हनुमान द्वारा की गई अमूल्य सेवा के प्रति कृतज्ञता से भर उठे राम, हनुमान अत्यन्त प्रसन्न मे हनुमान की प्रशंसा करते हुए, राम बोले, "गरुड़ के अतिरिक्त अन्य कोई भी वह कार्य संपन्न नहीं कर पाता जिसे आपने किया है। सर्वोत्तम सेवक वह होता है जो अपने स्वामी द्वारा कोई कार्य सौंपे जाने पर सौंपे गये कार्यभार से अधिक कार्य संपन्न करता है। मध्यम दर्जे का सेवक वह होता है जो सक्षम होने पर भी स्वामी द्वारा दिए गये आदेश से अधिक कार्य करने का प्रयास नहीं करता। सबसे अधम सेवक वह होता है जो समर्थ होने पर भी स्वामी द्वारा दिए गये आदेश का पालन नहीं करता है।
मेरे प्रिय हनुमान, आपने न सिर्फ सीता का पता लगाया, बल्कि आपने अपनी बातों से उन्हें ढाँढस भी बँधाया आपने सम्पूर्ण लंका नगरी का सर्वेक्षण किया, महान राक्षस योद्धाओं को शक्ति का परीक्षण किया और आपने रावण के दिल में भय पैदा किया। वास्तव में आपकी इस सेवा ने व्यवहारतः मेरे प्राणों की रक्षा की है। मुझे इस बात का अलयन्त दुख है कि मैं आपको उचित पुरस्कार दे पाने में असमर्थ हूँ। इस समय वनवास में होने के कारण मैं एकमात्र यही कर सकता है कि आपको गले से लगा लूँ।
यह कहकर राम ने हनुमान को स्नेहपूर्वक अपने हृदय से लगा लिया। फिर सुग्रीव की ओर मुड़कर, बोले, अब हमें यह पता है कि सीता कहाँ है, परंतु वानर- गण विशाल समुद्र को पार कैसे करेंगे? मुझे अचानक यह महसूस हो रहा है कि हमारी सभी आशाएँ और कठोर परिश्रम व्यर्थ रहे।
राम एकदम चुप हो गये और गहन चिंतन-मनन में डूब गये, तभी सुग्रीव बोले, हे प्रभु, जिस प्रकार एक कृतघ्न व्यक्ति आसानी से अपने पर किए गये उपकार को भुला देता है, उसी प्रकार आपको दुख का त्याग कर देना चाहिए। जिस व्यक्ति में उत्साह की भावना नहीं होती है, उसके समस्त कार्य दुख के कारण बन जाते हैं और जो व्यक्ति दुख में डूब गया हो, उसके सभी प्रयास निष्फल हो जाते हैं। मैं रावण से युद्ध करने की संभावना को लेकर रोमांचित हूँ और मुझे विश्वास है कि वानर गण यह कार्य संपन्न करने में समर्थ हैं। क्यों न किसी प्रकार से समूद्र के ऊपर एक सेतु बनाया जाये ? मुझे पूरा विश्वास है कि यदि वानर-गण लंका में प्रवेश कर गये, तो वे निश्चित हो विजय प्राप्त करेंगे।
हनुमान की ओर रख करते हुए, राम बोले, मैं अपनी गूढ शक्तियों का प्रयोग करके आसानी से समुद्र पार कर सकता हूँ, या फिर यदि मैं चाहूँ तो समुद्र को सुखा सकता हूँ। परंतु मुझे लंका की किलेबंदियों के बारे में और साथ ही वहाँ आप जितनी भी प्रासंगिक जानकारी एकत्रित कर पाए हो, उनके बारे में विस्तार से बताएँ।
हनुमान उत्साह के साथ बोले, लंका में चार प्रकार को प्रतिरक्षा प्रणालियाँ हैं। पहली यह कि एक पर्वत पर बहुत ऊँचाई में बसे होने के कारण और चारों और से एक नदी से व सघन वनों से घिरे होने के कारण उस पर आक्रमण करना प्राकृतिक रूप से कठिन है। इसके अतिरिक्त, वहाँ कृत्रिम रूप से खड़ी की गई किलेबंदियाँ भी हैं। लंका के चारों ओर सोने की बहुत ऊँची चाहरदीवारी है और चार दिशाओं में चार विशालकाय प्रवेश द्वार हैं। दीवारों के चारों ओर चौड़ी-चौड़ी खाइयाँ हैं और इन खाइयों पर चार खुलने बंद होने वाले पुल है जो चारों प्रवेश- द्वारों को जाते हैं। लंका में आग लगाते समय मैंने जान-बूझकर सभी खुलने बंद हो जाने वाले पुलों को नष्ट कर डाला और दीवारों के कई हिस्सों को तोड़ डाला था।
मेरे प्रिय प्रभु राम, मेरा प्रस्ताव है कि अंगद, द्विविद, मैदा, जाम्बवान, पानस नील और में अर्थात् सभी महानतम् योद्धा छलाँग लगाकर लंका पहुँच जायें। इस प्रकार हम वानरों की सम्पूर्ण सेना को समुद्र पार कराने की चिंता किए बिना रावण को पराजित कर सकते हैं।
राम बोले, मैंने शपथ ली है कि मैं स्वयं लंका जाकर इसे नष्ट करूँगा। सुग्रीव की ओर मुड़कर, राम बोले, "सूर्य अभी मध्य रेखा पर है इसलिए, अभी-अभी अभिजित नामक एक शुभ घड़ी आरंभ हुई है। सैन्य अभियान आरंभ करने के लिए यह एक सुअवसर है और साथ ही मेरी बाँयीं आँख की ऊपरी पलक भी फड़ककर विजय का संकेत दे रही है। आइए, हम सभी वानरों को इकट्ठा करें ताकि हम तत्काल लंका की ओर कूच कर सकें।
राम का प्रस्ताव सुनकर लक्ष्मण और सुग्रोव अत्यन्त प्रसन्न हुए। पल भर में ही वानरों के झुंड के झुंड गुफाओं और पर्वत के ढलानों पर स्थित वनों से उमड़कर बाहर आने लगे। राम ने नील को आदेश दिया, मैं चाहता हूँ कि आप सबसे आगे रहें। कुछ वानरों को अपने साथ ले लें और दसों दिशाओं में बिखर जायें ताकि यदि शत्रु सेना हमारी प्रतीक्षा में घात लगाकर बैठी हो, तो उसका पता चल जाये। कमजोर वानरों को छोड़ दिया जाये क्योंकि हमारा युद्ध अभियान अत्यन्त विकट है।
राम ने सेना को इस प्रकार व्यवस्थित किया, ताकि वह इस ब्यूह रचना के मध्य में हनुमान के पीठ पर सवार रहें, जबकि लक्ष्मण अंगद की पीठ पर बैठ जायें। सुग्रीव ने सभी को राम के आदेशों की सूचना दे दी और शीघ्र ही यह सेना दक्षिण को कूच कर गई। शक्तिशाली वानरों ने सिंह के समान गर्जना करते हुए और ऊपर-नीचे उछलते-कूदते हुए अत्यन्त उत्साह के साथ कूच किया। कभी वे कलाबाजियाँ खाते हुए आगे बढ़ते या एक-दूसरे की पीठ पर चढ़ जाते, तो कभी वे मनोरंजन करते हुए एक-दूसरे को आगे उछाल देते। प्रसन्न होकर और उग्ररूप से मनोरंजन करते हुए साहस व उत्साह से भरपूर वानर-गण, झुंड में पहाड़ों पर ऊपर चढ़ते हुए और नीचे उतरते हुए जोर-जोर से अपनी पूँछें फटकारते, वृक्षों को जड़ समेत उखाड़ते और विशाल चट्टानों को उनकी जगह से उखाड़कर हटाते हुए आगे बढ़ने लगे।
दक्षिण दिशा में आगे बढ़ते हुए, लक्ष्मण ने राम से कहा, जरा इन शुभ शगुनो को देखें हमारी पीठ की ओर से शीतल हवा प्रवाहित हो रही है और जंगल के जीव-जंतु अपने संतोष को प्रकट करने के लिए तरह-तरह की आवाजें निकाल रहे है। स्वयं यह पृथ्वी बहुत शांत व तरो-ताजा जान पड़ रही है और हमारे सिर के ऊपर सूर्य प्रसन्न भाव से चमक रहा है।
सीता को वापस लाने के लिए युद्ध करने को अत्यन्त व्यग्र होकर सेना दिन और रात लगातार आगे बढ़ती रही। आगे बढ़ते हुए वानरों ने पर्वतीय झीलों में स्नान किया और जलक्रीड़ा की। उन्होंने फल और कंद-मूल खाए और वनों में मिलने वाला शहद पिया। अंततः जब वे महेंद्र पर्वत पर पहुंचे, तो राम इस पर्वत के शिखर पर चढ़ गये। वहाँ से उन्हें दूर क्षितिज तक फैला समुद्र का अपार विस्तार दिखाई दिया। इसके बाद, राम पर्वत के पाद-स्थल पर स्थित सेना में लौट आये। और फिर वानर गण समुद्र तट तक बिना रुके आगे बढ़ते रहे।
राम ने सुग्रीव से कहा, अब हमारे सामने फिर से वही प्रश्न खड़ा है जिसने बहुत समय से हमें परेशान किया है। हम इस अपार विस्तार वाले समुद्र को कैसे पार करेंगे? इस समय वानरों को पास के वन में तंबू आदि लगाने का निर्देश देकर आइए, हम लंका तक जाने का कोई उपाय खोजने पर विचार करें।
तंबू आदि लगाने में व्यस्त वानरों के झुंड को देखकर ऐसा प्रतीत होता था मानो वह भूरे रंग की उफनती लहरों वाला कोई दूसरा विस्तृत समुद्र हो। वानरों के अग्रणी नेता आश्चर्य से एकटक उस अपार जलराशि वाले समुद्र के विस्तार को देखते रहे जो असुरों को शरणस्थली था और जहाँ से अतल गहराई में स्थित पाताल लोक को रास्ता जाता था वे आँखें फाड़कर उस अगाध अपार विस्तार वाले समुद्र को एकटक देखते रहे जहाँ विशालकाय तिमि मछली जैसे विकराल जलीय जीव भरे थे, और ये तिमिंगिल मछलियाँ उन्हें आसानी से निगल सकती थीं। पराक्रमी वानर- गण मानो आश्चर्य से जड़ होकर लंका और उनके बीच स्थित निरंतर प्रवाहमान लहरों की अनंत श्रृंखला और हवा के थपेड़ों पर रोष प्रकट करती हुई तूफानी लहरों वाले इस अलंघ्य जल विस्तार को अपलक देखे जा रहे थे।
जबकि शांत होकर बैठे राम ने लक्ष्मण से कहा, आम तौर पर वक्त बीतने के साथ दुख भी धीरे-धीर घटता जाता है, परंतु जहाँ तक मेरा प्रश्न है, तो सीता के वियोग में हर दिन के बीतने के साथ मेरा क्रोध बढ़ता जाता है। हे लक्ष्मण, मुझे यह सोच सोचकर और अधिक दुख होता है कि सीता ने हमें जो समय अवधि दी है वह रेत के समान लगातार हाथ से निकलती जा रही है मेरा हृदय उस घड़ी की प्रतीक्षा में व्याकुल हो रहा है जब मैं रावण का संहार करके सीता का उद्धार करूंगा। केवल तभी मेरा दुख सदा-सर्वदा के लिए ठीक उसी प्रकार दूर हो जायेगा, जैसे कि कोई व्यक्ति अपने फटे-पुराने वस्त्रों को फेंक देता है।
राम ने लक्ष्मण के सामने अपने मन में दबे क्रोध को बाहर निकालते बहुत देर तक विलाप करना जारी रखा, जबकि इस बीच सूर्य धीरे-धीरे क्षितिज में नीचे उतरता रहा और शोघ्र हो अंधेरा छा गया।
इसी बीच, लंका में हनुमान की अनर्थकारी शक्तियों को साक्षात् देखने के बाद, रावण ने सभी अग्रणी राक्षसों की एक बैठक बुलाई। राक्षसों के एकत्रित हो जाने पर राक्षस- राज बोला, अभेद्य लंका नगरी में हाहाकार मच गया, मेरा राजमहल खंडहर हो गया है और अनेक श्रेष्ट राक्षस योद्धा मारे जा चुके हैं। अधिकृत मत के अनुसार, विजय का मूल कारण अच्छा परामर्श होता है, इसीलिए मैंने आप सभी को यहाँ बुलवाया है।
संसार में तीन प्रकार के मनुष्य होते हैं। कोई भी महत्वपूर्ण कार्य आरंभ करने से पहले, एक बुद्धिमान् व्यक्ति अपने बैठजनों से और साथ ही समान हित वाले मित्रों से सलाह लेता है। इसके बाद उनसे मिली सलाह के अनुसार वह व्यक्ति अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करता है, भले ही उसके कार्य के परिणाम भाग्य पर निर्भर होते हैं। औसत दर्जे का व्यक्ति कार्य के विषय में स्वयं विचार करता है और स्वयं अपनी बुद्धि के प्रकाश में चीजों को देखता परखता है और फिर उसके मुताबिक कार्य करता है। सबसे अधम व्यक्ति वह होते हैं जिनकी ईश्वर पर आस्था नहीं होती और जो सनक में आकर दायित्व के बोध से होन होकर कार्य करते हैं। ऐसे व्यक्ति लाभ और हानि के विषय में न्यायपूर्ण विचार करने में अक्षम होते हैं और इसलिए आँख बंद करके काम करने लगते हैं और स्वयं से केवल यही कहते रहते हैं कि चाहे कुछ भी हो जाये, पर मैं यह करके रहूँगा ।
इसी प्रकार, सलाहें भी तीन प्रकार की होती हैं। अच्छी सलाह वह होती है। जिसे समस्या का वस्तुपरक अध्ययन करके दिया जाता है और जो धार्मिक सिद्धांतों के अनुरूप होती है। औसत दर्जे की सलाह वह होती है जिसे किसी समस्या पर हड़बड़ी में गरमागरम बहस करके दिया जाता है और जो धार्मिक सिद्धांतों से अधिक सीमित प्रकार के स्व-हित पर ज्यादा केंद्रित होती है। बुरी सलाह वह होती है जिसे झूठे अहंकार के वशीभूत होकर, या चाटुकारिता करने के कारण दिया जाता है और जो अंतिम परिणामों पर यथोचित विचार किए बिना दी जाती है।
मुझे विश्वास है कि राम शीघ्र ही वानरों की एक विशाल सेना के साथ लंका पर आक्रमण करेंगे। उनकी शक्ति का प्रदर्शन जनस्थान पर पहले ही देखा जा चुका है, इसलिए मुझे तनिक भी सन्देह नहीं है कि वह बिना किसी कठिनाई के समुद्र पार कर लेंगे। मेरे प्रिय राक्षसों, आप सभी अत्यन्त बुद्धिमान हैं इसलिए मैं आपसे यह सलाह चाहता हूँ कि ऐसे में हम सभी के कल्याण के लिए क्या किया जाना चाहिए ?
राम की शक्ति से अनभिज्ञ होकर, अपने स्वामी को प्रसन्न करने के लिए उत्सुक राक्षसों ने उत्तर दिया, हे राजन, भला आपको भयभीत होने की क्या आवश्यकता है ? आप स्वयं इतने शक्तिशाली हैं कि अपने सभी शत्रुओं का अकेले ही वध कर सकते हैं। जरा याद करें कि आपने किस प्रकार कुबेर को पराजित करके उससे लंका छीन ली थी। कृपा करके याद करें कि किस प्रकार माया दानव ने आपसे भयभीत होकर आपको अपनी पुत्री मंदोदरी को सौंप दिया था। भला आपको चिंतित होने की क्या आवश्यकता है? आप शान्तिपूर्वक विश्राम करें और आपका पुत्र इंद्रजित वहाँ जाकर राम का और समस्त वानरों का समुद्र पार करने से पहले ही वध कर देंगे। देवताओं को पराजित करने के पश्चात्, इंद्रजित ने स्वर्गाधिपति इंद्र को लंका में बंदी बनाकर रखा था। ब्रह्माजी के अनुरोध पर ही इंद्र यहाँ से स्वतंत्र होकर लौट सके और स्वर्ग के सिंहासन पर दोबारा बैठ सके ।रावण के प्रमुख सेनापति प्रहस्त ने कहा, हमने देवताओं, दानव, गंधर्वों और पिशाचों पर विजय प्राप्त की है। भला हमें नाशवान, मर्त्य मानवों से भयभीत होने की क्या आवश्यकता ? हनुमान अपनी शक्ति का उपयोग करने में मात्र इसलिए समर्थ हुए क्योंकि हम सचेत नहीं थे और हमने उन्हें मात्र एक वानर समझने की भूल की ?
दुर्मुख ने खड़े होकर घोषणा की, मैं इस अपमान का बदला अवश्य लूँगा। मैं इस पृथ्वों से वानर मात्र का नाम मिटा दूंगा - वे चाहे स्वर्ग में पृथ्वी पर या भले हो समुद्र के अंदर हों, पर मैं वानरों का नाश कर दूँगा!
