गया। यह देखकर इन्द्र आदि बड़े-बड़े देवता सिमटकर एक कुन्तल में जा छिपे, वहाँ भी उनका भय दूर न हुआ। इस प्रकार उन्होंने अनेक प्रकार के कष्ट उठाए। जलन्धर देवताओं को अपने वश में करने के पश्चात् आनन्दपूर्वक राज्य करने लगा। जिस स्थान पर कभी देवताओं की राजधानी थी, वहाँ अब दैत्यों की राजधानी बनायी। जलन्धर ने चन्द्र, अग्नि, यम, कुबेर, सूर्य, पवन आदि समस्त देवताओं के अलग-अलग पदों पर दैत्यों की नियुक्ति की। वह ऐसा प्रतापी एवं शक्तिशाली हुआ, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता।
इसके पश्चात् वह शुम्भ आदि को राज्यकार्य सौंपकर, सेना सहित देवताओं की खोज करने के लिए सुमेरु पर्वत की ओर चल दिया।
॥ विष्णु जी का जलन्धर से युद्ध तथा उसे वर देना ॥
ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! देवताओं ने जब जलन्धर को आते हुए देखा तो उन सब ने घबराकर विष्णुजी का स्मरण किया। वे सब हाथ जोड़, नत-मस्तक हो, स्तुति करते हुए 'जय-विष्णु, जय-विष्णु' कहने लगे तथा इस प्रकार बोले-हे विष्णुजी! आप प्रकट होकर दैत्यों का नाश करें। हमारे सम्मुख जलन्धर चला आ रहा है, इसलिए आप जो उचित समझें, वही करें। आपने देवताओं को दुःखी देखकर मत्स्य अवतार लिया था तथा मुनियों के समस्त दुःखों को दूरकर प्रलय में विराजमान हुए थे।
फिर आपने देवताओं के लिए कूर्मावतार लेकर पर्वत को अपनी पीठ पर उठाकर रखा। जब हिरण्याक्ष बहुत बलवान होकर देवताओं को कष्ट पहुँचाने लगा, उस समय भी आपने वाराह अवतार लेकर उसको नष्ट कर दिया था। जब उसके भाई हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद के साथ अन्याय किया, तब आपने नृसिंह का अवतार धारणकर उसका हृदय विदीर्ण किया था। आपने केवल देवताओं के कार्य को पूर्ण करने के लिए ही वामन अवतार लेकर बलि के साथ छल किया था तथा सम्पूर्ण पृथ्वी उससे निकालकर हम सबको दे दी थी।
आप शिवजी की भक्ति में स्थित होकर समस्त संसार का उपकार करते रहे हैं। जिस समय रावण ने शिवजी के वरदान से ऊँची पदवी पर पहुँचकर सबको दुःख पहुँचाया। उस समय आपने रामचन्द्र के रूप में अवतरित होकर शिवजी से बाण प्राप्त किया था तथा उसी बाण द्वारा रावण को मार डाला था। फिर आपने कृष्ण अवतार लेकर पृथ्वी के भार को उतारा।
हे विष्णुजी! आप कलियुग में कल्कि अवतार लेकर सब म्लेच्छों को नष्ट करेंगे। इस समय अब आप हमें अपने पीत वसन की झलक क्यों नहीं दिखाते ? आप शीघ्र ही हमारे दुःखों को दूर कीजिये, क्योंकि आप स्वयं कष्ट सहकर भक्तों को आनन्दित करते हैं। इसी प्रकार देवताओं ने विष्णुजी की बड़ी स्तुति की। जो कोई इस स्तुति को सुनता है वह कभी कष्ट नहीं पाता ।
हे नारद! विष्णुजी ने देवताओं की ऐसी स्तुति सुनकर अब यह जाना कि देवताओं पर इस समय कुछ दुःख पड़ा है तो वे तुरन्त उठकर गरुड़ पर आरूढ़ हुए। उस समय लक्ष्मी ने विष्णुजी की ऐसी शीघ्रता देखकर पूछा-हे नाथ! इस समय इतनी शीघ्रता से आप कहाँ जा रहे हैं ? तब विष्णुजी ने उन्हें यह उत्तर दिया-हे लक्ष्मी! तुम्हारे भाई जलन्धर ने देवताओं पर आक्रमण कर दिया है। इसलिए हम उनकी रक्षा तथा दैत्यों से युद्ध करने के लिए जा रहे हैं।
लक्ष्मी ने यह सुनकर, जलन्धर के प्रेम के कारण कहा- हे प्रभो! आप मेरे भाई जलन्धर को किस प्रकार मारेंगे ? विष्णुजी ने कहा-जलन्धर बहुत बलवान एवं पराक्रमी है, वह हमारे मारने से नहीं मरेगा। वह रुद्र का अंश है तथा ब्रह्मा के वरदान से देवताओं को कष्ट दे रहा है, इस समय यदि हम वहाँ नहीं जायँ तो हमारा भक्तवत्सल नाम मिट जायेगा। यह कहकर विष्णुजी वहाँ से चल दिये। उन्होंने शंख, चक्र, गदा, असि एंव बाण धारण किये तथा गरुड़ को तैयारकर, शीघ्र ही वहाँ जा पहुँचे जहाँ जलन्धर था।
उस समय गरुड़ ने अपने पैरों को इस प्रकार हिलाया, जैसे वायु मेघों को उड़ा देती है। उससे असंख्य दैत्य उड़ गये। तब जलन्धर ने वायु द्वारा दैत्यों को दुखी देखकर अत्यन्त क्रोध किया और सिंह के समान गरजता हुआ विष्णुजी के पास जा पहुँचा। विष्णुजी तथा जलन्धर में युद्ध आरम्भ हो गया। दोनों ओर से असंख्य बाण चले। वे बाण आकाश में इस प्रकार छा गये, जिससे कुछ भी दिखाई नहीं देता था।
विष्णुजी ने जलन्धर के रथ के घोड़े, छत्र, ध्वजा तथा धनुष को काटकर शंखध्वनि की और क्रोध में भरकर एक बाण जलन्धर के हृदय में मारा। यह देखकर जलन्धर ने अपनी गदा गरुड़ के सिर पर दे मारी। गरुड़ उस गदा की चोट न सह सके और धरती पर गिर पड़े। तब विष्णुजी ने निर्भय होकर अपनी असि द्वारा उस गदा को काट दिया। यह देखकर जलन्धर ने क्रोधित होकर विष्णुजी के हृदय पर अपने घूँसे का प्रहार किया। अनेक प्रकार के दाँव-पेंच हुए, लेकिन दोनों में से कोई भी नहीं हारा।
तब विष्णुजी ने बादल के समान गरजते हुए कहा-हे जलन्धर! हमने तेरे समान वीर तीनों लोकों में नहीं देखा। तेरे इस पराक्रम से हम अत्यन्त प्रसन्न हैं, इसलिए हम से इच्छानुसार वरदान माँग लो।
हे नारद! राजनीति का यही मुख्य तात्पर्य है कि किसी भी युक्ति से अपना मनोरथ पूर्ण किया जाय। जलन्धर यह सुनकर विष्णुजी से बोला-हे विष्णु! मैं आपसे यही वरदान माँगता हूँ कि आप मेरी बहन लक्ष्मी सहित मेरे घर में आकर रहें। इसी प्रकार समस्त देवता भी मेरे आधीन होकर मेरे घर में वास करें। जलन्धर का यह वर माँगना सुनकर विष्णुजी अत्यन्त दुःखी हुए तथा उसका कहना मानकर लक्ष्मी सहित उसके घर में निवास करने लगे।
॥ जलन्धर का तीनों लोकों पर विजय प्राप्त करना ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! जलन्धर ने तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर, देवताओं के स्थान पर दैत्यों को नियुक्त कर दिया तथा समस्त राजाओं को जीतकर अपने आधीन कर लिया। उसने संसार के सम्पूर्ण बहुमूल्य रत्न तथा अद्भुत एवं बहुमूल्य वस्तुओं को अपने अधिकार में कर लिया। फिर उसने सब दिक्पालों को बुलाकर, अपने नगर में प्रजा के समान बसा दिया। उसने इन्द्र से ऐरावत हाथी छीन लिया तथा उच्चैःश्रवा अश्व भी उसकी अश्वशाला में आ पहुँचा। कल्पवृक्ष भी उसके आँगन की शोभा बढ़ाने लगा। इस प्रकार जो मुख्य-मुख्य वस्तुएँ थीं, जैसे-वरुण का छत्र, प्रजापति का रथ तथा अनल का अंकुश-उन सबको छीनकर, उसने अपने आधीन कर लिया।
इसके पश्चात् उसने दया एवं धर्मपूर्वक सम्पूर्ण प्रजा का पुत्र के समान पालन किया। इसीलिए वह दैत्यों में अद्वितीय गिना गया। उसके राज्य में किसी को कोई कष्ट नहीं था। चारों वर्ण अपने-अपने धर्म तथा आश्रम में स्थित थे। कोई मनुष्य अधर्मी न था। किसी को तीनों प्रकार के दुःखों में से एक भी दुःख न था। कोई मनुष्य अकाल मृत्यु नहीं पाता था और न वहाँ किसी मनुष्य के हृदय में पाप ही उत्पन्न होता था। स्त्रियाँ पातिव्रत धर्म का पूरी तरह से पालन करती थीं। ब्राह्मण धर्म कथाएँ कहते थे। कोई भी दरिद्र न था।
हे नारद! उस समय जलन्धर के राज्य में देवताओं के अतिरिक्त और किसी के मन में न तो किसी प्रकार का भय था और न कोई कष्ट ही। एक दिन सब देवता एकत्र होकर शिवजी का स्मरण एवं ध्यान कर स्तुति करने लगे। देवताओं ने कहा -हे शिवजी! आपकी ही कृपा होनी चाहिए। हमको विष्णुजी का बड़ा भरोसा था, लेकिन उन्होंने अपनी पत्नी लक्ष्मी सहित जलन्धर के घर में निवास कर लिया है। जब तक हमारा काम विष्णु जी से निकलता था, तब तक हम आपको किसी प्रकार का कष्ट नहीं देते थे।
तब देवताओं की प्रार्थना सुनकर शिवजी ने आकाशवाणी द्वारा कहा-हे देवताओ! तुम कुछ चिन्ता मत करो। हम तुम्हारी मनोकांक्षा अवश्य पूर्ण करेंगे। देवताओं ने उस आकाशवाणी को सुनकर बड़ा आनन्द प्राप्त किया। हे नारद! उस समय तुमने जलन्धर के राज्य में जाकर विष्णुजी आदि को देखा। जलन्धर ने तुम्हारी भली प्रकार अगवानी की तथा पूर्णरूप से पूजा की। कुशल-क्षेम के पश्चात् उसने तुम्हारे आगमन का कारण पूछा तथा यह कहा कि आपने संसार में जो कुछ आश्चर्यजनक चरित्र देखा हो तो उसका वर्णन कीजिए।
तब तुमने जलन्धर को यह उत्तर दिया-हे जलन्धर! एक दिन हम कैलाश में गये जो सृष्टि भर में सबसे श्रेष्ठ है। शिवजी को स्तुति एवं प्रणाम करने के पश्चात् मैं वहाँ की सामग्री को देखकर आश्चर्य में पड़ गया तथा विचारने लगा कि इतनी असंख्य सामग्री किसी के यहाँ न होगी। इसलिए, अब मैं तुम्हारी सामग्री देखने को यहाँ आया हूँ। जलन्धर ने तुम्हारी यह इच्छा जानकर अपनी सम्पूर्ण सामग्री दिखाते हुए पूछा-हे नारद! सत्य कहना कि दोनों स्थानों से कहाँ अधिक सामग्री है ?
तब तुमने उसे यह उत्तर दिया-हे जलन्धर! वास्तव में तुम्हारे घर बहुत सामग्री है, लेकिन एक दारा-रत्न की कमी है। शिवजी के घर में ऐसी स्त्री है, जिसके समान संसार में कोई अन्य स्त्री नहीं है। उसकी सुन्दरता पर ब्रह्मा तक मोहित हो गये थे। वह इतनी सुन्दर है कि उसने कामदेव के शत्रु शिवजी को भी अपने वश में कर लिया है। ब्रह्मा ने बहुत प्रयत्न किया कि वे शिवरानी के समान दूसरी स्त्री बनावें, परन्तु उन्हें सफलता नहीं मिल सकी।
इतनी कथा कहकर ब्रह्माजी बोले-हे नारद! तुम जलन्धर से इतना कहकर वहाँ से चले गये । तुम्हारे जाने के पश्चात् जलन्धर काम-ज्वर में पीड़ित होकर रोगियों के समान दुःख-सागर में डूब गया तथा काम-वश हो, शिवजी को अन्य देवताओं के समान समझ, राहु को उनके पास भेज दिया। हे नारद! उन्होंने जलन्धर की ऐसी भावना देखकर, उसके ज्ञान को खींच लिया था। अपने स्वामी जलन्धर की आज्ञानुसार राहु शिवजी के पास चल दिया। वह छः द्वार पार कर गया, जब सातवें द्वार पर पहुँचा, जहाँ गणों के राजा नन्दी द्वारपाल बनकर बैठे हुए थे, तब नन्दी ने उसको रोक दिया। तदुपरान्त वे शिवजी की आज्ञा लेकर उसे अपने साथ ही शिवजी के पास ले गये।
उस समय शिवजी ने भौंह का संकेत करते हुए राहु से पूछा-कहो, तुम क्या चाहते हो ? राहु ने उत्तर दिया-हे शिवजी! जलन्धर जो सबसे श्रेष्ठ है तथा जिसके अधीन देवता एवं विष्णुजी भी हैं, उसने यह कहा है कि तुम तो तपस्वी, योगी, दिगम्बर और मरघटों में पड़े रहनेवाले हो। तुम्हें भोग-विलास से कोई प्रयोजन नहीं है। तुमको ऐसी कोमलांगी स्त्री से क्या प्रयोजन है ? ऐसी सुन्दर स्त्री तो हमको चाहिए। इसलिए तुमको उचित है कि उस परम सुन्दरी स्त्री को हमें दे दो।
राहु के ऐसे वचन सुनकर शिवजी अत्यन्त क्रोधित हुए। तब तुरन्त ही उनकी भौंहों से एक मनुष्य उत्पन्न होकर आगे आ खड़ा हुआ। उसका शरीर अत्यन्त भयानक तथा वज्र के समान दृढ़ था। उसका सिंह का-सा स्वरूप, तीक्ष्ण जिह्वा, जलती हुई अग्नि के समान नेत्र, सब बाल खड़े हुए तथा इसी प्रकार अत्यन्त भयानक डीलडौल था। वह विष्णुजी के चौथे अवतार नृसिंह के समान जान पड़ता था। वह शिवजी की इच्छा जानकर राहु को खाने के लिए आगे बढ़ा।
यह देखकर राहु भयभीत हो वहाँ से भाग चला, परन्तु शिवजी के उस गण ने उसे न जाने दिया और वहीं पकड़ लिया। यह देखकर राहु अत्यन्त कम्पित होकर शिवजी से बोला-हे शिवजी आप मुझको ब्राह्मण जानकर मेरी इसके द्वारा रक्षा कीजिये। यह मुझको खाये ही डालता है। शिवजी ने राहु के ऐसे विनयपूर्ण वचन सुनकर, उस गण से उसे छुड़वा दिया। उस समय गण ने राहु को छोड़, शिवजी के पास जाकर यह विनय की-हे प्रभो! मैं बहुत भूखा हूँ। आप मेरे लिए कुछ भोजन बतला दीजिए। मैं भूख की आग से जला जाता हूँ।
यह सुनकर शिवजी ने कहा-यदि तुम इतने ही भूखे हो तो अपने हाथ एवं पाँव को खा डालो। गण ने शिवजी की आज्ञानुसार यही कार्य किया। उसने अपने सिर के अतिरिक्त सब अंग खा डाले।
हे नारद! यह दशा देखकर शिवजी आश्चर्यचकित हुए। तब उन्होंने अत्यन्त प्रसन्न होकर गण से कहा-हम तुम्हारी आज्ञा-पालन से प्रसन्न होकर तुम्हारा नाम कीर्तिमुख रखते हैं। अब तुम्हीं हमारे द्वारपाल होगे। जो व्यक्ति पहिले तुम्हारी पूजा न कर लेगा, उसको हम स्वप्न में भी दर्शन नहीं देंगे।
हे नारद! उस दिन से कीर्तिमुख गण शिवजी के द्वार पर द्वारपाल के रूप में रहते हैं। कीर्तिमुख की पूजा किए बिना शिवजी की सब पूजा व्यर्थ हो जाती है। राहु जब कीर्तिमुख के हाथ से छूटकर भागा तो वह कैलाश पर्वत के एक गड्ढे में ऐसा गिरा, जिससे उसका अंग-भंग हो गया। तदुपरान्त राहु ने जलन्धर के समीप पहुँचकर सब हाल कह सुनाया।
॥ जलन्धर द्वारा कैलाश पर्वत पर चढ़ाई करना ॥
ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! दूत के यह वचन सुनकर जलन्धर अत्यन्त क्रोधित हुआ तथा उसने दैत्यों को आज्ञा दी कि सब एकत्र होकर इसी समय शिवजी के कैलाश पर्वत पर आक्रमण करें। यह सुनकर समस्त सरदार एवं सेनाध्यक्ष अपने-अपने शस्त्र लिए, चतुरंगिणी सेना के साथ चल दिए। उस सेना में एक करोड़ दैत्य, पाँच सौ कबन्ध तथा सौ कुलधूम्र चल; कालक, धुव्र, मुरज और कालनेमि आदि को आज्ञा देकर जलन्धर स्वयं भी घर से जलता-भुनता हुआ निकला।
उस समय उसकी पत्नी ने उसे बहुत समझाया तथा हाथ जोड़कर उसे मना करते हुए यह कहा कि हे स्वामी! शिवजी से युद्ध करके अब तक कोई नहीं जीता है। देवताओं के सब से बड़े सहायक विष्णुजी तुम्हारे घर में ही हैं अतः तुम वहाँ न जाओ; लेकिन जलन्धर ने मृत्यु के वशीभूत होने से उसकी एक भी बात नहीं मानी और वह उसी प्रकार क्रोध से भरा हुआ चल दिया।
हे नारद! जब मृत्यु आती है तो बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। जो मनुष्य चलने के समय स्त्री, ब्राह्मण आदि का आदर नहीं करता, वह फिर लौटकर नहीं आता। सब के आगे शुक्र, फिर जलन्धर तथा उसके पीछे समस्त सेना चली। पहिले तो जलन्धर को राहु दिखाई दिया, फिर मुकुट सिर से गिर गया। शुम्भ-निशुम्भ दोनों को सेनापति नियुक्त किया गया तथा कालनेमि भी जलन्धर की आज्ञा पाकर सेना सहित चला।
इसी प्रकार और भी अनेक दैत्यवंशी राजा कैलाश पर्वत पर चले। जब जलन्धर सेना सहित नगर से कुछ दूर बाहर पहुँचा तब विष्णुजी ने देवताओं को बुलाकर यह कहा कि अब हमारे कष्ट दूर होने का समय आ गया है, इसलिए तुम सब गुप्तरूप से शिवजी के पास जाकर, जलन्धर के आक्रमण का समाचार कहो।
विष्णुजी के उस आदेशानुसार देवता छिपे-छिपे शिवजी के पास पहुँचे तथा स्तुति करने के उपरान्त उन्होंने शिवजी से जलन्धर के आक्रमण का समाचार पूरा-पूरा कह सुनाया तथा जलन्धर के वध की इच्छा प्रकट की। शिवजी ने जब देवताओं के मुख से यह समाचार सुना तो हँसते हुए कहा-हे देवताओ! अब तुम सबलोग धैर्य धारण करो। तुम्हें कोई कष्ट न होगा।
यह कह उन्होंने विष्णु को बुलाकर पूछा-हे विष्णुजी! तुमने जलन्धर को क्यों नहीं मारा तथा वैकुण्ठ छोड़कर उसके घर में वास क्यों किया ? शिवजी के ऐसे वचन सुनकर विष्णुजी ने उत्तर दिया-हे शिवजी जलन्धर बहुत बलवान है, वह कोटि यत्नों से भी नहीं मर सकता। वह आपका अंश है, इसलिए उसपर किसी भी शस्त्र का प्रभाव नहीं होता।
मैंने उसके साथ बहुत युद्ध किया, परन्तु वह किसी प्रकार भी न मरा। उसकी मृत्यु आप ही के द्वारा होगी। अब आप ही कृपा करके उसको मारें। आप आकाश से लेकर पृथ्वी तक के स्वामी तथा तीनों गुणों से पूर्ण हैं। यह सुनकर शिवजी बोले-हे विष्णु! जलन्धर हमारे अंश से उत्पन्न हुआ है, इसलिए हम उस पर त्रिशूल नहीं चला सकते तथा त्रिशूल के अतिरिक्त जो भी हमारे पास अस्त्र हैं, उनका जलन्धर पर कोई प्रभाव न पड़ेगा। इसलिए हमने एक उपाय सोचा है कि तुम सब अपना-अपना तेज हमको देते जाओ। उस तेज से हम एक शस्त्र का निर्माण करेंगे और उसी शस्त्र द्वारा जलन्धर को जलाकर भस्म कर देंगे।
यह सुनकर मैंने, विष्णुजी ने, इन्द्र ने तथा समस्त देवताओं ने शिवजी को अपना-अपना तेज दे दिया। हम सबका वह तेज एकत्र होकर अत्यन्त प्रज्ज्वलित हुआ। तब शिवजी ने उसमें से एक शस्त्र बनाया। उसका नाम सुदर्शन चक्र रखा। वह चक्र कोटि सूर्यों के समान प्रकाशवान् एवं अग्नि के समान प्रज्ज्वलित था। सुदर्शन चक्र के बनाने से जो तेज शेष रह गया, उससे शिवजी ने वज्र बनाया। यह देखकर सभी देवता अत्यन्त प्रसन्न हुए ।
हे नारद! इतने में ही जलन्धर कैलाश पर्वत के समीप पहुँच गया। उसने पर्वत की एक कन्दरा में सेना सहित डेरा डाल दिया। तब सब देवता उसे देखकर छिपे-छिपे अपने स्थानों को, जहाँ वे पहिले वास करते थे, चले गए। शिवजी के गणों ने दैत्यों की सेना के आगमन के पूर्व ही शिवजी को समाचार दे दिया था कि दैत्य-सेना अब आना ही चाहती है। इसलिए शिवजी ने अपने नन्दी, गणपति एवं वीरभद्र को यह आज्ञा दी कि तुम अन्य गणों सहित जाकर दैत्यों से भली-भाँति युद्ध करो। शिवजी के गण यह आज्ञा पाकर वहाँ से चल दिए तथा पर्वत के नीचे उतर आए।
॥ शिवगणों एवं दैत्यों का युद्ध तथा नन्दी द्वारा दैत्य-सेना की पराजय ॥
ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! शिवजी के गण उनकी आज्ञा पाकर 'जय-शिव,जय-मृत्युञ्जय' कहते हुए प्रसन्नतापूर्वक गाते-बजाते हुए दैत्य सेना से लड़ने को चल दिए। वहाँ पहुँचकर दोनों ओर से भयंकर मार-काट शुरू हो गयी, जिससे पृथ्वी काँपने लगी। दोनों ओर से हर प्रकार के शस्त्रों का प्रयोग किया गया। युद्धस्थल अस्थि, मांस तथा रुधिर से पूर्ण हो गया। जो दैत्य गणों के हाथ मारे गए, उनको शुक्र ने पुनः जीवित कर दिया। जब गणों ने दैत्यों की सेना का वध किया तो शुक्रजी ने उन्हें फिर जिला दिया।
इसी प्रकार गणों ने अनेक बार दैत्यों का वध किया, परन्तु शुक्र ने फिर से उनको जीवित कर दिया। निदान गणों ने कोई उपाय न देख, दुःखी होकर शिवजी के पास जा सब वृत्तान्त कह सुनाया और बोले कि अब हम दैत्यों से युद्ध न करेंगे, क्योंकि हम दैत्यों को मारने में असमर्थ हैं।
हे शिवजी! यह काम आप स्वयं ही करें। गणों के मुख से ऐसे वचन सुनकर शिवजी क्रोधित होकर बोले-यह कार्य शुक्र मृत्युंजय मन्त्र पाकर कर रहा है। उसी समय शिवजी के मुख से कृत्यानाम की एक स्त्री प्रकट हुई। उसका स्वरूप अत्यन्त भयानक था । उसकी दाढ़ें बड़ी भयंकर, पर्वत के समान थीं। ऐसे स्वरूप से प्रकट होकर वह शिवजी की सेना के साथ युद्धस्थान में आयी। वह महा भयंकर नाद करती हुई दैत्यों का भक्षण करने लगी। तब दैत्य उसके स्वरूप को देखकर तथा उसके पराक्रम से भयभीत होकर भागने लगे।
इसके पश्चात् कृत्या शुक्र को अपने गुप्त अंग में दबाकर उड़ गयी तथा सबके देखते-देखते आँखों से ओझल हो गयी शुक्र को कृत्या द्वारा उड़ा ले जाने पर, दैत्य लोग बड़े भयभीत हुए और उनकी सेना में हाहाकार मच गया। उस समय वे इधर-उधर भागने लगे।
हे नारद! तब शिवजी के गण प्रसन्न होकर, दैत्यों को चारों ओर से धेर कर, सिंह के समान गर्जना करने लगे। दैत्य भागकर चारों ओर फैल गये। दैत्यों की यह दशा देखकर शुम्भ-निशुम्भ तथा कालनेमि तीनों सेनापति अत्यन्त दृढ़ता के साथ गणों का सामना करने लगे। अन्त में, उन तीनों ने शिवजी के गणों को बहुत बुरी तरह से मार कर दुःखी कर दिया, जिससे वह हार मानकर वहाँ से भाग चले।
इतने में गणपति, नन्दी, वीरभद्र आदि ने सब गणों को रोककर धैर्य देकर बुला लिया फिर दोनों सेनाओं में युद्ध छिड़ गया। कालनेमि तथा नन्दीगण, गणपति तथा शुम्भ और वीरभद्र तथा निशुम्भ परस्पर लड़ने लगे। वे सभी युद्धभूमि में अपनी वीरता का प्रदर्शन करने लगे। वीरभद्र ने निशुम्भ के हृदय में तीक्ष्ण बाण मारा, जिससे निशुम्भ धरती पर गिर पड़ा। वीरभद्र ने ज्योंही ये चाहा कि उसे सांग से मार डालें, इतने ही में शुम्भ ने उठकर वीरभद्र पर बड़े क्रोध से अपनी सांग का आक्रमण किया जिससे वीरभद्र घायल होकर पृथ्वी पर गिर पड़े।
नन्दी ने कालनेमि के शरीर पर सात बाण मारे, जिनके लगने से उसके रथ के पहिए, घोड़े तथा सारथी कट-कट कर गिर गये। तब कालनेमि ने क्रोधित होकर नदी के धनुष को काट डाला। उस समय नन्दी ने धनुष फेंक कर त्रिशूल चलाया जिसके प्रहार से कालनेमि मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। जब उसे चेत हुआ तब उसने नन्दी को उठाकर पर्वत के ऊपर फेंक दिया।
अब गणपति तथा शुम्भ लड़ने लगे। अब गणपति तो मूषक पर चढ़े और शुम्भ रथ पर सवार हुआ। वे दोनों इतने लड़े कि कोई भी युद्ध से विमुख न हुआ। अन्त में गणपति ने एक बाण शुम्भ के हृदय में मारा तथा तीन बाणों से उसके सारथी को पृथ्वी पर गिरा दिया। तब शुम्भ ने क्रोधित होकर गणपति पर साठ बाण छोड़े और गणपति के मूषक वाहन का सिर धड़ से अलग कर दिया। तब वे बिना-वाहन पैदल ही युद्ध करने लगे।
उन्होंने अपनी सांग उठाकर शुम्भ के ऊपर चलायी। शुम्भ सांग के लगने से पृथ्वी पर गिर पड़ा और गणपति पुनः मूषक को जीवित कर उसपर सवार हुए । इस प्रकार गणपति विजयी हुए। तब चारों ओर विजय के बाजे बजने लगे और सब गण अत्यन्त प्रसन्न हो जय-जयकार करने लगे।
हे नारद! यह देखकर वृन्द नामक शुम्भ का पितामह अत्यंत क्रोधित होकर गणपति के ऊपर बाणों की वर्षा करने लगा। तब गणेशजी तुरन्त दौड़कर वृन्द के पास जा पहुँचे। उनके साथ असंख्य भूत, प्रेत, कूष्माण्ड, पिशाच, भैरवगण, वैताल, शाकिनी, डाकिनी, योगिनी आदि किल-किल शब्द के अर्थात् सिंह एवं हाथियों के समान नाद कर रहे थे। उन्होंने वृन्द तथा शुम्भ को सेना सहित विकल कर दिया।
वीरभद्र की सेना ने दैत्यों को अत्यन्त दुःखी किया। उन्होंने अनेक दैत्यों को खाकर उनका रक्तपान भी किया। इतने में नन्दी भी वहाँ आ गए तथा उन्होंने बाणों की ऐसी वर्षा की, कि वे दैत्यों की ओर सर्प की भाँति चले। उन्होंने दैत्यों की बहुत-सी सेना नष्ट कर दी। कुछ दैत्य तो खा लिये गए, कुछ मारे गये, कुछ मूलित हुए, कुछ भाग गये तथा कुछ गिर पड़े।
॥ जलन्धर का शिवगणों के सम्मुख पहुँचना ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! जलन्धर अपनी सेना की ऐसी दुद्रशा देख, क्रोध में भरकर, रथ पर आरूढ़ हो, कटक सहित, गणों की ओर चल दिया, तब दैत्यों की सेना पुनः सँभलकर युद्ध करने के लिए तैयार हुई। युद्ध के बाजे बजने लगे और दोनों सेनाओं में फिर घमासान युद्ध होने लगा। जलन्धर ने आते ही बाणों की वर्षा की तथा पाँच-पाँच बाण गणपति और नन्दी के तथा बीस बाण वीरभद्र के शरीर में मारकर सिंहनाद किया।
उस समय वीरभद्र ने एक सांग जलन्धर पर ऐसी चलायी कि उसके लगने से जलन्धर मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। फिर उसने उठकर, क्रोधित हो वीरभद्र के ऊपर अपनी गदा का प्रहार किया, जिससे वीरभद्र व्याकुल होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। गणपति ने क्रोधित होकर अपनी सांग द्वारा जलन्धर की गदा को काट डाला तथा तीन बाण जलन्धर के हृदय में मारे। फिर सात बाण चलाकर उसके रथ के घोड़े, ध्वजा, पताका तथा छत्र आदि को काट दिया।
यह देखकर जलन्धर ने अपनी सांग द्वारा गणपति को घायल कर दिया तथा दूसरे रथ पर चढ़कर, वीरभद्र के पास जा पहुँचा और उनसे युद्ध करने लगा। तब वीरभद्र ने जलन्धर का धनुष काटकर, उसके मस्तक पर परिघ से प्रहार किया। उस प्रहार से जलन्धर पृथ्वी पर गिर पड़ा। थोड़ी देर बाद उसने सचेत होकर वीरभद्र के ऊपर परिघ से ऐसा प्रहार किया कि वीरभद्र मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े।
वीरभद्र की ऐसी दशा देखकर सब गण वहाँ से भागकर शिवजी के पास पहुँचे तथा उन्हें सब वृत्तान्त सुनाकर बोले-हे शिवजी! दैत्यों ने अपनी भीषण मारकाट से हम सबको व्याकुल कर दिया है। शिवजी गणों द्वारा यह समाचार सुनकर अपने बैल पर चढ़े तथा युद्धक्षेत्र में पहुँच कर, त्रिशूल लेकर दैत्यों की सेना पर आक्रमण करने लगे।
उस समय शिवजी ने अपना डमरू बजा दिया। जब गणों ने शिवजी को आते देखा, तब वे सब अत्यन्त प्रसन्न हुए तथा पुनः लौटकर युद्ध करने के लिए प्रस्तुत हो गये।
हे नारद! उन गणों ने दैत्यों के साथ घोर युद्ध किया। शिवजी ने ऐसा भयंकर रूप धारण किया कि जिसको देखकर दैत्यों की सेना में हाहाकार मच गया और वह मैदान छोड़कर भागने लगी। दैत्याधिपति जलन्धर ने अपनी सेना की यह दुद्रशा देखकर, शिवजी पर अनेक बाण छोड़े। शुम्भ, निशुम्भ, कालनेमि, हयमुख, असिलोमा, बलाहक, प्रचण्ड आदि सब दानव एक साथ शिवजी पर आक्रमण करके बाण-वर्षा करने लगे। परन्तु शिवजी ने उन बाणों के जाल को पलभर में काट डाला तथा अपने बाणों से आकाश को भर दिया।
इसके पश्चात् शिवजी ने परशु द्वारा असिलोमा का सिर काट डाला। फिर बलाहक का वध करके, घरभर को पाव से बाँध लिया। हे नारद! तदुपरान्त शिवजी ने अपना बैल दैत्यों की सेना में छोड़ दिया। उसने अपने सींगों से असंख्य दैत्यों को मार गिराया, जो दैत्य शेष रहे, वे भयभीत होकर भाग गए। जिस प्रकार सिंह के प्रहार से हाथी विकल होकर भाग जाता है, वही दशा उस समय दैत्यों की हुई।
यह देखकर जलन्धर ने शुम्भ, निशुम्भ तथा कालनेमि को सम्बोधित करते हुए कहा-देखो, जो संसार में उत्पन्न होते हैं, उनकी मृत्यु अवश्य होती है। मृत्यु से बचने का कोई भी उपाय नहीं है। ऐसी मृत्यु किसे भली न लगेगी, जिससे दोनों लोकों में यश एवं कीर्ति बढ़े ?
