"सत्यं परं धीमहि" सत्य-स्वरूप परमात्मा का मैं ध्यान करता हूं। सत्य स्वरूप भगवान नारायण ही सत्यनारायण हैं । सत्य धर्म की प्रतिष्ठा के लिए उन्होंने सत्यनारायण का अवतार धारण किया और सत्य की स्वीकृति स्थापित की। इस सम्बन्ध में भगवान् जो लीला की वह 'सत्यनारायण कथा' या 'सत्य व्रत कथा' के नाम से लोक में प्रचलित हो गए।

यह कथा श्रावण बहुत लोकप्रिय हैं और जनता जनार्दन में इसका प्रचार प्रसार भी सबसे अधिक हैं। भारतीय सनातन परंपरा में किसी भी मांगलिक कार्य की शुरुआत भगवान गणपति के पूजन से एवं उस कार्य की पूर्ण भगवान् सत्यनारायण के कथा श्रावण से समझी जाती है। कथा के माध्यम से इसमें मूल सत्य तत्व परमात्मा का ही प्रतिपादन हुआ है और सत्य के व्यवहार द्वारा नारायण की उपासना का मार्ग निर्धारित हुआ है।

अन्त:करण की निर्मलता और निश्चय भाव से भगवान की भक्ति का मार्ग परिपथ होता है। भगवान् को ऐसे ही भक्त विशेष प्रिय हैं। मनसि अन्यत्, वचसि अन्यत्, और कर्मणि अन्यत् यह छद्म कल्याण मार्ग का सर्वोपरि बाधक है , इसलिए सभी प्रकार से एक बने हुए विशुद्ध रूप से ही भगवान को प्राप्त करें और ऐसे ही गुरु नर को नारायण बना देता है ।

यही मूल बात इस 'सत्यनारायण कथा' से मुखरित होती हैं । सत्य की सर्वदा विजय होती हैं, असत्य की नहीं "सत्यमेव जयति नानृतम्" यह कथा का मूल संदेश हैं।

कथा में संक्षेप में यह बताया गया है कि अति निर्धन विप्र द्वारा सत्य का संकल्प करके उस प्रतिज्ञा का पालन करने से उसे भगवान की प्राप्ति हो गई है, यही स्थिति काष्ठ व्यापारी की भी हुई। इसके विपरीत सांकेत वणिक ने अपनी प्रतिज्ञा का पालन नहीं किया, छद्म व्यवहार किया, अंतर्यामी भगवान् से असत्य बोला; फलत: उनके और उनके परिवार की गंभीर दुर्गति हुई, फिर करुणामय भगवान् की शरण ग्रहण की तो उनका सर्वविध अभ्युदय हो गए। उन्हें वैकुण्ठ की प्राप्ति हुई। इन दृष्टान्तों द्वारा हमें के सत मार्ग के संगति की प्रेरणा प्राप्त होती हैं। 

इन सभी कारणों से सत्य या सत्यनारायण की महिमापरक यह व्रत - कथा बहुत ही लोकप्रिय है।

इसके साथ ही शंका का समाधान भी इस पर कई होते रहते हैं कि भिक्षु वाणिक, काष्ठ व्यापारी, शतानन्द ब्राह्मण, उल्कामुख, तुंगध्वज, आदि ने कौन कथाएं सुनी थीं और वे कथाएं कहा से तथा इस कथा का प्रचार कबसे हुआ ?

वास्तव में यह मूलरूप में भगवान् सत्यनारायण के व्रत एवं पूजन का ही विधान है। भगवान की लीला कथा अनन्त हैं और उनका श्रावण सनातन ही हैं। यह कथा व्रत, पूजन, महिमापरक होती है, जो सर्वप्रथम काशी में सुनी गई, यह बात मूल कथा से प्रतिबिंबित है "कश्चित् काशीपुरे रम्ये ह्यासीद् विप्रो अति निर्धनः" व्रत एवं पूजन की पूर्णता के लिए भगवान की कथा का भी श्रवण करना चाहता हूं। पूर्व में ब्राह्मण और साधु वणिक ने भी व्रत,पूजन के साथ भगवान की लीला, कथा का श्रवण किया था। वस्तुतः भगवान की लीला,कथा सच्चिदानन्द संदर्भ ही हैं ।
विशेष रूप से इस संबंध में यही सबसे खास कारण है कि कथा के माध्यम से मूल सत् - तत्व परमात्मा का ही इसमें निरूपण हुआ है, जिसके लिए भगवत गीता में "नासतो विद्यते भावों ना भावों विद्यते सतः ।


॥ श्रीं गणेशाय नमः ॥

प्रथमो अध्याय

एक समय प्राणियों के हित चाहने वाले समस्त मुनियों में परम रमणीक नैमिषारण्य क्षेत्र में मन को प्रसन्न करने वाली सभा की उसी समय अति तेजस्वी व्यास जी के शिष्य सूत जी शिष्य गणों के सहित हरि नाम स्मरण करते हुए वहाँ आये॥