रक्त और माँस से सने गदा को घुमाते हुए वज्रदंष्ट्र ने क्रोधपूर्वक चिल्लाकर कहा, भला वानरों के झुंड की बिसात ही क्या है? मैं राम व लक्ष्मण को भी मृत्यु के घाट पहुँचा दूंगा! हे राजन, आप केवल मुझे ऐसा करने की आज्ञा मात्र दे दें।
कुंभकर्ण के शक्तिशाली पुत्र निकुंभ ने गर्जन करते हुए कहा, "आप सभी यहाँ पर अपने स्वामी के साथ रहें। मैं जाता हूँ और अकेले ही वानरों सहित राम का नामो-निशान मिटाकर आता है।
इस प्रकार, अनेक राक्षसों ने अपनी शक्ति का दंभ भरते हुए रावण को आश्वस्त किया कि वे अकेले ही शत्रु को पराजित कर सकते हैं। अपने अस्त्र-शस्त्रों को लहराते हुए, क्रुद्ध राक्षस गण युद्ध के लिए प्रस्थान करने को आतुर थे, परंतु विभीषण ने विनम्रतापूर्वक उन्हें रोका।
जब सभी राक्षस गण अपने-अपने आसनों पर विराजमान हो गये और शान्ति- व्यवस्था कायम हो गई, तो विभीषण बोले, मेरे प्यारे बड़े भाई, बुद्धिमानों की सलाह है कि अन्य तीन रणनीतियों के विफल हो जाने के बाद ही हिंसा का सहारा लिया जाना चाहिए। परंतु तब भी, हिंसा केवल तभी न्यायोचित होती है जबकि इसका प्रयोग दुष्ट, लापरवाह, पहले से किसी अन्य शत्रु के अधिपत्य में होने, या दुर्भाग्य की स्थिति में किया जाये। राम सर्वशक्तिशाली और धर्मात्मा हैं और वह बदला लेने के लिए युद्ध करने को व्यग्र हैं। इस दृष्टि से विचार करें, तो आप उन्हें पराजित करने की आशा भला कैसे कर सकते हैं? हमारे वर्तमान संकट का मूल कारण सीता का अपहरण है, इसलिए बेहतर यही होगा कि राम द्वारा लंका और इसके समस्त निवासियों का विनाश कर दिए जाने से पहले ही उन्हें सीता लौटा दें
विभीषण की सलाह सुनने के बाद, रावण ने सभा विसर्जित कर दी और अपने कक्ष को चला गया। अगली सुबह जब विभीषण रावण के पास पहुँचे तो वह अपने राजसिंहासन पर विराजमान था और अपने कल्याण के लिए बह्मणों द्वारा की जा रही प्रार्थनाओं को सुन रहा था।
उसके पास में बैठने के बाद, विभीषण बोले, मेरे प्रिय भाई, जब से आप सीता को यहाँ पर लेकर आये है, तब से ही यहाँ अनेक अपशगुनकारी संकेत प्रकट होने लगे हैं। आहूति की अग्नि से अब चिंगारियाँ और धुँआ निकलता है। रसोइयों और आहुति-क्षेत्र के आस-पास अक्सर ही साँप दिखाई देते हैं। आहुति की सामग्रियों में अक्सर चीटियाँ भरी होती हैं। राजमहलों के शिखरों पर कौए चढ़े रहते हैं और नगर भर में निरंतर गिद्ध मंडराते रहते हैं। प्रत्येक सुबह और संध्या के समय, मादा सियार के रोने की आवाज सुनाई देती है। यह सभी अपशगुन आपके द्वारा सीता का अपहरण करने के पापपूर्ण कार्य के कारण हो रहे हैं।
हे रावण, आपके लिए एकमात्र पश्चाताप यही है कि आप सीता को तत्काल राम के सुपुर्द कर दें। मैं आपसे पूरी ईमानदारी के साथ सत्य बोल रहा हूँ जबकि आपके अन्य मंत्रीगण केवल आपकी चाटुकारिता करते हैं क्योंकि उन्हें भय है कि ऐसा न करने पर आप उनसे अप्रसन्न हो जायेंगे।
रावण सीता का भोग करने की कामना से भरा हुआ था इसलिए विभीषण की सलाह सुनकर वह क्रोधित हो उठा। जोर से चिल्लाते हुए, रावण बोला, "मैं राम या किसी और से नहीं डरता, इसलिए में सीता को वापस नहीं लौटाऊंगा। मेरे प्यारे छोटे भाई कृपा करके मुझे अकेला छोड़ दो और अपना काम करो।
सीता के प्रति अपनी अतृप्त कामना के कारण रावण दुर्बल हो गया था और उसके पाप कार्यों के कारण उसके सगे-संबंधी तक उसका अनादर करने लगे थे। युद्ध होना अपरिहार्य जानकर, रावण अपने मंत्रियों से इस बारे में और अधिक विचार-विमर्श करना चाहता था इसलिए उसने उन्हें फिर से बुलवाया।
रावण अपने रथ पर सवार होकर सभा स्थल पर पहुँचा, तो सभी लोगों ने जमीन पर माथा टेककर उसे प्रणाम किया और साथ ही उसके आगमन के समय हजारों बिगुल बज उठे। रावण ने सबसे पहले प्रहस्त को आदेश दिया, यह सुनिश्चित करो कि हमारी सेना लंका की भीतर और बाहर, दोनों जगहों से रक्षा करने के लिए तैयार है।
प्रहस्त जब सेना को सचेत करने के लिए चले गये, तो रावण बोला, मेरे प्रिय राक्षसों, मुझे यह घोषणा करते हुए अत्यन्त हर्ष हो रहा हैं, कि छह माह तक सोते रहने के बाद, कुंभकर्ण अंततः जाग गये हैं और यहाँ पर उनकी उपस्थिति से हम सम्मानित हुए हैं। कृपया बहुत ध्यान से मेरी बात सुनें क्योंकि मैं आप सभी को अपनी स्थिति से पूर्णतः अवगत कराना चाहता हूँ। जैसा कि आप लोग जानते हैं, मैं परम सुंदरी सीता को पूरे मन से चाहता हूँ। सच कहूँ तो, मेरा अब स्वयं पर भी कोई वश नहीं रह गया है क्योंकि मैं उसके प्रति अपनी कामना के वशीभूत हो गया हूँ।
इसके बाद, अपनी छवि को सुधारने की गरज से रावण ने असत्य भाषण करते हुए कहा, "सीता मेरी पत्नी बनने को तैयार है, परंतु वह ऐसा करने से पहले एक वर्ष का समय चाहती है क्योंकि उसने राम के लिए यह समय निर्धारित किया है ताकि वह इस दौरान यहाँ आकर उसका उद्धार कर सकें। इसी कारण मैं अब तक शांत रहा, परंतु अब ऐसा जान पड़ता है कि राम व लक्ष्मण वानरों की एक विशाल सेना के साथ लंका पर आक्रमण करने की तैयारी कर रहे हैं। सच कहूँ तो मुझे नहीं लगता कि दो मानव और वानरों का एक झुंड हमारे लिए कोई खतरा पैदा कर सकते हैं। फिर भी, हनुमान नाम के एक वानर द्वारा किए गये भीषण विनाश के कारण, मुझे यह स्वीकार करना पड़ रहा है कि विजय अनिश्चित है। इसीलिए मैंने आप सभी को यहाँ पर बुलाया है। मैं चाहता हूँ कि आप मुझे सलाह दें कि मैं राम का किस प्रकार से वध करूँ ताकि मैं परम सुंदरी सीता को अपनी पत्नी बना सकूँ ।
तभी कुंभकर्ण खड़ा हुआ और तीखे शब्दों में बोला, अरे मूर्ख राजा, तुम्हें हमारी सलाह तब लेनी चाहिए थी जब तुम सीता का अपहरण करने की योजना बना रहे थे, परंतु उस समय तुम कामनाओं के वशीभूत थे। यदि तुमने उस समय सलाह ली होती तो इस समय तुम्हें नहीं पछताना पड़ता। खैर, अब चिंतित न हो। तुम्हारी इस भयंकर गलती के परिणामों से बचाने के लिए मैं राम व लक्ष्मण का वध कर दूंगा और सभी वानरों को खा जाऊँगा।
महापार्श्वे बोला, हे राजन, विषैले सर्पों से भरे वन में मेहनत से शहद का पता लगाने के बाद, भला कौन होगा जो इतने परिश्रम से प्राप्त हुए शहद का स्वाद नहीं चखना चाहेगा? आप जबर्दस्ती सीता का भोग करके अपने हृदय की कामना शांत कर सकते हैं। भला आपको कौन रोक सकता है? आपके समान शक्तिशाली और कोई नहीं है, इसलिए आप निर्भय होकर अपनी मनोकामना पूर्ण कर सकते हैं।
रावण बोला, मैंने अपने अतीत की एक बात आप सभी से गुप्त रखी थी। परंतु अब जबकि आपने ऐसी बात कह दी है, तो मैं आपके सामने वह भेद प्रकट करता हूँ जिसे बहुत लंबे समय तक मैंने किसी को नहीं बताया, बहुत समय पहले एक बार मैंने एक अतुलनीय सुंदरी अप्सरा पुंजिकस्थला को देखा, उस समय वह ब्रह्माजी की आराधना करने के लिए जा रही थी, उस अप्सरा को देखते ही मेरे मन में काम-वासना भड़क उठी, इसलिए मैंने उसे पकड़कर उसका बलात्कार किया। अपनी कामवासना शांत कर लेने के बाद मैंने उसे जाने दिया और वह नग्न अवस्था में ही वहाँ से दौड़ती हुई ब्रह्मा जी के पास शरण लेने के लिए भाग गई।
ब्रह्माजी को अप्सरा ने जब मेरे इस कार्य के बारे में बताया तो वह अत्यन्त क्रोधित हो उठे और उन्होंने मुझे शाप देते हुए कहा, अरे दुष्ट राक्षय-राज यदि तुमने भविष्य में किसी भी स्त्री का बलात्कार करने का प्रयास किया,तो तुम्हारा सिर एक सौ टुकड़ों में फट जायेगा।
मेरे प्रिय महापार्थ, इसी शाप के भय से मैं सीता को बलपूर्वक घसीटकर अपने बिस्तर तक नहीं ले गया। मुझे राम से कोई भय नहीं है, क्योंकि मुझे यह पता है कि इस ब्रह्माण्ड में मैं ही सबसे अधिक शक्तिशाली हूँ। निश्चित ही, राम को मेरी शक्तियों के बारे में कुछ भी पता नहीं है, इसलिए यदि वह मुझ पर आक्रमण करने का दुःसाहस करेंगे, तो मैं उनक संहार कर दूँगा।
विभीषण बोले, मेरे प्रिय रावण, क्या आपको दिखाई नहीं देता कि सीता एक ऐसे विषैले सर्प की भाँति है जिसे आपने अपनी गर्दन चारों ओर बाँध लिया है? अपनी सदबुद्धि का इस्तेमाल करें और सीता को राम के पास लौटा दें और इस प्रकार सीता को लंका के विनाश और समस्त राक्षसों के संहार का कारण न बनने दें। मैं आपको आश्वस्त करता हूँ कि ऐसा कोई भी राक्षस योद्धा नहीं है जो युद्धक्षेत्र में राम का सामना कर सके और उनकी शक्ति के बारे में आपको बताने के लिए जीवित रह सके।
प्रहरत ने भड़ककर पूछा, जब हमें महानतम् देवताओं और असुरों तक से कोई भय नहीं है, तो भला राम जैसे एक मनुष्य से हमें भयभीत होने की क्या आवश्यकता है?
रावण के शुभचिंतक के रूप में, विभीषण ने उत्तर दिया, राम की शक्तियाँ अपरंपार और अपराजेय हैं और उनकी शक्तियाँ भगवान् विष्णु के समान इसलिए, हे प्रहस्त, अपने महाराज को राम के साथ युद्ध न करने की सलाह देकर आप उनका अत्यधिक कल्याण करेंगे।
इसके बाद, रावण का रुख करते हुए, विभीषण बोले, मैंने आपके कल्याण का विचार करके ही आपको यह सलाह दी थी कि आप सीता को राम के पास वापस भेज दें। जो मंत्री अपने राजा और शत्रु की शक्तियों का तुलनात्मक आकलन करके सलाह देता है, वही सच्चा शुभचिंतक होता है।
इंद्रजित अपने चाचा की बातों को और अधिक सहन नहीं कर पाया और उत्तेजित होकर बात को काटते हुए बोला, हे विभीषण, आप कायर और नपुंसक हैं। इस सभा में आपकी ऐसी सलाहों के लिए कोई स्थान नहीं है क्योंकि ये सलाहें साहस और पराक्रम से रहित हैं। अतीत में, मैं इंद्र और उसके ऐरावत हाथी को जमीन पर गिराकर घसीट चुका हूँ जिसे देखकर सभी देवगण भय से भाग खड़े हुए थे। राम व लक्ष्मण जैसे दो सामान्य मानवों का वध करना मेरे लिए अत्यन्त सरल होगा।
विभीषण ने कटुता से जवाब दिया, तुम अभी बच्चे हो। चूँकि अब तक तुम्हारी बुद्धि विकसित नहीं हुई है, इसलिए तुम ठीक से यह निर्णय नहीं कर सकते कि क्या किया जाना चाहिए और क्या नहीं किया जाना चाहिए। तुम असल में रावण के पुत्र नहीं शत्रु हो क्योंकि तुम मंदबुद्धि, अविचारी, असांस्कृतिक और दुष्ट हो सीता को प्रचुर उपहारों के साथ राम को वापस सौंप दिया जाना चाहिए, ताकि राक्षस गण शान्तिपूर्वक जीवन व्यतीत करते रहें।
विभीषण को सलाहों से रावण भी उकता चुका था। अपने युवा भाई को फटकारते हुए, रावण बोला, मित्र के वेश में किसी गद्दार के साथ रहने की तुलना में, अपने शत्रु के साथ रहना या किसी विषैले सर्प के साथ रहना बेहतर है। खासकर, अगर वह व्यक्ति किसी का भाई हो। अब तो यही सच मालूम होता है कि जब किसी व्यक्ति के सिर पर संकट के बादल मंडराएँ, तो सबसे ज्यादा प्रसन्न उसके रिश्तेदार ही होते हैं। एक बार की बात है, जब कुछ हाथियों ने शिकारियों को पास आते देखा, तो उन्होंने ये दो छंद कहे
अग्नि व अस्त्रों से हमें भय नहीं
खतरनाक होते हैं जो होते हैं तथाकथित करोबी ।
ऐसे करीबी कष्ट भी उठाते हैं
ताकि हम सभी के पैरों में बेड़ियाँ पड़ जायें।
गायों से हमें दूध मिलता है, ब्राह्मणों में हमें तपस्या मिलती है, स्त्रियों में हमें चंचलता दिखाई देती है और रिश्तेदार हमें संकट में डालते हैं। हे विभीषण तुम इर्ष्यालु हो और इसी कारण से तुम मेरा सम्मान सहन नहीं कर पा रहे हैं। यदि तुम्हारी जगह किसी और ने तुम्हारी बातें बोली होतीं, तो मैंने तत्क्षण ही उसका वध कर दिया होता, परंतु तुमसे मैं केवल यही कहूँगा कि अरे अधम भाई, तू हमारे कुलीन परिवार के नाम पर कलंक है।
अपने भाई को कटुतापूर्ण बातें सुनकर विभीषण को भी गुस्सा आ गया था। वह हाथ में गदा उठाए हुए, अपने चार समर्थकों के साथ हवा में उठ गये और घोषणा करके बोले, हे राजन, यद्यपि आप मेरे अग्रज और उच्च पदस्थ हैं, परंतु तब भी मैं आपके शब्दों को सहन नहीं कर सकता क्योंकि आप अधर्म के मार्ग पर चल पड़े हैं। प्रशंसक सिर्फ मनलुभावन बातें ही बोलते हैं क्योंकि यह करना आसान है। जबकि दूसरी तरफ, सत्य चाहे कितना भी कड़वा क्यों न हो, तो भी सत्य की बात करने वाले शुभचिंतक बहुत कम ही देखने को मिलते हैं।
हे रावण राम के हाथों आपका वध न हो, इसी आशा से मैंने आपको सलाह दी थी तब भी आपने मेरी सलाह को ठुकरा दिया। बेशक, आप अपनी इच्छानुसार निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं, परंतु मैं अब आपके साथ यहाँ पर नहीं रह सकता हूँ।