लोक में दो प्रकार की मृत्यु प्राप्त करने वाले सूर्यमंडल को भेद कर स्वर्ग को जाते हैं। उनमें एक योगी होता है तथा दूसरा योद्धा जो युद्ध में निर्भय होकर वीरतापूर्वक मारा जाता है। इसलिए अब तुम मृत्यु का भय त्यागकर भली-भाँति सामने डटकर युद्ध करो। यद्यपि जलन्धर ने ऐसी बातें कह कहकर उन्हें बहुत समझाया, पर उनकी समझ में कुछ न आया। तब जलन्धर ने उनको धिक्कारते हुए कहा-तुमने इस पृथ्वी पर जन्म लेकर व्यर्थ ही अपनी माता को कष्ट दिया; क्या तुमको युद्ध भूमि से इस प्रकार भागना उचित है ? क्या तुममें से कोई भी मृत्यु के पंजे से बचा रहेगा ?
॥ जलन्धर का शिवजी से माया युद्ध करना ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! उस समय जलन्धर के शब्द से पृथ्वी काँप उठी तथा समुद्र और पर्वत थरथराने लगे। जो दैत्य पहिले युद्ध-भूमि से डरकर भाग गये थे, वे सब जलन्धर का यह रूप देखकर पुनः लौट आए। उस समय जलन्धर ने शिवजी से कहा-हे शिवजी! मुझे प्रतीत हुआ कि तुम कुछ बल रखते हो, क्योंकि तुमने मेरे साथ युद्ध करने की इच्छा की है। यह कहकर उसने शिवजी के ऊपर एक भयानक बाण चलाया। उसे शिवजी ने बीच ही में काट डाला फिर शिवजी ने सुगमतापूर्वक एक बाण चलाकर जलन्धर के रथ, सारथी, घोड़े, धुनष आदि सबको नष्ट कर डाला।
तब जलन्धर ने शिवजी को मारने के लिए अपना घूँसा ताना तथा एक बाण छिपकर शिवजी को मारा। शिवजी ने यह देखकर अपने बाण से उसे एक कोस दुरी पे फेंक दिया। उस समय जलन्धर ने सोचा कि शिवजी वास्तव में बहुत बलवान हैं। मैं उनसे इस प्रकार युद्ध करके विजय प्राप्त नहीं कर सकूँगा। अतः मुझे कोई ऐसी माया करनी चाहिए जिससे शिवजी मोहित हो जायँ। शिवजी को नाद बहुत प्रिय है। उसी के द्वारा उनको मोहित किया जा सकता है।
यह विचारकर जलन्धर ने ऐसी माया फैलायी, जिससे गन्धर्व, अप्सरा, किन्नर आदि प्रकट होकर मनुष्यों के समान अनेक प्रकार नृत्य गान करने लगे। अतः शिवजी के मन में संगीत सुनने की इच्छा उत्पन्न हुई और वे उस आनन्ददायक नाद में मग्न हो गए। जैसा कि नियम है कि नाद सुनने से बुद्धि जाती रहती है, वही बात उनके साथ भी हुई। वास्तव में शिवजी ही ने राग की महिमा को प्रस्तुत किया।
यह बात वेद भी कहते हैं कि शिवजी नाद के अतिरिक्त और किसी से मोहित नहीं किये जा सकते। उस समय शिवजी के हाथों से सब शस्त्र गिर पड़े। उन्होंने उस तुरीयावस्था में कुछ न जाना। उस समय जलन्धर ने कामवश शिवजी के समान अपना स्वरूप बनाया, जिसके दस भुजा, पाँच मुख तथा तीन नेत्र थे। फिर उसने अपनी माया से एक बैल बनाया और उस पर चढ़कर तथा शिवजी के जो-जो मुख्य चिन्ह थे उन सबको धारण कर; शुम्भ-निशुम्भ को युद्धस्थल में छोड़कर, स्वयं गिरिजा के पास जा पहुँचा।
गिरिजा ने भी पहले तो लोक-रीति से उसको शिवजी जाना। परन्तु जब वे सखियों के बीच में से उठीं और यह जाना कि यह छल से शिवजी का स्वरूप बनाकर आया है, तब वे वहाँ से तुरन्त अन्तर्धान हो गयीं।
हे नारद! यह देखकर जलन्धर लज्जित होकर पुनः युद्धस्थल को लौट आया। उस समय गिरिजा ने विष्णुजी का ध्यान किया, जिससे विष्णुजी तुरन्त प्रकट हुए। गिरिजा ने उनसे जलन्धर का सब वृत्तान्त कहा तथा पातिव्रत धर्म की बहुत कुछ प्रशंसा की। वे बोलीं-हे विष्णुजी! जलन्धर की स्त्री बड़ी पतिव्रता है, उसी के धर्म से जलन्धर आज तक जीवित बचा हुआ है, क्योंकि पातिव्रता स्त्री विधवा नहीं हो सकती! इससे तुमको यह उचित है कि अब तुम जलन्धरपुरी में जाकर उसकी स्त्री के पातिव्रत धर्म को नष्ट करो। वृन्दा जो जलन्धर की स्त्री है, उसके साथ तुम छल करो।
यह सुनकर विष्णुजी तुरन्त जलन्धरपुरी को गए। उधर जलन्धर ने युद्धस्थल में लौटकर जब अपनी माया को दूर किया तो शिवजी ने चैतन्य होकर पुनः युद्ध का स्मरण किया। हे नारद! यह सब भी शिवजी की माया थी, क्योंकि संसार में जो शिवजी के भक्त हैं, उनका भी माया कुछ नहीं कर सकती, तब शिवजी पर, उसका क्या प्रभाव हो सकता था ? निदान शिवजी अत्यन्त क्रोधित होकर जलन्धर के ऊपर दौड़े।
उस समय जलन्धर ने भी बाण-वर्षा करके अपने बाणों से शिवजी को छिपा दिया। तब शिवजी ने भी अपने बाणों से उसके बाणों को काटकर उसे बहुत दुःखी किया। जो दैत्य शिवजी के हाथों से मारे गए, वे सब मुक्त हो गये। उन दैत्यों का परम सौभाग्य था जो शिवजी को सम्मुख देखते हुए अपने प्राण त्यागते थे।
हे नारद! यह लीला जिस प्रकार हमने विष्णुजी से सुनी थी, उसी प्रकार तुम्हें कह सुनायी।
॥ विष्णु जी द्वारा वृन्दा का पतिव्रत-धर्म भंग करना ॥
ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! गिरिजा की आज्ञा पाकर विष्णुजी जलन्धरपुरी में पहुँचे तथा यह सोचने लगे कि मैं किस प्रकार जलन्धर की पत्नी वृन्दा का पातिव्रत धर्म नष्ट करूँ। जब उन्होंने शिवजी का ध्यान किया तो उस ध्यान के करते ही विष्णुजी को एक उपाय सूझ गया। तब वे तपस्वी का रूप धारणकर, एक शिष्य को साथ लेकर वृन्दा के उपवन में जा पहुँचे। वृन्दा ने उसी रात को यह स्वप्न में देखा था कि मेरा पति जलन्धर युद्ध में मारा गया है तथा यह भी देखा था कि मेरा पति जलन्धर तेल लगाए हुए, भैंसे पर सवार, नंगा तथा सिर के अशुभ बाल बनवाये, काले पुष्पों की माला पहने, राक्षसों से घिरा हुआ, यमपुरी को चला जा रहा है। जब वह यह स्वन देखकर उठी तो उसने सूर्य को उदय होते समय राहु-ग्रस्त तथा प्रकाशहीन देखा।
ऐसे अपशकुनों को देखकर वह एकाएक रोने, पीटने तथा घबराहट से इधर-उधर फिरने लगी। वह अपनी दो सखियों को साथ लेकर जलन्धर के उद्यान को गयी, परन्तु उसे वहाँ फल-फूल देखकर सन्तोष न हुआ। उसे वहाँ दो राक्षस ऐसे दिखाई दिए जो अत्यन्त भयानक थे। उनको देखकर रानी वृन्दा वहाँ से भाग आयी। आगे जाकर उसने शिष्यों सहित एक तपस्वी को देखा, जो मौन साधे हुए बैठा था। वृन्दा उसी समय दौड़कर उस तपस्वी के पास गयी तथा अपने हाथ उसकी गद्रन में डालकर लिपट गयी और बोली-हे तपस्वी! आप मेरी रक्षा करो।
उस समय तपस्वी ने अपने दोनों नेत्र खोलकर बड़ा क्रोध किया तथा हुँकार दी जिससे वे दोनों राक्षस वहाँ से भाग गए। यह देखकर जलन्धर की स्त्री अत्यन्त प्रसन्न हुई तथा प्रणाम करके उनके तपोवन की प्रशंसा करने लगी। फिर वह तपस्वी से इस प्रकार बोली-हे प्रभो! आप मेरे पति का, जो शिवजी से युद्ध करने के लिए गये हैं, वृत्तान्त कहिये।
हे नारद! यह सुनकर तपस्वीरूपधारी विष्णुजी ने हँसकर ऊपर की ओर देखा, जिससे तुरन्त ही दो बन्दर वहाँ आ उपस्थित हुए तथा उन्हें प्रणाम करके बैठ गए। फिर वे दोनों बन्दर गुप्त हो गए। तदुपरान्त एक क्षण भी नहीं बीता कि वे दोनों बन्दर पुनः पहिले की भाँति आकर बैठ गए। इस बार उनके हाथ में जलन्धर का शीश एवं धड़ था। उसे उन्होंने योगी के सम्मुख रख दिया तथा स्वयं दुःखी होकर बैठे रहे।
उस समय वृन्दा अपने पति का सिर देखकर व्याकुल हो, पृथ्वी पर गिर पड़ी। तब तपस्वी ने पानी आदि छिड़ककर वृन्दा को सचेत किया। वृन्दा पुनः रो-रोकर अपने पति का सिर अपने सिर से लगाकर व्यथित होने लगी बोली-हे नाथ! मैंने तो आपसे शिवजी के साथ युद्ध करने के लिए पहले ही मना किया था, लेकिन आपने मेरी बात नहीं मानी। इसी प्रकार वह अनेक बातें कह कहकर रोती रही।
फिर तपस्वी से बोली-हे महाराज! आप मेरे ऊपर कृपा करके मेरे पति को जीवित कर दीजिए। मैं आपके प्रभाव को देख चुकी हूँ इसलिए मुझे विश्वास है कि आप इस योग्य हैं कि मेरे पति को जीवित कर देंगे। यह सुनकर मुनिवेषधारी विष्णुजी ने कहा-हे वृन्दा! जो मनुष्य शिवजी की क्रोधाग्नि से मृत्यु को प्राप्त हुआ है, उसे हम जीवित नहीं कर सकते, परन्तु तुम्हारे दुःख को देखकर हम इसको जीवित करेंगे।
यह कहकर उन्होंने सिर को धड़ से जोड़ दिया तथा स्वयं अन्तर्धान होकर उस शरीर में प्रवेश कर गए और जलन्धर के समान उठकर बैठ गए। तदुपरान्त उन्होंने वृन्दा को गले लगाया। परन्तु वृन्दा यह सब कुछ न समझ सकी और उसने बड़ी प्रसन्नतापूर्वक उनके साथ सहवास करके अपना धर्म नष्ट कर दिया।
जब वह उत्तम रीति से विहार कर चुकी तब विष्णुजी ने अपना शरीर प्रकट कर दिया, उसे देखकर वृन्दा ने उन्हें पहचान लिया। तब वह अपने कृत्य पर बहुत दुःखी हुई। उसे विष्णुजी के ऐसे छल पर बहुत क्रोध आया। वह बोली-हे विष्णु! तुमने वेद के विरुद्ध मेरे धर्म को नष्ट किया है। तुम मुनीश्वरों के समान स्वरूप धारण किये हुए बड़े अधर्मी हो।
यह कहकर वृन्दा ने विष्णुजी को यह शाप दिया कि जो राक्षस तुमने मुझे दिखाये थे वे दोनों बड़े शक्तिशाली होकर तुम्हारी स्त्री को भगा ले जायेंगे, उस समय तुम दुःखी होकर वन-वन में फिरोगे और तुम्हें हर प्रकार के कष्ट प्राप्त होंगे तथा जो बन्दर तुमने मुझको दिखाए, वही तुम्हारे सहायक होंगे । यह कहकर वृन्दा बहुत रोई तथा चिता बनाकर अपने पति के साथ सती होने की इच्छा करने लगी।
यद्यपि विष्णुजी ने उसे बहुत समझाया, लेकिन उसने पातिव्रत धर्म दृढ़ करके कुछ नहीं माना। तदुपरान्त वह शिव-गिरिजा का ध्यान धरकर, सती हो गयी और उसका तेज सबके देखते-देखते गिरिजा के शरीर में प्रवेश कर गया।
हे नारद! विष्णुजी यह दशा देखकर बारम्बार पछताते हुए, उसकी सुन्दरता के स्मरण में दुःखी हुए तथा उसकी चिता की भस्म को अपने शरीर में मलकर, उसी स्थान पर वास करने लगे। उनकी यह दशा देखकर देवता तथा सिद्ध उनके निकट जा पहुँचे और विष्णुजी को बड़े-बड़े इतिहास तथा दृष्टान्त सुनाकर समझाने लगे कि आप तो स्वयं हर समय धर्म का पालन करनेवाले रहे हैं। अब आप यहाँ से चलिये तथा अपने वैकुण्ठलोक में विहार कीजिये। जो पाप आपसे दुर्भाग्यवश हुआ है, वह सब शिवजी की कृपा से नष्ट हो जायगा।
आप किसी प्रकार का दुःख मत कीजिये तथा यहाँ से अपने स्थान को चलिये। आप हमें इन शब्दों के लिए क्षमा करें, क्योंकि हम तुच्छ आपको समझा रहे हैं। उन लोगों के इस प्रकार समझाने पर भी विष्णुजी ने किसी को कोई उत्तर नहीं दिया तथा उसी प्रकार शोक में बैठे रहे। हे नारद! शिवजी की माया बड़ी विचित्र है और सब उसी के आधीन रहते हैं।
॥ शिव जी द्वारा जलन्धर का वध ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! उधर युद्धक्षेत्र में शिवजी को चेत हुआ, तब देवता उन्हें देखकर बहुत आनन्दित हुए। उस समय शिवजी की वीरता एवं पराक्रम को देखकर जलन्धर ने यह विचार किया कि अब मुझे माया करनी चाहिए, जिससे मैं शिवरानी को प्राप्त करने में सफल हो सकूँ। यह विचार कर उसने अपनी माया से एक कृत्रिम गिरिजा बनायी तथा उसको अपने रथ में बैठाकर शिवजी के सम्मुख ले आया। शुम्भ-निशुम्भ दोनों भाई उसे मारते जाते थे तथा वह गिरिजा रोती हुई 'मेरी रक्षा करो, आदि कहती थी।
उस समय जलन्धर ने उच्च स्वर से कहा-हे सदाशिव! तुम अपनी स्त्री को देखो यदि तुम्हें अपनी स्त्री बहुत प्रिय है तो समझ लो कि अब उसको मैं पकड़ लाया हूँ तथा उसकी ऐसी दुद्रशा कर रहा हूँ। क्या तुमको नहीं दिखाई देता ? तुमको सहस्त्रों धिवकार है, जो तुम अपने को अब भी बड़ा समझते हो ? शिवजी तो जलन्धर के यह वचन सुनकर तथा माया की गिरिजा को देखकर अत्यन्त दुःखी हुए और मौन साधकर बुद्धि को भूल बैठे। तब शिवजी ने भी लीला करके अपने को ऐसा शोकाकुल प्रदर्शित किया कि जलन्धर ने अपने धनुष को कानों तक खींचकर तीन बाण-एक शिवजी के सिर में, दूसरा वक्ष में तथा तीसरा उदर में मारे।
उस समय शिवजी जलन्धर की माया को जान भयंकर रूप धारणकर अग्नि के समान प्रकट हुए। शुम्भ तथा निशुम्भ युद्ध से विमुख होकर भागे। जलन्धर की सारी माया उसी समय नष्ट हो गयी। तब शिवजी ने शुम्भ-निशुम्भ को यह शाप दिया कि तुमने छल करके गिरिजा को दुःख पहुँचाया है तथा युद्ध से मुख मोड़कर भागे जा रहे हो, इसलिए तुम्हारा धर्म नष्ट हो गया है।
हे नारद! जलन्धर ने शिवजी का यह रूप देखकर अत्यन्त क्रोधित हो, बाणों की वर्षा कर, शिवजी को ढंक दिया। यह देखकर शिवजी ने क्रोधित हो, अपने बाणों द्वारा जलन्धर के बाणों को काट डाला। इतने में जलन्धर ने एक परिघ बैल को मारा, जिसके कारण बैल धर्म को भूलकर, युद्ध क्षेत्र से भाग गया।
यद्यपि शिवजी ने उसको बहुत रोका, पर वह युद्धस्थल में न ठहर सका। यह देखकर शिवजी अत्यन्त क्रोधित हो, महाभयंकर हो गये। तब उन्होंने करोड़ों सूर्य के समान चमकते हुए सुदर्शन चक्र को अपने हाथ में उठा लिया और उसे जलन्धर के ऊपर छोड़ दिया। उस चक्र का तेज दसों दिशाओं में फैल गया। सम्पूर्ण पृथ्वी एवं आकाश उसके तेज से जलने लगे। चक्र ने जाकर जलन्धर का सिर धड़ से अलग कर दिया। उस समय बड़ा भारी शब्द हुआ । पृथ्वी थरथर काँपने लगी तथा पर्वत जलने लगे। जिस समय जलन्धर का तेज शिवजी के शरीर में प्रविष्ट हुआ, उस समय चारों ओर से जय-जय का नाद हुआ।
हे नारद! वे लोग बड़े सौभाग्यशाली हैं; जिनकी ऐसी दशा होती है, क्योंकि देवता, मुनि आदि बड़े-बड़े उपाय करके भी शिवजी को इतना प्रसन्न नहीं कर सकते और न इस गति को ही प्राप्त कर सकते हैं। उस समय मैं, मुनि तथा देवता आदि शिवजी की अत्यन्त प्रशंसा करने लगे।
हर ने कहा-हे शिवजी! आप हर प्रकार से भक्तों के दुःख दूर करनेवाले हैं। आपको मन, वाणी तथा वेद आदि भी नहीं प्राप्त कर सके। आपके एक निमेष में करोड़ों इन्द्र तथा विष्णुजी बीत जाते हैं। आप किसी से बनाये नहीं गये, अपितु परब्रह्म हैं। आपने यदुवंशी को मुक्ति प्रदान की तथा उसकी पत्नी कलावती ने भी आपकी भक्ति द्वारा मुक्ति प्राप्त की। आपने मदयन्ती को मोक्षदान दिया तथा सौमुनि के पुत्र को श्रेष्ठ गति प्रदान की है। राजा तिमिरधन को आपने अपनाकर निरन्तर सात जन्मों तक आनन्दित किया। आपने चन्दसेन का मान रखा तथा श्रीकर गोप को अपनी शरण में लेकर, अपना भक्त बनाया और उसे इतना द्रव्य प्रदान किया, जो देवताओं को भी उपलब्ध नहीं होता है।
आप ही ने सत्यरथ के कष्टों को दूर कर उसे आनन्दित किया तथा धर्मगुप्त आपका ही व्रत करके दरिद्रता से मुक्त हो गये। आप ही ने चित्रधर्म के दुःखों को दूर किया तथा उसकी लड़की के डूबते हुए पति राजा चन्द्रांगद के जीवन की रक्षा कर, बहुत सुख पहुँचाया। आपके बल से ही तक्षक को किसी प्रकार की हानि एवं भय नहीं होने पाया। आपने ही मद्रदेश के बाह्मण को मोक्ष प्रदान कर, उसकी स्त्री चंचला का उद्धार किया तथा आप ही ने भद्रामुखगिरि के कष्टों को दूर किया। आपने पिंगला की इच्छानुसार उसको धन आनन्द एवं सुख प्रदान किया और अपने भक्त भद्रामुख की इच्छा पूर्ण की। आपने ऋषभ को हर प्रकार से अपने में ही लीन कर लिया और आपकी सेवा द्वारा ही वामदेव शुभगति को प्राप्त हुआ ।
हे सदाशिवजी! आपने शबरी एवं शूकर को उत्तम गति प्रदान करके भक्ति का माहात्म्य प्रकट किया तथा भद्रसेन के पुत्र सुधर्मा एवं मित्र के पुत्र तारक को उत्तम गति देकर रुद्राक्ष की बड़ाई प्रकट की। आप ही ने गंगा को, जिसका नाम महानन्दा था, तार दिया तथा आपकी भक्ति से सुश्रुमान् अधिक काल तक जीवित रहा। आपने शारदा के पति को जीवित कर, उसके सौभाग्य को स्थिर रखा तथा बन्दिक नामक पापी ब्राह्मण को उत्तम गति आपने ही प्रदान की। उसकी स्त्री बीजुका को भी जो पुंश्चली थी, मुक्ति प्रदान की।
आप ही ने दक्ष के यज्ञ को विध्वन्स कर, उसके गर्व को चूर किया तथा काम को भस्म कर, शिवरानी का गर्व दूर किया। आपने बालक का रूप धारणकर तारक दैत्य को मार डाला तथा गणपति को अपना बल देकर, समस्त गणों से प्रबल कर दिया। आपने ही त्रिशूल से उनका सिर काटकर पुनः जीवित कर दिया था। दैत्यों को देवताओं सहित जलते हुए देखकर आपने हलाहल विष का पान कर लिया था। आपने पहिले त्रिशूल द्वारा अन्धक के सिर को काट डाला, फिर उस पर कृपा करके, अपने गणों में सम्मिलित कर लिया।
आपने विष्णुजी एवं ब्रह्मा के मोह को दूर कर मन्त्रशास्त्र को कील डाला तथा नृसिंह अवतार के गर्व का नाशकर शरभ का अवतार ग्रहण किया। आपने अत्रि के पुत्र होकर कामरूप का वध किया तथा हनुमान का स्वरूप धारणकर, राम-लक्ष्मण को दुःखों से मुक्त कर दिया। आप तीनों गुणों से परे तथा निर्गुण हैं। आपकी महिमा का वर्णन कहाँ तक किया जाय ?
