सुतजी बोले-हे ऋषियो! इतनी कथा सुनकर नारदजी ने ब्रह्माजी से कहा-हे पिता! अब आप मुझे यह बताइये कि सती ने दूसरा अवतार किस प्रकार लिया, उनका विवाह शिवजी के साथ किस प्रकार हुआ और उहोंने अर्द्धांगिनी नाम किस प्रकार पाया ? इसके अतिरिक्त आप मुझे शिव-पार्वती की अन्य लीलाओं को भी सुनायें, क्योंकि शिव-चरित्र सुनने ने मेरी तृप्ति नहीं होती है।
इसके विपरीत यह इच्छा अधिक बढ़ती जाती है कि मैं भगवान् शिव के चरित्र को निरन्तर सुनता रहूँ। नारदजी के मुख से यह वचन सुनकर ब्रह्माजी ने अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा-हे नारद! दक्ष-यज्ञ में भस्म होने से पूर्व सती ने शिवजी से यह वरदान मांगा या कि मुझे आपके चरणों की भक्ति सदैव प्राप्त हो और आप की प्रीति भी मेरे ऊपर कभी कम न हो। इतना कहकर उन्होंने अपने शरीर को भस्म कर दिया, तदुपरान्त मैना के गर्भ से दूसरा जन्म लिया।
यह सुनकर नारदजी बोले-हे पिता! मैं मैना को नहीं जानता हूँ। आप विस्तारपूर्वक यह बताने की कृपा करें कि मैना किसकी पुत्री थी और किसके साथ विवाह हुआ था । ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! उत्तर दिशा की ओर सम्पूर्ण पर्वतों का राजा हिमालय नामक पर्वत है। वह पर्वत प्रदेश अत्यन्त रमणीक है। उसी हिमालय प्रदेश के एक देश में, एक राजा राज्य करता था। उसके राज्य की शोभा का किसी भी प्रकार वर्णन नहीं किया जा सकता।
वहाँ बिना तेल के ही दीपक जलते हैं और वहाँ के निवासी अपने घरों में देवदारु की लकड़ी जला कर प्रकाश करते हैं। वहाँ की बर्फ पत्थर की शिला के समान कठोर होती है जिसके ऊपर लोग चलते हैं। यदि कोई छोटा मनुष्य भी वहाँ जा पहुँचता है तो वहाँ के निवासी उच्च्यद वाले व्यक्ति भी, उसका आदर तथा सम्मान करते हैं।
उस पर्वत पर ऐसी गायें हैं कि लोग उनकी पूँछ का मोरछल बनाते हैं और वे वन में निर्भय होकर स्वच्छन्द विचरण किया करती हैं। वहाँ की स्त्रियाँ भी निर्भय होकर स्वच्छन्द जहाँ भी चाहें, वहाँ घूमती रहती हैं। सहस्त्रों प्रकार के सुगन्धित पुष्प वहाँ सर्वत्र खिले रहते हैं।
हे नारद! अब मैं तुमसे उस पर्वत की श्रेष्ठता का वर्णन करता हूँ, जिस प्रकार कि उसने मेरे द्वारा उच्च पद प्राप्त किया। सर्वप्रथम जब मैंने यह विचार किया कि पर्वतों का राजा किसे बनाना चाहिए तब मैंने हिमालय पर्वत में सम्पूर्ण लक्षण देखकर, उसे राजा बनाना निश्चित किया, क्योंकि वह पर्वतराज विष्णु के अंश से उत्पन्न हुआ है। उसका सम्पूर्ण शरीर देवताओं के समान सुन्दर है तथा उसका स्वरूप सत्पुरुषों के समान है। वह विशाल शरीरधारी, पुष्ट, परमतेजस्वी, निष्पाप तथा बहुत बुद्धिमान है और वह अपने समान आप ही है।
वह न तो औरों को दिखाई देता है और न कोई उसके पास पहुँच ही सकता है। पर्वतों का स्वामी होने के पश्चात् वह नीतिपूर्वक राज्य करता हुआ, प्रजा का पालन करने लगा। उसकी प्रजा भी शुद्ध आचरणों वाली तथा व्रत-नियमों को धारण कर धर्म-मार्ग पर सदैव दृढ़ रहती थी। जिस प्रकार सूर्य पृथ्वी से रस लेता है तथा वर्षा द्वारा पुनः उसी को दे देता है, उसी प्रकार वह राजा भी अपनी प्रजा से जो कर लेता था, उस सब को उसी की भलाई में व्यय कर देता था।
हे नारद! हिमाचल सम्पूर्ण राज्य लक्षणों को धारण किये हुए था। वह परम शास्त्रज्ञ, बुद्धिमान, तथा दूरदर्शी था। वह चिकित्सा तथा उपाय से रहित होकर अपने शरीर का पालन करता था और किसी कार्य में शीघ्रता नहीं दिखाता था। वह दूसरों के आनन्द के लिए धन संचित करता था और इसलिए मौन रहता था कि अधिक न बोलने से श्रेष्ठ बुद्धि की प्राप्ति होती है।
शक्तिशाली होते हुए भी वह दयावान रहता था। त्याग तथा सन्तोष की कीर्ति का प्रकाश बढ़ाकर, उसने अहंकार से अपना सम्बन्ध तोड़ लिया था। यद्यपि वह युवा था तो भी वृद्ध पिता की भाँति अपनी पुत्ररूपी प्रजा का उदारतापूर्वक पालन करता था। वह दंड देने योग्य व्यक्तियों को इसलिए दंड देता था ताकि धर्म स्थिर बना रहे। वह प्रत्येक विद्या तथा गुण का ज्ञाता था। उसके राज्य में चोरों ने चोरी करना छोड़ दिया और वे वेद की आज्ञानुसार चलने लगे। उसके मित्र उसके प्रति हृदय मैं सच्चा स्नहे रखते थे। उसके राज्य में किसी को कष्ट नहीं था।
हे नारद! उस श्रेष्ठ राजा के विवाह के लिए सब देवताओं ने उद्योग किया। उन्होंने अपने मनोरथ की पूर्ति के हेतु पितरों से कहा कि आप अपनी बड़ी पुत्री, जिसका नाम मैना है, उसका विवाह हिमाचल के साथ कर दीजिये। ऐसा करने से देवताओं के अनेक कार्य सिद्ध होंगे तथा सबलोगों के दुःख दूर हो जायेंगे। अपनी पुत्रियों के शाप का स्मरण कर, पितारों ने देवताओं की यह बात स्वीकार कर ली तथा एक शुभ लग्न में मैना का विवाह हिमाचल के साथ कर दिया।
विवाह में आनन्द-मंगल की जो-जो रीतियां होती हैं, वे सब यथाविधि सम्पन्न हुई। उस विवाह को देखकर मुझे, विष्णुजी को तथा देवताओं को यह समझ कर विशेष प्रसन्नता हो रही थी कि इसके घर में जो पुत्री उत्पन्न होगी वह भगवान् सदाशिव को ब्याही जायेगी। विवाह हो जाने के उपरान्त हिमाचल मैना को साथ ले अपने घर को लौट गये।
॥ मैना तथा उसकी बहिनों को सनत्कुमार का शाप ॥
सूतजी बोले-हे शौनकादि ऋषियो! इतनी कथा सुनने के पश्चात् नारदजी ने ब्रह्माजी से इस प्रकार कहा-हे पिता! यह वृत्तान्त सुनकर मेरे मन में एक सन्देह उत्पन्न हुआ है, अतः आप उसका निराकरण कर दें। आप मुझे यह बताने की कृपा करें कि मैना की कितनी बहनें और थीं ? क्योंकि आप अभी यह बता चुके हैं कि मैना अपनी बहिनों में सबसे बड़ी थी। आप यह भी बताइये कि उन बहिनों को किसने शाप दिया था ?
यह सुनकर ब्रह्माजी बोले-हे नारद! मेरे पुत्र दक्ष प्रजापति ने सर्वप्रथम बहुत से पुत्र उत्पन्न किये, परन्तु उनके द्वारा दक्ष को आनन्द लाभ ने हुआ, क्योंकि वे मुक्ति पाकर परमपद को जा पहुँचे। तब यह देखकर दक्ष प्रजापति ने सात कन्याएँ उत्पन्न कीं और उनका विवाह चन्द्रमा आदि के साथ कर दिया। यह वृत्तान्त पहिले भी सुना चुका हूँ। दक्ष की उन पुत्रियों में एक लड़की का नाम 'स्वधा' था। उसका विवाह पितरों के साथ हुआ। स्वधा के गर्भ से तीन कन्याओं ने जन्म लिया। उनमें सबसे बड़ी का नाम मैना, मझली का नाम धन्या, तथा छोटी का नाम कलावती था।
हे नारद! प्रातःकाल के समय जो मनुष्य इनका नाम लेता है, उसके सम्पूर्ण मनोरथ पूरे होते हैं। इनके शुद्ध चरित्र को सुनने से आनन्द की प्राप्ति होती है, क्योंकि तीनों लोकों में सम्मान प्राप्त करने वाली ये इसी योग्य हैं। एक दिन की बात है कि तीनों कन्याएँ श्वेतद्वीप में जाकर, क्षीर समुद्र के निकट भगवान् विष्णु के समीप जा पहुँचीं और वहाँ विष्णुजी के दर्शन करने के उपरान्त उनकी स्तुति करके, उनकी आज्ञा से वहीं एक स्थान पर बैठ गयीं।
कुछ देर पश्चात् मेरे पुत्र सनकादिक भी वहाँ जा पहुँचे। उन्होंने दूर से ही भगवान् विष्णु को प्रणाम किया। सनकादिक को आते देखकर वहाँ उपस्थित सभी लोग उठकर खड़े हो गये तथा सम्मानपूर्वक उन्हें प्रणाम करने लगे। लेकिन हे नारद! वे तीनों कन्याएँ अपने स्थान पर ज्यों की त्यों बैठी रहीं। उन्होंने न तो सनकादिक को प्रणाम किया और न उनका सम्मान ही किया ।
हे नारद! दूसरों को दोष भले ही दे दिया जाय, परन्तु सत्य बात तो यह है कि शिवजी की जो इच्छा होती है, वही होता है। भगवान् सदाशिव की आज्ञा को ही भाग्य अथवा कर्म कहते हैं। उन तीनों कन्याओं को देखकर सनत्कुमार को बहुत क्रोध हुआ। यद्यपि वे लोग बुद्धिमान, निरहंकार तथा परमहंस हैं, उस समय शिवजी की माया में पड़कर वे अपने ज्ञान को भुला बैठे। भला, तीनों लोकों में ऐसा कौन है, जो शिवजी की माया तथा इच्छा पर विजय प्राप्त कर सके ?
सनत्कुमार ने उनको सम्बोधित करके कहा-अरी! तुम तीनों बहनें परम मूर्ख हो। तुम वेद के आशय को नहीं समझ पायी हो और तुमने यह बात नहीं जानी है कि ब्राह्मण समस्त प्राणियों द्वारा पूजा जाने योग्य हैं। तुमने अहंकार के वशीभूत हो, मनुष्यों के समान अपने मार्ग को त्याग दिया है और हमारा बहुत निरादर किया है, अतः हम तुम्हें यह शाप देते हैं कि तुम देवभूमि स्वर्ग को त्यागकर, मनुष्यों के देश में जाकर रहो।
हे नारद! इस शाप को सुनकर वे तीनों आश्चर्यचकित रह गयीं और सनत्कुमार की प्रार्थना करती हुई बोलीं-हे मुनि! हमसे यह बड़ा भारी अपराध हुआ जो आपका सम्मान नहीं किया। वास्तव में यह अपराध हमसे मनुष्य के समान ही बन पड़ा है। उसका फल भी हम प्राप्त कर चुकी हैं। अब हम आप से यह प्रार्थना करते हैं कि आप हमें यह वरदान दें कि जिस समय हमारा पाप नष्ट हो जाय, तब हम फिर इसी स्वरूप को प्राप्त कर लें।
उनके इन विनीत वचन को सुनकर सनत्कुमार अत्यत प्रसन्न हुए, और बोले-हे कन्याओ! तुम्हारी प्रार्थना सुनकर हमारे मन का क्षोभ दूर हो गया है,हम प्रसन्न होकर तुम्हें यह वर देते हैं कि तुम में जो सबसे बड़ी कन्या है, वह विष्णु के अंश से उत्पन्न पर्वतरात हिमाचल की पत्नी होगी और उसके गर्भ से जो लड़की उत्पन्न होगी, वह शिवरानी होकर अपने कुटुम्ब के लोगों का सब पाप नष्ट कर देगी।
मंझली कन्या का विवाह त्रेतायुग में राजा जनक के साथ होगा। उसके गर्भ से सीता का जन्म होगा, जो भगवान् रामचन्द्र के साथ ब्याही जायेंगी। तीसरी बहन का विवाह द्वापरयुग में वैश्य वर्ण वृषभानु के साथ होगा। उसकी पुत्री राधा भगवान् श्रीकृष्ण की प्रेयसी होंगी। इस प्रकार तुम तीनों ही पुनः अपनी गति को प्राप्त होकर, स्वर्ग में आ पहुँचोगी। इतना कहकर सनकादिक वहाँ से चले गये। तब वे तीनों कन्याएँ भी अपने पिता के घर लौट आयीं।
इतनी कथा को सुनकर नारदजी ने पूछा-हे पिता! इसके बाद क्या हुआ, वह आप मुझसे कहिये ?ब्रह्माजी बोले-हे पुत्र! अब मैं आगे का यह वृत्तान्त भी कहता हूँ, जिसे सुनकर भगवान् सदाशिव के चरणों में भक्ति उत्पन्न होती है।
॥ देवताओं द्वारा हिमाचल को, सती को कन्या रूप में प्राप्त करने के हेतु युक्ति बताना ॥
ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! जब हिमाचल विवाह करके अपने घर लौटे उस समय उनके राज्य में बहुत आनन्द मनाया गया। ब्राह्मणों की सेवा करके उन्हें दान-दक्षिणा देकर बहुत प्रसन्न किया गया। तदुपरान्त देवता तथा ऋषि, मुनि आदि अपने मनोरथों की प्राप्ति के लिए हिमाचल के समीप पहुँचे। हिमाचल ने सबका स्वागत सत्कार करते हुए कहा-आज मेरा अहोभाग्य है जो आप सबने यहाँ पधारकर मेरे घर को पवित्र किया है।
अब आप मुझे अपना सेवक जानकर कोई आज्ञा दीजिये। हिमाचल के इन विनम्र वचनों को सुनकर देवताओं ने अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा-हे हिमाचल! हमलोग तुम्हारे पास इसलिए आये हैं कि तुम्हारे, द्वारा देवताओं के कार्य की सिद्धि होगी। तुम यह तो जानते हो कि सती ने दक्ष के यज्ञ में अपना शरीर त्याग दिया था। अब तुम ऐसा उपाय करो, जिससे वे तुम्हारी कन्या बनकर पुनः जन्म लें। ऐसा करने से तो आनन्द प्राप्त होगा ही, तीनों लोकों का भी कल्याण होगा।
हे नारद! इस प्रकार हिमाचल को युक्ति बताने के उपरान्त सब देवता भगवती जगदम्बा की शरण में गये और उनकी बहुत प्रकार से स्तुति-प्रशंसा करन लगे। उस समय आदिशक्ति ने अपने पूर्णस्वरूप को प्रकट कर उन्हें दर्शन दिया। वे भगवती श्रेष्ठ रथ पर विराजमान थीं और उसके शरीर से करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाश निकल रहा था। जब देवता उनके तेजस्वी स्वरूप के तेज को सहन करने में असमर्थ हुए, तब भगवती जगदम्बा ने कृपा करके उन्हें ऐसी शक्ति प्रदान की, जिससे वे स्थिर रह सकें।
भगवती महामाया के प्रकट होने पर देवता तथा ऋषि-मुनियों ने हाथ जोड़कर उनकी प्रार्थना करते हुए यों कहा-हे मातेश्वरी! आप सर्वश्रेष्ठ हैं। आपकी शरण में पहुँचे हुए जीव को कभी दुःख प्राप्त नहीं होता। हे जगदम्बे! अब हम आपकी शरण में आये हैं, आप हमारे मनोरथों को पूर्ण करें अर्थात् पृथ्वी पर दूसरा जन्म लेकर शिवरानी का पद ग्रहण करें, जिससे सब देवताओं का दुःख दूर हो तथा ब्रह्मा एवं विष्णु को भी प्रसन्नता प्राप्त हो। इसके अतिरिक्त सनत्कुमार जो भविष्यवाणी कर चुके हैं, उसको पूर्ण करना भी आपका ही कार्य है। आप हमारी इस प्रार्थना को अवश्य स्वीकार करने की कृपा करें।
हे नारद! देवताओं द्वारा की गयी इस प्रार्थना को सुनकर भगवती जगदम्बा ने अत्यन्त प्रसन्न होकर मधुर वाणी में कहा- हे देवताओ! हमारी अपनी भी यही इच्छा थी। अब हम तुम्हारी प्रार्थना को स्वीकार कर अवश्य ही अवतार लेंगे। हिमाचल तथा मैना हमें प्राप्त करने के लिए तप कर रहे हैं। उनसे बड़ा भक्त अन्य कोई नहीं है। अतः उन्हीं के घर हम प्रकट होंगी। अब तुम सबलोग हमारे कथन पर विश्वास रखकर, अपने-अपने घरों को जाओ।
हम तुम्हारे दुःख को अवश्य ही दूर करेंगे। और सुनो, हम तुम पर एक गुप्त रहस्य और प्रकट किये देती हूं। वह यह है कि शिवजी ने भी हमारे दुबारा अवतार लेने के लिए अनेक उपाय किये हैं। जब से हमने दक्ष प्रजापति के यज्ञ में शरीर त्यागा है, तब से वे संसार से विरक्त होकर हमारे वियोग में अत्यन्त दुखी हैं।
उन्होंने हमारे शरीर की भस्म को अपने शरीर में मल रखा है और हमारी हड्डियों की माला को कण्ठ में पहन रखा है। हमारे वियोग-दुख में दुःखी होकर बे अब तक अकेले ही वनों में भ्रमण करते रहते हैं और देवताओं की सभा में नहीं गये हैं। तुम अपने मन में किसी भी प्रकार का सन्देह मत करो। तुम्हारे सम्पूर्ण दुःख अवश्य ही दूर हो जायेंगे। इतना कह कर भगवती जगदम्बा अन्तर्धान हो गयीं। तब सब देवता भी उन्हें प्रणाम करके अपने-अपने घर लौट गये। हे नारद! इस चरित्र को जो कोई सुनेगा अथवा सुनायेगा, उसे परम पद की प्राप्ति होगी और उसके यहाँ धन, सन्तान आदि की निरन्तर वृद्धि होती रहेगी।
॥ मैना सहित हिमाचल की तपस्या का वर्णन ॥
ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! हिमाचल ने अब अपनी पत्नी मैना को देवताओं की आज्ञा सुनायी तो मैना को बहुत प्रसन्नता हुई। तदुपरान्त दोनों पति-पत्नी गृहस्थ धर्म का अति उत्तम रीति से पालन करने लगे। मैना ने शिवजी की सेवा-पूजा आरम्भ कर दी तथा प्रतिदिन उन्हीं कार्यों में अपना समय व्यतीत करने लगी, जिनके करने से शिवजी प्रसन्न होते हैं। दोनों पति-पत्नी शिव तथा शिवरानी के स्मरण एवं ध्यान में मग्न हो गये।
हे नारद! शिवजी के भक्त परम धन्य हैं। वे लोक तथा परलोक में अत्यन्त आनन्द तथा पुण्य प्राप्त करते हैं तथा अपने कुल को ही नहीं, अपितु औरों को भी मुक्त कर देते हैं। हिमाचल ने भगवती जगदम्बा की आराधना आरम्भ की और मैना से भी यह कहा कि तुम अपनी तपस्या द्वारा आदिशक्ति तथा शिवजी को प्रसन्न करने का उपाय करो। इस प्रकार वे दोनों शिव तथा शक्ति की उपासना करने लगे।
हे नारद! उन दोनों ने शिव तथा शक्ति की उपासना करने के अतिरिक्त अन्य सब कार्यों को भुला दिया। वे अष्टमी के दिन व्रत रखते तथा शिवजी का पूजन किया करते थे। श्रावण मास में शिव व्रत रखने के उपरान्त उसकी पूर्णता के निमित्त गंगा तट पर बसे औषधप्रस्थ देश में जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने शिवलिंग की स्थापना कर, तपस्या करना आरम्भ किया।
उस तप की अवधि बीस वर्ष की थी। उस बीच में उन्होंने कभी बिना अन्न-जल ग्रहण किये और कभी केवल वायु का ही भक्षण करते हुए, शिव तथा शक्ति का विधिवत् पूजन किया। जब वह तपस्या पूर्ण हुई, तब भगवती उमा ने प्रकट होकर उन्हें अपना दर्शन देकर कृतार्थ किया।
उनका शरीर सजल मेघ के समान श्रेष्ठ श्यामवर्ण था तथा आठ हाथ और तीन आँखें थीं। वे सब प्रकार के वस्त्राभूषणों से अलंकृत थीं। हे नारद! तब उन भगवती ने प्रकट होकर मैना से कहा-हे मैना! तुम अपने मनोरथ को प्रकट करो, जो चाहो, माँग लो।
हे नारद! जब मैना ने अपने नेत्र खोलकर भगवती जगदम्बा के स्वरूप को देखा तो उसे अत्यन्त प्रसन्नता हुई। उसने हाथ जोड़कर स्तुति करते हुए कहा-हे माता! मेरे धन्य भाग्य हैं, जो मुझे आज आपके दर्शन प्राप्त करने का यह सौभाग्य प्राप्त हुआ है। मैं इस समय आपकी कुछ स्तुति करना चाहती हूँ परन्तु हे माता! न तो मुझे कुछ ज्ञान ही है और न मैं विद्या ही जानती हूँ, जिससे अपनी इस अभिलाषा को पूर्ण कर सकूँ।
यह जानकर भगवती महामाया ने मैना के शरीर से अपने हाथ से स्पर्श करा दिया, जिसके कारण उसे उसी समय श्रेष्ठ ज्ञान की प्राप्ति हुई। तब वह अत्यन्त प्रेममग्न होकर अपनी आँखों से अश्रुवर्षा करने लगी। उस समय उसने ऐसे कठिन शब्दों से युक्त श्रेष्ठ पदावली में जगदम्बा की स्तुति की, जिसे बड़े-बड़े विद्वान भी अच्छी तरह नहीं समझ सके। उस स्तुति को सुनकर भगवती ने कहा- हे मैना! जो व्यक्ति इस स्तुति को सुनेगा अथवा पढ़ेगा, वह अपने सम्पूर्ण मनोरथों को प्राप्त करेगा तथा संसार में स्त्री, पुत्र, धन आदि प्राप्त करके, अन्त में मेरे लोक में आवेगा।
भगवती महामाया के इन कृपापूर्ण वचनों को सुनकर मैना ने हाथ जोड़कर कहा-हे मातेश्वरी! तीनों लोकों में ऐसी कौन सी वस्तु है, जिसे आप न दे सकती हों ? अब मेरी आप से यही प्रार्थना है कि सर्वप्रथम मेरे गर्भ से अत्यन्त वीर, धीर तथा गुणी सौ पुत्रों का जन्म हो। वे ब्रह्मज्ञानी होकर अपने कुल का मान बढ़ायें तथा दोनों वंशों को मुक्ति देने वाले सिद्ध हों।
तदुपरान्त मेरे गर्भ से एक कन्या का जन्म हो, जो सब बातों में आपके समान ही हो। तीनों लोकों में उसके समान और कोई न हो और वह देवताओं की दुःखरूपी जड़ को काटने में कुल्हाड़ी के समान सिद्ध हो सके।
मैना की इस प्रार्थना को सुनकर भगवती जगदम्बा ने मुस्कुराकर कहा-हे मैना! तुम्हारी बुद्धि को धन्य है, जो तुमने ऐसा वर माँगा है। मैं तुम्हें इच्छित वर देती हूँ और यह बताती हूँ कि तुमने जिस प्रकार के सौ पुत्रों की कामना की है, वे तुम्हारे गर्भ से उसी रूप से जन्म लेंगे, अपने समान मैं स्वयं ही तुम्हारी मनोभिलाषा की पूर्ति के हेतु मैं स्वयं ही तुम्हारे घर में अवतार लूँगी।
इतना कहकर भगवती जगदम्बा अन्तर्धान हो गयीं। तब जिस दिशा की ओर वे अन्तर्धान हुई थीं, उस दिशा की ओर प्रणाम करने के पश्चात्, मैना भी अपने घर को लौट चली। जब उसने घर जाकर हिमाचल को सब वृत्तान्त सुनाया तो वे अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने मैना की बहुत प्रकार से प्रशंसा की। तदुपरान्त हिमाचल ने इस उपलक्ष्य में एक बहुत बड़ा उत्सव मनाया।
॥ शिव जी का दारुक वन में जाना तथा ब्राह्मणों के शाप से शिवलिंग का पतन होना॥
ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! जिस दिन से सती ने अपने शरीर को त्यागा था, उसी दिन से भगवान् सदाशिव अवधूत स्वरूप धारण कर, साधारण मनुष्यों के समान पत्नी वियोग से दुःखी हो, संसार में सब ओर भ्रमण करते रहे। वे परमहंस योगियों के समान नग्न शरीर, सर्वांग में भस्म मले हुए, मस्तक पर जटाजूट धारण किये, गले में मुण्डों की माला पहने हुए, भ्रमण करते रहे।
कुछ समय तक इस प्रकार भ्रमण करने के उपरान्त वे एक पर्वत की कन्दरा में जा बैठे और घोर तप करने लगे। अकेले रह जाने पर उन्होंने अनेकों प्रकार के कष्ट उठाये । एक दिन ये दिगम्बर वेषधारी शिवजी दारुक वन में जा पहुँचे। वहाँ उन्हें नग्नावस्था में देखकर, मुनियों की स्त्रियाँ उनके सुन्दर स्वरूप पर मोहित हो, काम के आवेग में उनसे लिपट गयीं।
यह देखकर सब मुनियों ने शिवजी को शाप दिया। उस शाप के कारण शिवजी का लिंग उनके शरीर से पृथक् होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा और उस समय तीनों लोकों में भारी हाहाकार मच उठा।
इस कथा को सुनकर नारद जी ने ब्रह्माजी से कहा-हे पिता! मैं चाहता हूँ कि आप शिवजी के चरित्र का विस्तार पूर्वक वर्णन करें। ब्रह्माजी बोले-अच्छा सुनो, जिस समय शिवजी दिगम्बर वेष में वन में भ्रमण कर रहे थे, उस समय ऋषि-मुनि तो कहीं अन्यन्त्र गये थे, केवल उनकी स्त्रियाँ ही घरों में थीं। उस कठिन अवस्था में भी शिवजी का स्वरूप इतना सुन्दर था कि उसे देखते ही सब ऋषि-पत्नियाँ उनके ऊपर मोहित हो, काम के वशीभूत हो गयीं।
वे आपस में एक दूसरी को सम्बोधित करती हुई यों बोलीं-हे सखी! उस स्त्री को बड़ी भाग्यवान् समझना चाहिए, जो इनके शरीर से जा लिपटें। इस प्रकार कहकर वे सब स्त्रियाँ काम के वशीभूत हो, हँसती, मुस्कुराती हुई शिवजी से जाकर लिपट गयीं। उसी समय उनके पति भी लौट कर वहाँ आ पहुँचे।
जब उन्होंन यह दृश्य देखा तो वे अत्यन्त क्रोध में भरकर शिवजी से कहने लगे-अरे मूर्ख! नारकी, अधर्मी, पापी, अनाचारी, तू यह कैसा पाप कर रहा है ? तूने वेद के विरुद्ध अधर्म को स्वीकार किया। तूने अपने इस स्वरूप द्वारा हमारी स्त्रियों के धर्म को बिगाड़ा है। हम तुझे यह शाप देते है कि तेरा लिंग पृथ्वी पर गिर पड़े।
हे नारद! उन ऋषियों के इस प्रकार कहते ही शिवजी का लिंग कटकर पृथ्वी पर गिर पड़ा और पृथ्वी को पार करता हुआ पाताल के भीतर जा पहुँचा। इधर लिंग-हीन हो जाने पर शिवजी भी अत्यन्त लज्जित हुए। फिर उन्होंने अपने स्वरूप को प्रलयकालीन रूप की भाँति महाभयानक बना लिया, यह भेद किसी पर प्रकट न हुआ कि शिवजी ने ऐसा चरित्र क्यों रचा था ?