विभीषण और उनके समर्थक वहाँ से चले गये और एक घंटे के अंदर ही वे उस स्थान पर पहुँच गये जहाँ पर राम ठहरे हुए थे। वानरों ने जब विभीषण को हवा में मंडराते हुए देखा, तो सुग्रीव ने हनुमान से कहा, निश्चित ही ये राक्षस यहाँ पर हमारा वध करने के लिए आये हैं।
सुग्रीव के आदेश की प्रतीक्षा करते वानरों ने उन पर आक्रमण करने के लिए जल्दी-जल्दी चट्टानें उठा लीं और वृक्ष उखाड़ लिए। तभी विभीषण बोले, हे वानर-राज, मैं रावण का सबसे छोटा भाई हूँ। मैंने महाराज को बार-बार यह सलाह दी कि वह सीता को राम के पास लौटा दें, परंतु इसके लिए उन्होंने बार- बार मुझे अपमानित किया। मैं अपनी पत्नी और संतानों को छोड़कर यहाँ आया हूँ, और भगवान् राम के चरण-कमलों में शरण लेना चाहता हूँ। कृपा करके उन्हें मेरे उद्देश्यों के बारे में सूचना दें।
सुग्रीव राम के पास जाकर बोले, शत्रु राक्षसों में से एक यहाँ आया है। वह कहता है कि उसने रावण का साथ छोड़ दिया है, परंतु मुझे लगता है कि उस पर विश्वास नहीं किया जा सकता है। राक्षस विश्वास के योग्य नहीं हो सकता है, इसलिए मेरे विचार से वह एक जासूस है। यदि हम उस पर विश्वास करते हैं तो इसके परिणामस्वरूप हमें बहुत हानि उठानी पड़ सकती है। मेरा सुझाव है कि हमें तत्काल ही उसका वध कर देना चाहिए।
राम ने अन्य वानरों से राय माँगी। वानरों ने कहा प्रिय प्रभु राम आप सब कुछ जानते हैं। इसलिए, हम यह समझ सकते हैं कि आप हमें सम्मान प्रदान करने के लिए हो हमसे राय माँग रहे हैं।
अंगद ने सुझाव दिया, यदि हम इस राक्षस का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए कर सके, तो हमें बहुत सावधानों से उसे स्वीकार करना होगा परंतु ऐसा करने में बहुत अधिक जोखिम है, इसलिए बेहतर होगा कि हम उसे स्वीकार करने से मना कर दें।
शरभ बोले, हमें इन राक्षसों पर गुप्तचर नियुक्त कर देने चाहिए। यदि अच्छी तरह से जाँच-परख लेने के बाद यह पता चलता है कि हम उसे सहभागी बना सकते हैं, तब उसका स्वागत किया जाना चाहिए।
जाम्बवान ने चेतावनी दी, राक्षसों के प्रति बहुत सचेत रहना चाहिए और शंका रखनी चाहिए, जबकि मैदा बोले, उसे अपनाने के बारे में सोचने से पहले उससे अच्छी तरह से पूछताछ करनी चाहिए।
वाक-कला में निपुण, बुद्धिमान हनुमान बोले, हमारे पास इतना समय नहीं है कि हम विभीषण की परीक्षा ले सकें, परंतु मेरे विचार से वह पूरी गंभीरता और ईमानदारी के साथ भगवान राम को शरण लेने यहाँ आये हुए हैं। वह यह समझ चुके हैं कि रावण दुष्ट है जबकि राम पवित्रता व धर्म के सर्वोच्च प्रतीक हैं। उनका शांत सुख संपत वाणी यह दर्शाते हैं कि उनका उद्देश्य पाप-रहित है, क्योंकि कोई धूर्त व्यक्ति इतनी अच्छी तरह से शांतचित्त नहीं रह सकता है। अपनी मंशा को पूरी तरह छुपाए रखना किसी भी व्यक्ति के लिए पूर्णतः संभव नहीं होता। व्यक्ति के हाव-भाव उसके विचारों की चुगली कर देते हैं। मेरे विचार से हमें विभीषण को बिना किसी शंका के अपना मित्र स्वीकार कर लेना चाहिए।
हनुमान की बात सुनकर राम बहुत प्रसन्न हुए, परंतु सुग्रीव ने तब भी आग्रहपूर्वक कहा, विभीषण ने युद्ध को आसन्नता के समय अपने भाई का त्याग किया है, जिससे यह समझा जा सकता है कि वह किसी को भी धोखा दे सकता है। राम बोले, मेरे विचार से विभीषण ने न्यायोचित कारण से रावण का साथ छोड़ा है। आखिरकार राज परिवारों में इस प्रकार के मतभेद अक्सर उभरते रहते हैं। आइए हम सब उन्हें अपने मित्र के रूप में स्वीकार करके उनका स्वागत करें।
सुग्रीव ने मंद स्वर में विरोध किया, हो सकता है कि उसे रावण ने ही भेजा हो। सुरक्षा कारणों से ही सही, हमें तत्काल उसे बंदी बना लेना चाहिए या उसका वध कर देना चाहिए। अन्यथा, यदि हम उस पर भरोसा करते हैं, तो वह किसी भी क्षण हमें धोखा दे सकता है।
राम मुस्कुराकर बोले, क्या आप सचमुच यह सोचते हैं कि यह राक्षस मुझे नुकसान पहुँचा सकता है? अपनी उंगली के सिरे मात्र से मैं समस्त राक्षसों और असुरों का वध कर सकता हूँ। अब मैं आपको एक कथा सुनाता हूँ, इसलिए कृपा करके ध्यानपूर्वक उसे सुनिए।
एक समय की बात है, एक शिकारी ने एक कबूतर को अपने जाल में फँसा लिया और फिर वह पास में स्थित एक वृक्ष की छाँव में सुस्ताने के लिए बैठा। कबूतर की पत्नी उसी वृक्ष पर रह रही थी और जब उसने देखा कि शिकारी उसके निवास पर आया है, तो उसने सभी प्रकार से उसकी आवाभगत की। चूँकि, उसके पास शिकारी को खिलाने के लिए कुछ भी नहीं था, तो उस कबूतरी ने स्वयं अपना मांस देकर अतिथि का सत्कार करने का कर्तव्य पूरा किया।
मेरे प्रिय सुग्रीव, यदि एक कबूतरी यह कर सकती है, तो मुझे क्या करना चाहिए? शास्त्रों ने बार-बार यह बताया है कि यदि कोई शत्रु भी हाथ जोड़कर आपके पास आये, तो आपको हर प्रकार से उसकी रक्षा करनी चाहिए। इस नैतिक शिक्षा के अतिरिक्त, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में, मेरा यह शाश्वत सिद्धांत है। कि "मैं स्वयं को आपको समर्पित करता हूँ कहकर मेरी शरण में एक बार भी आने वाले किसी भी जीवधारी को मैं सभी प्रकार के भयों से मुक्त कर देता हूँ। यहाँ तक कि यदि रावण भी यहाँ आकर मेरे सामने आत्मसमर्पण कर दे, तो मैं उसे भी सम्पूर्ण सुरक्षा प्रदान करूँगा।
इस तदात कथन को सुनकर, सुग्रीव का हृदय प्रेम से भर उठा। उनकी आंखों से आँसू बहने लगे और अपनी भूल स्वीकार करके वह बोले, मेरे प्रिय राम आपकी वाणी और आपके कार्य सदैव ही आपकी सर्वोच्च स्थिति के अनुरूप होते है। मुझे भी महसूस होता है कि विभीषण ईमानदार हैं। आइए हम बिना विलंब किए उनसे मित्रता कर लें।
सुरक्षा का आश्वासन मिल जाने पर, विभीषण धरती पर उतरे और भगवान् राम के चरण कमलों में साष्टांग प्रणाम किया। स्वयं को पूर्णतः राम के प्रति समर्पित करते हुए वह बोले, मैं रावण का सबसे छोटा भाई विभीषण हूँ। मैंने अपने भाई को उसके कल्याण के लिए अच्छी सलाह देने की कोशिश की, परंतु उसने कटु वचन बोलकर मेरा अपमान किया। इसी कारण से, मैंने अपना घर, परिवार और संपत्ति छोड़ दी और शुद्ध हृदय से आपकी भक्तिमय सेवा करने की भावना से लंका छोड़कर आ गया। अब मैं अपना जीवन आपको समर्पित करता हूँ और आपसे प्रार्थना करता हूँ कि आप मुझे अपनी असोम दया-दृष्टि देने का आशीर्वाद दें।
राम ने विभीषण को इतने स्नेहपूर्वक देखा मानो वह उन्हें आँखों से ही पी रहे हों और फिर राम ने विभीषण से अपने शत्रु के सशक और कमजोर पहलुओं के बारे में बताने का अनुरोध किया। विभीषण बोले, भगवान् ब्रह्माजी से मिले बरदानों के कारण, रावण को देवता गंधर्व, दैत्य, दानव व नाग नहीं मार सकते। केवल मनुष्य ही रावण का वध कर सकते हैं। चूँकि रावण मनुष्यों को अत्यन्त तुच्छ समझता है इसलिए उसने ब्रह्माजी से मानवों के हाथों नहीं मारे जाने का वरदान नहीं मांगा।
रावण का छोटा भाई कुंभकर्ण किसी विशाल पर्वत की भाँति महाकाय है और इंद्र के समान शक्तिशाली है। राक्षसों के सेनापति प्रहस्त ने एक बार यक्ष शूरवीर मणिभद्र को कैलाश पर्वत पर पराजित किया था। रावण का पुत्र इंद्रजित अपने पिता के समान ही शक्तिशाली है। वह अभेद्य कवच धारण करता है और एक बार अग्नि देव की तपस्या करने के बाद उसने उनसे वरदान पाया था कि वह युद्धक्षेत्र में स्वयं को अदृश्य कर सकेगा। इनके अतिरिक्त, महोदर, महापार्श्व और अकंपन के नेतृत्व में ऐसे लाखों राक्षस हैं जो अत्यन्त भयानक हैं और अपनी इच्छा से अपने रूप बदल सकते हैं।
राम बोले, प्रिय विभीषण, मैं रावण की शक्तियों से भलीभाँति परिचित है। मैं आपको वचन देता हूँ कि रावण व उसके अन्य राक्षस योद्धाओं का संहार करने के बाद, मैं आपको लंका के राज-सिंहासन पर संस्थापित करूँगा।
प्रत्युत्तर में विभीषण ने राम को यह आश्वासन दिया कि वह लंका पर विजय प्राप्त करने में उनकी सहायता करेंगे। राम अपने इस भक्त से अत्यन्त संतुष्ट थे, विभीषण को प्रेमपूर्वक गले लगाने के बाद, राम ने लक्ष्मण को समुद्र से जल लेकर आने का आदेश दिया ताकि वह तत्काल विभीषण का राज्याभिषेक कर सकें।
राम को एक राक्षस पर अवर्णनीय कृपा दृष्टि दिखाते हुए देखकर सभी वागर अपार आनन्द से भर उठे और खुशी से चिल्लाने लगे।
हनुमान व सुग्रीव बोले हे विभीषण, हमें यह विश्वास तो है कि हम राक्षसों पर विजय प्राप्त कर लेंगे, परंतु हम यह सोचकर परेशान है कि इस अपार विस्तार वाले व अलंघ्य समुद्र को कैसे पार किया जाये। आप हमें इस बारे में सलाह दे ।
विभीषण बोले, मेरे विचार से राम को समुद्र देव का आह्वान करना चाहिए। अतीत में, उनके पूर्वज महाराज सगर ने धरती को खोदकर समुद्र को विस्तारित किया था। उनकी इस सेवा के कारण, निश्चित ही समुद्र देव राम के उद्देश्य की सफलता के लिए आभार स्वरूप उनकी सहायता करेंगे।
सुग्रीव ने राम व लक्ष्मण तक यह प्रस्ताव पहुंचाया। राम को यह विचार बहुत भाषा, परंतु सुग्रीव के प्रति सम्मान प्रकट करने मात्र के उद्देश्य से वह बोले, आप व लक्ष्मण जो भी निर्णय लेंगे, मैं वैसा ही करूंगा।
सुग्रीव व लक्ष्मण विभीषण के प्रस्ताव से सहमत थे, इसलिए राम तत्काल समुद्र तट पर गये और कुश घास के आसन पर बैठ गये। उनका मुख समुद्र की ओर था। इसी बीच, शार्दूल नामक एक गुप्तचर ने वानरों का पता लगा लिया था और उसने रावण को बताया कि किस प्रकार सेना ने एक विशाल क्षेत्र में तंबू लगा। रखे हैं। तब राक्षस राज ने अपने दूत शुक को सुग्रीव के पास एक संदेश देने के लिए भेजा।
शुक ने एक पक्षी का वेश धारण किया और वह उड़कर सुग्रीव के ठहरने के स्थान पर जा पहुँचा। आकाश में उड़ते हुए ही उसने रावण का संदेश दिया. मैंने आपको कोई नुकसान नहीं पहुँचाया है, तो फिर आप लंका पर आक्रमण करने। की तैयारी क्यों कर रहे हैं? सीता के अपहरण का आपसे कोई लेना-देना नहीं है। इसलिए बेहतर यही होगा कि आप वापस किष्किंधा लौट जायें और शान्तिपूर्वक वहाँ जीवन यापन करें।
जिस समय शुक बोल रहा था, तभी कुछ वानरों ने हवा में छलाँग लगाकर उसे पकड़ लिया। उसे जमीन पर घसीटने के बाद, वानरों ने उसके पंख काट दिए और उसे बहुत अधिक मारा-पीटा।
शुक चीख उठा, हे राम, धर्मपरायण लोग कभी भी दूत का वध नहीं करते। राम के बीच-बचाव करने पर शुक को छोड़ दिया गया और वह फिर से हवा में उड़ गया और उसने सुग्रीव से पूछा कि क्या रावण के लिए उनका कोई संदेश है ।
सुग्रीव बोले, तुम अपने स्वामी को मेरा यह संदेश देना हे रावण, तुम अपने वंश की निकृष्ट विष्ठा के समान हो क्योंकि तुम दूसरे व्यक्ति की पतिव्रता पत्नी का आनन्द-भोग करने की लालसा रखते हो। इसी के कारण, जब मेरी वानर सेना समुद्र को पार करके लंका में आयेगी, तो राम तुम्हारे समस्त संबंधियों सहित तुम्हारा वध करेंगे।
अंगद बोले, यह पक्षी कोई दूत नहीं जान पड़ता। मेरे विचार से यह गुप्तचर है जो हमारी सेना की शक्ति के बारे में जानकारी लेने आया है। हमें इसे तत्काल बंदी बना लेना चाहिए।
इसे आदेश समझकर वानरों ने हवा में छलांग लगा दी और शुक को पकड़ने के बाद उन्होंने उसे रस्सियों से बाँध दिया। शुक ने एक बार फिर राम को गुहार लगाई जिस पर राम ने कृपापूर्वक उसे आश्वासन दिया कि उनके लंका पहुँचते ही उसे छोड़ दिया जायेगा।
इसके बाद, कुश घास के आसन पर बैठकर राम ने दोनों हाथ जोड़े और वह समुद्र देव से प्रार्थना कर उनका आह्वान करने लगे। राम किसी भी तरह से लंका पहुँचने के लिए संकल्पबद्ध थे और यहाँ तक कि समुद्र देव द्वारा सहायता करने से इंकार किए जाने की स्थिति में वह उनका वध करने को भी तैयार थे। अंततः, तीन दिन और तीन रात बीत जाने पर भी जब समुद्र देव ने कोई प्रत्युत्तर नहीं दिया, तो राम क्रोध से आग-बबूला हो उठे।
वह लक्ष्मण को संबोधित करके बोले, अब मुझे स्पष्ट तौर पर दिख रहा है। कि सद्गुणों से रहित दुष्ट लोगों के सामने धैर्य, क्षमाशीलता, सरलता और विनम्रता जैसे सद्गुण कारगर नहीं होते हैं। इस संसार में, ऐसे लोग उन्हीं को अधिक सम्मान: देते हैं जो हठी व आक्रामक होते हैं तथा कटु वाणी बोलते हैं और जो आत्म-प्रशंसा करते हुए एक जगह से दूसरी जगह घूमते-भटकते हुए आत्म-प्रदर्शन करने में लगे रहते हैं। मेरी विनम्रता और सहनशीलता के कारण, समुद्र देव मुझे शक्तिहीन व असहाय समझ रहे हैं। यही कारण है कि वह मेरे सामने प्रकट होने तक का कष्ट भी नहीं कर रहे हैं।