हे नारद! इस प्रकार सब देवताओं ने शिवजी की स्तुति की। जो कोई इस स्तुति को सुनेगा अथवा दूसरों को सुनाएगा, वह दोनों लोकों में प्रसन्न होकर आनन्द प्राप्त करेगा। उसे किसी प्रकार का कष्ट न होगा तथा अन्त में शिवजी के लोक को प्राप्त करेगा।
॥ देवताओं द्वारा शिवजी से विष्णु जी का वृत्तान्त कहना ॥
ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! देवताओं ने इस प्रकार स्तुति कर, शिवजी से विनती की-हे शिवजी! आपने जलन्धर को नष्ट करके हमलोगों के कष्टों को दूर करके अभयदान दिया है अब और कोई कंटक नहीं है; अचानक ही एक और दुःख हमलोगों को हुआ है अर्थात् विष्णुजी उस स्थान पर, जहाँ जलन्धर की स्त्री वृन्दा सती हो गयी है, भस्म लगाए लोट रहे हैं। आप ही कोई ऐसा उपाय कीजिए, जिससे विष्णुजी अपने हठ को छोड़कर पुनः पुराना मार्ग ग्रहण करें।
शिवजी ने हँसते हुए यह कहा-हे देवताओ! यह सब हमारी माया का ही परिणाम है। विष्णुजी हमको अत्यन्त प्रिय हैं। इसलिए हमने इस लीला द्वारा उनके अहंकार को दूर कर दिया है। अब हम तुमको जो उपाय बताते हैं, वह तुम करो, उससे विष्णुजी का मोह दूर हो जायगा। तुम सब लोग देवी की शरण में जाकर अपना दुःख सुनाओ, वे तुम्हारे सब कार्य सिद्ध करेंगी और विष्णुजी पुनः अपने मुख्य स्वरूप पर आ जायेंगे।
हे नारद! तब शिवजी के बताए हुए उपाय के अनुसार सब देवता गिरिजा की स्तुति करने लगे। वे बोले-हे मातेश्वरी! हम आपकी शरण में आए हैं, आप हमें इस दुःख से छुटकारा दिलाइये। देवता इस प्रकार स्तुति कर ही रहे थे कि उसी समय आकाश में एक अग्निकुण्ड दिखाई दिया तथा उस अग्निकुण्ड से यह शब्द निकला कि हे देवताओं! हमने तीन रूपों से, अलग-अलग तीनों गुणों से अलंकृत होकर संसार में अवतार लिया है। वह रूप-एक गिरिजा, दूसरी-लक्ष्मी तथा तीसरी-सरस्वती का है।
इसलिए हे देवताओ! तुम हमारे इन तीनों स्वरूपों की शरण में जाओ, तुम्हारा मनोरथ सफल होगा। यह सुनकर देवता पुनः स्तुति करने लगे। उस स्तुति के प्रत्येक श्लोक में 'जय-जय' शब्द था। तब देवताओं की उस स्तुति से प्रसन्न होकर तीनों देवियाँ प्रकट हुईं। फिर उन्होंने तीन बीज देकर यह कहा-हे देवताओ! जहाँ पर विष्णुजी बैठे हैं, वहीं तुम इन बीजों को बो दो। इस प्रकार तुम्हारी इच्छा पूर्ण होगी देवियों के ऐसे वचन सुनकर देवता उन बीजों को लेकर वहाँ जा पहुँचे, जहाँ विष्णुजी बैठे हुए थे।
उन्होंने उन बीजों को वहाँ बो दिया। उनसे तीन प्रकार की वनस्पति उपजीं। उनका नाम धात्री, मालती तथा तुलसी हुआ। हे नारद! धात्री मेरी स्त्री का नाम है. अतः उससे धात्री, लक्ष्मी से मालती तथा गिरिजा से तुलसी की उत्पत्ति हुई। वे तीनों वनस्पतियाँ रज, सत्, तम् इन तीनों गुणों को धारण किए स्त्रियों के समान प्रकट होकर, वृन्दा से भी अधिक सुन्दर रूप रख, विष्णुजी के सम्मुख जा खड़ी हुईं। विष्णुजी उनको देखकर आश्चर्यकित हुए।
हे नारद! विष्णुजी को इस प्रकार कामवश होते देखकर धात्री तथा तुलसी ने तिरछी चितवन से विष्णुजी की ओर देखा। मालती उनकी यह दृष्टि सौतिया डाह से न सहकर अत्यन्त दुःखी हुई। इसीलिए वह शिवजी पर नहीं चढ़ायी जाती। विष्णुजी धात्री तथा तुलसी पर मोहित होकर, उन्हें अपने साथ लिए हुए वैकुण्ठ में लौट आये। वहाँ आकर उनका मोह दूर हो गया।
हे नारद! जो मनुष्य जलन्धर के वध की इस कथा का पाठ करता है अथवा सुनता है, वह शिवलोक में स्थान प्राप्त करता है।
॥ नारद द्वारा सुदर्शन चक्र के संबंध में प्रश्न तथा दानवों के उपद्रवों का वर्णन ॥
सूतजी बोले कि-हे ऋषियो! इस कथा के सुनने के पश्चात् नारदजी ने ब्रह्माजी से कहा-हे पिता! अब आप मुझे उस सुदर्शन चक्र के विषय मैं बताइये, जो विष्णुजी का प्रसिद्ध शस्त्र है। मैं नहीं जानता कि यह वही सुदर्शन चक्र है जो शिवजी ने सब देवताओं से तेज लेकर जलन्धर के बंध के लिए बनाया था अथवा कोई दूसरा है।
नारदजी के ऐसे वचन सुनकर ब्रह्माजी बोले-हे नारद! सुदर्शन चक्र एक ही है, दूसरा नहीं। जब दैत्य अत्यन्त बल एवं द्रव्य प्राप्तकर देवताओं को दुःख पहुँचाने लगे तो विष्णुजी ने शिवजी की सेवाकर, उनसे सुदर्शन चक्र प्राप्त कर लिया। तब से वे उसी के द्वारा सब दैत्यों का वध करते हैं। कल्पभेद से शिव-चरित्र, लीला वर्णन, व्याख्यान, कथा तथा इतिहास में बहुत अन्तर है; परन्तु बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिए कि उसके हृदय में जो सन्देह उत्पन्न हो उसे पूछ ले, जिससे वह सत्यमार्ग से न भटक जाय।
जलन्धर के वध के पश्चात् दिति के लड़के दैत्य बहुत बली होकर उपद्रव मचाने लगे, जिससे संसार में मनुष्यों को बहुत दुःख प्राप्त हुआ। तप, योग, यज्ञ, देवताओं की पूजा, ध्यान वर्णाश्रम तथा सब धर्मों में विघ्न पड़ने लगे। तब सब देवता तथा मुनि दुःखी होकर मेरे पास आये। उन्होंने मेरी स्तुति कर अपने कष्टों का वर्णन किया। तब मैं उन सबको लेकर विष्णुजी के पास गया और उनकी स्तुति कर यह विनय की कि अब दानव तथा दैत्य बहुत दुःख पहुँचा रहे हैं, सो हम सब आपकी शरण में आये हैं।
हमारी यह प्रार्थना सुनकर विष्णुजी ने कहा-हे देवताओ! तुम सबलोग अपने-अपने घर जाओ, हम स्वयं दैत्यों से युद्ध करेंगे। यह कहकर वे दैत्यों के साथ युद्ध करने लगे परंतु दैत्यों पर विजय प्राप्त न कर सके; क्योंकि दैत्य महाबली थे। यह देखकर विष्णुजी ने सोचा कि शिवजी की सहायता के बिना हम दैत्यों पर विजय प्राप्त न कर पायेंगे। यह विचार कर विष्णुजी तुरन्त ही अन्तर्धान हो गए तथा कैलाश पर्वत के निकट तपस्या करने के लिए बैठ गये। उन्होंने एक कुण्ड खोदकर उसमें एक अग्नि भरी तथा वहीं बैठकर कठिन तप करने लगे।
हे नारद! इस प्रकार विष्णुजी ने पार्थिव पूजन, मन्त्र एवं ध्यान आदि से शिवजी का पूजन किया, लेकिन शिवजी प्रसन्न न हुए। यह देखकर विष्णुजी ने सोचा अब कि हम किस उपाय से शिवजी को प्रसन्न करें ? अन्त में उन्हें यह विश्वास हुआ कि शिवसहस्त्रनाम का जप करने से ही शिवजी प्रसन्न होंगे। यह निश्चयकर, वे शिवजी के एक सहस्त्र नामों का जप करने लगे तथा कमल पुष्प चढ़ाने लगे। शिवजी ने परीक्षा के लिए सहस्त्र पुष्पों में से एक कमल का पुष्प अलक्षित कर दिया। अन्त में पूजा करते-करते जब एक फूल कम हुआ तो उनको बड़ा दुःख हुआ, क्योंकि उस समय कमल-पुष्प प्राप्त होने की कोई आशा न थी। साथ ही पुष्प के बिना पूजन में भी अन्तर पड़ता था।
इसी चिन्ता में जब उन्होंने शिवजी का ध्यान किया तो ऐसा ज्ञान हुआ कि उनके नेत्र भी कमल-पुष्प से किसी प्रकार कम नहीं हैं। अतः उन्होंने तुरन्त ही अपने एक नेत्र को निकालकर, प्रसन्नतापूर्वक शिवजी को अर्पित कर दिया। यह देखकर शिवजी अत्यन्त प्रसन्न होकर प्रकट हुए। उन्होंने विष्णुजी को दर्शन दिया तथा आम्नडितम् मन्त्र का उच्चारण करते हुए कृपादृष्टि से देखा।
उस समय विष्णुजी ने शिवजी को प्रणाम किया। तब शिवजी मुस्कुराते हुए बोले-हे विष्णुजी! तुम्हारी जो इच्छा हो वह माँग लो। तब शिवजी के आदेशानुसार विष्णुजी ने! अत्यन्त पवित्र स्तुति करते हुए यह प्रार्थना की-हे सदाशिवजी! हम दैत्यों से पराजित हो गए हैं और उनपर किसी प्रकार भी विजय प्राप्त नहीं कर सकते। इसलिए आप कोई ऐसा यत्न कीजिये, जिससे वे मारे जायें।
हे नारद! यह सुनकर शिवजी ने कृपाकर, विष्णुजी को अपना सुदर्शन चक्र दिया और यह कहा-हे विष्णुजी! हमारे इस समय के रूप का ध्यान कर इस सहस्त्रनाम तथा सुदर्शन चक्र से, जो हम तुमको प्रदान करते हैं, तुम शत्रुओं एवं दैत्यों को मारकर, उन पर विजय प्राप्त कर लोगे। तुम्हें तीनों लोकों में कोई भी नहीं जीत सकेगा, लेकिन सुदर्शन चक्र का छोटे-छोटे कार्यों में प्रयोग मत करना। ब्राह्मणों के अतिरिक्त वह सबको जलाकर भस्म कर देगा।
शिवजी यह कहकर अन्तर्धान हो गए तथा विष्णुजी सुदर्शन चक्र को लेकर प्रसन्नतापूर्वक लौट आये। वे रात-दिन सहस्त्र नाम का जप करते तथा अपने भक्तों को उसी की शिक्षा देते रहते थे। अब भी जो कोई शिवसहस्त्रनाम तथा विष्णुस्तुति का पाठ करता है, उसके सब कार्य सिद्ध होते हैं। उसके शत्रुओं का विनाश होता है तथा वह दोनों लोकों में सुखी रहता है।
॥ विष्णु जी की तपस्या से दम्भ को शंखचूड़ नामक पुत्र की प्राप्ति ॥
नारदजी बोले-हे ब्रह्माजी! अब आप मुझे शिवजी के उन चरित्रों के विषय में बताइए, जिसमें उन्होंने दैत्यों को नष्ट किया। तब ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! अब मैं तुम्हें शंखचूड़ के मारने का वृत्तान्त बताता हूँ। शिवजी ने जिस उपाय से शंखचूड़ को मारा, उसको सुनने से शिव-भक्ति अधिक उत्पन्न होती है। सबसे पहिले मेरे पुत्र मरीचि से कश्यप उत्पन हुआ। उसको मेरे पुत्र दक्षप्रजापति ने अपनी तेरह पुत्रियाँ ब्याह दीं, जिससे बहुत सन्तानें उत्पन्न हुई। मैं तुम्हारे समक्ष उनमें से केवल एक मनुष्य का इतिहास सुनाता हूँ, जो भक्ति की वृद्धि करता है तथा इच्छित फल को देनावाला है।
कश्यप की स्त्री अत्यन्त सुन्दर एवं पतिव्रता थी। उसके चार पुत्र उत्पन्न हुए, जो दैत्य तथा महाशक्तिशाली थे। उनमें से एक पुत्र, विप्रचिति बहुत ही वीर एवं बलवान था । उनका एक पुत्र दम्भ था जो विष्णुजी का परम-भक्त एवं सेवक था। उसके कोई पुत्र उत्पन्न न होने से, वह अपने बड़ों की इच्छा एवं विष्णुजी की आज्ञानुसार पुष्कर में तप करने चला गया तथा एक लाख वर्षों तक इस हेतु कठिन तपस्या करता रहा, जिससे उसके कोई पुत्र उत्पन्न हो। विष्णुजी ने उसकी ऐसी आराधना देखकर दर्शन दिया तथा प्रसन्न होकर यह कहा कि तूम हमसे कोई वरदान माँग ले।
तब उसने कहा-हे विष्णुजी! मैं ऐसा पुत्र चाहता हूँ जो महावीर हो और मेरे आधीन हो। वह सारे संसार पर विजय प्राप्त करे तथा बहुत बुद्धिमान हो। विष्णुजी यह प्रार्थना स्वीकार कर उसे वरदान देकर अन्तर्धान हो गए। तब दम्भासुर अपने घर लौट आया तथा उसने सब हाल अपनी पत्नी से कहा सुनाया। पत्नी उसे सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुई। उसने भिक्षुकों को बहुत दान दिया। थोड़े दिनों बाद वह गर्भवती हो गयी।
हे नारद! सुदामा नामक कृष्णजी का एक भक्त, जो राधाजी के शाप से वैकुण्ठ अर्थात् गो-लोक में था, उसके गर्भ में आया। जब नौ-दस महीने व्यतीत हुए, तब शुभ-दिन एवं शुभ-नक्षत्र में उनका जन्म हुआ। उस समय दम्भासुर ने बड़ी धूमधाम से जात-कर्म करके अपने भाई-बन्धुओं की अनेक प्रकार से सेवा की और आनन्द प्राप्त किया। उसने अपने लड़के का नाम शंखचूड़ रखा। शंखचूड़ सर्वगुण-सम्पन्न तथा सब विद्याओं में पारंगत था। वह अपने माता-पिता को हर प्रकार से सुखी रखने लगा।
तदुपरान्त वह जैगीषव्य से उपदेश लेकर, तपस्या करने वन में गया तथा मेरे पाठ-पूजन में ऐसा लीन रहा कि उसे देखकर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई। इसलिए मैं उसे वरदान देने को प्रकट हुआ। उस समय शंखचूड़ ने मुझसे यह वरदान माँगा कि मैं देवताओं से कभी पराजित न होऊँ तथा तीनों लोकों में विजय प्राप्तकर, महावीर होकर रहूँ। मैंने उसको मुँहमाँगा वरदान देकर कृष्ण-कवच प्रदान किया। फिर उसे यह आज्ञा दी कि तुम बदरिकाश्रम में जाकर धर्मध्वज की पुत्री तुलसी से, जो तप कर रही है, अपना विवाह करो।
यह वरदान देकर, मैं वहाँ से अन्तर्धान हो गया। शंखचूड़ ने कृष्ण कवच को सिद्ध कर अपने कंठ पर बाँध लिया तथा उस स्थान पर अर्थात् बदरिकाश्रम में, जहाँ तुलसी तपस्या करती थी, जा पहुँचा। वह तुलसी की सुन्दरता को देखकर मोहित हो गया तथा उससे बोला-हे सुन्दरी! तुम कौन हो ? तुम किसकी कन्या हो और किसलिए ऐसा तप कर रही हो ? मैं तुम्हारा सेवक हूँ, इसलिए मुझसे सब बातें कहो।
यह सुनकर तुलसी ने कहा-मैं धर्मध्वज की पुत्री हूँ तथा तप करने के लिए यहाँ बैठी हूँ। तुम इस प्रकार मेरी परीक्षा लेनेवाले कौन हो ? यह सुनकर शंखचूड़ ने कहा-हे सुन्दरी! संसार में दो प्रकार के स्त्री-पुरुष होते हैं। एक तो बुरे तथा कामी, दूसरे भले और तपस्वी। मैं कामी और पापी नहीं हूँ, उसी प्रकार तुम भी इनसे रहित हो। मुझे यहाँ ब्रह्माजी ने भेजा है। मैं तुम्हारे साथ गान्धर्व-विवाह करूँगा। मेरा नाम शंखचूड़ है, मैं तीनों लोकों पर विजय प्राप्त करनेवाला तथा दम्भासुर का पुत्र हूँ।
हे नारद! शंखचूड़ के ऐसे वचन सुनकर तुलसी ने कहा-तुम बहुत भले एवं लोभ तथा काम से रहित हो। जो मनुष्य स्त्री के आधीन नहीं, वह बहुत भाग्यवान है; परन्तु जो मनुष्य स्त्री के वश में है, उससे बढ़कर संसार में कोई बुरा नहीं है। समस्त देवता, मुनि एवं पितर आदि स्त्री से घृणा करते हैं। स्त्रियों द्वारा दिये हुए पिण्ड पितरों को नहीं पहुँचते तथा उनके चढ़ाये हुए पुष्प देवता आदि स्वीकार नहीं करते हैं। जिसका हृदय स्त्री के आधीन है, उसका पूजा पाठ सब कुछ मिथ्या है और उसका जन्म भी मिथ्या है।
हे नारद! इस प्रकार उन दोनों में बातें हो ही रही थीं कि मैं उस स्थान पर जा पहुँचा तथा शंखचूड़ से बोला-हे शंखचूड़ तुम दोनों इस प्रकार वार्तालाप क्यों करते हो, शीघ्र ही गान्धर्व विवाह क्यों नहीं करते ? तुम दोनों एक ही वर्ण के हो। यह कहकर मैंने तुलसी को उसके कुल एवं जप-तप का हाल कहकर शंखचूड़ से विवाह करने की आज्ञा दी तथा कहा कि शंखचूड़ विष्णुजी का परम भक्त है, इसके साथ विवाह करने से कृष्णजी तुमको बहुत चाहेंगे तथा वैकुण्ठ प्रदान करेंगे।
यह कहकर मैं वहाँ से चला आया। तथा उन दोनों ने मेरी आज्ञानुसार प्रसन्नतापूर्वक गान्धर्व विवाह कर लिया। फिर शंखचूड़ तुलसी को लेकर अपने घर जा पहुँचा। वहाँ पहुँचकर उसने अपने माता पिता को प्रणाम किया और सब समाचार कह सुनाया। वे दोनों भी आनन्दित हुए। पश्चात् दम्भासुर शंखचूड़ को राजकाज सौंपकर स्वयं तप करने चला गया।
॥ शंखचूड़ द्वारा देवताओं को पराजित करना ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! असुरों के गुरु शुक्र यह समाचार सुनकर अनेक दैत्यों सहित शंखचूड़ के पास आये। शंखचूड़ ने उनकी भली प्रकार से सेवा की। शुक्रजी ने आशीर्वाद तथा प्रशंसा के पश्चात् देवता एवं दैत्यों की कथा का वर्णन किया। तदुपरान्त उन्होंने वह शत्रुता, जो दोनों में बहुत समय से चली आ रही थी कही, तथा देवताओं की जीत, दैत्यों की हार, बृहस्पति की सहायता एवं देवताओं के चरित्र सुनाकर, शंखचूड़ को सब दैत्यों का राजा बनाया। दैत्यों ने बहुत प्रसन्न होकर अनेक प्रकार की भेट दीं। तब शंखचूड़ ने अत्यन्त प्रसन्न होकर, दैत्यों तथा वीरों की एक विशाल सेना एकत्र कर, इन्द्रलोक पर आक्रमण कर दिया और नगर को चारों ओर से घेर लिया। इन्द्र भी देवताओं की सेना लेकर उससे लड़ने आये। उस समय दोनों सेनाओं में घमासान युद्ध हुआ। अन्त में देवताओं ने बड़ी वीरता से दैत्यों को पराजित कर दिया।
शंखचूड़ ऐसी हार देखकर बहुत दुःखी हुआ, तब उसने अपने बड़े-बड़े वीरों को युद्ध के लिए भेजा। वे देवताओं से कुशलता पूर्वक लड़े। देवता उनकी वीरतापूर्वक लड़ाई देखकर भाग गये और तितर-बितर हो गये। तब दसों दिक्पति दैत्यों के सम्मुख युद्ध करने आये। दोनों ओर से महायुद्ध हुआ। इन्द्र-वृषपर्वा, अनल-गौ, श्रुति-संहार, यम-कालिम्बिका, वरुण-चंचल, पवन-कल केय, कुवेर-दम्भ, ईश-विप्रचिति, ऋभु-राहु, चन्द्रमा-कनकाक्ष, मंगल-शुक्र, ब्रह्मपति-कालासुर, काल-यम, विश्वकर्मा-शनिश्चर, रक्ताक्ष-वसुगण, प्रगेशबण-धूमलोचन, नलकूबर-रलसार, इन्द्रपुत्र-किविट, मन्मथ-दीप्तिमान्, अश्विनी कुमार, सब दिक्पति, ग्रह, देवता तथा दैत्य, बड़े-बड़े वीर द्वन्द्वयुद्ध करने लगे।
अन्त में दैत्यों ने शुक्रजी का ध्यान किया तथा एक बार देवताओं के सम्मुख होकर एक साथ आक्रमण कर दिया। यह देखकर देवता वहाँ से भाग गये।
हे नारद! देवताओं को इस प्रकार भागते हुए देखकर ग्यारहों रुद्र दैत्यों के सम्मुख आ पहुँचे तथा त्रिशूलों से उनपर आक्रमण कर दिया। सब दैत्य उनके इस आक्रमण से भयभीत होकर भाग गये। जब शंखचूड़ ने दैत्यों की यह दुद्रशा देखी तो उसने अनेक वाण चलाये, जिससे देवता भाग गये। परन्तु ग्यारहों रुद्र वहीं युद्धस्थल में खड़े रहे।
उस समय ये आकाशवाणी हुई-हे देवताओ! शंखचूड़ को ग्यारहों रुद्र किसी प्रकार परास्त न कर सकेंगे और न इसे मारने में ही सफल होंगे, क्योंकि ब्रह्माजी के वरदान से यह सम्पूर्ण लोकों का राजा होगा। तुमलोग यहाँ से चले जाओ तथा अवसर की प्रतीक्षा करो। देवताओं ने इस आकाशवाणी को सुनकर युद्ध बन्द कर दिया। इस प्रकार दैत्य विजयी होकर आनन्द के साथ अपने घर लौट गये। तब शंखचूड़ सम्पूर्ण पृथ्वी का राजा हुआ। उसने देवताओं का द्रव्य दैत्यों को दे दिया। उसने इन्द्र के पद को धारण किया। उसके राज्य में किसी को कोई दुःख न हुआ। सबलोग अपने-अपने वर्ण, धर्म, कर्म तथा आश्रम में भली प्रकार स्थित रहे। शंखचूड़ कृष्णजी का परम भक्त था।
यद्यपि वह राधाजी के शाप से दैत्य रूप में उत्पन्न हुआ था, परन्तु दैत्यों के समान उसमें कोई लक्षण न था।
॥ राधिका जी के शाप से सुदामा का शंखचूड़ के रूप में जन्म लेने का वृत्तान्त ॥
नारदजी बोले-हे पिता! शंखचूड़ को राधिकाजी ने किस बात से रुष्ट होकर शाप दिया था, वह मुझे बताइये। ब्रह्माजी बोले-हे नारद! कृष्णजी गो-लोक में निवास करते हैं। वहाँ कृष्णजी के परममित्र सुदामा रहते थे। राधाजी ने उनका अनाचार देखकर ही उन्हें शाप दिया, जिससे उन्होंने दैत्य का शरीर धारण किया।
नारदजी बोले-हे पिता! गो-लोक कहाँ है ? क्या उसी को गो-लोक कहते हैं, जहाँ श्रीकृष्णजी विराजमान हैं ? ब्रह्माजी ने उत्तर दिया-हे पुत्र! प्रथम मेरा लोक है, जहाँ में शिवजी के ध्यान में सदैव मग्न रहता हूँ। उसके ऊपर वैकुण्ठ है, जहाँ विष्णु भगवान् विराजमान हैं। उसके ऊपर शिवजी का शासन है, जहाँ शिवजी के भक्त रहते हैं। उन्हें शिवजी के भजने से किसी प्रकार का खेद तथा शोक नहीं होता।
उसके ऊपर वीरभद्र का लोक है, जहाँ स्कन्द अर्थात स्वामिकार्तिकेय रहते हैं। उसके ऊपर उमा-लोक है, जहाँ शिवरानी विराजमान हैं। उसके ऊपर शिव-लोक है, जहाँ शिवजी परब्रह्म, जगत् के स्वामी, अन्तर्यामी विराजमान हैं। उसको आनन्दवन तथा काशी भी कहते हैं। वहाँ के राजा शिवजी हैं, जो तीनों देवताओं को उत्पन्न करनेवाले हैं। मैंने इस प्रकार के शिवलोक का जो वर्णन किया है, उसीके निकट गो-लोक है।
वहाँ श्रीकृष्णजी विराजमान हैं अर्थात् जहाँ शिवजी की गौ रहती हैं, वहाँ कृष्णजी का स्थान है जिससे वे उनका पालन करें। वह गो-लोक ही कृष्ण-लोक कहलाता है। प्रथम उसे शिवजी ने विष्णुजी को दिया था; परन्तु जब विष्णुजी ने कृष्णजी का और लक्ष्मीजी ने राधाजी का अवतार लिया, तब शिवजी ने उनका अभिषेक करके उन्हें ब्रह्माण्ड का राज्य दिया तथा उन्हें सबसे बड़ी पदवी दी।
उस समय शिवजी ने यह कहा-हे कृष्णजी! जैसी तुम्हारी इच्छा हो, तुम वैसा ही करना। तुम्हारी महिमा तथा बड़ाई विष्णुजी से अधिक होगी। तुम गोपियों के साथ विहार किया करना। इसी कारण श्रीकृष्णजी राधाजी को लेकर गोपियों के नगर में आए तथा गौओं का पालन करने लगे। एक दिन श्रीकृष्णजी ने राधाजी को कहीं भेज दिया तथा स्वयं विरजा के साथ विहार करने लगे। राधाजी से यह बात किसी सखी ने कह दी।
राधाजी यह सुनकर अत्यन्त क्रोधित हो, इस चरित्र को देखने के लिए आयी। वे विरजा के घर जाकर रथ से उतरीं और चाहा कि भीतर जायँ, परन्तु सुदामा, जो एक लक्ष गोपों के साथ द्वार पर बैठा था, उसने राधाजी को अन्दर जाने नहीं दिया। जब बहुत चिल्लाहट हुई, तब कृष्णजी ने जाना कि राधा आयी हैं। इसलिए वे भयभीत होकर स्वयं तो वहाँ से अन्तर्धान हो गए तथा विरजा ने अपने शरीर को नदी बना लिया, जो चारों और मीठे जल से बह निकली। जब राधिकाजी ने अन्दर जाकर दोनों में से किसी को न पाया, तब उन्होंने कृष्णजी पर बहुत क्रोध किया।
हे नारद! राधाजी विरजा को नदी देखकर बहुत रोयीं। उनके बाद विरजा श्रीशिवजी की आज्ञानुसार कृष्णजी के वियोग दुःख को देखकर प्रकट हुई। तब कृष्णजी ने फिर राधाजी को भुला दिया और विरजा के साथ विहार करने लगे। जब राधाजी ने फिर यह सुना तो वे कोपभवन में गयीं और वस्त्र एवं गहने आदि शरीर से उतारकर, भूमि पर लोटने लगीं। यह सुनकर श्रीकृष्णजी कोपभवन में राधाजी के निकट आये तथा सुदामा भी उसी प्रकार एक लाख गोपों की सेना लेकर द्वारा पर खड़ा रहा।
राधाजी ने कृष्णजी को अपने पास आता हुआ देखकर कहा-हे कृष्णजी! तुम यहाँ क्यों आये हो ? तुम परस्त्री से सम्भोग करते हो तथा उसी में मग्न रहते हो । तुम यहाँ से चले जाओ और जहाँ जी चाहे, वहाँ रहो। मेरे जाने से विरजा नदी हो गयी थी, अब तुमको भी यही उचित है कि तुम नद होकर परस्पर मिलो तथा भोग-विलास करो। तुम्हारे सब कार्य मनुष्यों के समान हैं, इससे मैं तुमको शाप देती हूँ कि तुम भी मनुष्य रूप धारंण कर, भरतखण्ड में निवास करोगे।
राधाजी ने ऐसा शाप देकर अपनी सखियों को आज्ञा दी कि इनको इस स्थान से निकाल दो। तब कृष्णजी राधाजी के आदेश पर वहाँ से निकाल दिये; गये, परन्तु वे गुप्त होकर वहीं बने रहे। जब सुदामा ने अपने स्वामी की ऐसी दशा देखी तो वे राधाजी से बोले-हे राधा! तुमने कृष्णजी को शाप क्यों दिया ? तुम सब गोपियाँ तो कृष्णजी के आधीन हो।
यह सुनकर राधाजी ने क्रोध में भरकर कहा-हे मूर्खसुदामा ! तू नहीं जानता कि कृष्णजी मेरे सेवक हैं। इसलिए मैं तुझ को भी यह शाप देती हूँ कि तू दानव का जन्म ले। तूने कृष्णजी का दैत्यों के समान मान किया तथा मेरा अपमान किया है। मेरे बिना तेरी कोई रक्षा न करेगा।
हे नारद! राधाजी का ऐसा शाप सुनकर सुदामा ने उत्तर दिया-हे राधे! अब तुम्हारी बुद्धि मनुष्यों के समान हो गयी है इसलिए तुम भी मनुष्यों का शरीर प्राप्त कर, कलंकित हो गयी और कोई गोप तुम्हारे साथ विवाह नहीं करेगा। तुम कृष्णजी को फिर पाकर सौ वर्ष तक दुःख भोगोगी।
हे नारद! शिवजी ने इस प्रकार के चरित्र किये, तदुपरान्त अपनी माया को खींच लिया। उस समय विष्णु भगवान् वहाँ उपस्थित हुए। उस समय दोनों को रुदन करते देखकर विष्णुजी ने सुदामा से यह कहा-हे सुदामा! तुम किसी प्रकार का दुःख मत करो तथा दानव होकर संसार का राज्य करो। शिवजी के अतिरिक्त तुम्हें कोई नहीं जीत सकेगा। तुम उन्हीं के हाथ से मरोगे तथा फिर यहाँ चले आओगे। मैं तथा राधा भी अवतार लेकर मनुष्यों के समान लीला करेंगे।
यह कहकर विष्णुजी राधाजी को लेकर गो-लोक में रहने लगे तथा सुदामा दानव हुए। मैंने तुम्हें यह पुरातन कथा सुनायी है। अब बताओ तुम और क्या सुनना चाहते हो ?