शिवजी का लिंग जब गिर पड़ा, उसके पश्चात् तीनों लोकों में अनेकों प्रकार के उपद्रव उठने लगे, जिसके कारण सब लोग अत्यन्त भयभीत, दुःखी तथा चिन्तित हो गये। पर्वतों से अग्नि की लपटें उठने लगीं, दिन में आकाश से तारे टूट-टूट कर गिरने लगे, चारों ओर हाहाकार का शब्द भर गया, ऋषि-मुनियों के आश्रम में यह उत्पात सबसे अधिक हुए, इस भेद को कोई भी नहीं जान सका कि इन उपद्रवों का मूल कारण क्या है।
हे नारद! प्रत्येक मनुष्य को यह उचित है कि वह प्रत्येक कार्य को भली-भाँति सोच-समझ लेने के पश्चात् ही करे। जो मनुष्य विद्या पढ़कर अहंकारी हो जाते हैं, वे शिवजी को नहीं जान पाते और पीछे बहुत दुःख उठाते हैं। उन उपद्रवों के कारण घोर दुःख पाने के पश्चात् वे ऋषि- मुनि अपने स्थान को त्याग कर देवलोक में जा पहुँचे; परन्तु जब वहाँ भी उन्हें शान्ति न मिली तब वे सब देवताओं को लेकर मेरे पास आये।
उस समय इन्द्र आदि सब देवताओं ने मुझे प्रणाम करते हुए पूछा-हे प्रभो! जिन उपद्रवों के कारण तीनों लोक भस्म हुए जाते हैं, उनके उत्पन्न होने का वास्तविक कारण क्या है ? देवताओं की बात सुनकर मैंने बहुत विचार किया, वास्तविक रहस्य को नहीं समझ पाया। तब मैं उन सबको साथ लेकर विष्णुलोक में जा पहुँचा।
वहाँ भगवान् विष्णु को प्रणाम करने के पश्चात् मैंने उनसे उन उत्पातों का कारण पूछा। मैं बोला-हे प्रभो! पृथ्वी में भूकंप, उल्कापात तथा पर्वतों का जलना क्यों हो रहा है ? आप कृपापूर्वक इसका कारण बताइये तथा जैसे हो, इन उपद्रवों को शान्त कर दीजिये, जिससे तीनों लोक इस घोर दुःख से मुक्ति प्राप्त कर सकें।
॥ लिंग धारण करने के हेतु देवताओं द्वारा शिव की प्रार्थना ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! मेरी यह प्रार्थना सुनकर भगवान् विष्णु ने कहा-हे ब्रह्मन्! मैंने दिव्यदृष्टि द्वारा उन उत्पातों का जो कारण जाना है, उसे तुमसे कहता हूँ। आश्चर्य की बात तो यह है कि बुद्धिमान् लोग भी पशुओं के समान मूर्ख बन बैठे और उन्होंने निन्दनीय कर्म कर डाला। तुम्हारे साथ जो ऋषि-मुनि आये हैं, यह सब इन्हीं की मूर्खता का परिणाम है। इन्होंने अपनी स्त्रियों को काम के वशीभूत हो, शिवजी के शरीर से लिपटे हुए देखकर, अपने ब्रह्मतेज का प्रदर्शन किया, जिसके कारण शिवजी का लिंग पृथ्वी पर गिर पड़ा है।
जबसे वह लिंग गिरा है, तभी से यह सब उपद्रव उठ रहे हैं। अब हम को उचित है कि हम सब भगवान् सदाशिव की शरण में चलें और उनसे क्रोध शान्त कर लेने की प्रार्थना करें। हे ब्रह्मन् ! जब तक वे अपने लिंग को पुनः धारण नहीं कर लेते, तब तक किसी को भी चैन नहीं मिलेगा। इतना ही नहीं, यदि इस कार्य में अधिक विलम्ब हुआ तो सर्वत्र प्रलय का दृश्य उपस्थित हो जायेगा।
इतना कहकर विष्णुजी हम सबको साथ लेकर शिवजी के पास पहुँचे और उनकी अनेक प्रकार से स्तुति करते हुए इस प्रकार कहने लगे-हे प्रभो! आप हमारे ऊपर कृपा करके अपने लिंग को पुनः धारण करें। विष्णुजी की यह प्रार्थना सुनकर शिवजी ने अत्यन्त लज्जित होकर कहा-हे विष्णो! इसमें इन मुनियों तथा देवताओं का कोई दोष नहीं, यह चरित्र तो हमने अपनी इच्छा से ही किया है।
जब हम बिना स्त्री के हैं, तब फिर हमें लिंग धारण करने की आवश्यकता ही क्या है ? तुम हमें इसी दशा में रहकर आनन्द प्राप्त करने दो। भगवान् सदाशिव के मुख से यह वचन सुनकर सब देवताओं ने उनकी स्तुति करते हुए कहा-हे प्रभो! यद्यपि हमें आपके सम्मुख धृष्टता करनी उचित नहीं है, तो भी हम आपसे यह प्रार्थना करते हैं कि सतीजी ने हिमाचल के घर फिर से जन्म लिया है और वे तपस्या करके अपकी अर्द्धांगिनी होंगी। आपको उचित है कि आप अपने लिंग को पुनः धारण कर लें।
यह सुनकर शिवजी ने कहा-हे देवताओ तथा मुनियो! यदि तुम हमारे लिंग की पूजा करना स्वीकार करो, तो हम पुनः अपने लिंग को ग्रहण कर सकते हैं और तभी सृष्टि को आनन्द प्राप्त हो सकता है। भगवान् शिव के श्रीमुख से निकले हुए इन वचनों को सुन मैंने, विष्णुजी ने तथा अन्य सभी देवताओं एवं ऋषि-मुनियों ने उनसे कहा-हे प्रभो! हम सब आपके लिंग की पूजा करेंगे आप उसे धारण कर लें।
इन शब्दों को सुनकर शिवजी उसी समय अन्तर्धान हो गये। तब लोगों ने पाताल के नीचे पहुँच कर शिवजी के लिंग का पूजन किया। सर्वप्रथम विष्णुजी ने, तदुपरान्त मैंने, फिर इन्द्र ने, इसी प्रकार क्रमानुसार सब देवताओं तथा ऋषि मुनियों ने शिवलिंग की पूजा की। उस पूजा में अनेक प्रकार के उत्सव हुए तथा आकाश से पुष्पवर्षा हुई।
उस समय शिवजी ने अपने लिंग से प्रकट होकर हँसते हुए कहा-हे देवताओ तथा मुनियो! हम तुम्हारी पूजा से अत्यन्त प्रसन्न हुए। अब तुम जो चाहो, वह वर माँग लो। यह सुनकर हमने उनसे प्रार्थना की-हे प्रभो। आप तीनों लोकों को अभयदान देकर, अपने लिंग को पुनः धारण कर लीजिये। तदुपरान्त आप हम लोगों को यह वर दीजिये कि हम सब अहंकार रहित होकर, आपकी भक्ति करते रहें। यह सुनकर शिवजी ने 'एवमस्तु' कहते हुए अपने लिंग को पुनः धारण कर लिया।
हे नारद! इस चरित्र के पश्चात् मैंने तथा विष्णुजी ने एक उत्तम तथा पवित्र हीरे को लेकर शिवलिंग के समान एक मूर्ति का निर्माण किया और उस मूर्ति को उसी स्थान पर स्थापित कर दिया। तदुपरान्त मैंने सब लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा-इस हीरकेश शिवलिंग का जो भी व्यक्ति पूजन करेगा, उसे लोक तथा परलोक में अत्यन्त आनन्द प्राप्त होगा।
उस शिवलिंग के अतिरिक्त हमने वहाँ और भी शिवलिंग की स्थापना की। तदुपरान्त हम सब शिवजी के उस लिंगस्वरूप का ध्यान धरते हुए, अपने-अपने लोक को लौट आये। भगवान् सदाशिव भी प्रसन्न होकर अपने स्थान को चले गये।
वे भगवान् त्रिशूलपाणि अपनी इच्छानुसार कभी मुनियों के पास बैठकर ज्ञान चर्चा करते तथा कभी पर्वत पर चढ़कर सती के वियोग को भुला देने की चेष्टा में सलंग्न रहते थे। हे नारद! शिवलिंग पूजन की कथा को जो प्राणी मन लगाकर सुनता है, वह सदैव प्रसन्न रहता है। जो लोग शिवलिंग की पूजा करते हैं, वे अपने कुल सहित मुक्ति को प्राप्त करते है।
॥ भौम की उत्पत्ति का वर्णन ॥
इतनी कथा सुनकर नारदजी ने कहा-हे पिता! आपने शिव-चरित्र का वर्णन कर मुझे अत्यन्त प्रसन्नता प्रदान की है। अब आप शिवजी की अन्य कथाओं का भी विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये तथा उनके कैलाश पर्वत पर निवास करने का सब हाल सुनाइये। ब्रह्माजी बोले-हे नारद! कैलाश पर्वत पर पहुँच कर शिवजी ने सतीजी का स्मरण किया और वीरभद्र आदि गणों के सम्मुख सतीजी की महिमा का विविध प्रकार से वर्णन किया।
उन्होंने सांसारिक मनुष्यों को कामदेव की महिमा दिखाने के लिए सतीजी के वियोग में शोक प्रकट करते हुए, अनेक प्रकार के चरित्र दिखाये। तदुपरान्त वे बहुत समय तक एक ही आसन पर बैठकर, ध्यानमग्न हो गये। जब उन्होंने बहुत दिनों बाद उस समाधि का त्याग किया, उस समय उनके ललाट से कुछ पसीना पृथ्वी पर गिर पड़ा।
उसके द्वारा एक परम तेजस्वी पुरुष की उत्पत्ति हुई। उस पुरुष के चार हाथ थे। वह लाल वर्ण वाला, अपने कण्ठ में माला पहने तथा अत्यन्त शक्तिशाली था। उत्पन्न होते ही वह बालकों के समान रोने लगा।
हे नारद! उसे देखकर पृथ्वी ने अपने मन में यह विचार किया कि इस बालक का पालन-पोषण मुझे करना चाहिए; क्योंकि यह परम तेजस्वी प्रतीत होता है। शिवजी की अर्द्धांगिनी सतीजी अपना शरीर त्याग चुकी हैं ? अतः अब मेरे अतिरिक्त इसका पालन करने वाला और कौन है ? यह मेरे ऊपर उत्पन्न हुआ है, इसलिए मैं इसकी माता के समान हूँ और माता के समान ही मुझे इसका पालन-पोषण करना चाहिए।
यदि मैं स्त्री रूप धर कर इसका पालन नहीं करूँगी तो शिवजी मुझे अश्यव ही दण्ड देंगे। यह निश्चय कर पृथ्वी ने अपना स्वरूप स्त्रियों के समान बनाया। पृथ्वी का यह स्वरूप अत्यन्त सुन्दर तथा पवित्र था। उसे देखकर यह प्रतीत होता था मानो कामदेव की पत्नी रति दूसरा अवतार ग्रहण किया हो अथवा भगवान् विष्णु ने फिर मोहिनी रूप धारण कर लिया हो।
ऐसा सुन्दर स्वरूप बनाकर पृथ्वी उस बालक के समीप जा पहुँची और उसे अपनी गोद में उठाकर तथा अपने स्तनों को उसके मुख से लगाकर, दूध पिलाने लगी। वह बार-बार उसे देखकर हँसती और उसका मुख चूमती थी। शिवजी ने जब पृथ्वी को इस रूप में देखा तो वे उनकी अभिलाषा जानकर मुस्कुरा पड़े।
फिर उसे सम्बोधित करते हुए बोले-हे पृथ्वी! तुम्हारा बड़ा भाग्य है, जो हमारा पुत्र तुम्हें दिखाई दिया। तुम प्रसन्नतापूर्वक इसका पालन करो। यद्यपि यह बालक हमारे पसीने से उत्पन्न हुआ है, तो भी यह तुम्हारे नाम से प्रसिद्ध होगा अर्थात् सब लोग इसे भौम कहकर पुकारेंगे। यह बालक तुम्हें अत्यन्त सुख प्रदान करेगा।
इस प्रकार पृथ्वी से कहकर, जब शिवजी ने उस बालक की ओर देखा तो उनके हृदय का शोक कुछ घट गया। तदुपरान्त पृथ्वी उस बालक को लेकर अपने घर लौट गयी और प्रसन्नतापूर्वक उसका पालन पोषण करने लगी। वह भौम नामक बालक शरद काल की रात्रि के समान निरन्तर वृद्धि को प्राप्त होने लगा। जब वह बड़ा हुआ तो शिवजी का पूजन करने के निमित्त मधुवन में जा पहुँचा और अत्यन्त भक्तिपूर्वक शिवजी की पूजा करने लगा।
उसने ग्रीष्म ऋतु में अग्नि सुलगाकर तथा शीत ऋतु में जल में बैठकर शिवजी की पूजा की। तीन करोड़ शिवलिंगों की स्थापना करके उसने श्रेष्ठ व्रत तथा नियमों द्वारा उनका पूजन किया। इस प्रकार कठिन तपस्या करने के उपरान्त जब वह एक स्थान पर निश्चित होकर बैठा, उस समय शिवजी ने अत्यन्त प्रसन्न होकर उसे अपने दर्शन प्रदान किये।
हे नारद! शिवजी के दर्शन प्राप्त कर भौम ने सर्वप्रथम अत्यन्त कठिन शब्दावली में रचित उनकी स्तुति की, तदुपरान्त यह कहा-हे प्रभो! मैं स्वयं आप से कुछ नहीं माँगना चाहता क्योंकि आप मेरे लिए जो भी उचित समझें, वह वरदान देने की कृपा करे। यह सुनकर शिवजी अत्यन्त प्रसन्न होकर बोले-हे भौम! तुम्हारी बुद्धि को धन्य है, तुम मेरी आराधना द्वारा भक्तिपद को प्राप्त कर चुके हो।
अब मेरी कृपा से तुम पवित्र मंगल ग्रह के रूप में प्रसिद्ध होगे और तुम्हारा स्थान सूर्य लोक में भी ऊपर होगा। तुम्हें सब प्रकार के आनन्द और प्रसन्नता की प्राप्ति होगी। इतना कहकर शिवजी अन्तर्धान हो गये।
तब भौम भी अपने लोक को जाकर परिवार सहित आनन्द करने लगा। हे नारद! शिवजी के इस पवित्र चरित्र को सुनने अथवा कहने से धन, सन्तान तथा सुख की प्राप्ति होती है एवं सम्पूर्ण प्रकार के रोग नष्ट हो जाते हैं।
॥ मैना के गर्भ से भवानी की उत्पत्ति का वर्णन ॥
नारदजी ने कहा-हे पिता! शिव-चरित्र को सुन-सुन कर मुझे अत्यन्त आनन्द प्राप्त होता है। अब आप कृपा करके यह वृत्तान्त सुनाइये कि हिमाचल की पत्नी मैना ने शिवजी से वरदान माँगने के उपरान्त क्या किया? यह सुनकर श्री ब्रह्माजी ने भगवान् सदाशिव का ध्यान धरने के उपरान्त कहा-हे पुत्र! जब मैना ने शिवजी से वरदान प्राप्त किया तथा शक्ति को अपने ऊपर प्रसन्न देखा, तब वह आनन्दित हो अपने घर लौट आयीं।
वहाँ सर्वप्रथम उसने एक सौ पुत्रों को जन्म दिया। वे सब 'मैनाक' तथा 'क्रौंच' आदि नाम से प्रसिद्ध हुए। उनके शरीर बहुत लम्बे थे। वे सब अत्यन्त बलवान्, बुद्धिमान् तथा गुणवान हुए। इसके पश्चात् सतीजी ने हिमाचल के हृदय में प्रवेश किया, ताकि उनके सब मनोरथ पूर्ण हो सकें। हिमाचल ने सतीजी के उस तेज को शुभ घड़ी प्राप्त कर मैना में स्थित कर दिया । जिस समय से सतीजी मैना के गर्भ में आयीं, उस समय से मैना का शरीर अत्यन्त तेजस्वी हो गया।
उस गर्भ को धारण कर मैना ऐसी सुन्दर तथा तेजस्विनी हो गयी, जैसी पहिले कभी नहीं थी। हिमाचल की यह अवस्था थी कि वे बारम्बार मैना के निकट पहुँचते तथा मैना की सखी-सहेलियों द्वारा यह पुछवाते कि उसे किसी वस्तु की आवश्यकता तो नहीं है। मैना लज्जित होकर कोई उत्तर नहीं देती थी, परन्तु वह जिस वस्तु की इच्छा करती वह स्वयं ही प्रकट हो जाया करती थी। ऐसी कोई भी वस्तु नहीं थी, जिसे प्राप्त करने में मैना को कभी कोई कठिनाई हुई हो।
हे नारद! मैना का गर्भ जितना अधिक बढ़ता जाता था, उतना ही उसका तेज भी अधिक होता जाता था। गर्भावस्था में जिन रीतियों तथा उत्सवों को करना उचित है, उन सबको हिमाचल ने बड़ी धूमधाम के साथ सम्पन्न किया। उन्होंने सब लोगों को इच्छानुसार दान दिया, तथा ब्राह्मणों, देवताओं एवं अतिथियों की भली-भाँति पूजा की। उन्हीं दिनों में, विष्णुजी तथा अन्य सब देवता शिवरानी की गर्भस्तुति करने हेतु हिमाचल के घर गये और अपने कर्त्तव्य को पूरा करने के उपरान्त लौट आये।
जब गर्भ के नौ महीने व्यतीत हुए और दसवाँ मास पूरा होने लगा, उस समय आकाश तथा पृथ्वी में शुभ शकुन होने लगे। आकाश पूर्णतः निर्मल हो गया और उसका प्रकाश बढ़ गया। सभी अशुभ ग्रह लुप्त हो गए। उस समय ऋषि-मुनि तथा देवता पुष्प वर्षा करने लगे एवं गन्धर्व, सिद्ध, चारण, किन्नर, अप्सरा तथा विद्याधर अपनी स्त्रियों सहित नाचने गाने लगे।
इस प्रकार मधुमास की शुक्लपक्ष नवमी को मृगशिरा नक्षत्र में अर्धरात्रि के समय भगवती महामाया ने उस अपार आनन्द के बीच मैना के गर्भ से पार्वतीरूप में जन्म ग्रहण किया। कालिका पुराण में भी यह कथा लिखी हुई है।
हे नारद! उस समय मैं तथा विष्णुजी, सब देवताओं सहित सम्पूर्ण सामग्रियों को साथ लेकर, हिमाचल के स्थान पर जा पहुँचे । हम सब ने अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार शिवरानी की स्तुति एवं प्रशंसा की। उस समय अनेक प्रकार के बाजे बज रहे थे तथा पुष्पवर्षा हो रही थी। देवताओं ने उन आदिशक्ति की स्तुति करते हुए इस प्रकार कहा-'हे जगदम्बे! आपकी जय हो। आप तीनों लोकों की माता तथा भगवान् भूतभावन की अर्द्धांगिनी हैं।
आप हमारी विपत्तियों का नाश करें, क्योंकि हमारे मन की कोई भी अभिलाषा आपसे छिपी नहीं है। हे आदिशक्ति! आपका तेज अपरिमित है। सृष्टि के सभी जीव आपके सेवक हैं। ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव आपके पुत्र कहे जाते हैं तथा तीनों गुणों की उत्पत्ति आप से ही हुई है। आप ब्रह्मस्वरूप आदिशक्ति बनकर सब जीवों में निवास करती हैं। तथा सबसे भिन्न रहती हैं।
वेदों ने आपकी महिमा का कुछ वर्णन किया है, परन्तु पार नहीं पाये हैं। नारद, शारद, शुक तथा सनकादिक बुद्धिमान् मुनि और देवता वाचाल होने पर भी आपकी महिमा का बहुत थोड़ा ही वर्णन कर सके हैं। उपनिषद् इस बात को कहते हैं कि यदि किसी मूर्ख पर भी आपकी कृपा हो जाय तो वह आपकी स्तुति करने में समर्थ हो सकता है।
आप अपने भक्तों को मुक्ति प्रदान करती हैं तथा करोड़ों कलाओं को अपने वश में किये रहती हैं। आप अहंकार को नष्ट करने वाली हैं। वेद और वेदान्त सबमें आपही सन्निहित हैं। हे भगवती! आपके सहस्त्रों नाम हैं, जिनका वर्णन करना वाणी की सामर्थ्य से परे है। इस प्रकार बहुत स्तुति करने के उपरान्त सब लोग अपने-अपने घर को लौट गये।
॥ गिरिजा की बाल लीलाओं का वर्णन ॥
इतनी कथा सुनकर नारदजी ने कहा-हे पिता! अब मेरी यह अभिलाषा है कि भगवती महामाया के जन्म के पश्चात् का वृतान्त आप मुझे सुनाने की कृपा करें। उन्होंने हिमाचल के घर में रह कर जो बाल-लीलाएँ कीं, उन सब को सुनाकर, आप मुझे प्रसन्नता प्रदान कीजिये।
देवर्षि नारद की यह प्रार्थना सुनकर ब्रह्माजी बोले-हे पुत्र! जब भगवती महामाया ने अवतार ग्रहण किया और सब देवता उनकी स्तुति-प्रशंसा करने के उपरान्त अपने-अपने स्थान को लौट गये, उस समय हिमाचल ने बड़ी धूमधाम से अपनी पुत्री का जन्म-महोत्सव मनाया।
मैना उन्हें आदिशक्ति का अवतार पहिचान कर अत्यन्त प्रसन्न हुई। उस समय भगवती जगदम्बा ने भी अष्टभुजी स्वरूप धारण कर मैना को अपना दर्शन देकर कृतार्थ किया। हे नारद! उस स्वरूप का वर्णन करना अत्यन्त कठिन है। वे भगवती आठ भुजाएँ, तीन नेत्र एवं ज्योतिपूर्ण वस्त्रालंकारों को धारण किये हुए थीं।
मैना ने जब उनको इस स्वरूप में देखा तो उनकी बहुत प्रकार से स्तुति-प्रशंसा करते हुए यह कहा-हे भगवती! आपने अत्यन्त कृपा करके मेरे घर में अवतार लिया है। मेरी यही प्रार्थना है कि आपका यह स्वरूप मेरे हृदय में सदैव स्थित रहे। अब आप कृपा करके पुनः अपना बालस्वरूप धारणकर मुझे सुख पहुँचाइये।
हे नारद! मैना की प्रार्थना सुनकर भगवती महामाया ने उसे सान्त्वना देते हुए कहा-हे मैना! मैंने इस समय यह स्वरूप केवल इसीलिए धारण किया है ताकि तुम्हारे हृदय में यह विश्वास हो सके कि मैं वही देवी हूँ, जिसे तुमने वरदान प्राप्त करते समय देखा था। अब तुम अपने मन में निश्चिन्त हो जाओ।
इतना कहकर भगवती जगदम्बा ने पुनः बाल-स्वरूप धारण कर लिया और नवजात शिशु की भाँति रुदन करने लगीं। उस समय स्त्रियाँ मैना के समीप आ इकट्ठी हुईं। कन्या का जन्म देखकर उन सबको अत्यन्त प्रसन्नता हुई। हिमाचल को भी उस समय बहुत हर्ष हुआ। तदुपरान्त वे पुरोहित, गुरु, ब्राह्मण तथा ऋषि-मुनियों को साथ लेकर घर के भीतर पहुँचे।
उस समय ऋषि-मुनियों ने उस कन्या को देखकर कहा-हे पर्वतराज ! तुम्हारे घर आदिशक्ति ने अवतार लिया है। यह सुनकर हिमाचल ने अत्यन्त प्रसन्न हो, ब्राह्मण तथा भिक्षुकों को बहुत-सा धन दान में दिया। नगर की सब स्त्रियाँ भी उस समय अपने-अपने श्रृंगार सजाकर बधावा देने के लिए मैना के समीप आ पहुँचीं। हिमाचल ने रीतिपूर्वक सम्पूर्ण संस्कारों को सम्पन्न किया, तदुपरान्त ब्राह्मणों ने उस कन्या के नाम गिरिजा, काली आदि रखे।
हे नारद! बालस्वरूपा शिवरानी ने संसारी लड़कियों की भाँति ही अनेक चरित्र करके माता-पिता को प्रसन्न करना आरम्भ किया। ज्यों-ज्यों उनकी आयु बढ़ती जाती थी, वे विविध प्रकार के चरित्रों द्वारा सबको प्रसन्नता प्रदान करती थीं। वे कभी गोद में लिपट कर मुस्कुरातीं, कभी अपनी तुतली वाणी से ऐसी बातें कहती थीं, जिनको सुनकर माता-पिता को अत्यन्त प्रसन्नता प्राप्त होती थी।
कुछ समय में ही उन्हें उमा, शिवा आदि नामों से भी पुकारा जाने लगा। बड़ी होकर जब उन्होंने तपस्या करने के लिए वन में जाने का विचार किया, उस समय मैना ने चिन्तित होकर उन्हें नहीं जाने दिया। पर्वतराज हिमाचल यद्यपि अनेक सन्तानों के पिता थे, तो भी उनका सबसे अधिक प्रेम गिरिजा पर ही रहता था।
गिरिजा दिन-प्रतिदिन चन्द्रमा की कला की भाँति बढ़ती जाती थीं। कभी वे कौड़ियों का खेल खेलतीं और कभी गंगाजी के जल में विहार किया करती थीं। संसारी रीति के अनुसार उन्होंने विद्याध्ययन भी प्रारम्भ किया और कुछ ही समय में सम्पूर्ण विद्याओं का ज्ञाता हो गयीं।
हे नारद! बाल्यावस्था व्यतीत हो जाने पर जब उन्होंने युवावस्था में प्रवेश किया, उस समय उनकी सुन्दरता का वर्णन किसी भी प्रकार नहीं किया जा सकता। वे ऐसी अनन्यस्वरूपा थीं कि उन्हें उत्पन्न करने के पश्चात् मैं उन जैसी सुन्दरता अन्य किसी भी प्राणी को प्रदान नहीं कर सका। मानो गिरिजा को उत्पन्न करने के पश्चात् मेरा सृष्टि-रचना का सम्पूर्ण परिश्रम सफल हो गया हो।
जिन लक्ष्मीजी को मैंने अत्यन्त प्रेमपूर्वक समुद्र से निकाला था, उन्हें भी गिरिजा के समान कहते हुए मुझे लज्जा का अनुभव होता है। गिरिजा के समान अन्य किसी को न पाकर मैं उन्हें केवल निरूपमेय कहकर ही मौन हो जाता हूँ। तीनों लोकों में उन जैसी अन्य कोई नहीं है।
मेरी पत्नी तो किसी भी प्रकार उनके समक्ष नहीं ठहर सकती। लक्ष्मी मैं चंचलता का अवगुण है, अतः उन्हें गिरिजा के समान नहीं कहा जा सकता। रति तथा भगवान् विष्णु के मोहिनी रूप की महिमा भी उनके सौन्दर्य के समक्ष नहीं ठहर पाती, इसलिए यही कहना उचित है कि वे अपनी उपमा आप ही थीं।
॥ गिरिजा के स्वयंवर में देवताओं के आगमन की कथा ॥
सूतजी ने कहा-हे ऋषियो! इतनी कथा सुनकर नारदजी ने ब्रह्माजी से कहा-हे पिता! जिस प्रकार आपने भगवती गिरिजा की सुन्दरता का वर्णन किया, उसी प्रकार उनके विवाह का चरित्र भी मुझे सुनाने की कृपा करें।
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! शिवजी तथा शिवरानी की लीलाएँ परम आश्चर्यजनक हैं। वे तीनों लोकों के स्वामी हैं। अतः तुम्हें उचित है कि तुम सन्देह रहित होकर उनकी सम्पूर्ण कथाओं में विश्वास रखो। अब मैं तुम्हें उनके विवाह का चरित्र सुनाता हूँ। कुछ लोगों का यह कहना है कि गिरिजा का विवाह स्वयंवर के रूप में हुआ, परन्तु कल्पभेद के अनुसार गिरिजा के विवाह की कथाएँ अलग-अलग प्रकार से हैं।
एक कथा यह है कि शिवजी दिगम्बर वेष में भिक्षुक स्वरूप धारण कर हिमाचल के द्वार पर विवाह करने के लिए आये थे। उस समय वे बैल पर आरूढ़ थे और शुक्र तथा शनिश्चर नामक देवता उनके साथ थे। अन्य देवता उनके साथ तो थे, परन्तु वे प्रत्यक्ष दिखाई नहीं देते थे। इस प्रकार विवाह के निमित्त पधारकर, सर्वप्रथम शिवजी ने हिमाचल के अहंकार का नाश किया, तदुपरान्त वे बारात सजाकर विवाह करने को पधारे और गिरिजा को अंगीकार किया।
हे नारद! कुछ आचार्यों का कहना है कि शिवजी ने गिरिजा की तपस्या से प्रसन्न होकर उनके साथ विवाह करना स्वीकार किया और बारात लेकर हिमाचल के घर जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने अनेकों प्रकार की लीलाओं के द्वारा सब लोगों को सुख पहुँचाया तथा मैना के भ्रम को नष्ट किया। इन अनेक प्रकार की कथाओं का कारण एक तो कल्पभेद है और दूसरा यह है कि शिवजी के प्रति जिसकी जैसी प्रीति होती है, उसे वैसा ही चरित्र दिखाई देता है।
इन बातों पर किसी प्रकार की शंका अथवा विचार करना ठीक नहीं हैं। सर्वप्रथम मैं स्वयंवर कथा का वर्णन करता हूँ। जिससे विष्णु के गणों तथा देवताओं की बुद्धि कुण्ठित हो गयी थी। वह कथा इस प्रकार है-
एक दिन हिमाचल ने यह देखा कि गिरिजा युवावस्था को प्राप्त हो चुकी हैं, तब उसने अपने भाई-बन्धुओं को बुलाकर यह कहा कि तुम लोग गिरिजा के अनुरूप किसी देवता को देखकर, उसके साथ गिरिजा का विवाह कर दो; क्योंकि पिता का धर्म यही है कि वह अपनी पुत्री के युवा हो जाने पर किसी श्रेष्ठ वर के साथ उसका विवाह करके अपने ऋण से उऋण हो जाय।
उन्हीं दिनों मैना ने भी हिमाचल को अपने निकट बुलाकर यह कहा कि हे पति! गिरिजा युवावस्था को प्राप्त हो चुकी है, आप उसके लिए कोई श्रेष्ठ वर ढूँढ़ें। उन्होंने यह भी कहा कि गिरिजा मुझे अत्यन्त प्रिय है, अतः इसके लिए कोई ऐसा योग्य वर ढूँढ़ें जो सब प्रकार से प्रशंसा का पात्र हो ।
हे नारद! मैना की बात सुनकर हिमाचल अत्यन्त प्रसन्न हो, घर के बाहर निकले और राज्यसभा में पहुँचकर मन्त्रियों से इस प्रकार कहने लगे-हे मन्त्रियो! आप मेरी पुत्री के योग्य किसी उचित वर की तलाश करें। उस समय मन्त्रियों ने यह सम्मति दी-हे राजन् ! राजकन्या के विवाह के लिए आप एक ऐसे स्वयंवर का आयोजन करें, जिसमें ब्रह्मा, विष्णु आदि सभी दिक्पाल भी सम्मिलित हों।
सर्वप्रथम आप उस स्वयंवर के समय गिरिजा को प्रत्येक विवाहेच्छु पुरुष के नाम, गुण आदि के सम्बन्ध में सूचित करें, तदुपरान्त उसका स्वरूप दिखाएँ। उस समय गिरिजा जिसके कण्ठ में वरमाला डाल दे, उसी के साथ गिरिजा का विवाह कर जाय।
मन्त्रियों की इस सम्मति को सुनकर हिमाचल का अत्यन्त प्रसन्नता हुई। तब उन्होंने स्वयंवर की तिथि निश्चित कर, सब लोगों के पास निमन्त्रण-पत्र भेज दिये। हे नारद! गिरिजा के स्वयंवर का समाचार प्राप्त कर सभी देवता हिमाचल के नगर में जा पहुँचे। मैं, विष्णु, इन्द्र, सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि तथा अन्य दिक्पाल भी अपनी-अपनी बारात सजा कर, बड़ी धूमधाम से हिमाचल के यहाँ गये।
हे नारद! हम सब लोगों को देखते ही हिमाचल ने अगवानी करते हुए, सबका अत्यन्त आदर-सत्कार किया। तदुपरान्त स्तुति एवं प्रशंसा करके, रहने के लिए श्रेष्ठ निवास दिया। उसने अन्य सब देवताओं की भी बहुत सेवा की। जब हम लोग स्वयंवर स्थल में जा पहुँचे तो उस विचित्र मण्डप को देखकर हमें अत्यन्त आनन्द हुआ।
हमलोग परस्पर बातें करते हुए कहने लगे- देखें, आज गिरिजा किस पर प्रसन्न होती हैं और किसे उनके साथ विवाह करने का सौभाग्य प्राप्त होता है ? कोई कहता-वे विष्णुजी को स्वीकार करेंगी और कोई अन्य देवता का नाम लेता था। बीच-बीच में सब लोग यह भी कहते जाते थे कि गिरिजा का विवाह जिसके साथ होगा, उसी को हम सब अपने से उत्तम और प्रधान पुरुष समझ लेंगे।
वे लोग जो विवाह देखने की इच्छा से ही आये थे, वे कह रहे थे कि हम तो गिरिजा का विवाह देखने आये हैं, अतः उनका विवाह किसी के साथ क्यों न हो, हम तो उस आनन्द को देखकर ही कृतार्थ हो जायेंगे।
॥ विष्णु आदि देवताओं, मणुष्यों तथा पर्वतों का स्वयंवर में पहुँचना ॥
ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! उस समय हिमाचल ने स्वयंवर-सभा में अनेक स्वर्ण-सिंहासन रखवा दिये तथा उन्हें सब प्रकार से सुसज्जित करके सब लोगों के पास यह सन्देश भिजवाया कि वे स्वयंवर-सभा में आ विराजें। उस सन्देश को सुनकर प्रत्येक व्यक्ति बड़ी धूमधाम से स्वंयवर-मण्डप में जा पहुँचा।
इन्द्र ऐरावत हाथी पर सवार होकर आया, विश्वानर के पुत्र अग्नि अपने गणों के साथ बड़ी सजधजपूर्वक आये, इसी प्रकार विष्णु, दिक्पाल, वरुण, कुबेर, यमराज, सूर्य तथा चन्द्रमा आदि भी सभा में पहुँचकर अपनी-अपनी चौकियों पर बैठ गये। मैं भी अपने हंस पर बैठकर उस स्वयंवर-सभा में पहुँचा। वहाँ मैंने यह देखा कि विष्णुजी चतुर्भुज रूप धारण किए, पीत वस्त्र पहने, रत्नालंकारों से सुसज्जित हो, सभा में बैठे हुए हैं।
कोई भी देवता ऐसा न था, जो वहाँ दिखाई न पड़ रहा हो। मेरी, विष्णुजी की तथा अन्य सभी लोगों की यह इच्छा थी कि गिरिजा का विवाह केवल हमारे साथ ही हो। सम्पूर्ण पर्वत अर्थात् कनकगिरि, देवकूप, विन्ध्य पर्वत, त्रिकूट, करवीर, चित्रकूट आदि भी उस सभा में आये थे और समुद्र के जीव भी मनुष्यों का स्वरूप धारण कर आ पहुँचे थे।
तात्पर्य यह कि प्रत्येक लोक, प्रत्येक द्वीप, प्रत्येक दिशा तथा प्रत्येक नगर से आये हुए जीव उस स्वयंवर-सभा में उपस्थित थे। उस मण्डप में सुख की सम्पूर्ण सामग्रियाँ उपस्थित थीं। वहाँ घण्टा, ढोल आदि विविध प्रकार के बाजे बज रहे थे तथा वेदपाठी जन वेद-मन्त्रो का उच्चारण कर रहे थे।
॥ गिरिजा का शिव जी को जयमाला पहिनाना ॥
ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! जब स्वयंवर-सभा में सब लोग यथास्थान आ विराजे, उस समय हिमाचल ने गिरिजा को यह आज्ञा दी कि अब तुम स्वयंवर-सभा में पहुँच कर, अपने अनुरूप पति का चुनाव कर लो। उस समय कुल की स्त्रियों ने गिरिजा का अनेक प्रकार से श्रृंगार किया तथा सभी ने यह प्रार्थना की कि गिरिजा का विवाह किसी श्रेष्ठवर के साथ हो। गिरिजा भगवान् सदाशिव का ध्यान धरती हुई स्वयंवर-सभा में आ पहुँचीं।
उस समय सहस्त्रों आँखें उनकी ओर उठ गयीं। विवाहेच्छु सभी व्यक्तियों ने उन्हें अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयत्न किया। उस समय सखियों ने सर्वप्रथम गिरिजा को इन्द्र के समीप ले जाकर खड़ा किया और उनका परिचय देते हुए बताया हे पार्वती! इनका नाम इन्द्र है। इन्होंने सहस्त्र यज्ञ किये हैं। जो व्यक्ति इनकी शरण में आ जाता है, उसकी ये सब प्रकार से रक्षा करते हैं।
इनका स्वरूप चन्द्रमा से भी अधिक सुन्दर है। इन्हें स्वीकार कर लेने पर तुम इन्द्राणी पद को प्राप्त करोगी तथा सब प्रकार के सुख-भोग तुम्हें हर समय उपलब्ध होते रहेंगे। हे गिरिजे ! तुम्हें उचित है कि तुम इनके साथ विवाह करना स्वीकार कर लो।
हे नारद! सखी की बातें सुनकर गिरिजा ने एक बार इन्द्र की ओर नीची दृष्टि डाली, तदुपरान्त उन्हें प्रणाम करती हुई चुपचाप आगे बढ़ गयीं। इसी प्रकार सखियों ने विष्णु आदि देवताओं की प्रशंसा करते हुए, उनमें से किसी को भी अपना पति चुन लेने की सलाह दी, लेकिन गिरिजा उन सबको प्रणाम करती हुई आगे बढ़ती गयीं।
जब वे मुझ पर तथा विष्णुजी पर भी प्रसन्न नहीं हुईं और वरमाला लेकर आगे बढ़ीं, उसी समय अचानक ही शिवजी उस स्वयंवर स्थल में आकाश से प्रकट होकर आ विराजे। उन्हें देखते ही गिरिजा के मुख पर प्रसन्नता चमक उठी और उन्होंने माला शिवजी के कंठ में डाल दी।
॥ बालरूप शिवजी द्वारा इन्द्र आदि देवताओं का गर्व दूर करना ॥
इस वृत्तान्त को सुनकर देवर्षि नारद ने ब्रह्माजी से कहा-हे पिता आप इस कथा का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये कि शिवजी वहाँ किस प्रकार प्रकट हुए और गिरिजा ने उनके कंठ में वरमाला किस लिए पहना दी ? ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! गिरिजा तो जन्म-जन्मान्तर से भगवान् शिव की संगिनी थीं। तब वह किसी अन्य को वरमाला किस प्रकार पहना देतीं ?
स्वयंवर-सभा में वे जिसके समीप पहुँचकर आगे बढ़ जाती थीं, वही अपने मन में अत्यन्त लज्जित होकर रह जाता था। इस प्रकार गिरिजा ने सब लोगों को सभा में देखा, वे किसी को भी देखकर प्रसन्न न हुई ? जब उन्हें वहाँ परब्रह्म शिवजी दिखाई न दिये तो उन्होंने अत्यन्त चिन्तित होकर यह विचार किया कि भला, क्या कारण है जो शिवजी अभी तक यहाँ नहीं पधारे हैं ?
उस समय उन्होंने मन ही मन शिवजी की बहुत प्रकार से स्तुति करते हुए यह कहा-हे प्रभो! मैं तो सदैव से आपकी हूँ, मेरे चाहे करोड़ों जन्म क्यों न बीत जायँ, परन्तु मैं आपके अतिरिक्त अन्य किसी के साथ विवाह न करूँगी। हे स्वामी! यदि मुझ से कोई अपराध बन पड़ा हो तो आप उसे क्षमा कर दें और मुझे इसी समय अपना दर्शन देकर कृतार्थ करें।
हे नारद! इस प्रकार मन ही मन प्रार्थना करती हुई जब गिरिजा भगवान् सदाशिव के प्रेम में मग्न हो गयीं; उसी समय शिवजी उनके आन्तरिक स्नेह को पहिचान कर वहाँ प्रकट हो गये। भगवान् शिवजी के तेज तथा स्वरूप को देखकर सभी सभासद् चकित रह गये। उन्हें कोई पहिचान भी नहीं पाया। शिवजी सब मनुष्यों के अहंकार का नाश करनेवाले हैं, उस समय उन्होंने यह लीला भी रची कि वे उस सभामंडप में एक सुन्दर बालक के रूप में प्रकट हुए।
भगवान् भूतभावन के उस रूप को पहिचानने में असमर्थ होने के कारण सब लोगों ने उन्हें एक साधारण बालक ही समझा और अपने पास से दूर हटा देना चाहा। जब वे भगाने पर भी नहीं भागे और निर्भय होकर अपने स्थान पर ही खड़े रहे, तब कुछ लोगों ने क्रुद्ध होकर यह चाहा कि उन्हें जान से ही मार डाला जाय। अपनी इच्छा की पूर्ति के हेतु पहिले तो कुछ देवताओं ने साधारण अस्त्र-शस्त्रों द्वारा उनके ऊपर प्रहार किया, परन्तु जब शिवजी के ऊपर उन शस्त्रों का कोई प्रभाव न हुआ, तो वे अपने तीक्ष्ण शस्त्रों द्वारा उन पर प्रहार करने की इच्छा करने लगे।
यह गति देखकर शिवजी ने उन सब की ओर ज्योंही अपनी आँखें उठाकर देखा तो उनके हाथ तथा शरीर जड़वत् हो गये और उस समय जो जैसे बैठा था, पत्थर की मूर्ति के समान उसी प्रकार बैठा रह गया।
हे नारद! इस स्थिति को देखकर विष्णुजी ने अपना सुदर्शन चक्र उनके ऊपर छोड़ा; परन्तु वह भी निष्फल हो गया। उस समय सब लोगों को मन में अत्यन्त आश्चर्य हुआ कि वह परम शक्तिशाली बालक कौन है; परन्तु शिवजी की माया में मोहित होने के कारण किसी को उनके वास्तविक भेद का पता न चल सका। शिवजी के इस चरित्र को देखकर गिरिजा मुस्कुराने लगीं।
उस समय जब मैंने शिवजी का ध्यान धरकर विचार किया तो यह जाना कि यह बालक और कोई नहीं, साक्षात् भगवान् सदाशिव ही हैं। उसी समय वे बालरूप भगवान् भूतभावन भी मेरी ओर देखकर हँस दिये। तब मैंने उनकी स्तुति करते हुए कहा-हे प्रभो! हमलोगों का इसमें कोई दोष नहीं है।
आपकी माया के वशीभूत होकर ही हम भगवती जगदम्बा को प्राप्त करने की इच्छा से यहाँ आये थे। अब आप हमें जो आज्ञा देंगे वह शिरोधार्य होगी। इसके उपरान्त मैंने गिरिजा की भी स्तुति करते हुए कहा-हे देवी! अब आप वह चरित्र कीजिये, जिससे हमलोगों की चिन्ता दूर हो। मेरे मुख से निकले हुए इन शब्दों को सुनकर भगवान त्रिशूलपाणि अत्यन्त प्रसन्न हुए।
तब उन्होंने अपनी माया को हमारे ऊपर से हटा लिया। उस समय चैतन्यता प्राप्त होने पर हम सब लोगों को उस बालक के स्थान पर साक्षात् सदाशिव खड़े हुए दिखाई दिये। उनका स्वरूप इतना सुन्दर था कि उसे देखकर करोड़ों कामदेव लज्जित हो जायें। वे मणि एवं स्वर्ण निर्मित आभूषणों को धारण किये हुए थे और ऐसे मनमोहक प्रतीत हो रहे थे जिसका वर्णन करना नितान्त असम्भव है।
॥ देवताओं की शिवजी से क्षमा प्रार्थना ॥
ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! भगवान् सदाशिव के उस स्वरूप को देखकर सभा में उपस्थित सभी लोगों ने अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार उनकी बहुत स्तुति की। विष्णुजी ने प्रार्थना करते हुए कहा-हे प्रभो! हम आपकी माया के वशीभूत होकर गिरिजा के साथ विवाह करने की इच्छा से यहाँ आये थे, सो आप हमारे अपराध को क्षमा करने की कृपा करें।
आप और गिरिजा जी सम्पूर्ण सृष्टि के माता-पिता हैं। आप हमें अपना बालक समझकर हमारे पाप को क्षमा कर दें। इसी प्रकार मैंने तथा इन्द्र, अग्नि, धर्मराज, निर्ऋति, वरुण, वायु, ईशान, कुबेर, शेष, दक्षप्रजापति आदि सिद्ध जन एवं हिमाचल आदि ने शिवजी की प्रार्थना करते हुए अपने अपराधों की क्षमा माँगी।
हे नारद! उस समय गिरिजा ने अपने पिता की आज्ञा प्राप्त कर, भगवान् सदाशिव के कंठ में वरमाला पहना दी। सब लोगों ने हर्ष में भर कर जय-जयकार की।
॥ शिव जी का कैलाश पर आना तथा देवताओं का अपने लोक को गमन ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! उस समय के आनन्द का वर्णन किस प्रकार किया जाय ? हम सबलोग गिरिजा तथा शिवजी के पीछे-पीछे चलने लगे। विष्णुजी उनके बायीं ओर थे और मैं दाहिनी ओर चल रहा था। अन्य सब देवता पीछे अपने हाथों में छत्र-चँवर उठाये चल रहे थे। कोई जय-जयकार कर रहा था तो कोई शंख आदि की ध्वनि द्वारा अपना उत्साह प्रकट कर रहा था।
इसी प्रकार सबलोग उनकी सेवा करने में संलग्न थे। अपने भाइयों तथा मित्रों सहित पर्वतराज हिमाचल भी हम लोगों के साथ चले। जिस समय सबलोग हिमाचल के नगर में पहुँचे, उस समय चारों ओर धूमधाम होने लगी। भगवान् सदाशिव के दर्शन प्राप्त करने के लिए नगर की सभी स्त्रियाँ अपने-अपने मकानों के ऊपर जा चढ़ीं। सबलोग अपने-अपने काम को छोड़कर शिवजी का दर्शन पाने के लिए दौड़ पड़े।
स्त्रियों की तो यह दशा थी कि जो काजल लगा रही थी, वह एक आँख में बिना काजल लगाये ही दौड़ी चली आयी। वे झरोखों के भीतर बैठी हुई शिवदर्शन करने में ऐसी मग्न थीं कि यदि किसी की धोती की गाँठ खुल गयी तो उस बात का उनको कोई ध्यान ही नहीं था। स्त्रियों की ऐसी दशा को देखकर शिवजी, विष्णुजी तथा हम बहुत हँसते चले जा रहे थे।
हिमाचल के घर पहुँचने पर शिवजी अपने नन्दी से नीचे उतरे। पर्वतराज ने सभी बारातियों को श्रेष्ठ स्थानों पर ठहराया और सबकी यथाशक्ति सेवापूजा की। उस समय शिवजी की आज्ञा से उनके वीरभद्र आदि गण भी कैलाश से चलकर उस स्थान पर आ पहुँचे।
उन गणों ने आकर हम सबको प्रणाम किया। तदुपरान्त हिमाचल की प्रार्थना स्वीकार कर शिवजी घर के भीतर गये। वहाँ हिमाचल के पुरोहित गर्ग ऋषि ने विवाह की सम्पूर्ण विधियों को सम्पन्न कराया। मैंने तथा विष्णुजी ने हवन के मंत्रों का उच्चारण किया। उस समय दोनों ओर से बहुत दान दिया गया।
जब शिवजी ने गिरिजा का हाथ अपने हाथ में लिया, उस समय के सुख का वर्णन किसी भी प्रकार नहीं किया जा सकता। उस अवसर पर जिसने जिस वस्तु की इच्छा प्रकट की, वह उसे प्राप्त हुई। जब भाँवरें पड़ चुकीं, तब शिवजी तथा गिरिजा को एक ही शैय्या पर बैठाया गया।
उस समय सब लोगों ने धन्य-धन्य का घोष कर, आकाश को गुंजा दिया। हिमाचल ने भगवान् भूतभावन को दहेज में बहुत-सा धन तथा वस्त्रालंकार प्रदान किये। फिर सब बारातियों को भोजन कराया। इस प्रकार जब विवाह हो चुका तो शिवजी वहाँ से चल कर अपने कैलाश पर्वत पर लौट आये। फिर हम सबलोग भी शिवजी की आज्ञा पाकर अपने-अपने लोक को लौट गये।
॥ अन्य रीति से शिव विवाह का वर्णन ॥
ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! अब मैं दूसरे प्रकार के शिवजी के विवाह का विस्तारपूर्वक वर्णन करता हूँ। वह इस प्रकार यह है कि जब गिरिजा युवावस्था को प्राप्त हुई तब मैना ने हिमाचल से यह कहा-हे पति! आप एक लाख पर्वतों के राजा हैं। आप जैसे श्रेष्ठ कीर्तिवाले हैं, उसी प्रकार गिरिजा के लिए भी किसी उत्तम वर को ढूंढ़िये।
हे स्वामी! हमारे पुत्र तो सौ हैं, परन्तु कन्या केवल एक ही है, इसके श्रेष्ठ भविष्य के हेतु हमें अच्छी से अच्छी जगह इसका विवाह करना चाहिए। हिमाचल ने उत्तर दिया- हे प्रिये! तुम निश्चित रहो। जो बर श्रेष्ठ होगा, उसी के साथ हम गिरिजा का विवाह करेंगे।
हे नारद! इतना कहकर हिमाचल अपनी राज्यसभा में आये और मन्त्रियों से विचार-विमर्श करने के उपरान्त अपने पुरोहित से बोले-हे पुरोहितजी! आप गिरिजा के लिए कोई योग्य वर ढूँढ़ने की कृपा करें। हिमाचल की बात सुनकर पुरोहित सर्वप्रथम इन्द्रलोक में गये। वहाँ इन्द्र की सुन्दरता को देखकर उन्हें अत्यन्त प्रसन्नता हुई और उनसे गिरिजा के विवाह की चर्चा छेड़ी।
उसे सुनकर इन्द्र ने उत्तर दिया-हे पुरोहित! गिरिजा ने तो शिवजी के लिए अवतार ग्रहण किया है। तुम ऐसी बातें करके हमें नकरगामी क्यों बनाना चाहते हो ? इन्द्र के यह वचन सुनकर पुरोहित अग्निलोक में गये। वहाँ भी उन्हें यही उत्तर सुनने को मिला। इस प्रकार वे जहाँ-जहाँ भी गये वहीं सबने गिरिजा को अपनी माता अनुमान कर पुरोहित के ऊपर क्रोध किया।
अन्त में सबके कहने से पुरोहित विष्णुजी के पास गये। विष्णुजी ने स्वयं गिरिजा के साथ विवाह करना स्वीकार न करके, पुरोहित को यह उत्तर दिया कि तुम हिमाचल से जाकर यह कहना कि वे गिरिजा से ही यह बात पूछें कि तुम्हारा पति कौन है। तब गिरिजा जिसे बतावे उसी के साथ हिमाचल उसका विवाह कर दें। विष्णुजी के मुख से यह शब्द सुनकर पुरोहित हिमाचल के पास लौट गये और उन्हें सब समाचार कह सुनाया। समाचार पाकर गिरिजा अत्यन्त प्रसन्न हुईं।
॥ हिमाचल द्वारा सभा में, गिरिजा से उनके पति के संबंध में प्रश्न ॥
ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! तब हिमाचल ने अपनी सभा में गिरिजा को बुलाया और जिस प्रकार विष्णुजी ने पुरोहित को बताया था, वह सब वृत्तान्त सुनाते हुए यह पूछा-हे पुत्री! तुम्हारा पति कौन है ? तुम उसे हमें बताओ तो हम उसी के साथ तुम्हारा विवाह कर देंगे। यह सुनकर गिरिजा ने लज्जित होते हुए उत्तर दिया-हे पिता! यदि आप शपथपूर्वक मेरी बात मानने के लिए तैयार हों तो मैं पुरोहित जी को अपने पति का नाम बता दूँगी।
उसी के अनुसार वे तिलक चढ़ा आवें। हिमाचल ने प्रसन्नतापूर्वक यह बात स्वीकार कर ली। तब गिरिजा ने पुरोहित को अलग ले जाकर कहा कि तीनों लोकों में सब से उत्तम जो कैलाश पर्वत है, वहाँ शिवजी निवास करते हैं। तुम वहीं जाकर उन्हें टीका चढ़ा आओ, क्योंकि मैं उन्हीं के साथ अपना विवाह करना चाहती हूँ।
हे नारद! यह सुनकर पुरोहित अपने साथ ही एक नाई को लेकर टीका चढ़ाने के लिए चल दिये परन्तु उन्होंने नाई को यह नहीं बताया कि वे किस व्यक्ति को टीका चढ़ाने के लिए जा रहे हैं। जब वे कैलाश पर्वत पर पहुँचे तो वहाँ एक वटवृक्ष के नीचे शिवजी को दूर से ही बैठे देखकर, उन्होंने प्रणाम किया।
उस समय शिवजी ध्यान-मग्न बैठे थे। वे दोनों भी कुछ दूरी पर चुपचाप बैठ गये। लेकिन थोड़ी देर बाद ही नाई ने क्रोध में भरकर पुरोहित से यह कहा-हे पुरोहितजी! तुम मुझे ऐसे निर्जन स्थान में क्यों ले आये हो ? यहाँ तो चारों ओर दैत्य ही दैत्य दिखाई पड़ते हैं। यहाँ प्राण बचना असम्भव है। तुम यहाँ से तुरन्त भाग चलो और गिरिजा के लिए कोई दूसरा पति ढूँढ़ो।
यह व्यक्ति तो गिरिजा का पति होने के सर्वथा अयोग्य है। नाई की बात सुनकर पुरोहित ने उसे डाँटते हुए कहा -अरे मूर्ख! तू चुप क्यों नहीं बैठा रहता ? इस प्रकार प्रलाप क्यों कर रहा है ? पुरोहित की इस दृढ़ता को देखकर तथा गिरिजा की प्रीति का स्मरण कर शिवजी ने अपनी समाधि खोली। उस समय पुरोहित हाथ जोड़कर उनके सामने जा खड़ा हुआ और बहुत प्रकार से स्तुति तथा प्रशंसा करने लगा।
हे नारद! पुरोहित ने गिरिजा के गुण तथा सौन्दर्य का वर्णन करते हुए शिवजी से कहा-हे प्रभो! गिरिजा आपके साथ विवाह करना चाहती है, अतः आप उसे स्वीकार करें। तब शिवजी ने उससे कहा-हे पुरोहित! तुम्हें ऐसी बात कहनी उचित नहीं है, क्योंकि हिमाचल की पुत्री के साथ सम्बन्ध करने के योग्य हम नहीं हैं। हिमाचल पर्वतों के राजा हैं तथा बहुत धनवान् हैं। इसके विपरीत हम निर्धन हैं।
मित्रता, शत्रुता, तथा विवाह अपने समान बल वालों के साथ करनी चाहिए। गिरिजा मुझे अपना पति बना कर कोई सुख नहीं पावेगी। बल्कि यों कहिये कि मेरी भाँग घोंटते समय उसे बहुत कष्ट उठाना पड़ेगा। वह राजपुत्री है, अतः उसका विवाह किसी राजा के साथ होना ही उचित है। दूसरी बात यह भी है कि मुझे तिलक चढ़ाने पर तुम्हें पुरस्कार में धन भी नहीं मिल सकेगा, क्योंकि हम तो दक्षिणा में थोड़ी-सी भस्म ही तुम्हें दे सकते हैं।
हे नारद! शिवजी की यह बात सुनकर पुरोहित ने उत्तर दिया हे प्रभो! यदि आपकी भस्म हमें मिल जाय तो इससे बढ़कर हमारे भाग्य और क्या होंगे ? अब आप कुछ और अधिक न कहकर, मुझे तिलक चढ़ाने दीजिये । इतना कहकर पुरोहित ने शिवजी के तिलक चढ़ा दिया। शिवजी को भी उस समय अत्यन्त प्रसन्नता हुई। परन्तु नाई को यह बातें अच्छी न लगीं। जब पुरोहित ने घर लौटना चाहा उस समय शिवजी ने उसे थोड़ी सी भस्म देकर उसे विदा कर दिया।
इसी प्रकार नाई को भी उन्होंने थोड़ी-सी भस्म दे दी। पुरोहित तो उस भस्म को पाकर बहुत प्रसन्न हुए, परन्तु नाई को अत्यन्त क्रोध आया। उसने पुरोहित से कहा-हे पुरोहितजी! तुमने राजा हिमाचल की पुत्री का तिलक एक अवधूत को चढ़ा दिया, इससे बढ़कर बुरी बात और क्या हो सकती है ? भला, तुमने किस लोभ में पड़कर ऐसा बुरा काम किया ?