हे लक्ष्मण, मुझे मेरा धनुष तो दो ताकि मैं इस समुद्र-देव को इस धृष्टता का सबक सिखा सकूँ तुम देखना कि मैं किस तरह से समुद्र को सुखा देता हूँ ताकि वानर गण बिना किसी कठिनाई के पैदल चलकर आसानी से लंका तक पहुँच सकें।
दावानल की अग्नि के समान प्रचंड क्रोध से, राम ने अपना पराक्रमा धनुष उठा लिया। इस पर प्रत्यंचा चढ़ाकर, राम ने जब अत्यन्त बल के साथ धनुष की टंकार पैदा की, तो धरती काँप उठी । इसके बाद, राम ने समुद्र के जल में बाण चला दिए जिनके कारण समुद्र का जल उफनकर बहुत ऊँचा उठने लगा और समुद्र की लहरे नष्ट होने लगीं और इसमें रहने वाले समस्त जलीय जीव भय से आतंकित हो उठे।
इसके बाद, जब राम ने अत्यन्त शक्तिशाली ब्रह्मास्त्र का आह्वान किया, तो लक्ष्मण ने राम के धनुष पर अपना हाथ रख दिया और बोले, मेरे प्रिय भाई कृपा करके अपने क्रोध पर संयम रखें व अब और अधिक बाण न चलाएँ। निश्चित ही समुद्र को सुखाने के अन्य श्रेष्ठतर तरीके भी होंगे ताकि वानर- गण लंका तक पैदल जा सके।
आकाश से यह सब देख रहे महर्षिगण राम के क्रोध की प्रचंडता को देख आतंकित हो उठे। लक्ष्मण के अनुरोध को ठुकराते हुए राम ने ब्रह्मास्त्र बाग उठाया और गर्जन करते हुए समुद्र देव को धमकी दी, मैं तुम्हारे जल को पूरी तरह सुखा दूँगा ताकि तुम्हारे स्थान पर सिर्फ रेत का मरुस्थल रह जाये। हे समुद्र- देव, तुम घमंड से चूर होकर मेरी सहायता करने से विमुख हो रहे हो, इसलिए अब मैं अपनी शक्ति का प्रयोग करूंगा ताकि वानर- गण तुम्हारे ऊपर चलकर तुम्हें पार कर सके
जब राम ने क्रोध से भरकर अपने धनुष की प्रत्यचा खींची, तो स्वर्गलोक और पृथ्वी लोक थर-थर काँपने लगे और सम्पूर्ण आकाश में अंधकार छा गया। स्वर्गिक हवाएँ क्रोध से भरकर तूफान पैदा करने लगी जिससे सभी लंबे-लंबे वृक्ष जड़ समेत उखड़ने लगे और पर्वतों के शिखर भरभराकर टूटने लगे। आकाश में बिजली कौंध उठी और सैकड़ों धूमकेतु जल उठे और इनकी गर्जना सभी दिशाओं में गूँज उठी। समुद्र उफान मारने लगा और समस्त जीवधारी भय से त्राहि-त्राहि कर उठे, परंतु राम अविचल भाव से अपने निश्चय पर संकल्पबद्ध बने रहे।
अचानक समुद्र के जल की सतह से समुद्र देव बाहर निकले और राम के समक्ष आ खड़े हुए और उनके साथ मुख से अग्निवर्षा करते हुए अनेक सर्प थे । उफनती लहरों के कारण विशालकाय घड़ियालों, कछुओं व मछलियों के समुद्र बाहर फेंके जाने के कारण समुद्र-देव अपने तट पर आ पहुंचे। उनके पीछे-पीछे गंगा और सिंधु देवियों सहित अगणित नदियों की देवियों थीं। स्वर्ण आभूषणों से सुसज्जित व लाल पुष्पों की माला पहने व लाल वस्त्र धारण किए समुद्र देव दोनों हाथ जोड़कर राम के पास पहुँचे। समुद्र देव के चारों और बादल व वायु के घेरे थे।
समुद्र-देव बोले, हे महान रघु के सौम्य वंशज, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु व आकाश सदा-सर्वदा से अपने नैसर्गिक गुणों से ओत-प्रोत रहते हैं। जल का एक विशाल भंडार होने के कारण, नैसर्गिक रूप से मैं अलंघ्य व अगाध हूँ, इसलिए मुझे पार करना संभव नहीं है। हे राम, मात्र आपके लिए मैं यह छूट दे सकता हूँ कि आप मेरे जल को पार कर सकते हैं। यदि आप मुझ पर एक सेतु का निर्माण करें, तो मैं अपनी ऊर्जा के द्वारा इसके भार को संभालकर इसे जल की सतह पर तैरते रहने में सक्षम बनाकर आपको सहायता कर सकता हूँ। इस प्रकार वानर सैनिकों के झुंड लंका पर आक्रमण कर सकते हैं और आप अपनी प्रिय पत्नी सीता की रक्षा कर सकते हैं।
ब्रह्मास्त्र बाण को अपने कान तक खींचकर खड़े राम बोले, सबसे पहले, मुझे यह बताएँ कि मैं इस बाण को कहाँ चलाऊँ क्योंकि धनुष की प्रत्यंचा पर इसे चढ़ाने के बाद में इसे वापस नहीं रखना चाहता।
मानव रूप में अवतरित समुद्र देव बोले, उत्तर दिशा में द्रुमकूल्या नामक एक पवित्र स्थान है जहाँ पापी चोरों-लुटेरों का आभीर नामक एक भयानक जनजाति निवास करती है। वे समुद्र का जल पीते हैं और उनके पापमय स्पर्श से मुझे घृणा होती है। हे प्रभु, यदि आप अपना शक्तिशाली बाण उस स्थान पर चलाएँ, तो मुझे बहुत प्रसन्नता होगी।
समुद्र देव के अनुरोध पर राम ने द्रुमकूल्य को और अपना बाण चला दिया। ब्रह्मास्त्र ने जब धरती को भेदा, तो रसातल से आने वाला जल, बाण द्वारा बनाए गये। अतल गर्त में समा गया और वह सम्पूर्ण भूमिगत क्षेत्र सूख गया। जिस स्थान पर वह बाण गिरा उसे बाद में मरुकंटर के नाम से जाना गया और राम ने उस स्थान को यह बरदान दिया कि यह भूमि फलों-फूलों, शहद व समस्त प्रकार की जड़ी-बूटियों से समृद्ध हो जायेगी। यह स्थान गायें पालने के लिए सर्वोत्तम होगा और यहाँ रहने वाले लोग सभी रोगों से मुक्त रहेंगे।
मानव रूप में अवतरित समुद्र-देव बोले, मेरे प्रिय राम, यह दिव्य वास्तुशास्त्री विश्वकर्मा के पुत्र नल हैं। यह शक्तिशाली वानर आपका अनन्य भक्त है और यह अपने पिता के ही समान प्रतिभाशाली है। यह आपके द्वारा निर्मित किए जाने वाले पुल के निर्माण कार्य की देखरेख कर सकता है।
यह कहकर समुद्र देव अंतर्ध्यान हो गये। नल राम के सामने आये। राम को आदरपूर्वक प्रणाम करने के बाद, वह बोले, “कृतघ्न लोगों के साथ धैर्य, सुलह समझौता और उपहार जैसे गुण व्यर्थ होते हैं। मैं जानता हूँ कि समुद्र-देव ने दंड के भय से आपको रास्ता देना स्वीकार किया न कि कृतज्ञता के भाव से।
मेरे प्रिय भगवान्, बहुत समय पहले, मेरे पिता विश्वकर्मा ने मेरी माता को यह वरदान दिया था कि उन्हें मेरे पिता के समान ही प्रतिभाशाली पुत्र रत्न प्राप्त होगा। यही कारण है कि मुझे विश्वकर्मा के वास्तुशास्त्रीय और अभियांत्रिकी संबंधी समस्त कौशल उत्तराधिकार में प्राप्त हुए, इसलिए मैं यह सेतु बनाने में पूर्णतः सक्षम हूँ। मुझमें यह प्रतिभा हमेशा से ही रही है, परंतु आज से पहले कोई भी इस बारे में नहीं जानता था। ऐसा इसलिए है कि किसी ने भी मुझसे ऐसे कार्यों के बारे में नहीं पूछा और मुझे अपने गुणों का बखान करना पसंद नहीं है। मेरा सुझाव है कि वानर- गण सेतु के निर्माण के लिए आवश्यक सामग्रियाँ एकत्रित करने के काम में जुट जायें ताकि हम यथासंभव शीघ्रता से यह कार्य आरंभ कर सके।
इसके बाद, राम की देखरेख में सभी वानर वन में गये। बड़ी-बड़ी चट्टानें तोड़ने, वृक्षों को उखाड़ने और समूचे पर्वतों को खोदने के बाद, वे उन्हें समुद्र तट पर लेकर आये। जब इन विशाल चट्टानों और वृक्षों को समुद्र में फेंका जाने लगा तो पानी बहुत ऊपर तक उछलने लगा जिससे मंत्रमुग्ध कर देने वाला एक शानदार दृश्य दिखने लगा।
इस प्रकार से सौ योजन लंबे व दस योजन चौड़े सेतु का निर्माण कार्य आरंभ हुआ। पुल की सतह को वृक्षों के तने बिछाकर समतल किया गया और उनके ऊपर फूलों से लदी डालें बिछाई गई। निर्माण कार्य के दौरान, विभीषण और उसके मंत्रियों ने समुद्र तट की चौकसी की।
पहले दिन, चौदह योजन पुल निर्मित किया गया। दूसरे दिन इसके आगे के बीस यौजन, तीसरे दिन और इक्कीस योजन पुल निर्मित हुआ। चौथे दिन योजन निर्माण कार्य हुआ और पाँचवें दिन पुल बनकर तैयार हो गया।
देवतागण और दिव्य ऋषिगण इस शानदार पुल को निहारने के लिए आकार मंडल में जमा हो गये। गहरे नीले समुद्र के ऊपर बिछा यह पुल आकाश गंग के समान दिखाई देता था। सुग्रीव ने राम व लक्ष्मण से अनुरोध किया कि वे हनुम व अंगद की पीठ पर बैठ जायें। थोड़े ही समय में, हजारों कोटि वानरों की सम्पूर्ण सेना ने पुल पर कदमताल करते हुए आगे बढ़ना आरंभ किया।
लंका द्वीप में स्थित सुवेल पर्वत के पास उत्तरी समुद्र-तट पर पहुँचने के बाद वानर राज-विजय भाव से चिल्लाए सुग्रीव ने तंबू लगवाए और तब सभी महान देवगण और वहाँ पहुँचे। उन्होंने वानर राज सुग्रीव को पवित्र नदियों के जल कराया और उन्हें विजय प्राप्त करने का आशीर्वाद दिया।
राम ने लक्ष्मण को गले से लगाकर कहा, "यह सुनिश्चित करना तुम्हारा दायित्व है कि सेना सदैव सचेत रहे। मुझे अपशगुन के लक्षण यह भविष्यवाणी करते दिख रहे हैं कि वानरों भालुओं और राक्षसों के अनेक पराक्रमी शूरवीर मृत्यु को प्राप्त होंगे। जरा देखो तो, भयानक हवाएँ किस धूल के बवंडर उठा रही है।बीच बीच में धरती काँप रही है और काले बादलों से रक्त की वृष्टि हो रही है। सायं का प्रकाश रक्तवर्णी है और वन्य जीव जंतु करुणा स्वर में रो रहे हैं। हे लक्ष्मण मेरे विचार से हमें तत्काल सैन्य अभियान को आगे बढ़ाता चाहिए।
शीघ्र ही वानर गण लामबंद हो गये और जिस समय वे लंका की ओर आगे बढ़े, तब सभी राक्षसों को उनका गर्जन सुनाई दिया। त्रिकूट पर्वत के शिखर पर स्थित सोने की नगरी की ओर देखते हुए, राम का मन सीता के विचारों में खो गया। राम ने सेनापतियों को आदेश दिया कि वे सेना को मानव आकृति को संरचना में व्यवस्थित करें जिसके शीर्ष में स्वयं उन्होंने और लक्ष्मण ने स्थान ग्रहण किया। सभी वानरों ने बड़े-बड़े वृक्ष और विशाल चट्टानें उठा ली। लंका के निकट पहुँचने पर राम ने सुग्रीव को आदेश दिया कि शुक को छोड़ दिया जाये।
शुक वहाँ से रावण पास गया राक्षस राज ने जब देखा कि शुक के पंख काट दिए गये हैं, तो उसने हँसकर पूछा, "यह किसने किया ?
शुक में उत्तर दिया, "मैंने सुग्रीव की आपका संदेश सुना दिया, परंतु जब मैं संदेश दे रहा था तभी कुछ वानरों ने मुझे पकड़ लिया। मुझे बहुत मार- पीट लेने के बाद उन्होंने मेरे पंख काट दिए मर्यादा पुरुषोत्तम राम की दया के कारण ही मैं वहाँ से मुक्त हो सका। हे राजन, सीता को मुक्त कराने के लिए वानरों की सेना यहाँ पहुँच चुकी है। बेहतर यही है कि आप सीता को राम के पास लौटा दें या फिर लंका की चाहरदीवारी पर वानरों के झुंडों के चढ़ने से पहले हो उन पर आक्रमण कर दें।
रावण क्रोध से बोला मैं सीता को नहीं लौटाऊंगा। मैं राम और उनके सभी वानर सैनिकों का वध कर दूँगा, परंतु मैं यह जानकर वास्तव में हैरान हूँ कि वानरों ने यहाँ तक आने के लिए समुद्र पर पुल का निर्माण कर दिया। अब मैं चाहता हूँ कि तुम और सारण वानरों का वेश धारण करके गुप्त रूप से शत्रु की सेना के अंदर घुस जाओ और उनकी शक्ति का अनुमान लगाओ।
शुक और सारण आज्ञा का पालन करते हुए उस स्थान पर गये जहाँ वानरों ने तंबू लगा रखे थे परंतु वनों व पहाड़ों से लेकर समुद्र तट तक फैली सेना की विशालता के कारण, ये दोनों गुप्तचर सैनिकों की संख्या का आकलन करने का कार्य आरंभ तक नहीं कर पाए। तभी सतर्क विभीषण ने दोनों छद्म वेशधारी राक्षसों को पहचान लिया और उन्हें बंदी बनाकर वह राम के सामने ले आये।
अपने प्राणों के भय से शुक और सारण, दोनों ही, राम के सामने हाथ जोड़कर खड़े हुए और उनसे याचना करके बोले, हम यहाँ पर स्वयं अपनी इच्छा से नहीं आये हैं। हमें रावण ने यहाँ भेजा है ताकि हम आपकी सेना की शक्ति का आकलन कर सकें।
राम हँसकर बोले, यदि तुमने अपना कार्य पूरा कर लिया है, तो तुम लोग इसी समय रावण के पास लौट सकते हो, परंतु यदि अब तक तुम लोगों ने अवलोकन नहीं किया है, तो तुम बिना किसी भय के अपना कार्य पूरा कर लो और विभीषण तुम्हारा मार्गदर्शन करेंगे। हमारे आतिथ्य सत्कार के बदले में, मैं तुमसे अनुरोध करता हूँ कि रावण को मेरा यह संदेश देना, कल प्रातः काल के समय मैं और मेरी वानर सेना लंका नगरी पर आक्रमण करेगी और सभी राक्षसों का संहार कर देगी।
शुक और सारण ने कृतज्ञता के भाव से भगवान् राम को नमन किया और बोले, ईश्वर आपको विजयी बनाएँ!
वह लोग शीघ्र ही रावण के पास लौट गये और उससे बोले, हमें विभीषण ने बंदी बना लिया था, परंतु पवित्रात्मा और उदार हृदय राम ने दया दिखाकर हमें मुक्त कर दिया। शत्रु सेना की विशालता के कारण हमारे लिए यह असंभव था कि हम उसका अनुमान लगा सकें। परंतु, हम आपको आश्वस्त कर सकते हैं कि राम लक्ष्मण सुग्रीव और विभीषण यदि चाहें तो वानरों की सहायता के बिना ही लंका को जड़ सहित उखाड़कर ले जा सकते हैं। सच तो यह है कि हम इस बात पर भी पूर्णतः सहमत हैं कि राम अकेले ही सभी राक्षसों का वध करके लंका को ध्वस्त करने में समर्थ हैं। इसलिए, हम आपको यही सलाह देते हैं कि आप सीता को राम के पास ले जाकर उनसे मित्रता कर लें।
रावण बोला, मैं सीता को कभी भी वापस नहीं करूँगा, भले ही समस्त देवता और असुर एकसाथ मिलकर ही मुझ पर आक्रमण क्यों न कर दें। तुम ऐसी बकवास इसलिए कर रहे हो क्योंकि वानरों ने तुम्हें मार-पीटकर डरा दिया है। भला मुझे डरने की क्या आवश्यकता है ?