॥ देवताओं का शिवजी की शरण में पहुँचना ॥
नारद जी बोले-हे पिता! अब आप मुझे यह बताइए कि शिवजी ने शंखचूड़ को किस प्रकार मारा ? यह सुनकर ब्रह्माजी ने कहा-हे पुत्र! शंखचूड़ ने सब देवताओं को निकाल दिया तथा अच्छी प्रकार राज्य करने लगा।
तब सब देवता चिन्तामग्न होकर इन्द्र के पास गए तथा उनको आगे करके मुनीश्वरों सहित मेरे पास आए और शोकाकुल होकर शंखचूड़ का सब वृत्तान्त सुनाने लगे।
उनकी यह दशा देखकर मैं सबको विष्णुजी के पास लेकर गया तथा स्तुति कर, शंखचूड़ का सम्पूर्ण वृत्तान्त उन्हें कह सुनाया।
हे नारद! तब विष्णुजी ने प्रसन्न होकर यह कहा, हे देवताओ! शंखचूड़ हमारा परमभक्त है, इसलिए वह त्रिशूल के अतिरिक्त और किसी शस्त्र से नहीं मरेगा। यह कहकर विष्णुजी हम सबको साथ लेकर शिव-लोक में गये।
वहाँ ड्योढ़ी पर पहुँचकर हम सबलोग शिवजी की आज्ञानुसार अन्दर गये तथा उनकी स्तुति करते हुए बोले-हे सदाशिवजी! हम दैत्यों के हाथ से मारे जाते हैं। यह दशा देखकर शिवजी हम पर दयालु हुए।
॥ शिवजी का शंखचूड़ से युद्ध करने के हेतु देवताओं को भेजना ॥
ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! शिवजी अन्यन्त प्रसन्न होकर बोले-हे देवताओ! तुम निर्भय रहो। तुम्हारा सब प्रकार कल्याण होगा। शंखचूड़ ने अपने पहिले जन्म में कृष्णजी की पूजा की थी, परन्तु शाप राधाजी से पाया था। इस प्रकार शिवजी आदि से अन्त तक सब वृत्तान्त कह ही रहे थे कि उसी समय श्रीकृष्णजी राधिकाजी सहित वहाँ जा पहुँचे और स्तुति करने के पश्चात् बोले-हे शिवजी! आपकी माया में फंसकर तथा स्वयं को भूलकर हमने ऐसा शाप पाया। अब आप हमें क्षमा करें।
यह सुनकर शिवजी ने कहा-हे कृष्णजी! हमारी ऐसी ही इच्छा थी। तुम्हारा अहंकार समाप्त करने के लिए ही हमने यह चरित्र किया था। अब तुम अपने घर जाओ तथा आनन्दपूर्वक रहो। जब तुम दोनों क्रीड़ाकल्प में मनुष्य का शरीर धारणकर अवतरित होगे, तब तुम्हारा शाप नष्ट हो जायगा। तुम्हारा मित्र सुदामा दानव होकर इस समय शंखचूड़ कहलाता है। उसने देवताओं को बहुत दुःखी किया है। हम उनका भी दुःख दूर करेंगे।
कृष्णजी से यह कहकर शिवजी ने देवताओ की ओर देखा तथा कहा-हे देवताओ! तुम कैलाश पर्वत पर जाकर रुद्र से, जो कि अवतार हैं, सब वृत्तान्त कहो। वे तुम्हारे सब दुःख दूर करेंगे। वे केवल देवताओं के लिए ही अलग रूप धारण किये हैं। हमारा वहाँ सगुण रूप उपस्थित रहता है। जो हममें तथा रुद्र में भेद समझता है, वह कष्ट पाता है।
हे नारद! यह सुनकर हमसब अत्यन्त प्रसन्न हुए। जब राधाजी तथा कृष्णजी गोप सहित वहाँ से चले गये, तब मैं भी इन्द्र आदि देवताओं सहित कैलाश पर्वत पर गया और रुद्र को प्रणाम करने के पश्चात् यह प्रार्थना की-हे गिरिजा-पति! हम सब आपकी शरण में आये हैं। आप हमारे दुःखों को दूर कीजिये।
रुद्र ने उत्तर दिया-हे देवताओ! तुम अपना कार्य सिद्ध समझो तथा अपने-अपने घर लौट जाओ। हम शंखचूड़ को सभी दैत्यों सहित मारकर, तुम्हारे मनोरथ को पूरा करेंगे । शिवजी की ऐसी अमृतमयी वाणी सुनकर हम सब उन्हें प्रणम करके अपने-अपने घर लौट आये।
॥ शिवजी का शंखचूड़ के पास सन्देश भेजना ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! शिवजी ने शंखचूड़ के मारने का उपाय सोचकर अपने भक्त पुष्पदन्त को बुलाया तथा यह कहा-हे पुष्पदन्त! तुम गन्धर्वों के राजा हो इसलिए शंखचूड़ के पास जाकर यह कहो कि तुमने देवताओं का राज्य छीन कर ठीक नहीं किया है। तुम
माया के कारण अभिमानी एवं अहंकारी हो गये हो। अभी कुछ नहीं बिगड़ा है। तुमको यही उचित है कि देवताओं का राज्य उनको लौटा दो तथा व्यर्थ का कोई झगड़ा न करो।
यदि तुम अपनी मृत्यु नहीं चाहते हो तो पाताल में चले जाओ और वहाँ का राज्य करो; अन्यथा हम तुम्हें तुरन्त ही मार डालेंगे। पुष्पदन्त यह सुनकर शंखचूड़ के पास गया। उस समय वह एक ऊँची अटारी पर बैठा हुआ था तथा तीन करोड़ दैत्य उसकी सेवा कर रहे थे। ऐसी सेना देखकर पुण्षदन्त आश्चर्य चकित हुआ। अन्त में शंखचूड़ के पास बैठ गया।
उस समय शंखचूड़ ने उससे यह पूछा-तुम किसके दूत हो तथा इस प्रकार निडर क्यों बैठे हुए हो ? तुम्हारे कर्म सेवकों के से दिखाई नहीं देते। तुम जिस काम के लिए आये हो, उसे तुरन्त कहो। यह सुनकर पुष्पदन्त ने सब वृत्तान्त जो शिवजी ने उससे कहा था, शंखचूड़ को कह सुनाया तथा अपनी ओर से यह भी कहा कि या तो तुम देवताओं का राज्य लौटा दो अन्यथा युद्ध के लिए तैयार हो जाओ।
हे नारद! यह सुनकर शंखचूड़ ने कहा-हे दूत! हम शिवजी के भय के कारण देवताओं को राज्य नहीं देंगे। हम यह भली प्रकार जानते हैं कि पृथ्वी का यह राज्य दैत्यों तथा वीरों के लिए है। हम युद्ध करेंगे। हमें तो यह आश्चर्य है कि शिवजी ऐसे निःस्वार्थ महात्मा होकर भी देवताओं की रक्षा करते हैं। हम प्रातःकाल कैलाश पर्वत आयेंगे। तब शिवजी जो उचित समझें, वह करें।
यह सुनकर पुष्पदन्त ने मुस्कुराकर कहा-हे शंखचूड़! शिवजी परमश्रेष्ठ हैं। तुम इतना अहंकार मत करो। उनसे युद्ध करके तुम मृत्यु को प्राप्त होगे। पहिले तुम उनके गणों से ही लड़कर देख लो। उनका सामना करना तो बहुत ही कठिन हैं। पुष्पदन्त ऐसे वचन कहकर चुप हो गया।
तब शुखचूड़ ने कहा-मैं शिवजी से लड़े बिना दुःखी रहूँगा। यह सम्पूर्ण सृष्टि काल से उत्पन्न होती है तथा काल से ही नष्ट हो जाती है। हे पुष्पदन्त! तुम यह सारा वृत्तान्त जैसा कि मैंने तुमसे कहा है, शिवजी से कह देना।
यह सुनकर पुष्पदन्त वहाँ से उठकर शिवजी के पास आए तथा उन्हें सारा हाल कह सुनाया।
॥ शिव जी का गणों सहित शंखचूड़ से युद्ध करने के लिये जाना ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! शिवजी पुष्पदन्त द्वारा शंखचूड़ के ऐसे कठोर वचन सुनकर, क्रोधित हुए तथा अपने गणों को आज्ञा दी कि तुम सब तैयार हो जाओ। फिर वे वीरभद्र, नन्दीगण, भृंगी, क्षेत्रपाल, भैरव तथा मुनिभद्र आदि को पुकार-पुकार कर बोले कि तुम सबलोग शस्त्र आदि लेकर चलो। शिवजी की ऐसी आज्ञा सुनकर सब लोग प्रसन्न हो, बाजे बजाने लगे तथा सेना सहित बाहर निकल आए।
तब शिवजी ने यह कहा कि समस्त सेना तथा सेनापति हमारे साथ चलें, परन्तु गणपति अपनी सेना सहित यहाँ रह जायँ। इतना कहकर शिवजी शस्त्र आदि लेकर बैल पर चढ़कर चल दिए तथा कैलाश पर्वत के बाहर पहुँचकर ठहर गए। बड़े-बड़े सेनापति, गण, वीरभद्र, नन्दी, महाकाल, बाण, सुभद्रक विकृत, पिंगलाक्ष, मणिभद्र, विरूपाक्ष, विशालाक्ष, वाष्कल, गतिहूत, वृष, दृष्टिदंष्ट्र, कालंजर, दुर्गम, विद्रुम, बलभद्र, कपिल, कूटाम्बर, ताम्रनयन, विकर्ण, कीचर, बितवल, सन्तद्रन, अभिलाषी, आठो भैरव, ग्यारहों रुद्र और क्षेत्रपाल आदि गणों के स्वामी तथा राजा भी शिवजी की सेना के साथ हुए।
हे नारद! इतनी विशाल सेना के स्वामी वीरभद्र हुए। वीरभद्र की रक्षा के लिए भवानी सहस्त्रभुजा धारण किए, विमान पर चढ़कर आयीं। उनके वस्त्र लाल थे तथा वे मुण्डों की माला पहिने थीं। उनके हाथ में खप्पर था तथा अनेक प्रकार के शस्त्र थे। उनके पीछे देवता आदि की सेना थी जिसमें इन्द्र, वरुण, कुबेर, पवन, सूर्य, चन्द्रमा आदि नवग्रह वसुकर्मा, अश्विनीकुमार, बृहस्पति, धर्म, आठों बसु आदि समस्त देवता थे।
ये सभी शिवजी की सेना के साथ हुए। शिवजी ने सबको अलग-अलग बैठाया तथा कृपादृष्टि से सबकी ओर देखा, जिससे उनको बड़ी शक्ति प्राप्त हुई। तदुपरान्त शिवजी विन्ध्यभागा नदी के तटपट एक बरगद के वृक्ष के नीचे विराजमान हुए।
॥ शंखचूड़ द्वारा अपनी रानी से युद्ध के संबंध में सम्मति लेना ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! जब पुष्पदन्त शंखचूड़ के पास चले आए, तब शंखचूड़ अपनी रानी के पास गया और प्रातःकाल शिवजी से युद्ध करने का वृत्तान्त उसे कह सुनाया। उसे सुनकर रानी शोकाकुल होकर रोने लगी तथा बोली-हे नाथ! शिवजी के सब आधीन हैं, आप उनसे युद्ध करते हैं। आपको यह उचित नहीं कि आप उनसे वैर करें।
इस प्रकार शिवजी की महिमा का वर्णन करके वह बोली-हे स्वामी! कल रात्रि को मैंने एक बुरा स्वप्न देखा है अर्थात् मेरा बायाँ अंग फड़का है। यह अपशकुन देखकर आपको शिवजी से युद्ध नहीं करना चाहिए। शंखचूड़ ने उसकी बातों पर कोई ध्यान न देते हुए कहा -हे प्रिये! दुःख की बात कोई नहीं है। तीनों लोकों में सब कार्य समयानुसार ही होते हैं। समय पर ही अच्छी तथा बुरी बातें, सुख-दुःख, वृक्षों एवं पुष्पों का फलना-फूलना, देवताओं तथा सृष्टि की उत्पत्ति, संसार का जीवन-मरण तथा अन्तकाल आदि सभी कार्य होते हैं।
हे नारद! शंखचूड़ ने इस प्रकार अपनी स्त्री को समझाकर उसके साथ सम्भोग किया और अपने धर्म को भूल गया। उसकी स्त्री को यह भोग करना अच्छा न लगा; क्योंकि वह सदाशिवजी के साथ युद्ध करने जा रहा था, लेकिन शंखचूड़ उसे बहुत कुछ समझाकर भोग-विलास करता रहा। प्रातःकाल उठकर उसने अपने पुत्र को तिलक दे दिया। फिर अपनी रानी को रोते हुए देखकर, अपने पुत्र को उपदेश दिया तथा स्त्री को उसे सौंपकर, शिवजी के साथ युद्ध करने के लिए चल दिया।
उसने सेनापति को बुलाकर कहा-आज हमारी परीक्षा का दिन है, इसलिए तुम अपनी सम्पूर्ण सेना साथ ले चलो। शिवजी देवताओं को राज्य देने तथा मुझे अपने आधीन करने की इच्छा रखते हैं। इसलिए चलकर भली-भाँति युद्ध करो। छियासी कुल कम्बुदैत्य, पचास कुल असुर बन्दर, एक कोटिवीर्य तथा सात कुल दानव धौम्र-ये सब शस्त्र आदि लेकर चले तथा कालक भी अपनी सेना को साथ लेकर चले।
यह आज्ञा देकर शंखचूड़ घर से निकला तथा सोने-चाँदी के विमान पर चढ़कर शिवजी के साथ युद्ध करने चल दिया। उस समय युद्ध के बाजे बजने लगे। सब सेना तथा सेनापति प्रसन्नतापूर्वक चले जा रहे थे। शंखचूड़ उस स्थान पर आ गया, जहाँ शिवजी विराजमान थे। वहाँ पहुँचकर वह राजनीति का स्मरणकर, शिवजी की सेना से कुछ दूर पर ही ठहर गया।
॥ शंखचूड़ द्वारा दूत भेजकर शिवजी से सम्मति लेना ॥
ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! शंखचूड़ ने एक दूत भेजा। वह दूत वहाँ से शिवजी के पास चला, क्षिप्रा नदी के पास, जहाँ शिवजी विराजमान थे, पहुँचकर उसने शिवजी को प्रणाम किया और कहा-शंखचूड़ ने यह पूछा है कि आपकी क्या इच्छा है ? शिवजी ने उत्तर दिया-तुम शंखचूड़ से हमारी ओर से जाकर कह देना कि तुम मुरज के वंशज हो तथा सुदामा तुम्हारा नाम था। पिछले जन्म में तुम श्रीकृष्णजी के मित्र थे, परन्तु राधाजी के शाप से इस जन्म में दैत्य हुए हो।
इसलिए तुमको उचित है कि पूर्व जन्म एवं धर्म का स्मरण कर, देवताओं के साथ शत्रुता ने रखा। तुम योग्यतापूर्वक राज्य करो तथा देवताओं को हर प्रकार से सुख पहुँचाओ। तुम तथा समस्त देवता कश्यप मुनि द्वारा उत्पन्न किये हुए हो, इसलिए तुममें किसी प्रकार का अन्तर नहीं है। सब से बड़ा पाप अपने बन्धु-बान्धवों से शत्रुता रखना है। हम किसी की ओर नहीं हैं, परन्तु हम सेवा से प्रसन्न रहते हैं और अपने सेवक की सदैव रक्षा करते हैं। शिवजी ने इसी प्रकार बहुत से उपेदश देकर वेद तथा धर्म शास्त्र की नीति आदि का दूत से वर्णन किया ।
हे नारद! उसे सुनकर दूत ने उत्तर दिया-हे शिवजी! आपने जो यह कहा कि परस्पर की शत्रुता दुखदायी होती है, यह सत्य है, परन्तु विष्णुजी ने राजा बलि के साथ छल करके उसका नगर एवं राज्य छीन लिया तथा उनको पाताल भेज दिया। क्या उन्होंने यह उचित किया था ? क्या उनको यह भी उचित था जो उन्होंने बलि के पिता को मार डाला ? फिर जब देवताओं एवं दैत्यों ने सागर-मन्थन किया, तब देवताओं को अमृत क्यों मिला ? महिषासुर को देवीजी ने बिना किसी दोष के क्यों मार डाला ? फिर तारक तथा त्रिपुर भी मारे गये इसी प्रकार अन्धक, गज एवं जलन्धर आदि की मृत्यु हुई।
क्या देवता बुद्धिहीन थे जो उन्हें यह नहीं मालूम था कि अपने भाइयों के साथ शत्रुता करना पाप है ? क्या आप इसको जाति-द्रोह नहीं कहेंगे ?
हे शिवजी! आपको उचित है कि देवताओं तथा दैत्यों के युद्ध में आप ईश्वर होकर पक्षपात न करें, शत्रुता एवं मित्रता समान लोगों से होती है। आप जैसे ईश्वर तथा स्वामी को यह उचित नहीं है कि आप हमारे साथ युद्ध करें। क्या आपको ऐसे कार्य पर लज्जा नहीं आती ?
हे नारद! दूत की ऐसी बातें सुनकर शिवजी ने हँसते हुए कहा-हे दूत! हम किसी का पक्षपात नहीं करते। अब हमारे उपस्थित होने का कारण यह है कि इन्द्र आदि देवता हमारी शरण में आये हैं। तुम शंखचूड़ से यह कहना कि तुम सब दैत्यों से बड़े हो तथा कृष्णरूपी विष्णुजी के परमभक्त हो, इसलिए तुम भी उनके समान तथा परमोत्तम हो। इसलिए तुमसे युद्ध करते समय हम लज्जित नहीं हैं। तुमसे अधिक कहना व्यर्थ है। तुम देवताओं का राज्य उन्हें लौटा दो तथा स्वयं पाताल में जाकर राज्य करो। यदि तुम मेरे इन वचनों से असंतुष्ट एवं अप्रसन्न हो तो युद्धस्थल में आकर हमारे साथ युद्ध करो।
हे दूत! तुम यह सब बातें अपने स्वामी शंखचूड़ से कह देना। फिर उसकी जो भी इच्छा हो, वह करे। हम देवताओं का मनोरथ अवश्य पूर्ण करेंगे। इसके पश्चात् दूत वहाँ से उठकर चला आया तथा उसने शंखचूड़ से सब वृत्तान्त कह सुनाया।
॥ दूत से संदेश पाकर शंखचूड़ का शिवजी पर चढ़ाई करना ॥
ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! दूत के मुख से ऐसी बातें सुनकर शंखचूड़ अत्यन्त क्रोधित हुआ तथा उसने युद्ध करना ही उत्तम समझा। फिर वह देवताओं से सन्धि न कर, युद्ध की तैयारी में लग गया। उसने अपनी सेना सजाकर तैयार की और युद्ध के बाजे बजवाये। तदुपरान्त वह युद्धस्थल में जा खड़ा हुआ। उधर से शिवजी भी अपनी सेना सहित युद्धस्थल में आ उपस्थित हुए। इस प्रकार देवता एवं दैत्यों में युद्ध होने लगा। इन्द्र पुरुषप्रिय के साथ, शुक्र बृहस्पति के साथ तथा मृत्यु पुष्कर के साथ; इसी प्रकार दोनों ओर के प्रसिद्ध सेनापति परस्पर युद्ध करने लगे।
उस युद्ध में अनेक प्रकार के शस्त्रों का प्रयोग किया गया, जिनके आघात से अनेक देवता, दैत्य तथा हाथी-घोड़े मारे गए। इसी प्रकार वह युद्ध बहुत दिनों तक चलता रहा। न किसी की विजय हुई और न किसी की हार ही। अन्त में, दैत्यों ने देवताओं पर बड़े जोर का आक्रमण किया, जिससे भयभीत होकर देवता भागकर तितर-बितर हो गए। यह देखकर वीरभद्र तथा नंदी आदि शिवजी के गण युद्धक्षेत्र में आ उपस्थित हुए।
वीरभद्र ने अपने त्रिशूल द्वारा सब दैत्यों को कुरूप बना दिया। उस समय दैत्य भी युद्धस्थल छोड़कर भागने लगे। शंखचूड़ ने जब अपनी सेना को इस प्रकार भागते हुए देखा, तो उसने अपनी भागती हुई सेना को साहस बंधाया तथा स्वयं युद्ध करने चला। फिर उसने ऐसी भीषण बाण-वर्षा की, जिससे शिवजी के सब गण भयभीत होकर भाग गये। केवल नन्दी तथा वीरभद्र, जो शिवजी के अंश से उत्पन्न हुए हैं, युद्धस्थल में खड़े रहे। तथा शंखचूड़ ने नन्दी को भी बाण मारकर उन्हें धरती पर गिरा दिया। परन्तु कुछ समय पश्चात् ही नन्दी पुनः उठकर युद्ध करने लगे।
फिर शंखचूड़ के ऊपर वीरभद्र ने अपने त्रिशूल से आक्रमण किया, लेकिन शंखचूड़ ने उसे काट डाला तथा अपने शस्त्र से वीरभद्र पर ऐसा आक्रमण किया, जिससे वीरभद्र घायल होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। थोड़ी देर बाद ही वीरभद्र तुरन्त उठ बैठे तथा क्षेत्रपाल दैत्य से युद्ध करने लगे। फिर भैरव ने शंखचूड़ को अपने त्रिशूल से मारा, जिससे वह अचेत होकर गिर पड़ा। उस समय बड़ा भयानक युद्ध हुआ।
तभी भैरव को यह आकाशवाणी सुनाई दी कि शंखचूड़ शिवजी के अतिरिक्त और किसी से नहीं मरेगा, इसलिए तुमलोग शिवजी के निकट जाओ और उनसे निवेदन करो कि वे शंखचूड़ को मार डालें। इस आकाशवाणी को सुनकर भैरव तथा अन्य सब गण शिवजी के पास गये तथा उन्हें युद्ध का सब पूर्ण वृत्तान्त कह सुनाया।
॥ वीरभद्र का शंखचूड़ से युद्ध ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! शिवजी के गणों द्वारा देवताओं की पराजय तथा अपने गणों की दुर्गति का समाचार सुनकर, वीरभद्र को दैत्यों से युद्ध करने का आदेश दिया। वीरभद्र तुरन्त ही शिवजी की आज्ञानुसार सेना सहित युद्धस्थल में गये। वहाँ पहुँचकर वीरभद्र ने शिवजी के समान शंख बजाया तथा क्रोध प्रकट किया। उस शंख की ध्वनि को सुनकर तथा वीरभद्र के क्रोध को देखकर दैत्य काँप गये। तदुपरान्त वीरभद्र ने अपने भयानक आक्रमण से एक अक्षौहिणी दैत्य सेना का नाश कर दिया।
उस समय युद्धक्षेत्र रक्त से लाल हो उठा। सहस्त्रों कबन्ध इधर-उधर फिरने लगे। फिर वीरभद्र ने भी क्रोधित होकर एक करोड़ दैत्यों को मार डाला। अन्त में विप्रचिति, वृषपर्वा, जृम्भासुर तथा वीर विकम्पन-ये चारों महाबली दैत्य वीरभद्र के सम्मुख हुए तथा अलग-अलग युद्ध करने लगे। यह देखकर महामारी ने जाकर दैत्यों को नष्ट कर दिया। फिर भैरव ने दैत्यों को खाना शुरू किया। उस समय सब दैत्य पराजित हो गये।
हे नारद! अपनी सेना की इस प्रकार हार देखकर शंखचूड़ अपने कवच को कंठ में पहिन, विमान पर चढ़, बहुत बड़ी सेना साथ ले, मारू बाजे बजवाता हुआ, युद्धस्थल में आ पहुँचा तथा अपनी भागी हुई सेना को एकत्र किया। फिर उसने अपने धनुष को तानकर ऐसी बाण-वर्षा की जिससे आकाश बाणों से भर गया और चारों ओर अँधेरा ही अँधेरा छा गया। तब अनेक देवता हार मानकर भाग गये। अकेले वीरभद्र ही वहाँ खड़े रहे ।
तब शंखचूड़ ने अपनी माया से पर्वत, सर्प, अग्नि आदि को उत्पन्न किया तथा इनकी वर्षा आरम्भ कर दी, जिसमें वीरभद्र इस प्रकार छिप गये, जैसे सूर्य बदली में छिप जाता है। यह देखकर वीरभद्र ने आश्चर्यचकित हो शिवजी का स्मरण किया तथा महाशक्ति को छोड़ा। उस शक्ति ने दैत्यों की इस माया को बिलकुल नष्ट कर दिया। तब शंखचूड़ ने क्रोधित होकर वीरभद्र के रथ तथा धनुष को अपने अत्यन्त पवित्र बाण से काट डाला। वीरभद्र के रथ के घोड़े मरकर पृथ्वीपर गिर पड़े। तब शंखचूड़ ने दूसरा बाण वीरभद्र पर छोड़ा, जिससे वीरभद्र मूच्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े।
जब वीरभद्र को चेत हुआ, तब वे दूसरे रथ पर चढ़कर शंखचूड़ से युद्ध करने लगे। उन्होंने उसके रथ, सन्नाह, घोड़े, शक्ति आदि को काटकर पृथ्वी पर गिरा दिया। फिर उसके सारथी को मारकर, अपनी शक्ति से शंखचूड़ को भी अचेत कर दिया। थोड़े समय के पश्चात् जब शंखचूड़ सचेत होकर उठा तथा गर्जन करने लगा, तब वीरभद्र ने उसे पुनः अपनी शक्ति से गिरा दिया।
इसी प्रकार वीरभद्र ने कई बार उसे अचेत करके गिराया; लेकिन शंखचूड़ ने उठकर अन्त में अपनी सांग से वीरभद्र पर आक्रमण कर ही दिया। वीरभद्र उसके प्रहार से पृथ्वी पर गिरकर मर गये।
हे नारद! तब मृतक-वीरभद्र को महाकाली ने उठाकर शिवजी के पास ले जाकर रख दिया और सब वृत्तान्त विस्तार पूर्वक कह सुनाया। उस समय शिवजी ने वीरभद्र को स्पर्श किया, जिससे वे पुनः जीवित हो उठे। पुनः जीवित होते ही वीरभद्र चिल्लाने लगे तथा फिर से युद्धस्थल में जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने अपने त्रिशूल से शंखचूड़ पर आक्रमण किया तब शंखचूड़ उसके आघात से पृथ्वी पर गिर पड़ा।
जब वह सचेत हुआ, तब उसने वीरभद्र पर बाण-वर्षा की; परन्तु वीरभद्र पर उन बाणों का कोई प्रभाव न हुआ। अन्त में, उसने अपनी बरछी वीरभद्र के हृदय में मारी, जिससे वे पृथ्वी पर गिर पड़े। परन्तु शंखचूड़ ने वीरभद्र को पुनः अपने त्रिशूल से मारना चाहा।
उस समय महाकाली तथा समस्त गणों ने आकर उनकी रक्षा की। दैत्यों ने भी अपनी भागी हुई सेना को फिर एकत्र किया। दोनों सेनाएँ पुनः रणक्षेत्र में आ डटीं। अतः युद्ध पुनः आरम्भ हो गया।
॥ कालीजी का शंखचूड़ से युद्ध ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! इस बार युद्ध बहुत भयानक हुआ, जिससे दिन रात के समान दिखाई देने लगा। कालीजी ने ऐसा भयंकर शब्द किया जिससे सब दैत्य अचेत होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। फिर कालीजी ने महामद का पानकर नृत्य करना आरम्भ कर दिया।