यदि तुमने किसी राजा के यहाँ तिलक चढ़ाया होता तो हमारी राह इस प्रकार नहीं कटती, जैसी कि अब कट रही है। शिवजी ने तो केवल एक मुट्ठी भर राख दे दी है और मुँह से भी कुछ अच्छी बात नहीं कही। मेरे घर में तो ऐसी राख बहुत भरी पड़ी है। यदि तुम्हारे घर में न हो तो तुम भले ही ले जाओ। मुझे तो उन्होंने मार्ग का खर्च भी नहीं दिया। अब भला मैं किस प्रकार अपने घर तक पहुँचूँ ? पता नहीं, राजा हिमाचल इस वृत्तान्त को सुनकर क्या दंड देंगे ? मैं तो सारा दोष तुम्हारे ही सिर पर रख दूँगा, यह याद रखना। इतना कह कर नाई ने क्रुद्ध हो भस्म को खोलकर वहीं फेंक दिया।
हे नारद! जब पुरोहित और नाई अपने-अपने घर पहुँचे तो उस भस्म के प्रभाव से पुरोहित के घर में संसार के सम्पूर्ण रत्न और सुख-सामग्री उत्पन्न हुई, जिससे पुरोहित तथा उनकी पत्नी को बहुत आनन्द हुआ। एक दिन नाई की स्त्री पुरोहित के घर आयी। जब उसने यह देखा कि उसके घर में सुख की सम्पूर्ण सामग्रियाँ उपस्थित हैं तो उसने पुरोहित की पत्नी से उस ऐश्वर्य का कारण पूछा।
जब पुरोहित की पत्नी ने उसे यह बताया कि यह सब सम्पत्ति शिवजी द्वारा दी गयी भस्म के कारण प्राप्त हुई है, तो उसने अपने पति के पास पहुँच कर यह सब हाल कह सुनाया। उसे सुनकर नाई दौड़ा-दौड़ा पुरोहित के पास आया और झगड़ा करके यह कहने लगा कि तुम मझे इस धन का आधा भाग दो। उस समय पुरोहित ने उसे यह उत्तर दिया- हे मूर्ख! तूने शिवजी द्वारा दी गयी भस्म का निरादर करके उसे फेंक दिया, इसलिए तू इस सम्पत्ति से वंचित रहा।
अब मुझसे लड़ने के लिए क्यों आया है ? यदि तू सम्पत्ति प्राप्त करना चाहता है तो फिर उन्हीं के पास चला जा, जिन्होंने पहिले तुझे भस्म दी थी। पुरोहित की बात सुनकर नाई फिर कैलाश पर्वत पर गया, परन्तु इस बार उसे वहाँ से निराश लौट आना पड़ा।
॥ शिव तिलक चढ़ाने वाले नाई तथा पुरोहित के विवाद का वर्णन ॥
ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! जब राजा हिमाचल ने पुरोहित एवं नाई के झगड़े का हाल सुना, तो उन्होंने दोनों को अपने पास बुलाकर यह कहा कि तुम दोनों गिरिजा के वर का हाल कह सुनाओ। यह सुनकर पुरोहित ने उत्तर दिया-हे प्रभो! आपकी आज्ञानुसार मैं सर्वप्रथम गिरिजा के पास गया। फिर गिरिजा की आज्ञा पाकर कैलाश पर्वत पर जा पहुँचा और वहाँ शिवजी को तिलक चढ़ा आया।
मैंने शिवजी का पूजन किया फिर उनकी स्तुति करते हुए यह कहा कि तीनों लोक आपके सेवक हैं, अतः आप कृपा करके गिरिजा के साथ विवाह करना स्वीकार कर लीजिये। मेरी बात सुनकर पहिले तो शिवजी ने मना किया, फिर मेरी प्रार्थना को स्वीकार कर लिया। मैं उन्हें तिलक चढ़ाकर लौट आया।
हे राजन्! शिवजी सब प्रकार से गिरिजा के पति होने योग्य हैं। तीनों लोकों में उनसे बड़ा और कोई नहीं है। सब लोकपाल उन श्री शिवजी की महिमा का वर्णन करते हैं। उन्होंने चलते समय मुझे भस्म दी थी, जिससे मेरे घर में सब प्रकार की सुख-सामग्रियाँ उपस्थित हुई हैं। इतना कहकर पुरोहित अपने घर चला गया।
हे नारद! पुरोहित के जाने के बाद नाई आया। वह हाय-हाय करता हुआ राजा हिमाचल से बोला-हे राजन्! आपके पुरोहित ने सब काम बिगाड़ दिया। वह स्थान ऐसा निर्जन था कि वहाँ एक भी मनुष्य दिखाई नहीं देता था। कुछ और आगे चलकर वृटवृक्ष के नीचे बैठा हुआ केवल एक मनुष्य दिखाई दिया। उसका रूप अवधूतों जैसा था। वह योगियों के समान ध्यानमग्न बैठा हुआ था।
पुरोहित ने बिना पूछे ही उसे तिलक चढ़ा दिया। यद्यपि मैंने बहुत रोका, किन्तु पुरोहित ने मेरी एक बात नहीं मानीं। उस अवधूत के पास एक बैल के अतिरिक्त और कुछ नहीं था। चलते समय उसने हमें कुछ धन भी नहीं दिया। केवल एक-एक मुट्ठी भस्म पकड़ा दी। हे राजन्! जो सच्ची बात थी, वह मैंने कह सुनायी। अब जो आप उचित समझें, वह करें।
हे नारद! इस समाचार को सुनकर हिमाचल को तो कुछ ही खेद हुआ, मैना को बहुत चिन्ता उत्पन्न हुई। उन्होंने हिमाचल से कहा-हे स्वामी! मैंने जब से यह सुना है कि पुरोहित ने एक भिखारी के साथ मेरी पुत्री का विवाह निश्चित किया है, तब से मुझे बहुत चिन्ता हो रही है। मैंने यह भी सुना है कि वह अवधूत बहुत कुरूप, अशक्त तथा मूर्ख है। मेरी पुत्री परम सुन्दरी है, तब भला ऐसे पति के साथ उसका विवाह किस प्रकार किया जा सकता है?
हे नारद! हिमाचल ने यह सुनकर जब अपने मित्रों को सब वृत्तान्त सुनाया, तब उनमें से किसी ने यह बताया कि तुम्हारे धन्य भाग्य हैं जो गिरिजा को ऐसे श्रेष्ठ पति की प्राप्ति हुई है और किसी ने यह कहा कि ऐसे वर के साथ विवाह करना उचित नहीं है। गिरिजा का विवाह तो किसी राजा के साथ ही होना चाहिए। हिमाचल ने उन सबकी बातें सुनकर उत्तर दिया-हे भाइयो! जो भगवत का इच्छा होती है, उसमें किसी का वश नहीं चलता।
यह कहकर हिमाचल ने यह सब वृत्तान्त कह सुनाया कि जिस प्रकार सब देवताओं ने गिरिजा के साथ विवाह करना अस्वीकार कर दिया था। फिर उन्हें यह शाप भी बताया कि देखो, शिवजी की भस्म के प्रताप से हमारे पुरोहित के घर किसी भी प्रकार की कमी नहीं रही है। उन्होंने यह भी कहा कि इन सब बातों पर भली भाँति विचार कर, आप मुझे अपनी राय दीजिये उसी के अनुसार मैं आचरण करूँगा।
॥ हिमाचल द्वारा शिव जी को बारात लाने का सन्देश ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! हिमाचल की बातों को सुनकर सबलोगों को बहुत आश्चर्य हुआ। तब उनमें से किसी ने यह राय दी कि शिवजी के साथ विवाह कभी नहीं करना चाहिए। अंत में बहुत कुछ सोच-विचार करने के उपरान्त बुद्धिमान तथा विद्वान पुरुषों ने हिमाचल से यह कहा-हे राजन्! आप शिवजी को एक पत्र इस आशय का लिखें कि वे एक अच्छी-सी बारात सजाकर लावें। यदि उन्होंने ऐसा नहीं किया तो गिरिजा के साथ उनका विवाह न हो सकेगा। यदि वे वास्तव में तपस्वी तथा योगी होंगे तो आपकी बात को स्वीकार करके श्रेष्ठ बारात सजाकर लावेंगे।
हे नारद! बुद्धिमानों की इस बात को हिमाचल तथा मैना ने स्वीकार कर लिया तथा शिवजी को अच्छी बारात लाने के लिए पत्र लिखा। उसमें यह कहा गया था कि आपकी बारात में सभी देवता, ऋषि, मुनि, सनकादिक, शेषनाग, ब्रह्माजी तथा विष्णुजी को भी आना चाहिए। यदि ये लोग नहीं आये तो गिरिजा के साथ आपका विवाह न हो सकेगा। इस पत्र के साथ लग्न की सामग्री देकर हिमालय ने पुरोहित को पुनः शिवजी के पास भेजा।
जब पुरोहित पुनः कैलाश पर्वत पर पहुँचा तो उसने देखा कि शिवजी ने उसकी मनोभिलाषा जानकर पहिले से ही वहाँ देवताओं की सभा जमा कर रखी है। उस सभा के समान अन्य कोई सभा संसार में नहीं हो सकती थी। जिस समय पुरोहित ने उस सभा को देखा तो उसके आनन्द का पारावार न रहा। उसने प्रसन्न होकर लग्न चढायी। उस लग्न की सामग्री को देखकर सभी सभासद् अत्यन्त प्रसन्न हुए।
तदुपरान्त पुरोहित शिवजी से आज्ञा तथा अपना नेग लेकर, हिमाचल के समीप लौट आया और उन्हें सब हाल कह सुनाया। पुरोहित ने नाई की निन्दा करते हुए कहा-हे राजन्! मैं आपको शपथ खाकर कहता हूँ कि गिरिजा का पति अत्यन्त सुन्दर तथा तेजस्वी हैं और तीनों लोकों में उसके समान अन्य कोई नहीं हैं। पुरोहित के मुख से इन शब्दों को सुनकर हिमालय तथा मैना अपने भाई-बन्धुओं सहित अत्यन्त प्रसन्न हुए। पुरवासी जनों ने जब यह समाचार सुना तो उन्हें भी हार्दिक आनन्द हुआ।
॥ हिमाचल द्वारा पत्र भेजना तथा शिव जी का हँसना ॥
ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! हिमाचल ने सब सामग्री एकत्र करके, बारात के ठहरने के लिए एक बहुत लम्बा-चौड़ा श्रेष्ठ भवन निर्मित कराया। जहाँ एक ओर भगवती आदिशक्ति और दूसरी ओर परमपुरुष सदाशिवजी हों, वहाँ किसी प्रकार की कमी हो भी कैसे सकती है ? अब तुम शिवजी का हाल सुनो। जब शिवजी ने हिमाचल का पत्र पढ़ा तब उहें बहुत हँसी आयी। फिर उन्होंने हिमाचल के गर्व को नष्ट करने के लिए यह चरित्र किया कि उन्होंने अपना स्वरूप एक बूढ़े जैसा बना लिया।
तदुपरान्त अपने बैल को भी बूढ़ा बना कर उसके ऊपर बैठ गये, फिर अपने साथ दो शिष्यों को ले डमरू तथा सिंगी को बजाते हुए 'अलख-अलख' शब्द का उच्चारण करते हुए, भयानक वेष बनाये, हिमाचल के नगर में जा पहुँचे और वहाँ जाकर एक बाग में ठहर गये। इधर राजा हिमाचल बारात आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने जब सिंगी और डमरू का नाद सुना तो बहुत से लोगों को बारात देखने के लिए भेजा। वे सब मनुष्य तथा गिरिजा की सहेलियाँ उस स्थान पर जा पहुँची, जहाँ अवधूत-स्वरूप शिवजी बैठे हुए 'अलख-अलख' शब्द का उच्चारण कर रहे थे।
उन्होंने शिवजी के पास पहुँचकर पूछा-हे योगिराज! तुमने कहीं शिवजी की बारात तो नहीं देखी ? यह सुनकर शिवजी ने उत्तर दिया-हमीं गिरिजा के दूल्हा हैं और हमीं बारात हैं। हमारे साथ दो शिष्यों के अतिरिक्त और कोई नहीं आया है।
हे नारद! शिवजी के मुख से निकले हुए इन शब्दों को सुनकर गिरिजा की सखियों ने उन्हें गालियाँ देते हुए कहा-अरे पागल! तू हमारे राजा की पुत्री के लिए ऐसी बात क्यों कहता है ? यदि तू ठीक-ठाक बतायेगा कि तूने बारात को नहीं देखा है, तो हम तुझे अच्छे भोजन खिलायेंगी और पहिनने के लिए श्रेष्ठ वस्त्र भी देंगी। यह सुनकर शिवजी ने फिर अपना पहला उत्तर दुहरा दिया और कहा -हे सखियो! तुम गिरिजा से जाकर यह कह देना कि हम वही व्यक्ति हैं, जिन्हें पुरोहित लग्न चढ़ाकर आया है।
गिरिजा हमें अच्छी तरह जानती है, अतः वह सब कुछ बता देगी। यह सुनकर उन सब स्त्रियों ने शिवजी की लात-घूसों से खूब पिटाई की, तथा पाँव पकड़कर चारों ओर घसीट डाला। इसके बाद उन्होंने नाखून तथा चुटकियों से उनके पवित्र शरीर को जगह-जगह काटा। किसी ने उनके बैल को लकड़ी मार कर भगा दिया और किसी ने उनके साथ के छोटे-छोटे नंग-धड़ंग बालकों को ऐसे जोर-जोर के चाँटे लगाये कि वे रोते हुए भाग खड़े हुए।
हे नारद! उन स्त्रियों ने यह सब ऊधम केवल इसीलिए किया था कि वे शिवजी की माया में मोहित होकर, उन्हें पहिचानने में असमर्थ रही थीं। शिवजी ने उनकी इस मारपीट का कोई बुरा न मानते हुए हँसकर कहा-हे स्त्रियो! ससुराल में इस प्रकार मार खाना भी अच्छा लगता है, अतः तुम अपने मन में किसी प्रकार का संकोच मत करो और जिस प्रकार चाहो, मुझे खूब तंग कर लो।
यह सुनकर वे स्त्रियाँ तथा पुरुष शिवजी को छोड़कर अपने घर को लौट चले। जब वे लोग चले गये, तब शुक्र और शनिश्चर देवता, तो बालस्वरूप धारण किये हुए शिवजी के साथ थे, तथा बैल, जिन्हें स्त्रियों ने कुछ देर पहिले मार कर भगा दिया था, वे रोते-पीटते फिर शिवजी के पास आ पहुँचे। उस समय शिवजी ने हँसते हुए उनसे कहा-तुम लोग अपने मन में कुछ बुरा मत मानो।
ससुराल में तो इसी प्रकार का आनन्द मिलता है। परन्तु जब उन लोगों को शिवजी की इस बात से प्रसन्नता नहीं मिली, तब शिवजी ने लौटकर जाती हुई उन स्त्रियों के पीछे, अपने झोले में से निकाल कर अनेक प्रकार की बर्रें छोड़ दीं। उन बर्रों ने स्त्रियों के कोमल शरीर को काट कर जगह-जगह सुजा दिया। तब वे रोती-पिटती और चिल्लाती हुईं बड़ी तेजी के साथ अपने घरों को भाग चलीं। उसी अवस्था में वे सब गिरिजा के समीप जा पहुँची।
उनकी इस दुर्गति को देखकर जो स्त्रियाँ उनके साथ नहीं गयी थीं, वे बहुत प्रसन्न हुई और उन्हें चिढ़ाती हुई पूछने लगीं-अरी सखियो! तुम्हारी यह दुर्गति किसने कर दी है ? गिरिजा भी उनकी हालत को देखकर पहिले तो बहुत हँसी, फिर अपनी कृपादृष्टि द्वारा उन सबको स्वस्थ कर दिया।
तदुपरान्त उन्होंने पूछा कि यह सब चरित्र कैसे हुआ, वह तुम मुझे बताओ? गिरिजा के इन शब्दों को सुनकर उन स्त्रियों ने सम्पूर्ण घटना कह सुनायी। तब शिवजी के चरित्र को देख सुनकर गिरिजा हँसने लगीं।
॥ गिरिजा का पत्र देकर विजया को शिव जी के समीप भेजना ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! हिमाचल की आज्ञा पाकर जो लोग बारात को ढूँढ़ने गये थे, उन लोगों ने लौटकर यह समाचार दिया कि हमें बारात कहीं नहीं मिली। हिमाचल यह सुनकर पहिले तो बहुत दुःखी हुए, परन्तु जब उन्होंने गिरिजा की सखियों की दुर्गति का समाचार सुना तो उन्होंन अपने मन में निश्चय किया कि सम्भवतः वही शिवजी होंगे। यह विचार आते ही वे बहुत पछताकर कहने लगे-हाय, ब्राह्मण आदि तो शिवजी की बहुत प्रशंसा किया करते हैं, फिर क्या कारण है, जो वे ऐसा भयानक स्वरूप बनाकर मेरी पुत्री को ब्याहने आये हैं ? अब मुझे वास्तव में पता चला कि पुरोहित ने मेरे साथ धोखा किया है।
मैं राजा होकर ऐसे भिखारी के साथ अपनी पुत्री का विवाह कदापि नहीं करूँगा। इस प्रकार की बातें करते हुए हिमाचल तथा मैना बहुत चिन्तित हुए। जो बन्धु-बान्धव विवाह में सम्मिलित होने के निमित्त हिमाचल के घर आये हुए थे, वे भी शोकाकुल होकर कहने लगे कि अरे, यह क्या हुआ ?
हे नारद! उस समय हिमाचल आदि के चित की चिन्ता को देखकर गिरिजा ने 'विजया' नामक सखी को अपने पास बुलाया और उसे एक पत्र देते हुए कहा-हे सखी! तुम इसी समय इस पत्र को लेकर शिवजी के पास चली जाओ और निर्भय हो हाथ जोड़कर, उनसे मेरी ओर से प्रार्थना करते हुए यह कहना कि आप गिरिजा के इस पत्र का उत्तर तुरन्त देवें। फिर वे जो भी उत्तर दें उसे लेकर तुम मेरे पास लौट आना।
यह सुनकर वह सखी गिरिजा का पत्र लेकर शिवजी के पास चल दी और वहाँ पहुँचकर उन्हें दण्डवत्-प्रणाम करने के उपरान्त पत्र देती हुई बोली-हे प्रभो! आपकी जो आज्ञा हो, उसे कहिये ताकि मैं गिरिजा को जाकर यह सन्देश सुना दूँ। हे नारद! गिरिजा ने अपने पत्र में यह लिखा था-हे परब्रह्म शिवजी! मैं आपको भली-भाँति जानती हूँ, परन्तु मेरे माता-पिता तथा अन्य लोग आपकी महिमा को न पहिचान पाने के कारण अत्यन्त चिन्तित हो रहे हैं।
इसलिए मैं आपसे प्रार्थना करती हूँ कि आप अपने परम सुन्दर तथा कोमल स्वरूप को धारण कीजिये। इसके अतिरिक्त आप श्रेष्ठ बारात एवं सुन्दर सामाग्री के साथ यहाँ पधारिये, जिससे सब लोगों के मन की व्याधि दूर हो। शिवजी ने इस पत्र को पढ़कर उत्तर लिख दिया और उसे देकर सखी को विदा किया। जब गिरिजा को अपने पत्र का उत्तर मिल गया, तब वे अपने मन में बहुत प्रसन्न तथा सुखी हुईं।
॥ शिव के अवधूत स्वरूप को देखकर हिमाचल तथा मैना का दुःखी होना ॥
ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! उस समय हिमाचल ने बहुत दुःखी होकर गिरिजा को अपने पास बुलाया और यह कहा-हे पुत्री! तूने यह क्या किया जो सब देवताओं को छोड़कर ऐसे अवधूत पति की इच्छा की ? मैं तो अपनी प्रतिज्ञा के कारण तुझ से कुछ नहीं कह सकता, परन्तु तेरी माता अपयश का ध्यान करके बहुत दुःखी हो रही हैं। जब मैं यह विचार करता हूँ कि मेरी लड़की का विवाह एक अवधूत के साथ होगा, उस समय मैं शोक-समुद्र में डूब जाता हूँ।
मुझे बड़ी चिन्ता है कि मैंने तो इतनी सामग्रियाँ एकत्र कीं, परन्तु तेरा पति अपने साथ केवल दो कुरूप शिष्यों को बारातियों के नाम पर लाया है। उसके साथ जो बैल है, वह भी बहुत बूढ़ा तथा निर्बल है। उस बैल के ऊपर भाँग-धतूरा आदि अनेक प्रकार की मादक वस्तुएँ तथा विभिन्न प्रकार के विष लदे हुए हैं। मेरा भाग्य तो देखो कि कैसी बारात आज मेरे दरवाजे पर आयी है। अब भला तू ही बता कि इस अवसर पर सब लोग मुझे क्यों नहीं धिक्कारेंगे ?
हे नारद! हिमाचल की बात सुनकर गिरिजा ने हँसते हुए कहा-हे पिता! आप कुछ चिन्ता न करें। विष्णुजी का वचन मिथ्या न होगा। इस समय जो लीला हो रही है, वह भी सब लोगों का आनन्द प्रदान करने वाली सिद्ध होगी। अन्त में, सब लोग आपकी बहुत स्तुति करेंगे तथा आपके प्रताप को सबसे बड़ा स्वीकार करेंगे।
आप विश्वास रखो कि इस विवाह के बाद तीनों लोकों में आपको सुयश प्राप्त होगा। ब्रह्मा, विष्णु आदि देवता भी आपका अत्यंत सम्मान करेंगे। अब आपको उचित है कि आप उन योगीरूपधारी भगवान् सदाशिव के समीप जायें और हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करें, वे आपकी सम्पूर्ण इच्छाओं को पूरी करेंगे।
हे नारद! शिवजी तथा गिरिजा की लीलाएँ अपार हैं। वे दोनों एक ही रूप हैं। उनमें किसी प्रकार का भेद नहीं समझना चाहिए। जिस प्रकार शब्द और अर्थ में कोई अन्तर नहीं होता, उसी प्रकार शिवजी तथा गिरिजा जी में भी किसी प्रकार की भिन्नता नहीं है। उनकी जो इच्छा होती है, उसी लीला को वे सब लोगों को दिखाते हैं। उनकी लीलाओं का पार किसी ने नहीं पाया है।
इस घटना के उपरान्त हिमाचल ने अपने भाई-बन्धुओं को बुलाकर गिरिजा ने जो बात कही थी, वह सब कह सुनायी। फिर कहा-हे भाइयो! वह योगी अवधूत का स्वरूप बनाये हुए एक निर्बल बैल तथा दो छोटे-छोटे बालकों को साथ लिये हुए यहाँ आया है। अब आपलोगों की जो सम्मति हो, वही कार्य किया जाय ।
॥ हिमाचल द्वारा योगीरूप शिव जी की परीक्षा ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! हिमाचल की बात सुनकर सब पर्वतों ने इस प्रकार कहा-हे राजन्! हमें सर्वप्रथम उस योगी के पास पहुँचकर उसकी परीक्षा ले लेनी चाहिए। यदि उसमें कोई बुराई न हो तो उसके साथ गिरिजा का विवाह करने में कोई हानि नहीं है। यह सुनकर हिमाचल अपने साथ कई लोगों को लेकर शिवजी के पास जा पहुँचे और हाथ जोड़कर प्रणाम करने के उपरान्त चुपचाप खड़े हो गये।
उस समय शिवजी ने यह लीला की कि शुक्र तथा शनिश्चर, जो शिष्यों की भाँति उनके साथ थे, पास आ पहुँचे और रुदन करने लगे। उन्हें रोते हुए देखकर शिवजी ने कहा-हे बालको! तुम रोना-धोना त्यागकर खूब खेलो-कूदो परन्तु मेरे पास से कहीं दूर मत चले जाना। मैं अकेला निर्धन मनुष्य हूँ। तुम भी मुझे बड़ी कठिनाई से प्राप्त हुए हो! देखो, तुम बैल की भी देख-भाल किये रहना; क्योंकि नशे में चूर होने के कारण इस समय मैं उसकी देख-भाल नहीं कर सकता हूँ।
हे नारद! इस प्रकार नशेबाजों की भाँति शिवजी ने हिमाचल आदि के सामने उन बालकों से बहुत सी बातें कहीं, परन्तु वे बालक बराबर रोते रहे। उस समय शिवजी ने उनसे रोने का कारण पूछा तो वे उत्तर देते हुए बोले-हे बाबा! हम तो भूख से मरे जाते हैं, अब या तो आप हमें कुछ खाने के लिए दीजिये, अन्यथा हम इसी प्रकार चिल्लाते रहेंगे ? यह सुनकर शिवजी ने उत्तर दिया-हे बालको! मेरे पास तो खाने के लिए कुछ भी नहीं है, परन्तु तुम कुछ देर और ठहरे रहो। हिमाचल के घर खाने-पीने की बहुत सामग्रियाँ बनी हैं। जब गिरिजा के साथ मेरा विवाह होगा, उस समय तुम्हें भी बहुत सा भोजन खाने के लिए मिलेगा।
यह सुनकर दोनों चेलों ने कहा-हे बाबा! विवाह में तो अभी बहुत देर है तब तक हम भूखे नहीं रह सकेंगे। कई दिनों से भोजन प्राप्त न होने के कारण अब हम से और अधिक देर तक नहीं ठहरा जाता है। इसलिए आप कुछ न कुछ खाने का प्रबन्ध तो कर ही दें।
हे नारद! हिमाचल ने जब उन दोनों बालकों की यह बात सुनी तो शिवजी से कहा-हे प्रभो! यदि आपकी आज्ञा हो तो हम आपके दोनों शिष्यों को अपने साथ घर ले जाकर भोजन करा लावें। शिवजी बोले-हे राजन्! यदि आप यही चाहते हैं तो इन्हें भोजन करा लाइये। मुझे इसमें कोई आपत्ति नहीं है। यह सुनकर हिमाचल को सम्बोधित करते हुए कहा-हे राजन्! हम आपके घर भोजन करने के लिए नहीं जायेंगे; क्योंकि घर के स्वामी के बिना हमें वहाँ कोई भी अच्छी तरह से भोजन नहीं करा सकेगा।
यदि आप स्वयं हमें लेकर चलें तो हम तैयार हैं, अन्यथा भूखे रहकर यहीं रोते रहेंगे। उस समय शिवजी ने हिमाचल को सम्बोधित करते हुए कहा-हे राजन्! आप स्वयं इन्हें साथ ले जाकर भोजन करा लाइये। सचमुच यह कई दिन के भूखे हैं। आप इन्हें अच्छी तरह से भोजन करा दें तथा पानी भी पिला दें।
हे नारद! शिवजी की आज्ञा सुनकर हिमाचल उन दोनों को साथ लेकर घर आये और उन्हें भोजन कराने लगे। उस समय उन दोनों शिष्यों ने यह किया कि उनके सामने जितना भी भोजन परोसा गया, उस सब को वे एक ही ग्रास में खा गये, तदुपरान्त उन्होंने हिमाचल को सम्बोधित करते हुए कहा-हे राजन्! अभी तो हमने केवल एक ही ग्रास भोजन खाया है, इससे हमारी भूख बिल्कुल नहीं बुझी, अब तुम हमें शीघ्र ही और कुछ खिलाओ। तुम बहुत बड़े राजा हो, अतः तुम्हें किसी प्रकार का लोभ करना उचित नहीं है। यदि हम भूखे उठ गये तो तुम्हें बहुत पाप लगेगा।
यह सुनकर हिमाचल ने रसोई करनेवालों से कहा-तुम्हें लोभ करने की आवश्यकता नहीं है। मेरे यहाँ भोजन ढेर के ढेर रखे हैं, अतः ये जितना भी खा सकें, तुम इन्हें खूब खिला दो। यह सुनकर रसोईया जब और सारा भोजन ले आया तो उसको भी वे एक ही ग्रास में खा गये। हिमाचल के यहाँ जितना पानी था, उन सबको भी उन्होंने एक ही घूँट में पी लिया। तदुपरान्त वे चिल्लाते हुए बोले-हे राजन्! हम तो भूख के मारे मरे जा रहे हैं, तुम हमें खाने के लिए कुछ क्यों नहीं देते हो ? यदि तुम्हारे यहाँ भोजन तैयार न हो तो हमें कच्चा अन्न ही बतला दो, हम उसी को खा जायेंगे।
यह सुनकर हिमाचल ने अत्यन्त चिन्तित होकर कच्चे अन्न का जो अम्बार लगा था, वह उन दोनों को बतला दिया। उस पर्वत के समान अन्न के ढेर को भी वे एक ही ग्रास में खा गये। जब राजा के घर कुछ भी शेष नहीं रहा, तब वे भूख-भूख चिल्लाते और रोते हुए वहाँ से लौट पड़े तथा अपने गुरु के समीप जा पहुँचे । शिवजी ने जब उन्हें देखा तो पहिले तो बहुत हँसे, तदुपरान्त अपने झोले से निकाल कर उन्हें एक जड़ी ऐसी दे दी, जिसे खाते ही उनकी भूख शांत हो गयी।
॥ शिव जी के शिष्यों द्वारा हिमाचल का सम्पूर्ण भोजन खा लेना ॥
ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! हिमालय के घर से जब शिवजी के दोनों शिष्य चले गये, तो उस समय सब लोगों ने हिमालय के पास पहुँचकर कहा-हे राजन्! अब तो नगर में अन्न का लेशमात्र भी शेष नहीं रहा है। भला, हम लोग किस प्रकार जीवित रहेंगे ? अब आप शीघ्र ही वह उपाय कीजिये, जिससे प्रजा का यह दुःख दूर हो। यह सुनकर हिमाचल ने उनसे कहा-हे भाइयो! हमारे नगर के बाहर उद्यान में एक बूढ़ा योगी कहीं से आकर ठहरा हुआ है।
उसके साथ एक बैल है और दो शिष्य हैं। वह मेरी पुत्री के साथ विवाह करने की इच्छा रखता है। उसके शिष्यों ने ही नगर में अन्न का अकाल उपस्थित कर दिया है। ऐसी दशा में अब आप ही बताइये कि हमें क्या करना चाहिए ? यह सुनकर सब लोगों ने उत्तर दिया-हे राजन्! इसका भेद तो पुरोहित अथवा गिरिजा से ही पूछना उचित है, परन्तु एक बात को हमलोग अवश्य स्वीकार करते हैं कि यदि उस योगी में कोई दोष होता तो गिरिजा उसे पति रूप में पाने की इच्छा कभी नहीं करतीं।
हे नारद! यह सुनकर हिमाचल ने पुरोहित को अपने पास बुलाकर पूछा-हे पुरोहित! तुम सच-सच बताओ कि जो योगी दो शिष्यों को साथ लेकर यहाँ आया है, वह वास्तव में कौन है ?पुरोहित ने उत्तर दिया-हे राजन्! गिरिजा ने मुझे उस योगी का पता बताया था, तब मैं उसे तिलक चढ़ा आया। इतना कहकर पुरोहित ने योगीस्वरूप शिवजी की महिमा को सुनाते हुए कहा-हे राजन्! ये योगीरूप में साक्षात् शिवजी हैं और तुम्हारी पुत्री गिरिजा आदिशक्ति भवानी का अवतार हैं।
यदि आप इससे कुछ और अधिक जानना चाहते हों तो गिरिजा से ही पूछ लीजिये। वे इस सम्बंध में आपको और अधिक बात बता सकेंगी। पुरोहित के मुख से यह बात सुनकर सबलोगों ने गिरिजा की बात सुनने का निश्चय किया। तब हिमाचल ने गिरिजा को अपनी सभा में बुलाया। पिता की आज्ञा सुनकर गिरिजा अपनी माता तथा दो सखियों को साथ लेकर सभा में पहुंचीं। जब गिरिजा ने लोगों को प्रणाम किया तो हिमाचल ने प्रसन्न होकर उन्हें अपने पास बैठा लिया।
॥ नारदजी का हिमाचल को समझाना ॥
हिमाचल ने गिरिजा को अपने पास बैठाते हुए अत्यन्त स्नेहपूर्वक कहा-हे पुत्री! इस समय सब लोग दुःख सागर में निमग्न हैं, अतः तुम सब हाल समझाकर कहो कि वह योगी कौन हैं, जिसके शिष्यों ने हमारा सम्पूर्ण भोजन खा लिया है और नगर में अन्न तो अन्न, कहीं पानी भी ढूँढ़े नहीं मिलता है ?पिता की बात सुनकर गिरिजा मन ही मन अत्यन्त प्रसन्न हुईं, परन्तु ऊपर से लज्जित होकर कुछ न कह सकीं।
हे नारद! उसी समय तुम हिमाचल की सभा में पहुँचे और तुमने आदि से अन्त तक का सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनाते हुए हिमाचल से कहा-हे राजन्! तुम किसी प्रकार सन्देह मत करो। तुम और तुम्हारी पत्नी परम धन्य हो। तुम्हारे यहाँ भगवती आदिशक्ति ने अवतार लिया है। ये आदिशक्ति ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव को भी उत्पन्न करने वाली हैं।
यही सबका संहार भी करती हैं। इनकी माया अपरम्पार है। यह जो तुम्हारे घर में सखियों के साथ क्रीड़ा करती हुई भ्रमण कर रही हैं, इसे तुम अपना अहोभाग्य ही समझो। इन्होंने प्रेम के वशीभूत होकर ही तुम्हारे ऊपर यह कृपा की है। वे बूढ़े योगी, जिसका नाम हर है, और जो अपने साथ शुक्र तथा शनिश्चर नामक दो शिष्यों को लेकर बाग में ठहरे हुए हैं, तुम्हारी इस कन्या के सच्चे पति हैं।
ये ब्रह्मा तथा विष्णु के भी पिता हैं और सम्पूर्ण सृष्टि को उत्पन्न करनेवाले तथा उसका संहार करनेवाले भी हैं। अब तुम्हें यह उचित है कि तुम उन्हीं की शरण में जाओ। वे तुम्हारे अन्न आदि को जो उनकी माया द्वारा गुप्त हो गया है, फिर से प्रकट कर देंगे तथा तुम्हारी सम्पूर्ण इच्छाओं को पूर्ण करेंगे।
वे अपना स्वरूप भी ऐसा सुन्दर बना लेंगे कि उसे देखकर तुम्हें अत्यन्त आश्चर्य होगा। उनकी बारात भी पलक मारते ही सज जायेगी और उसमें ब्रह्मा, विष्णु आदि देवता सेवक बनकर सम्मिलित होंगे।
हे नारद! जब तुमने इस प्रकार सब लोगों को समझाया, उस समय हिमाचल तथा अन्य लोगों को अत्यन्त प्रसन्नता प्राप्त हुई। तदुपरान्त तुम अपने लोक को चले गये और हिमाचल गिरिजा के विवाह की तैयारी में संलग्न हुए।
॥ हिमाचल का शिव जी के पास पहुँचकर स्तुति करना ॥
ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! फिर पर्वतराज हिमाचल सब लोगों को साथ लेकर शिवजी की सेवा में जा पहुँचे और हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करने लगे। यह देखकर शिवजी ने उनसे हँसते हुए पूछा-हे राजन्! तुम क्या चाहते हो ? हम तुम्हारी प्रत्येक मनोकामना को पूर्ण करेंगे ? यह सुनकर हिमाचल ने अपनी इच्छा को प्रकट करते हुए कहा-हे प्रभो! आपकी लीला जानी नहीं जाती। आप कृपा करके मेरे सम्पूर्ण अपराधों को क्षमा कीजिये और मुझे ऐसा ज्ञान प्रदान कीजिये कि जिससे मैं सदैव चैतन्य बना रहूँ।
हे प्रभो! आपका वर्णन वेदों से भी नहीं हो सकता। यदि नारदजी हमें आश्चर्यरूपी समुद्र से बाहर न निकालते तो हमारी अज्ञानता कभी दूर नहीं होती। हे नाथ! अब मेरा सम्पूर्ण अहंकार नष्ट हो गया है। आप नगर में पधारकर गिरिजा को स्वीकार कीजिये और हम सबलोगों को प्रसन्नता प्रदान कीजिये। हे प्रभो! आपके दोनों शिष्यों ने नगर का सम्पूर्ण अन्न खा गया है जिसके कारण लोग अत्यन्त दुःखी हैं। आप कृपा करके इस दुःख को भी दूर कर दीजिए। इस समय मेरी प्रतिष्ठा आपके हाथ में है। मैं आपकी शरण में आया हूँ।