इसके बाद, रावण अपने दोनों गुप्तचरों के साथ अपने राजमहल की छत पर चढ़ गया ताकि वह शत्रु को अच्छी तरह देख-परख सके। रावण ने सारण से कहा कि वह वानर सेनापतियों की तरफ इशारा करके उनकी पहचान उजागर करे। जवाब में, सारण ने अपने स्वामी को सभी पराक्रमी नायकों को दिखा दिया जिनमें हनुमान, सुग्रीव, अंगद, मैंदा, द्विविद, श्वेत, पांस, विनत, गवय के साथ ही भालुओं के सेनापति धूम्र और उनके छोटे भाई जाम्बवान शामिल थे। उनकी तरफ इशारा करते हुए, सारण ने उनकी शारीरिक विशेषताओं और निवास स्थानों के बारे में भी बताया और उनकी अतुलनीय शक्ति की प्रशंसा की।
इसके बाद, शत्रु सेना को विशालता का वर्णन करते हुए, सारण ने गणना की वैदिक प्रणाली का वर्णन करते हुए कहा : 1,00,000 को एक लक्ष (लाख) कहते है। 100 लाख का अर्थ एक कोटि (करोड़) होता है। एक लाख करोड़ को शंख व एक लाख शंख को महा-शंख कहते हैं। एक लाख महा-शंख को वृंद, व एक लाख वृंद को महा-वृंद कहते हैं। एक लाख महा-वृंद को पद्म, व एक लाख पद्म को महापद्म कहा जाता है। एक लाख महापद्म को खर्व, व एक लाख खर्व को महा-खर्व कहते हैं। एक लाख महा खर्व को समुद्र तथा एक लाख महा-समुद्र को ओष कहते हैं। एक लाख ओघ को महा-औध कहते हैं और इस प्रकार सारण ने बताया कि वानरों की सेना में कम से कम १०० करोड़ महा-औध सैनिक हैं।
राम, लक्ष्मण व अन्य वानर नायकों को देखने के बाद, रावण अत्यधिक क्रोधित हो उठा और उसका हृदय उत्तेजित हो उठा। रावण अपने क्रोध पर संयम रखने की बहुत अधिक कोशिश कर रहा था, परंतु तब भी शुक व सारण के लटके हुए सिरों को देखकर, रावण ने उन्हें बहुत डाँटा-फटकारा।
रावण बोला, तुम लोग मेरे मंत्री हो, परंतु तब भी तुम शत्रु की प्रशंसा कर रहे हो। तुम्हारी वाणी कटु है। तुम दोनों ही मूर्ख हो और तुम लोगों को राजनीति-शास्त्र का बिल्कुल भी ज्ञान नहीं है। निश्चित ही में अत्यन्त भाग्यशाली हूँ जो तुम जैसे मूढ़ अज्ञानियों के रहते हुए भी इतने लंबे समय तक अपनी संप्रभुता को बनाए रखें सका। भला तुम इतनी मूर्खतापूर्ण बातें कैसे कह सकते हो ? क्या तुम्हें मृत्यु का भी कोई भय नहीं है? तुम्हारी पिछली सेवाओं का ध्यान करके ही मैं तुम लोगों का तत्काल वध नहीं कर रहा हूँ।
रावण की डाँट फटकार को सुनकर शुक और सारण बहुत लज्जित हुए अपने स्वामी को शांत करने का प्रयास करते हुए बोले, "हे राजन, ईश्वर आपको विजयी बनाए। यह कहकर शुक और सारण वहाँ से प्रस्थान कर गये।
फिर रावण ने वहीं पास में खड़े महोदर को कुछ अन्य गुप्तचरों को भेजन का आदेश दिया। कुछ ही समय में, शार्दूल और अन्य गुप्तचर रावण की जय-जयकार करते हुए वहाँ पहुंचे। रावण द्वारा शत्रु के खेमों में जाने और शत्रु की योजनाओं का पता लगाने का आदेश मिल जाने पर इन गुप्तचरों ने रावण को प्रदक्षिणा की और राम के खेमे की ओर प्रस्थान कर गये। उन्होंने वानरों का वेश धारण किय हुआ था, परंतु तब भी विभीषण ने उन्हें शीघ्र ही पहचान लिया और उन्हें बंदी बना लिया। कुछ वानरों ने शत्रु के गुप्तचरों को मारना पीटना शुरू कर दिया, परंतु जैसे ही राम का ध्यान उनकी तरफ गया उन्होंने कृपापूर्वक उन्हें छोड़ दिए जाने का आदेश दिया।
आश्चर्य से चकित होकर लंका लौट आने पर, शार्दूल और उसके अनुयायी रावण के पास गये और उसे सूचित करके बोले, वानर सेना ने सुवेल पर्वत के पास डेरा डाल रखा है, परंतु इसकी जासूसी करना संभव नहीं है। हमारे वहाँ पहुँचते ही, विभीषण ने हमें पहचान लिया। राम की कृपा से ही हम यहाँ जीवित लौट पाए हैं।
हे राजन, ऐसा जान पड़ता है कि राम न केवल समस्त राक्षसों का संहार करने में समर्थ हैं बल्कि वह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को नष्ट करने में भी समर्थ हैं। किसी भी स्थिति में, आपको या तो सीता को राम के पास वापस भेज देना चाहिए, या फिर वानरों के लंका की चाहरदीवारी तक पहुँचने से पहले शीघ्रातिशीघ्र राम की सेना के साथ युद्ध करने की तैयारी कर लेनी चाहिए।
रावण ने कुछ क्षण शार्दूल की कही बात पर विचार किया और फिर बोल् मैं किसी भी स्थिति में, कभी भी सीता को वापस नहीं करूँगा।
फिर अपने कक्ष में वापस लौट आने के बाद, रावण ने विधुज्जिह्वा को बुलवाया। विद्युज्जिह्वा छल-कपट के करतब करने में माहिर था। रावण उससे बोला, मैं चाहता हूँ कि तुम राम का एक छद्म सिर तैयार करो और साथ ही उनके पराक्रमी धनुष और एक बाण की सचमुच जैसी नकल तैयार करो। मैं अशोक वाटिका में सीता से भेंट करने जा रहा हूँ और तुम भी वहीं आस-पास में छुपे रहना। जब मैं तुम्हें बुलाऊँ, तो तुम अपनी ये जादुई चीजें लेकर मेरे पास आना।
सीता से भेंट करने की उत्सुकता से भरकर, रावण अशोक वाटिका को चला गया। राजा जनक को दुखी पुत्री के पास पहुँचकर, रावण ने घोषणा की, मेरे सेना प्रमुख ने राम का वध कर दिया है, इसलिए अब तुम्हें अपनी हठधर्मिता का त्याग करके मेरी प्रिय रानी बन जाना चाहिए। मैं तुम्हें बताता हूँ कि यह सब कैसे हुआ। राम ने जब समुद्र को पार किया, तब तक रात हो चुकी थी। अत्यन्त थके होने के कारण, राम, लक्ष्मण और सभी वानर गण समुद्र-तट पर ही सो गये।
रात के अंधेरे में, पराक्रमी राक्षस योद्धा वहाँ गये और उन्होंने वानरों का वध करना आरंभ कर दिया। प्रहस्त ने गहरी नींद में सो रहे राम का सिर काट लिया। लक्ष्मण, हनुमान व अन्य ढेरों वानर प्रमुख भी मारे गये, जबकि अन्य वानर किसी तरह वहाँ से जान बचाकर भाग गये हे सुंदरी, तुम्हें अपनी बात की सत्यता का प्रमाण देने मात्र के लिए मैंने राम का कटा हुआ सिर मंगवाया है।"
रावण ने वहाँ की पहरेदारी करने वाली एक राक्षसी को विद्युजिह्वा को बुलाने के लिए भेजा। एक ही क्षण में, वह मायावी जादूगर राम का नकली सिर व एक धनुष तथा एक बाण लेकर वहाँ पहुँच गया। रावण बोला, "देखो, अपने पति के रक्त रंजित सिर को देखो!
विद्युजिहा की ओर देखकर रावण बोला, राम का कटा हुआ सिर सीता को दो। उसे अपने मृत पति के अंतिम अवशेष को देख लेने दो।
रावण के आदेश का पालन करते हुए विद्युज्जिह्वा ने वह मायावी सिर सीता के चरणों पर रख दिया और तत्काल वहाँ से चला गया। रावण ने मायावी धनुष लिया और इसे सीता के सामने फेंककर आदेश देने वाले स्वर में बोला, अब कोई आशा नहीं बची है, इसलिए मेरे सामने समर्पण कर दो!
मायावी सिर का रूप हूबहू राम के समान था और जब सीता ने इसे देखा, तो वह करुण स्वर में चीख उठी, हे कैकेयी, देखो तुम्हारी दुष्टता भरी योजनाओं का क्या परिणाम हुआ है। तुम्हारी मनोकामना अब पूरी हो गई है और निश्चित ही अब तुम बहुत प्रसन्न हो गई होगी।
सीता फफक-फफककर रोए जा रही थी और उनको सम्पूर्ण देह काँप रही थी। यह कहने के बाद, वह ठीक उसी प्रकार अचेत होकर जमीन पर गिर पड़ी जैसे तेज हवाओं से कोई कैले का वृक्ष जड़ सहित उखड़कर गिर जाता है।
कुछ समय बाद जब उनकी चेतना लौटी, तो वह मायावी सिर के पास बैठकर विलाप करने लगीं, हे राम! आपके नहीं रहने पर, में विधवा हो गई हूँ, इसलिए
अभी मेरा भी अंत हो गया है। किसी स्त्री के लिए इससे बड़ा अनर्थ भला क्या हो सकता है कि उसके जीवित रहते हुए उसके पति की मृत्यु हो जाये? ओह मैं कितनी अभागी और पापिन हूं कि मैं स्वयं ही अपने पति के मृत्यु का कारण बन गई , केवल मेरी खातिर ही अपने समुद्र पार किया और युद्ध किए बिना ही मृत्यु को प्राप्त हो गये, मुझसे विवाह करते समय भला राम को कहाँ पता था कि उनका विवाह उनकी मृत्यु के साथ हो रहा है। मैं विश्वास के साथ कह सकती हूँ कि पूर्वजन्म में मैंने किसी अबला युवती के विवाह में बाधा डाली होगी, तभी इस जन्म में मैं यह दुख भोग रहीं हूँ। हे राम। क्या आप मेरे बिना ही दूसरे लोक को चले गये?
फिर रावण की ओर मुड़कर, सीता बोली, मुझे उस स्थान पर ले चलो जहाँ राम का शरीर पड़ा हुआ है। जब मैं उनके शरीर पर लेट जाऊँ, तो तुम मुझे भी मार सकते हो ताकि मैं अपने पति के पास पहुँच सकूँ।
तभी एक दूत ने आकर रावण को सूचना दी कि प्रहस्त एक अत्यावश्क कारण से मंत्रियों को सभा में रावण को उपस्थित होने का अनुरोध कर रहे हैं। रावण चला गया और उसके जाते ही वह मायावी सिर तथा धनुष सीता की नजरों से ओझल हो गये।
सभा में पहुँचने पर, रावण ने अपनी सेना को लामबंद होने का आदेश दिया। इस प्रकार बिना अधिक विचार-विमर्श के युद्ध की तैयारियाँ आरंभ हो गई। तभी विभीषण की पत्नी, सरमा अशोक वाटिका में सीता को सांत्वना देने आई। सरमा ने रावण के आग्रह पर सीता से पहले ही मित्रता कर ली थी, क्योंकि रावण को सन्देह था कि अत्यधिक दुख के कारण कहीं सीता की असमय ही मृत्यु न हो जाये।
सरमा बोली, मैं एक झाड़ी के पीछे छुपी थी, इसलिए मैं यहाँ घटित हो रही सारी घटनाएँ देख और सुन पा रही थी मैं तुम्हें आश्वस्त करती हूँ कि राम मरे नहीं है। जो सिर आपने देखा वह मायावी कला में माहिर एक राक्षस द्वारा निर्मित मायावी सिर था। सच तो यह है कि राम लंका पहुँच चुके हैं और उनके साथ लक्ष्मण व वानरों को एक विशाल सेना है। इस समय वे रावण पर आक्रमण करने की तैयारी कर रहे हैं। यही कारण है कि राक्षस-राज अचानक ही अत्यन्त उत्तेजित अवस्था में यहाँ से चले गये। वह जानते हैं कि वह राम को और राम के संरक्षण में स्थित वानर शूरवीरों को पराजित नहीं कर सकते।
मुझे यहाँ पर भी राक्षसों द्वारा की जा रही तैयारियों की आवाजें सुनाई दे रही हैं क्योंकि शीघ्र ही दो सेनाओं के बीच एक भयानक युद्ध होने वाला है। हे सीता आप चिंता नहीं करें क्योंकि निःसन्देह ही राम रावण का वध कर देंगे। यदि आप राम को कोई संदेश भिजवाना चाहें, तो में इसी समय जाकर उन्हें यह संदेश दे सकती हूँ।
यह सुनकर सीता ने चैन की साँस ली। सीता बोलों, हे सरमा, राम के पास संदेश ले जाने से बेहतर यह है कि आप इसी समय जाकर रावण की योजनाओं का पता लगाएँ। क्या वह मुझे राम के पास लौटाने वाला है या फिर वह उनके साथ युद्ध करने वाला है?
सरमा मंत्रि-परिषद में छुपकर पहुँची और मंत्रियों के साथ रावण के जारी वार्तालाप को सुनने लगी। अपना कार्य पूरा करके वह सीता के पास लौटी और इनसे बोली, मैंने छुपकर सुना कि अनेक बुजुर्ग मंत्रियों ने रावण को यह सलाह दी कि वह आपको राम के पास भेज दे। उन लोगों ने विस्तार से राम की शक्तियों का बखान किया ताकि वे रावण को इसके लिए राजी कर सकें। रावण की माता कैकशी ने भी अपने पुत्र से आग्रह किया कि वह शान्ति बनाए रखने के लिए आपको राम के पास लौटा दें।
परंतु रावण जिद पर अड़ा रहा और में भलीभांति यह समझ रही थी कि वह अपनी मृत्यु के समय ही आपका त्याग करने के लिए संकल्पबद्ध है। यहाँ तक कि अभी सभा चल ही रही थी कि रावण को शंख ध्वनि, ढोल नगाड़ों के बजने की आवाजें और वानरों की गर्जन ध्वनियाँ सुनाई दीं। तब रावण के नाना, माल्यवान ने रावण को समझाया।
माल्यवान बोले, 'बुद्धिमान राजा वह होता है जो अपने से अधिक शक्तिशाली शत्रु के साथ युद्ध में नहीं उलझता। इसलिए, मैं तुम्हें यही सलाह दूँगा कि सीता को राम के पास भेज दो और उनके साथ शान्तिपूर्ण संबंध स्थापित कर लो। अन्यथा, हे रावण, तुम इस बात के प्रति आश्वस्त रहो कि धर्म ने तुम्हारे अधर्म पर विजय प्राप्त करने के लिए मानव अवतार लिया है। ब्रह्माजी ने तुम्हें जो वरदान दिए थे वे मनुष्यों या वानरों के हाथों मृत्यु से तुम्हारी प्राण-रक्षा करने का वचन नहीं देते। इस कारण से तुम्हें अत्यन्त सावधानीपूर्वक यह विचार करना चाहिए कि तुम कितनी भयानक स्थिति में फँसे हुए हो, मेरे प्रिय नाती, कृपा करके मेरी अच्छी सलाह मान लो।
अनेक अपशगुन दिखाई दे रहे हैं जो यह पूर्वसंकेत कर रहे हैं कि लंका का विनाश निश्चित है। गरजते हुए बादल रक्त की वर्षा कर रहे हैं। हमारे अश्वों और हाथियों की आँखों में आँसू भरे हुए हैं। माँस खाने वाले पशु निर्भय होकर उद्यनों में विचरण कर रहे हैं और अपशगुनकारी ढंग से विलाप कर रहे हैं। राक्षसों को स्वप्न में पीले दाँतों वाली काली स्त्रियाँ दिख दे रही हैं जो उनके घरों को लूटने के बाद उनके सामने हँसती हुई खड़ी हो रही हैं। कुत्ते यज्ञ की सामग्रियाँ खा रहे हैं। एक प्रजाति के पशु किसी अन्य प्रजाति के पशु के साथ संभोग करते हुए देखे जा रहे हैं। प्रतिदिन सुबह व संध्या के समय, मानव रूप में स्वयं समय, सिर मुड़ाए हुए विशाल काली आकृति धारण करके लंका के घरों में झाँकते हुए देखा गया है।
हे रावण, मेरे विचार से राम स्वयं भगवान् विष्णु के मानव अवतार हैं। इसलिए बेहतर यही है कि तुम उनके पास जाकर आत्म-समर्पण कर दो ताकि तुम्हें इस विपत्ति से छुटकारा मिल सके।
सरमा ने सीता को पूरी घटना बताना जारी रखा, परंतु, रावण ने यह अच्छी सलाह नहीं मानी। वह क्रोधपूर्वक बोला, तुम दोगले हो क्योंकि तुम शत्रु का पक्ष ले रहे हो। राम की शक्तियों का गुणगान करने को तुम बहुत उत्सुक हो, परंतु मेरे बारे में तुम्हारा क्या विचार है? मैं जानता हूँ कि तुम शत्रु की प्रशंसा इसलिए कर रहे हो क्योंकि तुम मुझसे ईर्ष्या करते हो, या फिर तुम राम के पक्ष में जाना चाहते हो, या फिर तुम उनसे भयभीत हो, परंतु मैं तुम्हें आश्वस्त करता हूँ कि शीघ्र ही तुम मेरे हाथों राम का वध होते हुए देखोगे।