यह देखकर दैत्यों को अत्यन्त दुःख एवं शोक हुआ; परन्तु देवता प्रसन्न थे। तब शंखचूड़ फिर सब दैत्यों को एकत्र करके रणक्षेत्र में खड़ा हो, वीरभद्र से युद्ध करने लगा। लड़ते-लड़ते दोनों वीरों के शरीर इस प्रकार घायल हो गये, जिस प्रकार फूले हुए ढाक के वृक्ष हों। जब शंखचूड़ ने अग्निबाण चलाकर चारों ओर अग्नि फैला दी, तब वीरभद्र ने वरुणास्त्र छोड़कर उस अग्नि को बुझा दिया।
इसी प्रकार शंखचूड़ ने अनेक प्रकार के वाण छोड़े लेकिन वीरभद्र ने सबको अपने बाणों द्वारा नष्ट कर दिया। अन्त में, शंखचूड़ ने अपने बाणों का कोई प्रभाव न देख, नारायण बाण छोड़ा, परन्तु वीरभद्र ने उसको भी पाशुपात अस्त्र से दूर कर दिया। तब शंखचूड़ ने चक्र छोड़ा, उसे महाकाली ने तुरन्त निगल लिया तथा शंखचूड़ को किसी प्रकार विजय प्राप्त न करने दी।
फिर कालीजी ने अपने धनुष, जिसका शब्द अन्तकाल से कम न था, खींचकर अग्निबाण छोड़ा लेकिन शंखचूड़ ने वैष्णवास्त्र द्वारा उसे दूर कर दिया। तब कालीजी ने नारायणास्त्र छोड़ा, लेकिन शंखचूड़ ने अपने रथ से उतरकर उसे दंडवत् की, जिससे वह निष्फल होकर दूर हो गया। फिर शंखचूड़ ने दिव्यास्त्र शक्ति आदि कालीजी पर चलाये, वे सब भी निष्फल रहे। इसी प्रकार बहुत दिनों तक दोनों पक्ष लड़ते रहे। अन्त में, कालीजी ने पाशुपत अस्त्र के छोड़ने का विचार किया, परन्तु उसी समय यह आकाशवाणी हुई कि हे काली! तुम यह अस्त्र किस लिए छोड़ती हो ? यह शंखचूड़ तुमसे न मरेगा; क्योंकि यह कृष्णजी का परम भक्त है।
हे नारद! महाकाली ने उस आकाशवाणी को सुनकर, अस्त्र को न छोड़ा। शंखचूड़ ने अपने खड्ग को छोड़ा परन्तु कालीजी ने उसे खा लिया तथा मुख खोलकर शंखचूड़ को खाने के लिए चलीं, परन्तु वह अपनी माया से गुप्त हो गया। कालीजी ने उसके रथ तथा सारथि को नष्ट कर डाला। तब शंखचूड़ फिर प्रकट हुआ। कालीजी ने उसे उठा तथा धुमाकर आकाश की ओर फेंक दिया तथा एक करोड़ दैत्यों को मारकर रक्तपान किया।
तब शंखचूड़ ने उठकर कालीजी को प्रणाम किया तथा विमानपर चढ़कर, निर्भय हो, पुनः युद्ध करने लगा। महाकाली ने शंखचूड़ में ऐसा धैर्य देखकर, अपना महाभयंकर शरीर बनाया तथा रुद्र महाधनुष हाथ में लेकर सोचा कि अब इससे प्रलय करें, परन्तु तभी यह आकाशवाणी हुई कि हे काली! इसकी मृत्यु तुम्हारे हाथ से नहीं होगी, तुम व्यर्थ ही युद्ध करती हो। तुम शिवजी के निकट जाओ, वे इसे मारेंगे।
॥ शिवजी का शंखचूड़ से युद्ध ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! महाकालीजी युद्धस्थल से हटकर शिवजी के पास गयीं तथा सेना को साथ ले जाकर, शिवजी को सब वृत्तान्त कह सुनाया। उसे सुनकर शिवजी अत्यन्त चिन्तित हुए। फिर उन्होंने अपनी माया का स्मरण किया तथा शंखचूड़ के पहिले जन्म का वृत्तान्त कहा। इसके पश्चात् शिवजी अपने गणों सहित बैल पर चढ़कर युद्धक्षेत्र को चल दिए। क्षेत्रपाल, वीरभद्र, भैरव तथा नन्दीश्वर की ओर उन्होंने एक बार दृष्टिपात किया, जिससे उन सबको महाशक्ति प्राप्त हुई।
तब वे सब अस्त्र-शस्त्र लिये तथा भयंकर रूप धारण किए, युद्धस्थल में आ गये। दैत्यों ने उनको रुद्र कालान्तक के रूप से देखा तथा भयभीत हो गये। उस समय शंखचूड़ ने शिवजी को देखकर रथ से उतरकर प्रणाम किया। फिर वह शिवजी की आज्ञा के अनुसार, धनुष एवं बाण लेकर शिवजी से लड़ने लगा। सौ वर्ष तक वे दोनों लड़ते रहे।
हे नारद! उस समय मैं अपने कुल सहित सभी वैकुण्ठवासी आकाश में स्थित होकर इस युद्ध कौतुक को देखते रहे। शंखचूड़ ने जो बाण छोड़े, वे सब शिवजी ने तुरन्त काट डाले तथा जो शस्त्र शिवजी ने मारे, वे शंखचूड़ ने काट डाले। अन्त में शंखचूड़ ने क्रोधित होकर शिवजी को चक्र मारा। शिवजी ने उस चक्र को अपने घूँसे से चूर-चूरकर पृथ्वी पर फेंक दिया तथा शंखचूड़ को भी घायल कर पृथ्वी पर गिरा दिया।
जब उसकी मूर्च्छा दूर हुई, तब वह पुनः रथ पर चढ़कर शिवजी के सम्मुख आया। उस समय शिवजी ने शंखचूड़ को आते हुए देखकर डमरू बजाया तथा श्रृंगीनाद करके अपना धनुष टंकारा, जिससे यह प्रतीत होता था कि अब अन्तकाल आ गया है। चारों दिशाओं में शिवगण गर्जना करने लगे। उस समय शंखचूड़ ने अपनी शक्ति चलायी जिसे क्षेत्रपाल ने तुरन्त निगल लिया। शिवजी तथा शंखचूड़ परस्पर इतने लड़े कि उस युद्ध को देखकर सब डर गये।
अन्त में शिवजी ने उसकी समस्त भुजाएँ काट डालीं तब शंखचूड़ शिवजी की ओर झपटा। शिवजी ने तुरन्त त्रिशूल से शंखचूड़ के हृदय को फाड़ दिया। उदर के फटते ही उसमें से एक मनुष्य 'तिष्ठ-तिष्ठ' कहता हुआ निकला। शिवजी ने अपने अस्त्र से उसका भी सिर काट डाला। वह फिर कट कर काँपने लगा तथा भयंकर रूप धारण कर देवताओं को बहुत दुःख पहुँचाने लगा। तब सदाशिवजी की आज्ञा के अनुसार कालीजी दैत्यों की सेना में घुस गयीं और दैत्यों को खाने लगीं। इस प्रकार उन्होंने अनेक पक्षियों आदि को खा डाला। महामारी ने भी सेना का ग्रास किया।
क्षेत्रपाल, भैरव, नन्दी तथा वीरभद्र ने भी बहुत से दैत्यों को खाया तथा अनेक को नष्ट कर दिया। शिवजी के सारे सेनापति दैत्यों को मारकर नष्ट करने लगे। योगिनीगण दैत्यों को खाने लगीं। ज्वर ने भी शरीर धारण कर दैत्यों को मार डाला। उस समय सब दैत्य ऐसी दुर्गति देखकर, वहाँ से भाग गये, क्योंकि सन्निपात ने भी अनेक दैत्यों को दुःखी किया था तथा नन्दी ने भी दैत्यों को मार डाला था। अन्त में, इस प्रकार दैत्यों पर विजय प्राप्त करके शिवजी भी परम आनन्दित हुए।
॥ शिवजी के द्वारा शंखचूड़ का वध ॥
ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! शंखचूड़ ने इस प्रकार अपनी सेना की दुर्गति देखकर भयंकर क्रोध किया तथा शिवगणों को डॉट-डपट कर बोला-तुमलोग मेरे सम्मुख आकर लड़ो, इस प्रकार दैत्यों को मारने से क्या लाभ है ? वीर निर्बलों से नहीं लड़ा करते।
यह कहकर उसने शिवजी पर तीक्ष्ण बाण मारे, परन्तु शिवजी ने उन सबको काट डाला। तब शंखचूड़ ने एक माया को उत्पन्न किया, जिसको शिवजी ने महादिव्य बाणों से दूर कर दिया। तदुपरान्त शंखचूड़ पृथ्वी में लुप्त हो गया। उस समय मैंने तथा विष्णुजी ने शिवजी का जय-जयकार किया। तब शिवजी ने क्रोध करके यह चाहा कि शंखचूड़ को मार डालें।
उन्होंने अपना त्रिशूल उठा लिया। उसी समय यह आकाशवाणी हुई-हे शिवजी! जब तक शंखचूड़ कृष्ण-कवच पहने रहेगा तथा इसकी पत्नी तुलसी पतिव्रता रहेगी, यह नहीं मरेगा, क्योंकि ब्रह्माजी का ऐसा वरदान है।
हे नारद! इस आकाशवाणी को सुनकर शिवजी ने अपना त्रिशूल नहीं छोड़ा। उस समय विष्णुजी शिवजी की अभिलाषा जानकर उपस्थित हुए और बोले-हे शिवजी! आपकी जो आज्ञा हो बताइये, मैं उसे पूरा करूँगा। तब शिवजी ने यह कहा-हे विष्णु! तुम किसी प्रकार से शंखचूड़ के कंठ से कृष्ण-कवच उतार लो तथा उसकी स्त्री का पातिव्रत धर्म नष्ट कर डालो।
शिवजी की ऐसी आज्ञा सुनकर विष्णुजी ब्राह्मण के रूप में शंखचूड़ के पास गये। शंखचूड़ ने उन ब्राह्मण रूपधारी विष्णुजी को प्रणाम किया। तब ब्राह्मण ने उसे आशीर्वाद देकर कहा-हे शंखचूड़ तुम मुझे पानी पिलाओ। शंखचूड़ ने अत्यन्त आदर के साथ उस ब्राह्मण को पानी पिलवाया।
तब ब्राह्मण ने कहा-हे शंखचूड़! तुम हमको कृष्ण-कवच दे दो। यद्यपि कृष्ण-कवच शंखचूड़ को अत्यन्त प्रिय था, फिर भी उसने उसे ब्राह्मण को दे दिया। हे नारद! यदि शत्रु ब्राह्मण बन कर कोई वस्तु मांगे तो उसे निशंक दान कर दे दिया। चाहे प्राण भले ही चले जायें; परन्तु ब्राह्मण विमुख न जाय।
फिर, जिसके पास विष्णुजी भिक्षुक-ब्राह्मण बन कर जायँ, उससे अधिक भाग्यशाली कौन होगा? जिसके यहाँ से भिक्षुक निराश होकर न लौटे, उसके धन्य भाग्य हैं। इसी उदारता पर राजा बलि, दधीचि, जरासन्ध, सांख्य आदि अत्यन्त कीर्तिवान हुए हैं।
इसके पश्चात् विष्णुजी शंखचूड़ के रूप में उसके घर गये तथा बड़े चरित्रों से उसकी स्त्री का धर्म नष्ट किया। फिर उन्होंने लौट कर शिवजी से सब वृत्तान्त कहा। शिवजी ने उसे सुनकर अपने विजय-त्रिशूल को उठा लिया, जिसमें पृथ्वी एवं आकाश सब दिखाई देते थे। वह मध्यान्ह-काल के सूर्य के समान तेजस्वी था। उसमें सब शस्त्र थे। फिर शिवजी ने उस त्रिशूल को छोड़ा, जिससे शंखचूड़ तुरन्त जलकर भस्म हो गया। त्रिशूल अपना काम करके पुनः शिवजी के पास लौट आया।
हे नारद! शिवजी द्वारा शंखचूड़ का वध तथा दैत्यों पर अपनी विजय देखकर देवता बड़े प्रसन्न हुए। शंखचूड़ मरकर गो लोक में जा पहुँचा तथा शाप से छूटकर पूर्व के समान हो गया। उसकी हड्डियों के शंख बने, जो विष्णुजी को अत्यन्त प्रिय हैं। देवता एवं मुनि जो विष्णुजी के परिवार में हैं उन सबको भी शंख बहुत प्यारे लगते हैं, परन्तु वह शंख शिवजी को प्यारा नहीं है।
उस समय मैं, इन्द्र तथा समस्त देवता शिवजी के पास गये और उनकी बहुत स्तुति कर बारम्बार प्रणाम एवं दंडवत की। फिर शिवजी की आज्ञा पाकर सब देवता अपने-अपने घर चले गये। उस समय सब के दुःख दूर हो गये तथा सम्पूर्ण संसार में आनन्द छा गया। इसके पश्चात् शिवजी अपने गणों सहित कैलाश पर गये। जो मनुष्य शिवजी के इस चरित्र को सुने अथवा पढ़ेगा, उसको किसी प्रकार का दुःख न होगा। सब के दुःख इस इतिहास को सुनकर भस्म हो जायेंगे।
॥ विष्णु जी द्वारा शंखचूड़ का स्वरूप धारण कर, तुलसी के घर जाना ॥
नारदजी बोले-हे पिता! अब आप मुझे यह बताइये कि विष्णुजी ने किस प्रकार तुलसी का पातिव्रत धर्म नष्ट किया था ? यह सुनकर ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! यह चरित्र शिवजी एवं विष्णुजी की भक्ति को अधिक बढ़ाता है, इसलिए तुम इसको मन लगाकर सुनो। विष्णुजी शंखचूड़ का वेष धारण कर तुलसी के घर गये तथा उसके द्वार पर पहुँचकर, अपनी विजय के बाजे बजवा दिये। यह देखकर तुलसी अत्यन्त प्रसन्न हुई तथा उसने बहुत सा धन आदि भिक्षुकों एवं ब्राह्मणों को दान में दिया। फिर वह अपना श्रृंगार करके पति के आगमन की प्रतीक्षा करने लगी।
तब विष्णुजी शंखचूड़ के रूप में ही अन्दर घर में गये। तुलसी ने उनके चरण धोकर स्तुति की तथा चाँदी की चौकी पर बैठाकर ताम्बूल दिये। फिर हाथ जोड़कर बोलीं-हे स्वामी! मेरे धन्य भाग्य हैं जो आप विजय प्राप्त करके आये हैं। फिर तुलसी ने शिवजी की स्तुति करके पूछा कि आपने उनपर किस प्रकार विजय प्राप्त की?
तब विष्णुजी ने कहा-हे तुलसी! हमने युद्धस्थल में जाकर बहुत लड़ाई की। देवता हमारे पराक्रम से भयभीत होकर भाग गये। उस समय ब्रह्माजी ने हम दोनों में सुलह करवा दी तथा हमने भी ब्रह्माजी की आज्ञानुसार देवताओं को कुछ दे दिया। तदुपरान्त शिवजी अपने घर चले गये तथा देवता आदि भी अपने-अपने लोकों को लौट गये।
हे नारद! तुलसी को यह वृत्तान्त सुनाकर विष्णुजी सेज को सजा हुआ देखकर, तुलसी के साथ भोग-विलास करने लगे, परन्तु तभी तुलसी को कुछ सन्देह उत्पन्न हुआ। उसने सोचा कि कहीं यह मेरे पति के रूप में कोई अन्य मनुष्य न हो। यह सोचकर तुलसी ने विष्णुजी से कहा-तुम शंखचूड़ नहीं हो तुमने मेरे साथ छल किया है तथा मेरे पातिव्रत धर्म को नष्ट किया है। अब सत्य-सत्य बताओ कि तुम कौन हो?
तब विष्णुजी ने डरकर कहा-हे तुलसी! हम विष्णु हैं। हमने यह कार्य देवताओं की भलाई के लिए ही किया है। यह कहकर विष्णुजी ने उसे अपने स्वरूप में दर्शन दिये। जब तुलसी ने विष्णुजी को इस प्रकार देखा तो वह क्रोधित होकर बोली-हे विष्णुजी! तुमने मेरे पतिव्रत धर्म को छल से नष्ट कर दिया तथा इसी प्रकार छल से मेरे स्वामी को मरवा डाला।
इसलिए मैं तुम्हें शाप देती हूँ कि तुम पत्थर हो जाओ। जो लोग तुमको दया-सिन्धु कहते हैं, वे मूर्ख हैं। यह कहकर तुलसी रोने लगी। यह देखकर विष्णुजी डरे तथा उन्होंने शिवजी का ध्यान किया।
उस समय शिवजी ने तुलसी को दर्शन दिया तथा बोले हे तुलसी! सब लोग अपने-अपने कर्मों का फल भोगते हैं। संसार में दुःख एवं सुख कोई वस्तु नहीं है। यह संसार समुद्र के समान है, जिसमें दोनों प्रकार का जल है। तृष्णा उसकी लहर है और बिना धर्म के कोई इसे पार नहीं कर सकता। तुम दोनों से हम यही कहते हैं कि तुमने प्रथम जो योग तथा तप किया था, वह किसी प्रकार निष्फल न होगा। तुम दोनों हमारे भक्त हो। तुम्हारा पति कृष्णजी का मित्र सुदामा था। उसे राधिकाजी ने शाष दिया था, इसीलिए वह यहाँ आकर उत्पन्न हुआ। अब वह मारा गया तथा इस शरीर को त्यागकर, फिर वैसा ही शरीर धारण किया है। तुम भी इस शरीर का त्याग करो तथा विष्णुजी के साथ विहार करो। देवताओं की भलाई के लिए हमने तुम्हारे पति का वध किया था, इस पर क्रोध न करना।
अब तुम नदी होकर गण्डकी नदी के नाम से प्रसिद्ध होगी तथा समुद्र, जो विष्णुजी के अंश से है, उसकी स्त्री होकर विहार किया करोगी। इसके अतिरिक्त तुम दोनों एक और रीति से इकट्ठे रहोगे अर्थात् तुम पृथ्वी में इसी नाम अर्थात् तुलसी के नाम से प्रसिद्ध होकर उत्पन्न होगी तथा विष्णु के शरीर पर चढ़ा करोगी, जिससे विष्णु अपने कर्मों का फल पायेंगे। विष्णु तुम्हारे शाप से पत्थर बनकर, गण्डकी नदी के तीर पर स्थित रहेंगे।
उस जगह बड़े-बड़े तीक्ष्ण दंष्ट्रों वाले भयानक जीव उत्पन्न होकर पत्थर को काटकर बहुत से गोल सीधे टुकड़े बनाया करेंगे, वे टुकड़े शालग्राम के नाम से प्रसिद्ध होंगे। तथा जो टूटे-फूटे टुकड़े होंगे केवल पत्थर कहलायेंगे।
हे तुलसी! वेद ने चक्र के भेद से शालग्राम शिला का बहुत विस्तार से वर्णन किया है। तुम्हारी भेंट उस शालग्राम-शिला के साथ सदैव हुआ करेगी, जो पुण्य को बढ़ाने वाली तथा पापों को नष्ट करनेवाली समझी जायेगी। तुम शंखचूड़ की स्त्री हो तथा तुमने बहुत समय तक उससे विहार किया है, इससे तुम्हारा संयोग शंख के साथ भी हुआ करेगा।
शिवजी तुलसी से यह बातें कहकर अन्तर्धान हो गये। तब तुलसी भी प्रसन्न हो, अपना शरीर त्याग, वैकुण्ठ को चली गयी। वह सुन्दर स्वरूप धारणकर विष्णुजी के साथ विमान पर चढ़ी उस समय उसको हर प्रकार का आनन्द प्राप्त हुआ। तुलसी के प्रथम शरीर से गण्डकी नदी उत्पन्न होकर ऐसी तेजवती हुई कि जो कोई मनुष्य उसके जल को देखता या स्पर्श करता है तो उसके सब पाप नष्ट हो जाते हैं। उसके तट पर विष्णुजी पर्वत के आकार में स्थित हुए, जिनके दर्शन मात्र से ही समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। वहाँ बड़े-बड़े कठोर दाँत वाले कीड़े इकट्ठे होकर शिलाओं में बड़े-बड़े छेद किया करते हैं। उनसे जो टुकड़े होकर गण्डकी नदी में गिरा करते हैं नही शालग्राम की मूर्तियाँ हैं, जो अत्यन्त पवित्र तथा दुःख दूर करनेवाली
हैं। उनमें जो चक्र सहित हों, वे पूजने के योग्य हैं। उनके लक्ष्मीनारायण आदि अनेक प्रकार हैं। जो टुकड़े नदी से बाहर मिलते हैं, वे पिंगलादि नामों से प्रसिद्ध हैं तथा गृहस्थ के पूजने योग्य नहीं हैं। जो मनुष्य चारों बर्णों के बाहर हैं, वे भी उन्हें पूजने के योग्य हैं। वे मूर्तियाँ दो प्रकार की हैं- एक तो आनन्द देती हैं तथा दूसरी दुःख प्रदान करने वाली हैं। यह शालग्राम शिला शुद्र वर्ण के पूजने योग्य नहीं है। शालग्राम शिला की बहुत बड़ी बड़ाई है, जैसी कि नर्मदा के पत्थरों की महिमा है। शालग्राम तथा नर्मदा की मूर्तियाँ स्वयं विष्णुजी एवं शिवजी का स्वरूप हैं।
हे नारद ! शालग्राम-शिला को तुलसीपत्र अत्यन्त प्रिय हैं। कदाचित् यदि तुलसी पत्र से अलग शालग्राम की मूर्ति रक्खी जाय तो बहुत ही दुःख प्राप्त होता है एवं स्त्री का वियोग होता है। इसी प्रकार शालग्राम को शंख का वियोग भी अत्यन्त दुखदायी है। जब तुलसी, शंख, शालग्राम एकत्र करे तथा एक ही स्थान पर रक्खे तो दोनों लोकों का सुख प्राप्त होता है। हे नारद ! विष्णुजी की यह कथा मुक्ति प्रदान करनेवाली है। इसको सुनने अथवा सुनाने से आनन्द मिलता है। शंखचूड़ वध तथा शिवजी का चरित्र सम्पूर्ण मनोरथों को पूर्ण करने वाला है। इस कथा में विष्णुजी का यश भी कहा गया है, इसलिए यह और भी आनन्ददायक है। यह भक्तों को अधीन करनेवाली है। शिवजी भक्तों के अधीन रहकर ऐसी ही अद्भुत लीलाएँ करते हैं।"
॥ अन्धकासुर का देवताओं पर विजय प्राप्त करणा ॥
नारदजी बोले- "हे पिता ! अब मेरी अभिलाषा शिवजी द्वारा अन्ध कासुर के वध की कथा सुनने की है। अस्तु, आप कृपा करके जिस प्रकार शिवजी ने अन्धकासुर का वध किया, उसका वर्णन कीजिए।" यह सुनकर ब्रह्माजी बोले- "हे नारद ! जब विष्णुजी ने नृसिंह तथा वाराह अवतार लेकर दिति के पुत्रों को मारा, तब दिति ने बड़ा विलाप किया तथा कश्यप की शरण में जाकर उनकी सेवा करने लगी। वह अपने पति कश्यप को प्रसन्न करने के लिए सब श्रृंगार छोड़, ब्रह्मचर्य धारण कर रहने लगी । वह केवल कश्यप की इच्छा के अनुसार ही मीठे वचन कहती तथा अधिक बातचीत नहीं करती थी। तब एक दिन कश्यप ने प्रसन्न होकर
यह कहा- "हे दिति ! हम तुम्हारी सेवा से अत्यन्त प्रसन्न हुए हैं, अतः तुम हमसे कोई वरदान माँगो ।" इसके पश्चात् उन्होंने पातिव्रत धर्म का वर्णन करते हुए कहा- "हे दिति ! ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जिसको हम शिवजी की कृपा से नहीं दे सकें।" अपने पति को इस प्रकार प्रसन्न देखकर दिति ने कहा- "हे स्वामी ! देवताओं ने मेरे साथ शत्रुता करके विष्णुजी के द्वारा मेरे दोनों पुत्रों को मरवा डाला है तथा अनेक दैत्यों का वध करवा दिया है। मुझे इस बात का बहुत दुःख है, इसलिए मैं आपकी शरण में आयी हूँ। अब कृपा करके मुझे ऐसा पुत्र दीजिये, जो देवताओं के हाथ से न मर सके ।"
हे नारद ! कश्यप ने दिति की बातों को सुनकर उसे वरदान देते हुए कहा- "हे दिति ! तुम्हारी इच्छा पूर्ण होगी । मृत्युञ्जय जो रुद्र हैं, उनके समान संसार में कोई दैत्य अथवा देवता नहीं है। उसके सामने विष्णु तथा ब्रह्मा की भी कुछ नहीं चलती। इसलिए जब तुम्हारे पुत्र उत्पन्न हो, तब तुम उसे यह भली-भांति समझा देना कि वह किसी प्रकार मृत्युञ्जय को क्रोधित न होने दे, क्योंकि शिवजी के क्रोधित होने पर फिर और कोई रक्षा करनेवाला नहीं है।" इतना कहकर कश्यप चुप हो गए। तदुपरान दिति कश्यप के तेज से गर्भवती हुई। दिति का तेज इतना बढ़ा कि कोई मनुष्य उसके तेज के कारण उसकी ओर देख भी नहीं सकता था। दसवें मास में दिति के एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका विचित्र स्वरूप था अर्थात् उसके एक सहस्त्र सिर, दो सहस्त्र आँखें, दो सहस्त्र पाँव तथा दो सहस्त्र भुजाएँ थीं। वह बहुत ही सुन्दर, तेजस्वी एवं हृष्ट-पुष्ट था । उसको यदि सब मुनि तथा देवता भी मिलकर उठावें तो भी वह नहीं उठ सकता था । वह अन्धों के समान इधर-उधर झुककर चलता था, इसलिए उसका नाम अन्धक रखा गया। जैसा उसका अन्धक नाम था, उसी प्रकार उसने सब कार्य भी किये । अन्धकासुर ने संसार में अनेक उपद्रव मचाये तथा देवताओं से समस्त रत्न आदि लात मारकर छीन लिये ।
हे नारद! इसी प्रकार अधक अन्य दैत्यों को अपने साथ लिये हुए तीनों लोकों में अनेक प्रकार के उपद्रव करता रहा। वह इन्द्र की सभा में जाकर इन्द्रासन पर बैठ, केवल देवताओं को ही नहीं, अपितु इन्द्र को भी आज्ञा प्रदान करता था। देवताओं को तो वह सेवकों के ही समान समझता था।
एक दिन दैत्यों के अधिपति ने उसके पास आकर प्रणाम करने के पश्चात् कहा-हे अन्धक! संसार में जितने देवता तथा मुनि हैं, वे तुम्हारे शत्रु हैं। उन्होंने बड़े छल-कपट से दैत्यों का वध किया है। इन्द्र भी दैत्यों का घोर शत्रु है। उसने पहिले दैत्य को, जो सर्वप्रथम उत्पन्न हुआ था मार डाला तथा देवताओं ने मुनीश्वरों की सम्मति से हम दैत्यों का बहुत बड़ा वन जला डाला।
इसलिए तुम पुरानी शत्रुता का विचार करके देवताओं को पराजित करो और तीनों लोकों पर विजय प्राप्त करो। दैत्याधिपति की ऐसी बातें सुनकर अन्धक तुरन्त ही तीनों लोकों पर विजय प्राप्त करने के लिए तैयार हो गया। उसने एक बहुत बड़ी सेना एकत्र की। यह देखकर देवता तथा मुनि सब अत्यन्त दुःखी हुए।
तब इन्द्र ने स्वयं कश्यप के पास जाकर, अत्यन्त विनयपूर्वक यह कहा-हे पिता! आपने देवताओं को बड़े आनन्द से रखा, परन्तु अब अन्धक सबको निकाले देता है। आप देवता तथा पुनियों के ऐसे दुःख को क्यों नहीं देखते?