हे नारद! हिमाचल के इन शब्दों को सुनकर शिवजी ने प्रसन्न होते हुए कहा-हे राजन्! अब तुम प्रसन्नतापूर्वक अपने नगर को लौट जाओ। तुम्हारे सम्पूर्ण मनोरथ पूर्ण होंगे। तुम विवाह की सामग्री एकत्र करो। हे पर्वतराज! तुम्हें अपने राज्य तथा सामग्री एकत्र करने का बहुत अहंकार हो गया था, उसे नष्ट करने के लिए ही हमने यह लीला दिखायी है। अब तुम घर जाकर बारात की अगवानी की प्रतीक्षा करो।
तुम्हारे घर की सभी वस्तुएँ ज्यों की त्यों प्रकट हो जायेंगी। शिवजी की आज्ञा पाकर हिमाचल अपने घर लौट गये। वहाँ जाकर जब उन्होंने यह देखा कि सब सामग्रियाँ पुनः प्रकट हो गयी हैं तो उन्हें अत्यन्त प्रसन्नता हुई। मैना भी गिरिजा की ओर देखकर अत्यन्त आनन्दित हुईं। तदुपरान्त हिमाचल बारात की अगवानी के लिए सभी लोगों को साथ लेकर आगे चले।
इधर हिमाचल को विदा करने के उपरान्त शिवजी ने सिंगीनाद करके अपना डमरू बजा दिया। उसके शब्द को सुनते ही मैं, विष्णु, इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता तथा ऋषि-मुनि सम्पूर्ण सृष्टि को साथ लेकर शिवजी के समीप जा पहुँचे। उस समय शिवजी ने वस्त्रालंकारों से सुसज्जित होकर अपना सुन्दर दूल्हारूप बनाया। भगवान् सदाशिव के उस परम तेजस्वी स्वरूप का दर्शन प्राप्त कर, सब लोगों को अत्यन्त प्रसन्नता हुई ।
॥ बारात की अगवानी के हेतु हिमाचल का बन्धु बान्धवों सहित जाना ॥
ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! जब हिमाचल अपनें भाई-बन्धु तथा प्रजा को साथ लेकर अगवानी के लिए आगे आये, उस समय शिवजी की सजी हुई बारात की धूमधाम को देखकर वे आनन्दमग्न हो गये। उस बारात के सम्मुख हिमाचल ने अपनी सम्पूर्ण सामग्री को बहुत तुच्छ समझा। तब वह अत्यन्त लज्जित हो शिवजी के चरणों में गिर पड़े। उस समय शिवजी ने प्रेममग्न हो उन्हें अपने हाथों पर उठा लिया। फिर बारात हिमाचल के द्वार की ओर चली।
उस सुन्दर बारात को देखने के लिए नगर की सभी स्त्रियाँ अपना-अपना काम छोड़कर छज्जों पर आ बैठीं। यहाँ तक कि कोई स्त्री अपने पति को भोजन करते छोड़कर ही उठ बैठी और कोई अधूरा श्रृंगार किये ही भागी चली आयी। वे सब शिवजी के परम मनोहर रूप को टकटकी बाँधकर देखने लगीं और गिरिजा के भाग्य की सराहना करती हुई, बारात के ऊपर पुष्पों की वर्षा करने लगीं।
हे नारद! इस प्रकार शिवजी की बारात हिमाचल के द्वार पर जा पहुँची। उस समय हिमाचल तथा मैना ने अपना अहंकार त्यागकर बहुत-सा धन शिवजी को भेंट किया। तदुपरान्त बारात के ठहरने के लिए जो निवास बनाया गया था, उसमें सभी बाराती ठहरे। गिरिजा ने ऋद्धि-सिद्धियों को बारात की सेवा करने के लिए भेज दिया था। किसी को किसी वस्तु की कमी न रही। रीति-भाँति सम्पन्न होने के पश्चात् हिमाचल ने बारातियों को अनेक प्रकार के सुस्वादु, व्यंजन खिलाये।
तदुपरान्त भगवान् सदाशिव के उन चरणकमलों को जिन्हें हम तथा विष्णु रात-दिन अपने हृदय में बैठाये रहते हैं, हिमाचल ने अपने हाथों से धोया। भोजन के समय बारातियों को जो प्रसन्नता हुई, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। भक्ष्य, भोज्य, लेह्य तथा चोष्य, ये चारों प्रकार के व्यंजन बारातियों को खिलाये गये।
जब बारात भोजन करके जनवासे में चली गयी, तब हिमाचल के बन्धु-बान्धवों ने भोजन प्राप्त किया। शिवजी जिस स्थान पर ठहरे हुए थे, वहाँ विविध प्रकार के नृत्य एवं गीतों का आयोजन हुआ, जिन्हें देख-सुनकर व्यसनी लोग अत्यन्त प्रसन्न होते थे। उस समय सब लोग भगवान् सदाशिव तथा भगवती गिरिजा की बारम्बार प्रशंसा कर रहे थे।
॥ शिव गिरिजा के विवाह का वर्णन ॥
ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! उस समय हिमाचल के पंडित ने आकर लग्न का मुहूर्त बताया। तब मैं और विष्णुजी, शिवजी को साथ लेकर हिमाचल के घर में जा पहुँचे। भगवान् सदाशिव के उस समय के स्वरूप का वर्णन नहीं किया जा सकता। उनका सम्पूर्ण शरीर कपूर तथा अथवा कुन्द के पुष्प के समान श्वेत था। वे सिर से पाँव तक वस्त्राभूषणों से अलंकृत थे और माथे पर मौर रखे हुए थे।
जिस बैल पर वे आरूढ़ थे, उसके सौन्दर्य और श्रृंगार का भी वर्णन नहीं किया जा सकता। जब शिवजी घर के भीतर पहुँचे, तब उनकी ओर से मैंने तथा हिमाचल की ओर से पुरोहित ने मिलकर सम्पूर्ण रीतियाँ सम्पन्न कीं। हिमाचल ने शिवजी का मधुपर्क सहित अर्घ्य प्रदान किया तथा दो वस्त्र भेंट किये, तदुपरान्त मैंने उसी स्थान पर गिरिजा को बुलवाया।
हे नारद! गिरिजा के आ जाने पर पुरोहित ने हवन किया। तदुपरान्त अग्नि को साक्षी करके हिमाचल ने कन्यादान किया। जिस समय शिवजी ने गिरिजा के हाथ को अपने हाथ में पकड़ा, उस समय सब लोग अत्यन्त प्रसन्न हो गये। हिमाचल के कुटुम्बियों ने शिव तथा गिरिजा दोनों के चरणों की पूजा की। दोनों ओर के सेवकों को उस समय इतना पुरस्कार दिया गया कि वे सब तृप्त हो गये।
भाँवरें हो जाने के उपरान्त शिव तथा गिरिजा को एक स्वर्ण सिंहासन पर बैठाया गया तथा जो रीतियाँ शेष रह गयी थीं, उन्हें मैंने पुरोहित के साथ सम्पन्न कराया। फिर शिवजी ने मेरी आज्ञानुसार गिरिजा के मस्तक में सिन्दूर लगाया। उस समय मैंने तथा पुरोहित ने भी अपना-अपना पुरस्कार प्राप्त कर दोनों को आशीर्वाद दिया।
हे पुत्र! शिव तथा पार्वती के विवाह का वह आनन्द तीनों लोकों में भर गया। फिर स्त्रियाँ शिवजी को अन्तःपुर में ले गयीं। वहाँ जो भी रीतियाँ होने को थीं, उन सबको शिवजी ने प्रसन्नता पूर्वक किया। दूसरे दिन भी हिमाचल ने बारात को ठहराये रखा। और इस दिन भी उसने सम्पूर्ण बारात का अत्यन्त स्वागत-सत्कार किया।
तीसरे दिन हिमाचल ने अत्यन्त स्नेह में भरकर शिवजी को प्रणाम किया और गिरिजा का हाथ उनके हाथ में देकर, बारात को विदा किया। हिमाचल के नगर से विदा होकर बारात कैलाश पर्वत पर जा पहुँची। वहाँ भी अनेक प्रकार के उत्सव हुए। तदुपरान्त सब देवता शिवजी से विदा लेकर अपने-अपने घर लौटे। मैं तथा विष्णु भी अपने-अपने लोक को लौट आये। शिवजी तथा गिरिजा जी के विवाहोत्सव का वर्णन करते हुए सब लोग अत्यन्त प्रसन्न होते थे।
॥ हिमाचल द्वारा गिरिजा को नारद के चरणों में डालने की कथा ॥
ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! एक समय संसार की मंगल-कामना करते हुए हम हिमालय के घर पहुँचे थे। उस समय की कथा यह है कि जब हिमाचल ने तुम्हारे दर्शन पाये तो उसने अत्यन्त प्रेममग्न होकर तुम्हें दंडवत् करते हुए, स्तुति एवं प्रशंसा की। तदुपरान्त उसने गिरिजा को बुलाकर तुम्हारे चरणों में डाल दिया और यह कहा-हे मुनि! आज आप इस कन्या के गुण-दोषों का वर्णन करने की कृपा करें।
यह सुनकर तुमने गिरिजा की हस्तरेखा को देखते हुए हिमालय को बताया-हे राजन्! तुम्हारी पुत्री सर्वगुण सम्पन्न हैं। यह शीलवान् बुद्धिमान, गुणवान, रूपवान तथा पति को प्रसन्नता प्रदान करनेवाली होगी। यह अपने माता-पिता के सुयश को दूना बढ़ायेगी, परन्तु इसका पति योगी, अहंकार-हीन, नग्न-वेषधारी तथा माता-पिता से रहित होगा।
हे नारद! तुम्हारी बात सुनकर हिमाचल अत्यन्त चिन्तित हुए, परन्तु गिरिजा को बहुत प्रसन्नता हुई; क्योंकि वे जानती थीं कि ऐसे लक्षण वाले शिवजी ही हैं। उन्हें यह विश्वास था कि नारदजी का वचन कभी झूठा नहीं होता, इसलिए वे शिवजी को पति रूप में प्राप्त करने की अभिलाषा से और अधिक प्रसन्न हो गयीं परन्तु उन्होंने प्रसन्नता का कोई लक्षण प्रकट नहीं किया। उस समय हिमाचल ने मुझसे कहा-हे ऋषिराज! आपने तो ऐसी बात बतायी, जिसे सुनकर मैं चिन्तित हो उठा हूँ।
अब आप कृपाकर यह और बताइये कि मुझे गिरिजा के वर के सम्बन्ध में क्या उपाय करना चाहिए ? यह सुनकर तुमने उत्तर दिया-हे राजन्! भाग्य के सम्मुख किसी का वश नहीं चलता। फिर भी हम तुम्हें एक उपाय बतलाते हैं, यदि भाग्य सहायता दे तो वह ठीक बैठेगा। हमने गिरिजा के पति के सम्बन्ध में जो गुण बताये हैं, वे सब शिवजी में भी पाये जाते हैं। भगवान् सदाशिव सबसे श्रेष्ठ तथा सब के स्वामी हैं।
आप अपनी कन्या का विवाह उनके साथ करें। मुझे यह भी निश्चय है कि वे स्वयं भी गिरिजा के अतिरिक्त किसी अन्य स्त्री के साथ अपना विवाह नहीं करेंगे।
हे नारद! यह सुनकर हिमाचल ने कहा-हे मुनिराज! शिवजी को तो सबलोग त्यागी कहते हैं तथा वे सदैव योग-समाधि में मग्न रहते हैं। इसके अतिरिक्त तीनों लोकों में यह बात भी प्रसिद्ध है कि उन्होंने केवल सती के साथ विवाह करने की प्रतिज्ञा की है। मुझे यह सन्देह होता है कि वे गिरिजा को किस प्रकार स्वीकार कर लेंगे ? यह सुनकर तुमने उत्तर दिया-हे हिमाचल! शिवजी की उन आदिशक्ति सती ने ही गिरिजा बनकर तुम्हारे घर में अवतार लिया है। तुम इस सम्बन्ध में किसी प्रकार सन्देह मत करो। यह कहकर तुमने हिमाचल को पूर्व-वृत्तान्त कह सुनाया। तदुपरान्त तुम गिरिजा को श्रेष्ठ वर देकर, वहाँ से लौट आये।
हे नारद! कुछ दिनों बाद जब गिरिजा युवावस्था को प्राप्त हुई, उस समय मैना ने हिमाचल से इस प्रकार कहा-हे स्वामी! अब आपको गिरिजा के विवाह का प्रयत्न करना चाहिए। पत्नी की बात सुनकर हिमाचल ने उत्तर दिया-हे मैना! सूर्य चाहे पूर्व की अपेक्षा पश्चिम में उदय होने लगे, परन्तु नारदजी के वचन कभी मिथ्या नहीं हो सकते हैं। तुम सम्पूर्ण सन्देहों को नष्टकर, शिवजी का ध्यान धरो और गिरिजा से यह कह दो कि वह शिवजी को प्राप्त करने के निमित्त तपस्या करे । तभी हमारा मनोरथ पूर्ण होगा।
यह सुनकर मैना के हृदय में धैर्य बँधा। तब वह गिरिजा के समीप पहुँचकर, उन्हें गोद में उठाकर रोने लगी। प्रेम की अधिकता के कारण उनके मुख से कोई बात नहीं निकलती थी। उस समय गिरिजा ने अपनी माता के मनोरथ को पहिचान कर इस प्रकार कहा-हे माता! मैंने आज स्वप्न में यह देखा है कि मुझ से एक मनुष्य इस प्रकार कह रहा है-हे गिरिजे! तुम वन में जाकर शिवजी की तपस्या करो, जिससे तुम्हारे माता-पिता तथा तीनों लोकों को आनन्द की प्राप्ति हो।
नारद का वचन कभी मिथ्या नहीं हो सकता। तुम जब तक तपस्या नहीं करोगी, तब तक कोई कार्य सिद्ध न होगा। गिरिजा के स्वप्न को जब मैना तथा हिमाचल ने सुना, वे अत्यन्त प्रसन्न होकर, शुभ समय की प्रतीक्षा में रात-दिन व्यतीत करने लगे।
॥ औषधिप्रस्थ पर गिरिजा द्वारा शिव जी का तप एवं शिवजी की क्रोधाग्नि से कामदेव के भस्म होने की कथा ॥
ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! एक समय शिवजी ने यह इच्छा की कि हम परिश्रमपूर्वक तप करें तथा अपने नाम का स्वयं स्मरण करें। यह विचार कर वे अपने गणों सहित हिमालय पर्वत की ओर चले। जब वे हिमालय पर्वत पर पहुँचे तो उन्होंने डमरू को बजाना आरम्भ कर दिया। उस स्थान पर गंगाजी की धारा बह रही थी और औषधियों का केन्द्र होने के कारण वह जगह 'औषधप्रस्थ' के नाम से प्रसिद्ध थी। वहाँ पक्षी मधुर ध्वनि में चहचहाते थे तथा अनेक प्रकार के रंग-बिरंगे पुष्प खिले हुए थे।
उस श्रेष्ठ स्थान को देखकर शिवजी तप करने की इच्छा से वहीं बैठ गये और अपने स्वरूप का ध्यान धरने लगे। उन्होंने कुम्भक, रेचक तथा पूरक-इन तीनों प्रकार के प्राणयाम को करना आरम्भ कर दिया। उनके नन्दी, भृंगी आदि गण भी, शिवजी का ध्यान धरते हुए, उसी स्थान पर बैठ गये ।
हे नारद! जब हिमाचल ने भगवान् सदाशिव के आगमन का समाचार सुना तो बड़ी सजधज के साथ उनके समीप जा पहुँचे। फिर शिवजी की बहुत प्रकार से स्तुति-प्रशंसा करते हुए बोले-हे प्रभो! मेरे धन्य भाग्य हैं, जो आप यहाँ पधारे हैं। अब आप मुझे कोई आज्ञा दीजिये, जिसका पालन करके मैं कृतार्थ हो जाऊँ। यह सुनकर शिवजी ने हँसते हुए कहा-हे पर्वतराज! हम यहाँ तपस्या करने के हेतु आये हैं और कुछ दिनों तक यहीं निवास करेंगे।
हम केवल यही चाहते हैं कि जब तक हम यहाँ रहें, तब तक हमारे समीप कोई न आने पावे। हिमाचल ने इस आज्ञा को शिरोधार्य करते हुए कहा-हे स्वामी! आप जो चाहते हैं, वही होगा। मेरा यह परम सौभाग्य है कि आपने यहाँ पधारकर मुझे प्रतिष्ठा प्रदान की है। इतना कहकर हिमाचल शिवजी की आज्ञा लेकर अपने घर लौट आये और सब जगह यह राजा की आज्ञा घोषित कर दी कि औषधप्रस्थ पर कोई व्यक्ति न जाने पाये, यदि कोई जायेगा तो वह मृत्यु-दण्ड पायेगा।
इस आज्ञा के उपरान्त हिमाचल अपनी पुत्री गिरिजा को साथ लेकर फिर शिवजी की सेवा में पहुँचे और उनकी स्तुति प्रशंसा करने के उपरान्त बोले-हे प्रभो! यदि आप आज्ञा दें तो मेरी कन्या गिरिजा अपनी सखियों सहित यहाँ आपकी सेवा करती रहे।
हे नारद! हिमाचल की प्रार्थना सुनकर शिवजी ने गिरिजा को सिर से पाँव तक देखने के उपरान्त विचार किया कि श्रेष्ठ कार्यों में स्त्री बाधास्वरूप आ खड़ी होती है, इसलिए उत्तम कार्य करते समय स्त्री को पास रखने का निषेध किया गया है। कामदेव का उत्तम शस्त्र स्त्री को ही कहा गया है, इसीलिए बुद्धिमानों ने स्त्री को महारोग के समान कहा है।
यह विचार कर शिवजी ने हिमाचल से कहा-हे राजन्! हम तपस्वियों का स्त्री के साथ रहना शुभ नहीं है। स्त्री तप को भ्रष्ट कर डालती है। अतः हमें गिरिजा का यहाँ रहना स्वीकार नहीं है। शिवजी के मुख से यह वचन सुनकर हिमाचल आश्चर्य चकित रह गया, परन्तु गिरिजा ने शिवजी को सम्बोधित कर कुछ बातें कहीं।
हे नारद! गिरिजा ने कहा-हे तपस्वी! आपका मत यह है कि पुरुष प्रकृति से पृथक रहता है, परन्तु मैं कहती हूँ कि प्रकृति के बिना पुरुष कभी नहीं ठहर सकता। इस संसार में जो कुछ भी दृष्टिगोचर होता है. वह सब प्रकृति का स्वरूप है। प्रकृति जड़ तथा चैतन्य को अपने वश में रखती है। आप की समझ में तो पुरुष और प्रकृति अलग-अलग हैं, परन्तु मेरी समझ में पुरुष प्रकृति से मिला हुआ है; क्योंकि कहना, सुनना तथा तपस्या करना आदि सब कार्य माया के रूप हैं। जो पुरुष माया से अलग है, उसे तो तपस्या करते समय किसी के द्वारा विघ्न डाले जाने का भय होना ही नहीं चाहिए।
गिरिजा के ऐसे वचन सुनकर शिवजी बोले-हे गिरिजे! तुम्हारी यह बुद्धि केवल अपने मन से उत्पन्न की हुई है, जिसे केवल आनुमानिक ही कहा जा सकता है। तुम्हें यह जान लेना चाहिए कि ब्रह्म सबसे श्रेष्ठ है। माया कभी स्वाधीन नहीं है। क्योंकि वह जड़ होती है। यदि तुम्हें ऐसा अहंकार है कि माया और ब्रह्म एक दूसरे से अलग नहीं रह सकते तो तुम ब्रह्म को रोक क्यों नहीं लेती हो ?
इतना कहकर शिवजी चुप हो गये। तब हिमाचल शिवजी की स्तुति करने के उपरान्त अपने घर को लौट गये, परन्तु गिरिजा को सखियों सहित वहीं छोड़ गये। इस बार शिवजी ने भी उनसे यह आग्रह नहीं किया कि वे गिरिजा को लौटा ले जायँ। गिरिजा प्रतिदिन अपनी सखियों सहित शिवजी की सेवा करने लगीं। वे वन से अनेक प्रकार के पुष्प आदि तोड़कर लातीं और शिवजी का पूजन किया करती थीं, परन्तु शिवजी का चित्त किसी भी प्रकार चलायमान न हुआ।
हे नारद! गिरिजा अपने मन में विचार किया करती थीं कि शिवजी मुझे किस समय स्वीकार करेंगे ? उधर शिवजी भी अपने मन में यह सोचते थे कि यदि मैं गिरिजा को इसी समय ग्रहण कर लूँगा तो इसे अपने मन में बहुत अहंकार हो जायगा। इसके अतिरिक्त तीनों लोकों में मेरी निन्दा भी होगी। क्योंकि उस समय लोग यह कहेंगे कि शिवजी ने काम के आवेश में गिरिजा को स्वीकार कर लिया। जब गिरिजा मेरे लिए बहुत तपस्या करेगी, तब मैं इसके मनोरथों को पूर्ण करूँगा।
यह निश्चय कर शिवजी ध्यान में मग्न हो गये। उसी समय तारक नामक दैत्य के द्वारा दुःखी होकर सब देवता मेरी शरण में आये। तब मेरे कहने से इन्द्र ने कामदेव को बुलाकर शिवजी को वश में करने के लिए उसे हिमालय पर्वत पर भेजा। इन्द्र की आज्ञा मानकर कामदेव शिवजी के पास गया, वहाँ उनकी क्रोधाग्नि में पड़कर भस्म हो गया। उस समय तीनों लोकों में हाहाकर मचा। गिरिजा ने वन में जाकर बहुत तपस्या की और शिवजी ने प्रसन्न होकर उन्हें अंगीकार कर लिया।
॥ हिरण्यकशिपु तथा हिरण्याक्ष की मृत्यु पर दिति द्वारा कश्यप से पुत्र की याचना ॥
इतनी कथा सुनाकर सूतजी ने कहा-हे शौनकादि ऋषियो! ब्रह्माजी के मुख से यह वृत्तान्त सुनकर नारदजी ने संशययुक्त हो, यह प्रार्थना की-हे पिता! आप मुझे तारक दैत्य द्वारा देवताओं को दुःख देने, कामदेव के भस्म होने तथा शिवजी द्वारा गिरिजा को पुनः ग्रहण करने का वृत्तान्त विस्तारपूर्वक सुनाने की कृपा करें। ब्रह्माजी बोले-हे पुत्र! तुम ध्यान देकर इस कथा को सुनो।
कश्यप की दिति नामक स्त्री के गर्भ से हिरण्यकशिपु तथा हिरण्याक्ष नामक दो अत्यन्त बलवान् तथा तेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुए। उन्होंने अपनी शक्ति द्वारा तीनों लोकों को वश में कर लिया। उनके अत्याचारों के कारण देवताओं को स्वप्न में भी आनन्द नहीं मिलता था। तब विष्णुजी ने अवतार लेकर हिरण्यकशिपु को मारा तथा वाराह अवतार लेकर हिरण्याक्ष का वध किया। उस समय सब देवता प्रसन्न होकर विष्णुजी की स्तुति करने लगे।
हे नारद! अपने दोनों पुत्रों की मृत्यु से दिति को बहुत दुःख हुआ। उसने कश्यप के पास जाकर सब समाचार कह सुनाया। तदुपरान्त उसने अपने पति की अत्यन्त सेवा करके, उनसे आनन्द प्रदान करनेवाले एक पुत्र की माँग की। दिति की सेवा से प्रसन्न होकर कश्यप ने उससे यह कहा-हे दिति! तुम एक सहस्त्र वर्षों तक तपस्या करो। यदि तुम्हारा तप सिद्ध हुआ तो तुम्हें अवश्य ही भाग्यवान् पुत्र की प्राप्ति होगी।
यह सुनकर दिति ने तप करना आरम्भ कर दिया। जब इन्द्र ने दिति को इस प्रकार तप करते देखा तो वे पास जाकर दिति की सेवा करने लगे। दिति ने उसकी सेवा से प्रसन्न होकर पूछा-हे इन्द्र! तुम मेरी इतनी सेवा किस इच्छा से कर रहे हो ? तुम मुझे अपनी अभिलाषा बताओ तो मैं उसे अवश्य पूर्ण करूँगी। यह सुनकर इन्द्र ने उत्तर दिया-हे माता! हम अपनी सेवा के बदले तुम से यही वर माँगते हैं कि जिस पुत्र के लिए तुम ऐसा कठिन तप कर रही हो, वह जब जन्म ले तो हमारे भाई के समान, हमारा परम हितैषी हो और हम देवताओं का दुःख दूर किया करे। यह बात सुनकर दिति ने अत्यन्त दुःखी होकर कहा-हे इन्द्र! तुमने छल करके मुझे ठग लिया है, फिर भी मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ण करूँगी । इतना कहकर दिति पुनः उग्र तप करने लगी।
हे नारद! एक दिन अचानक ही दिति सोते समय अशुद्ध हो गयी। उस समय इन्द्र छिद्र के मार्ग द्वारा उसके गर्भाशय में प्रवेश कर गये। वहाँ पहुँचकर, उन्होंने दिति के गर्भ में जो बालक था, उसके सात खण्ड कर डाले; परन्तु इतने पर भी जब वह बालक नहीं मरा और एक के स्थान पर सात रूपों में विभाजित हो गया, तब इन्द्र ने उनमें से प्रत्येक खण्ड के सात सात टुकड़े और कर दिये।
इस प्रकार वे सब उनचास टुकड़े हो गये। परन्तु वे सब टुकड़े मृत्यु को प्राप्त न होकर अलग-अलग बालक के रूप में जीवित बने रहे। यह देखकर इन्द्र दिति के गर्भाशय से बाहर निकल आये। इसी बीच दिति की नींद टूट गयी। तब उन्होंने अत्यन्त चिन्तित होकर इन्द्र से पूछा कि कुछ देर पूर्व मेरे गर्भाशय में किसने प्रवेश किया था ? दिति की बात सुनकर इन्द्र ने उन्हें सब सच्चा वृत्तान्त कह सुनाया। उस घटना को सुनकर दिति को अत्यन्त प्रसन्नता हुई। जब वे उन्चास खण्ड बालक के रूप में प्रकट हुए, तब उनका नाम मरुद्गण अर्थात् वायु रक्खा गया। वे उन्चासों मरुद्गण इन्द्र के भाई होकर, देवपद को प्राप्त हुए।
हे नारद! मरुद्गणों के जन्म के पश्चात् दिति ने कश्यपजी की फिर बहुत सेवा की और यह कहा कि हे प्रभो! अब आप मुझे एक ऐसा लड़का दीजिये, जिसके शरीर पर किसी भी शस्त्र का प्रभाव न हो सके। यह सुनकर कश्यप ने उत्तर दिया-हे दिति! तुम दश सहस्त्र वर्षों तक तपस्या करो, तो तुम्हें निश्चय ही ऐसे पुत्र की प्राप्ति होगी । पति की आज्ञानुसार दिति ने पुनः दश सहस्त्र वर्षों तक कठिन तप किया। जब उसकी तपस्या पूर्ण हुई तो उसके गर्भ से एक बालक ने जन्म लिया। उसका नाम 'वज्रांग' रखा गया।
वह बालक महाप्रतापी, तेजस्वी, धीर, वीर, तथा बुद्धिमान था, उसने अपनी माता दिति की आज्ञा से इन्द्र को पकड़ लिया। फिर उसे लात-घूसों से अच्छी तरह पीटता और पृथ्वी पर घसीटता हुआ अपनी माता के सामने लाकर खड़ा कर दिया। हार कर इन्द्र ने वज्रांग की अधीनता स्वीकार कर ली।
हे नारद! जब मैंने इन्द्र की यह दशा देखी, उस समय मैंने तथा कश्यप ने वज्रांग के पास जाकर यह कहा-हे पुत्र! तुमने इन्द्र को अपने वश में कर लिया है । अब तुम हमारे ऊपर कृपा करके इसे छोड़ दो। तुम अपने कुल में सूर्य के समान प्रतापी हो। तुम्हारी शक्ति का वर्णन कहाँ तक किया जाय। यह सुनकर वज्रांग ने उत्तर दिया- मैं आप लोगों के कहने से इन्द्र को छोड़े देता हूँ। मुझे इन्द्रलोक प्राप्त करने की कोई इच्छा नहीं है।
मैंने तो अपनी माता की आज्ञा मानकर ही इन्द्र को यह दंड दिया है।इतना कहकर वह मुझसे बोला-हे पितामह! आप तीनों लोकों के स्वामी हैं, अतः मैं चाहता हूँ कि आप मुझे तीनों लोकों का सार बता दें। उसकी बात सुनकर मैंने बहुत देर तक सोच-विचार करने के उपरान्त उसे तपस्या तथा योग का सार बता दिया और वारांगी नामक एक स्त्री उसे देकर बोला-हे वज्रांग! यह स्त्री तुम्हारी पत्नी होगी, तुम इसे स्वीकार करो।
हे नारद! इतना करके मैं तो अपने लोक को लौट आया, उधर वज्रांग समुद्र में घुसकर तपस्या करने लगा। उसकी स्त्री वारांगी भी समुद्र, के तट पर स्थिर एक पर्वत के समीप बैठकर तपस्या करने लगी। उस समय इन्द्र ने उसकी तपस्या भ्रष्ट करने के लिए अपने अनेक सेवकों को भेजा। उन्होंने अनेक प्रकार के स्वरूप धारण कर वारांगी को डराया परन्तु उस स्त्री के ऊपर किसी का कुछ वश न चला।
यह देखकर इन्द्र ने अत्यन्त भयभीत हो, मनुष्य रूप धारण कर उसकी शरण में पहुँचा, जैसे ही वारांगी ने उसकी ओर अपनी दृष्टि घुमायी, वैसे ही इन्द्र की सम्पूर्ण माया इस प्रकार लुप्त हो गयी, जिस प्रकार शिवजी के दर्शन प्राप्त करके, सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं। तब इन्द्र अपने गणों के साथ उस स्थान से चला गया।
हे नारद! कुछ समय बाद वज्रांग की तपस्या से प्रसन्न होकर मैं उसे वर देने के लिए पहुँचा। उस समय उसने मेरी बहुत प्रार्थना करते हुए यह कहा-हे पितामह! आप मुझे अपना सेवक जानकर यह वरदान दीजिये कि मुझ में आसुरी भाव उत्पन्न न हो। मेरा मन धार्मिक कार्यों में सदैव लगा रहे। वज्रांग की विनती सुनकर मैंने उसे इच्छित वरदान दे दिया और अपने लोक को लौट आया।
तदुपरान्त वज्रांग भी जल से बाहर निकल कर अपनी स्त्री के पास जा पहुँचा। स्त्री ने उसे देखकर रोते हुए इन्द्र के गणों द्वारा कष्ट देने का सब हाल कह सुनाया, वज्रांग ने उसे शान्त करते हुए धर्म का उपदेश किया और यह कहा कि हमें इन्द्र के ऊपर क्रोध करना उचित नहीं है। उस समय तो वारांगी यह सुनकर चुप रह गयी।
जब कुछ समय उसे पति की सेवा करते हुए व्यतीत हुए, तब एक दिन उसने वज्रांग से कहा कि हे स्वामी! इन्द्र हम लोगों का शत्रु है और उसने मुझे बहुत दुःख दिया आप मेरी मनोभिलाषा पूर्ण करने के निमित्त मुझे एक ऐसा पुत्र दीजिये जो इन्द्र से मेरे अपमान का बदला ले सके। इतना कहकर वह अपने पति के चरणों में गिर पड़ी।
॥ वज्राङ्ग का तप एवं तारकासुर की उत्पत्ति का वर्णन ॥
ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! अपनी स्त्री के मुख से यह शब्द सुनकर वज्रांग ने अपने मन में दुःखी होकर यह विचार किया कि अब मुझे क्या करना चाहिए ? मेरी पत्नी तो देवताओं से शत्रुता करना चाहती है। मैं यह नहीं समझ पा रहा हूँ कि मुझे क्या करना उचित है और क्या अनुचित है ? नियम यह है कि यदि स्त्री का मनोरथ पूर्ण हो जाये तो वह अत्यन्त सुख देने वाली होती है, उसके कारण तीनों लोकों में किसी को अप्रसन्नता नहीं होती।
इसके विपरीत जो स्त्री के मनोरथ को पूरा नहीं करता तो वह भी लोक में बहुत दुःख पाता है और अन्त में नरक में गिरता है। इस विचार से वज्रांग बहुत दुःखी होकर तपस्या करता रहा। बहुत समय तक वह उसी अवस्था में बैठा रहा। अन्त में, मैं उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर उसे वरदान देने के लिए उसके पास पहुँचा। उस समय उसने मेरी बहुत स्तुति करते हुए यह माँग की मेरे एक ऐसा पुत्र उत्पन्न हो, जो परम तेजस्वी, बलवान् तथा अपनी माता को आनन्द देनेवाला सिद्ध हो। मैं उसे इच्छित वरदान देकर अपने लोक को लौट आया। तब वज्रांग ने भी अपने घर पहुँचकर वारांगी को वरदान पाने का सब हाल कह सुनाया।
हे नारद! कुछ समय बाद वारांगी गर्भवती हुई। उसके गर्भ से जब बालक उत्पन्न हुआ, उस समय संसार में अनेक प्रकार के उपद्रव होने लगे। पृथ्वी पर भूकम्प आने लगे, आकाश से तारे टूट-टूटकर गिरने लगे। इस प्रकार उस दुखदायी बालक ने जन्म लिया। वज्रांग ने नियमानुसार जातकर्म आदि संस्कारों को सम्पन्न किया। उसकी माता को भी अत्यन्त प्रसन्नता हुई। वह बालक अपने माता-पिता के दुःख को दूर करने के लिए उत्पन्न हुआ था इसलिए उसका नाम 'तारक' रखा गया।
हे नारद! कुछ समय बाद जब वह बालक बड़ा हुआ तब उसने अपनी माता की आज्ञा से पारिजात पर्वत पर जाकर तीनों लोकों को विजय करने की इच्छा से तप करना आरम्भ कर दिया। वह सौ वर्षों तक पाँव के अगूठे के बल खड़ा रह कर तपस्या करता रहा। गर्मियों के दिनों में वह अग्नि में तपा तथा अन्य ऋतुओं में वन में बैठा रहा। जाड़े के दिनों में उसने पानी के भीतर खड़े होकर तपस्या की। उसकी इस कठिन तपस्या को देखकर भी जब शिवजी प्रसन्न नहीं हुए, तब उसने आसुरी-यज्ञ करना आरम्भ कर दिया। और उसने अपनी शरीर को काट-काट कर अग्नि में हवन करने का व्रत लिया।
जब उसकी इस कठिन तपस्या से तीनों लोक जलने लगे, उस समय सब देवताओं ने मेरे पास आकर अपने दुःख को सुनाते हुए कहा-हे ब्रह्मन्! तीनों लोकों में यह कैसी अग्नि फैल रही है। हम सबलोग इसमें पड़कर भस्म हुए जाते हैं। आप हमारी रक्षा करने की कृपा करें।
हे नारद! देवताओं की प्रार्थना सुनकर मैंने बहुत विचार किया, परन्तु शिवजी की माया को किसी प्रकार नहीं समझ सका। तब मैं उन सबको अपने साथ लेकर विष्णुजी के पास जा पहुँचा। विष्णुजी भी शिव की माया को नहीं जान सके। तब हम सबलोग शिवजी के पास पहुँचे और स्तुति-प्रणाम करने के उपरान्त उनसे कहने लगे-हे प्रभो! हम सब आपकी शरण में आये हैं। आप सबसे श्रेष्ठ तथा सबके स्वामी हैं। आप कृपा करके हमारे दुःख को दूर कीजिये। हमारी प्रार्थना सुनकर शिवजी ने हँसते हुए कहा-हे देवताओ ! तारक द्वारा कठिन तपस्या किये जाने के कारण ही सब लोगों की यह दशा हो रही है। वह देवताओं को दुःख देने के लिए उग्र तप कर रहा है, इसीलिए हम उसे वरदान देने में संकोच करते हैं।
शिवजी के मुख से यह वचन सुनकर देवताओं ने अत्यन्त अचरज में भरकर कहा-हे प्रभो! आप तारक को वरदान अवश्य दे दें। क्योंकि उसे वरदान देने पर हम इतनी जल्दी नष्ट नहीं होंगे, जितने इस समय अग्नि के कारण भस्म हुए जाते हैं। तब शिवजी बोले-हे देवताओ! क्या तुम में से कोई भी इतना बलवान् नहीं है जो अपनी माया द्वारा तारक की तपस्या को भ्रष्ट कर दे ?