समस्त शास्त्रों को जानने वाले श्री सूतजी को देख महा तेजस्वी शौनकादि मुनिगन खड़ा हो गये, सब धर्मों को जानने वालों में श्रेष्ठ सूत जी तथा परम वैष्णव शौनकादि ऋषि परस्पर शीघ्रता से पृथ्वी पर दंडवत नमस्कार करके शौनकादि मुनियों के दिये गए आसन पर संपूर्ण शिष्यों सहित अति बुद्धिमान सूतजी बैठ गये ॥

बैठे हुए सूत जी से शैनिकादि मुनियों ने नमस्कार कर हाथ जोड़कर कहा हे महर्षे ! हे सर्वज्ञ सूतजी ! इस कलिकल में मनुष्य को हरीभक्ति किस उपाय से हो ? हे भगवान ! वह कहिये, क्योंकि कलिकल में सब प्राणी पाप करने में तत्पर और वेदविहीन हो जायेंगे॥

उसका कल्याण किस प्रकार होगा इस कलयुग में मनुष्य प्राणों को धारण किये, थोड़ी आयुवाले , निर्धन और अनेक पीड़ा से युक्त होंगे प्रायः पुण्य अति परिश्रम से होता है। इससे कलियुग में कोई मनुष्य पुण्य न करेगा और पुण्य के नष्ट होने से सब पापों में प्रवृत्त हो जायेंगे ॥

तब तुच्छ ज्ञानवाले मनुष्य अपना सब वशं सहित नष्ट हो जायेंगे हे सूतजी ! किस तरह अल्प परिश्रम से थोड़े धन और कुछ ही समय में पुण्य प्राप्त हो ऐसा कोई उपाय हम लोगों से वर्णन कीजिये जिसके उपदेश से मनुष्य पुण्य पाप करता है वह उसका भागी होता है पुण्य का उपदेश करनेवाला, दयावान, कपट रहित, निष्पाप और निर्विरोधी यह चार तरह का मनुष्य नारायण के समान हैं ॥

संसार में ज्ञानी होकर जो दूसरों को ज्ञान नहीं देता उस पर ज्ञान रूपी परमेश्वर प्रसन्न नहीं होते जो पुरुष रत्नरूपी ज्ञान से दूसरों को संतोष देते हैं, उन्हें मनुष्य के रूप धारण किये नारायण ही जाने हे महामते ! ऐसा कौन व्रत है, जिसके करने से मनोवांछित फल प्राप्त हो, वह हम लोगों को सुनने की इच्छा रखते हैं हे मुनि श्रेष्ठ ! आप वेद, वेदांत के ज्ञाता हैं, आप जैसा दूसरा कोई वक्ता नहीं दीखता क्योंकि श्रीवेदव्यासजी के आप शिष्य हैं ॥

सूतजी बोले - हे मुनिश्रेष्ठ ! तुम धन्य हो, तुम वैष्णवों में अग्रगण्य हो । कारण कि सब प्राणियों का तुम सदैव हित चाहते हो॥ 

हे शौनक ! सुनो , मैं आपसे उस उत्तम व्रत को कहूँगा, जिस व्रत को नारद जी ने लक्ष्मीपति भगवान् से पूछा था और जिस प्रकार भगवान् ने नारदजी से कहा, हे ऋषिगण! उसे सावधान होकर सुनो ॥

ॐ इति श्री स्कंदपुराने रेवाखण्डे श्री सत्यनारायण व्रत कथायां प्रथमो अध्याय ॥ 1 ॥

अथ द्वितीय अध्याय

एक समय नारदजी समस्त प्राणियों के हित की इच्छा से अनेक लोकों मे घूमते हुए मित्युलोक में आये यहाँ उन्होंने देखा कि सभी प्राणी अनेक पीड़ाओं से युक्त और अनेक योनियों में उत्पन्न होकर पाप कर्म से दुःख पा रहे हैं॥ यह देखकर यह विचार किया कि इन लोगों का दुःख किस प्रकार दूर हो ऐसा मन में विचार कर विष्णु लोक में चला गया॥ 

वहां जिनके शुक्लवर्ण, चार भुजाएँ हैं, जो शंख, चक्र को धारण किया हैं और वनमाला से सुशोभित देवेश नारायण हैं उन्हें देखकर स्तुति करने लगे॥ नारद जी बोले कि महाराज ! आप वचन और मन से न कहने, न धारण करने के योग्य अनन्त शक्ति युक्त और निर्गुणात्मक हैं॥ 

हे महाराज! आप सब प्राणियों के उत्पन्न कर्त्ता और भक्तों के दुःख के नाशक हैं। यह स्तुति सुनकर विष्णु भगवान् बोले ॥ हे नारद ! तुम किस काम से आये ? तुम्हारे मन में क्या है हमसे जो पूछोगे वह हम कहेंगे ॥ 

नारद जी बोले - हे नाथ ! मृत्यु लोक के सब प्राणी अनेक योनियों में उत्पन्न होकर निज पाप कर्म से क्लेशित हो रहे है, हे भगवन्! जिस छोटे उपाय से उनका क्लेश दूर हो, वह उपाय मैं सुनना चाहता हूं॥ 