वह क्षण-क्षण पर हमको आज्ञा दिया करता है तथा हम से छोटा होते हुए भी हमें बड़ा नहीं मानता। हे पिता! इस प्रकार का कार्य करने से बड़ा उपद्रव होगा तथा तीनों लोकों का काम बिगड़ जायगा।
॥ कश्यप का अन्धकासुर को समझाना ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! इन्द्र के मुख से ऐसे दुःखपूर्ण वचन सुनकर कश्यप अत्यन्त आश्चर्य करते हुए बोले- हे इन्द्र! अन्धक ने जो दुःख तुमलोगों को पहुँचाया है, उससे कुछ भय मत करो। हम तुम्हारे सब दुःखों को दूर कर देंगे। यह कहकर कश्यप ने इन्द्र को वहाँ से विदा कर, अन्धक को बुलाया और कहा-हे अन्धक! अदिति तथा दिति हमारी स्त्री हैं, तथा उन्हीं से सब देवता और दैत्य उत्पन्न हुए हैं। वे बराबर हमारी सेवा करते हैं। हमें दोनों ही प्यारे हैं।
तुम तीनों लोकों पर विजय प्राप्त करने का विचार त्याग दो, क्योंकि यह बड़ा दुःखदायी होगा। तुम और इन्द्र राज्य को आधा-आधा बाँट कर शत्रुता दूर करो तथा एक ही पत से सुख एवं कुशलतापूर्वक राज्य करो। तुम देवताओं को इस प्रकार दुःखी बना कर मुझे तंग मत करो, नहीं तो तुम बड़ा दुःख पाओगे। यह कह कश्यप ने अन्धक को विदा किया।
हे नारद! कश्यप के इस प्रकार समझाने पर अन्धक कुछ दिन तक तो शान्त बैठा रहा, परन्तु थोड़े दिनों के पश्चात् वह पुनः दैत्यों की संगति से उपद्रव मचाने लगा और देवताओं को दुःख पहुँचानेवाली बातें करने लगा। वास्तव में संगति का प्रभाव बहुत शीघ्र ही पड़ता है। अपने पुत्र की यह दशा देखकर दिति को बड़ी प्रसन्नता हुई।
फिर उसने एक दिन अन्धक को बुलाकर इस प्रकार समझाया-हे देखकर अन्धक! तेरे कर्म देर मुझे बहुत दुःख मिलता है। मैं तुझे एक बात समझाती हूँ, तू उसी पर ध्यान धरकर काम कर। यह कहकर, उसने पहिले कश्यप ने जो कही थी, वही बातें विचार कर कहा-हे पुत्र! तुम शिवजी की सेवा करो और उनसे किसी प्रकार की शत्रुता मत रखो; क्योंकि उनसे शत्रुता रख कर कोई सुखी नहीं रहता।
फिर शिवजी की बड़ी स्तुति करके वह बोली-हे पुत्र! तुम नित्य शिवजी की उपासना किया करो। तब अन्धक ने माता की आज्ञा मानकर, सब दैत्यों की संगति छोड़ दी तथा इन्द्रियों पर विजय पाकर कठिन तप करने लगा। उसने सर्वप्रथम वन और जल में बैठकर तप किया, फिर केवल वन के फल खाकर ही शिवजी की सेवा करने लगा। ऐसा करने से अन्धक के तेज में वृद्धि हुई। उस तेज के कारण उसकी ओर देखा भी नहीं जाता था। ऐसा कठिन तप करते हुए देखकर सब देवता भयभीत होकर मेरी शरण में आये।
तब मैं उन सबको साथ लेकर विष्णुजी के पास गया और विष्णुजी सब हाल सुनकर हम सब को साथ लिये हुए, शिवजी के पास जा पहुँचे। वहाँ हम सबने उनकी पवित्र स्तुति की।
॥ अन्धकासुर की तपस्या से भयभीत हो देवताओं का शिवजी की शरण में पहुँचना ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! शिवजी की स्तुति करने के उपरान्त सब देवता शान्त खड़े रहे। तब शिवजी बोले-हे विष्णु, ब्रह्मा तथा समस्त देवताओ! तुमलोगों की जो इच्छा हो, वह हम से कहो। हम तुम सबको वरदान देने के लिए तैयार हैं।
यह सुनकर देवताओं ने कहा-हे शिवजी! हम लोग अन्धक के कठोर तप से अत्यन्त भयभीत हैं, इसलिए आप जाकर अन्धक को वरदान दें; जिससे हमारे दुःख दूर हों। यद्यपि वह आपसे वरदान पाने के पश्चात् देवताओं का पूर्ण रूप से शत्रु हो जायगा। हम सबकी इच्छा है कि इस समय कृपा करके आप अन्धक के कठिन तप की अग्नि को शीघ्र ही शान्त करें। तदुपरान्त हमारे लिए भिषक् के समान होकर, हमारी चिकित्सा कीजिएगा।
यह सुनकर शिवजी अन्धक को वरदान देने के लिए चल दिये। वे अपने वाहन गिरिजा तथा गणों सहित वहाँ जा पहुँचे और बोले-हे अन्धक! हम तुमसे बहुत प्रसन्न हैं, तुम हमसे वर माँगो।
तब अन्धक ने प्रणाम एवं स्तुति करते हुए यह कहा-हे प्रभो! मैं आपसे केवल यही वरदान माँगता हूँ कि अपने पिता के वरदान के अनुसार मैं आपके अतिरिक्त किसी के हाथ से न मारा जाऊँ। आप कोई उपाय कीजिये, जिससे मेरे पिता का वचन सत्य हो।
यह सुनकर शिवजी बोले-अच्छा, हम तुमको यही वरदान देते हैं, परन्तु यदि तुम तीनों लोकों के राजा होकर अपना धर्म त्यागकर कुकर्मी हो जाओगे, तो हम निःसन्देह तुम पर बड़ा क्रोध करेंगे; जिससे तुम्हारे सब पुण्य नष्ट हो जायेंगे। ऐसी दशा में भी हम तुम पर दया करेंगे, जिससे तुम्हारा श्रम निष्फल न जायगा।
शिवजी इस प्रकार अन्धक को वरदान देकर वहाँ से अन्तर्धान हो गये। तब अन्धक ने प्रसन्नतापूर्वक अपने घर आकर अपने माता-पिता को वर प्राप्त करने का हाल कह सुनाया।
हे नारद! जब देवताओं ने यह सुना कि शिवजी ने अन्धक को ऐसा वरदान दिया है तो सब बहुत घबराये। फिर उन्होंने इन्द्र के पास जाकर अन्धक के वरदान पाने का सब हाल कह सुनाया। जिस समय सब देवता इन्द्र के पास जाकर सब हाल कह रह थे, उसी समय चारों ओर से दैत्यों ने अन्धक के पास जाकर देवता तथा दैत्यों की पुरानी शत्रुता की कहानी कह सुनायी। परन्तु अन्धक ने कुछ नहीं कहा। वह केवल इन्द्रपुरी को देखने के लिए रथ पर चल दिया तथा कुछ समय के पश्चात् इन्द्रपुरी में पहुँच गया।
अन्धक को वहाँ आते हुए देखकर अन्य देवताओं के साथ इन्द्र भी बहुत भयभीत हुए। उस समय इन्द्र ने तुरन्त उठकर अन्धक को बराबर एक ही आसन पर बैठाया। तदुपरान्त इन्द्र ने मन में दुःखी होकर अन्धक से आने का कारण पूछा तथा यह कहा कि आपने यहाँ आकर बड़ी कृपा की है। अब जो आज्ञा आप हमें देंगे, हम उसका पालन करेंगे।
यह सुनकर अन्धक ने अहंकार से भरकर उत्तर दिया-हे इन्द्र! तुम केवल मुझे अपनी सब सम्पत्ति दिखला दो। मुझे किसी वस्तु को लेने की आवश्यकता नहीं है। तुम्हारे पास जो ऐरावत हाथी तथा उच्चैःश्रवा घोड़ा आदि उत्तम रत्न एवं उर्वशी आदि महास्वरूपवती स्त्रियाँ हैं, उन सबको मुझे दिखा दो, मैं उनको देखने मात्र से ही प्रसन्न हो जाऊँगा।
तब इन्द्र ने निरुपाय होकर अपनी समस्त सम्पत्ति उसे दिखा दी। इन्द्र की सम्पत्ति को देखकर अन्धक आश्चर्यचकित हो इन्द्र के आसन पर बैठ गया। उस समय अन्धक ने यह आज्ञा दी कि नृत्य आरम्भ किया जाय। इन्द्र ने यह सुनकर भयभीत हो, सब सेविकाओं, गन्धर्व और अप्सराओं से कहा कि तुम सब लोग अपने सुन्दर नृत्यों द्वारा अन्धक को प्रसन्न करो।
हे नारद! हर प्रकार के बाजे ताल-स्वर सहित बजने लगे। सातों स्वर, इक्कीस मूच्छना तथा तीन ग्राम के साथ गान होने लगा। अन्धक ने उस नृत्यगान से मोहित होकर यह चाहा कि मैं अप्सराओं को अपने वश में करूँ, परन्तु देवताओं ने यह स्वीकार नहीं किया। अन्धक ने जब देवताओं की ऐसी अवज्ञा देखी तो वह अत्यन्त क्रोधित होकर सिंहनाद करने लगा।
उस सयम इन्द्र ने देवताओं से कहा-हे देवताओ! उठो, ईश्वर को स्मरण कर भली प्रकार निर्भय होकर युद्ध करो, क्योंकि अपनी स्त्रियों के देने से तो लड़ कर मर जाना ही उत्तम है। इन्द्र की यह आज्ञा पाकर देवता तुरन्त लड़ने को तैयार हो गये, उस समय अन्धक भी पाँच सौ धनुष अपने हजार हाथों में लेकर तथा प्रत्येक धनुष में अनेक बाण चढ़ाकर युद्ध करने लगा।
जब इन्द्र ने सम्मुख आकर वज्र से अन्धक को मारा, तब अन्धक ने क्रोधित होकर अपने त्रिशूल, गदा आदि नाना प्रकार के शस्त्रों से प्रहार किया। उस समय देवताओं सहित इन्द्र युद्धस्थल छोड़कर भाग गये। इसके पश्चात् अन्धक अपनी माता दिति को भी वहीं बुलाकर राज्य करने लगा तथा यह ड्योड़ी पिटवा दी कि हमारे राज्य में सब प्रजा आनन्दपूर्वक रहे और किसी प्रकार का सन्देह न करे। इन्द्र का राज्य अब समाप्त हो गया।
सब वर्ण अपने धर्म में स्थिर रहकर हमारी आज्ञा का पालन करें। जो कोई हमारी आज्ञा के विरुद्ध कार्य करेगा, वह हमारे हाथों से मारा जायगा। इस प्रकार आज्ञा प्रसारित कर, अन्धक स्वयं इन्द्रपुरी पर शासन करने लगा।
॥ ब्रह्मा तथा विष्णु जी द्वारा अन्धकासुर के अध्यायों का वर्णन ॥
ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! देवता अत्यन्त दुःखी हो मेरे पास आये और मुझसे सब वृत्तान्त कह सुनाया। उन्होंने यह भी कहा कि देवता अब अन्धक के भय से यज्ञ में भी भाग नहीं ले पाते। इधर-उधर छिपे रहते हैं। यह कहकर देवताओं ने मेरी बड़ी स्तुति की।
तब मैंने उनसे यह कहा-हे देवतओ! तुम सब किसी प्रकार का दुःख मत करो, तुम्हारे सब दुःख दूर हो जायेंगे। इस प्रकार अनेक पुरातन इतिहास कहकर सबको साथ लिये हुए मैं विष्णुजी के पास गया तथा बहुत स्तुतिकर, उनसे अन्धक के अन्याय का वर्णन किया। उस समय विष्णुजी बोले-तुम सब अपने-अपने घरों को लौट जाओ, हम शीघ्र ही दैत्यों के पास पहुँचकर उनको नष्ट कर देंगे।
यह सुनकर देवता अपने-अपने घरों को लौट गये। तब विष्णुजी तुरन्त गरुड़पर सवार होकर अपने शस्त्रों सहित अन्धक के पास पहुँचे। विष्णुजी बड़े-बड़े अस्त्र अन्धक पर चलाते रहे तथा अन्धक उनको नष्ट करता रहा। जब अन्धक ने विष्णुजी को अपने शस्त्रों से दुःखी कर दिया तो विष्णुजी ने क्रोधित होकर सुदर्शन चक्र को अपने हाथ से छोड़ा जिससे संसार जलने लगा। उस समय ऐसा प्रतीत हुआ, जैसे प्रलय हो रहा हो। अन्धक भी दैत्यों सहित भयभीत हो गया।
तब उसने शिवजी का ध्यान धरकर, अपना त्रिशूल चलाकर सुदर्शन को व्यर्थ कर दिया। उस समय विष्णुजी ने शिवजी का ध्यान करके मन में स्तुति करते हुए कहा-हे शिवजी मैं देवताओं के मनोरथ किस प्रकार पूर्ण करूँ ? आप मुझे आज्ञा दीजिए।
हे नारद! शिवजी ने विष्णुजी के ऐसे दुःखपूर्ण वचन सुनकर कहा-हे विष्णुजी! मुझे तुम्हारे समान और कोई भी प्यारा नहीं है। जो मनुष्य, मेरी भक्ति चाहता है, उसे पहिले तुम्हारी भक्ति करनी चाहिए। परन्तु इस समय तुम स्वयं ही कुरीति से देवताओं के पक्ष में उद्यत हुए हो। जब तक अन्धक ब्राह्मणों से शत्रुता न करेगा, तब तक मैं उसके ऊपर क्रोध न करूंगा; क्योंकि ब्राह्मण मुझको गिरिजा से भी अधिक प्रिय हैं।
इसलिए तुम कोई ऐसा उपाय करो कि अन्धक मेरी आराधना-भक्ति त्याग कर ब्राह्मणों से शत्रुता करे। यह आज्ञा पाकर विष्णुजी ने अन्धक से कहा-हे अन्धक! तुम्हारी वीरता तथा बल देखकर हम अत्यन्त प्रसन्न हुए हैं। तुम हमसे वरदान माँगो।
यह सुनकर अन्धक ने गर्व में भरकर कहा-हे विष्णु! वरदान लेना छोटे मनुष्यों का कर्त्तव्य है। हमको किस बात की कमी है, जो हम तुमसे वरदान माँगें ? तुमको जो इच्छा हो, वह तुम हमसे माँगो, हम तुमको देंगे। विष्णुजी ने अन्धक के ऐसे गर्वपूर्ण वचन सुनकर, प्रसन्नता से कहा-हे अन्धक! हम तुमसे यह वरदान मागते हैं कि तुम शिवजी की भक्ति छोड़कर, स्वयं शिव बनकर विहार किया करो।
अन्धक ने यह सुनकर विष्णुजी की माया में भूल, कहा-ऐसा ही होगा। इसके पश्चात् विष्णुजी तथा अन्धक अपने-अपने स्थान को चले गये। तब अन्धक ने स्वयं अपने को शिव ठहरा कर तीनों लोकों को वश में कर लिया, जिससे सबको दुःख पहुँचा। उसने ब्राह्मणों के मान को भी स्थिर न रखा तथा स्वयं अपने को परब्रह्म सिद्ध किया। दैत्यों की सब रीतियाँ उसने चलार्थी।
॥देवताओं तथा ब्राह्मणों द्वारा अन्धक को शाप॥
ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! उस समय देवताओं की दशा अत्यन्त खराब थी। वे सब दैत्यों के भय से इधर-उधर भागे फिरते थे, जब देवता तथा ब्राह्मण बहुत दुःखी होकर शाप देने लगे, तब अन्धक का तेज क्षीण हो गया। एक दिन सब देवताओं ने एकत्र होकर कहा कि अब तो अन्धक हमको कोई धर्म नहीं करने देता, न हम विष्णुजी तथा शिवजी की पूजा ही करने पाते हैं। सब प्रकार का दुःख हमलोगों को है। भला, वह किस उपाय से मारा जा सकता है ?
यह सुनकर बृहस्पति ने कहा-हे देवताओ! अन्धक शिवजी के अतिरिक्त संसार भर से अवध्य है। जब शिवजी ने प्रसन्न होकर उसे वर दिया था उस समय यह भी कहा था कि जब तुम पाप करने लगोगे, तब हम ऐसा क्रोध करेंगे, जिससे तुम्हारा तेज घट जायगा। शिवजी ने सर्वप्रथम ब्राह्मणों को दुःख देने का निषेध किया था। सो हे देवतओ! अब वह समय आ गया है हम सब चलकर शिवजी की सेवा करें। वे हमारे समस्त दुःखों को दूर करेंगे।
हे नारद! तब देवताओं ने यह वृत्तान्त कहने के लिए तुम्हें शिवजी के पास भेजा। तुम वहाँ से चलकर शिवजी को मन्दार के वन में देखकर, स्तुति करने लगे। शिवजी तुम्हारी स्तुति सुनकर अत्यन्त प्रसन्न होकर बोले-हे नारद! तुम हमारे यहाँ किस कार्य से आये हो ?शिवजी की ऐसी इच्छा जानकर, तुमने अन्धक के अन्याय का सब हाल उनको कह सुनाया।
उसे सुनकर शिवजी बोले-हे नारद! तुम मन्दार के पुष्पों की माला पहनकर अन्धक के पास जाकर हमारी प्रशंसा करना तथा ऐसा उपाय करना जिससे वह क्रोधित होकर हमारे पास आवे। यह सुनकर तुम विदा हो, वन से मन्दार के पुष्प तोड़, उनकी माला कंठ में पहन, अन्धक के समीप पहुँचे। उस समय अन्धक सहित सभी दैत्यों को तुम्हारी माला को, जो अत्यन्त सुगन्धित थी, देखकर बहुत आश्चर्य हुआ।
तब अन्धक बोला-हे नारद! ये पुष्प कहाँ उत्पन्न होते हैं ? उस उद्यान का कौन रक्षक है ? मैं यह पुष्प अपने बाहुबल से प्राप्त करना चाहता हूँ। तब तुमने यह उत्तर दिया-हे अन्धक! मन्दराचल में वीरकाम्यक नामक एक वन है। उसमें यह पुष्प उत्पन्न होते हैं। वहाँ शिवजी के गण वन की रक्षा करते हैं। वे गण अत्यन्त बलवान् हैं। शिवजी अपनी पत्नी सहित उसी वन में विहार करते हैं। उनको जीतने वाला सृष्टि में कौन है ? परन्तु उनकी सेवा करने से यह पुष्प प्राप्त हो सकते हैं।
इसके अतिरिक्त उस वन में और भी अनेक प्रकार के पुष्प हैं। बहुतों में इनसे भी अधिक सुगन्ध है। कई वृक्षों से रत्न तथा कुछ वृक्षों से चारों प्रकार का अन्न प्राप्त होता है। वहाँ किसी को किसी प्रकार का दुःख प्राप्त नहीं होता, न किसी को भूख, प्यास, चिन्ता तथा खेद प्राप्त होता है। उन शिवजी की कृपा से मनुष्य इन्द्र पर भी विजय प्राप्त कर लेता है।
अन्धक से ऐसे उपदेशपूर्ण वचन कहकर, तुम वहाँ से विदा हुए। तब अन्धक ने दैत्यों की सभा बुलाकर मन्दार के पुष्पों की प्रशंसा करते हुए यह कहा-तुम सबलोग तैयार होकर मेरे साथ मन्दार पुष्प लेने चलो, यहाँ कोई न रहे। यह कहकर अन्धक सेना सहित चल दिया तथा शिवजी की महिमा भूल गया।
॥ अन्धक से भयभीत हो सबका शिव जी शरण में पहुँचना ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! वहाँ से चलकर अन्धक मन्दराचल पर्वत पर जा पहुँचा। वहाँ उसने देखा कि वह पर्वत अनेक प्रकार की औषधि तथा जड़ी-बूटियों से सुशोभित है। सिद्ध, मुनीश्वर, देवता तथा गण उसकी रक्षा करते थे। चन्दन, अगरु, शाल, चम्पर, बेल तथा रुद्राक्ष आदि अनेक प्रकार के वृक्ष वहाँ वर्तमान थे। वहाँ गन्धर्व, किन्नर, अप्सरा आदि नृत्य करते थे। हंस, चकोर, सिंह, बाघ आदि जीवों से वह स्थान भरा हुआ था।
उस आनन्ददायक स्थान पर जब अन्धक ने देवताओं को देखा तो बड़े क्रोध से यह कहा-हे मन्दराचल! तुम मुझको भली-भाँति जानते हो। मैं अपने समान संसार में किसी को नहीं समझता हूँ तथा मुझे कोई भी नहीं मार सकता है। संसार भर मेरे वश में है। तुम भी मेरी प्रजा तथा मेरे अधीन हो। तुम मेरी आज्ञा को सुनो। आज से मैं तुम्हारे निकट के इस वन को अपने विहार तथा भोग-विलास के लिए नियत करता हूँ। यदि तुम मेरी आज्ञा का पालन न करोगे, तो बहुत दुःख उठाओगे।
हे नारद! इसी प्रकार अन्धक ने चारों प्रकार की राजनीति के वचन कहे, परन्तु शिवजी का वह मन्दराचल पर्वत बिल्कुल ही भयभीत न हुआ और वहाँ से उसी समय अन्तर्धान हो गया। अन्धक ने मन्दराचल को इस प्रकार अन्तर्धान होते हुए देखकर क्रोध से कहा -आज मैं तुझे अपने क्रोध से भस्म किये देता हूँ। यह कहकर उसने पर्वत को जड़ से उखाड़ कर मिट्टी के समान पीस डाला तथा उसे बहुत योजन की दूरी पर फेंक दिया। उस समय उस वन के रहनेवाले सब प्राणी थर-थर काँपने लगे। तब वह पर्वत उठते-बैठते, काँपते भागते हुए शिवजी के समीप जा पहुँचा।
हे नारद! शिवजी उस समय गिरिजा के पास थे। गिरिजा ने जब पर्वत को काँपते हुए देखा तो यह कहा-तू आज इस प्रकार क्यों काँप रहा है तथा पृथ्वी अकाश और पाताल भी क्यों काँप रहे हैं ? भला आज किसने इतना क्रोध किया है ?
तब शिवजी ने कहा-हे गिरिजे! तुम नहीं जानती की यह उपद्रव किसने मचाया है। देखें, आज कौन यमलोक को जाता है ? यह कहकर शिवजी ने पर्वत को प्रसन्न किया। इसके पश्चात् उन्होंने अपनी कृपा से पर्वत के टुकड़ों को जो टूट-टूट कर इधर-उधर गिर पड़े थे, दैत्यों की सेना पर गिराना आरम्भ कर दिया। यह देखकर दैत्यों में हलचल मच गयी।
उस समय अन्धक क्रोधित होकर कहने लगा-हे पर्वत! मुझको नहीं जानता कि मैं परब्रह्म हूँ। तू मुझसे ऐसा छल क्यों करता है; प्रकट होकर क्यों नहीं लड़ता ? अन्धक के यह शब्द सुनकर शिवजी ने बड़ा क्रोध किया। इतने में, मैं स्वयं, इन्द्र तथा अन्य देवता आदि शिवजी की स्तुति करते हुए उनके पास जा पहुँचे।
हे नारद! शिवजी की वह स्तुति ऐसी है, जिसको सुनने तथा सुनाने से दोनों लोकों में मुक्ति मिलती हैं।
॥ दैत्यों तथा नन्दी का युद्ध एवं शिव जी का शुक्र को पेट में डाल लेना ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद्! शिवजी ने जब इस प्रकार स्तुति सुनी तो उहोंने अन्धक पर अत्यन्त क्रोध प्रकट करते हुए अपने गणों से कहा कि तुम जाकर दैत्यों को नष्ट करो। उस समय समस्त गण शिवजी की आज्ञा प्राप्त कर नन्दी के सेनापतित्व में अन्धक से युद्ध करने चल दिये। युद्धस्थल मैं पहुँचते ही घनघोर युद्ध होने लगा। गणों ने अनेक दैत्यों का नाना प्रकार के शस्त्रों से वध कर डाला। नन्दी ने हुण्ड, थुण्ड जृम्भासुर, कुञ्जासुर, पाकहारीत, मदन-मद्रन आदि दैत्यों के अधियों को मारा, जिससे सब दैत्यों को बड़ा दुःख पहुँचा।
अन्धक यह देखकर अत्यन्त शोकाकुल हो, भयभीत हुआ। फिर अपने गुरु शुक्र के पास जाकर स्तुतिकर कहने लगा-हे गुरुदेव! आपने अनेक बार दैत्यों के दुःखों को दूर किया है। मैं इस समय आपकी शरण में आया हूँ। आपकी सेवा के बल पर दैत्य पर्वत के समान युद्धक्षेत्र में स्थिर रहते हैं।
हे भृगु! इस समय शिलादि के पुत्र नन्दीगण ने असंख्य दैत्यों को युद्धक्षेत्र में मार डाला है। हुण्ड, थुण्ड आदि अच्छे-अच्छे दैत्यों को उन्होंने मारकर पृथ्वी पर लिटा दिया है। अब आप जैसा उचित समझें वह उपाय करें। आपने जो विद्या प्राप्त की है, उसको प्रयोग में लाने का यही समय है। आप दैत्यों को जीवित करिये, जिससे संसार में आपके यश की वृद्धि हो।
हे नारद! अन्धक के ऐसे वचन सुनकर भृगु ने हँसकर कहा-हे अन्धक! सहस्त्र वर्षों तक हमने केवल धान की भूसी का धुँआ पीकर जो विद्या प्राप्त की है, अब तुम उसकी सिद्धि देखो। हम मरे हुए दैत्यों को मृत्यु निद्रा से जगाते हैं तथा जिस प्रकार सूखे धानों को पानी हरा कर देता है, उसी प्रकार उस विद्या द्वारा दैत्यों को जीवन-दान देते हैं। यह कहकर भृगु ने अपना मंत्र पढ़ा, जिससे मरे हुए दैत्य तुरन्त जीवित हो गये और उस समय अन्धक अपने साथियों को जीवित देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुआ।
शिवजी के गणों ने नंदी से जब भृगु की इस सिद्धि की बात जाकर कही, तब नन्दी ने तुरन्त ही शिवजी के पास पहुँचकर यह विनय की-हे शिवजी! जो दैत्य हमारे हाथों से मारे जाते हैं, उनको भृगु बार-बार जीवित कर देते हैं। इस प्रकार हमारी विजय कैसे होगी ? यह सुनकर शिवजी का रूप अत्यन्त भयंकर हो गया।
वे क्रोधित होकर नन्दी से बोले- हे नन्दी! ब्राह्मणों में जो अत्यन्त नीच भृगु है उसको तुम शीघ्र ही हमारे पास पकड़कर ले आओ। नन्दी यह सुनकर निर्भय हो, दैत्यों की सेना में प्रवेश कर गये। उन्होंने देखा कि भृगु की रक्षा अनेक दैत्य कर रहे हैं। फिर भी नन्दी ने सबको मोहित कर, भृगु को पकड़ लिया तथा उन्हें घसीटते हुए ले चले।
यद्यपि भृगु ने शस्त्र चलाकर नन्दी से मुक्ति प्राप्त करने का बहुत प्रयत्न किया, परन्तु नन्दी ने अपने शरीर से अग्नि उत्पन्न कर सभी शस्त्रों को जला दिया और शिवजी के पास उन्हें पकड़कर ले गये। फिर उन्होंने भृगु को शिवजी के सम्मुख खड़ा करके कहा-हे महादेव! भृगु आपके सम्मुख खड़ा है। अब आप जो उचित समझें, वह करें।
शिवजी ने उत्तर में कुछ न कहा तथा भृगु को अपने उदर में डाल लिया। यह देखकर दैत्यों को अत्यन्त दुख हुआ तथा उन्हें अपनी विजय की कोई आशा न रही। जब अन्धक ने यह हाल सुना तो वह दैत्यों को धिक्कारने लगा और बोला -आज मैं नन्दी का वध अवश्य कर डालूंगा। भृगु तो योगशास्त्र में निपुण हैं, इसलिए उनके मरने का मुझे भय नहीं है।
यह कहकर वह पुनः गणों से युद्ध करने लगा। तब नन्दी ने गणों सहित ऐसा युद्ध किया कि दैत्यों की सेना पलभर में छिन्न-भिन्न होकर भागने लगी।
॥ अन्धकासुर का संग्राम में आना ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! इस प्रकार अपनी सेना को युद्धक्षेत्र से भागते हुए देखकर अन्धक स्वयं रथ पर आरूढ़ हो, युद्धस्थल में आ पहुँचा। तब बलभद्र, शाख, विशाख, गणेश, सोम तथा नंदीश्वर आदि शिवगण ने अन्धक के ऊपर एक साथ आक्रमण कर दिया। उधर भृगु ने शिवजी के उदर में पूरा ब्रह्माण्ड देखा। इसी प्रकार वे सौ वर्ष तक शिवजी के उदर में भ्रमण करते रहे, परन्तु उसमें से निकलने के लिए उन्हें कोई स्थान नहीं मिला।
तब वे शिवजी की वन्दना करके उनके लिंग के छिद्र द्वारा, प्रकट होकर, शिवजी की स्तुति करने लगे। शिवजी भृगु की ऐसी चतुराई देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और बोले-हे भृगु! तुम शुक्र के मार्ग से प्रकट हुए हो इसलिए तुम्हारा नाम 'शुक्र' होगा। तुम हमारे पुत्र हो। अब अपने घर सुखपूर्वक चले जाओ। यह सुनकर शुक्र वहाँ से दैत्यों की सेना में लौट आये। उन्हें पुनः देखकर दैत्य अत्यन्त हर्षित हुए। तब अन्धक सावधानी के साथ शुक्र की रक्षा का पूरा प्रबन्ध करके, किसी सुरक्षित स्थान पर उन्हें बैठाकर, स्वयं युद्ध करने लगा।
उसने अपने भीषण प्रहारों से गणों को दुःखी कर दिया। यहाँ तक कि सभी गण युद्धस्थल से भागकर शिवजी के पास जा पहुँचे तथा लज्जापूर्वक बोले-हे शिवजी! हमको दैत्यों की सेना मार डालता है, हम अत्यन्त दुःखी हैं। यह सुनकर शिवजी ने कहा-तुम तुरन्त ही हमारा रथ सजाओ। तब उनकी आज्ञानुसार शीघ्र ही इस प्रकार, जैसा कि त्रिपुर का वध करने के लिए सजाया गया था, रथ तैयार किया गया। तदुपरान्त शिवजी अपने गणों के दुःख का स्मरण कर, क्रोधित हो उस रथ पर आरूढ़ हुए तथा रण-भूमि में पहुँचकर अन्धक से युद्ध करने लगे।
अन्धक जो भी बाण एवं शस्त्र चलाता था, उनको शिवजी अपने तीक्ष्ण-बाणों तथा अन्य उत्तम शस्त्रों से काट देते थे तथा शिवजी जो शस्त्र छोड़ते थे, उनको अन्धक नष्ट कर देता था। अन्त में, अन्धक ने शिवजी पर अपनी मुष्टिका का प्रहार किया। शिवजी ने भी उत्तर स्वरूप प्रहार करके उसे पृथ्वी पर मूच्छित करके गिरा दिया।
उस समय शिवजी की इच्छानुसार चामुण्डा देवी, जो दुर्गा का स्वरूप हैं, प्रकट हुईं। उनका शब्द घनगर्जन के समान महाभयंकर था। दाढ़ें विकराल, स्वरूप महाकठोर, लाल-लाल आँखें, लाल-लाल होंठ बहुत ही लम्बा कान, काली आँखें, ऐसे स्वरूप से चामुण्डा देवी दैत्य सेना में प्रवेश कर दैत्यों को विदीर्ण करने लगीं तथा अपने केशों को बिखराकर, रणभूमि में नृत्य करने लगीं।