यह सुनकर विष्णुजी ने अहंकार में भरकर उत्तर दिया-हे प्रभो! यदि आप मुझे आज्ञा दें तो मैं तारक की तपस्या को भंग कर सकता हूँ। विष्णुजी की यह बात सुनकर शिवजी ने उन्हें आज्ञा दे दी। तब विष्णुजी मोहिनी रूप धारण करके तारक के पास जा पहुँचे; परन्तु शिवजी की लीला के कारण वे तारक पर कुछ भी प्रभाव नहीं डाल सके और असफल मनोरथ होकर लौट आये।
इतनी कथा सुनकर ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! शिवजी की माया अत्यन्त बलवान् है। इसके कारण विष्णुजी मोहिनी स्वरूप धारण करके भी शिव भक्त तारक की तपस्या भ्रष्ट करने में असमर्थ रहे। विष्णुजी ने शिवजी के पास जाकर यह प्रार्थना की हे प्रभो! तारक की तपस्या भंग करने में, मैं असफल रहा हूँ। आप उसे वरदान दे दीजिये।
यह सुनकर शिवजी तारक का वरदान देने के लिए उसके पास जा पहुँचे और उसे सुनाते हुए बोले-हे तारक! मैं तुम्हारी तपस्या से अत्यन्त प्रसन्न हूँ। तुम जो चाहो वह वरदान माँग लो। यह सुनकर तारक ने अत्यन्त प्रसन्न हो, पहिले तो शिवजी को प्रणाम किया, और फिर हाथ जोड़कर यह कहा-हे प्रभो! मैं आपके अतिरिक्त अन्य किसी के हाथ से न मरूँ और करोड़ों वर्षों तक तीनों लोकों का राज्य करूँ। यह वरदान आप मुझे दीजिये।
शिवजी ने तारक की यह प्रार्थना स्वीकार कर ली, तदुपरान्त वे उसे इच्छित वरदान दे, कैलाश पर्वत पर लौट आये। तारक भी शिवजी से वरदान प्राप्त कर, अत्यन्त प्रसन्न हो, अपने घर को लौट गया।
॥ तारक का वरदान प्राप्त कर, देवताओं पर विजय पाना ॥
इतनी कथा सुनकर नारदजी ने कहा-हे पिता! वरदान पाकर तारक ने क्या किया, वह सब वृत्तान्त आप मुझे सुनाने की कृपा करें। ब्रह्माजी बोले-हे पुत्र! वरदान पाकर तारक अपने घर लौट आया और उसने अपनी स्त्री से सम्पूर्ण वृत्तान्त कह सुनाया। उस समय सब दैत्यों ने एकत्र होकर तारक को अत्यन्त प्रतिष्ठित तथा अपना स्वामी स्वीकार करते हुए, उसकी बहुत प्रकार से स्तुति-प्रशंसा की। तदुपरान्त तारक ने सब असुरों की एक बड़ी सेना इकट्ठी की। उसमें करोड़ों बलशाली असुर योद्धा थे।
उस सेना के दस मुख्य सेनापति थे, जिनके नाम इस प्रकार हैं-कुम्भक, कुन्ज, महिष, कुंजर, कालनेमि, निमि, कृष्णजठर, प्रजम्बुक, शुभ तथा कालकेतु। जो दैत्य इस सम्पूर्ण सेना का प्रधान सेनापति था, उसका नाम 'ग्रसन' था। ये सब असुर योद्धा अपने सामने तीनों लोकों को तुच्छ समझते थे। इस सेना को लेकर तारक ने सबसे पहिले इन्द्र पर चढ़ाई की, तदुपरान्त देवलोक को चारों ओर से घेर लिया।
हे नारद! उस समय देवता तथा दैत्यों में घोर युद्ध होने लगा, जिसमें अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग हुआ। तारक से इन्द्र ने युद्ध ठाना, निमि से अग्नि आ भिड़े, कालनेमि तथा यमराज आमने-सामने हुए, नमुचि तथा नर्ऋति ने परस्पर युद्ध करते हुए अपनी-अपनी विजय की कामना की, महिषासुर तथा वरुण ने एक दूसरे को मारने के लिए शस्त्र धारण किये। इसी प्रकार सभी दैत्यों और देवता अपनी-अपनी जोड़ी देखकर आपस में युद्ध करने लगे।
हे नारद! उस समय तारक ने अपना तेज प्रकट करके इन्द्र को परास्त कर दिया, तदुपरान्त वह विष्णुजी के सम्मुख जा पहुँचा। तारक के इस प्रताप को देखकर विष्णुजी ने पहिले तो बहुत आश्चर्य किया, फिर शिवजी के वरदान की महिमा समझकर युद्ध-क्षेत्र से अन्तर्धान हो गये। इस प्रकार तारक ने उस युद्ध में विजय पाकर सब देवताओं को बन्दी बना लिया। तदुपरान्त वह उन्हें अपनी राजधानी में ले गया और बन्दीगृह में डालकर अनेक प्रकार की यन्त्रणा देने लगा।
जिस स्थान पर महानदी समुद्र में जा मिली है, उसी स्थान पर तारक की राजधानी थी। इस प्रकार वहाँ देवता तथा दैत्य इकट्ठे होकर रहने लगे। तारक ने निर्भय होकर अपने देश को अलग-अलग भागों में बाँट दिया और उनका राज्य असुरों को सौंप दिया, जहाँ वे अपने परिवार तथा मित्रों सहित आनन्द का उपभोग करने लगे। इस प्रकार विष्णुजी के स्थान पर तारक स्वयं ही तीनों लोकों का स्वामी बन बैठा।
उसने अग्नि की पदवी निमि को दी तथा कालनेमि की यमराज के स्थान पर नियुक्त किया । तदुपरान्त उसने निऋति का पद नमुचि को, वरुण का महिषासुर को, पवन का मेध को, कुबेर का कक्ष कोमछिद्र के जुम्भक को, अहिपति का शुम्भ को, ब्रह्मा का कुंभ को तथा मित्र का पद कुन्जर को दिया। इसी प्रकार उसने सब देवताओं के पद पर दैत्यों को प्रतिष्ठित कर दिया। वे सब असुर संसार के स्वामी बनकर राज्य करने लगे।
उनके राज्य में देवताओं के अतिरिक्त अन्य कोई भी प्राणी दुःखी नहीं था। कुछ समय बीतने पर विष्णुजी ने छिपे हुए देवताओं के पास जाकर यह कहा कि हे देवताओ! शिवजी का भक्त होने के कारण तारक अत्यन्त बलवान तथा प्रतापी है, इसलिए वह तुमसे कभी परास्त नहीं होगा। मैंने बहुत कुछ विचार करने के उपरान्त यह निश्चय किया है कि तुम सब लोग अपना मनोरथ प्राप्त करने के लिए उसकी सेवा करना आरम्भ कर दो।
तुम नट का स्वरूप धारण कर उसके पास जाओ और अपने कौशल द्वारा उसे प्रसन्न करो। जब वह प्रसन्न हो जायगा, तब तुम्हें अवश्य छोड़ देगा। तदुपरान्त सब देवता नट का रूप धारण कर तारक के पास जा पहुँचे और उससे ऐसी बातें कीं, जिनके कारण वह अत्यन्त प्रसन्न हो गया। तब तारक ने देवताओं से कहा-हे देवताओ! तुम जो चाहो, वह मुझ से माँग लो।
यह सुनकर देवताओं ने प्रार्थना की-हे असुरराज! यदि आप हम पर प्रसन्न हैं तो देवताओं को अपने बन्दीगृह से मुक्त कर दीजिये देवताओं की इस प्रार्थना को स्वीकार कर, तारक ने उनके सभी साथियों को बन्दीगृह से मुक्त कर दिया। तब वे भी अपने लोक को चले गये। हे नारद! तारक के राज्य में देवताओं के अतिरिक्त और कोई दुःखी नहीं था। यह बात तुम्हें भली-भाँति जान लेनी चाहिए।
॥ तारक द्वारा दुखी देवताओं का ब्रह्मा की शरण में पहुँचना ॥
ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! जब देवताओं ने राक्षसों द्वारा पीड़ित होकर अनेक प्रकार के दुःख उठाये तो वे परस्पर इस प्रकार कहने लगे कि हम किसके पास जाकर अपना दुःख कहें ? सूर्य और चन्द्रमा जो संसार के जीवनदाता हैं, वे स्वयं भी इस समय तारक की सेवा करते रहते हैं। पता नहीं, यह दैत्य हमें कब तक दुःख देता रहेगा ? इस समय हमारा कौन सहायक है, जिसके पास जाकर हम अपना दुःख सुनायें ? इस प्रकार देवताओं ने दुःख में डूब कर बहुत चिन्ता की।
अन्त में, वे सब एकत्र होकर इन्द्र तथा बृहस्पति को साथ लेकर मेरे पास आये और मेरी स्तुति तथा पूजा करने लगे। देवताओं की प्रार्थना सुनकर मैंने उनसे कहा-हे देवताओ! मैं तुमलोगों को अत्यन्त दुःखी तथा चिन्तित देख रहा हूँ। इन्द्र के मुख पर भी कोई तेज दिखाई नहीं देता। हे पुत्रो! तुम मुझे अपने यहाँ आने का सब कारण कह सुनाओ।
हे नारद! मेरी बात सुनकर देवताओं की ओर से बृहस्पति ने मुझसे कहा-हे पिता! तारक नामक दैत्य ने शिवजी से वरदान प्राप्त कर तीनों लोकों को अपने वश में कर लिया है। उसके भय से सूर्य ने भी अपने तेज को ठंडा कर लिया है तथा चन्द्रमा भी अपनी सम्पूर्ण कलाओं सहित उसकी सेवा में हर समय उपस्थित रहता है। सभी ऋतुएँ उसकी सेवा में बनी रहती हैं और फल-फूलों को उत्पन्न कर, उसे सन्तुष्ट रखती हैं। इन्द्र भी उसकी बहुत प्रकार से सेवा किया करते हैं।
इस प्रकार सभी देवता उनके सेवक बने हुए हैं, परन्तु वह किसी के ऊपर कोई कृपा नहीं दिखाता। जिन देववृक्षों की पत्तियों को देवस्त्रियाँ बहुत समझ-बूझ कर तोड़ती थीं, उन वृक्षों को तारक के साथी जड़ से उखाड़कर फेंक देते हैं। जिस समय वह शयन करता है, उस समय देवताओं की स्त्रियाँ अपने नेत्रों से आँसू बहाती हुईं उसकी स्तुति करने को विवश होती हैं।
उनके भय से देवता अपने लोक की ओर आँख उठाकर भी नहीं देख सकते। वे स्वयं ही यज्ञ का भाग ले लेते हैं। इन्द्र को भी कोई कुछ नहीं गिनता। जिस प्रकार सन्निपात हो जाने पर कोई औषधि काम नहीं देती, उसी प्रकार भगवान् विष्णु के जिस चक्र पर हमें बड़ा भारी भरोसा था, वह इन दिनों व्यर्थ हो गया है। हे पिता! आप हमारे दुःख को दूर करने के लिए कोई उपाय करें।
हे नारद! देवताओं की प्रार्थना सुनकर मैंने उन्हें उत्तर दिया-हे देवताओ! तारक ने शिवजी से ऐसा वरदान प्राप्त किया है कि उसे शिवजी के अतिरिक्त और कोई नहीं मार सकेगा। यदि शिवजी के वीर्य से कोई पुत्र उत्पन्न हो तो वह भी तारक को मारने में समर्थ हो सकता है, क्योंकि पुत्र में पिता का तेज रहता है और उसे पिता का स्वरूप कहा जाता है।
यह बात बहुत कठिन दिखाई देती है। इस समय शिवजी हिमाचल पर्वत पर तपस्या कर रहे हैं तथा गिरिजा अपनी सखियों सहित उनकी सेवा में सलंग्न हैं। यदि किसी प्रकार वे दोनों परस्पर मिल जायँ तो तुम्हारा कार्य पूर्ण हो सकता है। गिरिजा के बिना और किसी से तुम्हारा कार्य नहीं चलेगा। मैं तुम्हें एक उपाय बताता हूँ तुम उसके अनुसार कार्य करो। वह उपाय यह है कि तुम कामदेव को शिवजी के पास भेजो वह शिवजी के मन में गिरिजा के प्रति स्नेह उत्पन्न करे। बस, इतना होते ही सब कार्य स्वतः सिद्ध हो जायेंगे।
हे नारद! मेरी बात सुनकर सब देवता बहुत स्तुति करते हुए अपने घर को चले गये। तदुपरान्त इन्द्र ने कामदेव को अपने समीप बुलाया और उससे यह कहा-हे कामदेव! तुम देवताओं के हितैषी तथा उनका सब कार्य सिद्ध करने वाले हो। ब्रह्माजी ने जो उपाय बताया है, उसके अनुसार कार्य सिद्ध करने के हेतु शीघ्र तैयार हो जाओ।
हे मित्र! वीरों की परीक्षा युद्ध के समय ली जाती है, उदार लोगों को समय के अनुसार पहिचाना जाता है, इसी प्रकार विपत्ति पड़ने पर मित्र तथा स्त्री की परीक्षा का अवसर होता है। इस अवसर पर मैं तुम्हारी मित्रता की परीक्षा लेना चाहता हूँ। इस कार्य में केवल मेरा ही स्वार्थ नहीं है, अपितु अन्य सब लोगों का भी हित है।
हे नारद! इन्द्र की बात सुनकर कामदेव ने उत्तर दिया-हे देवराज! मैं आपकी प्रत्येक आज्ञा का पालन करने को प्रस्तुत हूँ। यदि कोई व्यक्ति आपका पद प्राप्त करने के लिए तपस्या कर रहा हो तो मैं उसके तप को इसी समय भ्रष्ट कर सकता हूँ। देवता, दैत्य, ऋषि आदि सभी लोग मेरे वश में रहते हैं। मनुष्य तो सेवकों की भाँति मेरी पूजा किया करते हैं।
आप अपने हृदय में अब किसी प्रकार की चिन्ता न करें। कामदेव की इन बातों को सुनकर इन्द्र ने अत्यन्त प्रसन्न हो, उसे अपने पास बैठाते हुए कहा-हे मन्मथ! मैं जिस कार्य के लिए तुमसे कहने जा रहा था, उसे तुम स्वयं ही बता रहे हो यह अत्यन्त शुभ है। अब सुनो, तारक दैत्य ने शिवजी की तपस्या करके उनसे अमोघ वरदान प्राप्त किया है। उसने धर्म-कर्म को नष्ट करके, उस वरदान के बलपर देवताओं के सम्पूर्ण सुखों को छीन लिया है और उनके पद पर अपने साथी देत्यों को प्रतिष्ठित कर दिया है।
उसके ऊपर देवताओं के सभी अस्त्र-शस्त्र निष्फल हो गये हैं, इस कारण सभी देवता अत्यन्त चिन्तित एवं दुःखी हैं। ब्रह्माजी ने इस कष्ट से मुक्ति प्राप्त करने का यह उपाय बतलाया है कि शिवजी के वीर्य द्वारा किसी पुत्र की उत्पत्ति हो तो वह तारकासुर का वध करने में समर्थ हो सकेगा। शिवजी स्वयं अपने भक्त तारक को अपने हाथ से नहीं मारेंगे। अब कहना यह है कि गिरिजा अपनी सखियों सहित उनकी सेवा में संलग्न हैं। तुम अपनी माया द्वारा शिवजी को मोहित करके उनका संयोग गिरिजा के साथ करा दो। ऐसा करने से शिवजी के द्वारा पुत्र उत्पन्न होना सम्भव हो जायेगा।
॥ इन्द्र की आज्ञा द्वारा कामदेव का शिवजी के पास जाना तथा उनके तीसरे नेत्र की अग्नि द्वारा भस्म होना ॥
ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! इन्द्र की बात को कामदेव ने स्वीकार कर लिया। तदुपरान्त वह शिवजी पर विजय प्राप्त करने के हेतु, इन्द्र से विदा लेकर अपनी पत्नी के साथ चल दिया। जिस समय वह चला, उस समय अनेक प्रकार के अपशकुन होने लगे। होनी के वशीभूत होकर उसने उन अपशकुनों पर कोई विचार नहीं किया। उसने वसंत आदि अपनी सम्पूर्ण सेना को एकत्र किया और अत्यन्त अहंकार में भरकर शिवजी पर विजय प्राप्त करने के लिए हिमाचल पर्वत की ओर प्रस्थान किया।
मार्ग में वह इस बात पर निरन्तर विचार करता चला जा रहा था कि मैं शिवजी के ऊपर किस प्रकार विजय पाऊँगा। जब वह शिवजी के समीप पहुँचा, उस समय उसने अपनी माया द्वारा सब ओर वसंत ऋतु को फैला दिया। वसंत ऋतु के फैलते ही उस स्थान पर चारों ओर रंग-बिरंगे फूल खिल गये तथा लताओं ने प्रकट होकर वृक्षों से आलिंगन करना आरम्भ कर दिया। अनेक प्रकार के पक्षी मीठे स्वरों में चहचहाने लगे।
जिन लोगों को अपने ज्ञान का बड़ा अभिमान था, वे भी कामदेव की माया में पड़े बिना न रहे। सब का तप और संयम नष्ट हो गया। चराचर जगत् में ऐसा कोई भी प्राणी नहीं बचा, जिसे कामदेव के बाणों ने घायल न किया हो। यद्यपि यह अवस्था एक मुहूर्त भर ही रही, परन्तु इसी बीच सब लोगों का विवेक नष्ट हो गया। सम्पूर्ण संसार तो कामदेव के वशीभूत हुआ, लेकिन शिवजी और उनके गणों पर कामदेव का कोई प्रभाव न पड़ा।
जिस समय कामदेव शिवजी के पास पहुँचा, उस समय उसका सम्पूर्ण बल नष्ट हो गया। कामदेव की शक्ति क्षीण होते ही संसार के सभी प्राणी उसी प्रकार पूर्वस्थिति में आ गये, जिस प्रकार कि नशा उतर जाने पर मनुष्य होश में आ जाता है। हे नारद! उस समय कामदेव अपने मन में इस प्रकार विचार करने लगा-मुझ से यह बड़ा अपराध हुआ जो मैं अपने अहंकार में भरकर शिवजी का चित डोलाने के लिए यहाँ चला आया।
अब शिवजी के क्रोध से मेरी मृत्यु अवश्य ही होगी। यह विचार कर कामदेव कुछ समय तक तो चिन्ता में पड़ा रहा, अन्त में उसने निश्चय किया कि पर उपकार के लिए यदि मुझे प्राण भी त्याग देने पड़ें तो वह शुभ ही है। साथ ही यदि मेरी मृत्यु शिवजी के द्वारा हुई तो मैं भी शिवगणों में गिना जाऊँगा। मुझे मृत्यु का भय त्याग कर देवताओं का कार्य सिद्ध करना चाहिए। यह निश्चय कर कामदेव ने पुनः अपनी शक्ति को प्रदर्शित किया और सम्पूर्ण संसार को पहिले के ही समान फिर अपने वश में कर लिया।
शिवजी ने यह दशा देखकर अपने मन को दृढ़तापूर्वक वश में कर लिया और हठ योग साध कर बैठ गये। यह देखकर कामदेव अपने धनुष पर बाण चढ़ा शिवजी की बाँयी ओर जा खड़ा हुआ। उस समय तपोभूमि में शिवजी के अतिरिक्त ऐसा और कोई नहीं था, जिसे उसने मोहित न कर लिया हो। वह छिपकर समय की प्रतीक्षा करने लगा। जिस समय शिवजी अपना ध्यान छोड़कर आसन पर बैठे और गिरिजा पूजन की सामग्री लेकर उनके पास आयीं, उसी समय कामदेव ने उचित अवसर जानकर, अपने बाण को कानों तक खींचकर शिवजी के हृदय पर छोड़ दिया।
उसके लगते ही शिवजी के मन में प्रीति का अंकुर उत्पन्न हो गया। उस समय शिवजी भी कामदेव के वशीभूत हो, मुस्कराते हुए, गिरिजा के सुन्दर अंगों की प्रंशसा करने लगे और यह इच्छा प्रकट करने लगे कि गिरिजा का हाथ पकड़कर अपने पास खींच लिया जाय। उस समय गिरिजा नारी-सुलभ लज्जा के कारण संकुचित हो, कुछ पीछे की ओर हट गयीं।
हे नारद! यह दशा देखकर शिवजी ने अपने मन में विचार किया कि यह क्या कारण है जो हम इस स्त्री के द्वारा छले गये हैं ? ऐसा कौन सा प्रतापी है, जिसने हमें ऐसा आचरण करने के लिए विवश कर दिया ? यह विचार कर ज्योंही उन्होंने चारों ओर दृष्टि घुमायी, त्योंही उन्हें अपने बाँयी ओर एक वृक्ष की आड़ में छिपा हुआ कामदेव दिखाई दे गया। उस समय शिवजी के भयानक रूप को देखकर तीनों लोक काँपने लगे और यह प्रतीत होने लगा मानो अब प्रलय होने ही वाली है। शिवजी ने कामदेव पर क्रोधित हो, जैसे ही अपने तीसरे नेत्र को खोला, वैसे ही कामदेव जलकर भस्म हो गया। उस समय तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। सभी देवता अत्यन्त भयभीत, परम दुःखी तथा दीन हो गये। और व्यक्तियों को अत्यन्त प्रसन्नता हुई।
इतनी कथा सुनकर नारदजी ने बह्माजी से कहा-हे पिता! यह चरित्र सुनकर मुझे अत्यन्त आश्चर्य होता है। शिवजी परब्रह्म, निष्पाप, माया-रहित, योगी, तीनों लोकों के स्वामी तथा देवताओं के पूज्य हैं, उनका नाम कामजित् तथा मृत्युजित प्रसिद्ध है, उनकी कृपा प्राप्त करके उनके भक्त कामदेव को अपने वश में किये रहते हैं। ऐसे भगवान् सदाशिव को कामदेव ने अपना लक्ष्य क्यों बनाया और सुगमतापूर्वक उनके ऊपर विजय कैसे प्राप्त कर ली ?
यह सुनकर ब्रह्माजी ने उत्तर दिया-हे नारद! मैं तुम्हें यह वृत्तान्त सुना चुका हूँ कि पहिले मैंने सन्ध्या नामक एक कन्या को उत्पन्न किया था, तदुपरान्त मैंने मन्मथ अर्थात् कामदेव को जन्म दिया। फिर मैंने कामदेव को यह वरदान भी दिया कि तुम तीनों लोकों के स्वामी बनकर सब लोगों को अपने वश में रखोगे। यहाँ तक कि मैं, विष्णु तथा शिव भी तुम्हारे वशीभूत हो जायेंगे।
मुझसे यह वरदान पाकर उसने सर्वप्रथम मेरे ही ऊपर अपना बाण छोड़ा और मुझसे कुकर्म करना चाहा। तब मैंने उसे यह शाप दिया कि तुम शिवजी के तीसरे नेत्र की ज्वाला में पड़कर भस्म हो जाओगे। इसी शाप के कारण कामदेव ने पहिले तो शिवजी को अपने वश में कर लिया, तदुपरान्त वह शिवजी के तीसरे नेत्र की ज्वाला में पड़कर भस्म हो गया। जिस समय शिवजी ने कामदेव को भस्म कर दिया, उस समय कुछ लोगों को दुःख हुआ और कुछ लोग सुखी हुए। गिरिजा को भी अत्यन्त आश्चर्य हुआ।
उस समय उनके शरीर से बहुत पसीना छूटा और वे अपने सौंदर्य का अहंकार त्यागकर मूच्छित हो गयीं। उनका कमल के समान मुख प्रभातकालीन चन्द्रमा के समान तेजहीन हो गया। जब सखियों ने उनकी इस अवस्था को देखा तो वे गिरिजा का हाथ पकड़कर उनका उपचार करने लगीं। तदुपरान्त चैतन्यता प्राप्त होने पर, गिरिजा अत्यन्त लज्जित हो, अपने घर लौट आयीं।
हे नारद! इस घटना के उपरान्त शिवजी भी हिमाचल पर्वत को छोड़कर अपने कैलाश पर्वत पर चले गये। शिवजी के चले जाने पर गिरिजा की यह दशा हुई कि वे हर समय शिवजी के चरित्रों का ध्यान करती हुईं, उन्हीं के स्मरण में संलग्न हो गयीं। कामदेव की स्त्री रति ने जब अपने पति की मत्यु को देखा, तो वह बहुत प्रकार से विलाप कर उठी। वह अपने पति के चरित्रों का वर्णन करती हुई 'हाय-हाय' शब्द का उच्चारण करती थी और अपने शरीर की सुधि-बुधि को भुला बैठी थी।
जब उसे कुछ चैतन्यता प्राप्त हुई, तब वह अपने पति के शव को सम्बोधित करती हुई इस प्रकार कहने लगी-हे स्वामी! मैंने आपको पहिले भी बहुत समझाया था कि शिवजी के साथ वैर करना उचित नहीं है, परन्तु आपने दूसरों के वश में पड़कर मेरी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया। हे नाथ! आपने मुझसे कुछ भी नहीं कहा और मुझे त्याग कर अकेले ही शिवपुरी को चले गये।
अब मैं अनाथ बनकर रह रही हूँ। आपने जैसा किया, उसका फल अच्छी तरह पा लिया। यह नियम है कि संसार में कोई किसी को दुःख देकर, स्वयं सुखी नहीं रहा है। उसे कहीं भी आनन्द नहीं मिलता है। हे पति! आप तो शिवगणों में सम्मिलित हो गये, लेकिन अब मेरा कोई नहीं रहा। इस प्रकार की बातें कहते हुए रति ने बहुत विलाप किया।
॥ इन्द्रदि देवताओं का शिव जी की शरण में पहुँचना तथा रति के वरदान की कथा ॥
ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! मैं, विष्णु तथा अन्य सभी देवता रति को साथ लेकर शिवजी की शरण में गये और उन्हें प्रणाम करके इस प्रकार स्तुति करने लगे-हे प्रभो! हम सबलोग शोकरूपी समुद्र मे डूब रहे हैं, अतः आप हमारा उद्धार करने की कृपा करें। हमारी प्रार्थना को सुनकर शिवजी ने प्रकट होकर दर्शन दिया। उस समय वे परमहंसों के समान स्वरूप धारण किये हुए थे। उनके उस सुन्दर रूप को देखकर हम सबको अत्यन्त प्रसन्नता हुई। तब मैंने अलग-अलग खड़े होकर शिवजी की प्रार्थना की।
शिवजी ने प्रसन्न होकर हम सबको सम्बोधित करते हुए कहा-हे देवताओ! तुम सबने जो हमारी स्तुति की है, उससे हम अत्यन्त प्रसन्न हुए हैं। जो मनुष्य इस स्तुति को पढ़ेगा, उस पर हम सदैव कृपा किया करेंगे। अब तुम जो चाहो, वह हमसे माँग लो। शिवजी के मुख से निकले हुए इन शब्दों को सुनकर हमने उनसे कहा-हे प्रभो आप हमारे मन की इच्छा को भली-भाँति जानते हैं, हम स्वयं आपसे क्या कहें ?
हे नारद ! यह सुनकर शिवजी ने हँसते हुए कहा-हे देवताओ! हमने ब्रह्मा के शाप को सत्य करने के लिए ही कामदेव को भस्म किया है। अब हम तुम्हें यह वरदान देते हैं कि आज से कामदेव शरीर रहित होकर 'अतनु' के नाम से संसार में प्रसिद्ध होगा और उसकी उत्पत्ति मन के द्वारा हुआ करेगी। उचित समय आने पर हम रति को उसका स्वरूप भी दिखा देंगे। तब वह हमारे पास इसी कैलाश पर्वत पर निवास किया करेगा। जब द्वापर युग में विष्णु का अवतार कृष्ण के रूप में होगा, तब कामदेव कृष्ण के पुत्र के रूप में जन्म लेगा। उस समय वह रति को पुनः प्राप्त कर लेगा।
अब रति को उचित है कि वह उस समय के आने तक इन्द्र के यहाँ जाकर रहे और अपने मन में किसी प्रकार का दुःख न माने। वह बिना कोई परिश्रम किये अपने पति को पुनः प्राप्त कर लेगी। जब रुक्मिणी के गर्भ से पुत्र के रूप में कामदेव की उत्पत्ति होगी, उस समय इन्द्र उसे उठा ले जायेंगे और समुद्र में डाल देंगे। वहाँ समुद्र में एक मछली उसे निगल जायगी। पर हमारे प्रताप से उसकी मृत्यु नहीं होगी।
उस मछली को एक केवट अपने जाल में फँसा लेगा और उसे 'शंबर' नामक एक असुर की भेंट कर देगा। जिस समय मछली का पेट फाड़ा जायेगा, उस समय कामदेव जिसका नाम उस समय 'प्रद्युम्न' प्रसिद्ध होगा, प्रकट होकर रति के पास गुप्तरूप से रहेगा। तदुपरान्त वह बालक उस असुर को मारकर यहाँ चला आयेगा।
इतना कहकर शिवजी सबके देखते-देखते अन्तर्धान हो गये। फिर देवताओं ने भी रति को इन्द्र के साथ कर दिया और अपने-अपने स्थान को चले गये। हे नारद! कामदेव का चरित्र तुम से कहा, अब तुम गिरिजा का वृत्तान्त सुनो।
॥ काम दहन पर पार्वती की तपस्या ॥
ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! जिस समय गिरिजा ने कामदेव को जलते हुए देखा, उस समय वे भयभीत हो वहाँ से भागकर अपने घर जा पहुँचीं। इस दशा को देखकर माता-पिता शीघ्र ही गिरिजा के समीप जा पहुँचे। उस समय हिमाचल के सम्पूर्ण नगर में भी खलबली मच गयी। जब गिरिजा को कुछ चैतन्यता प्राप्त हुई, तब उनकी माता ने इस प्रकार पूछा-हे पुत्री! तुझे इस प्रकार किसने भयभीत किया है, जो तू लम्बी-लम्बी श्वासें ले रही है ? तब गिरिजा ने जो कुछ दृश्य देखा था वह सब विस्तारपूर्वक कह सुनाया। उसे सुनकर माता-पिता ने गिरिजा को बहुत सान्त्वना दी।
हे नारद! कुछ समय बाद तुम गिरिजा के समीप पहुँचे। तब गिरिजा ने अत्यन्त लज्जित होकर तुमसे यह कहा कि आप मुझे ऐसा उपाय बतावें जिससे मुझे शिवजी की प्राप्ति हो। यह सुनकर तुमने उत्तर दिया-हे गिरिजे! शिवजी केवल तपस्या के वशीभूत रहते हैं। यदि तुम उन्हें अपने पतिरूप में प्राप्त करना चाहती हो, तो वन में जाकर कठिन तपस्या करो। शिवजी तपस्या के वशीभूत होकर सब लोकों का पालन करते हैं और उसी के बल पर सबका संहार भी करते हैं।
तपस्या के बल पर ही शेषनाग पृथ्वी को अपने मस्तक पर धारण किये हुए हैं और तपस्या के द्वारा ही देवता सम्पूर्ण वस्तुओं को प्राप्त करते हैं। यह सुनकर गिरिजा ने उत्तर दिया-हे मुनिराज! आपका कथन सत्य है, परन्तु गुरु के बिना किसी को सच्चे ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती, आप मुझे अपनी शिष्या बनाकर, तपस्या की विधि बताइये। ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवजी गुरु के बिना शक्ति-हीन हो जाते हैं, आप मेरे गुरु बनना स्वीकार करें।
हे नारद! यह सुनकर तुमने शिवजी का ध्यान किया और गिरिजा को अपनी शिष्या बनाकर, पंचाक्षर मंत्र का उपदेश दिया। तदुपरान्त तुम वहाँ से लौटकर मेरे पास आये और गिरिजा तुम्हारे उपदेश को पाकर, अपने मन में तपस्या करने की दृढ़ इच्छा को ले, सखियों सहित अपने पिता हिमाचल के समीप जा पहुँचीं।
उस समय सखियों ने पर्वतराज हिमाचल को सम्बोधित करते हुए यह कहा-हे राजन्! गिरिजा अपने मन की अभिलाषा को कहते हुए लजाती हैं, उनकी ओर से हम आप से यह प्रार्थना करती हैं कि आप गिरिजा को तपस्या करने के निमित्त वन मैं जाने की आज्ञा दें, जिससे वे शिवजी को प्राप्त करने के लिए तप करें। सखियों की यह बात सुनकर हिमाचल अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने इस प्रार्थना को स्वीकार करते हुए गिरिजा को तपस्या के निमित्त बन में जाने की आज्ञा दे दी। तदुपरान्त गिरिजा अपनी सखियों को साथ लेकर अपनी माता के पास पहुँचीं और उनसे भी यही प्रार्थना की। मैना ने जब इस समाचार को सुना तो उन्हें अत्यन्त चिन्ता हुई।
उन्होंने अत्यन्त उदास होकर गिरिजा से यह कहा-हे पुत्री! तुम घर में ही रहकर तपस्या करो। माता-पिता के घर को किसी तीर्थ अथवा देवालय से कम नहीं समझना चाहिए। तुम्हें इस प्रकार कष्ट सहन करना उचित नहीं है, तुम यहीं तपस्या करो।
हे नारद! मैना की बात सुनकर गिरिजा ने उत्तर दिया-हे माता! शिवजी केवल तपस्या के ही वश में हैं; बिना तपस्या किये कोई फल प्राप्त नहीं हो सकता। संसार में जिसने जो वस्तु पायी है, वह सब तपस्या का ही फल है। तपस्या करने से अत्यन्त सुख प्राप्त होता है, तुम मुझे तपस्या करने से मत रोको। यह सुनकर मैना बोली-हे पुत्री! मेरे सौ पुत्र हैं, लेकिन तुम उनमें मुझे सबसे अधिक प्रिय हो। मैं चाहती तो यह हूँ कि तुम मेरी आँखों से दूर मत जाओ, और यहीं रहो। तुम जो चाहोगी, मैं वही करूंगी, जो माँगोगी वही दूँगी।
गिरिजा ने कहा-हे माता! जब तक मैं तपस्या नहीं करूंगी, तब तक शिवजी मेरे साथ विवाह नहीं करेंगे और तपस्या केवल वन में हो सकती है, क्योंकि घर अहंकार मूर्खता, दुःख एवं चिन्ता को प्रदान करने वाला होता है। यदि घर बैठकर तपस्या हो सकती हो तो मुनि तथा राजा लोग वन में कभी न जायँ। यह सुनकर मैना ने फिर चिन्तित होते हुए कहा-हे गिरिजा! वन में सिंह, हाथी आदि अनेक हिंसक जीव घूमते रहते हैं। तुमने उन्हें कभी देखा भी नहीं है, फिर भला तुम उनके बीच किस प्रकार रह सकोगी ?
गिरिजा ने उत्तर दिया-हे माता! बिना कष्ट उठाये संसार में किसी वस्तु अथवा मनोरथ की प्राप्ति नहीं होती। मेरा यह निश्चित मत है कि शिवजी अपने भक्त की, घर तथा बाहर सब जगह रक्षा करते हैं। गिरिजा के मुख से इन शब्दों को सुनकर मैना ने उसका मन शिवजी की ओर से हटाने के लिए यह बात कही-हे गिरिजा! शिवजी भाँग, धतूरा, विष आदि मादक वस्तुओं का सेवन करते हैं। वे नग्न शरीर, अशुभ वेषधारी तथा दरिद्री हैं। भला, यह तो बताओ कि उनकी भक्ति करने से तुम्हें क्या प्राप्त हो सकेगा ?