भगवान बोले - समस्त जनों पर कृपा कर तुमने बहुत अच्छा प्रश्न पुछा हैं, जिसके करने से मनुष्य मोह से छूट जाय, मैं ऐसा उपाय कहता हूँ सुनो, हे नारद ! जो व्रत तीनों लोकों में अति दुर्लभ है वह आज आपके कहने से प्रकाशित कर रहा हूँ॥ 

वह सत्यनारायण का व्रत है जिसको विधिपूर्वक करने से इस लोक में सुख और परलोक में मोक्ष मिलता है॥ यह सुनकर नारद जी बोले - इस व्रत का क्या फल है और पूर्व में किसने किया था ? किस समय यह व्रत करना चाहिये, आप विस्तारपूर्वक कहिये॥ 

भगवान ने कहा कि इसके करने से दुःख-शोकादि नाश , धन-धान्य का वृद्धि और सन्तति की प्राप्ति तथा सर्वत्र विजय की प्राप्ति होती है इस व्रत में मनुष्य भक्ति-श्रद्धायुक्त किसी भी दिन सायंकाल में सत्यनारायण की पूजा करें॥ और भाई बन्धु तथा ब्राह्मणों के साथ धर्मयुक्त सवासेर उत्तम नैवेद्य भोग लगावें ॥ 

केले का फल, घी, दूध, और गेहूँ का चूर्ण लावें। गेहूं का चूर्ण न हो तो चावल का चूर्ण, खाँड़ या गुड़ मिलावें, सवा पाव अथवा सावा सेर के हिसाब से मिलाकर भक्ति से सत्यनारायण को नैवेद्य लगावें, बान्धवों के साथ कथा सुनकर ब्राह्मणों को दक्षिणा दें श्री सत्यनारायण के प्रसाद को अपने भाई- बन्धुओं के साथ खाकर रात्रि में नृत्य-गीतादि करें॥ तदन्तर सब श्रोतागण सत्यनारायण का स्मरण करते हुए अपने अपने घर जायें, इस प्रकार व्रत करने से मनोवांछित फल मिलते हैं॥

विषेश कर इस कलिकाल में पृथ्वी पर इससे बढ़कर दूसरा कोई उपाय नहीं है, हे नारद ! जिन्होंने इस व्रत को पहले किया वह कथा सुनो, काशीपुरी में निर्धन शतानन्द नामक एक ब्राह्मण क्षोधा-पिपासा से दुःखित नित्य पृथ्वी पर भिक्षा माँगने हेतु घूमता था, ब्राह्मण-प्रेमी भगवान् नारायण ने दुःखित ब्राह्मण को देखकर बूढ़े ब्राह्मण का रूप धारण कर अति आदर से पूछा॥ 

हे विप्र ! किस कारण पृथ्वी पर आप नित्य घूमा करते हैं, यह हमारी सुनने की इच्छा है, यदि आपकी इच्छा हो तो कहिये, ब्राह्मण बोला - मैं अत्यन्त दरिद्र हूँ, भिक्षा के लिए पृथ्वी पर भ्रमण करता हूँ, यदि आप कुछ जानते हों, तो कृपा कर पूर्ण रूप से कहिये॥ 

वृद्धि ब्राह्मण बोले - हे द्विजश्रेष्ठ ! मनोरथ को सिद्ध करने वाला उत्तमोत्तम श्रीं सत्यनारायण का व्रत करो॥ जिसके करने से मनुष्य को सब दुःख से छूट जाते हैं। वृद्ध ब्राह्मण रूपी श्री सत्यनारायण देव ने व्रत का विधान ब्राह्मण को बताकर अपने अन्तर्धान हो गये, तदन्तर ब्राह्मण शतानन्द ने मन में निश्चय किया कि मैं कल ही श्रीसत्यनारायण का व्रत करूँगा॥ 

इसी चिन्ता में ब्राह्मण को रात भर नींद नहीं आयी, सुबह उठकर उसने यह निश्चय किया कि मैं श्रीसत्यनारायण का व्रत अवश्य करूँगा, यह संकल्प कर भिक्षा मांगने को गया तो उस दिन उसको सब दिनों से अधिक द्रव्य मिला, द्रव्य से उसने अपने भाइयों के साथ श्रीसत्यनारायण का व्रत किया, उसके प्रभाव से दुःखों से छूट कर सर्व-सम्पत्ति से युक्त हो गया, व्रत के प्रभाव से शतानन्द नगर से श्रेष्ठ माना जाने लगा और तभी से वह ब्राह्मण हर महीने व्रत करने लगा॥ 

भगवान ने कहा - शतानन्द द्वारा किया हुआ श्रीसत्यनारायण का यह पूजन है, इसे जान कर जो मनुष्य व्रत करता है वह सब पापों से छूट कर मोझ को पा जाता है जिस प्रकार पृथ्वी में इस व्रत को मनुष्य करेंगे उनका दुःख अवश्य ही नष्ट हो जाएगा॥ 