हे नारद! अन्धक ने चामुण्डा का ऐसा विकराल स्वरूप तथा दैत्यों को भयभीत देख, क्रोधित होकर अपना शूल चण्डी के सम्मुख कर दिया। उस समय शिवजी ने अन्धक की ऐसी ढिठाई देखकर बड़ा क्रोध किया तथा अपने त्रिशूल से अन्धक को छेद दिया; जिससे रक्त की नदी बह निकली। केवल अन्धक के अस्थि तथा चर्म ही त्रिशूल पर रह गये, शेष रक्त निकल गया।
वह कमल के समान त्रिशूल पर रह गया। उस समय शिवजी ने सब शत्रुता भुलाकर अन्धक को उत्तम बुद्धि प्रदान की, जिससे वह सतोगुण धारणकर, दैत्य भाव से छूट गया तथा शिवजी की स्तुति करने लगा।
॥ अन्धकासुर की स्तुति से प्रसन्न होकर शिव जी का वर देना ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! उस समय अन्धक ने शिवजी की बहुत स्तुति करने के पश्चात् कहा-हे शिवजी! मैं आपकी शरणागत हूँ आप मेरी ओर दया दृष्टि कीजिये । अन्धक की यह स्तुति सुनकर शिवजी ने उसकी ओर दया की दृष्टि से देखा तथा अत्यंत प्रशंसा करते हुए कहा-हे अन्धक! तुम धन्य हो। हम तुमसे अत्यन्त प्रसन्न हुए हैं। अब तुम्हारी जो इच्छा हो, वह वरदान हमसे माँग लो।
यह सुनकर अन्धक ने कहा-हे शिवजी! आप मुझको अपना गण करके, अपने निकट ही रखे तथा वीरभद्र के समान ही समझें। यह सुनकर शिवजी ने प्रसन्न होकर कहा-हे अन्धक! तुम्हारी यह इच्छा अवश्य पूर्ण होगी।
हे नारद! इस प्रकार शिवजी ने अन्धक को अपना गण बनाकर मुक्त किया तथा उसे अपने साथ ले जाकर कैलाश पर्वत पर वास करने लगे। इतनी कथा सुनाकर ब्रह्माजी बोले-हे नारद! उस समय विष्णुजी ने, मैंने तथा देवताओं ने कैलाश में पहुँचकर शिव शंकर को प्रणाम किया तथा सबने अलग-अलग स्तुति की।
जो कोई उस स्तुति तथा चरित्र को सुनेगा अथवा सुनावेगा, वह अपने कुल सहित प्रसन्न रहेगा। परलोक में उसे शिवजी का सामीप्य प्राप्त होगा। स्तुति के पश्चात् देवता एवं शिवजी यथास्थान चले गये।
॥ बाणासुर के ताण्डव नृत्य का वर्णन ॥
इतनी कथा सुनकर नारदजी बोले-हे पिता! इस चरित्र के सुनने से वास्तव में मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है। अब आप सदाशिवजी का अन्य चरित्र कहें। नारदजी की ऐसी लालसा देखकर ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! अब हम तुम्हें शिवजी तथा विष्णुजी के युद्ध का वर्णन सुनाते हैं। मेरे पुत्र मरीचि के द्वारा कश्यप उत्पन्न हुए; वे शिवजी के परम भक्त हैं।
उनके तेरह पलियाँ थीं, जिनसे अनेक संतानें उत्पन्न हुईं। उनकी सबसे बड़ी पत्नी का नाम दिति था। दिति के गर्भ से बड़े वीर दैत्य उत्पन्न हुए। उनमें से दो का नाम हिरण्यकशिपु तथा हिरण्याक्ष था। वे बहुत समय तक तप करते रहे। हिरण्यकशिपु के चार पुत्र हुए। उनमें प्रह्लाद सबसे छोटा था। प्रह्लाद से विरोचन उत्पन्न हुआ जो शिवजी का अनन्य भक्त था। विरोचन से बलि उत्पन्न हुआ।
बलि शिवजी का भक्त, बड़ा उदार तथा देवताओं के साथ युद्ध करने में अत्यन्त बलवान था। उसका एक पुत्र बाण नाम का उत्पन्न हुआ। बाण भी शिवजी का बड़ा भक्त था। वह सन्तों का मित्र, अपने नियम तथा व्रत में अत्यन्त दृढ़, निरहंकार तथा सहस्त्रबाहु था। उसने अत्यन्त उदारता के साथ सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड पर राज्य किया। उसने अपनी राजधानी शोणितपुर में स्थापित कर, बड़ी धूमधाम के साथ राज्य किया। उसके राज्य में कोई भी दुःखी न था।
हे नारद! एक दिन बाण शिवजी की भक्ति एवं प्रेम में मग्न होकर, अपनी सहस्त्रबाहुओं से बाजा बजा कर, शिवजी के सम्मुख ताण्डव-गति से नृत्य करने लगा। यह देखकर शिवजी अत्यन्त प्रसन्न हुए और बोले-हे बाण! हम तुमसे बहुत प्रसन्न हैं। तुम हमसे अपनी इच्छानुसार वरदान माँगो।
यह सुनकर बाणासुर ने विनती की हे प्रभो! आप सदैव मेरे सहायक रहा करें तथा मेरे दुःख दूर किया करें। शिवजी बाणासुर की यह बात मानकर, अपने कुल सहित बाणासुर के घर में निवास करने लगे तथा अपनी सम्पूर्ण शक्ति सहित बाणासुर की रक्षा करने लगे। एक दिन समस्त देवताओं के राजा शिवजी देवताओं सहित नर्मदा नदी के तट पर एक उत्सव-विहार करने लगे।
सब देवता, सिद्ध आदि शिवजी के उस उत्सव को देखने के लिए वहाँ आये। उस समय वहाँ नृत्य गायन तथा अनेक प्रकार की आनन्द की बातें होने लगीं। उससे शत्रुओं को दुःख तथा भक्तों को सुख प्राप्त हुआ। उस समय तीनों प्रकार की वायु बहने लगी, नाना प्रकार के पुष्प खिल उठे, पक्षी मधुर-वाणी में बाले उठे, मानो वे भी गायक बनकर गाने लगे हों तथा सम्पूर्ण वन फूल उठा।
ऐसे समय में शिवजी ने इच्छानुसार विहार किया। फिरते-फिरते उन्होंने काम के वश हो नन्दीगण को बुलाकर यह कहा कि तुम तुरन्त कैलाश में जाकर गिरिजा को अपने साथ ले आओ। नन्दी ने यह सुनकर तुरन्त ही गिरिजा की सेवा में पहुँचकर, शिवजी का समाचार कह सुनाया। गिरिजा ने उत्तर दिया कि तुम चलो, हम श्रृंगार करके पीछे से आती हूं।
नन्दी यह सुनकर वहाँ से चला आया तथा गिरिजा श्रृंगार करने लगीं। तब नन्दी ने यह सुनकर शिवजी के निकट पहुँचकर कहा कि गिरिजा पीछे आ रही हैं। यह सुनकर शिवजी बोले-तुम फिर शीघ्र जाकर, उन्हें अपने साथ ले आओ। नन्दी फिर गिरिजा के पास जा पहुँचे तथा उनसे शीघ्र चलने के लिए कहा।
तब गिरिजा ने कहा-अच्छा मैं अभी चलती हूँ तुम बैठो। यह कहकर उन्होंने श्रृंगार करने में अपना बहुत समय लगाया। उधर शिवजी अप्सराओं के नृत्य तथा रंग को देखकर बहुत ही कामवश हो गये। जब गिरिजा ने आने में बहुत देर की तब सभा की स्त्रियों ने यह निश्चित किया कि हम सब स्त्रियाँ अपना-अपना और ही प्रकार का पवित्ररूप धारण करें।
यह निश्चत कर सब स्त्रियाँ अपना-अपना अन्य स्वरूप धारण करने लगीं। उन्होंने यह सोचा था कि ऐसा करने से शिवजी किसी प्रकार भुलावे में आ जायेंगे। नन्दी ने उर्वशी का रूप, सुकेशी ने लक्ष्मी का स्वरूप, पृताची ने काली का स्वरूप, विश्वाची ने चण्डी का स्वरूप, प्रेमगोत्रा ने सावित्री का रूप, मैना ने गायत्री का रूप, पद्मावती ने विजयस्थला का रूप, तथा जया ने सहजन्या का स्वरूप धारण किया।
हे नारद! उषा ने, जो बाणासुर की कन्या थी, गिरिजा का स्वरूप धारण कर लिया। फिर उन्होंने यह निश्चय किया कि इस समय हम शिवजी को अपने वश में करके उनके साथ भली प्रकार भोग-विलास करें। जब शिवजी ने उषा को बुलाया तभी वहाँ गिरिजा आ पहुँचीं तथा हँसकर इस प्रकार कहा-हे उषा! तुमने काम-वश हो हमारा स्वरूप धारण किया है, इसलिए हमारा वचन सुनो। मधुमास की शुक्ल द्वादशी को सोते समय एक मनुष्य तुम्हें मिलेगा, तुम उसके साथ जी भरकर भोग-विलास करना। वही तुम्हारा पति होगा।
यह कहकर गिरिजा अत्यन्त प्रसन्नता के साथ शिवजी के पास जा पहुँची। शिवजी यह लीला करके अपनी सम्पूर्ण सभा सहित अन्तर्धान हो गये।
॥ बाणासुर द्वारा देवताओं पर विजय प्राप्त कर शिवजी के पास पहुँचना ॥
ब्रह्मा जी बोले-हे नारद! एक दिन बाणासुर ने अपने ताण्डव नृत्य से शिवजी को अत्यन्त प्रसन्न करके उनसे यह विनती की हे शिवजी! मैं आपकी कृपा से अत्यन्त बलवान हुआ हूँ, परन्तु आपने मुझे जो सहस्त्र भुजाएँ देने की कृपा की है, वे मेरे शरीर पर भार के समान हैं, क्योंकि उनके बल से आज तक मैंने कोई कार्य नहीं किया है। अब तीनों लोकों में कोई युद्ध भी मुझसे नहीं हुआ। मैं इस समय तीनों लोकों में केवल युद्ध के निमित्त फिरता हूँ।
हे शिवजी! मेरी भुजाएँ बल की अधिकता से खुजलाया करती हैं। सो अब आप ही कृपा करके मेरी यह खुजली दूर करें। मैंने सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को जीत कर, सबको अपने अधीन कर लिया है, परन्तु मुझे युद्ध की अभी भी बहुत बड़ी इच्छा है। या तो कोई मेरी भुजाएँ काट डाले या मैं उसकी भुजाएँ काट हूँ।
हे नारद! शिवजी ने बाणासुर के मुख से ऐसे वचन सुनकर कहा-हे बाणासुर! तुझे धिक्कार है, जो तुझे अपने ऊपर इतना गर्व है। तू दैत्यों के कुल में महा अधम है। तू बलि का पुत्र तथा हमारा भक्त होकर भी ऐसी व्यर्थ की बातें करता है ? यह तेरा अभिमान शीघ्र ही मिट जायगा। हमारे समान ही एक मनुष्य तेरे पास आयेगा वह तेरी अभिलाषा को भली-भाँति पूर्ण कर देगा। उस समय केवल हमारी कृपा द्वारा ही तेरे प्राणों की रक्षा होगी।
हम तुझको वह समय भी बताते हैं, जब यह सब बातें प्रकट होंगी। जब तेरा यह ध्वज, जिसका सिर मनुष्य के सिर के समान तथा नीचे मोर का आकार है, बिना पवन के ही पृथ्वी पर गिर पड़े तथा नाना प्रकार के अपशकुन प्रकट हों, तब तुम यह निश्चय समझना कि अब वही समय आया है। ये शब्द शिवजी ने प्रकट में क्रोध तथा भीतर से प्रसन्न होकर कहे।
हे नारद! शिवजी के ऐसे वचन सुनकर बाणासुर अत्यन्त प्रसन्न हुआ था उसने शिवजी की बड़ी पूजा की। फिर उसने घर जाकर अपनी स्त्री से सब हाल कहा। उसकी स्त्री का नाम कन्दला था। जब उसने यह समाचार सुना तो वह अत्यन्त चिन्तित हुई और बोली-हे नाथ! यह क्या आनन्द की बात है ? यह तो बहुत बुरी बात हुई है। शिवजी सदैव अंहकार को नष्ट करते हैं। इस पर आपकी सब भुजाएँ कट जायेंगी।
अब तक आप पराजित नहीं हुए थे, लेकिन अब अवश्य ही आपको पराजय मिलेगी। शिवजी ने आपको यह शाप दिया है, वरदान नहीं। इससे तो उत्तम है कि आप अब भी शिवजी को भली प्रकार प्रसन्न करके, उनकी ऐसी सेवा करें जिससे आपका भला हो। कन्दला यह कहकर अत्यन्त दुःख के साथ शिवजी का स्मरण कर, बाणासुर के चरणों पर गिर पड़ी।
तब यह आकाशवाणी हुई हे कन्दला! तुम अपने मन में किसी प्रकार का दुःख मत करो। उस समय शिवजी ही तुम्हारे सहायक होंगे तथा बाणासुर का गर्व नष्ट करके उस पर कृपा करेंगे। कन्दला इस आकाशवाणी को सुनकर कुछ प्रसन्न हुई; लेकिन इस बात को बाणासुर ने नहीं जाना। तदुपरन्त वह घर से निकलकर बाहर आया और अपने सभासदों को एकत्र कर युद्ध की सलाह करने लगा।
॥ उषा चरित्र का वर्णन ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! अब हम तुमको बाणसुर की पुत्री उषा का चरित्र सुनाते हैं, जो उस युद्ध का मूल है जिसमें बाणासुर की भुजाएँ कट गयी थीं। यह सब लीला भी तुम शिवजी की ही जानो। बाणासुर की कन्या उषा, जिसे गिरिजा ने यह वर दिया था कि तुमको रात्रि में पति मिलेगा, एक दिन वैशाख शुक्ल द्वादशी को जब, शिवजी की पूजाकर, अर्धरात्रि को सोने लगी, तब गिरिजा की इच्छा से श्रीकृष्णजी के पोते अनिरुद्ध ने वहाँ पहुँच कर उसके साथ भोग किया।
उस समय उषा कुछ सकुचाई, परन्तु अनिरुद्ध गिरिजा की कृपा से तुरन्त कृतकार्य हो, अपने घर चला आया। तब उषा मृतक के समान शिथिल होकर बहुत रोई। फिर उसने अपनी सखियों से सब हाल कह सुनाया। उसने अनिरुद्ध को पुनः प्राप्त करने की इच्छा करके, अपनी सखियों से उसकी बड़ी प्रशंसा की तथा गिरिजा का ध्यान किया। उस समय कुम्भाण्ड की पुत्री चित्रलेखा ने जो उषा की सखी थी, उषा को बहुत समझाया तथा उसे पहिले जन्म का सब हाल कह सुनाया। उसे सुनकर उषा अत्यन्त प्रसन्न हुई।
तब उसने अत्यन्त विनय के साथ चित्रलेखा से कहा-हे सखी! जिस पति को गिरिजा ने मुझे रात्रि के समय दिखाया है, उसे तुम किसी प्रकार छिपाकर मेरे पास ले आओ तथा मुझसे भेंट करा दो। यह बात तुम्हारे लिए कुछ भी कठिन नहीं है। इतना कहकर उषा फिर बोली-तुम सब सखियाँ इस बात को सत्य समझ लो कि जिस मनुष्य के मिलने से रात्रि के समय मुझको बहुत सुख प्राप्त हुआ है, वह मनुष्य यदि फिर न मिला तो मेरी मृत्यु निश्चित है।
यह सुनकर चित्रलेखा ने हँसकर कहा-हे सखी! मैं तुम्हारे सब दुःख दूर कर दूँगी, जिससे तुम्हें परम आनन्द प्राप्त होगा। यदि वह मनुष्य तीनों भुवनों में कहीं होगा, तो उसे तुरन्त ही तुमसे मिला दूँगी। यह कहकर चित्रलेखा कपड़े के ऊपर सब प्राणियों के स्वरूप खींचने लगी। उसने आदि से अन्त तक, जितने भी देवता आदि आकाश के निवासी थे, सबके रूप बनाये, परन्तु उषा ने उनमें से किसी को नहीं पहचाना। तब वह मनुष्यों के चित्र बना-बना कर दिखलाने लगी।
हे नारद! जब मेरा चित्रलेखा यदुवंश को चित्रित करने लगी, तब उसने क्रमशः वसुदेव, राम, कृष्ण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध के चित्र बनाकर उषा को दिखाये। उषा ने अनिरुद्ध के स्वरूप को देखकर पहिचान लिया तथा यह कहा कि यही व्यक्ति वह है, जिसने मेरा मन चुराया है। तब चित्रलेखा यह जानकर कि उषा कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध पर मोहित है, शिवजी का ध्यानकर, योगमाया के बल से ज्येष्ठ शुक्ला चतुर्दशी को कृष्णजी के भवन में गयी।
वहाँ उसने यह देखा कि अनिरुद्ध अपनी पत्नी के साथ मद्यपान कर रहे हैं। उनकी किशोरावस्था, श्याम रंग तथा अत्यन्त सुन्दर स्वरूप को देखकर, चित्रलेखा ने तामसयोग को प्रकटकर, चारों ओर अँधेरा कर दिया तदुपरान्त वह उस शैय्या को जिस पर अनिरुद्ध बैठे हुए थे, अपने मस्तक पर रखकर योग-बल से उड़ चली और उसे उषा के पास लाकर रख दिया। उस समय उषा ने आश्चर्यचकित होकर अनिरुद्ध को देखा।
तदुपरान्त अत्यन्त गुप्तरूप से भीतर ले जाकर यह इच्छा की कि मैं इनके साथ भोग-विलास करूँ। उस समय का यह हाल द्वारपालों तथा रक्षकों ने जान लिया। वे अत्यन्त आश्चर्य करके उषा के अपकर्म तथा छल पर पश्चात्ताप करने लगे।
फिर जब उन्होंने उषा के घर जाकर अनिरुद्ध को इस प्रकार देखा कि वह भोग-विलास में लिप्त हैं, तो उन्होंने तुरन्त ही बाणासुर के पास जा, स्तुति करते हुए, यह कहा-हे स्वामी! आप तीनों लोकों के ऐसे राजा हैं, जिनसे ब्रह्मा भी डरते हैं। प्रभो! इस समय आपकी पुत्री के घर में एक अकेला मनुष्य बैठा है। आप स्वयं ही चलकर उसे देख लें तथा जो उचित समझे, करें। यह सुनकर बाणासुर अत्यन्त दुःखी एवं क्रोधित हुआ । उसने वहाँ जाकर अनिरुद्ध को देखा तथा मन में विचार किया कि यह मनुष्य कोई बड़ा वीर, युद्ध करनेवाला तथा प्रण का दृढ़ है। इसने मेरे कुल-धर्म को नष्ट कर दिया है। यह विचार कर बाणासुर ने अपने वीरों को आज्ञा दी कि इसको तुरन्त मार डालो।
हे नारद! बाणासुर ने अपने सेवकों को यह आज्ञा देकर अनिरुद्ध को देखा। उस समय उनका तेजस्वी स्वरूप देखकर, उसे बहुत सन्देह हुआ। इसलिए दस सहस्त्र सेना अनिरुद्ध को मारने के लिए तैयार हुई। यह देखकर अनिरुद्ध भी निर्भय हो, उठ खड़े हुए। वे अपने एक हाथ में परिघ उठाकर, तुरन्त ही द्वार की ओर चले तथा उस सेना पर इस प्रकार आक्रमण किया कि एक भी सैनिक जीवित न बचा।
इसके पश्चात् अनिरुद्ध से युद्ध करने के लिए जो और सेना आयी, उसको भी उन्होंन बुरी तरह मारा। फिर एक लाख वीर आकर अनिरुद्ध से लड़ने लगे। अनिरुद्ध ने उनको भी मारकर वहाँ से भगा दिया। जब बाणासुर को युद्ध का समाचार मिला, तब वह स्वयं अपने रथ पर सवार होकर युद्ध करने के लिए चला। उसके रथ पर कुम्भाण्ड नामक मन्त्री सारथी के स्थान पर बैठा हुआ था। उस समय अनिरुद्ध ने अपनी तलवार द्वारा सारथी सहित बाणासुर को घायल कर दिया।
तब बाणासुर ने अनिरुद्ध पर अपनी सांग चलायी। अनिरुद्ध ने बाणासुर के हाथ से सांग छीन ली और उसी से बाणासुर के ऊपर आक्रमण किया। उस युद्ध को देखकर दैत्य एवं देवता अत्यन्त आश्चर्य चकित हुए। तब बाणासुर अनिरुद्ध को अत्यन्त बलशाली समझकर, वहाँ से अन्तर्धान हो गया और मायायुद्ध करके अनिरुद्ध को अपार कष्ट दिया। कुम्भाण्ड ने बाणासुर को अनेक प्रकार से समझाया तथा उसका क्रोध शान्त किया।
फिर उसने अनिरुद्ध को अच्छे-अच्छे उपदेश देकर, भली प्रकार समझाते हुए कहा-हे अनिरुद्ध! अब तुम बाणासुर के हाथ जोड़कर, कहो कि हम तुमसे हार गये, तुम हमको प्राणदान दो। यह सुनकर अनिरुद्ध ने कहा-हे मूर्ख तू क्षत्रियधर्म नहीं जानता। क्षत्रियों को युद्ध में सम्मुख होकर मरना अत्यन्त आनन्ददायी तथा मोक्ष प्रदान करनेवाला होता है। जब धर्म ही न रहा तो जीना किस काम का ? ऐसा मनुष्य दोनों लोकों में आनन्द नहीं उठा सकता।
ऐसे वचन सुनकर बाणासुर अत्यन्त क्रोधित हुआ तथा उसने चाहा कि अनिरुद्ध का वध कर डालें। इस इच्छा से ज्योंही उसने अपना त्रिशूल उठाया, तभी आकाशवाणी हुई । उस आकाशवाणी को अनिरुद्ध सहित सबने सुना। वह यह थी-हे बाणासुर! तू ऐसा पाप क्यों करता है ? तू बलि का पुत्र और शिव भक्त है। यह काम अच्छा नहीं। यह बालक मार डालने के योग्य नहीं है, इसके शिवजी रक्षक हैं। शिवजी सबके स्वामी हैं, जिनके आधीन तीनों लोक हैं। वह शिवजी सबका पालन करनेवाले तथा प्रलय करनेवाले हैं। तुझको यही उचित है कि तू ऐसे शिवजी की पूजा किया करे। जब शिवजी तेरे ऊपर कृपा करेंगे, उस समय तेरा गर्व नष्ट हो जायगा।
हे नारद! इस आकाशवाणी को सुनकर, बाणासुर उस स्थान से उठकर अपने घर चला गया तब अनिरुद्ध ने भी देवी का स्मरण किया तथा मन में बड़ी स्तुति की, जिससे श्री महाकालीजी अत्यन्त प्रसन्न हुईं। वह महाकाली गिरिजा का ही एक रूप हैं, उन्होंने अनिरुद्ध को आनन्द दिया तथा स्वयं अन्तर्धान हो गयीं। तब अनिरुद्ध फिर उषा के पास चले गये।
॥ चित्रलेखा द्वारा अनिरूद्ध का हरण ॥
ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! जिस समय चित्रलेखा अनिरुद्ध को लेकर आकाश को चली थी, उस समय अनिरुद्ध की पत्नी जोर-जोर से रोने लगी थी। उसके रुदन को सुनकर तथा अनिरुद्ध को न देखकर, कृष्ण-बलराम सहित समस्त यदुवंशियों को अत्यन्त चिन्ता हुई। उन सबने अनिरुद्ध को चारों ओर ढूँढ़ा, परन्तु किसी भी प्रकार पता न चला। इसी प्रकार चार महीने व्यतीत हो गये और कोई यह न जान सका कि अनिरुद्ध को कौन ले गया है ?
हे नारद! तब भगवान् सदाशिव की आज्ञा पाकर एक दिन तुम श्री कृष्णजी के पास पहुँचे और उन्हें आदि से अन्त तक का सम्पूर्ण वृत्तान्त कह सुनाया। उस समय गरुड़ भी श्रीकृष्णजी की सहायता के निमित्त उनके पास जा पहुँचे। शोणितपुर पहुँच कर श्रीकृष्णजी ने अपनी सेना द्वारा नगर को चारों ओर से घेर लिया। और यह देखकर बाणासुर युद्ध करने की इच्छा से श्रीकृष्णजी के सामने आया तथा उसके संरक्षक भगवान् रुद्र भी युद्ध क्षेत्र में आ पहुँचे।
हे नारद! उस समय दोनों सेनाओं में घोर युद्ध होने लगा। रुद्र ने श्रीकृष्णचन्द्रजी के साथ युद्ध ठाना, वीरभद्र प्रद्युम्न के साथ लड़ने लगे तथा कोपकर्ण और कुम्भाण्ड बलरामजी के साथ युद्ध करने लगे। बाणासुर के पुत्र ने साम्ब का सामना किया तथा शिवजी के वाहन नन्दीश्वर गरुड़ के साथ युद्ध करने लगे। इस प्रकार सभी योद्धा अपना-अपना जोड़ देखकर एक-दूसरे से भिड़ गये । स्वयं बाणासुर अपने हाथ में साँग लेकर श्रीकृष्णजी की सेना से युद्ध करने लगा। उस महायुद्ध को देखने के लिए मैं तथा अन्य सब देवता युद्ध क्षेत्र में जा पहुँचे।
शिवजी के गणों ने यदुवंशियों के साथ युद्ध छेड़ रखा था। इस प्रकार उस युद्ध में एक ओर तो श्रीकृष्णचन्द्रजी थे और दूसरी ओर भगवान् सदाशिवजी थे। उस युद्ध का वर्णन किस प्रकार किया जाय ? कोई भी योद्धा अपने स्थान से तनिक भी विचलित नहीं होता था। जिस समय श्रीकृष्णजी और बलरामजी ने अपनी शस्त्र-वर्षा द्वारा दैत्यों तथा शिवगणों का मुँह फेर दिया, उस समय शिवजी ने भी अत्यन्त क्रुद्ध होकर अपनी घोर-गर्जना द्वारा यदुवंशियों की सेना को भयभीत कर दिया, जिसके कारण वे लोग भी युद्धक्षेत्र से भागने लगे।
तब श्रीकृष्णचन्द्रजी ने बहुत क्रोध करके शिवजी के ऊपर अपने पैने बाणों का प्रहार किया। परन्तु शिवजी ने उन सब बाणों को पल भर में ही काट डाला। तब श्रीकृष्णचन्द्रजी ने क्रुद्ध होकर शिवजी के ऊपर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। उस ब्रह्मास्त्र को भी शिवजी ने अपने ब्रह्मास्त्र से निष्फल कर दिया। इस प्रकार श्रीकृष्णजी ने शिवजी के ऊपर जितने भी अस्त्र-शस्त्र चलाये, वे सब निष्फल हो गये।
यह देखकर श्रीकृष्णचन्द्रजी ने कोप में भरकर शिवजी के ऊपर शीतज्वर का प्रयोग किया, जिसके कारण शिवजी की सेना के सभी योद्धा थर-थर करके काँपने लगे। तब शिवजी ने पित्तज्वर को छोड़ा, जिसने शीतज्वर को निष्फल कर दिया और वह शिवजी की स्तुति करता हुआ उनकी शरण में जा पहुँचा। उस समय शिवजी ने दोनों ज्वरों को यह आज्ञा दी कि तुम दोनों हमारे भक्तों को कभी न सताना। हम तुम्हें आज से अपना सेवक बनाये लेते हैं। अब तुम प्रसन्न होकर अपने घर को जाओ। यह सुनकर शीतज्वर तथा पित्तज्वर अपने-आपने स्थान को चले गये।
हे नारद! शिवजी के इस चरित्र को देखकर श्रीकृष्णजी को बहुत दुःख हुआ। वीरभद्र ने प्रद्युम्न के ऊपर उस शक्ति का प्रयोग किया, जिसके द्वारा तारक का संहार किया था। उस शक्ति को आते देख प्रद्युम्न अत्यन्त व्याकुल हो युद्ध क्षेत्र से भाग खड़े हुए। इसी प्रकार बलभद्र आदि सम्पूर्ण यदुवंशी योद्धा भी क्षेत्र को छोड़कर भाग गये। यह देखकर गरुड़ ने अपने पंखों को फैलाकर उपद्रव मचाना आरम्भ किया, तब नन्दीश्वर ने अपने सींगों द्वारा गरुड़ के पंखों को छेद दिया और उन्हें उलझा लिया। उस समय गरुड़ बड़ी कठिनता से नन्दी के पंजे से निकलकर भाग खड़े हुए।
जब श्रीकृष्णचन्द्रजी ने अपनी सेना की यह दुरदशा देखी तो उन्हें अत्यन्त चिन्ता हुई। उस समय उन्होंने अपने सारथी दारुक से यह कहा-हे दारुक! देखो, यह कैसा आश्चर्य है कि शिवजी ने बाणासुर को यह शाप दिया था कि कृष्णचन्द्रजी तेरी भुजाओं को काटेंगे और उसी शाप के कारण हम बाणासुर की भुजाएँ काटने के लिए आ खड़े हुए हैं और शिवजी अपने वचन को मिथ्या सिद्ध कर रहे हैं। शिवजी के ऐसे व्यवहार से हमारी प्रतिष्ठा कम हो रही है।
हम शिवजी से मिलकर कुछ बातें करना चाहते हैं। तुम हमारा रथ उनके समीप ले चलो, जिससे हम बाणासुर के शाप की बात स्मरण करा सकें और यह कह सकें कि आप बाणासुर की सहायता करना बन्द कर दें।
हे नारद! श्रीकृष्णजी की यह आज्ञा सुनकर दारुक रथ को शिवजी के पास ले पहुँचा। तब श्रीकृष्णजी ने शिवजी के चरणों में प्रणाम कर, हाथ जोड़ स्तुति करते हुए यह कहा-हे प्रभो! आप ही की आज्ञानुसार मैं बाणासुर की भुजाएँ काटने के लिए यहाँ आया था, क्योंकि आपने उसे यह शाप दिया था कि तेरी भुजाओं को कृष्णचन्द्र काट डालेंगे। हे नाथ ! आप बाणासुर की रक्षा करना छोड़ दीजिये जिससे युद्ध में मुझे विजय प्राप्त हो और आपका वचन सत्य सिद्ध हो।
श्रीकृष्णजी के मुख से यह वचन सुनकर शिवजी बोले-हे कृष्ण! तुम सबसे बड़े, सबसे श्रेष्ठ तथा हमारे भक्त हो। तुम साक्षात् विष्णु के अवतार हो। इस समय तुम जो कुछ कह रहे हो, वह भी पूर्ण सत्य है, लेकिन तुम यह भी स्मरण रखो कि हम भक्ति के आधीन रहते हैं। जब हम यहाँ रक्षक बनकर उपस्थित हैं, तब हमारे देखते हुए बाणासुर की भुजाएँ नहीं कट सकतीं।
इसलिए हम तुम्हें एक उपाय बताते हैं, उसके करने से तुम्हें अवश्य ही सफलता प्राप्त होगी। वह उपाय यह है कि तुम हमारे ऊपर जृम्भणास्त्र का प्रयोग करो। उस अस्त्र के लगने पर हम निद्रा के वशीभूत हो सो जायेंगे। उस समय तुम अपनी मनोभिलाषा पूर्ण करना और संसार में यश प्राप्त करना। शिवजी की यह आज्ञा सुनकर श्रीकृष्णजी अपने स्थान पर लौट आये। तदुपरान्त उन्होंने जृम्भणास्त्र का प्रयोग करके शिवजी को सुला दिया।