हे नारद! माता की यह बात सुनकर गिरिजा ने उत्तर दिया-हे माता! ब्रह्मा, विष्णु आदि देवता तथा समस्त ऋषि-मुनि शिवजी की सेवा करते हैं। वे आदिपुरुष तथा सबके स्वामी हैं। मेरे हृदय में भी अब उन्हीं का निवास हो गया है। वे तीनों गुणों से रहित होते हुए भी अनेक प्रकार के चरित्र करते हैं। तुम्हें उनकी अप्रशंसा करनी उचित नहीं है। अब तुम मुझे आज्ञा दो जिससे मैं वन में जाकर तपस्या करूँ।
गिरिजा के इस प्रकार के निश्चय को देखकर जब मैना ने यह जान लिया कि गिरिजा के हृदय में सचमुच ही शिवजी की भक्ति दृढ़ हो गयी है, तो उन्होंने अत्यन्त प्रसन्न हो इस प्रकार कहा-हे पुत्री! मैंने तुम्हारे निश्चय को देखने के लिए ही जानबूझकर ऐसी बातें कही थीं। सच पूछा जाय जो भगवान् शिव सबका मनोरथ पूरा करते हैं। अब तुम प्रसन्नतापूर्वक वन में जाओ और शिवजी की आराधना करो।
इस प्रकार माता-पिता की आज्ञा पाकर गिरिजा भगवान् सदाशिव की स्तुति करती हुईं, तपस्या करने के हेतु वन के लिये चल दीं। जिस समय मैना ने उन्हें जाते हुए देखा तो वे मातृ-प्रेम के कारण मूच्छित हो, पृथ्वी पर गिर पड़ीं। यह देखकर सब कुटुम्बियों तथा नगरवासियों ने गिरिजा को पुनः वन में जाने से रोकना चाहा तथा वन के कष्टों का वर्णन करते हुए सलाह दी कि वे घर में ही रहकर तपस्या करें।
उन्होंने सब लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा-हे प्रियजनो! आप लोग किसी प्रकार की चिन्ता न करें, मैं शीघ्र ही शिवजी का वरदान प्राप्त कर लौट आऊँगी। मुझे वन में जाना ही शुभ है, क्योंकि यहाँ रहकर तपस्या नहीं की जा सकती।
हे नारद! इस प्रकार मीठे शब्दों में सब को समझाने-बुझाने के उपरान्त गिरिजा ने ब्राह्मणों को प्रणाम किया तथा अपने लौटने के समय तक के लिए उन्हें कालक्षेप करने के निमित्त बहुत कुछ दान देकर प्रसन्न किया। उन्होंने भिखारियों को भी सब वस्तुएँ प्रदान कीं, क्योंकि भिखारियों को भिक्षा देने से शिवजी अधिक प्रसन्न होते हैं। गिरिजा ने श्रेष्ठ मुहूर्त में वन के लिए प्रस्थान किया। उस समय सब लोग उन्हें आशीर्वाद देने लगे। देवताओं ने भी जय-जयकार करते हुए उनके ऊपर फूलों की वर्षा की तथा दुन्दुभी बजायी।
जिस समय गिरिजा चलीं, उस समय उनके बायें अंग फड़कने लगे तथा शुभ-शकुन होने लगे, जिनसे यह प्रतीत होता था कि उन्हें शिवजी अवश्य प्राप्त होंगे। यद्यपि गिरिजा के वन जाने के कारण नगर-निवासी अत्यन्त चिन्तित थे, किन्तु अशुभ समझकर किसी ने भी अपने नेत्रों से आँसू नहीं बहाये। हिमाचल के नगर का सम्पूर्ण वैभव मानो लोप सा हो गया और ऐसा प्रतीत होने लगा, मानो यह नगर कालरात्रि के समान भयानक हो गया हो। नगर निवासी भी साक्षात् यमराज जैसे दिखाई देने लगे। वे आपस में ही एक दूसरे को देखकर भयभीत हो जाते थे। नगर के सभी घर श्मशान के समान प्रतीत होने लगे और मित्र यमदूत के समान दिखाई पड़ने लगे। नदी और नालों में पानी नहीं रहा। सब प्राणियों का तेज नष्ट हो गया । सब लोग गिरिजा के वियोग दुःख से दुःखी होकर उनकी बाल-लीलाओं का स्मरण कर अपना समय ज्यों-त्यों काटने लगे।
हे नारद! तुम इस बात को भली भाँति जान लो कि शक्ति के बिना संसार में कोई आनन्द नहीं है। शक्ति के प्रकट होने पर ही संसार में आनन्द प्रकट होते हैं। वे शक्ति ही अपने चरित्रों द्वारा सब लोगों के दुःखों को दूर किया करती हैं। जिस प्रकार जीव के बिना इन्द्रियाँ, चन्द्रमा के बिना रात्रि और जल के बिना मछली प्रसन्न नहीं रहती, उसी प्रकार गिरिजा के बिना हिमाचल का नगर भी सूना हो गया। यह दशा देखकर वेदज्ञ मुनि हिमाचल के नगर में पहुँचे।
उन्हें देखकर सबलोगों ने उनकी बहुत प्रकार से सेवा की। मुनि ने उन्हें सम्बोधित करते हुए पूछा-हे हिमाचल! तुम किस शोक में व्याकुल हो ? मुनि की बात सुनकर हिमाचल पहिले तो दुःख की अधिकता के कारण कुछ नहीं बता सके, तदुपरान्त धैर्य धरकर बोले-हे प्रभो! मेरी पुत्री शिवजी को प्राप्त करने के निमित्त वन में तपस्या करने के लिए गयी है, मैं उसी के वियोग दुःख से दुःखी हूँ।
मैना ने भी यह कहा-हे मुनिराज! मेरी पुत्री को कभी उष्ण वायु भी नहीं लगी थी, अब वह वन में जाकर न जाने कैसे-कैसे दुःख उठा रही होगी ? जब वह यहाँ घर में सोती थी उस समय उसकी सखियाँ स्तुति किया करती थीं, अब मुझे यह सन्देह हो रहा है कि कहीं वन में उसे कोई सिंह आदि न खा ले। मेरा जीवन तो उसके जाते ही कठिन हो गया है।
हे नारद! हिमाचल तथा मैना के मुख से यह शब्द सुनकर मुनि ने भरावान् सदाशिव की माया को बारम्बार धन्यवाद देते हुए कहा-हे भगवान् सदाशिव! आपकी माया का पार कोई नहीं पा सकता। आप जब जो चाहते हैं, वही कर दिखाते हैं। मन ही मन इतना कहकर वे हिमाचल तथा मैना को सम्बोधित करते हुए बोले-हे पर्वतराज! तुम अपने मन में कुछ चिन्ता मत करो। तुम्हारी पुत्री आदिशक्ति है। तुम उसकी महिमा को नहीं जानते हो, इसीलिए इतने दुःखी हो रहे हो। वह अपनी तपस्या के द्वारा तुम सबको आनन्द प्रदान करेगी। उसके कारण संसार में तुम्हारा भी बहुत यश फैलेगा। तुम्हें उचित है कि तुम उसके लिए कोई चिन्ता मत करो और अपने हृदय में शिवजी का ध्यान धरते रहो।
इतना कहकर मुनि ने मन ही मन गिरिजा को प्रणाम किया, तदुपरान्त वे हिमाचल से विदा लेकर चल दिये। उनके वचन सुनकर हिमाचल मैना तथा सब नगर-निवासी भी अत्यन्त प्रसन्न हुए। सभी ने चिन्ता करना त्याग दिया और मन ही मन शिवजी का ध्यान धरने लगे।
॥ भूत प्रेतो द्वारा गिरिजा को डराने का प्रयत्न ॥
ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! जब हिमाचल और मैना का दुःख दूर हो गया, तब उन्होंने शिवजी के चरणों में अपना ध्यान लगा दिया। उधर गिरिजा ने भी वन में पहुँचकर अपना स्वरूप ऋषि-मुनियों के समान बनाया तथा शिवजी के अतिरिक्त और सबों का ध्यान भुला दिया। तदुपरान्त वे तपस्या करने के निमित्त 'श्रृंगतीर्थ' को गयीं, जो इसी समय से 'गौरीशिखिर' के नाम से संसार में प्रसिद्ध है। उन्होंने चौंसठ वर्षों तक सिर नीचा किये हुए, एक ही आसन पर बैठे, तपस्या की। वे ग्रीष्मकाल में अग्नि में तपतीं, वर्षाकाल में खुले मैदान में रहतीं और शीतकाल में जल के भीतर बैठकर कठिन तपस्या करतीं। जब इस प्रकार के उग्र तप द्वारा भी उन्हें फल की प्राप्ति नहीं हुई तो उन्होंने एक सहस्त्र वर्षों तक केवल वृक्षों की जड़ तथा पत्ते खाकर और कठिन तपस्या की। तदुपरान्त एक वर्ष तक केवल हरी घास और साग आदि खाये। फिर कुछ समय तक केवल वायु पीकर ही तप करती रहीं।
हे नारद! ऐसा उग्र-तप करने पर भी जब उनका मनोरथ पूरा न हुआ, तब वे हिमाचल पर्वत पर लौट आयीं। वहाँ उन्होंने तीन करोड़ पार्थिव अर्थात् शिवलिंग बनाकर, उनका पूजन किया। उन्होंने अनेक प्रकार के पुष्प गिन-गिन कर उन शिव-मूर्तियों पर चढ़ाये तथा दिन-रात शिवजी के पूजन, ध्यान तथा स्मरण के अतिरिक्त अन्य किसी बात से अपना सम्बन्ध नहीं रखा। वे शिवजी के प्रेम में ऐसी मग्न हुईं कि उन्होंने प्राणायाम करके अपने को अपने में ही लीन कर दिया और ब्रह्मरूप में स्थित हो गयीं। उनके इस तपस्याकाल में अनेक प्रकार के संकट भी सामने आये। कई बार उन्हें भूत-प्रेत की सेना ने चारों ओर से घेर लिया। कई बार सिंह, हाथी, भैंसा, बैल तथा चमगादड़ आदि का स्वरूप धारण करके भूतों ने उन्हें डराया। जो भूत-प्रेत गिरिजा को डराने के लिए आते थे, उनका स्वरूप ऐसा भयानक था कि उसका वर्णन नहीं किया जा सकता।
उनमें से अनेक के केवल एक ही आँख थी। कोई अन्धा था, तो किसी के सहस्त्रों नेत्र थे। कोई नाचता था तो कोई दौड़ता था। कोई मार-मार शब्द का उच्चारण करता और कोई गिरिजा को मारने की चेष्टा करता था। कोई मैना का स्वरूप धारण कर के यह कहता कि हे गिरिजे! तुम्हारे पिता ने तुम्हारे वियोग में खाना-पीना छोड़ दिया है, अब वे मृत्यु को प्राप्त होने ही वाले हैं, तुम घर चल कर, उनकी रक्षा करो। इस प्रकार भूत-प्रतों ने गिरिजा का तप भंग करने के लिए अनेक छल किये, परन्तु गिरिजा का ध्यान पलभर को भी विचलित न हुआ। वे दूने उत्साह से शिवजी के चरणों में अपना मन लगाये रहीं।
तब गिरिजा के तेज से भयभीत होकर बहुत से भूत-भाग गये। जो बचे, उनमें से कोई भस्म हो गया, तो कोई किसी नदी में डूब कर मर गया। इस प्रकार गिरिजा के ध्यान को भंग करने में वे सब के सब असमर्थ ना रहे।
हे नारद! जिस स्थान पर गिरिजा तपस्या कर रही थीं, वह स्थान कैलाश पर्वत के समान ही सुन्दर हो गया। वहाँ के निवासियों को ऐसा ज्ञान प्राप्त हुआ कि वे संसार की माया को भुलाकर ब्रह्मज्ञानी हो गये। उस स्थान पर सिंह, गायों के साथ खेला करते थे, बिल्ली चूहों से प्यार करती थीं। यदि किसी प्राणी को किसी प्रकार का कष्ट होता था, तो दूसरे प्राणी उसके दुःख को दूर करने की स्वयं चेष्टा करने लगता था । उस स्थान पर पारस्परिक वैर-विरोध का कहीं नाम भी न रहा। वहाँ के तालाब, नदी और नाले जल से परिपूर्ण हो बहते रहते थे। सब वृक्षों में अनेक प्रकार के फल-फूल दिखाई पड़ते थे।
इस प्रकार वहाँ किसी वस्तु की कोई कमी नहीं रही। गिरिजा की तपस्या तीनों लोकों में ऐसी प्रसिद्ध हुई कि उसे देखने के लिए मैं, विष्णु तथा इन्द्र आदि उस स्थान पर पहुँचे। हम लोगों ने उन्हें इस प्रकार देखा मानो वे स्वयं सिद्धिरूपा हों। हम सबने उन्हें प्रणाम करते हुए स्तुति की। उस समय इन्द्र ने सब देवताओं को सम्बोधित करते हुए यह कहा-गिरिजा का तप सर्वश्रेष्ठ है। तीनों लोकों में किसी भी प्राणी ने ऐसी कठिन तपस्या नहीं की। गिरिजा को तथा गिरिजा के माता-पिता को सहस्त्रों धन्यवाद हैं।
हे नारद! इस प्रकार गिरिजा की स्तुति-प्रशंसा करने के उपरान्त हम सबलोग कैलाश पर्वत पर शिवजी के समीप पहुँचे। वह कैलाश पर्वत इतना सुन्दर है कि वहाँ छहों ऋतुएँ हर समय वर्तमान रहती हैं। वहाँ कलकल-निनादिनी गंगाजी की धारा अत्यन्त प्रसन्नता प्रदान करती है। वहाँ किसी को भी, किसी प्रकार का दुःख नहीं है। सब ओर ऋषि-मुनि लोग बैठे हुए भगवान् सदाशिव का ध्यान धरते रहते हैं। कहीं पर सिद्धजन तपस्या करते हैं और कहीं किन्नर गीत गाते हैं।
कैलाश के उस आनन्द को देखते हुए जब हमलोग शिवजी के समीप पहुँचे तो उन्होंने हमें योगस्थित शरीर धारण किये अपना दर्शन दिया। शिवजी के उस स्वरूप को देख हमें ऐसी प्रसन्नता हुई कि उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। उनके ललाट पर चन्द्रमा विराजमान था तथा जटाओं से गंगाजी बह रही थीं। वे अपने मस्तक पर त्रिपुण्ड लगाये हुए थे तथा कानों में सर्पों के कुण्डल पहने थे। शिवजी के उस परम सुन्दर स्वरूप को देखकर हम सब लोगों ने पहिले तो उन्हें दण्डवत्-प्रणाम किया, तदुपरान्त बहुत प्रकार से स्तुति एवं प्रशंसा की।
॥ देवताओं द्वारा शिव जी की स्तुति ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! देवताओं ने भगवान् सदाशिव की प्रार्थना करते हुए कहा-हे प्रभो! आपके महान् तेज तथा महिमा का वर्णन नहीं किया जा सकता। आपने कृपा करके शबरी को मुक्त किया तथा सुमना को भी परमपद दिया है। आपकी सेवा करके अनेक पापी आपके लोक को प्राप्त हुए हैं। आप परब्रह्म, परमेश्वर तथा सबके स्वामी हैं। उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलय यह तीनों कार्य आपके वश में रहते हैं। आप ही हम सबके रक्षक हैं। जड़ तथा चेतन की बातों को आप भली-भाँति जानते हैं। संसार में ऐसा कोई पदार्थ नहीं है, जो आपसे भिन्न हो। यह सम्पूर्ण संसार एक वृक्ष के समान है, उस वृक्ष का एक अंकुर, दो फल, तीन मूल तथा चार रस हैं। आप स्वयं ही आकाश तथा स्वयं ही पृथ्वी-रूप हैं। निकट तथा दूरी सब में आप वर्तमान हैं।
हे प्रभो! माया के वशीभूत रहने के कारण साधारण लोग आपको नहीं जान पाते; जो लोग आपके भक्त हैं, वे सम्पूर्ण संसार को शिवमय ही देखते हैं। आपका स्वरूप निर्गुण है, भक्तों पर कृपा करके आप सगुण भी बन जाते हैं। बहुत से लोग आपकी चरणरूपी नौका का सहारा लेकर संसार-सागर से पार उतर गये हैं। आपकी भक्ति के बिना आवागमन से छुटकारा नहीं मिलता। आपके भक्त आवागमन से सहज ही छूट जाते हैं और वे सदैव निर्भय होकर आपके चरणों की सेवा द्वारा परमपद को प्राप्त कर लेते हैं।
हे स्वामी! आप उत्पत्ति के समय ब्रह्मा, पालन के समय विष्णु तथा प्रलय के समय हर का स्वरूप धारण कर लेते हैं। वेद, कर्म, जप, तप, योग तथा ध्यान आदि द्वारा आप प्राप्त होते हैं। यदि आप सगुणरूप धारण नहीं करते तो हमलोगों को सहज ही मोक्षपद किस प्रकार प्राप्त होता ? आपके नाम तथा गुण अनन्त हैं और उनका वर्णन करने की सामर्थ्य किसी में नहीं है। हम में आपके समान बुद्धि कहाँ से आयी ? आपकी महिमा अपार है। हे नाथ! आप हमारे कार्यों को पूर्ण करें। आप देवताओं के स्वामी, सम्पूर्ण सृष्टि के इन्द्र, शुभ मार्ग पर स्थित करनेवाले, सम्पूर्ण सृष्टि के कारणरूप, अविनाशी, अनादि तथा अप्रेमय हैं। आपका शरीर विद्या तथा बुद्धि से परिपूर्ण है।
हे प्रभो! आपका पवित्र स्वरूप भक्तों के हृदय में वास करता है, इसीलिए वे कुसंगति तथा काम-क्रोध आदि को त्यागकर आपकी सेवा में संलग्न रहते हैं। आप पूर्ण ब्रह्म, आनन्द के निधान, दुःख-नाशक अत्यन्त कृपालु हैं। आप इच्छा रहित, अद्वितीय, निरीह तथा परब्रह्म हैं। आपने ही सबसे पहले शरीर धारण किया था। आपके अवतार हमारे मनोरथों को पूर्ण करने के लिए ही होते हैं।
आपके उन अवतारों की महिमा अपार तथा अप्रेमय है। हमलोगों का मन आपकी महिमा को कहाँ तक जान सकता है ? जो लोग मन लगाकर आपके गुणों को सुनते हैं और उनका ध्यान धरते हैं, उन्हीं पर आप अपनी कृपा दिखाते हैं। बहुत से लोग तो धर्ममार्ग को भी त्यागकर केवल आपसे ही स्नेह रखते हैं। और अपनी भक्ति पर दृढ़ रहने के कारण आपको प्राप्त कर लेते हैं। वे केवल आपका गुणगान करते हैं तथा किसी संसारी वस्तु से अपना कोई प्रयोजन नहीं रखते। आपको भी अपने भक्त अत्यन्त प्रिय हैं। आप उन्हीं के सामने प्रकट होते हैं तथा उनकी प्रत्येक अभिलाषा को पूर्ण करते हैं। इस प्रकार स्तुति करके मैं, विष्णु तथा अन्य सब देवता चुप रह गये।
हे नारद! उस समय शिवजी ने अत्यन्त प्रसन्न होकर हम लोगों से इस प्रकार कहा-हे देवताओ! तुम सबलोग यहाँ किसलिए आये हो ? हमें ऐसा प्रतीत होता है कि तुम बहुत चिन्तित हो। जो भी बात हो, उसे हमारे सम्मुख निस्संकोच प्रकट करो। यह सुनकर मैंने तथा विष्णुजी ने प्रार्थना करते हुए उनसे यह कहा-हे प्रभो! हम लोगों के धन्य भाग्य हैं, जो आपने हम पर कृपादृष्टि की। संसार में वे ही लोग पूर्णात्मा हैं, जिनके ऊपर आप अनुग्रह करते हैं। हे स्वामी! आपकी महिमा महान है। आप प्रत्येक प्राणी के शरीर में निवास करते हैं। आपकी कलाएँ असंख्य हैं तथा आप अपने भक्तों को दुःखी देखकर, उन्हें अत्यन्त आनन्द प्रदान करते हैं। इतना कहकर मैं तथा विष्णुजी चुप हो गये।
॥ देवताओं द्वारा शिवजी से गिरिजा की तपस्या का वर्णन ॥
ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! हमारी इस प्रकार स्तुति एवं प्रार्थना को सुनकर शिवजी बोले-हे ब्रह्मा तथा हे विष्णु! तुम सब देवताओं को साथ लेकर जिस कार्य के लिए आये हो, वह हमसे स्पष्ट कहो। हम तुम्हारे मनोरथ को अवश्य पूरा करेंगे। यह सुनकर मैंने तथा विष्णुजी ने फिर इस प्रकार कहा-हे प्रभो! आप सम्पूर्ण देवताओं के स्वामी हैं। आप सबके मन की बात जानते हैं और अपने स्थान पर बैठे हुए तीनों लोकों की घटनाओं को देखते रहते हैं। आप इस प्रकार अनजान बनकर हमसे क्यों पूछ रहे हैं ? फिर भी जब आपकी आज्ञा है तो हम यह प्रार्थना करते हैं कि नारदजी से उपदेश ग्रहण कर गिरिजा अत्यन्त कठिन तपस्या कर रही हैं। उन जैसा कठोर तप आज तक किसी ने नहीं किया। अब आपको उचित है कि आप उनके पास जाकर इच्छित वरदान दें। हम सब लोगों की यह प्रबल इच्छा है कि हम गिरिजा के साथ आपके विवाह का आनन्द लाभ करें और आपकी बारात में बाराती बनकर सम्मिलित हों।
हे नारद! हम लोगों की यह प्रार्थना सुनकर शिवजी हँसकर बोले-हे देवताओ! विवाह करके सांसारिक जाल में फँसना मूर्खों का काम है। यद्यपि वेद ने इस सम्बन्ध में बहुत सी बातें कहीं हैं, उनमें सबसे मुख्य बात ध्यान में रखने योग्य यह है कि स्त्री की संगति के समान बुरा कर्म और कोई नहीं है। हम तुम्हारा कहना भी नहीं टाल सकते, क्योंकि यदि हम अपने भक्तों की बात न मानें तो वेद और धर्मशास्त्र की प्रतिष्ठा कम होगी। चाहे हमें बहुत दुःख ही क्यों न उठाने पड़ें, फिर भी हम गिरिजा की तपस्या के वशीभूत होकर तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार किये लेते हैं। तुम यह तो जानते ही होगे कि जब राजा कामरूप ने इच्छा की, तब हमने दैत्य को मारकर उसे आनन्द प्रदान किया था। इसी प्रकार गौतम के दुःख को भी दूर किया था। जब हलाहल विष के कारण सब देवता भस्म हुए जा रहे थे उस समय हमने कृपा करके उस विष को भी पी लिया था। विष्णुजी के रामचन्द्र अवतार के समय हमने हनुमान का अवतार लेकर अनेक दुःख उठाये थे।
इसी प्रकार जब-जब हमारे भक्तों पर कोई कष्ट पड़ा है। तब-तब हमने स्वयं दुख उठाकर उन्हें आनन्द प्रदान किया है, जिस प्रकार हमने ग्रहपति नामक अवतार लेकर विश्वामित्र मुनि के दुःख को दूर किया, उसी प्रकार अब तुम्हारे लिए भी हम गिरिजा के साथ विवाह कर लेंगे, क्योंकि हमने भक्तों की प्रार्थना को कभी अस्वीकार नहीं किया है। अब तुम सब लोग निश्चित होकर अपने-अपने लोक को जाओ।
हे नारद! हम सबको विदा करने के उपरान्त शिवजी ने सप्तर्षियों को अपने पास बुलाया। तब उन्होंने शिवजी के समीप पहुँचकर दंडवत्-प्रणाम एवं स्तुति करते हुए हाथ जोड़कर कहा-हे प्रभो! आपने हमें किसलिए बुलाया है ? अब आप हमें क्या आज्ञा देते हैं, वह बताइये। हम उसका पालन करेंगे ? यह सुनकर शिवजी उनसे बोले-हे ऋषियो! गिरिजा हमें प्राप्त करने के लिए बहुत कठिन तपस्या कर रही है। तुम उसके प्रेम की परीक्षा लेने के लिए उसके पास जाओ और उसे छलने का प्रयल करो। शिवजी की यह आज्ञा पाकर सप्तऋषि गिरिजा के समीप जा पहुँचे और यह देखा कि वे साक्षात् तपस्या का रूप बनी बैठी हैं। उस समय ऋषियों ने अपनी चतुराई का प्रदर्शन करते हुए उनसे यह कहा-हे गिरिजे! तुम ऐसा तप क्यों कर रही हो और किस कार्य के लिए ऐसी कठिन साधना में संलग्न हो ? तुम हमसे सब हाल सत्य-सत्य कहो। ऋषियों की बात सुनकर पार्वती ने उत्तर दिया-हे ऋषियो! मुझे अपना मनोरथ कहने में लज्जा का अनुभव होता है, क्योंकि आप उसे सुनकर अवश्य ही हँसेंगे। फिर भी मैं आपको बताती हूँ कि देवता तथा मुनियों के वचन को सत्य मानकर शिवजी के साथ विवाह करने की इच्छा से यह तपस्या कर रही हूँ।
हे नारद! गिरिजा की बात सुनकर मुनियों ने हँसते हुए इस प्रकार कहा-हे गिरजे! तुम नारद की बातों पर विश्वास कर बैठीं, इससे बढ़कर मूर्खता और क्या होगी ? तुम्हें यह पता नहीं है कि नारद की बातों से अनेक नगर तथा गाँव उजड़ चुके हैं। इस सम्बन्ध में हम एक इतिहास सुनाते हैं। ब्रह्माजी के पुत्र दक्षप्रजापति ने दस सहस्त्र पुत्रों को उत्पन्न किया था। वे सब बड़े गुणवान, रूपवान, बलवान तथा बुद्धिमान थे। दक्ष ने उन्हें सृष्टि उत्पन्न करने की आज्ञा दी, परन्तु उसी समय नारद ने उनके पास पहुँचकर ऐसा उपदेश किया कि वे संसार त्यागकर वन में चले गये; फिर कभी लौटकर नहीं आये। इसके उपरान्त दक्ष ने फिर उतने ही पुत्र उत्पन्न किये, वे भी नारद के उपदेश से उसी स्थान पर जा पहुँचे, जहाँ पहिले उनके भाई गये थे। यह गति देखकर दक्ष ने नारद को यह शाप दिया कि तुम एक मुहूर्त से अधिक किसी स्थान पर नहीं ठहर सकोगे। इसके अतिरिक्त नारद ने राजा चित्रकेतु के घर को भी नष्ट कर दिया और उन्होंने हिरण्यकशिपु का भी सर्वस्व नष्ट कर दिया है। हम नारद को बहुत अच्छी तरह जानते हैं, क्योंकि बहुत दिनों तक हम उनके साथ रहे हैं। इसलिए हम यह कहते हैं कि तुम नारद के भुलावे में आकर बहुत बड़ी भूल कर रही हो।
हे गिरजे! इसके अतिरिक्त जिन शिवजी को प्राप्त करने के लिए तुम यह घोर तपस्या कर रही हो, उनके सम्बन्ध में भी हम तुम्हें यह बता देना चाहते हैं कि वे निर्गुण, अशुभ, निर्लज्ज तथा बुरा वेष धारण करनेवाले हैं। न तो उनके कुल परिवार का कोई पता है और न उनके पास सेवक आदि ही हैं। तुम्हें उस ठग नारद ने मोहित करके तुम्हारी बुद्धि को भ्रष्ट कर दिया है। भला, ऐसा पति पाकर तुम्हें कौन सा सुख मिल सकेगा ? तुम इस बात पर भली भाँति विचार करो तो यह स्पष्ट हो जायेगा कि हमारा कथन सत्य है अथवा नहीं। शिव ने पहिले दक्ष की पुत्री के साथ भी विवाह किया था, जब वे उसका निर्वाह नहीं कर सके, तो उसे मिथ्या दोष लगाकर त्याग दिया। तब से वे अपने-आप में ध्यान लगाकर निश्चित बैठे रहते हैं। भला, जो आदमी एकान्त में ही रहना पसन्द करता है उसके साथ किसी स्त्री का निर्वाह किस प्रकार हो सकता है ? हमारा तो यह कहना है कि अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है। तुम अपना हठ छोड़कर घर चली जाओ। यदि तुम अपने लिए श्रेष्ठ वर को ही चाहती हो तो हम तुम्हें यह भी बताये देते हैं कि विष्णु से अधिक श्रेष्ठ और कोई नहीं है। वे सब देवताओं के स्वामी हैं और तुम्हारे वर बनने के सर्वथा योग्य हैं।
हे नारद! सप्तऋषियों की बात सुनकर पार्वती ने उन्हें उत्तर देते हुए कहा-हे ऋषियो! आपका कहना सत्य हो सकता है, लेकिन मेरे हठ में किसी प्रकार की कमी नहीं आयेगी। मैं तो उसी राग में गाती रहूँगी, जिसे अब तक गाती आयी हूँ। मेरा शरीर पहाड़ से उत्पन्न हुआ है, अतः उसमें पहाड़ की जड़ता प्रत्यक्ष देखने में आती है। मैं नारदजी को अपना गुरु स्वीकार कर चुकी हूँ, अतः उनकी बात को किसी प्रकार नहीं टालूँगी; क्योंकि जो लोग गुरु के वचन को मिथ्या समझते हैं, वे कल्पभर भटकते रहने पर भी कभी ईश्वर को प्राप्त नहीं कर पाते।
मैं आपकी इस बात को मान लेती हूँ कि विष्णु में सब गुण भरे हुए हैं तथा शिवजी अवगुणों की खान हैं, आपको यह भी अवश्य बता देना चाहती हूँ कि शिवजी निर्गुण हैं और उन्होंने अपने भक्तों की प्रसन्नता के निमित्त ही शरीर धारण किया है। वे अपनी शक्ति और ऐश्वर्य का विज्ञापन नहीं करना चाहते। इसलिए वे परमहंस गति में रहकर, अवधूतों के समान दिखाई देते हैं। वस्त्र और आभूणों को पहिनना तो साधारण मनुष्यों का काम है। शिवजी तीनों गुणों से रहित तथा सब के स्वामी हैं। वे इन वस्तुओं को स्वीकार नहीं करते। मैंने अपने गुरु की कृपा से शिवजी को भली-भाँति पहिचान लिया है और इसीलिए मैं यह निश्चयपूर्वक कहती हूँ कि या तो मैं शिवजी के साथ विवाह करूंगी, अन्यथा जन्म भर कुंवारी रहूँगी। आप मुझे इस प्रकार का उपदेश देने की कृपा न करें।
हे नारद! इतना कहकर गिरिजा ने सप्तऋषियों को प्रणाम किया,तदुपरान्त वे पहिले की ही भाँति शिवजी के ध्यान में मग्न हो गयीं। गिरिजा के उस दृढ़ निश्चय को देखकर सप्तर्षि जय-जयकार करने लगे तथा आशीर्वाद देते हुए बोले-हे गिरिजे! तुम परम धन्य हो। तुम्हें शिवजी अवश्य प्राप्त होंगे। इतना कहकर वे गिरिजा को प्रणाम करने के उपरान्त शिवजी के पास चले गये। कैलाश पर्वत पर पहुँचकर उन्होंने शिवजी से कहा-हे प्रभो! हमने गिरिजा की बहुत प्रकार से परीक्षा ली तथा अपने वाक्यजाल द्वारा छलने का भी बहुत प्रयत्न किया; परन्तु न तो वे हमारे धोखे में आयीं और न उन्होंने आपके चरणों से अपने ध्यान को ही हटाया। आपको उचित है कि आप उन्हें वहाँ जाकर वरदान दें। इतना कहकर सप्तर्षि अपने स्थान को चले गये।
॥ सप्तर्षियों का गिरिजा के वार्त्तालाप ॥
इतना सुनकर नारद ने ब्रह्माजी से पूछा-हे पिता! जब सप्तर्षि विदा होकर अपने घर चले गये, तब उस समय शिवजीने क्या किया, यह सब वृत्तान्त आप मुझे बताइये ? ब्रह्माजी बोले-हे नारद! शिवजी ने सप्तर्षियों के चले जाने के पश्चात् ब्रह्माण का रूप धारण किया तथा ब्रह्मचारियों के समान दंड लेकर मस्तक में त्रिपुण्ड लगाया, गले और हाथ में रुदाक्ष की माला पहनी। फिर ऐसा स्वरूप धारण कर वे वहाँ पहुँचे, जहाँ पार्वती तप करती थीं। पार्वती ने उन्हें प्रणाम किया तथा कुशल के पश्चात् पूछा कि तुम कौन हो और कहाँ से आये हो ? यह सुनकर ब्राह्मणरूपी शिवजी ने ठंडी साँस लेकर कहा-हम ब्रह्ममचारियों का व्रत धारण किये सृष्टि की भलाई के लिए इधर-उधर घूमते हैं। तुमने हमको धर्मनिष्ठ जानकर हमारा जो आदर और सत्कार किया इससे हमको बड़ी प्रसन्नता हुई है।
अब हम तुमसे पूछते हैं कि हे देवी! तुम कौन हो ? और किस उद्देश्य से आयी हो ? श्री पार्वतीजी ने यह सुन, कुछ सोचकर अपनी एक सखी से संकेत किया। उसने आदि से अन्त तक सब वृत्तान्त जिस प्रकार नारदजी ने आकर भविष्यवाणी की थी कि पार्वती का विवाह शिव से होगा, कह सुनाया। उसे सुनकर ब्राह्मण ने पश्चाताप करके कहा-हे पार्वती! तुम हमसे यह हँसी क्यों करती हो, तुम स्वयं हमको उत्तर क्यों नहीं देतीं ? पार्वती बोली-हे ब्रह्मन् मेरी सखी ने आपसे जो कुछ कहा है, वह सब सत्य है। मैं यह चाहती हूँ कि मेरा विवाह शिव के साथ हो। यह सुनकर ब्राह्मणवेषधारी शिवजी ने शब्दजाल फैलाते हुए कहा-हे गिरिजे! तुम जो चाहो सो करो, हमको उससे क्या मतलब; परन्तु तुमने मेरा आदर और सत्कार किया है, इसलिए मुझ से बिना कहे नहीं रहा जाता। इसके अतिरिक्त जानबूझकर किसी बात को छिपाना भी बहुत बड़ा पाप है। हे पार्वती! तुम हिमाचल की पुत्री होकर इतनी मूर्ख क्यों हो गयी हो जो अपने ऐसे कोमल शरीर को तपस्या द्वारा भस्म कर रही हो ? तुम इस प्रकार अपनी सुन्दरता को क्यों नष्ट करना चाहती हो ? यह भाग्य की बात है कि तुम विष्णु एवं ब्रह्मा को छोड़कर शिव के लिए तप करती हो। क्या तुम्हारे लिए शिव के समान अशुभ तथा अनुचित पति चाहिए ? उनकी चाल-ढाल तो संसार से अलग है। देखो, विष्णु आदि सर्वगुण सम्पन्न, कुलवान् तथा प्रतिष्ठित हैं, शिव में इनमें से कोई बात नहीं। वे माता-पिता से हीन हैं तथा सर्प एवं भस्म शरीर से लपेटे रहते हैं। वे बैल पर सवार होकर नाना प्रकार के विष एवं भंग का सेवन करते हैं। वे सिंगी तथा डमरू हाथ में लिये हुए भूत-प्रेतों के साथ लीला करते हैं। तथा वन में अकेले उदास बैठे रहते हैं। उन्होंने कामदेव को, जो स्त्रियों को प्रिय है, जला दिया है। नारद ने भी तुमको उनके अवगुण न बताकर इस प्रकार छला है। फिर नारद का तो यह स्वभाव है कि वह सम्पूर्ण सृष्टि में इसी प्रकार के उत्पात करते फिरते हैं।
उन्होंने दक्ष प्रजापति के सब लड़के नष्ट कर डाले तथा हिरण्यकशिपु के लड़के के साथ कितना छल किया। वे प्रकट में साधु बनकर सब को छला करते हैं। तुम उन सब बातों को भुलाकर, समझ से काम लो तथा अपना काम करो। अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है। तुम स्वर्ण जटित अँगूठी छोड़कर कांच को क्यों ग्रहण करना चाहती हो ? गंगाजल छोड़कर कुएँ के जल की क्यों इच्छा करती हो ?
इतना कहकर शिवजी ने पार्वती के स्वरूप की प्रशंसा करते हुए कहा-हे पार्वती! देखो, तुम्हारे इस सुन्दर मुखकमल पर असंख्य चन्द्रमाओं की कान्ति विद्यमान है। तुम्हारा मुखचन्द्र सुन्दरता की खान के समान सुन्दर है । तुम इस प्रकार अपने सुन्दर शरीर को व्यर्थ ही क्यों नष्ट करती हो ? तुम्हारे विवाह के लिए केवल विष्णु ही हैं। तुम उन्हीं से विवाह करो। हम तुमसे कहते हैं कि यह बात उचित नहीं है। तुम सम्भल जाओ। इस प्रकार ब्राह्मणरूपधारी शिवजी छल की बातें कहकर खेद सहित तथा रूखे हो, अलग बैठ गये। पार्वती ने शिवजी की निन्दासुन, मन में कुपित हो बार-बार खेद किया। कुछ समय के पश्चात् पार्वती मन ही मन बोलीं मैंने इस व्यक्ति को ब्राह्मण जानकर धोखा खाया। यदि मैं पहले से इस ब्राह्मण को दुष्ट तथा शिवजी की इतनी निन्दा करनेवाला जानती तो चुप रहती। इसने वेद के विरुद्ध शिवजी की इतनी निन्दा की है कि यदि अब मैं इसको उत्तर नहीं देती हूँ तो शिव की निन्दा सुनने का पाप मुझे लगेगा।
यह विचार कर पार्वती ने कहा-हे ब्राह्मण! आप मुझे धोखा क्यों दे रहे हो ? आप तो वेद के विरुद्ध शिवजी की अत्यन्त निन्दा की है। आपको ब्राह्मण होने के नाते प्राणदंड नहीं दिया जा सकता। अब मैं वेद, पुराण तथा स्मृति के वचनों के अनुकूल शिवजी का वर्णन करती हूँ। तू अब तक शिवजी के गुणों को नहीं जान पाया है, इसीलिए तेरा वचन वेद के विरुद्ध है। यदि तू शिव को जानता तो वेद के विरुद्ध कभी ऐसे वचन न कहता। शिव की समस्त अशुभ सामग्री शुभ ही है। कोई भी देवता उनसे श्रेष्ठ नहीं है। वे सब विद्याओं के ज्ञाता, पूर्णब्रह्म, अलख, जगदीश हैं।
उन्होंने ही ब्रह्मा को अपने श्वास-मार्ग से वेद दिये। वही शिव सबका आदि, मध्य एवं अन्त हैं। उनका तेज एवं प्रताप आज तक कोई नहीं जान पाया। वे अपने भक्तों को तीनों लोक प्रदान करते हैं। उनकी सेवा द्वारा ही मनुष्य मृत्यु पर विजय प्राप्त करते हैं। शिवजी की निन्दा करने से मनुष्य बहुत दुःख प्राप्त करता है। जो दुष्ट एवं अनाचारी ब्राह्मण शिव के विरुद्ध हैं, वे करोड़ों जन्म तक दरिद्र रहा करते हैं। हे ब्राह्मण! आपने शिव की निन्दा करके अपने लिए नरक का मार्ग खोला है। आपका आदर करने से मुझे कोई फल प्राप्त नहीं हुआ और मेरे समस्त पुण्य नष्ट हो गये। अब आप शीघ्र अपने घर चला जाओ; क्योंकि मेरा मन शिवजी में लग रहा है।
ब्राह्मण यह सुनकर हँसा तथा मन में पार्वती की प्रशंसा करके चाहा कि और कुछ कहें, पार्वती ने ब्राह्मण की इच्छा समझ, अपनी एक सहेली से कहा-अब इस स्थान को छोड़कर कहीं और चलो, क्योंकि यहाँ रहने से बड़ा दुःख होता है। इस ब्राह्मण ने शिव की निन्दा करके हमको दुःख पहुँचाया है। शिव की निन्दा करनेवाले को आँख से न देखना ही उचित है। इसकी व्यर्थ की बातें सुनने से महापाप होगा। जो शिव-निन्दा को आँखों से देख ले, उसको तुरन्त स्नान कर लेना चाहिए और यदि वश चले तो उसकी जिह्वा को काट डाले नहीं तो अपने दोनों कान बन्द कर वहाँ से उठ जाना चाहिए।
वेद भी यही कहते हैं। अब तुम देरी न करो। उठो, किसी और वन में चलकर रहेंगे। अन्यत्र जाकर तप करूँगी। यदि मेरा निश्चय दृढ़ है तो शिवजी मुझसे अवश्य प्रसन्न होंगे। किसी के धोखा देने से क्या होता है ? शिव तो केवल प्रेम से ही प्रसन्न होते हैं। मैंने गुरु से सुना है कि तप करने में इसी प्रकार के विघ्न सामने आते हैं। उनसे धोखा खाकर जो तप से विमुख हो जाते हैं, वे मूर्ख हैं और तप का फल प्राप्त नहीं कर पाते। जो दृढ़तापूर्वक धोखे से बचे रहकर तप में संलग्न रहते हैं, वे ही सिद्धि प्राप्त करते हैं। शिवजी अपने भक्तों का पालन करनेवाले हैं। पहिले तो वे अपने भक्तों की परीक्षा लेते हैं, फिर प्रसन्न हो जाते हैं। यह कह कर पार्वती अपनी सखियों के साथ वहाँ से चली गयीं।
॥ गिरिजा के तप से प्रसन्न हो, शिव जी का दर्शन देना ॥
इतना कहकर ब्रह्माजी बोले-हे नारद! शिवजी इस प्रकार पार्वती का हठ तथा प्रेम देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुए तथा उन्होंने अपना यथार्थ मुख्य स्वरूप जैसा कि नारदजी ने उमा से कहा था, धारण कर लिया। मस्तक पर जटा, गंगा की धारा तथा चन्द्रमा विराजमान, ललाट पर त्रिपुण्ड लगाये हुए, कानों में कुण्डल पहिने, गोल-गोल सुडौल कपोल, तीन नेत्र, नाक तथा ओष्ठ परम सुन्दर, हाथ-पाँव की उँगलियाँ लाल-लाल, इसी प्रकार प्रत्येक अंग-प्रत्यंग अत्यन्त सुन्दर एवं सुभग था।
जिस रूप का पार्वती ध्यान कर रही थीं, शिवजी ने उसी प्रकार का रूप धारणकर, उनको दर्शन दिये और कहा कि हे पार्वती! तुमने हमारी इतनी आराधना तथा तपस्या की है, जितनी आज तक किसी ने नहीं की। तुमको ग्रहण करके हम भी लोक में पवित्र होते हैं। यद्यपि हमारा तप और संयम अत्यन्त दृढ़ है, तुम्हारे तप ने उसे भी हिटा दिया। हमने पहिले भूतों को, फिर सप्तर्षियों को तुम्हारे पास भेजा जिसमें तुम्हारे दृढ़ तप की ख्याति संसारभर में प्रसिद्ध हो।
तुम क्रोध न करो, क्योंकि हमने यह सब बातें तुमसे प्रकट होने के लिए तथा परीक्षा लेने के लिए की हैं, जैसा कि कुम्हार घड़े को सम्हालने के लिए ऊपर से पीटता है। हमने तुम्हारी भक्ति को संसारी रीति के कारण ही देखा है। तुम समस्त संसार की माता तथा वह देवी हो, जिनके चरण-कमलों की सेवा देवता आदि सब करते हैं। तुम उत्पत्ति, पालन तथा प्रलय के हेतु तीन गुण धारण करती हो। तुम्हीं तीनों लोकों को आनन्द देनेवाली हो। तुम्हारे रूप गुण तथा प्रभाव असंख्य हैं। तुम्हारा ही अंग लक्ष्मी, वाणी तथा ब्रह्माणी है। तुमने मुझे सगुण अवतार लेते हुए जानकर गिरिजा का अवतार लिया है।
जिस प्रकार शब्द एवं अर्थ में कोई अन्तर नहीं है, उसी प्रकार हमारे और तुम्हारे बीच में भी कोई अन्तर नहीं है। केवल संसारी जीवों की दृष्टि में हम-तुम दो शरीर रखते हैं, वास्तव में हम एक हैं। हमारे तुम्हारे चरित्र वेद भी नहीं जानते। तुम्हारा तप अब पूर्ण हो गया है। तुम्हारी जो इच्छा हो, वह हमसे माँगो। यह कहकर शिवजी चुप हो गये।
पार्वती बोलीं-हे देव! यदि आप वास्तव में मुझपर प्रसन्न हैं तो मुझको मेरी इच्छानुसार वर दीजिये। आप मेरे पति होकर संसार की रीति के अनुसार मेरे साथ विवाह कीजिये। मेरे समस्त अपराधों को क्षमा कर, अब आप मेरे पिता से जाकर विनती करें तथा अपने संसारी चरित्र को दिखावें। पार्वती यह कहकर चुप हो गयीं।
तब शिवजी ने कहा-हे गिरिजे! तुमने जो वरदान माँगा है, हम उसे स्वीकार करते हैं। यह कहकर शिवजी अन्तर्धान हो गये। तब देवताओं ने जय-जयकार किया, आकाश से पुष्प-वर्षा हुई, विष्णु, और मैं तथा अन्य देवता गिरिजा के चरणों पर आकर गिर पड़े तथा हर्ष के कारण गिरिजा की स्तुति करने लगे। जो कोई उस स्तुति का पाठ करता है, उसके सब मनोरथ पूर्ण होते हैं।
उस स्तुति को सुनकर पार्वती ने सब देवताओं से कहा-हे देवताओ! तुम सब अपने-अपने घरों को जाकर प्रसन्न रहो। मैंने कठोर तप किया है इसलिए देवताओं के सभी कार्य पूर्ण होंगे। शिवजी ने मुझको वर दिया है कि तुम्हारा कोई कार्य शेष नहीं रह जायेगा। यह आज्ञा सुनकर सब देवता वहाँ से चले गये तथा गिरिजा भी घर जा पहुँचीं। उस समय जो हर्ष हिमाचल एवं मैना को हुआ, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। हिमाचल ने हर प्रकार से आनन्द मंगल मनाया तथा असंख्य द्रव्य दान दिया। यद्यपि गिरिजा ने वरदान का वृत्तान्त किसी पर प्रकट न किया, पर वह सब लोगों पर प्रकट हो गया।
॥ शिव जी का भिक्षुक रूप धर हिमाचल के घर जाना ॥
ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! भगवान् सदाशिव की महिमा जानना अत्यन्त कठिन है। उनकी महिमा करोड़ों वर्ष तप करके भी कठिनता से जानी जा सकती है। वे शरीर धारण कर अनेक प्रकार की लीलाएँ रचते हैं तथा संसार के जीवों की भाँति प्रकट होकर, अपने भक्तों के कार्य पूरे करते हैं। हे नारद! तुम ध्यान से सुनो, जिस समय शिवजी पार्वती को वर देकर चले गये, उसी समय उन्होंने भिक्षुक का रूप धारण किया और नृत्य एवं गायन में पूर्ण अभ्यास करके एक सहस्त्र गति के ज्ञाता बन गये। फिर उन्होंने अपने बांये हाथ में सिंगी तथा दाहिने हाथ में डमरू लिया और समस्त शरीर में श्वेत भस्म लगाकर लाल वस्त्र पहिने।
इस प्रकार वे वृद्ध बन गये। उनका शरीर बूढ़ों की भाँति काँपता हुए, वाणी अत्यन्त मधुर थी। ऐसे अनूप रूप तथा वस्त्राभूषणों से सुशोभित होकर श्री सदाशिवजी हिमाचल पर्वत के पास गये। उन्होंने अनेक प्रकार के नृत्य-गान, नट करतब, मधुर-स्वर, प्रिय सिंगी तथा डमरू के नाद से नगर निवासियों को मोहित कर लिया। उनके इस करतब को देखने के लिए चारों ओर से झुण्ड के झुण्ड पर्वत-निवासी एकत्र होकर यहाँ तक कि सभी बूढ़े बालक स्त्री, पुरुष वह मधुर शब्द सुन, घरों से बाहर निकल आये।
इस प्रकार कोई भी शिव के उत्तमोत्तम ताल एवं प्रिय स्वर सहित राग द्वारा मोहित विह्वल तथा अधीर होने से शेष न रहा। पार्वती उस आनन्ददायक स्वर में मग्न हो गयीं। वे शिव की मूर्ति का मन में ध्यानकर अत्यन्त प्रसन्न हुई तथा उन्होंने अपने मन में शिव की स्तुति की। तब शिवजी कृपालु होकर बैठ गये। जब मैना को चेत आया, तब वह योगी को अत्यन्त प्रसन्न हो, हीरा, पन्ना, मोती, मणि आदि थाल में भरकर देने लगीं, परन्तु उस योगी ने कुछ न लेकर केवल पार्वती को माँगा तथा फिर नृत्य करने को उठ खड़ा हुआ।
यह सुनकर मैना ने अप्रसन्न होकर उसे बहुत डराया, धमकाया तथा यह इच्छा की कि उस योगी को निकाल दें। इतने में हिमाचल भी वहाँ आ पहुँचे और सब वृत्तान्त सुनकर क्रोधित हुए। उन्होंने आज्ञा दी कि इस योगी को तुरन्त यहाँ से निकाल दो। हिमाचल के सेवक इस आदेश को पाकर उस योगी को निकालने को उद्यत हुए, वे उस योगी के प्रताप से, उसके निकट भी न जा सके। उस समय हिमाचल ने मन में सोचा कि यह कौन मनुष्य है ? जब उन्होंने बहुत ध्यान से विचारपर्नूक योगी को देखा तो उन्होंने शिवजी को चतुर्भुजी स्वरूप, सिर पर मुकुट, कानों में कुण्डल, पीले वस्त्र पहिने हुए तथा जो पुष्प विष्णु पर चढ़ाये जाते हैं, उनसे भूषित देखा। फिर हिमाचल ने उसी समय द्विभुजी मूर्ति इस प्रकार देखी कि वे अपने को गोपों के समान भूषित किये, मुरली हाथों में लिये, चन्द्रमा के समान उत्तम किशोर अवस्था को प्राप्त दिखाई दे रहे हैं।
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! शिवजी ने हिमाचल को अपना मुख्य स्वरूप दिखाया कि शीश पर जटा तथा गंगा की पवित्र धारा, मस्तक पर चन्द्रमा एवं त्रिपुण्ड, चन्द्र के समान सुन्दर मुख, लालिमा लिये हुए तीनों नेत्र, कीर के समान नासिका, अरुण अधर, कंठ में श्यामता लिये हुए तीन रेखाएँ, गले में हार पहिने, चार भुजाएँ, सूर्य, कपाल, अभय आदि नाना प्रकार के वस्त्राभूषणों से अलंकृत, उदर अत्यन्त कोमल, जिसमें तीन बल पड़े हुए, अत्यन्त सुन्दर कटि, लाल कमल के समान लाल पगतल, गोल नितम्ब, रक्त वर्ण नख आदि थे।
हिमाचल ने ऐसा मनोहर विचित्र स्वरूप देख, अत्यन्त आश्चर्यान्वित होकर जाना कि यह सदाशिव हैं। जब सदाशिव ने जाना कि हिमाचल ने हमको पहिचान लिया तो उन्होंने तुरन्त उसी योगी का स्वरूप धारण कर लिया तथा पुनः हिमाचल से पार्वती को पाने की इच्छा प्रकट की। उस समय हिमाचल ने तुरन्त ही प्रणाम कर, सब स्वीकार कर लिया। कुछ समय पश्चात् योगी जब अन्तर्धान हो गये, तब मैना और हिमाचल ने चेत में आकर शिव को सर्वश्रेष्ठ जाना। देवताओं ने भी अपने हृदय में निश्चित ठहराया कि शिव एवं पार्वती का विवाह उनको, समस्त संसार को तथा पार्वती के माता-पिता को शुभदायक होगा।
इसी इच्छा से उन सभी देवताओं ने हिमाचल के गुरु के घर जाकर उनको प्रणाम किया तथा कहा-हे देव! इस समय शिव के चरित्र से मैना एवं हिमाचल ने शिव को सर्वश्रेष्ठ समझ लिया है। अब आप वहाँ जाकर ऐसा प्रयत्न करें, जिससे शिव तथा पार्वती का विवाह हो जाय। यह सुनकर गुरु अत्यन्त क्रोधित होकर दोनों हाथ कानों पर रखकर बोले-हे देवताओ! तुम बड़े स्वार्थी हो। तुम हमारी यही सेवा करते हो, जिससे हमको नरक प्राप्त हो। जो मनुष्य विष्णु, महादेव, ब्रह्मा आदि देवता, ब्राह्मण, अपने गुरु, गौ, तुलसी, पुराण, गंगा, वेदमाता, गायत्री, वेद एवं दान की निन्दा करता है, वह निस्संदेह नरक में जाकर असंख्य कल्पों तक दुःख तथा कष्ट भोगता है।
यदि तुम यह कार्य करना आवश्यक समझते हो, तो तुमको चाहिए कि ब्रह्मा के पास जाकर उनसे सहायता माँगो तथा तुम भी अपनी बुद्धि के अनुसार कोई उपाय करो, अपने मन में शिव के चरणों का ध्यान अवश्य रखो। हमें पूर्ण विश्वास है कि ब्रह्मा, अरुन्ध ती तथा सप्तर्षि के साथ जाकर हिमाचल को समझायेंगे। हमको अपने तपोबल से यह भी पूर्ण विश्वास है कि पार्वती को शिव के अतिरिक्त और कोई प्राप्त नहीं कर सकता। यह कहकर गुरु चुप हो गये।
॥ देवताओं द्वारा गिरिजा के साथ विवाह करने हेतु शिव जी से विनय करना ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! गुरु के आदेशानुसार समस्त देवताओं ने हमारे पास आकर अपना मनोरथ कहा। हमने उनसे कहा कि तुम हमें शिवजी की निन्दा कराना सिखाते हो ? क्या अच्छे लोगों का यही धर्म है ? भला, पिता की यही सेवा करना लड़कों का धर्म है ? शिव की निन्दा सबको दुःख देनेवाली है। यह विपत्ति की जड़ तथा सब प्रकार के आनन्द-मंगल को नष्ट करनेवाली है। मैं तुम्हारी इस विषय में कोई सहायता नहीं करूँगा। तुम सब मिलकर शिव के पास जाओ तथा विनय करो, क्योंकि पर-निन्दा दोनों लोकों में दुःखदायी होती है।
यह सुनकर वे सब कैलाश पर्वत में जाकर शिव की प्रशंसा एवं स्तुति करने लगे। वे बोले-हे विश्वपति! हिमाचल आपका बड़ा भक्त है, उसने आपको परब्रह्म जानकर इच्छा की है कि अपनी पुत्री आपको देकर मुक्ति प्राप्त करे। आप इस प्रस्ताव को स्वीकार करें। देवताओं की यह विनती सुनकर शिवजी हँस दिये तथा उन सबको अत्यन्त प्रसन्न कर विदा किया। इसके पश्चात् वे अति सुन्दर ब्राह्मण-शरीर धारण कर, हाथ में श्वेत रत्नों की माला पहिने, मस्तक पर तिलक लगा, गले में शालग्राम की मूर्ति डाल, उत्तमोत्तम वस्त्र धारण कर, वैष्णवी वस्त्रों से भूषित हो, अति चतुरता से हिमाचल के घर गये।
हिमाचल सपरिवार उनके आदर के लिए उठ खड़ा हुआ। पार्वती ने उस ब्राह्मण रूप की बड़ी भक्ति से पूजा की। उन्होंने पहचान लिया कि यह शिव ही हैं। ब्राह्मण ने आशीर्वाद देकर कुशल-क्षेम पूछा। तब हिमाचल ने उनसे पूछा-हे महात्मन्! आप कौन हैं तथा किस कार्य से आये हैं ? ब्राह्मण रूपी शिवजी ने उत्तर दिया-मैं ब्राह्मण हूँ और पर्यटन करता रहता हूँ। मैं अपने गुरु की कृपा से तीनों लोकों को पहिचानता तथा सब बातों को जानता हूँ। मनुष्यों तीनों लोकों में कोई काम करता है, मैं उसे अपने मन में ही जान लेता हूँ।
ब्राह्मण ने कहा-हे राजन्! तुम्हारी यह प्रबल इच्छा है कि पार्वती का विवाह शिवजी के साथ हो। मैं तुम्हारे भले के लिए कहता हूँ कि तुम ऐसी रूपवती गुणवती कन्या को ऐसे बुरे एवं निर्गुण व्यक्ति को क्यों देते हो ? जिनकी सेवा सम्पूर्ण सृष्टि, देवता, मुनि, दैत्य, सिद्ध आदि सब करते हैं, उन विष्णु के ही साथ इसका विवाह करना उचित है। इस विषय में तुम अपने भाई-बन्धुओं से परामर्श ले लो। यदि तुम यह कहोगे कि पार्वती को शिव के अतिरिक्त अन्य पति स्वीकार नहीं है तो यह बात स्पष्ट है कि रोगी को कुपथ्य ही भाता है, कोई गुणकारी औषधि रुचिकर नहीं लगती।
यह कहकर ब्राह्मण रूपधारी शिव वहाँ से चल दिये। उस समय हिमाचल के नेत्रों से दुःख और चिन्ता के अश्रु बह चले। तब मैना ने हिमाचल से कहा-हे स्वामी! मेरी बात सुनो, जो अन्त को अच्छी फलदायक होगी। आपको यही उचित है कि सब पर्वतों को बुलाकर उस ब्राह्मण के कथन के विषय में अवश्य पूछें, क्योंकि उसकी बातें सुनकर मुझको बड़ा सन्देह हुआ है। जब तक यह बात स्पष्ट न होगी, मुझे बहुत ही भय बना रहेगा।
आप भी ब्राह्मण की बातों पर अच्छी तरह विचार करें। यदि ऐसा न किया तो मैं या तो घर त्याग कर वन में जा रहूँगी या विष खाकर मर जाऊँगी। मैना यह कह अत्यन्त कुपित होकर पार्वती को साथ ले, कोप भवन में जा बैठी। हिमाचल मैना का यह चरित्र देख अत्यन्त दुःखी हुए तथा उसके पास जाकर अनेक प्रकार से समझाने लगे। उन्होंने समझाते हुए कहा कि तुम इस प्रकार के कोपभवन में क्यों पड़ी हो ? फिर हिमाचल बड़े आश्चर्य में पड़कर सोचने लगे कि शिव ने यह चरित्र कैसा किया ?