माल्यवान चुप रहे। राजा को उचित आदर-सम्मान देने के बाद, वह अपने महल लौट गये। इसके बाद, रावण ने प्रहस्त को पूर्वी द्वार पर, महापार्श्व व महोदर को दक्षिणी द्वार पर, इंद्रजित को पश्चिमी द्वार पर, शुव व सारन सहित स्वयं को उत्तरी द्वार पर और विरुपाक्ष को नगर के मध्य में नियुक्त करके लंका की प्रतिरक्षा करने की व्यवस्था की। इसके बाद, रावण ने सभा भंग कर दी और अपने राजमहल के भीतरी कक्षों को चला गया।
इस बीच, राम और वानर सेना जब लंका पहुँच गये, तो उन्होंने आपस में विचार-विमर्श किया कि नगर पर अधिकार जमाने का श्रेष्ठ तरीका क्या होगा। विभीषण बोले, मैंने अपने मंत्रियों-अनल, संपति, पानस और प्रमति के साथ पक्षी का रूप धारण करके रावण की सैन्य व्यवस्था का सर्वेक्षण किया। मेरे प्रिय राम, मुझे पूर्ण विश्वास है कि जिस तरह बहुत समय पहले रावण ने साठ लाख राक्षसों के साथ लंका पर आक्रमण करके कुबेर को पराजित किया था, उसी प्रकार आप भी इन वानरों के दल की सहायता से अवश्य ही विजय प्राप्त करेंगे।
तब राम ने इस प्रकार आदेश दिया, नील पूर्वी द्वार पर प्रहस्त के विरुद्ध होने वाले आक्रमण का नेतृत्व करेंगे। अंगद दक्षिणों द्वार पर महापार्श्व व महोदर के साथ होने वाले युद्ध का नेतृत्व करेंगे। पश्चिमी द्वार पर आक्रमण का नेतृत्व हनुमान करेंगे। लक्ष्मण और मैं उत्तरी द्वार पर रावण से युद्ध का नेतृत्व करेंगे। सुग्रीव, जाम्बधान तथा विभीषण हमारी सेना के मध्य में रहेंगे और जिस स्थान पर सहायता को आवश्यकता होगी वहीं सहायता प्रदान कराएँगे। मैं चाहता हूँ कि लक्ष्मण, विभीषण, विभीषण के चार मंत्री और मैं अर्थात केवल हम सात लोग ही मानव रूप में युद्ध करें। अन्य सभी अपने वानर रूप में ही रहें, ताकि हम आसानी से उन्हें राक्षसों से अलग करके पहचान सकें।
सूर्य क्षितिज के नीचे डूबने लगा था, इसलिए राम, लक्ष्मण व अन्य वानर प्रमुख रात बिताने के लिए सुवेल पर्वत पर चढ़ गये। अंधकार छा जाने पर भी, पर्वत-शिखर से उन्हें लंका का मनोहारी दृश्य दिखाई दिया। अगणित चमचमाती रोशनियों से भरा नगर ऐसा दिखता था मानो वह आकाश में झूल रहा हो और वहाँ से युद्ध के लिए तैयार राक्षसों को देखा जा सकता था।
अगली सुबह सूर्य के प्रकाश में फूलों से आच्छादित उद्यानों वाले, दिव्य वृक्षों व संगीतमय सुर में चहचहाती पक्षियों से परिपूर्ण स्वर्ग के समान सुंदर लंका नगरी को देखकर हर कोई आश्चर्यचकित रह गया। त्रिकूट पर्वत के समतल बनाए गये शिखर पर स्थित मनोरम लंका नगरी बहुत विशाल थी चाहरदीवारी से घिरी यह नगरी बीस योजन लंबी और दस योजन चौड़ी थी और इसके बीचो-बीच 1000 स्तंभों के ऊपर खड़ा रावण का अत्यन्त सुंदर राजमहल स्थित था। राम अत्यन्त प्रशंसापूर्ण नेत्रों से नगरी को निहार रहे थे कि तभी उनकी नजर उत्तरी द्वार के शीर्ष पर चढ़े रावण पर पड़ी। रावण के सिर के ऊपर चंदोवा लगा था और उसके निजी सेवक उसे पंखा झल रहे थे।
सुग्रीव ने अनेक वानरों को एक पर्वत शिखर से दूसरे पर्वत-शिखर पर छलाँग लगाते हुए आगे बढ़ने और लंका नगरी के बाहरी उद्यानों पर अधिकार करने का आदेश दिया। तभी सुग्रीव ने भी रावण को देखा और तत्क्षण ही वह सुवेल पर्वत में छलाँग लगाकर राक्षस-राज के आसन के सामने पहुँच गये। अत्यधिक घृणा से रावण को कुछ क्षण तक देखने के बाद, सुग्रीव ने घोषणा की, मैं भगवान् राम का एक सेवक हूँ और मैं आज ही तुम्हारा वध कर दूंगा।
यह कहकर सुग्रीव ने अचानक ही रावण पर छलाँग मारी और उसके राजमुकुट को उसके सिर से नीचे गिरा दिया। रावण हालाँकि चौंक गया था परन्तु उसने किसी तरह सुग्रीव को पकड़ लिया और फिर उसने भी उसी प्रकार सुग्रीव को धमकाते हुए वानर राज को जमीन पर पटक दिया। परंतु सुग्रीव रबर की गेंद के समान उछलकर वापस लौट आये और रावण को पकड़कर पूरी शक्ति के साथ उसे जमीन पर पटक दिया।
इन दोनों शूरवीरों के बीच भयानक द्वंद्व युद्ध ठन गया और दोनों ही एक-दूसरे को नाखूनों से नोंचने- खरोचने लगे जिसके कारण दोनों ही रक्त और पसीने से लथपथ हो गये। बहुत देर तक एक-दूसरे को मुक्के मारने और एक- -दूसरे से मल्ल युद्ध करने के बाद, सुग्रीव और रावण अचानक द्वार के ऊपर से चाहरदीवारी व खाई के बीच की जगह पर गिर पड़े। परंतु ये दोनों ही तत्काल अपने पैरों पर खड़े हो गये और उन्होंने युद्ध जारी रखा और धीरे-धीरे मल्ल युद्ध की सम्पूर्ण कला का प्रदर्शन करने लगे।
अंततः, रावण यह समझ गया कि केवल शारीरिक शक्ति के बल पर वह सुग्रीव को पराजित नहीं कर सकता है, इसलिए उसने अपनी मायावी शक्तियों का प्रयोग करना आरंभ कर दिया। यह देखकर सुग्रीव ने युद्ध छोड़ने का निर्णय लिया। वह हवा में छलाँग लगाकर वापस उसी स्थान पर लौट आये जहाँ पर राम थे।
इस प्रकार का पराक्रमी प्रदर्शन करने पर सुग्रीव को अत्यधिक प्रसन्नता हुई और उनके अनुयायी उत्साह से भरकर ऊपर-नीचे कूदने लगे। राम ने सुग्रीव के पास जाकर उन्हें गले से लगाया, पर साथ ही वह प्रेम से विभोर होकर उन्हें झिड़कते भी लगे।
राम बोले, आपने बहुत जल्दबाजी से काम लिया, क्योंकि आपको ऐसा कोई कार्य मेरी अनुमति के बिना नहीं करना चाहिए। इसके अतिरिक्त, एक राजा को इस प्रकार का खतरा मोल नहीं लेना चाहिए क्योंकि एक राजा की मृत्यु होने पर सम्पूर्ण राज्य पर घोर विपत्ति टूट पड़ती है। हे सुग्रीव, यदि रावण ने आपका वध कर दिया होता, तो निश्चित ही इसकी प्रतिक्रिया के रूप में मैं उसका वध कर देता। इसके बाद, विभीषण को लंका के सिंहासन पर आरूढ़ करके और भरत को अयोध्या का राजसिंहासन सौंपकर, मैंने स्वयं अपनी उपस्थिति में आपका वध कर दिए जाने के शोक से अपने प्राण त्याग दिए होते।
सुग्रीव बोले, सीता का अपहरण करने वाले उस पापी रावण को देखते ही मैं स्वयं को नहीं रोक सका।
राम बोले, कोई बात नहीं। आपने अपने पराक्रम का अदभुत प्रदर्शन किया और सभी वानर सैनिक आपके साहस व शक्ति के इस उदाहरण को देखकर प्रेरित हुए हैं।
इसके बाद, लक्ष्मण का रुख करके, राम बोले, विभिन्न प्रकार के पूर्वसूचक लक्षणों को देखकर मैं यह समझ गया हूँ कि शीघ्र ही भारी संख्या में प्रमुख वानरों भालुओं तथा राक्षसों का विनाश होगा। चलो अब समय गँवाए बिना हम लंका पर आक्रमण कर दें।
राम सुवेल पर्वत पर चढ़ गये। अपनी सैन्य टुकड़ियों का आकलन करने के वाद उन्होंने हाथ में धनुष लेकर लंका की ओर आगे बढ़ना आरंभ किया, जबकि वानर-गण उखाड़े हुए वृक्षों व चट्टानों को हाथ में पकड़े हुए उनके पीछे-पीछे बढ़ने लगे। शीघ्र ही वे लंका नगरी को चाहरदीवारी पर पहुँच गये। राम ने उत्तरी द्वार के बाहर की स्थिति संभाल ली, नील ने पूर्वी द्वार के बाहर मोर्चा संभाला, अंगद ने दक्षिणों द्वार के बाहर मोर्चा लिया और हनुमान पश्चिमी द्वार को और बढ़े। सुग्रीव ने उत्तरों और पश्चिमो द्वारों के बीच अपनी सेना सजायी और इस प्रकार वानरों ने चाहरदीवारी से घिरी लंका नगरी को चारों तरफ से घेर लिया व आक्रमण की प्रतीक्षा करने लगे।
अगणित वानर सैनिकों द्वारा खाई और चाहरदीवारी के बीच मोर्चा जमाकर लंका को चारों तरफ से घेर लिया गया देखकर राक्षस योद्धा चकित रह गये। हाथों में अस्त्र-शस्त्र धामे, राक्षस प्रमुख भयभीत मुद्रा में रावण के राजमहल की तरफ अपने राजा को यह सूचना देने भागे कि लंका नगरी हाथ से निकलने ही वाली है। सूचना पाकर, रावण जल्दी-जल्दी अपने महल के छज्जे की तरफ स्थिति का आकलन करने दौड़ा।
रावण ने देखा कि अनगिनत वानरों से भरी होने के कारण पूरी पृथ्वी भूरे रंग की दिखने लगी है और यह देखकर वह घोर आश्चर्य से भर उठा। रावण बहुत देर तक बिना हिले-डुले राम की और एकटक देखता रहा और हैरान होकर यह सोचता रहा कि अब क्या किया जाये।
राम ने अंगद को आदेश दिया कि वह उनके दूत के रूप में रावण के पास जाकर उनका संदेश पहुँचाएँ। हवा में ऊँची छलाँग लगाकर, अंगद शीघ्र ही रावण के सामने जाकर खड़े हो गये। उस समय रावण उत्तरी द्वार के शीर्ष पर अपने मंत्रियों से घिरा हुआ बैठा था।
रावण से कुछ दूरी बनाकर खड़े, अंगद ने घोषणापूर्वक कहा,मेरा नाम अंगद है मैं सुग्रीव का भतीजा और किष्किंधा के सिंहासन का उत्तराधिकारी हूँ। मैं भगवान राम द्वारा दिए गये संदेश को पहुँचाने के लिए दूत के रूप में यहाँ आया हूँ। भगवान् राम का संदेश है कि 'हे राक्षस-राज, तुम्हारे समस्त पुण्य कार्यों का प्रभाव समाप्त हो गया है और तुमने ऋषि-मुनियों पर जो अत्याचार किए हैं उनके प्रतिकारस्वरूप मैं तुम्हारा वध करने वाला हूँ। यदि तुम स्वेच्छा से तत्काल मेरे सामने आत्म-समर्पण नहीं करते, तो मैं सम्पूर्ण धरा से राक्षसों का नामो-निशान मिटा दूँगा। या तो मेरी शरण में आ जाओ, अन्यथा मुझसे युद्ध करो ताकि मैं अपने जानलेवा बाणों के प्रहार से तुम्हारा दूषित रक्त बहाकर तुम्हें शुद्ध कर सकूँ। यदि तुम सीता को वापस नहीं लौटाते और मेरे सामने शीश नहीं झुकाते, तो मेरी तुम्हें सलाह है कि लंका नगरी को अंतिम बार जी भरकर देख लो।
यह सुनकर, रावण का क्रोध भड़क उठा। उसने अपने मंत्रियों को आदेश दिया कि वे अंगद को पकड़कर उसका वध कर दें। अंगद को पकड़ने के लिए चार राक्षस आगे बढ़े, तो अंगद ने उन्हें स्वयं को बंदी बनाने दिया क्योंकि वह अपनी श्रेष्ठ शक्तियों का प्रदर्शन करना चाहते थे। तब अचानक ही, अंगद ने अपनी भुजाएँ पकड़े हुए चारों राक्षसों सहित रावण के राजमहल के शिखर पर छलाँग लगा दी। अंगद की छलाँग की शक्ति से राक्षसों की पकड़ ढीली पड़ गई और वे रावण के देखते-देखते जमीन पर गिर पड़े। इसके बाद अंगद ने राजमहल की छत पर अपने पैरों से प्रहार किया जिससे वह भरभराकर गिरने लगी और रावण असहाय भाव से अपनी आँखों के सामने यह सब होते हुए देखता रहा।
इस प्रकार राक्षस-राज का मान मर्दन करने के बाद, अंगद ने भयानक हुँकार भरी और उस स्थान को वापस लौट गया जहाँ राम खड़े थे। अंगद की शक्तियों को देखने के बाद, रावण को अपने विनाश का पूर्वाभास होने लगा और तब वह बार-बार गहरी साँस भरने लगा।
ठीक तभी, राम का मन एक बार फिर सीता की दयनीय दशा के बारे में सोचने में डूब गया, इसलिए उन्होंने अपनी सेना को आदेश दिया, राक्षसों का शीघ्रता से संहार कर दो!
यह सुनते ही, वानर-गण विजय-ध्वनि से नारे लगाने लगे, "राम व लक्ष्मण की विजय हो । वानरों की गर्जन ध्वनि से सम्पूर्ण लंका नगरीस गूंज उठी। वानर योद्धाओं ने वृक्षों व चट्टानों से प्रहार करके सुरक्षात्मक चाहरदीवारी को तोड़ने के बाद उसे पार करना आरंभ कर दिया। यह देखकर, रावण ने अपनी सैन्य टुकड़ियों को जल्दी- जल्दी आगे बढ़ने का आदेश दिया और भयानक गर्जन-ध्वनि के बीच घनघोर युद्ध छिड़ गया।
राक्षसों ने अपनी गदाओं व अन्य अस्त्र-शस्त्रों से वानरों पर प्रहार किया, जबकि वानरों ने वृक्षों व शिलाओं से और साथ ही अपने पंजों व दाँतों से राक्षसों पर आक्रमण कर दिया। सुरक्षात्मक चाहरदीवारी पर मोर्चा जमाए राक्षसों ने अनेक वानरों को अपने अस्त्र-शस्त्रों से घायल किया। ठीक उसी समय, अनगिनत वानरों ने छलाँग लगाई और राक्षसों को बलपूर्वक जमीन पर गिराकर घसीटना आरंभ कर दिया और इस तरह से शीघ्र ही धरती पर चारों तरफ रक्त व माँस का कांचड़नुमा मिश्रण भर गया।
हनुमान ने जाम्बुमाली से, अंगद ने इंद्रजित से, नील ने निकुंभ से और सुग्रीव ने प्रघास से मोर्चा लिया और मारे गये योद्धाओं के शव उस भवानक नरसंहार से बनी रक्त की नदियों में प्रवाहित होने लगे।
इंद्रजित ने अंगद पर अपनी गदा से प्रहार किया, परंतु राजकुमार ने चतुराई से उसे अपने हाथों से पकड़ लिया और उसे इंद्रजित के रथ पर पटक दिया। जम्बुमाली ने एक भाले से हनुमान को वेध दिया, परंतु पवन पुत्र ने उस राक्षस के रथ पर छलाँग लगा दी और अपने थप्पड़ के प्रहार से उसका अंत कर दिया। राम, सुग्रीव व नल ने अगणित राक्षसों का संहार किया और इस प्रकार वानरों की पराक्रमी सेना ने शत्रु सेना को भारी क्षति पहुँचाई। उस भयानक युद्ध में, राक्षसों व वानरों के अगणित सिर-विहीन घड़ यत्र-तत्र बिखरे हुए थे जिससे युद्ध क्षेत्र भयंकर जुगुप्सापूर्ण दिखने लगा था।
अंततः रात घिर आई। अंधेरे में वानर पूछते, क्या तुम वानर हो ? और जैसे ही किसी को शत्रु का पता चलता तो उस पर अत्यन्त शत्रुतापूर्वक हमला किया जाता। हालांकि अपने सुनहरे कवच के कारण राक्षस आसानी से दिखाई दे जाते थे, परंतु अपने स्वभाव के कारण वे रात के समय अत्यन्त सचेत और शक्तिशाली हो जाते थे। दोनों पक्षों को बहुत अधिक हानि उठानी पड़ी।
राक्षसों के झुंडों ने अंधेरे में राम पर आक्रमण किया और उनके घनघोर गर्जन ने बहुत अधिक शोर उत्पन्न किया। गोलंगुल नामक महाकाय वानर को अपने एक तरफ और जाम्बवान के भाई धूम्र को अपनी दूसरी तरफ रखकर, राम ने अपने सुनहरे बाणों से रात में आकाश को रोशनी से भर दिया। इसी समय अंगद ने इंद्रजित के रथ को चकनाचूर कर दिया और उसके सारथी को मार डाला घायल होने के कारण, इंद्रजित ने अपने टूटे रथ को छोड़ दिया और आकाश लौक पर स्थित देवगणों और दिव्य ऋषियों के देखते ही देखते वह आँखों से ओझल हो गया।