ॐ इति श्री स्कन्दपुराने रेवाखण्डे श्री सत्यनारायण व्रत कथायां द्वितीय अ्ध्याय ॥ २ ॥

अथ तृतीय अध्याय

सुत जी बोले - हे शौनक ! विष्णु भगवान् ने जिस तरह कहा था, वह तुमसे मैंने कहा और दूसरी बात जो हो वह पूछो! शौनक जी बोले - हे सूतजी ! उस ब्राह्मण के बाद इस व्रत को किसने किया ? वह सुनने की इच्छा हैं ॥ 

सुतजी बोले - हे मुनियों ! जिसने व्रत को किया वह सुनिये, एक समय निज धर्मानुसार जिन बान्धवों के साथ व्रत को करने को उद्यत हुआ उसी समय एक लकड़हारा वहाँ आया भुख - प्यास से पीड़ित काष्ठ के भार को बाहर रख ब्राह्मण के घर में जाकर उसने व्रत करते हुए ब्राह्मण को देखा नम्रता से हाथ जोड़कर प्रणाम कर बोला आप क्या कर रहे हैं ? इसके करने से क्या फल होता हैं ? वह विस्तारपूर्वक कहिये॥ 

ब्राह्मण बोला मनोरथों को देनेवाला, दुःख और शोक को नाश करने वाला तथा सिद्धि को देनेवाला यह श्रीसत्यनारायण का व्रत हैं, जिसके प्रसाद से यह - धान्यादि प्राप्त हुआ है, यह सुनकर लकड़हारा प्रसन्न हो प्रसाद को खाकर और जल पीकर वह भगवान् सत्यनारायण का ध्यान करता हुआ अपने नगर को चला गया ॥ 

आज लकड़ी बेचने से जो द्रव्य प्राप्त होगा उसी से मैं सत्यदेव के उत्तर व्रत को अवश्य करूँगा ऐसा मन में विचार कर उसने लकड़ी को सिर पर रख जहाँ धनी लोग रहते थे उस नगर में गया उस दिन लकड़हारे को दूना द्रव्य प्राप्त हुआ॥

वह अत्यन्त प्रसन्न हो सुन्दर केले के फल, शक्कर,दूध, घी, गेहूं का चूर्ण सबको सवाई लेकर, घर में आकर अपने भाई बन्धुओं को बुला कर विधि से सत्यनारायण का व्रत किया, उस व्रत के प्रभाव से लकड़हारा धन पुत्र से युक्त हो गया॥ 

इस लोक में सुख पाकर अन्त में सत्य लोक को चला गया , हे मुनीगन ! मैं और कथा कहता हूं उसको सुनिये ॥

ॐ इति श्री स्कन्दपुराने रेवाखण्डे श्री सत्यनारायण व्रत कथायां तृतीयो अ्ध्याय ॥ ३ ॥
 
अथ चतुर्थो अध्याय

सुतजी ने कहा - राजाओं में श्रेष्ठ उल्कामुख नामक एक जितेन्द्रिय राजा था, वह सदैव देव मन्दिर जाया करता था वह ब्राह्मणों को नित्य धन देकर संतुष्ट किया करता था, उसकी कमल के सुदृश मुखवाली प्रमुग्धा पत्नी थी वह अपनी स्त्री के साथ भद्रशीला नदी के तट पर सत्यदेव का व्रत करता था , उसी समय वहां एक बनिया आया॥ 

वाणिज्य के लिए बहुत धन से परिपूर्ण नाव को नदी के तीर पर लगाकर आपने तट पर उतर गया वह राजा को व्रत करता हुआ देख नम्रता से पूछले लगा साधु बोला - हे राजन! आप यह क्या करतें हैं वह हमसे भक्ति ‌‌‌‌‌‌पूर्वक कहिये, सूनने की इच्छा हैं ॥

राजा बोला- हे साधो! यह अति तेजस्वी विष्णु भगवान् का पूजन है, जो अपने बान्धवों के साथ पुत्रादी प्राप्ति की इच्छा से किया जाता है तब बनिया नमस्कार कर बोला, हे राजन! इस व्रत को मुझसे कहिये, यह मैं भी करूंगा कारण कि मेरे भी सन्तान नहीं हैं , इस व्रत से अवश्य होगी, वह व्रत की विधि जान कर अपने घर में आकर उसने अपनी स्त्री से यह सन्तानप्रद व्रत कहा और यह संकल्प किया कि जब मेरे घर सन्तान होगी तब मैं अवश्य सतनारायण का व्रत करूंगा॥ 

थोड़े ही समय में उसकी स्त्री लीलावती आनन्द चित्त से गर्भवती हो गयी उसने दसवें मास में अति निर्मल एक कन्या को उत्पन्न किया, जैसे शुक्ल पक्ष में चंद्रमा की ज्योति बढ़ती है, उसी तरह प्रतिदिन कन्या वृद्धि को प्राप्त हुई अपनी स्त्री के साथ बनिये ने कन्या का जातकर्म कर कलावती नाम रखा॥ 