॥ शिवजी द्वारा सप्तर्षियों को हिमाचल के घर भेजना ॥
ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! इस दशा को देख हिमाचल के परिवार के सबलोग तथा नगर निवासी अत्यन्त व्याकुल हुए। देवता भी आपस मैं यह कहने लगे कि क्या करते हुए, यह क्या हो गया ? तब सब स्त्री-पुरुषों ने भगवान् सदाशिव का ध्यान कर इस प्रकार प्रार्थना की-हे प्रभो! आपने जो कुछ किया, वह सबलोगों के लिए शुभ हो। गिरिजा भी बहुत उदास होकर शिवजी का स्मरण करने लगीं। उस समय गिरिजा की चिन्ता को देखकर शिवजी ने सप्तर्षियों का स्मरण किया।
शिवजी की आज्ञा का पालन करने के लिए वे शीघ्र ही आ पहुँचे। वे अपने सम्पूर्ण शरीर पर भस्म लगाये थे तथा हाथों में माला लिये थे। वे अपने मुख से 'शिव-शिव' उच्चारण कर रहे थे। उन्होंने आते ही शिवजी को प्रणाम किया, तदुपरान्त हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हुए बोले-हे प्रभो! आप हमें क्या आज्ञा देते हैं ? यह सुनकर शिवजी ने उत्तर दिया-हे ऋषियो! तारक दैत्य के संहार के निमित्त हमने गिरिजा के साथ विवाह करने का निश्चय किया है। अब वह समय निकट है। तुम हिमाचल के निकट जाकर उनसे तथा उनकी स्त्री से हमारे विवाह के लिए कहो।
हे नारद! यह सुनकर सप्तर्षि अत्यन्त प्रसन्न हो, परस्पर यह कहने लगे कि हमारे भाग्य धन्य हैं जो सृष्टि का उपकार करने के निमित्त शिवजी अपने विवाह का सन्देश पहुंचाने के लिए हमें हिमाचल के पास भेज रहे हैं। इस प्रकार कहकर वे हिमाचल के समीप जा पहुँचे। हिमाचल ने उन्हें दंडवत्-प्रणाम करने के उपरान्त आने का कारण पूछा। उस समय सप्तर्षियों ने उत्तर दिया-हे हिमाचल! शिवजी सम्पूर्ण सृष्टि के पिता हैं और गिरिजा सब की माता हैं। संसार के कल्याण करने के निमित्त शिवजी गिरिजा के साथ विवाह करना चाहते हैं। तुम गिरिजा का शिवजी के साथ विवाह कर दो। इस सम्बन्ध में ब्रह्माजी ने शिवजी से बड़ी प्रार्थना की थी तथा गिरिजा ने भी कठिन तपस्या करके उन्हें प्रसन्न किया है। तभी शिवजी यह विवाह करने को प्रस्तुत हुए हैं।
जिस समय सप्तर्षि हिमाचल से इस प्रकार की बातें कर रहे थे, उसी समय अगस्त्य ऋषि की पत्नी लोपामुद्रा तथा वशिष्ठ मुनि की पत्नी अरुन्धती भी मैना के समीप जा पहुँची। उन्होंने देखा कि मैना महामलिन वस्त्र पहिने, अत्यन्त दुःखी हो, कोप भवन के भीतर पृथ्वी पर पड़ी हुई है। यह देखकर उन्होंने मैना से कहा-हे मैना! तुम उठकर हमारी बात सुनो। ऋषि- पत्नियों को देखकर मैना तुरन्त उठ बैठी और बोली-मेरे धन्य भाग्य हैं जो आपने यहाँ पधारकर मेरे ऊपर कृपा की।
आप मुझे कोई आज्ञा प्रदान करने की कृपा करें। यह सुनकर अरुन्धती ने कहा-हे मैना! देखो, हिमाचल गिरिजा का विवाह शिवजी के साथ करना चाहते हैं। तुम इससे अप्रसन्न क्यों हो ? क्या तुम शिवजी को नहीं पहचानती कि वे तीनों लोकों के स्वामी और सबसे श्रेष्ठ हैं ? इस प्रकार शिवजी की महिमा का बहुत कुछ वर्णन करने के उपरान्त दोनों ऋषि-पत्नियाँ मैना को साथ ले हिमाचल की सभा में जा पहुँचीं। वहाँ पहुँचकर मैना ने सप्तर्षियों को प्रणाम किया। फिर वह अपने पति के चरणों का ध्यान धरती हुई अरुन्धती के समीप बैठ गयी। उस समय सप्तर्षियों ने हिमाचल से इस प्रकार कहा तुम्हें उचित है कि अब तुम अपनी बुद्धि को स्थिर कर शिवजी के साथ गिरिजा का विवाह कर दो।
॥ सप्तर्षियों द्वारा हिमाचल को उपदेश ॥
सप्तर्षियों ने कहा-हे हिमाचल! तुम्हें उचित है कि अब तुम अपनी बुद्धि को स्थिर कर शिवजी के साथ गिरिजा का विवाह कर दो। शिवजी को अपना जामाता बनाकर तुम सर्वश्रेष्ठ पद को प्राप्त करोगे। देखो, इस समय संसार में तारक नामक दैत्य अत्यन्त उपद्रव कर रहा है। उसका वध करने के निमित्त ही शिवजी ने विवाह करना स्वीकार किया है। तुम देवताओं का कार्य पूरा करने के लिए इस कार्य में विलम्ब न करो।
यह सुनकर हिमाचल ने हाथ जोड़कर उत्तर दिया-हे ऋषियो! मैं आप से एक बात पूछना चाहता हूँ कि वे संसार से विरक्त, अवधूत तथा अशुभ वेषधारी हैं। भला मैं ऐसे व्यक्ति के साथ अपनी कन्या का विवाह कैसे कर दूँ ? इस प्रकार के वर को कन्यादान करने से पिता नरकगामी होता है; क्योंकि विवाह, मैत्री और वैर बराबर वाले से ही करना चाहिए। इसीलिए मैं शिवजी के साथ अपनी कन्या का विवाह नहीं करना चाहता।
हिमाचल की बात सुनकर अरुन्धती ने उत्तर दिया-हे राजन्! वेद के अनुसार तीन प्रकार के वचन होते हैं। एक ऐसा होता है, जिसको सुनने में ऊपर से तो आनन्द होता है, परन्तु वास्तव में वह आनन्द का नाश करनेवाला होता है। दूसरे प्रकार का वचन सुनने में भी अमृत के समान होता है और उसका अन्त भी शुभ होता है। तीसरे प्रकार का वचन सत्य धर्म से विभूषित होता है। हम बीच वाले वचन का आश्रय लेकर तुम्हें समझाती हैं कि शिवजी सम्पूर्ण संसार के राजा तथा सबके स्वामी हैं। वे निर्गुण तथा सगुण दोनों रूप वाले हैं। कुबेर के समान धनपति उनके सेवक हैं। ब्रह्मा, विष्णु तथा हर उन्हीं के तीनों गुणों द्वारा उत्पन्न हुए हैं।
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! अरुन्धती ने पुनः कहा-हे राजन्! गिरिजा तो सनातन काल से शिवजी की शक्ति हैं अतः तुम्हें उचित है कि तुम गिरिजा का विवाह शिवजी के साथ कर दो। ऐसा करने से तीनों लोकों में तुम्हें यश प्राप्त होगा तथा सम्पूर्ण देवता तुम्हारे वशीभूत हो जायेंगे। यदि तुमने ऐसा नहीं किया तो भी यह निश्चित रखे कि गिरिजा तो शिवजी को अवश्य प्राप्त करेगी ही, तुम्हें व्यर्थ ही सन्ताप उठाना पड़ेगा। जिस प्रकार राजा अनरण्य ने अपनी कन्या का विवाह ब्राह्मण के साथ करके अपने वंश की रक्षा की, उसी प्रकार तुम्हें भी उचित है कि तुम गिरिजा का विवाह शिवजी के साथ करके अपने कुल की रक्षा कर लो।
यह सुनकर हिमाचल ने कहा-आप मुझसे राजा अनरण्य की कथा कहने की कृपा करें। यह सुनकर वशिष्ठजी ने उत्तर दिया-हे हिमाचल! वेदचन्द्र नामक चौहदवें मनु की सौलहवीं पीढ़ी में 'अनरण्य' नामक राजा उत्पन्न हुआ था। वह मंगलारण्य राजा की भाँति प्रजा का पालन करनेवाला तथा राज्य सिंहासन पर बैठकर नीतिपूर्वक राज्य करनेवाला था। उसके सात पुत्र तथा एक पुत्री उत्पन्न हुई। पुत्री का नाम 'पद्मा' था। वह पुत्री राजा तथा रानी को प्राणों से भी अधिक प्रिय थी। जब उसकी अवस्था विवाह के योग्य हुई, तब राजा उसके लिए पति की खोज करने लगे।
इतने में 'पिप्पलाद' मुनि ने अपने आश्रम को जाते समय वन में देखा कि एक गन्धर्व अपनी स्त्री से विहार कर रहा है। मुनि भी यह देखकर काम के वशीभूत होकर स्त्री से भोग की इच्छा करने लगे। तभी मुनि ने पुष्पभद्रा नदी के तट पर पद्मा को देख, सबसे पूछा कि यह किसकी कन्या है ? लोगों ने बताया कि यह राजा अनरण्य की पुत्री है। यह सुनकर मुनि स्नान तथा पूजन कर राजा के पास गये और कामवश होकर उससे उनकी पुत्री को माँगा, परन्तु राजा चुप रहे, उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया।
तब मुनि ने क्रोधित होकर कहा कि तू हमको लड़की नहीं देता तथा चुप बैठा हुआ है। हमारे पास वह विद्या है, जिससे हम इसी समय तुझे जला कर भस्म किये देते हैं। मुनि के ऐसे क्रोधपूर्ण वचन सुनकर राजा, स्त्री, पुत्र तथा भृत्यों सहित आश्चर्यचकित होकर रोने लगा। उस समय एक बुद्धिमान् पंडित ने राजा से कहा-हे राजन्! अब आपको यही उचित है कि अपनी पुत्री मुनि को दे दें और इस प्रकार मुनि के क्रोध से अपने कुल को जलने से बचावें।
तब राजा ने पंडित की बात मानकर, अपने कुल की रक्षा के लिए, पुत्री मुनि को दे दी। इसलिए हे हिमाचल! तुमको भी यही करना चाहिए। अब विवाह के शुभ मुहूर्त को केवल सात दिन शेष रह गये हैं। उस दिन मृगशिरा नक्षत्र, चन्द्र वार, उत्तम योग करण तथा केन्द्र के शुभ ग्रह हैं। उसी समय लग्न का स्वामी अपने स्थान पर आयेगा। यही अति उत्तम मुहूर्त होगा।
उस दिन तुम गिरिजा का विवाह शिव के साथ कर दो। इस प्रकार समझाते हुए सप्तर्षि तीन दिन तक वहाँ ठहरे। तब हिमाचल ने उनकी बात मानकर, चौथे दिन लग्न लिखाया। उसे लेकर सप्तर्षि शिव के पास गये।
॥ सप्तर्षियों का शिवजी से हिमाचल का वृत्तान्त कहना ॥
ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! सप्तर्षियों ने शिवजी के पास जाकर सम्पूर्ण वृत्तान्त कह सुनाया। शिवजी बोले-हे ऋषियो! तुमने यह काम अच्छा किया। तुम भी अपने शिष्यों सहित हमारे विवाह में अवश्य उपस्थित होना। यह सुनकर सप्तर्षि प्रसन्न होकर वहाँ से विदा हुए।
हे नारद! इसके पश्चात् शिवजी ने तुमको स्मरण किया। तुम वहाँ तुरन्त प्रसन्नतापूर्वक पहुँचे। तुमने शिवजी की हाथ जोड़कर स्तुति एवं विनती की और कहा कि मेरा यह सौभाग्य है, जो आपने मुझे स्मरण किया। आप मुझ सेवक को आज्ञा दीजिये। उस समय शिवजी ने संसार की रीति के अनुसार कहा-हे नारद! गिरिजा ने हमारी बड़ी आराधना की है। हमने प्रेम के वश होकर उसे अपने साथ विवाह करने का वर दे दिया है। अब तुम हमारी ओर से समस्त देवताओं को निमन्त्रण दो। उन सब को यह बात भली-भाँति समझा देना कि जो हमारी बारात में सम्मिलित न होगा, वह हमारा प्यारा न होगा।
तुम यह सुनकर तुरन्त चल दिये। सर्वप्रथम तुम विष्णुजी के पास तथा इसी प्रकार सनकादिक, भृगु आदि के समीप पहुँचे। तुमने सबको शिवजी का सन्देश कह सुनाया और सब ने अत्यन्त प्रसन्नता के साथ उसे स्वीकार किया।
हे नारद । इस प्रकार तीनों लोकों में कोई ऐसा स्थान शेष नहीं रहा। जहाँ तुमने शिव की ओर से जाकर निमन्त्रण न पहुँचाया हो। सबको निमन्त्रण देने के पश्चात् तुम शिवजी के पास लौट आये और उनकी स्तुति करते हुए बोले-हे महाराज! आपके निमन्त्रण को ब्रह्मा, विष्णु एवं सम्पूर्ण सृष्टि ने बड़ी प्रसन्नता के साथ स्वीकार किया है। इसके पश्चात् तुम शिव की आज्ञा से वहीं रह गये।
नियत समय पर ब्रह्मा, विष्णु, सनकादिक, लोकपाल, इन्द्र आदि गणपति, अग्नि, धर्मराज, वरुण, कुबेर, पवन, ईशान, दिक्पाल, सूर्य, चन्द्रमा, हिंगुलाज, ज्वालामुखी आदि देवी-देवता तथा मुनि कैलाश में अपनी समस्त सामग्री, परिवार, स्त्री, गण, सेना तथा सभासदों को लेकर आये और अपने पद के अनुकूल बैठे। विष्णु तथा मैं शुभ लग्न पर शिवजी के पास आये तथा प्रणामकर के पश्चात् उनसे बोले-हे प्रभो! अब तो चलने का समय आ गया है।
॥ शिवजी की आज्ञा से सब देवताओं का बारात में चलना ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! शिवजी ने उसी समय बारात की तैयारी की आज्ञा दी। उनके आदेशानुसार सब अपने को वस्त्राभूषणों से भूषित करने लगे। चारों ओर ध्वजा, पताका, चंवर आदि शुभ सामग्री स्थापित हुई। देवताओं की पत्नियाँ मंगलगान करने लगीं। रत्न एवं मोतियों से चौक पुराये गये।
उस समय की शिवजी की सुन्दरता का हम वर्णन नहीं कर सकते। विष्णु एवं मैं तथा इन्द्र आदि देवता अपने-अपने प्रसिद्ध वस्त्रों से भूषित हुए। सवारों के रिसाले, गज समूह तथा घोड़ों के छल-बल देखने योग्य एवं प्रशंसा के योग्य थे।
शुभ मुहूर्त में शिवजी महाराज बारात सहित चले। नन्दी, वीरभद्र, भैरव आदि भी अपने गणों सहित उनके साथ हुए। शिवजी की उस बारात में असंख्य सेना चली। शिवजी ने सर्वप्रथम सांसारिक नियम के अनुसार ब्राह्मण के चरणों का ध्यान धर, डमरू, बजाया, इसके पश्चात् वे बारात के साथ चले।
॥ हिमाचल द्वारा बारात के स्वागत की तैयारियाँ ॥
ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद! हिमाचल ने भी इस विवाह के लिए अपने भाई, बान्धव तथा समस्त नदी, नद एवं समुद्रों को स्त्रियों सहित निमन्त्रित किया और अपने नगर को भली-भाँति सजाया। अनेक मन्दिरों को रत्न आदि से पूर्ण कर भूषित किया गया। अच्छा मँडवा सजाकर बन्दनवार तथा मोतियों की झालरें लटका दीं।
समस्त निमन्त्रित भाई-बन्धु उनके घर एकत्र हुए। इस प्रकार वहाँ एक आश्चर्यजनक सामग्री एकत्र हुई। हिमाचल ने अपने दान से सब याचकों को सन्तुष्ट किया। प्रत्येक ने अपने को सुसज्जित किया तथा अनेक प्रकार के साज सजने लगे। स्त्रियों के समूह ने एकत्र होकर गिरिजा को स्नान कराया।
जो-जो कुल देवता आदि की पूजा नियत हैं, वह सब गिरिजा से करायी गयीं। तुमको शिवजी की ओर से देवताओं ने पहिले, हिमाचल के पास भेजा, जहाँ तुम्हारा बहुत ही आदर-सत्कार हुआ। सब रीति-रिवाजों के पूरा हो जाने के पश्चात् हिमाचल ने पहिले अपने पुत्रों को बारात की अगवानी के लिए भेजा तथा स्वयं भी बारात आने की प्रतीक्षा करने लगे।
जब बारात निकट पहुँची तो हिमाचल स्वयं अपने समस्त भाई-बन्धुओं सहित अगवानी के लिए चले। वे बारात की शोभा, असंख्य सेना तथा विचित्र सामग्री देखकर साथियों सहित आश्चर्यचकित हुए। उन्होंने हम सबको झुककर प्रणाम किया तथा बहुत कुछ स्तुति की। तदुपरान्त रहने के लिए एक बहुत अच्छा स्थान दिया।
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! बारात की उस शोभा का वर्णन किसी प्रकार भी नहीं किया जा सकता। सब बारात बड़ी सजधज के साथ अपने-अपने वाहनों पर चढ़कर हिमाचल के घर की ओर चलीं। बारात को द्वार पर आया हुआ देखकर मैना की इच्छा हुई कि सर्वप्रथम मैं अपने दामाद को देखूँ, उसके पश्चात् द्वारचार की रीति पूरी की जाय।
यह विचार कर मैना ने तुमको बुलाया तथा अपनी मनोकांक्षा प्रकट की। वह बोली कि तुम जिसको परब्रह्म तथा सर्वश्रेष्ठ कहते थे, उसे देखकर ही सब काम किये जायेंगे।
॥ मैना द्वारा बारात के आगमन की प्रतीक्षा ॥
बह्माजी बोले-हे नारद! जब मैना राज्य के अंहकार से यह अनुचित विचार अपने मन में लायी तथा उसने शिवजी के स्वरूप की परीक्षा करनी चाही, तब शिवजी यह जानकर अप्रसन्न हुए। अब मैं ऐसा चरित्र करता हूँ, जिससे यह मूर्ख ऐसी बातों को भूल जाय। ऐसा सोचकर शिवजी ने अपना विचार विष्णु को बुलाकर प्रकट किया और कहा-हे विष्णु! तुम और ब्रह्मा हमारे बड़े शुभचिन्तक हो। हम तुमको आदेश देते हैं कि तुम सब पहिले अलग-अलग अपनी सेना सहित हिमाचल के द्वार पर चलो।
हम सब के पश्चात् वहाँ आवेंगे। विष्णुजी ने यह सुनकर सबको शिवजी का आदेश सुनाया। उस आदेश के अनुसार ही सब अलग-अलग अपनी सेना सहित चले तथा हिमाचल के द्वार में प्रवेश करने लगे। मैना ऐसी धूमधाम से आती हुई बारात को देखकर प्रसन्न हो कहने लगी-वाह, वाह, कैसी सुन्दर बारात है।
उसकी ऐसी दशा हुई कि जिसको देखती, तुमसे उसी के विषय में पूछती कि क्या यही गिरिजा के पति हैं ? पहिले जब मैना ने गन्धर्वराज वसु को देखा तो तुमसे कहा कि क्या यही शिव हैं ? तब तुमने उत्तर दिया-नहीं। यह तो शिव की सभा के गानेवाले हैं। यह सुनकर मैना बोली कि जिसकी सभा के गाने व नाचनेवाले ऐसे हैं, तब वह मुझको कब दिखाई पड़ेंगे ? फिर मैना ने यक्षों के स्वामी मणिग्रीव को देखा और तुमसे पूछा कि क्या यही शिव हैं ? तुमने उत्तर दिया-"नही"
हे नारद! इसी प्रकार मैना ने धर्मराज, सप्र, वरुण, पवन, कुबेर, ईशान, आठों दिक्पाल, रुद्र, इन्द्र, चन्द्र, गृहपति, शुक्र प्रजापति, सप्तर्षि, ब्रह्मा तथा विष्णु जो एक के पीछे एक आते थे, उसको देखकर, प्रसन्न हो, तुमसे पूछा- क्या यही शिव है? परन्तु तुम बराबर यही उत्तर देते रहे कि नहीं यह शिव नहीं हैं, यह तो शिव के भक्त हैं।
यह सुनकर मैना अत्यन्त प्रसन्न हुई तथा अपने को धन्य समझने लगी। वह समझी कि हमारा कुल कृतार्थ हो गया। इस प्रकार मैना के सब दुःख दूर हो गये।
॥ शिवजी के स्वरूप को देखकर मैना की मूर्च्छा तथा नारद को धिक्कारना ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! मैना ने तुम्हारी तथा गिरिजा की बहुत प्रशंसा करते हुए तुमसे कहा कि मैंने अब तक शिवजी को नहीं देखा। इतने में शिवजी सम्मुख आ गये। तब तुमने मैना से कहा- यही शिवजी हैं, यही गिरिजा के पति हैं, इन्हें अच्छी तरह देखो। मैना ने शिव को अच्छी तरह देखा, परन्तु शिव की माया से उसके नेत्र ऐसे हो गये कि उसकी दृष्टि में सन्देह उत्पन्न हुआ।
उस समय उसको शिवजी का दल ऐसा दिखाई देने लगा, जैसे कि वे सभी भूत प्रेत आदि हैं। कइयों के तो हाथ ही नहीं थे तथा कई के बहुत से हाथ थे। मैना ऐसा दल देखकर बहुत भयभीत हुई। उस सेना में शिव को बैल पर चढ़े, त्रिनेत्र, चन्द्रमा तथा मुकुट धारण किए, व्याघ्राम्बर एवं गजचर्म धारण किये, हाथों में डमरू, कपाल, त्रिशूल और सब शस्त्र लिए, सिर पर जटा-जूट, कानों में सर्प, पाँच मुख, मुण्डमाल धारण किये हुए, कण्ठ में हलाहल की श्यामता तथा शरीर में सर्प लिपटाये हुए देखा।
हे नारद! उस समय तुमने मैना से कहा कि अब तुम इधर-उधर क्या देखती हो, शिव का रूप क्यों नहीं देखतीं ? जब मैना ने शिव का ऐसा रूप तथा वैसी सेना देखी तो वे भयभीत होकर अत्यन्त दुःखी हुईं और मूच्छित होकर धरती पर गिर पड़ीं। सबको अत्यन्त खेद हुआ। सब लोग औषधि आदि का उपचार कर मैना को चेत में लाए ।
फिर मैना तुमसे बोली-हे नारद! तुझे धिक्कार है। तूने मेरी कन्या का जीवन नष्ट कर दिया। यह अवधूत मेरी लड़की के साथ विवाह करने के लिए भूत-प्रेतों की सेना लेकर आया है। मेरा तथा हिमाचल का जन्म वृथा हुआ। सप्तर्षियों ने भी मेरे साथ धोखा किया है।
हे नारद! यह कहकर मैना गिरिजा से बोली-हे पुत्रि! तुमने वन में जाकर यह क्या काम किया ? हंस के स्थान पर कौआ लिया, सूर्य से मतलब न रखकर जुगनू से मनोरथ चाहा, घी अच्छा न लगा और रेंडी के तेल से रुचि हुई। तुमने यज्ञ की भस्म को दूर कर चिता की भस्म लगायी, जो विष्णु तथा अन्य देवताओं को छोड़, शिव के लिए तप किया।
तुम्हारे कर्मों को धिक्कार है, तुम्हारे उपदेश, तुम्हारी सखियों एवं तुम्हें भी धिक्कार है। अब मुझको आनन्द कहाँ है ? यह सब मेरे कर्मों का ही फल है। मैंने बड़े प्रेम से पुत्री के लिए तप किया था परन्तु ऐसा दुःख देनेवाला फल तथा ऐसा भयावना स्वरूप मुझको प्राप्त हुआ। यह कहकर मैना बारम्बार पृथ्वी पर गिरकर, मूच्छित होने लगी।
कुछ देर पश्चात् मैना को जब चेत हुआ तो गिरिजा की ओर से आँखें मूँद कर 'धिक- धिक' कहने लगीं। वे बोलीं-मुझे दुःख है कि तुम मर न गई। इस प्रकार इस समय हमारे कुल में बट्टा तो न लगता। हिमाचल ने भी नारद के वचन पर इतना विश्वास कर बहुत बड़ी मूर्खता की।
अब मैं क्या करूँ, जिससे मेरा यह दुःख दूर हो ? मैना ऐसे वचन कहती हुई रो-रो कर धरती पर गिर पड़ती थी। यह देखकर सब आनन्द दुःख में परिवर्तित हो गया, परन्तु बहुत समझाने के पश्चात् सब लोगों ने पुनः आनन्द मनाया।
॥ नारद तथा सप्तर्षियों का मैना को समझाना ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! मैना की यह दशा देखकर नगर भर में उदासी छा गयी। तब देवता आदि वहाँ बहुत प्रकार से मैना को समझाने लगे कि तुम यह क्या करती हो, जो इस प्रकार इस शुभ अवसर को अशुभ किये देती हो ? यह सुनकर मैना ने जो कुछ मन में आया, देवताओं को बुरा-भला कहा तथा दिक्पाल आदि को वहाँ से उठा दिया।
हे नारद! तब तुमने मैना को समझाते हुए कहा-हे मैना! तुम्हारी बुद्धि कहाँ गयी है ? यह सब शिव की लीला है। शिवजी परब्रह्म हैं। उठकर अपना सब काम करो। मैना ने तुम्हारे इस प्रकार के वचन सुन, 'दुर-दुर' कहकर तुम को फटकारा। तब सप्तर्षि अरुन्धती सहित वहाँ आकर मैना को समझाने लगे। मैना ने उनको भी क्रोधित होकर वहाँ से निकाल दिया।
जब मैंने अच्छी प्रकार से शिव की स्तुति की, तब मैना मुझसे अत्यन्त क्रोधित होकर बोली-चुप रहो, ऐसी व्यर्थ की झूठी बातें मत कहो। अन्त में हिमालय ने वहाँ जाकर मैना को बहुत समझाया और कहा-संसार के स्वामी तथा पिता शिव मेरे द्वार पर आये हैं, तुमको ऐसा अनुचित कार्य नहीं करना चाहिए।
देखो, एक बार पहिले भी वे शिवजी मेरे यहाँ अवधूत स्वरूप धारण कर आये थे तथा ऐसे नाचे-गाये थे कि स्त्री-पुरुष सब अधीर हो उठे। उन्होंने यहाँ ऐसे-ऐसे रूप दिखलाये थे कि उनको देखकर मैं और तुम दोनों ने गिरिजा को उन्हें देना स्वीकार कर लिया था। इस प्रकार हिमाचल ने अनेक उदाहरण देकर मैना को समझाया, लेकिन मैना के मन में कुछ न आया।
तब मैना की यह दशा देखकर गिरिजा बोलीं-हे माता! मैं शिवजी के अतिरिक्त और किसी के साथ विवाह न करूँगी। यह बात किस प्रकार हो सकती है कि सिंह का भाग सियार प्राप्त करे ? यह सुनकर मैना क्रोधित हो उठी। हे नारद! जब मैना का क्रोध शान्त न हुआ, अपितु वह और बढ़ता ही गया, तब विष्णुजी स्वयं वहाँ मैना को समझाने के लिये गये।
॥ विष्णु जी का मैना को समझाना ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! विष्णुजी ने वहाँ पहुँचकर मैना को समझाते हुए कहा-हे मैना! तुम शिव को नहीं जानती हो। वे सबसे बड़े, सबके स्वामी तथा अनादि हैं। उन्हीं से प्रकृति, पुरुष, सनकादिक, मैं तथा ब्रह्मा आदि सब उत्पन्न हुए हैं। वे और मैं उन्हीं की सेवा करता हूँ। अनेक स्तुति करने के पश्चात् विष्णुजी ने फिर कहा-सबको शिवजी में और शिव को सब में समझो।
जिस प्रकार एक शरीर अनेक प्रकार के वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार शिवजी को भी समझना चाहिए। शिवजी की भक्ति बड़ी आनन्ददायक है। मैं उन्हीं की शक्ति से सब कार्य करता हूँ तथा उन्हीं के तप से मुझको चक्र प्राप्त हुआ है। सब देवता शिवजी की सेवा से ही अमर हो गये हैं।
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! विष्णुजी शिवजी के गुणों का इस प्रकार वर्णन करते हुए मैना से फिर बोले-हे मैना! तुमको सब धर्मरूप कहते हैं, इसलिए आज मैं तुमको समझाता हूँ कि तुम्हारा यह परम सौभाग्य है, जो सदाशिव हम सब के साथ तुम्हारे द्वार पर पधारे हैं।
तुम इस बात को भली-भाँति समझो कि शिवजी की भक्ति के बिना यह संसारभर का बखेड़ा व्यर्थ है। शिवजी का तप बहुत सरल है। उनके अनेक रूप तथा असंख्य लीलाएँ हैं। जिस प्रकार तुमने तब अनेक रूप देखे थे, उसी प्रकार अब उनके भयानक स्वरूप को भी देख लिया।
जो मनुष्य किसी को कुछ देने के लिए कहे और अन्त में अपने वचन का पालन न करके न दे, उसके बराबर और कोई पापी नहीं। अब तुम उठो तथा अपना काम करो। शिवजी तुम्हारा कल्याण करेंगे। मैं तुमसे सत्य कहता हूँ कि शिव और गिरिजा का विवाह अवश्य होगा।
॥ शिव जी के दिव्य रूप को देखकर मैना का प्रसन्न होना ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! विष्णुजी के मुख से इस प्रकार के पवित्र बचन सुनकर मैना को कुछ आभास हुआ। तब वह उठकर लज्जापूर्वक विष्णु से बोलीं-आपने मुझको समझाकर बड़ा धीरज बँधाया, मैं अपने मन से विवश हूँ। वह बात को समझ कर भी समझने की शक्ति नहीं रखता। मेरा हृदय यह कार्य करने को नहीं चाहता।
हे नारद! यह सुनकर विष्णुजी ने तुमसे कहा कि तुम शिवजी के पास जाकर निवेदन करो कि वे मैना के हृदय से अपनी माया को खींच लें जिससे मैना अपनी यथार्थ दशा को प्राप्त करे और गिरिजा का विवाह हो सके तथा सब मनुष्य प्रसन्न हो जायँ। हे नारद! तुम विष्णुजी की आज्ञा पाकर शिवजी के चरणों में पहुँचे तो शिवजी से विष्णु की इच्छा जानकर कहें, अत्यन्त सुन्दर हो गये।
उन्होंने एक मुख, दो नेत्र, चम्पा के फूल के समान शरीर का रंग तथा सब प्रकार से मोहक रूप धारण कर लिया। उन्होंने अपने शरीर को उत्तमोत्तम रत्न एवं जड़ाऊ वस्त्रों से भूषित कर लिया। अग्नि के समान चमकते हुए मस्तक पर चन्दन, कस्तूरी, अगरु, कुंकुम, इन आदि लगाये। मणिजटित अँगूठियाँ हाथों में पहिनी तथा नेत्रों में काजल लगाया। उस समय समस्त संसार की सुन्दरता एकत्र होकर शिवजी में स्थित हो गयी।
हे नारद! जो परब्रह्म आदि, मध्य, अन्तरहित तथा सृष्टि उत्पन्न करने वाला है, उसने ऐसे रूप में प्रकट होकर कैसी-कैसी लीला की ?हे नारद ! तुमने शिवजी का ऐसा सुन्दर स्वरूप देख, अत्यन्त आनन्द माना। तुम स्तुति करने लगे और मैना से बोले कि हे मैना! अब तुम शिवजी के रूप को देखो।
तब मैना ने शिवजी के रूप को देखा और अत्यन्त प्रसन्न हुई। फिर चारों ओर प्रसन्नता छा गयी। देवता उच्च स्वर में 'जय शिवशम्भु' कहने लगे। अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। शंख, मृदंग आदि वाद्य बजने लगे। उस समय मैना भी बोली-यह हमारा परम सौभाग्य है। इसके पश्चात् शिवजी सम्पूर्ण बारात के साथ हिमाचल के द्वार को चले।
॥ द्वारचार एवं जनवासे की कथा ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! वे लोग संसार में बड़े भाग्यशाली हैं, जो शिवजी की भक्ति करते हैं। शिवजी की भक्ति तीनों लोकों को भाग्य से ही प्राप्त होती है। वे ही सदाशिव जब देवताओं सहित संसारी मनुष्यों के समान हिमाचल के द्वार को चले, तब उनको देखने के लिए नगर की सब स्त्रियाँ, जो जिस अवस्था में बैठी थीं, उसी प्रकार उठकर चल दीं।
वे शिवजी को देखकर परस्पर कहती थीं कि गिरिजा को ऐसा पति तप के ही कारण मिला है। वे सब मिलकर परस्पर मंगल गान करने लगीं। मैना ने अत्यन्त प्रसन्न होकर शिवजी की आरती उतारी। गिरिजा ने भी अपनी माता से छिपकर शिवजी को देखा। उनका जैसा सुन्दर स्वरूप गिरिजा को दिखाई दिया, उसकी प्रशंसा नहीं की जा सकती।
गिरिजा ने सुन्दर स्वरूप को देखकर प्रणाम किया। तब हिमाचल ने कुल तथा संसार की रीति के अनुसार बड़ी प्रसन्नता व धूमधाम के साथ सब रीतियाँ पूरी कीं । द्वारचार के पश्चात् गायन, नृत्य, पुष्पवृष्टि तथा अनेक प्रकार के आनन्द मंगल होने लगे । तत्पश्चात् बारात जनवासे को गयी।
॥ विवाह के अन्य उत्सवों का वर्णन ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! हिमाचल ने बारात की सेवा के लिए दास-दासी तथा अन्य सब प्रकार की सामग्री भेज दी। गिरिजा ने ध्यान करके बारात में सिद्धि को प्रकट कर दिया, जिससे किसी बात की कमी न रह गयी। विष्णु आदि सब देवता हिमाचल की बड़ाई करने लगे, वे सब यह न जान सके कि यह सब सिद्धि गिरिजा की है।
इसके पश्चात मैंने हिमाचल से लग्न मुहूर्त का ध्यान दिलाते हुए कहा कि अब देर मत करो, यह सुनकर हिमाचल ने प्रसन्न होकर अपने पुरोहित को बुलाया। पण्डित वेद पाठ करते हुए अनेक प्रकार के बाजे बजवाते हुए चले तथा शिवजी के पास जाकर यह निवेदन किया कि अब आप हमारे घर चलें। तब मैं एवं शिव सहित हिमाचल के घर को गया। हम सब देवता वहाँ पहुँचकर उचित स्थानों पर बैठे। फिर गिरिजा को भीतर से बुलवाया। सबने गिरिजा को आते हुए देखकर प्रणाम किया। गिरिजा को उत्तम स्थान पर बैठाने के उपरान्त विवाह की सब रीतियाँ होने लगीं। दोनों ओर से बहुत-सा दान दिया गया, जो प्रत्येक को उसकी इच्छानुसार ही मिला। उस समय चारों ओर बड़ा आनन्द हुआ। स्त्रियाँ मंगलगान कर रही थीं।