॥ श्रीकृष्णजी के चक्र द्वारा बाणासुर की भुजाओं का कटना ॥
ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! जब बाणासुर ने अपनी सेना के बल में कमी देखी तो वह अत्यन्त क्रुद्ध हुआ और सिंहनाद करता हुआ श्रीकृष्णजी के सामने आकर घोर युद्ध करने लगा । श्रीश्यामसुन्दर ने अपने धनुष पर अनेक बाण चढ़ाकर बाणासुर के ऊपर चलाये, परन्तु बाणासुर ने भी उनके सब बाणों को काटते हुए अपने बाणों द्वारा उन्हें चारों ओर से ढक दिया। जिस समय कुम्भाण्ड ने अपने प्रहारों द्वारा यदुवंशी सेना को विचलित कर दिया, उस समय बलरामजी ने अपने हल-मूसल द्वारा कुम्भाण्ड के मस्तक को हिलाने की चेष्टा की। यह देखकर कुम्भाण्ड ने बलराम जी के हृदय पर अपने त्रिशूल का प्रहार किया और उन्हें मूच्छित करके पृथ्वी पर डाल दिया।
हे नारद! गरुड़जी भी रणक्षेत्र में लड़ने लगे। इनके पंख-प्रहारों से व्याकुल होकर दैत्यों की सेना युद्धक्षेत्र से भागने लगी यह देखकर बाणासुर ने अपने त्रिशूल द्वारा गरुड़ को मूच्छित करके पृथ्वी पर गिरा दिया। कुछ देर पश्चात् जब गरुड़ की मूर्च्छा टूटी तो फिर वे युद्धक्षेत्र से भाग गये। तदुपरान्त बाणासुर और श्री कृष्णजी में इस प्रकार का घोर युद्ध होने लगा कि सम्पूर्ण संसार में हाहाकार मच गया। उस युद्ध में दोनों ओर से इतने बाण चले कि उनसे सम्पूर्ण आकाश भर गया।
हे नारद! तदुपरान्त बाणासुर ने श्री कृष्णजी के साथ घोर युद्ध आरम्भ किया। तब श्री कृष्णचन्द्रजी ने अपनी बाण-वर्षा द्वारा बाणासुर के रथ के घोड़ों को मार गिराया। फिर उन्होंने एक बाण ऐसा छोड़ा कि उसके लगते ही बाणासुर घायल हो पृथ्वी पर गिर गया और मूच्छित हो गया। कुछ देर बाद जब उसे होश हुआ, तब वह त्रिशूल हाथ में लेकर श्री कृष्णजी से फिर युद्ध करने लगा। उसने अपने त्रिशूल द्वारा श्री कृष्णजी को बहुत दुःख पहुँचाया।
तब श्री कृष्णजी ने अपने बाणों से उसके त्रिशूल एवं गदा को काट दिया तथा उसके अन्य शस्त्रों को भी बेकार कर दिया। यह देखकर बाणासुर ने श्री कृष्णजी के धनुष को काट डाला। तब श्री कृष्णजी ने शिवजी के शाप का स्मरण करते हुए बाणासुर को पकड़ लिया और अपने चक्र द्वारा उसकी सम्पूर्ण भुजाओं को काट डाला,केवल चार भुजाएँ शेष रहने दीं। शिवजी की कृपा से बाणासुर को भुजाओं के कटने का दुःख नहीं हुआ और उसके सभी घाव तुरन्त रन्त भर गये ।
हे नारद! उस समय श्री कृष्णजी का क्रोध इतना बढ़ा कि उन्होंने बाणासुर के मस्तक को काट डालने की इच्छा प्रकट की। यह जानते ही श्रीशिवजीं जो एक ओर सोये पड़े थे, तुरन्त जग पड़े और श्रीकृष्णजी की ओर क्रोध पूर्वक देखते हुए इस प्रकार कहने लगे-हे कृष्ण! हमने जो आज्ञा दी थी, उसे तुम पूरी कर चुके; अब बाणासुर के मस्तक को मत काटो। तुम्हें ज्ञात होगा कि तारक तथा रावण पर जब तुमने यह चक्र चलाया था, उस समय यह निष्फल सिद्ध हुआ था, क्योंकि वे दोनों हमारे भक्त थे।
इसलिए हमारे भक्त बाणासुर पर तुम इतना क्रोध मत दिखाओ और इसके साथ प्रेम-संबन्ध स्थापित करके उषा सहित अनिरुद्ध को अपने घर ले जाओ तथा हमारा स्मरण करते रहो। शिवजी की इस आज्ञा को श्रीकृष्णजी ने स्वीकार कर लिया। तब शिवजी ने बाणासुर तथा श्रीकृष्णजी में मित्रता स्थापित करा दी। तदुपरान्त बाणासुर ने अनिरुद्ध के साथ उषा का विवाह करा दिया और श्रीकृष्ण-बलराम आदि सभी लोगों को दान-मान से सन्तुष्ट किया।
सब रीतियाँ सम्पन्न हो जाने पर श्रीकृष्णजी अनिरुद्ध और उषा को साथ ले, बाणासुर से विदा हो, अपने नगर में जा पहुँचे। बाणासुर भी शिवजी का गण बनकर दैत्य पद त्याग, देवता हुआ।
॥ उषा तथा अनिरुद्ध के विवाह का वर्णन ॥
इतनी कथा सुनकर नारदजी ने कहा-हे पिता! जब श्रीकृष्णजी अनिरुद्ध और उषा को साथ लेकर द्वारका को चले गये, तब बाणासुर ने क्या किया, वह आप मुझे बताने की कृपा करें ? शिवजी ने बाणासुर को अपना गण किस प्रकार बनाया वह वृत्तान्त भी मुझसे विस्तारपूर्वक कहिये।
यह सुनकर ब्रह्माजी बोले-हे पुत्र! श्रीकृष्णचन्द्र के चले जाने के पश्चात् बाणासुर अपनी मूर्खता पर अत्यन्त लज्जित हुआ तथा अपने अहंकार को धिक्कारने लगा। उस समय नन्दीश्वर ने बाणासुर के पास पहुँचकर उसे समझाते हुए कहा -हे बाणासुर! तुमने शिवजी के सम्मुख अपने अहंकार का प्रदर्शन किया था, उसीका यह फल तुम्हें प्राप्त हुआ है। अब तुम शिवजी की शरण में जाओ। शिवजी की इच्छा से जो कार्य हो, तुम उसी में प्रसन्न रहा करो और सम्पूर्ण अहंकार को त्याग करके उन्हींकी सेवा में लगे रहो। तुम ताण्डव नृत्य द्वारा शिवजी को रिझाओ। तब वे प्रसन्न होकर तुम्हारी चिन्ताओं को नष्ट कर देंगे।
हे नारद! यह सुनकर बाणासुर अत्यन्त प्रसन्न हो, शिवजी के समीप जाकर रोने लगा और अपने अपराध की क्षमा माँगते हुए स्तुति करने लगा। तदुपरान्त उसने शिवजी के सम्मुख तांडव नृत्य करना आरम्भ किया। उस नृत्य में उसने पदगति, प्रत्यालीढ़, प्रमुखगति, मदनबाणगति तथा सरकंपा आदि सब प्रकार की गतियों एवं भावों का प्रदर्शन किया।
उस नृत्य नारद! यह सुनकर बाणासुर अत्यन्त प्रसन्न हो, शिवजी के समीप जाकर रोने लगा और अपने अपराध की क्षमा माँगते हुए स्तुति करने लगा। तदुपरान्त उसने शिवजी के सम्मुख तांडव नृत्य करना आरम्भ किया। उस नृत्य में उसने पदगति, प्रत्यालीढ़, प्रमुखगति, मदनबाणगति तथा सरकंपा आदि सब प्रकार की गतियों एवं भावों का प्रदर्शन किया। को देखकर शिवजी ने अत्यन्त प्रसन्न होकर बाणासुर से यह कहा-हे बाणासुर! तेरे नृत्य एवं गायन द्वारा हम अत्यन्त प्रसन हैं। तू हमें अत्यन्त प्रिय है। इसलिए हमने अपनी लीला द्वारा तेरे अहंकार को नष्ट कर दिया है। अब तू जो चाहे, वरदान माँग ले।
यह सुनकर बाणासुर ने उत्तर दिया-हे प्रभो! आप मेरे ऊपर यही कृपा कीजिये कि मेरा शरीर दैत्यभाव से छूट जाय और मैं आपके गणों में स्थान प्राप्त करूँ। इसके साथ ही आप मुझे यह वरदान भी दीजिये कि मेरी पुत्री उषा द्वारा जिस बालक की उत्पत्ति हो, वही शोणितपुर का राज्य प्राप्त करे। वह बालक देवताओं से कभी भी शत्रुता न करे तथा मेरे वंश से दैत्य भाव सदा के लिए नष्ट हो जाय। मैं यह भी चाहता हूँ कि मुझे आपकी नवधा भक्ति की प्राप्ति हो और मैं आपके भक्तों से विशेष स्नेह रखूं।
हे नारद! इतना कहकर बाणासुर शिवजी के चरणों पर गिर पड़ा। स्नेह की अधिकता के कारण उसके नेत्रों से अश्रु-धार बह निकली और कंठ गद्गद् हो गया। यह दशा देखकर, शिवजी अत्यन्त प्रसन्न हो, बाणासुर को अपने हाथों से उठा कर हृदय से लगाते हुए बोले- हे बाणासुर! तुम हमारे परम भक्त हो। तुमने हमसे जो वरदान मांगे हैं, हम उन सबको तुम्हें देते हैं। तुम हमारे गणों के स्वामी होकर महाकाल नाम से प्रसिद्ध होगे। तुम युद्ध में कभी भी किसी से परास्त न होगे और हमारी कृपा से सभी देवता तुम्हारे सेवक बने रहेंगे।
इतना कह शिवजी ने बाणासुर को अत्यन्त स्नेहपूर्ण दृष्टि से देखा और उसके मस्तक पर अपना हाथ फेरने लगे। उस समय बाणासुर भी अत्यन्त प्रसन्न हुआ तथा महाकाल होकर शिवजी की सेवा में रहने लगा।
॥ शिवजी द्वारा गजासुर तथा जगदम्बा द्वारा महिषासुर का वध ॥
ब्रह्माजी ने कहा- हे नारद! अब हम तुम्हें नागासुर अर्थात् गज के संहार का वृत्तान्त सुनाते हैं। जिस प्रकार शिवजी ने अपने त्रिशूल द्वारा उसका वध करके, उसे अपना गण बनाया था, वह कथा सुनो। जब भगवती जगदम्बा ने विष्णुजी तथा मुझपर कृपा करते हुए भगवान् सदाशिव की आज्ञानुसार देवताओं एवं ऋषि-मुनियों का उपकार करने के हेतु महिषासुर का संहार किया, तब उसका पुत्र गजासुर अत्यन्त दुःखी हो, अपने पिता के वध का स्मरण कर, देवताओं से बदला लेने की इच्छा करने लगा।
इसी उद्देश्य से उसने वन में जाकर अत्यन्त परिश्रमपूर्वक हमारा तप करना आरम्भ किया। उसकी अभिलाषा यह थी कि जो स्त्री-पुरुष कामदेव से नहीं जीत पाये हैं, उनमें से कोई भी मेरा संहार न कर सके। वह हिमाचल के शिखर पर अँगूठे के बल खड़ा हो, आकाश की ओर आँखें उठाये, अपनी दोनों भुजाओं को ऊँचा किये, बहुत बर्षों तक तपस्या करता रहा।
हे नारद! उसकी तपस्या के तेज के सम्मुख सूर्य का तेज भी मलिन पड़ गया। जब उसका तप पूर्णता को प्राप्त करने के निकट पहुँचा, उस समय उसके शरीर से अग्नि की ऐसी ज्वाला उठी कि वह अपने तेज द्वारा सम्पूर्ण संसार को भस्म करने लगी। उस समय सब देवता, ऋषि, मुनि आदि अत्यन्त दुःखी होकर मेरे पास आये और गजासुर के तप का वर्णन करते हुए कहने लगे-हे प्रभो! आप कृपा करके गजासुर के पास जाइये और उसे वरदान देकर सन्तुष्ट कीजिये, अन्यथा हमारा दुःख बढ़ता ही चला जायगा।
देवताओं की यह प्रार्थना सुनकर मैं, भृगु तथा दक्ष आदि अपने पुत्रों को साथ ले गजासुर के पास पहुँचा। वहाँ उसे उग्र तप करते हुए देखकर मैं अत्यन्त आश्चर्य में भरकर बोला-हे गजासुर! हम तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हैं। तुम जो वरदान चाहो, माँग लो।
हे नारद! मेरे मुख से निकले हुए इन शब्दों को सुनकर गजासुर ने अपने नेत्र खोलकर मुझे प्रणाम किया। तदुपरान्त बहुत प्रकार से स्तुति करते हुए इस प्रकार बोला-हे प्रभो! मैं यह चाहता हूँ कि जो स्त्री-पुरुष कामदेव के आधीन रहते हैं, उनमें से कोई भी, मुझे किसी दशा में नहीं मार सके तथा मेरे ऊपर किसी प्रकार का शस्त्र प्रहार अपना प्रभाव न डाल सके। गजासुर की यह इच्छा सुनकर मैं 'एवमस्तु' कहकर अपने स्थान को लौट आया।
तब गजासुर भी अपने घर लौट गया। वहाँ जाकर उसने बहुत-सी सेनाएँ इकट्ठी की और तीनों भुवनों को अपने पराक्रम से जीत लिया। फिर वह अच्छी तरह से प्रजा का पालन करता हुआ निष्कंटक राज्य करने लगा। इस प्रकार कुछ समय तक तो उसने धर्मपूर्वक राज्य किया, लेकिन जब उसे राज्य-पद का अहंकार हुआ और यह विश्वास हो गया कि उसे कोई भी नहीं जीत सकता, तब वह अधर्म करने पर उतर आया।
उस समय उसने ब्राह्मणों को अनेक प्रकार के कष्ट देने आरम्भ कर दिये तथा तपस्वियों एवं धर्मात्माओं को भी सताने लगा। एक दिन वह अहंकार में भर, शिवजी की राजधानी आनन्दवन अर्थात् काशी जा पहुँचा।
हे नारद! उसके उत्पातों से भयभीत होकर आनन्दवन अर्थात् काशी के निवासी शिवजी के समीप जा, हाथ जोड़कर इस प्रकार कहने लगे-हे प्रभो! तीनों लोकों को जीतने के पश्चात् गजासुर अब काशीपुरी में भी आ पहुँचा है। उसने अपने अत्याचारों से सब लोगों को दुःख पहुँचाया है। जिस समय वह हाथी के समान चाल से चलता है, उस समय पर्वत हिल उठते हैं तथा वृक्ष टूटकर गिर पड़ते हैं।
बादल उसकी आज्ञा पाकर ही आकाश में उड़ सकते हैं। तथा उसके भय से समुद्र भी सूख जाते हैं। इस समय वाराणसी क्षेत्र में आकर उसने आपके भक्तों को बहुत दुःख पहुँचाया है। आपके अतिरिक्त उसे जीतनेवाला अन्य कोई नहीं है। अतः आप उसका संहार करके सब लोगों को प्रसन्न कीजिये।
हे नारद! काशीवासियों की यह प्रार्थना सुनकर शिवजी अपने हाथ में त्रिशूल लेकर काशी जी में जा पहुँचे। वहाँ गजासुर के सम्मुख पहुँचकर उन्होंने ऐसा भयानक नाद किया कि उसे सुनकर दैत्यों की सेना में हाहाकार मच गया। जिस समय गजासुर ने शिवजी को त्रिशूल लेकर अपनी ओर आते हुए देखा, उस समय वह भी गर्जन करता हुआ, उनके सम्मुख युद्ध करने के लिए चला आया।
देखते-देखते शिवजी तथा गजासुर परस्पर घोर युद्ध करने लगे। उस समय शिवजी ने गजासुर के सभी शस्त्रों को काटकर, उसकी सेना को विचलित कर दिया। यह दशा देखकर गजासुर अपने हाथ में नंगी तलवार लेकर, शिवजी को मारने के लिए दौड़ा और उन्हें ललकारता हुआ इस प्रकार कहने लगा-हे शिव! आज मैं तुम्हें जीवित नहीं छोडूंगा।
इतना कहकर उसने सभी गणों को अपने शस्त्रों की चोट से व्याकुल कर दिया। यह देखकर शिवजी ने अपने मन में निश्चित किया कि अब बिना विलम्ब किये, मुझे इसका वध कर डालना चाहिए। शिवजी ने अपना त्रिशूल गजासुर के ऊपर छोड़ दिया। उस त्रिशूल का स्पेश पाते ही गजासुर पवित्र हो गया तथा उसका दैत्यभाव नष्ट हो गया।
उस समय वह अत्यन्त प्रसन्न हो, शिवजी की स्तुति करते हुए इस प्रकार कहने लगा-धन्य भाग्य हैं, जो मुझे आपके द्वारा मृत्यु प्राप्त हुई। अब मेरी यह प्रार्थना है कि आप मुझे परम पद प्रदान करने की कृपा करें। संसार में जो जन्म लेता है, उसे एक न एक दिन अवश्य मरना पड़ता है, मुझे जो मृत्यु मिली है, उसे वेद भी अत्यन्त दुर्लभ कहते हैं।
हे नारद! गजासुर के ऐसे भक्तिपूर्ण वचन सुनकर, शिवजी ने प्रसन्न होकर कहा-हे गजासुर! तेरे अत्यन्त भक्तिपूर्ण वचन सुनकर, हम अत्यन्त प्रसन्न हुए हैं। अब तेरी जो इच्छा हो, वह वर माँग ले।
शिवजी के श्रीमुख से निकले हुए इन वचनों को सुनकर गजासुर बोला-हे प्रभो! यदि आप मुझपर इतने प्रसन्न हैं तो मुझे यह सौभाग्य प्रदान कीजिये कि आप मेरे शरीर के चमड़े को हर समय धारण किये रहें और आपके त्रिशूल से मेरे शरीर का प्रतिदिन स्पर्श हुआ करे। इसके साथ ही आप कृत्तिवासा के नाम से प्रसिद्ध हों। जो मनुष्य आपके इस नाम को मुख पर लावें, वे अपना सम्पूर्ण मनोरथ प्राप्त करें।
हे नारद! गजासुर की यह प्रार्थना सुनकर शिवजी ने 'एवमस्तु' कहा। फिर इस प्रकार बोले-हे गजासुर! तेरा यह शरीर हमारा लिंग होकर कृत्तिवासेश्वर के नाम से प्रसिद्ध होगा तथा जो इस लिंग का दर्शन करेंगे, उनके सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जायेंगे। काशी में हमारे जितने भी लिंग हैं, उनमें इसे सर्वश्रेष्ठ पद प्राप्त होगा।
यह कहकर शिवजी ने गजासुर को परमपद प्रदान किया। हम सब देवता भी उस स्थान पर जा पहुँचे और कृत्तिवासेश्वर का पूजन करके आनन्दमग्न हुए। हे नारद! शिवजी का यह चरित्र आवागमन से छुड़ाने वाला है। जो व्यक्ति इस चरित्र को सुनता-सुनाता है, उसके सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं ।
॥ दुन्दुभि का वृत्तान्त ॥
ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! अब मैं तुम्हें दुन्दुभि के संहार की कथा सुनाता हूँ। जिस प्रकार विष्णुजी ने नृसिंह का अवतार धारणकर देवताओं को आनन्द प्रदान करने के लिए दिति के दोनों पुत्रों को मारा था, वह अद्भुत वृत्तान्त तुम जानते ही हो। अब आगे की कथा सुनो।
जब विष्णुजी ने नृसिंह तथा वाराह रूप धारणकर दिति के दोनों पुत्रों का संहार कर दिया, उस समय दिति ने अत्यन्त विलाप किया। तब दिति के भाई दुन्दुभि ने उसे समझाते हुए यह कहा कि तुम किसी प्रकार का शोक मत करो। लेकिन दिति का शोक दूर न हुआ। यह देखकर दुन्दुभि ने अपने मन में विचार किया कि देवताओं ने विष्णु के हाथ से मेरे बहनोई को अनायास मरवा डाला है, इसलिए मुझे उन्हें कष्ट पहुँचाना चाहिए।
सबसे पहले मुझे यह पता लगाना चाहिए कि वे किस कारण अमर हैं और किसके बल का भरोसा रखते हैं तथा किस उपाय द्वारा उन्हें दुःख पहुँचाया जा सकता है। बहुत सोच-विचार करने के उपरान्त वह इस निश्चय पर पहुँचा कि ब्राह्मण, वेद द्वारा अपनी रक्षा करते हैं और देवता, ब्राह्मणों द्वारा पलते हैं। यदि ब्राह्मण नष्ट हो जायँ तो वेद भी नष्ट हो जायेंगे और जब वेद नष्ट हो जायेंगे, तब देवता भी दुर्बल हो जायेंगे।
इस प्रकार जब देवता दुर्बल हो जायेंगे, तब मैं उन्हें जीतकर उन पर राज्य करूँगा और आनन्द को प्राप्त होऊँगा। जिस प्रकार ब्राह्मण संसार में सबसे बड़े हैं और वेद के मार्ग पर चलते हैं, उसी प्रकार काशी ब्राह्मणों का सबसे बड़ा घर है। इसलिए मुझे सर्वप्रथम काशी में पहुँच कर ब्राह्मणों को मारना चाहिए, तदुपरान्त अन्य स्थानों में जाकर ब्राह्मणों को नष्ट करना चाहिए।
हे नारद! यह विचार कर दुन्दुभि काशी में जा पहुँचा। वहाँ उसने सहस्रों ब्राह्मणों का वध कर डाला। जब ब्राह्मण उसके भय से भयभीत हो, अपने प्राणों की रक्षा करने के हेतु वन में भागने लगे, तब वह वन में जाकर उन सबको मारने लगा। वह अनेक प्रकार की माया करना जानता था, इसलिए कभी वन में जाकर पशु बन जाता, कभी जल में पहुँचकर मगर बन जाता और कभी पृथ्वी पर रहकर राक्षस रूप द्वारा ब्राह्मणों को खा लेता था।
एक दिन की बात है कि रात्रि के समय एक शिवभक्त शिवजी के मन्दिर में बैठकर पूजा कर रहा था। उस समय दुन्दुभि ने उसे देखकर यह विचार किया कि मैं सिंह का स्वरूप धारणकर, इसे मार डालूँ; जब उसने यह देखा कि सिंह का रूप धारण करके मैं उसे नहीं खा सकता हूँ तब वह पर्वत के समान विशाल स्वरूप धारण कर, उसे स्पर्श करने में भी असमर्थ रहा। उसका यह अनाचार देखकर, शिवजी भक्त की रक्षा हेतु उसी क्षण व्याघ्र के रूप में प्रकट हो गये।
हे नारद! जब उसने वहाँ शिवजी को उपस्थित देखा तो यह इच्छा प्रकट की कि मैं शिवजी को भी निगल जाऊँ। यह विचारकर वह जैसे ही शिवजी की ओर बढ़ा, बैसे ही शिवजी ने अत्यन्त क्रोध में भरकर उसे पकड़ लिया और अपनी मुष्टिका द्वारा उसे मार डाला, इस प्रकार शिव-भक्त के प्राण बच गये। दुन्दुभि के मारे जाने पर जो घोर-शब्द हुआ था, उसे सुनकर शिवभक्त की आँखें खुल गयीं। तब उसने शिवजी की अत्यन्त प्रशंसा की। उस समय सभी काशीवासी उस स्थान पर आकर एकत्र हो गये तथा दुन्दुभि को मरा हुआ देखकर अत्यन्त प्रसन्न हो, शिवजी की स्तुति करने लगे।
उन्होंने शिवजी को प्रणाम करने के उपरान्त कहा-हे प्रभो! आप अब इसी स्वरूप में यहीं स्थित रहें तथा 'व्याघ्र' नाम से प्रसिद्ध होकर अपनी काशी नगरी की रक्षा करें। हम सबलोग आपके दर्शनों से अत्यन्त प्रसन्न हुए हैं।
हे नारद! उनकी प्रार्थना को सुनकर शिवजी ने 'एवमस्तु' कहा तदुपरान्त बोले-हे भक्तो! जो व्यक्ति निश्चयपूर्वक एवं विश्वासपूर्वक मेरे स्वरूप का ध्यान धरेगा, मैं उसके सम्पूर्ण दुःखों को दूर किया करूँगा। जो व्यक्ति मेरे इस चरित्र का स्मरण करके युद्ध करने के लिए जायेगा, उसे अवश्य ही विजय प्राप्त होगी। शिवजी के मुख से यह वचन सुनकर सब लोगों को अत्यन्त प्रसन्नता हुई।
उसी समय मैं तथा विष्णुजी भी सब देवताओं सहित वहाँ जा पहुँचे और शिवजी की स्तुति करते हुए कहने लगे-हे प्रभो! दुन्दुभि को मारकर आपने तीनों लोकों की तथा हमारी रक्षा की है। हम सब आपके सेवक हैं और आप हमारे स्वामी हैं। यह सुनकर शिवजी ने प्रसन्न हो, हमलोगों को अभयदान दिया। तदुपरान्त वे अपने उसी लिंग में, जो 'व्याघेश्वर' नाम से प्रसिद्ध है, प्रवेश करके अन्तर्धान हो गये। तब मैं, विष्णुजी तथा सभी देवता अपने-अपने लोक को लौट आये और काशीवासी भी अपने-अपने घर चले गये।
॥ उत्पल तथा विदल नामक दैत्यों का वृत्तान्त ॥
इतनी कथा सुनाकर ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! एक उत्पल एवं विदल नामक दो महा बलवान दैत्य उत्पन्न हुए। वे दोनों वन में पहुँचकर बहुत वर्षों तक उग्र तपस्या करते रहे। उन्होंने मेरा ध्यान धरते हुए, एक पाँव से खड़े होकर बहुत समय व्यतीत किया।
उस समय मैं प्रसन्न होकर, वरदान देने के लिए बोला-हे भक्तो! मैं तुम्हारी तपस्या से अत्यन्त प्रसन हूँ। अब तुम मुझसे इच्छित वरदान माँग लो। यह सुनकर उन दोनों भाइयों ने कहा-हे ब्रह्मन्! आप हमें यह वरदान दीजिये कि हम किसी भी पुरुष के हाथ से न मारे जायँ। यह सुनकर मैंने शिवजी का ध्यान धरते हुए "एवमस्तु' कहा तथा अपने स्थान को लौट आया।
मुझसे वरदान प्राप्त कर लेने के कारण वे महाबली अजेय हो गये। उन्होंने अपने बल द्वारा तीनों लोकों को जीत लिया और देवताओं को बहुत दुःख दिया। उन्होंने देवताओं के अधिकार, धन एवं सब प्रकार की वस्तुओं को छीन लिया और निर्भय होकर तीनों लोकों पर अपना शासन करने लगे। जब उनके अत्याचार बहुत अधिक बढ़ गये, तब सब देवता और मुनि अत्यन्त दुःखी होकर मेरी शरण में आये और मुझसे यह कहने लगे कि हे ब्रह्मन्! आप इन दुष्टों के हाथों से हमारी रक्षा करें, अन्यथा हमलोग कहीं के भी नहीं रहेंगे।
यह सुनकर मैंने उन्हें उत्तर दिया-हे देवताओ! वे दोनों दैत्य मेरे वरदान के कारण अजेय हैं। केवल शिवजी के द्वारा ही मृत्यु को प्राप्त हो सकते हैं। तुमलोग शिवजी का ध्यान धरो।
हे नारद! यह सुनकर सब देवता आदि अपने स्थान को चले गये। तुदपरान्त एक दिन तुम उन दैत्यों के पास जा पहुँचे तुमने उनकी बहुत प्रशंसा की और यह कहा कि गिरिजा परम सुन्दरी हैं, जब तक वे तुम्हें प्राप्त नहीं हो जातीं, तब तक तुम्हारा राज्य, कोष आदि सब कुछ निष्फल है। इतना कहकर तुम तो वहाँ से चले आये और उन दैत्यों ने यह विचार किया कि किसी न किसी प्रकार हम गिरिजी को अवश्य छीन लावें।
बहुत समय तक वे यही विचार करते रहे कि हम किस उपाय का आश्रय लें, जिससे गिरिजा हमारे हाथ आ जायें। उनकी इस मनोभिलाषा को शिवजी भी जान गये। तब उन्होंने एक विचित्र लीला ऐसी रच दी, जिसके अनुसार उन दोनों दैत्यों की मृत्यु हो गयी। वह लीला यह थी कि एक दिन शिवजी अपने गणों के साथ कोई खेल खेलने लगे और। गिरजा भी अपनी सखियों के साथ गेंद का खेल खेलने लगीं।
उसी समय भाग्यवश वे दोनों दैत्य श्री गिरिजा को प्राप्त करने की इच्छा से आकाशमार्ग द्वारा उस स्थान पर जा पहुँचे। वहाँ जाकर उन्होंने अपना स्वरूप शिवगणों जैसा बनाया और गिरिजा के समीप पहुँच कर, यह इच्छा प्रकट की कि उन्हें वहाँ से भगा ले जायें।
हे नारद! उनकी इच्छा को जानकर, शिवजी ने संकेत द्वारा गिरिजा से यह कहा कि ये दोनों हमारे गण नहीं हैं, अपितु दैत्य हैं। ये किसी पुरुष द्वारा नहीं मारे जायेंगे, अतः तुम्हीं इनका संहार कर डालो। शिवजी के उस संकेत को समझकर गिरिजा ने उन दोनों को मारने का निश्चय किया और अपनी गेंद को उन दोनों के ऊपर फेंक दिया।
गेंद के लगते ही वे दोनों दैत्य चक्कर खाते हुए पृथ्वीपर गिर पड़े और मृत्यु को प्राप्त हो गये। उस समय विष्णुजी, मैं तथा अन्य सब देवता उस स्थान पर पहुँच गये, जहाँ ज्येष्ठेश्वर उपलिंग है। वहाँ हमने शिवजी तथा गिरिजाजी की स्तुति करते हुए कहा-हे संसार के माता-पिता! आप अपने भक्तों के निमित्त अनेक प्रकार की लीलाएँ किया करते हैं। इस समय भी यह 'गयन्दकेश' नामक आपका लिंग प्रकट हुआ है।
आप सदैव इसी प्रकार हमलोगों पर कृपा बनाये रहें तथा दुष्टों का संहार करते रहें। इस प्रकार प्रार्थना कर सब देवता अपने स्थानों को लौट गये। और शिवजी का वह लिंग उसी स्थान पर स्थित रहा।
हे नारद! उस शिवलिंग की सेवा करने से दोनों लोकों में अपार आनन्द मिलता है। वह लिंग 'पुण्डलेश' के नाम से भी प्रसिद्ध है। शिवजी के इस चरित्र को जो कोई सुनता अथवा सुनाता है, उसे दोनों लोकों में अत्यन्त आनन्द प्राप्त होता है। जो लोग शिवजी के चरणों का ध्यान धरते हुए, उनकी लीलाओं को भक्तिपूर्वक सुनते हैं, उनकी तीनों व्याधियाँ नष्ट हो जाती हैं और उन्हें अपार धन की प्राप्ति होती है।
॥ इति श्रीशिवपुराणे श्रीशिववलासे ब्रह्मा-नारद-सम्वादे दीक्षितकृत भाषायां पंचमो खण्ड समाप्तः ॥ 51 ॥
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