प्रभुं प्राणनाथं विभुं विश्वनाथं 
जगन्नाथनाथं सदानन्दभजाम्। 
भवद्भव्य भूतेश्वरं भूतनाथं 
शिवं शङ्करं शम्भुमिशानमिडे ॥ 


गले रुण्डमालं तनौ सर्पजालं 
महाकालकालं गणेशाधिपालम्। 
जटाजूट भङ्गोत् तरङ्गैर् विशालं
शिवं शङ्करं शम्भूमिशानमिडे ॥ 


मुदामाकरं मण्डनं मण्डयन्तं 
महामण्डलं भस्म भूषाधरं तम्। 
अनादिं ह्यपरं महामोहमारं 
शिवं शंकरं शम्भुमिशानमिडे ॥ 


ततधोनिवासं महाट्टा ट्टहासं 
महापापनाशं सदा सुप्रकाशम्। 
गिरीशं गणेशं सुरेशं महेशं 
शिवं शंकरं शम्भुमिशानमिडे ॥ 


गिरीन्द्र अत्मजा संगृहितार्ध देहं 
गिरौ संस्थितं सर्वदासन्न गेहम्। 
परब्रह्म-ब्रह्मादिभि-र्वन्द्यमानं 
शिवं शंकरं शम्भुमीशानमिडे ॥ 


कपालं त्रिशूलं कराभ्यां दधानं 
पदम्भोजनम्राय कामं ददानम्। 
बलिवर्द यानं सुराणां प्रधानं 
शिवं शंकरं शम्भुमिशानमिडे ॥ 


शरच्चन्द्रगात्रं गुणानन्दपात्रं 
त्रिनेत्रं पवित्रं धनेशस्य मित्रम्। 
अपर्णाकलत्रं चरित्रं विचित्रं 
शिवं शंकरं शम्भूमिशानमिडे ॥ 


हरं सर्पहारं चिताभूविहारं 
भवं वेदसारं सदा निर्विकारम्। 
श्मशाने वसन्तं मनोजं दहन्तं 
शिवं शंकरं शम्भुमिशानमिडे ॥


स्तवं यः प्रभाते नरः शूलपाणेः
पठेत् सर्वदा भर्ग भावा नुरक्तः।
स पुत्रं धनं धान्य मित्रं कलत्रं
विचित्रः समासाद्य मोक्षं प्रयाति ॥


॥ इति शिवाष्टक स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

॥ शिवाष्टकम् २ ॥

तस्मै नमः परमकारण कारणाय 
दीप्तो ज्ज्वल ज्वलित पिङ्गललोचनाय।
नागेन्द्रहार कृत कुण्डल भूषणाय ब्रह्येन्द्रविष्णुवरदाय नमः शिवाय ॥

श्रीमत्प्रसन्न शशिपन्नग भूषणाय
शैलेन्द्रजा वदन चुम्बित लोचनाय।
कैलास मन्दर महेन्द्रनि केतनाय
लोक त्रयार्ति हरणाय नमः शिवाय ॥ 

पद्मा वदात मणि कुण्डल गो वृषाय
कृष्णा गरु प्रचुर चन्दन चर्चिताय।
भस्मा नुषक्त विकोचोत्पल मल्लिकाय
नीलाब्ज कण्ठ सदृशाय नमः शिवाय ॥

लम्बत्स पिङ्गल जटा मुकुटोत् कटाक्ष
दंष्टा कराल विकटोत् कट भैरवाय ।
व्याघ्रा जिनाम् बरधराय मनोहराय
त्रैलोक्य नाथ नमिताय नमः शिवाय ॥

दक्ष प्रजापति महा मख नाशनाय
क्षिप्रं महा त्रिपुर दानव घातनाय ।
ब्रह्मोर् जितोर्ध्यग करोटि निकृन्तनाय
योगाय योग नमिताय नमः शिवाय ॥ 

संसार सृष्टि घटना परिवर्तनाय
रक्षः पिशाचगण सिद्ध समाकुलाय।
सिद्धो रग ग्रहगणेन्द्र निषेविताय
शार्दूल चर्म वसनाय नमः शिवाय ॥

भस्माङ्ग राग कृत रूप मनोहराय
सौम्या वदात वनमाश्रित माश्रिताय ।
गौरी कटाक्ष नयनार्ध निरीक्षणाय 
गोक्षीर धार धवलाय नमः शिवाय ॥

आदित्य सोम वरुणा निल सेविताय
यज्ञाग्नि होत्र वर धूम निकेतनाय ।
ऋक् सामवेद मुनिभिः स्तुति संयुताय
गोपाय गोप नमिताय नमः शिवाय ॥

शिवाष्टाक मिदं पुण्य यः पठेच्छिव सन्निधि ‌।
शिवलोक मवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥


॥ इति श्रीमच्छराचार्यविरचितं शिवार्क सम्पूर्णम् ॥