एक दिन लीलावती अपने स्वामी से मधुर वचन बोली कि पहले का संकल्पित व्रत आप क्यों नहीं करते ? साधु बोला हे प्रिय ! इसके विवाह के समय में इस व्रत को मैं  अवश्य करूंगा इसी प्रकार स्त्री को समझा कर वह बाहर चला गया, इधर कलावती पिता के घर नित्य बढ़ने लगी ॥ 

एक दिन धर्मज्ञ साधु बनिया ने सखियों के साथ खेलती हुई लड़की को विवाह के योग्य देख दूतों को बुलाकर कहा विवाह के निमित्त कन्या के लिए योग्य वर खोज कर ले आओ, साधु की आज्ञा पाकर दूत कांचन नगर में गये उस नगर से एक वणिक्पुत्र को लेकर साधु के पास आये, उसने सुन्दर गुणयुक्त लड़के को देखा ॥ 

जाति भाइयों के साथ प्रसन्न चित्त हो विधानपूर्वक अपनी कन्या का उस वणिक्पुत्र के साथ विवाह कर दिया अभाग्यवश विवाह के समय भी उस व्रत को साधु भूल गया, तब सत्यनारायण देव क्रोधित हो गये कुछ दिन बाद निजकर्म में अति चतुर साहूकार व्यापार की इच्छा से अपने दामाद को लेकर ॥ 

समुद्र के निकट रत्नसार नामक नगर में जाकर व्यापार करने लगा इसी समय सत्यनारायण स्वामी ने राजा को प्रतिज्ञा से भ्रष्ट देखकर उसके शाप दिया कि तेरे ऊपर बड़ा भारी दुःख पड़ेगा॥ 

उसी दिन चोरों ने राजा के धन को चुरा अपने पीछे देखते हुए साधु की दिशा को चले दौड़ते हुए राजा के दूतों को आता देख डर कर धन को यहाँ ही रख कर वो छिप गये ॥ राजा के दूतों ने साधु के निकट आकर राजा के धन को देखा तो साधु को बांध कर ॥ 

आनन्दचित्त हो राजा के निकट ले जाकर बोले कि हे राजन्! दो चोर लाये हैं इनको देख कर आज्ञा दीजिए ॥ राजा साधु को देख कर अविचार से आज्ञा दे दिया, फिर तो दूतों ने उन्हें खूब बाँध कर बन्दी खाने में बन्द कर दिया ॥

ॐ इति श्री स्कन्दपुराने रेवाखण्डे श्री सत्यनारायण व्रत कथायां चतुर्थो अ्ध्याय ॥ ४ ॥

 अथ पंञ्चमो अध्याय

सुतजी बोले - सत्यदेव की माया से चन्द्रकेतु राजा ने उन दोनों बनियों के वचन को कुछ भी न सुना और उनका सब धन ले लिया श्रीसत्यनारायण के शाप से साधु और दामाद के घर पर स्त्रियां भी बड़ी दुःखित हो गयीं, चोरों ने घर का धन भी चुरा लिया आधि व्याधि से पीड़ित और भूख प्यासी लीलावती अन्न की चिन्ता से घर घर घूमने लगी और कलावती कन्या भी नित्य ही घूमने लगी, एक दिन रात को भूख से दुःखी कलावती एक ब्राह्मण के घर पर गयी ॥ 

वहां सत्यनारायण के व्रत को देख कथा को सुन निज मनोरथ को माँगी और प्रसाद को खाकर कुछ रात गये अपने घर आई, तब लीलावती अपनी कन्या को धिक्कारने लगी ॥ हे पुत्री! इतनी रात तक तुम कहाँ रही ? तेरे मन में क्या है ? तब कन्या माता से सत्य वचन बोली ॥ 

हे माता ! मनोरथों को परिपूर्ण करनेवाला श्री सत्यनारायण के व्रत को ब्राह्मण के घर मैं देखी हूं, लीलावती कन्या कलावती का वचन सुनकर श्री सत्यनारायण के व्रत करने के लिए उद्यत हुई, पतिव्रता साधु की स्त्री अपने कन्या सहित बन्धु बान्धवों के साथ सनारायण के व्रत को किया ॥ 

उसने सत्यदेव से यह दिव्य वर  मांगा कि हे सत्यदेव ! हमारे पति और दामाद जल्दी अपने घर आवें मेरे पति और दामाद के अपराध को आप क्षमा करने योग्य हैं, अतः क्षमा कीजिये, इससे सत्यनारायण स्वामी सन्तुष्ट हो गये और चन्द्रकेतु राजा को स्वप्न दिखाया कि हे राजन्, कल सबेरे ही सज्जन बनियो को छोड़ देना ॥ 

और उनका धन भी जो तुमने लिया है वह दे देना, नहीं तो हम धन पुत्र के सहित तेरा राज्य नष्ट कर देंगे यह बात राजा से कह कर सत्यनारायण प्रभु अन्तर्ध्यान हो गए, तब प्रातः काल के समय राजा निज जनों के साथ सभा में उपस्थित हो मन्त्री जनों से यह अपना स्वप्न सुनाकर कहा बांधे हुए बनियों को शीघ्र छोड़ दो ॥ 