अदृश्य रहकर ही, क्रुद्ध इंद्रजित ने सर्पों के रूप में बाणों की वृष्टि करनी आरंभ कर दी। इंद्रजित को ब्रह्माजी से मिले वरदान के कारण, इन सर्प-बाणों ने राम व लक्ष्मण को इतना कसकर बांध दिया कि उनके लिए हिलना-डुलना तक मुश्किल हवा हो गया था। राम ने हनुमान, नील और अंगद सहित दस सर्वश्रेष्ठ वानरों को इंद्रजित की खोज करने भेजा, परंतु जब वानरों ने उसे खोजने के लिए हर दिशा में हवा में छलाँग लगाई, तो अदृश्य इंद्रजित ने उन्हें अगणित बाणों से वेध दिया। साथ ही उसने राम व लक्ष्मण पर तब तक बाण बरसाने जारी रखे जब तक कि उनके शरीर पर बने घावों से उमड़ते रक्त से उनकी पूरी देह रक्तरंजित नहीं हो गई।
इंद्रजित घोषणा करते हुए बोला, अरे राम-लक्ष्मण, मेरी बात ध्यान से सुनो। इंद्र तक मुझे नहीं देख सकता है, तो भला औरों की क्या बिसात। अपने बाणों की अनवरत् वर्षा से तुम दोनों को अब यमराज के पास भेजकर मुझे बहुत प्रसन्नता होगी।
इंद्रजित ने राम व लक्ष्मण को बाणों से वेधना जारी रखा और अंतत: उनके शरीर को इतने अधिक बाणों ने वेध दिया कि उनकी देहों पर एक उंगली रखने तक की जगह नहीं बची। आखिरकार, राम के हाथ से उनका धनुष गिर पड़ा और वह धरती पर गिर पड़े, जबकि लक्ष्मण ने जीवित रहने की आशा त्याग दी और मूच्छिंत हो गये। इस करुण दृश्य को देखकर सभी वानर-गण अत्यधिक निराश हो गये और उनकी आँखों से आँसू छलक पड़े।
जिस समय प्रमुख वानर - गण राम व लक्ष्मण के पास पहुँचकर उन्हें घेरै हुए खड़े थे, उसी समय इंद्रजित ने खुशी से भरकर अपने अनुगामियों से कहा, ब्रह्माजी की शक्ति से भरे मेरे चमत्कारी सर्प बाणों का शिकार होकर दो महान पराक्रमी योद्धा घायल होकर धरती पर गिर पड़े हैं। अब तो इंद्र और समस्त देवगण भी राम व लक्ष्मण के प्राण नहीं बचा सकते।
यह सुनकर राक्षस उत्साह से भरकर चिल्ला उठे, "राम का वध हो गया। इंद्रजित ने अकेले ही शत्रुओं की पराजित कर दिया।
इंद्रजित को लगा कि सचमुच राम व लक्ष्मण को मृत्यु हो गई है और विजय के मद में चूर होकर प्रसन्नता से रावण के राजमहल की ओर चल पड़ा और विभाषण उस स्थान पर आये जहाँ राम और लक्ष्मण खून से लथपथ होकर निर्जीव से पड़े हुए थे और उनकी साँसे बहुत धीमी चल रही थी। विशेषकर सुग्रीव को यह देखकर बहुत दुख हुआ कि किस प्रकार सर्प बाणों से पूरी तरह बँधकर दोनों भाई घायल पड़े हुए हैं, इसलिए विभीषण ने सुग्रीव को ढांढस बँधाया ।
सुग्रीव की आँखों से आँसू पोंछते हुए, विभीषण बोले, हे राजन, मैं जानता हूँ। कि राम और लक्ष्मण पुनः स्वस्थ हो जायेंगे। वे नहीं मरेंगे। राम की सावधानीपूर्वक चौकसी करें, तब तक मैं अपनी सेना को संगठित करके वानर - गणों का आत्मविश्वास लौटाता हूँ।
जिस समय सभी श्रेष्ठ वानर-गण राम व लक्ष्मण की सुरक्षा कर रहे थे, उसी समय इंद्रजित रावण के पास पहुँचा और अत्यन्त गर्व से भरकर उसे अपनी विजय की सूचना दी। रावण ने जब यह सुना कि राम व लक्ष्मण मारे गये हैं, तो वह खुशी से उछल पड़ा और अपने पुत्र का स्नेहपूर्वक आलिंगन करते हुए बोला, मेरे प्रिय पुत्र तुमने यह कठिनतम कार्य भला कैसे कर दिखाया ? मुझे विस्तारपूर्वक सारी बात बताओ ।
इंद्रजित बोला, आकाश में अदृश्य रहकर, मैंने राम व लक्ष्मण को अपने सर्प वाणों से बाँध दिया। फिर मैं अपने बाणों से तब तक उन्हें छलनी करता रहा जब तक कि वे निष्प्राण होकर धरती पर नहीं गिर गये। सभी वानर योद्धाओं ने घोर निराशा से भरकर युद्ध त्याग दिया।
राम व लक्ष्मण को मृत जानकर, रावण का सारा भय और बेचैनी दूर हो गई। इंद्रजित को वापस भेज देने के बाद, उसने सीता की पहरेदारी कर रही राक्षसियों को बुलवाया। वह आश्वस्त था कि अब सीता उसके सामने समर्पण कर देगी, इसलिए यह प्रसन्न होकर बोला, मेरे अपराजेय पुत्र इंद्रजित के हाथों राम व लक्ष्मण का वध हो गया है। मैं चाहता है कि तुम तत्काल जाकर सीता को यह समाचार सुनाओ। इसके बाद, उसे पुष्पक विमान में बिठाकर ले जाओ ताकि वह स्वयं यह देख सके कि किस प्रकार उसका पति युद्धक्षेत्र में मृत पड़ा हुआ है।
राक्षसियों को वापस भेजने के बाद, रावण ने लंका नगरी के नागरिकों को प्रसन्न करने के लिए समूची नगरी में राम व लक्ष्मण का मृत्यु का समाचार प्रसारित करवाया। पहरेदारी करने वाली राक्षसियों ने जब सीता को उसके पति की पराजय की सूचना दी, तो सीता को गहरा आघात पहुँचा और वह पागलों के समान विलाय करती हुई जमीन पर गिर पड़ीं।
राक्षसियों ने अपनी प्रमुख त्रिजटा के साथ सीता को सहारा देकर पुष्पक विमान में बिठाया। एक ही पल में वे आकाश में बहुत ऊँचे पहुँच गये। युद्धक्षेत्र के ऊपर उड़ते हुए, सीता को भारी संख्या में मृत वानर और राक्षस दिखाई दिए। तभी, सीता ने राम व लक्ष्मण को विलाप करते वानरों से घिरकर जमीन पर पड़े हुए देखा। राम के बाणों से छलनी शरीर व पास ही में पड़े धनुष को देखते हुए, सीता को राक्षसों की खुशी भरी गर्जन ध्वनि सुनाई दी।
अपने शोक को दबाने में असफल होकर सीता ने जोर-जोर से अपने दुर्भाग्य पर विलाप करना आरंभ कर दिया, मुझे ज्योतिष शास्त्र व हस्तरेखा विज्ञान के प्रकांड विद्वान ब्राह्मणों ने आश्वस्त करते हुए कहा था कि 'हे सौभाग्यशाली राजकुमारी, तुम्हें पुत्र रत्न प्राप्त होंगे और तुम कभी भी विधवा नहीं होओगी। भविष्य में तुम एक ऐसे प्रतापी राजा की महारानी बनोगी जो अनेक महान यज्ञ संपन्न करेगा।' अब राम को मृत अवस्था में देखकर मैं यह समझ गई हूँ कि वे सभी ब्राह्मण झूठे और मक्कार थे।
उन ब्राह्मणों ने मेरे शुभ शारीरिक चिह्नों का वर्णन करते हुए मेरे सौभाग्यवती होने का विश्वास दिलाया था। उन्होंने कहा था, 'हे राजकुमारी, तुम्हारे केश गहरे काले रंग के हैं और तुम्हारी भौंहें जुड़ी हुई नहीं, वरन तिरछी हैं। तुम्हारी मोतियों जैसी सुगठित और सम दंतपंक्ति है और तुम्हारे हाथ-पैरों की उंगलियाँ गुलाबी हैं और उनके बीच में खाली जगहें नहीं हैं। तुम्हारी जंघाएँ गोल, सुगठित और लोमरहित हैं और तुम्हारे भरपूर स्तन एक-दूसरे का स्पर्श करते हैं। तुम्हारी नाभि गहरी है, तुम्हारी त्वचा सुकोमल है और तुम्हारी त्वचा की रंगत गोरी और उजली है। चलते समय तुम्हारे पैरों की सभी उंगलियाँ भूमि का स्पर्श करती हैं और तुम्हारे पैर के तलुवों पर कमल के फूल के शुभ चिह्न बने हुए हैं, जो तुम्हारे राजसी जन्म का संकेत देते हैं। तुम कमल-नयनी हो और तुम्हारी मुस्कान सौम्य व मधुर है और ये सभी लक्षण इस बात का संकेत देते हैं कि तुम अत्यन्त सौभाग्यशाली हो।' ओह, इन शुभ शगुनकारी संकेतों का भला अब क्या अर्थ है जबकि मेरे पति ही इस संसार में नहीं रहे? राम के बिना मेरा सौभाग्य समाप्त हो गया है!
तब त्रिजटा सीता के पास आकर बोली, हे राजकुमारी, आप आश्वस्त रहे कि राम व लक्ष्मण का मृत्यु नहीं हुई है, क्योंकि पुष्पक विमान कभी भी किसी विधवा को अपने पर नहीं बिठाता है। जरा वानरों को ओर देखो। वे अनिश्चय की दशा में नहीं हैं। वे अत्यन्त सावधानी के साथ राम व लक्ष्मण को चौकसी कर रहे हैं। यदि राम व लक्ष्मण की मृत्यु हो गई होती, तो भला ऐसा करने की क्या आवश्यकता थी? यहाँ से भी मैं राम व लक्ष्मण के मुख पर फैला तेज देख सकती हूँ और यदि वे मृत होते तो यह तेज लोप हो चुका होता। मेरी प्रिय सीता, अनावश्यक विलाप न करो, क्योंकि निश्चित ही तुम्हारा पति अभी जीवित है।
त्रिजटा के शब्द सुनकर सीता को थोड़ा ढांढस बंधा। फिर उसे वापस अशोक वाटिका में ले आया गया। अपने पति की करुण दशा का विचार मन में आने पर सीता फिर से निराशा व हताशा में जमीन पर गिर पड़ी।
इसी बीच, राम को होश आ गया। लक्ष्मण को रक्तरंजित दशा में अपने पास निष्प्राण-सा पड़ा देखकर, राम अत्यन्त क्रोध से बोले, यदि मैं सीता को बचाने में सफल भी हो जाऊँ, तब भी यदि लक्ष्मण की मृत्यु हो जाती है तो यह सारा प्रयास व्यर्थ हो जायेगा! राजा जनक की पुत्री के स्थान पर मुझे कभी भी दूसरी पत्नी मिल सकती है, परंतु मैं लक्ष्मण जैसा सहयोगी मित्र कहाँ से ला पाऊँगा। यदि लक्ष्मण की मृत्यु हो जाती है, तो मैं भी प्राण त्याग दूंगा क्योंकि मैं लक्ष्मण के बिना अयोध्या वापस लौटने की कल्पना तक नहीं कर सकता। युद्ध क्षेत्र में मेरे रहते हुए यदि लक्ष्मण की मृत्यु हो जाये, तो भला मैं उसकी माता से आँख मिलाने का साहस भी कैसे कर पाऊंगा ?
फिर सुग्रीव की ओर देखकर राम बोले, "वानर योद्धाओं को अब पाछे हट जाना चाहिए क्योंकि मेरे और लक्ष्मण की ओर से सुरक्षा मिले बिना उनका जीवन संकट में पड़ जायेगा। हे श्रेष्ठ वानर राज मैं आप सभी लोगों को सच्ची मित्रता के लिए कोटि-कोटि बार आभार प्रकट करता हूँ क्योंकि मेरी सेवा के लिए आप सब ने अपने प्राणों को संकट में डालकर शानदार पराक्रम का परिचय दिया है।
राम के मधुर और करुण शब्दों को सुनकर सभी वानरों को आँखों में आँसू भर आये। तब तक सेना का मनोबल बढ़ाकर विभीषण लौट आये। विभीषण ने जब राम व लक्ष्मण को बाणों की शय्या पर लेटे हुए देखा, तो वह दुख से चूर-चूर होकर रोने लगे। सुग्रीव ने उन्हें गले से लगाकर कहा, आपको इस बात पर बिल्कुल भी सन्देह नहीं होना चाहिए कि राम व लक्ष्मण शीघ्र हो स्वस्थ हो जायेंगे और युद्ध में रावण को पराजित करेंगे।
सुग्रीव ने अपने ससुर सुषेण से कहा, "आपको राम व लक्ष्मण के किष्किंध लौटने का प्रबंध करना चाहिए ताकि उनके घाव सुरक्षित ढंग से भर सके। सभी वानरों को उनके साथ जाने दें। मैं अकेला यहाँ रहूंगा। रावण को अकेले ही परास्त करने के बाद, मैं सीता के साथ किष्किंधा लौट आऊंगा।
सुषेण बोले, प्राचीन काल में, देवताओं और दैत्यों के बीच युद्ध हुआ था जिसमें दैत्यों ने मायावी शक्तियों के जरिए अनेक देवताओं का वध कर दिया था। परंतु, मंत्रों व विशेष औषधीय जड़ी-बूटियों को सहायता से बृहस्पति देव मुन देवगणों को जीवित करने में सफल रहे थे।
मेरा सुझाव है कि पनस और संपति क्षीर सागर जायें क्योंकि वे संजीवकारनी और विषल्य नामक जड़ी-बूटियों से परिचित हैं। ब्रह्माजी द्वारा सृजित संजीवकार्णी बूटी से मृत व्यक्ति में भी प्राण-संचार हो जाते हैं और विषल्य नामक बूटी से बाणों द्वारा हुए घाव तत्काल भर जाते हैं। ये जड़ी-बूटियाँ चंद्र और द्रोण पर्वतों पर मिल सकती हैं। ये पर्वत क्षीर सागर के मध्य में हैं और ये वहाँ पर सागर मंथन से अमृत निकालने के कारण उभरे थे। संभवतः हनुमान को वहीं जाना चाहिए क्योंकि वह सबसे जल्दी वहाँ तक की यात्रा पूरी कर सकते हैं।
सुषेण अभी बोल ही रहे थे कि तभी प्रचंड वेग से हवा बहने लगी और अपने साथ घने काले बादल और बिजली की चमक लेकर आई। समुद्र की लहरें अत्यन्त ऊँची-ऊँची उठने लगीं और पर्वत मानो भरभराकर टूटने लगे। ऊँच- ऊँचे वृक्ष उखड़ गये और हवा से उड़कर समुद्र में जा गिरे और अचानक एक विशालकाय पक्षी समान जीव प्रकट हुआ।
उसके पहुँचते ही, राम व लक्ष्मण को बाँधे हुए समस्त सर्प बाण तत्काल भाग खड़े हुए। यह जीव नीचे आया और उसने राम व लक्ष्मण के मुख पर अपने हाथ फेरे। उसके स्पर्श मात्र से राम व लक्ष्मण के शरीरों का सामान्य तेज लौट आया, उनकी त्वचा दमकने लगी और उनमें नई शक्ति का संचार हो गया। इस रहस्यमय पक्षी ने जब राम को ऊपर उठाकर, अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक उन्हें गले से लगाया, तो राम स्नेह से भरकर बोले, हम दोनों भाई सदा-सर्वदा आपके आभारी रहेंगे। यदि आप हमें अपना परिचय देने योग्य मानते हैं, तो कृपा कर बताएं कि आप कौन हैं।
विशालकाय पक्षी ने उत्तर दिया, मैं आपका चिरंतन सेवक व विनता का पुत्र गरुड़ हूँ। सभी देवतागण अपने अधिपति इंद्र समेत भी आपको इंद्रजित के सर्प बाणों के बंधन से मुक्त नहीं कर सकते थे। ये सर्प कद्रू के पुत्र है और ब्रह्माजी से मिले वरदान की मायावी शक्ति के द्वारा इंद्रजित ने इन्हें बाणों में बदल दिया था।
मेरे प्रिय भगवान्, राक्षसों के साथ युद्ध करते समय आपको सावधान रहना चाहिए क्योंकि वे बहुत मक्कार होते हैं जबकि आपके जैसे शूरवीर सीधे-सरल होते हैं। मैं अब यहाँ से जाना चाहता हूँ, परंतु तब भी ऐसा करने से पहले मैं आपको यह विश्वास दिलाता हूँ कि आप विजयी होंगे और अपनी प्रिय सीता को पुनः प्राप्त करेंगे।
गरुड़ ने राम की प्रदक्षिणा की और एक बार फिर से उन्हें गले से लगाने के बाद वह आकाश लोक को चले गये। राम व लक्ष्मण को पुनः स्वस्थ देखकर सभी वानर-गण खुशी से उछल पड़े। अत्यन्त प्रसन्नता से भरकर उन्होंने ढोल-नगाड़े बजाए अपनी पूँछें खुशी से फटकारने लगे और सिंहों के समान गर्जना करने लगे और प्रचंड शोर करने लगे। वानरों ने वृक्ष और चट्टानें उखाड़ लीं और युद्ध करने की तैयार हो गये।
जब रावण ने वानरों को प्रसन्नतापूर्ण गर्जन ध्वनि सुनी तो उसने अनुमान लगाया कि राम व लक्ष्मण स्वस्थ हो उठे हैं। इस अनुमान को सुनिश्चित करने के लिए उसने कुछ राक्षसों को वहाँ जाकर वानरों को इस प्रसन्नता का कारण जानने के लिए भेजा। सुरक्षा दीवार पर चढ़ने के बाद राक्षसों ने देखा कि राम व लक्ष्मण जीवित व स्वस्थ हैं, तो वे भयभीत होकर रावण को सूचित करने के लिए दौड़ पड़े। रावण के सन्देह की पुष्टि हो जाने पर, वह इतना घबरा उठा कि उसका प्रसन्नता से खिला हुआ चेहरा मुरझा गया।
क्रोध से भरकर, रावण ने धूम्राक्ष नामक महान योद्धा को राम पर आक्रमण करने के लिए भेजा। जल्दी-जल्दी अपनी सेना को संगठित करके, धूम्राक्ष अपने रथ पर चढ़ गया जिसे गधे खींच रहे थे। अट्टाहस करके घमंड से चूर होकर हंसते हुए वह पश्चिमी द्वार की और बढ़ा जहाँ हनुमान थे।