हे नारद! इसके पश्चात् बारात वहाँ से चल कर जनवासे में आयी। तब हर प्रकार के भोजन परोसे गये। हिमाचल ने अपने घर में ही छप्पन प्रकार के भोजन बनवाये थे। हिमवान ने बारात को आने का सन्देश भेजा। थोड़ी ही देर में सब बारात आ पहुँची। हिमाचल ने सबके पाँव धोये। जिस समय उन्होंने शिव के चरण धोये, उस समय वे प्रसन्नता से विह्वल हो गये। उन्होंने यही सोचा कि ये वही चरण हैं, जिनका विष्णु एवं ब्रह्मा ध्यान करते हैं। चरण धोने के पश्चात् शिवजी को एक सुन्दर स्वर्ण की चौकी पर बैठाया तथा उनके सम्मुख भोजन लाकर रखा। प्रत्येक के सम्मुख स्वादिष्ट भोजन रखे गये। वे भोजन चारों प्रकार के थे, जिनमें छहों रसों का स्वाद था। सभी भोजन करने लगे। स्त्रियों ने गालियाँ गायीं, जिनमें वे सब के नाम लेती थीं और बाराती प्रसन्न होकर बहुत धीरे-धीरे भोजन करते थे। जब भोजन समाप्त कर चुके, तब उसको पान बाँटे गये। तदुपरान्त वहाँ से बारात विदा होकर जनवासे में आयी। जब मैंने विवाह की शुभ लग्न पहिले के विचार के अनुसार देखी तो हिमाचल को सूचित कर दिया। हिमाचल ने उसी समय अपना एक पुत्र शिवजी को आदर सहित लाने के लिए भेज दिया। शिवजी देवता एवं मुनियों सहित तुरन्त वहाँ से चल दिये। उस समय अनेक प्रकार के बाजे बजने लगे। उस समय चारों ओर जो आनन्द छा गया उसका वर्णन किसी प्रकार भी नहीं किया जा सकता।
॥ हिमाचल द्वारा शिव जी को कन्यादान ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! उस समय शिवजी का विवाह अपने नेत्रों से देखने के लिए सभी उत्सुक एवं प्रसन्न थे। मैना ने सर्वप्रथम शिवजी की आरती उतारी, इसके पश्चात् शिवजी अन्दर गये। देवता एवं मुनि आदि भी अन्दर जाकर बैठ गये। वे सब शिवजी के चन्द्रमा के समान सुन्दर मुख को चकोर की भाँति देखने लगे। उस समय मण्डप के चारों ओर की धरती चार प्रकार से पवित्र की गयी। उसके नीचे सिंहासन पर शिवजी विराजमान हुए। फिर गिरिजा आयीं। वे सोलह श्रृंगार किये हुए अपनी सखियों के साथ थीं। विष्णुजी तथा हम सब देवताओं ने हाथ जोड़कर गिरिजा को प्रणाम किया तथा सबने शुभ आशीर्वाद दिया। दोनों ओर के मुनियों ने प्रथम गणपति एवं गौरी का पूजन किया। तदुपरान्त वे अन्य रीतियाँ पूरी करने लगे।
हे नारद! पंचदेवता अनादि हैं तथा पाँचों को समान जानकर उनकी पूजा करनी चाहिए। जिस प्रकार वेद में विवाह की विधि लिखी है, हिमाचल ने उसी प्रकार सब रीतियाँ पूरी कीं। मैना ने बहुत महीन तथा उत्तम वस्त्र शिवजी को दिये। उसी प्रकार के दो वस्त्र गिरिजा को भी दिये। गिरिजा हिमाचल की दाहिनी ओर आकर बैठीं और शिवजी गिरिजा के सम्मुख बैठे। तब मुनीश्वरों ने वेदपाठ किया। मैना भी कन्यादान के समय आयीं। पुरोहित दूसरे पक्ष का गोत्र-नाम पूछने लगे तथा अपने कुल का बताने लगे। हिमाचल ने गर्ग, विष्णुजी तथा मुझसे कहा कि अब आप लोग कन्यादान करा दीजिये, हमलोग शिवजी का गोत्रोच्चारण न कर सके, इसलिए विवश होकर चुप ही रहे। तब हिमाचल ने शिवजी से कहा कि आप अपना गोत्र एवं कुल स्वयं वर्णन कीजिये; क्योंकि बिना इसके कन्यादान नहीं हो सकता।
शिवजी ने लीला करके अपने मुख से कुछ न कहा, वे चुप हो गये। यह देखकर सब लोग आश्चर्य करने लगे। उस समय सबको बहुत दुःख भी हुआ, सबकी आशा टूट गयी । हिमाचल का यह वचन एवं हठ किसी को भी भला न लगा। सब परस्पर एक दूसरे की ओर देखने लगे, शिवजी की लीला को कोई न जान सका। गिरिजा अपने पति के मुख को देखकर सबसे अधिक चिन्तित हुईं और शिवजी का ध्यान करने लगीं। शिवजी ने गिरिजा की चिन्ता को जानकर, तुम (नारद) पर अपनी इच्छा प्रकट की। तब तुम तुरन्त हँसकर अपनी वीणा बजाने लगे। हिमाचल मन में अत्यन्त अप्रसन्न हुए। सब लोगों ने तुम से कहा कि यह समय वीणा बजाने का नहीं है।
हे नारद! यह सुनकर तुमने उत्तर दिया-हे राजन्! तुमने जो शिवजी का गोत्र एवं कुल पूछा है सो हमने शिवजी के संकेत के अनुसार उत्तर दिया है अर्थात् शिवजी का कुल एवं गोत्र नाद है। शिवजी का शरीर नादरूपी है तथा शिवजी नादपूर्ण हैं। शिवजी का कुल एवं गोत्र जो ब्रह्मा, विष्णु तथा हम सब में से कोई नहीं जानता, कौन मनुष्य बता सकता है। तुम तो मूर्खा जैसी बातें करते हो।
शिव सशरीर शरीर रहित, निष्कुल, सकुल, अगोत्र तथा सगोत्र सब कुछ हैं। अब समय बीता जाता है, इसलिए तुम कन्यादान कर दो। तब हिमाचल ने उसी समय कुश एवं जल लेकर कन्यादान कर दिया तथा गिरिजा का हाथ शिवजी के हाथ में पकड़ा दिया। इससे हिमाचल की तीनों लोकों में कीर्ति हुई। शिवजी ने गिरिजा का हाथ पकड़ा सो यही विवाह पद्धति लोक में प्रसिद्ध हो गयी।
॥ ब्रह्मा का मोह तथा बटुकों की उत्पत्ति का वर्णन ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! उस समय सब आनन्दित हुए। दास, दासी आदि को भरपूर पारितोषिक दिया गया। तदुपरान्त पुरोहित गिरिजा को शिव के वामभाग में बैठाकर हवन करने लगे। उत्तम रीति से भाँवरें पड़ने लगीं, जिनको देखकर सबको आनन्द प्राप्त हुआ। तब शिवजी ने ऐसा चरित्र किया कि भाँवरें पड़ते समय गिरिजा का एक अँगूठा कपड़े से हट जाने से मुझे दिखाई दे गया। मैंने भावी के वश में होकर उसको काम की दृष्टि से देखा।
यद्यपि मैंने अपने को बहुत सँभाला, मेरा वीर्य धरती पर गिर पड़ा। उससे असंख्य बटुक एवं जटाधारी तेजस्वी उत्पन्न हुए। वे सब मेरी स्तुति करके खड़े हो गये। शिवजी ने उनको देखकर अत्यन्त क्रोधित हो त्रिशूल उठा लिया। जब सबने मिलकर शिवजी की विनती की जब शिवजी प्रसन्न होकर बोले-हे ब्रह्मा! हम अप्रसन्न नहीं हैं। तुम सुखपूर्वक अपना कार्य करो। तब मैंने उन सब बटुकों को सूर्य को सौंपकर कहा कि तुम सब इनकी सेवा में रहो। वे सब सूर्य की सेवा में ब्रह्मचारी रहकर, वेद के महान् ज्ञाता हुए।
हे नारद! इसके पश्चात् मैंने विवाह का जो कार्य शेष रह गया था, वह सब भली-भाँति पूर्ण करा दिया। फिर हिमाचल ने हम सबको जो कुछ उचित था, दिया। शिवजी को उन्होंने रत्न आदि हर प्रकार का धन-द्रव्य दहेज के रूप में दिया। हिमाचल की उदारता से उस समय कोई भिक्षुक खाली हाथ न रहा। फिर हम सब तो अपने-अपने निवासस्थान पर लौट आये, लेकिन स्त्रियाँ शिवजी को घर के भीतर ले जाकर सब रीतियाँ पूरी करने लगीं। उन स्त्रियों ने शिवजी के साथ अनेक प्रकार के हास्य किये।
॥ शिव गिरिजा का अन्तःपुर में प्रवेश एवं कामदेव की उत्पत्ति का वर्णन ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! सब रीतियाँ पूरी हो जाने के पश्चात् स्त्रियों ने शिव और गिरिजा को अन्तःपुर में ले जाकर उत्तम शैय्या पर बैठाया। गिरिजा और शिव के उस समय के स्वरूप का, जो वस्त्राभूषण से सज्जित था, किसी प्रकार भी वर्णन नहीं किया जा सकता। उस समय सब देवपलियाँ शिवजी के पास गयीं, जिनमें सावित्री, जाह्नवी, लक्ष्मी, सरस्वती, अहिल्या, तुलसी, शतरूपा, संज्ञावर्ता, अदिति तथा सोलहों संसार की माताएँ जो अपनी कृपा द्वारा संसार के दुःखों को नष्ट कर देती हैं,वे थीं। सर्वप्रथम सरस्वती बोलीं-हे देवाधिदेव! अपने प्राणों के समान पत्नी पायी अब अपनी प्यारी के मुख को तो देखो। लक्ष्मी ने कहा-हे देवताओं के देवता! अब समस्त लज्जा त्यागकर अपनी प्यारी को हृदय से लगा लो। फिर सावित्री बोलीं-हे देव! आप स्वयं भोजन करके अपनी प्यारी को भोजन कराओ और उन्हें पान खिलाओ।
तुलसी बोलीं-हे शिव! आप तो स्त्री को छोड़कर कामदेव को भस्म कर दिया था तथा संसार से त्यागी एवं काम-रहित बन गये थे, फिर अरुन्धती को अपने क्यों सिखाकर भेजा ? स्वाहा ने कहा-हे गिरिजापति! स्त्री के वचन सुनकर लज्जित मत होना। यदि वह कोई ढिठाई से लाड़-प्यार की बातें कहें तो उसका बुरा मत मानना; क्योंकि संसार की यही रीति है। इसके पश्चात् शंखा ने सबसे कहा कि अब गिरिजा को शिव के साथ वहाँ भेज दो, जहाँ सुन्दर मन्दिर पुष्पों से सज्जित हों तथा रत्नदीप जलते हों।
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! स्त्रियों की ऐसी हास्यपूर्ण बातें सुनकर शिवजी अत्यन्त लज्जित हुए तथा बोले-हम तुम सब के हाथ जोड़ते हैं तथा विनय करते हैं कि हमारे समक्ष ऐसी बातें मत कहो। सब स्त्रियाँ शिवजी के यह वचन सुनकर लज्जित हो गयीं तथा चित्रलिखित-सी चुप होकर रह गयीं। उस समय शिवजी को प्रसन्न देखकर रति बोली-हे शिवजी! आपने तो अपनी स्त्री को ग्रहण कर प्रसन्नता प्राप्त की; परन्तु मेरे पति को व्यर्थ ही जला दिया।
अब मैं यह आशा लेकर आपसे विनय करती हूँ कि आप मेरे पति को जीवित कर दीजिये। इस समय मेरे अतिरिक्त सारा संसार आनन्दित है। यह कहकर रति विलाप करने लगी, जिससे सभी दुखित हुए । फिर रति अपने पति की जली हुई भस्म को, जिसे वह बाँध कर लाई थी, खोलकर शिवजी के आगे खड़ी हो गयी। रति का रोना सुनकर सब स्त्रियाँ भी रोने लगीं। उस समय शिवजी ने रति एवं देव-पत्नियों का रुदन सुनकर एकबार अमृत दृष्टि से देखा जिससे उसी समय कामदेव अपनी भस्म से उत्पन्न हो गया।
यह देखकर रति अत्यन्त प्रसन्न हुई तथा कामदेव शिवजी की स्तुति करने लगा। शिवजी ने कहा-हे कामदेव! अब तुम शोक मत करो तथा बाहर बारात में जाकर बैठो। कामदेव ने शिवजी के आदेशानुसार जनवासे में आकर, मुझको एवं विष्णुजी को प्रणाम किया। मैंने उसे आशीर्वाद देते हुए कहा कि तुम शिव एवं गिरिजा के प्यारे हो। अब तुमको किसी प्रकार का भय नहीं करना चाहिए। यह सुनकर कामदेव वहीं बैठ गया।
हे नारद! फिर स्त्रियाँ अत्यन्त प्रसन्नता के साथ शिवजी एवं गिरिजा को अनेक प्रकार की विचित्र वस्तुओं एवं रत्न आदि से भूषित मुख्य अन्तःपुर में ले गयीं। उस अन्तःपुर को विश्वकर्मा ने स्वयं अपने हाथों से निर्मित किया था। चन्दन, कस्तूरी, अगरु आदि से मन्दिर में सब ओर सुगन्धि फैल रही थी। उसमें कहीं विष्णुलोक, ब्रह्मलोक, इन्द्रलोक तथा गोलोक, रासमण्डल आदि के चित्र थे और कहीं पर वह कैलाश पर्वत बना हुआ था, जहाँ वृद्धावस्था एवं मृत्यु का कोई भय नहीं है।
शिवजी उन सुन्दर चित्रों को देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुए। जब प्रभात हुआ तो चारों ओर से अनेक प्रकार के बाजे बजने लगे तथा मुनि, देवता आदि जयकार का शब्द करने लगे। तब विष्णुजी ने धर्मराज से कहा कि तुम शिवजी के पास जाकर उन्हें किसी उपाय से निन्द्रा से जगाकर उठाओ। विष्णुजी के वचन सुनकर धर्मराज ने शिवजी के समीप जाकर कहा-हे महादेव! कृपाकर अब उठिये तथा जनवासे में चलकर सबको आनन्दित कीजिये।
धर्मराज की यह बात सुनकर शिवजी हँसे और बोले-हे धर्मराज! तुम चलो, मैं अभी आता हूँ। शिवजी बड़ों की आज्ञा पाकर, मन में हँसते हुए जनवासे को चल दिये।
॥ हिमाचल द्वारा देवताओं की विनय ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! अन्तःपुर से उठकर जब शिवजी जनवासे में आये, तब हमने सब देवताओं आदि को बुला लिया। विष्णुजी तथा मैंने, तुम्हें सप्तर्षियों को सम्बोधित करते हुए, इस प्रकार उच्च स्वर से कहा-हे नारद! एवं हे सप्तर्षियो! तुमने बड़ी कृपा की। केवल तुम्हारी कृपा के फलस्वरूप ही यह विवाह सम्पन्न हुआ है।
फिर विष्णुजी तथा मैंने बहुत-सा दान देकर हिमाचल से विदा माँगी। हिमाचल बहुत से लोगों के साथ आकर विनय करते हुए बोले-हे देवताओ! आप मुझे छोड़कर न जायें। यद्यपि मैं आप लोगों की भली प्रकार से सेवा न कर सका, सेवा तो क्या आपके चरण भी नहीं धो सका। मैं अत्यन्त लज्जित हूँ, यहाँ तक कि पुष्प भी आप लोगों को भेंट न कर सका। आशा है आप लोग उसका विचार न करके पुनः मेरे गृह को पवित्र करेंगे।
हे नारद! यह सुनकर मैंने, विष्णुजी ने तथा समस्त देवताओं ने हिमाचल से कहा-हे पर्वतराज! तुम तो धन्य हो। हमने ऐसा आनन्द कहीं प्राप्त नहीं किया। इस प्रकार का मनोहारी स्थान तथा भोजन कहीं प्राप्त नहीं हुआ। ऋद्धि-सिद्धि तुम्हारी सेविका हैं। संसार में तुम्हारे समान और कौन है ? इसी प्रकार दोनों ओर से नम्रता के वचन कहे गये। इसके उपरान्त हिमाचल बारात को अपने घर भोजन कराने के लिए ले गये। वहाँ पहुँचकर वे बारात को भोजन कराने लगे और स्त्रियाँ शिवजी को सुनाकर गाली गाने लगीं, जिनका आशय यह था कि यद्यपि तुम अपनी सम्पूर्ण सामग्री अशुभ रखते हो, परन्तु अपने भक्तों को सब कुछ प्रदान करते हो। यह सुनकर शिवजी ने वरदान दिया कि जो इस वृत्तान्त को पढ़ेगा, वह सदैव प्रसन्न बना रहेगा।
॥ हिमाचल के यहाँ से देवताओं का विदा होना ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! इस प्रकार हिमाचल ने तीन दिन तक आग्रह एवं विनती करके बारात को नहीं जाने दिया। चौथे दिन मैंने स्वयं पश्चिम मुख से शिव-गिरिजा को बैठाकर होम कराया तथा जो रीतियाँ शेष रह गयी थीं, सब को पूर्ण कराया। तत्पश्चात् अभिषेक किया गया। सब ने शुभाशीर्वाद दिया। फिर सब बारात को भोजन कराया गया। प्रातःकाल जब हिमाचल से विदा माँगी तो हिमाचल अत्यन्त विनय के साथ बारात विदा की आज्ञा न देकर, उसे कई दिन तक वहीं ठहराये रहे।
हिमाचल के प्रेम एवं शील के कारण किसी को भी ऐसी संगति छोड़ने की इच्छा न हुई। उस समय देवताओं ने हिमाचल की बहुत स्तुति की तथा समझाते हुए कहा-हे राजन्! शिवजी परब्रह्म हैं जिनके हम सब सेवक हैं। वे तुम्हारे घर आये, इसलिए संसार में तुम से अधिक भाग्यवान् कौन है ? यह कहकर सब देवता एवं मुनि अत्यन्त दुःखी होकर वहाँ से लौट आये तथा कोई किसी से कुछ न कह सका।
अन्त में निराश होकर हिमाचल ने लज्जा से एक सभा कर सबको यह सूचना दी कि शिवजी अब विदा होने वाले हैं। हिमाचल के मुख से ऐसे वचन सुनकर सब लोग अचेत तथा मूच्छित से हो गये, फिर हिमाचल ने गुरु की आज्ञानुसार सब प्रकार की सामग्री उपस्थित कर, बारात को घर के भीतर बुला लिया। हे नारद! जब बारात के सब लोग आ गये, तब मैंने शिव एवं गिरिजा को मध्य मैं बैठा लिया। फिर गौरी-गणपति की पूजा कराकर, सब करने योग्य काम पूरे करा लिये। हिमाचल ने दहेज में पकवान, फल, हाथी, घोड़े, रथ, दास, दासी गौ आदि इतने दिये जो असंख्य थे।
इसके उपरान्त हिमाचल ने कहा-मुझे पूर्ण आशा है कि जो अपराध मुझसे हुआ हो, उसे आपलोग क्षमा करेंगे। हिमाचल के ऐसे वचन सुनकर सब देवता बोल उठे-हे हिमाचल! तुम मुक्त हो गये, क्योंकि शिवजी ने तुम पर दया की है। तुमने गिरिजा का विवाह शिवजी के साथ कर दिया, यह हम सब पर बड़ी कृपा हुई।
॥ शिव जी का गिरिजा के साथ विदा होना ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! इस प्रकार हिमाचल तथा मैना सहित समस्त परिवार बारम्बार शिवजी की स्तुति करने लगा। तत्पश्चात् सब बारात वहाँ से स्वस्थान में लौट आयी। शिवजी हिमाचल के घर के भीतर गये; जहाँ सब स्त्रियाँ एकत्र होकर शिवजी को विदा करने लगीं। शिवजी ने कहा-सब बारात यहाँ से विदा हो गयी, अब मुझे भी विदा होने की आज्ञा दें।
यह सुनकर मैना ने बड़े स्नेह के साथ गिरिजा को शिवजी को सौंप दिया तथा बोलीं- हे शंकर! यह गिरिजा मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय है तथा अभी इसकी अवस्था छोटी ही है। यह अधिक कोमलांगी है। इसको संसार के रीति-रिवाज अब तक मालूम नहीं। यह बहुत ही सीधी है, इसलिए आप इसे प्रेम तथा कृपा से रखे। यह कहकर मैना शिवजी के चरण पकड़कर मोहित हो गयी।
हे नारद! यह सुनकर शिवजी बोले-तुम और हिमाचल धन्य हो जिनकी संसार में सबलोग स्तुति करते हैं, तुम कुल एवं परिवार-सहित मुक्ति प्राप्त करोगे। हमें भक्तजन वैर, भय, प्रीति, भक्ति एवं सम्बन्ध आदि द्वारा अनेक प्रकार से पाते हैं। यह कह शिवजी मैना से विदा होकर हिमाचल के पास आये तथा हाथ जोड़कर खड़े होकर विदा माँगी।
उस समय हिमाचल अत्यन्त प्रेम एवं भक्ति से आँसू बहाते हुए बोले-हे प्रभु! आप मेरे समस्त अपराधों को क्षमा करें तथा मुझे अपना सेवक समझकर सब दुःख दूर करते रहें। यह कहकर हिमाचल ने शिवजी को विदा किया। तब बारात बड़ी धूमधाम से चली उस समय सब प्रकार के बाजे बजने लगे।
॥ ब्राह्मण स्त्रियों द्वारा गिरिजा को पतिव्रत धर्म का उपदेश ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! इस प्रकार शिवजी वहाँ से विदा होकर नगर के बाहर ठहरे। उधर मुनियों ने हिमाचल से कहा कि अब गिरिजा को भी विदा कीजिये। जब यह समाचार भीतर मैना के पास भेजा गया तो मैना सुनकर प्रेम-सागर में डूब गयी। नगर भर की स्त्रियों को बुलाया गया। वे सब वस्त्रभूषणों से सज्जित होकर गिरिजा को विदा करने के लिए आयीं।
ब्राह्मण स्त्रियों ने गिरिजा को पातिव्रतधर्म की शिक्षा देते हुए कहा-हे गिरिजे! अपने पति की सेवा लोक में अत्यन्त आनन्द प्राप्त करनेवाली है। तुम दिन-रात पति की सेवा में ही लगी रहना। स्त्री के लिए इसके समान कोई दूसरा तप नहीं है। संसार में चार वस्तुएँ सुख देनेवाली हैं- पहला प्रियतम, दूसरा धर्म, तीसरी स्त्री तथा चौथा सन्तोष; इन चारों की परीक्षा विपत्ति के समय में ही हो सकती है।
जो स्त्रियाँ अपने पति का सम्मान नहीं करतीं, उनकी सेवा नहीं करतीं, वे निस्सन्देह नरक में जाती हैं। इसलिए स्त्री को सब कुछ त्यागकर, केवल अपने पति की ही सेवा करना उचित है। वेदों में चार प्रकार की स्त्रियाँ बतायी गयी हैं। पहली उत्तम वह है, जो स्वप्न में भी दूसरे पुरुष का मन में विचार न लावे। दूसरी मध्यम, जो अन्य पुरुष को पुत्र, पिता व भाई के समान समझे। तीसरी निकृष्ट, जो अपने धर्म का विचार करके पर-पुरुष की संगति से बची रहे। चौथी अति अधम, जो अपने पति व कुल के भय से दूसरे की संगति से बच जाये। समय से न डरना भी चौथी प्रकार की स्त्री में ही गिना गया है। पतिव्रता स्त्रियों की सभी प्रतिष्ठा करते हैं।
हे नारद! ब्राह्मण-स्त्रियाँ गिरिजा को इस प्रकार समझाती हुईं फिर बोलीं कि स्त्री से चाहे अनेक पाप हुए हों, परन्तु वह केवल अपने पतिव्रत धर्म से ही परमपद प्राप्त करती है। हे गिरिजा! शिवजी जितनी स्त्रियों पर कृपा करते रहे हैं, उतनी और किसी पर नहीं। जो स्त्रियाँ अपने पति का विरोध करती हैं, वे निसन्देह नारकीय हैं। उनकी पहिचान यह है कि दूसरा जन्म धारण कर या तो युवावस्था में ही वैधव्य को प्राप्त करती हैं या पति सहित अनेक प्रकार के दुःखों को भोगती हैं।
पतिव्रता स्त्रियों की वेद भी बड़ाई करते हैं। स्त्री को उचित है कि प्रथम अपने पति को भोजन कराकर, स्वयं पीछे खावे तथा प्रथम अपने पति को सुलाने के पश्चात् स्वयं सोवे। पति जो आज्ञा दे, उसको बिना किसी हठ के पूरा करे। बुरी स्त्रियों से प्रेम तथा संगति न रखे। अपने मुख से कभी पति की निन्दा के शब्द न निकाले। एकान्तवास न करे। जहाँ अपने पति की प्रसन्नता तथा इच्छा देखे, वहाँ स्वयं भी अधिक प्रीति बढ़ावे तथा अपने पति को किसी समय भी न छोड़े। विपत्ति के समय में भी एक समान ही देखे। ऐसे नियम से चले, जिससे पति को अधिक परिश्रम न करना पड़े।
जो स्त्री अपने पति की इच्छा के बिना व्रत आदि करती है, वह अपने पति की आयु को कम करती है, तथा स्वयं नरक में जाती है। स्त्री को यही उचित है कि वह पति से ऊँचे स्थान पर न बैठे और पति के सम्मुख किसी पर-स्त्री से बात न करे। झूठ एवं दुर्वचन मुख से न निकाले। सदैव लड़ाई झगड़ों से दूर रहे। यदि किसी समय उसका पति मारपीट करे, तो स्त्री को क्रोध न करना चाहिए और न भागना चाहिए।
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! ब्राह्मण स्त्रियाँ गिरिजा को पुनः समझाते हुए बोलीं-हे गिरिजा! देखो अत्रि ब्राह्मण की स्त्री अनुसूया ने इस धर्म से कितना आनन्द प्राप्त किया तथा वाराह मुनि को अपने तेज से जलाकर दूसरे एक ब्राह्मण को जीवित किया। पातिव्रत धर्म की एक कथा मुनि इस प्रकार कहते हैं कि एक तपस्वी तप करते थे। एक बगुली ने उनके सिर पर विष्ठा कर दी। जब तपस्वी ने ऊपर दृष्टि उठाकर उसकी ओर देखा तो उसी समय बगुली जलकर भस्म हो गयी।
यह देखकर तपस्वी ने अनुमान लगाया कि हमारा तप अब पूर्ण हो गया है। इसी विचार से वे तप को छोड़, चलते-फिरते एक पतिव्रता स्त्री के द्वार पर आये। उस स्त्री ने तपस्वी की बड़ी सेवा की तथा द्वारा पर तपस्वी को ठहराकर, स्वयं घर पर दान के लिए वस्त्र लेने गयी। संयोगवश उसके पति ने घर में उससे किसी काम के लिए कहा। वह उसी कार्य में लग गयी तथा तपस्वी की बात भूल गयी। तब वह पति की सेवा कर चुकी तब दान लेकर द्वार पर आयी।
उसको देख तपस्वी ने क्रोधित होकर शाप देने की इच्छा की उस समय उस स्त्री ने तपस्वी को क्रोधित देखकर कहा-हे तपस्वी! मुझको किसी प्रकार का भय नहीं है। तुम इतना क्रोध क्यों करते हो? क्या मैं बगुली हूँ ? इतना सुनकर तपस्वी का अहंकार नष्ट हो गया। उसने उसकी बारम्बार प्रशंसा कर इस बात को समझा कि पातिव्रत धर्म सब धर्मों से बड़ा है। हे गिरिजे! तुम विश्वास रखो कि संसार में पति से बढ़कर अन्य कोई देवता नहीं है।
॥ शिव एवं पार्वती का कैलाश पर आगमन ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! मैना ने भी गिरिजा को इसी प्रकार बहुत सी बातें समझायीं। फिर उनको विदा करने की इच्छा की। वे गिरिजा के वियोग का दुःख स्मरण कर अत्यन्त दुखी हुईं। वे गिरिजा को बारम्बार अपनी भुजाओं में लिपटा लेती थीं। इसी प्रकार शिवजी की सेवा के लिए बार-बार कहती हुई रोने लगीं। वे बोलीं-हे पुत्री! दूसरे के फन्दे में पड़कर कुछ आनन्द नहीं मिलता। गिरिजा भी प्रेम से मैना के चरणों पर गिर पड़ीं तथा मूच्छित हो गयीं।
मैना ने उन्हें उठाकर अपनी छाती से लिपटा लिया। फिर गिरिजा की सखियाँ गिरिजा को मैना से अलग कर, ले चलीं। इसी प्रकार गिरिजा सबसे विदा होकर स्वंय रोती तथा दूसरों को रुलाती हुई चलीं। गिरिजा की बातों को सुनकर बड़े-बड़े धैर्यवान् भी अधीर हो उठते थे। यहाँ तक कि पशु-पक्षी भी रोने लगे। हिमाचल को भी बहुत दुःख हो रहा था। उस समय कोई भी ऐसा पंडित, ज्ञानी शेष न रहा, जिसको रोने-पीटने के अतिरिक्त कुछ ज्ञान रहा हो।
तब ब्राह्मणों ने हिमाचल तथा उनके मित्रों से कहा कि अब शीघ्रता करो, शुभ मुर्हत समाप्त हुआ जाता है। यह सुन हिमाचल ने निरुपाय होकर गिरिजा को पालकी पर सवार कर, स्त्री-धर्म की शिक्षा दी। मैना आदि अन्य समस्त स्त्रियाँ तथा पुरुष एक साथ गिरिजा को आशीष देने लगे। हिमाचल ने गिरिजा को वे दासियाँ भी दे दीं, जिन्हें गिरिजा विशेष रूप से चाहती थीं। जितने तोता, आदि मधुरवाणी के पक्षी थे, जिन्हें गिरिजा बहुत प्यार करती थीं, वे भी गिरिजा के साथ कर दिये। गिरिजा के चलने के समय मार्ग में शुभ-शकुन हुए। बाजे बजने लगे तथा चारों ओर प्रसन्नता की बातें दृष्टिगोचर होने लगीं।
हे नारद! गिरिजा के विदा के समय बहुत-सा धन-द्रव्य लुटाया गया। चलने के समय हिमाचल ने अपने पुत्रों सहित देवताओं से प्रार्थना की कि हम कुछ दूर तक आपके साथ चलेंगे। कुछ दूर तक जाने के पश्चात् देवताओं ने हिमाचल को विदा किया। हिमाचल भी वहाँ से यह कहकर कि मुझे तीनों लोको में बड़ाई प्राप्त हुई है, सब को प्रणाम कर विदा हुए। उन्होंने शिवजी से कहा कि आप मुझे कृपा करके अपनी भक्ति दीजिये। शिवजी ने प्रसन्न होकर हिमाचल की इच्छा पूरी की और उन्हें विदा किया।
हिमाचल के यहाँ जितने अतिथि आये थे, उन सबको भी हिमाचल ने आदर सहित विदा किया। उस समय विन्ध्यपर्वत ने हिमाचल से कहा-हे राजन्! तुम शिवजी से संबन्ध स्थापित करके, हम सब से श्रेष्ठ हुए।जब शिवजी बारात के साथ कैलाश पर्वत पर पहुँचे, तब वहाँ हर प्रकार के आनन्द की सामग्री एकत्र हुई। बाजे बजने लगे तथा शिवजी की आरती उतारी गयी। तदुपरान्त शिव-गिरिजा ने शुभ-लग्न में मन्दिर में प्रवेश किया।
॥ देवताओं का अपने अपने लोक को प्रस्थान ॥
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! शिव-गिरिजा के मन्दिर में प्रवेश करने के पश्चात् सब स्त्रियाँ एकत्र होकर उनकी आरती उतारने लगीं। विष्णु तथा हम सब ने दोनों का पूजन किया। उस समय हम सबको इस प्रकार आनन्द प्राप्त हुआ जिस प्रकार दरिद्री को धन, अन्धे को नेत्र तथा रोगी को अमृत प्राप्त होने से होता है।
हम सब ने उनकी अलग-अलग स्तुति की, जिससे शिवजी अत्यन्त प्रसन्न हुए। फिर वहाँ से विदा होने की आज्ञा माँगते हुए शिवजी से यह निवदेन किया-हे कैलाशपति! हम सबका जो मनोरथ है, उसे आप भली-भाँति जानते हैं, आप हम पर कृपा बनाये रहें और अब हमें जाने की आज्ञा दें।
हे नारद! इसके उपरान्त क्रमशः वहाँ से सब लोग विदा हुए। शिवजी ने विष्णु तथा मुझ से कहा-मुझे तुमसे अधिक प्रिय कोई नहीं है। तुम्हारे कहने से ही मैंने गिरिजा से विवाह किया। अब तुम भी अपने लोक को लौट जाओ। तुम्हारे सब कार्य सम्पन्न होंगे। तारक दैत्य शीघ्र ही यमलोक में जायेगा।
यह कहकर शिवजी हँसे और चुप हो गये। विष्णुजी तथा मैं भी हँसकर बड़ी प्रसन्नता से 'जय-जय श्रीशम्भु' कहते हुए, उनकी स्तुति करके वहाँ से चल दिये। सब बारात के चले जाने के पश्चात् शिव-गण उनकी सेवा करने लगे। शिवजी जगत्पिता तथा गिरिजा जगत्माता हैं। हम उनके श्रृंगार का किस प्रकार वर्णन करें ? संसार में शिव के समान और कौन सहायक है। उन्होंने परब्रह्म होकर भी संसार का दुःख दूर करने को विवाह किया, जिससे उनकी वह लीला कह-सुनकर संसारी जीव मोक्ष प्राप्त करे।
शिव-गिरिजा के विवाह की यह कथा अत्यन्त मंगल प्रदान करने वाली है। जो इसको न सुने, वह पशु के समान है। इस संसार में शिवजी के यशगान के अतिरिक्त मुक्ति प्राप्त करने की कोई सरल युक्ति नहीं है। यद्यपि उनका यश अपार है; जितना सुना जा सके, भलाई के लिए उतना ही बहुत है। जो इस कथा को प्रेमपूर्वक सुनेगा तथा दूसरों को सुनावेगा, वह शिवजी के समान हो जायगा तथा आनन्द प्राप्त करेगा।
जो कम से कम भी इस कथा का पाठ करेगा, वह भी धन्य होगा। चारों वर्ण के जो लोग इस कथा का पाठ करेंगे, उनके सब रोग दूर होंगे। सब कष्टों से छुटकारा मिलेगा तथा अन्त में मुक्ति प्राप्त करेंगे।
इति श्री शिवपुराणे श्री शिवविलासे तीर्थखण्डे ब्रह्मानारदसंवादे भाषायां शिवगिरिजाविवाहवर्णनाम् तृतीयोखण्ड समाप्तम् ॥ 3 ॥
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