ऐसा आदेश दिया, यह सुनकर दूत लोग बनियों को बन्दीखाने से छुड़ाकर राजा के निकट लाये और विनययुक्त वचन बोले हे महाराज ! हम इन दोनों बनियों को बन्धन से छुड़ा कर लाये हैं, अब आपकी क्या आज्ञा है ? उन दोनों ने महाराज चन्द्रकेतु को नमस्कार कर पूर्व वृत्तान्त का स्मरण करते हुए राजा चन्द्रकेतु से साधु तथा दमाद ने कुछ नहीं कहा, वणिक् पुत्रों को देख कर राजा आदर से बोले ॥ 

अभाग्यवश तुमको बड़ा दुःख मिला, अब आप लोग भय न करना, इस प्रकार राजा ने कह कर उन दोनों के हाथ - पैर की हथकड़ी - बेड़ी कटवाकर क्षौर कर्म कराया फिर वस्त्र और आभूषणदि देकर बनिया को अत्यन्त सन्तुष्ट किया ॥ 

पहले जितना धन लिया था, उसका दूना धन देकर कहा, अब आप अपने घर जाएं दोनों बनियों ने राजा को नमस्कार कर कहा कि आपकी कृपा से घर जाते हैं॥

ॐ इति श्री स्कन्दपुराने रेवाखण्डे श्री सत्यनारायण व्रत कथायां पंञ्चमो अ्ध्याय॥ ५ ॥

अथ षष्ठो अध्यायः

सूत जी बोले - साधु, भगवान् का मंगलाचारपूर्वक पूजा कर ब्राह्मणों को धन देकर निज नगर को चला कुछ दूर जाने पर श्रीसत्यनारायण देव ने वैश्य के मन की बात जानने के लिए पूछा कि तुम्हारी नाव में क्या है ? मदोन्मत्त महाजन बनियाँ हँस कर बोला दण्डिन् ! यह क्यों पूछते हो ? क्या धन लेने की इच्छा है ? मेरी नाव में लता पत्रादिक हैं, तब दण्डी ऐसे वजनों को सुनकर बोले कि तेरा वचन सत्य हो ॥ 

ऐसा कह कर आप समुद्र के पास बैठ गये दण्डी के चले जाने पर नित्य क्रिया कर नाव को ऊपर उठा देख साधु को आश्चर्य हुआ, ज्यों ही उसने नाव में लतादिक देखा त्योंहि मूर्च्छा को प्राप्त हो भूमि पर गिर गया और सचेत होने पर अति चिन्ता करने लगा साधु से दामाद बोला कि व्यर्थ शोक क्यों करते हो वे ही दण्डी महाराज ने श्राप दिया है ॥ 

वे सब कुछ कर सकते हैं इसमें संशय नहीं, इसीलिए उन्हीं की शरण में चलें, क्योंकि मनोरथ उन्हीं से सिद्ध होगा साधु दामाद के वचन सुनकर दण्डी के पास गया और दण्डी को प्रणाम कर भक्ति से देखकर आदर युक्त वचन बोला जो मैंने आपसे कहा था उस अपराध को क्षमा कीजिये, यह कह कर बारम्बार नमस्कार कर शोकाकुल हो गया ॥ 

तब दण्डी उसको रोते हुए देखकर बोले - रोओ मत, मेरे वचन को सुन, तू मेरी पूजा से सदा मुँह फेरे रहता है और मेरी इच्छा से, हे दुर्बुद्धे ! तुझे बारम्बार दुख मिला, भगवान् का यह वचन सुन कर साधु स्तुति करने लगा साधु बोला कि स्वामिन् ! आपकी माया से मोहित ब्रह्मादि देवता भी आपके बड़े अद्भुत गुण और रूप को नहीं जानते ॥ 

आपकी माया से मोहित मैं मूढ़ आपको कैसे जान सकता हूँ, अतः हमारे ऊपर प्रसन्न हो जाइये, मैं यथा विभव विस्तार से आपका पूजन करूंगा मैं आपके शरणागत हूं, मुझे पहिले वाला सब धन दीजिये, उसके भक्ति युक्त वचन सुन भगवान् सन्तुष्ट हो गये ॥ 

और मनोवाञ्छित वर देकर वहीं अन्तर्ध्यान हो गये साधु नाव को धन से परिपूर्ण देख उस पर चढ़ गया सत्यदेव की कृपा से मनोरथ पूर्ण हुआ, यह बात अपने स्वजनों से कह, यथा विधि पूजन कर ॥ सत्यदेव जी कृपा से बड़ा हर्षित हुआ, नाव को यत्न से सहेज कर अपने देश को चल दिया ॥ 

अपने नगर के समीप साधु आकर दमाद से कहने लगा कि वह मेरी रत्नपुरी देखें, ऐसा कह कर उसने धन की रक्षा करने वाले दूत को वहां भेजा वह दूत नगर में जाकर साधु की धर्मपत्नी को देख प्रणाम कर बोला कि ग्राम के निकट दामाद सहित साहूकार बहुत से इष्ट मित्रों और धन के साथ आ गये हैं ॥ 

दूत के मुख से ऐसे वचन सुन कर साधु की स्त्री बड़ी हर्षित हो सत्यदेव का पूजन कर कन्या से कहने लगी कि मैं जाती हूं तुम भी शीघ्र व्रत समाप्त कर आओ, लड़की इस प्रकार का वचन सुन कर जल्दी व्रत समाप्त कर प्रसाद को भूल से न खाकर अपने पति को देखने चली गयी, इससे सत्यदेव ने क्रोधित होकर उसके पति को नाव सहित जल में डुबो दिया, कलावती कन्या अपने पति को ना देख कर बड़े शौक से रोती हुई भूमि पर गिर पड़ी, साधु ने कन्या को अति दुःखित देखकर, डरे हुए मन से कहा, यह क्या हुआ ? और नाव चलाने वाले भी चिन्ता करने लगे ॥ 

तब लीलावती कन्या को दुःखी देख अति विह्वल होकर रोने और अपने पति से कहने लगी इसी क्षण नाव के साथ वे कैसे अलक्षित हो गये ? ना जाने किस देवता के अनादर से नौका जल में नहीं दीख रही है, श्री सत्यदेव के माहात्म्य को कौन जान सकता है, यह कहकर वह अपने जनों के साथ विलाप करती हुई कन्या को गोद में लेकर रोने लगी और कलावती भी स्वामी को न देखने से अति दुःखित हो ॥ 

पति की पादुका लेकर सती होने की इच्छा करने लगी, कन्या का यह चरित्र देख कर धर्मज्ञ साधु बनिया स्त्री के साथ अत्यन्त शोक से युक्त होकर विचार करने लगा कि मैं सत्यदेव की माया से बारम्बार छला गया हूं ॥ 

अब यथाविभव श्रीसत्यनारायण का पूजन करूंगा, इस प्रकार सबको बुला कर कहने लगा और पृथ्वी पर गिर कर सष्टांग दण्डवत् किया, इसी पर दिनों के पालन करने वाले सत्यनारायण भगवान् सन्तुष्ट हो गये, भक्तवत्सल सत्यदेव जी की कृपा से आकाशवाणी हुई कि तुम्हारी कन्या प्रसाद को त्याग कर पति को देखने चली आई इसी कारण इसका पति अदृश्य हो गया हैं, यदि वह पुनः घर जाकर प्रसाद भक्षण कर आयेगी तब पति को निःसंदेह पायेगीं, कन्या ने यह आकाशवाणी सुनकर ॥ 

शीघ्र ही घर जाकर प्रसाद को भक्षण कर अपने पति को देखा तब कलावती सन्तुष्ट होकर अपने पिता से कहने लगे कि अब शीघ्र ही घर चलिये विलम्ब ना कीरिये कन्या के वचन सुनकर साधु दामाद सहित सन्तुष्ट होकर धन और बन्धुओं के साथ अपने घर को गया उस दिन से वह हर महीने और संक्रान्ति पर विधि पूर्वक सत्यदेव की पूजा करने लगा, इस तरह सुख प्राप्त कर वह अन्त में सत्यदेव के लोक को चला गया फिर,सूतजी कहने लगे कि हे मुनि श्रेष्ठ ! मैं आपसे और भी कथा कहता हूँ ॥

ॐ इति श्री स्कन्दपुराने रेवाखण्डे श्री सत्यनारायण व्रत कथायां षष्ठो अ्ध्याय ॥ ६ ॥

अथ सप्तमो अध्याय

सूतजी बोले - प्रजा पालन में तत्पर एक तुङ्गध्वज नामक राजा था, जिसने सत्यदेव के प्रसाद को त्यागने से अति दुःख पाया एक दिन उसने वन में जाकर मृगादि अनेक पशुओं को मारा और पीछे आकर वट वृक्ष के नीचे श्री सत्यदेव भगवान् का पूजन देखा ॥ 

जिसको गोप लोग बन्धु बान्धवयुक्त सन्तुष्ट चित्त से करते थे, अहंकार में राजा वहां गया, ना सत्य देव को प्रणाम किया जब वे गोप राजा को प्रसाद देने लगे तो राजा ने प्रसाद नहीं लिया, तब वे गोप वहां प्रसाद को रखकर चले आये, राजा ने प्रसाद का अनादर किया ॥ 

इस तरह प्रसाद का अनादर करने से उसने अति दुःख पाया, उस राजा के एक सौ पुत्र थे, वे मर गये और धन धान्य भी नष्ट हो गये तब राजा ने अपने मन में विचार किया कि सत्यदेव ने ही धन नष्ट कर दिये है, इसीलिए मैं वहीं जाऊँ जहाँ पूजन हो रहा था ॥ 

यह विचारा और वहाँ जाकर अहीरों के साथ भक्ति श्रद्धा युक्त होकर विधि से उसने सत्य देव का पूजन किया, तब सत्यदेव के प्रसाद से धन पुत्रदि युक्त हुआ और इस लोक में सुख पाकर अन्त में सत्य लोक को गया, जो प्राणी अति दुर्लभ इस सत्यदेव के व्रत को करता है और भक्ति युक्त होकर पवित्र फल देने वाली कथा को सुनता है उसको सत्यदेव के प्रसाद से धन धन्यादिक प्राप्त होते हैं ॥ 

दरिद्र धन पावे, कैदी झूठ जावे, भयार्त भय से जुटे, इसमें कोई संशय नहीं है इस पुनीत व्रत को करने से प्राणी सदा सुख पाकर अन्त में सत्यदेव के लोक में जाता है 

सुत जी कहते हैं - विप्रो ! मैंने सत्यनारायण प्रभु के व्रत को आप लोगों से कहा जिसके करने से मनुष्य सब दुःखों से छूट जाता है, विशेष कर सत्य देव की पूजा कलि काल में फल देने वाली है, उन्हीं को कोई काल, कोई सत्य, कोई परमेश्वर, कोई सत्यनारायण, और कोई सत्यदेव कहेंगे ॥ 

सत्यरुपी विष्णु सनातन कलियुग में अनेक रूप धारण कर सबको वाञ्छित फल देने वाले होंगे, हे मुनिश्रेष्ठ ! जो प्राणी इसको पढ़ता या सुनता है , उसके सम्पूर्ण पाप सत्यदेव के प्रसाद से नष्ट हो जाते हैं , इसमें कुछ भी सांशय नहीं है ॥

ॐ इति श्री स्कन्दपुराने रेवाखण्डे श्री सत्यनारायण व्रत कथायां सप्तमो अ्ध्याय॥ ७ ॥

श्री सत्यनारायण जी की आरती

आरती कीजै सत्यनारायण स्वामी जी के,हरिहर भक्ति करहूं संतन सुख दीजै जी 
पहली आरती पुष्प की माला , पुष्प की माला ।
कालीनाग नाथ लाये कृष्ण गोपाल   जी ॥
 आरती कीजै राजा रामचन्द्र की , हरिहर भक्ति करहूं संतन सुख दीजै जी 
दुसरी आरति देवकी नन्दन , देवकी नन्दन ।
फक्त उबारय असुर निकन्दन  जी  ॥
आरती कीजै राजा रामचन्द्र की , हरिहर भक्ति करहूं संतन सुख दीजै जी 
तीसरी आरति त्रिभुवन मोहै , त्रिभुवन मोहै ।
गरुड़ सिंहासन राजा राम चन्द्र शोभै जी ॥
 आरती कीजै राजा रामचन्द्र की , हरिहर भक्ति करहूं संतन सुख दीजै जी 
चौथी आरती चहुं युग पूजा , चहु युग पूजा ।
राम   नाम   औरो    न    दूजा    जी       ॥
 आरती कीजै राजा रामचन्द्र की , हरिहर भक्ति करहूं संतन सुख दीजै जी 
पञ्च आरति राम जी के भावै  ,  रामजी के भावै ।
राम नाम   गाई   परम पद पावै‌    जी      ॥
आरती कीजै राजा रामचन्द्र की , हरिहर भक्ति करहूं संतन सुख दीजै जी 
षष्ठही  आरति लछुमन भ्राता , लछुमन भ्रता ।
आरति  उतारे   कौशल्या  माता  जी      ॥
 आरती कीजै राजा रामचन्द्र की , हरिहर भक्ति करहूं संतन सुख दीजै जी 
सप्तम  आरति  कीजै  ऐसो  , कीजै  ऐसो  ।
ध्रुव   प्रह्लाद  विभीषण   जैसो    जी        ॥
 आरती कीजै राजा रामचन्द्र की , हरिहर भक्ति करहूं संतन सुख दीजै जी 
अष्टम आरति लंका सिधारे  , लंका  सिधारे  ।
रावण      मारी    विभिषण    जैसो     जी ॥
आरती कीजै राजा रामचन्द्र की , हरिहर भक्ति करहूं संतन सुख दीजै जी 
नवम  आरति   बावन देवा   ,  बावन  देवा  ।
बली   के   द्वार  करब   हरि     सेवा      जी ॥
 आरती कीजै राजा रामचन्द्र की , हरिहर भक्ति करहूं संतन सुख दीजै जी 
कञ्चल थाल कपूर की बाती , कपूर की बाती ।
जगमग ज्योत जरै  सारी    राति          जी    ॥
आरती कीजै राजा रामचन्द्र की , हरिहर भक्ति करहूं संतन सुख दीजै जी 
जो राजा राम जी की आरती गावै , आरती गावै ।
बसी      बैकुण्ठ    अमर  पद   पांवै       जी   ॥
आरती कीजै राजा रामचन्द्र की , हरिहर भक्ति करहूं संतन सुख दीजै जी 
सत्य देव प्रभु की यह आरती , 
सत्य देव प्रभु की यह आरति ।
सब मिले प्रेम से गावै जी॥
आरती कीजै राजा रामचन्द्र की , हरिहर भक्ति करहूं संतन सुख दीजै जी