धूम्राक्ष लंका नगरी की सड़कों से होकर गुजर रहा था कि एक विशाल गिद्ध आकर उसके रथ पर बैठ गया और एक अन्य माँसाहारी पक्षी उसके ध्वज स्तंभ पर बैठ गया। अचानक कहीं से एक सिर-विहीन धड़ उसके रास्ते पर आ गिरा। और बादलों से रक्त-मिश्रित वर्षा होने लगी। इन अपशगुनकारी चिह्नों को देखकर धूम्राक्ष डर गया, परंतु इसके बावजूद वह युद्ध करने के लिए तैयार वानर सैनिकों के सामने साहस के साथ पहुँचा।
एक भयानक युद्ध छिड़ गया। वानरों ने राक्षसों को विशाल चट्टानों व वृक्षों से मारा और अपने तीखे दाँतों व नाखूनों से उन्हें चीरने लगे। वानरों की श्रेष्ठ शक्तियों के कारण, राक्षस सेना में हड़कंप मच गया और वे युद्ध क्षेत्र से भाग गये।
यह देखकर, धूम्राक्ष क्रोध से भड़क उठा और वानरों पर इतने उग्र ढंग से प्रहार करने लगा कि वे भी इधर-उधर भागने लगे। यह देख हनुमान को भी क्रोध आ गया। एक विशाल चट्टान उठाकर उन्होंने इतने जोर से इसे धूम्राक्ष के रथ पर फेंका कि रथ के टुकड़े-टुकड़े हो गये। परंतु राक्षस ने जमीन पर छलाँग लगाकर अपनी प्राण रक्षा की और हनुमान ने विध्वंस करना जारी रखा। एक विशाल शिलाखंड उठाकर, हनुमान फिर से धूम्राक्ष पर टूट पड़े। हनुमान से भिड़ने के लिए वह राक्षस उनकी ओर दौड़ा और चपलता से हनुमान के सिर पर अपनी गदा से प्रहार किया। हनुमान ने उसके प्रहार की अनदेखी करके, शिलाखंड को धूम्राक्ष के सिर पर इतनी जोर से मारा कि वह पराक्रमी राक्षस मृत होकर जमीन पर गिर पड़ा और उसके हाथ-पैर टूटकर बिखर पड़े।
धूम्राक्ष की सेना भयभीत होकर लंका में शरण लेने भाग गई और तब रावण ने वज्रदंस्त्र को युद्ध करने भेजा। इस राक्षस ने दक्षिणी द्वार की ओर अपनी सेना आगे बढ़ाई जहाँ पर अंगद डटे हुए थे। वज्रदंस्त्र ने आगे बढ़ते समय देखा कि आकाश में उल्कापात हो रहे थे और एक भयानक मादा सियार आग उगल रही थी। परंतु इसके बावजूद उसने साहस बटोरा और वानरों व राक्षसों के बीच भयानक युद्ध छिड़ गया।
अंगद ने एक विशाल शिला उछालकर उसके रथ को चूर-चूर कर दिया परंतु वज्रदंस्त्र ने रथ से कूदकर प्राण बचा लिए। अंगद ने एक और विशाल चट्टान उठाकर उसे वज्रदंस्त्र के सिर पर पटक दिया जिससे वह मूर्च्छित होकर जमीन पर गिर पड़ा और अपने मुद्गर को सीने से चिपटाए खून की उल्टियाँ करने लगा। परंतु उसे शीघ्र ही होश आ गया और उसने अंगद के सामने पहुँचकर अपनी गदा से उसके सीने पर भयानक प्रहार किया।
दोनों महान योद्धा मुष्टि युद्ध में उलझ पड़े और इस तरह कुछ समय बाद दोनों ही थककर चूर हो गये और दोनों के मुख से खून बहने लगा। अल्प विश्राम के बद अंगद ने एक वृक्ष का तना उठा लिया जबकि वज्रदंस्त्र ने तलवार और डाल ली। कुछ देर तक युद्ध करने के बाद, दोनों योद्धा थककर घुटनों के बल बैठ गये ।
इस अवसर का लाभ उठाकर, अंगद ने अपनी सारी शक्ति बटोरकर उस राक्षस की तलवार छीन ली और उसके खड़े होते ही उसका सिर काटकर अलग कर दिया।
अपने सेनापति का कटा हुआ सिर देखकर, बची हुई राक्षस सेना लंका में शरण लेने के लिए भाग खड़ी हुई। तब रावण ने अकंपन को बुलाकर कहा, आप सभी प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग करने में सिद्धहस्त हैं और युद्ध के लिए आपकी तत्परता अतुलनीय है। अब जायें और वानरों की सेना का संहार करें। राम व लक्ष्मण को सदा-सर्वदा के लिए मिटा दें।
युद्ध क्षेत्र की ओर बढ़ते हुए, अकंपन की बाई आँख बार-बार फड़कने लगी, उसका गला रुंध गया और उसके रथ में जुते घोड़े अवसादग्रस्त जान पड़ने लगे। इन अपशगुनकारी लक्षणों की अनदेखी करके, अकंपन ने युद्ध क्षेत्र में प्रवेश किया। इसके बाद छिड़े प्रचंड रण में दोनों पक्षों ने इतनी धूल उड़ाई कि शत्रु और मित्र तक की पहचान करना असंभव हो गया। परिणामतः, वानर और राक्षस अपने ही लोगों का वध करने लगे।
अकंपन से युद्ध करने के लिए जब हनुमान आगे बढ़े, तो उसने बाणों की वृष्टि आरंभ कर दी। यह देखकर हनुमान मुस्कुराए और उन्होंने पर्वत शिखर से शिलाओं का एक विशाल खंड तोड़ लिया। हाथ में शिलाखंड लेकर, घनघोर गर्जन करते हुए जब वह अपने शत्रु की ओर बढ़े, तो अकंपन ने अपने बाणों से शिलाओं को चूर-चूर कर दिया। इससे हनुमान का क्रोध भड़क उठा। एक विशाल अश्वत्थ वृक्ष उखाड़कर, वह फिर से उग्र रूप धारण करके उस राक्षस की ओर दौड़ पड़े।
अपने रास्ते में पड़ने वाले सभी रथों और वृक्षों को चूर-चूर करके आगे बढ़ते हनुमान के इस भयानक रूप को देखकर, राक्षस सैनिक युद्ध क्षेत्र से उल्टे पाँव भागने लगे। अकंपन अपनी जगह पर स्थिर खड़ा रहा और हनुमान के पास पहुँचते ही उसने चौदह बाणों से उन्हें गंभीर रूप से वेध दिया। तब भी हनुमान के पैर नहीं लड़खड़ाए। अकंपन के ठीक सामने पहुँचकर उन्होंने राक्षस सेनापति के सिर पर शिलाखंडों से प्रहार किया जिससे वह मृत होकर जमीन पर गिर पड़ा। जब नेतृत्व- विहीन हो गई राक्षस सेना प्राण बचाकर लंका के अंदर भाग गई, तो राम, लक्ष्मण और वानर योद्धागण हनुमान के पास आये और उन्हें हार्दिक शुभकामनाएँ देने लगे।
दोपहर से पहले ही रावण को अकंपन की मृत्यु का समाचार मिला और यह सुनकर रावण बहुत परेशान हो उठा। राक्षस-राज ने अपने मंत्रियों को बुलवाया और वह लंका नगरी की किलेबंदियों पर नजर डालने के लिए नगरी की यात्रा पर निकल पड़ा। अपने प्रमुख सेनापति की ओर मुड़कर वह बोला, मेरे प्रिय प्रहस्त केवल आप मैं, कुंभकर्ण, इंद्रजित और निकुंभ ही वानरों को पराजित करने का सामर्थ्य रखते हैं। हम बहुत मुश्किल में है, इसलिए मैं चाहता हूँ कि अब आप शत्रु पर आक्रमण करें।
प्रहस्त बोला, हे राजन, मैंने पहले ही आपको यह सलाह दी थी कि सीता को राम के पास लौटा दें, परंतु अब जबकि युद्ध आरंभ हो चुका है, तो मैं आपको यह बताना चाहता हूँ कि मैं आपके लिए अपने प्राण उत्सर्ग करने को तैयार हैं।
प्रहस्त ने तत्परता के साथ अपनी सेना तैयार की। एक घंटे के भीतर कर अपने रथ पर बैठकर कूच कर गया। युद्ध क्षेत्र की ओर जाते समय प्रहस्त ने मांसभक्षी पक्षियों को अपने सिर के ऊपर दक्षिणावर्त चक्कर काटते देखा। आकाश में उल्कापात हो रहा था। मादा सियार अपशगुनकारी ढंग से हुँकार भर रही थी। तभी एक गिद्ध आकर उसके ध्वज स्तंभ के ऊपर बैठ गया और हड्डियों को वेधती ठंडी हवाएँ बहने लगीं तथा घने काले बादल रक्त मिश्रित वर्षा करने लगे। उसके सारथी के हाथ से बार-बार चाबुक छूट जा रहा था और समतल पथ होने पर भी घोड़े कुछ-कुछ देर बाद लड़खड़ा जा रहे थे। प्रहस्त के शरीर की काँति बुक्ष गई थी, परंतु इसके बावजूद, जब वानरों और राक्षसों ने एक-दूसरे को ललकारने के लिए गर्जना की, तो वह आत्म-विश्वास के साथ सुग्रीव की सेना पर धावा बोलने के लिए ऐसे आगे बढ़ा मानो कोई पतिंग आग की ओर बढ़ रहा हो।
इसके बाद छिड़े युद्ध में, प्रहस्त ने अपने बाणों की बारिश से बहुत सारे वानरों का वध कर दिया। उसे चुनौती देने के लिए जब नील आगे बढ़े, ती प्रहस्त के बाग नील के शरीर को आर-पार वेधकर धरती में समा गये। परंतु, नील विचलित नहीं हुए। प्रहस्त तेजी से नील को और बढ़ा, तो नील ने एक विशाल वृक्ष उखाड़ लिया और इससे राक्षस के घोड़ों को मार गिराया और उसका धनुष तोड़ डाला। अपने हाथ में गदा लेकर, प्रहस्त अपने चकनाचूर हो चुके रथ से कूद पड़ा और तब उन दोनों में द्वंद्व-युद्ध ठन गया।
प्रहस्त ने नील पर अपने गदा से इतना भयानक प्रहार किया कि नील के घावों से रक्त की धार बह निकली। नील ने विचलित हुए बिना, एक वृक्ष से प्रहस्त के सीने पर प्रहार किया। उस प्रहार की अनदेखी करके जब प्रहस्त नील की ओर दौड़ा, तब नील ने शीघ्रता से एक चट्टान उखाड़ ली। प्रहस्त के पास आते ही, नील ने उसके सिर पर चट्टान दे मारी, चट्टान टूटकर चूर-चूर हो गई और रावण का प्रमुख सेनापति निष्प्राण होकर जमीन पर गिर पड़ा। राक्षस सेना में भगदड़ मच गई और वे लंका की ओर भागने लगे, तभी लक्ष्मण ने नील के पास पहुँचकर उन्हें बधाई दी।
रावण को जब प्रहस्त को मृत्यु का समाचार मिला, तो उसका हृदय असह्य वेदना से भर उठा। अपने मंत्रियों को संबोधित करके, राक्षस-राज बोला, मैं अपने शक्तिशाली शत्रुओं की और अधिक अवहेलना नहीं कर सकता। इसलिए अब मैं स्वयं युद्ध क्षेत्र में जाऊँगा।
रावण अपने शानदार रथ पर बैठा और युद्ध करने के लिए अपनी सेना के साथ नगर से बाहर आया। राम ने जब विशाल राक्षस सेना को आते देखा, तो उन्होंने विभीषण से इसके बारे में पूछा। तभी राम को रावण की झलक दिखी तो वह प्रसन्न होकर बोले, राक्षस राज रावण के असाधारण तेज और शक्ति के कारण, मुझे उसे देखने में कठिनाई हो रही है परंतु यह मेरा सौभाग्य है कि वह मेरे सामने आया क्योंकि अंततः अब मैं इतने समय से अपने मन में दबाए क्रोध को बाहर निकाल सकूँगा।
रावण ने लंका के भीतर एक विशाल सेना को सतर्क रहने का आदेश देकर रख छोड़ा था ताकि यदि वानर उसकी अनुपस्थिति का लाभ उठाना चाहें, तो वह उन्हें रोक सके। रावण जब लंका से बाहर आया, तो वानर दो हिस्सों में बँट गये, जबकि राम व लक्ष्मण ने युद्ध की आशंका से अपने-अपने धनुष उठा लिए। तभी सुग्रीव ने अचानक ढेर सारी चट्टानें उठाकर धावा बोलते हुए, चट्टानों को रावण की ओर फेंक दिया और युद्ध छिड़ गया। रावण ने बिना किसी कठिनाई के बाणों की वृष्टि से चट्टानों को चूर-चूर कर दिया और बाणों की दूसरी खेप छोड़कर सुग्रीव को गंभीर रूप से घायल कर दिया। सुग्रीव घायल होकर दर्द से कराहते हुए जमीन पर गिर पड़े और सभी राक्षस खुशी से शोर मचाते हुए उछलने-कूदने लगे।
छह अन्य वानर प्रमुखों ने चट्टानें उठा ली और रावण पर धावा बोल दिया. परंतु रावण ने एक बार फिर से चट्टानों को आसानी से चकनाचूर कर दिया। रावण पराक्रमी वानरों को घायल करता रहा, जबकि साथ ही अपने बाणों की वर्षों से उसने अन्य अनेक वानरों को भी मार डाला। अंततः, अत्यधिक मुसीबत में फँस गये वानरों ने भगवान् राम को शरण ली।
तब राम ने रावण की ओर कदम बढ़ाए, परंतु लक्ष्मण सामने आ गये और राम से विनती की कि वह पहले उन्हें रावण के साथ अकेले युद्ध करने की अनुमति दें।
राम ने अनुमति दे दी और जब लक्ष्मण रावण से युद्ध करने आगे बढ़े, तो हनुमान ने लक्ष्मण को सहायता करने के लिए राक्षस राज के बाणों को निष्फल करने हेतु उन पर चट्टानों की वर्षा कर दी। परंतु, कुछ समय बाद, स्वयं को संयत नहीं रख पाने के कारण, हनुमान अचानक रावण की ओर दौड़ पड़े।
अपने दाहिने हाथ को अपने सिर के ऊपर लहराते हुए, हनुमान ने चुनौती देकर कहा, ब्रह्माजी से मिला वरदान, तुम्हें वानर के हाथ मरने से नहीं बचाता है। अब मैं अपने एक ही शक्तिशाली प्रहार से तुम्हें मौत के घाट उतार दूँगा!
इस पर रावण बोला, मैं तुम्हें एक बार मनचाहे ढंग से प्रहार करने के लिए आमंत्रित करता हूँ और फिर मैं अपने प्रहार से तुम्हारा वध कर दूंगा,
हनुमान बोले, क्यों मूर्खतापूर्ण बातें करते हो? क्या तुम्हें याद नहीं कि मैंने कितनी आसानी से तुम्हारे पुत्र अक्ष का वध किया था?
यह सुनकर, रावण अचानक आगे दौड़ा और उसने हनुमान के सीने पर जोरदार प्रहार किया जिससे हनुमान पीछे गिरने लगे। परंतु अपना संतुलन वापस बनाने के बाद, हनुमान ने अपनी हथेली से रावण पर भरपूर शक्ति से प्रहार किया। इस प्रहार से रावण बुरी तरह हिल गया और आकाश से यह देख रहे देवताओं और ऋषियों ने हनुमान की भूरि-भूरि प्रशंसा की। रावण जब थोड़ा संभला, तो उसने भी हनुमान की प्रशंसा करते हुए उसे युद्ध के लिए एक योग्य प्रतिद्वंद्वी माना।
तब हनुमान बोले, यदि तुम अब तक जीवित और स्वस्थ हो, तो इसका अर्थ है कि मेरी शक्ति अत्यन्त तुच्छ है। खैर, यदि इस पर भी तुम मुझे योग्य प्रतिद्वंद्वी मानते हो, तो मुझ पर एक और प्रहार करो।
क्रोधित रावण ने हनुमान के सोने पर मुट्ठी भींचकर जोरदार प्रहार किया जिसके कारण हनुमान एक बार फिर से लड़खड़ाकर पीछे की ओर जाने लगे। इसके बाद, हनुमान को छोड़कर, रावण ने नील पर ध्यान केंद्रित किया और बाणों की निरंतर वृष्टि से उन्हें वेध दिया। अत्यधिक जख्मी हो जाने पर भी, नील ने एक चट्टान उठाकर रावण की ओर फेंक दी। इधर, राक्षस राज उस चट्टान को चूर- चूर करने में व्यस्त था, तो उधर हनुमान स्वयं को संभाल चुके थे, परंतु हनुमान ने नील से युद्ध में उलझे रावण पर प्रहार करने से स्वयं को रोका।
नील एक के बाद एक लंबे वृक्ष उखाड़कर रावण पर फेंकते और रावण अपने बाणों से उन्हें चूर-चूर करता जाता और साथ ही वह अन्य वानर सैनिकों को भी हताहत करता जा रहा था। तब रावण के बाणों से बचने के लिए, नील ने अपना आकार बहुत छोटा कर लिया और फिर वह रावण के ध्वज स्तंभ पर कूद गये। इस चाल को देखकर राक्षस राज का क्रोध भड़क उठा। इसके बाद नील-ध्वज-स्तंभ और रावण के धनुष के बीच छलाँग लगाने लगे, जिसे देखकर राम, लक्ष्मण और हनुमान आश्चर्यचकित रह गये। रावण ने भी इस दुस्साहसपूर्ण कार्य की सराहना की, परंतु एक शक्तिशाली आग्नेयास्त्र का आवाहन करके वह नील के सीने पर प्रहार करने में सफल रहा जिसके कारण नील अपने घुटनों के बल जमीन पर गिर पड़े।
नील को रास्ते से हटाने के बाद, रावण लक्ष्मण की ओर मुड़ा। कुछ क्षण तक एक-दूसरे को खरी-खोटी सुनाने के बाद, रावण ने लक्ष्मण पर सात बाण छोड़े जिन्हें लक्ष्मण ने आसानी से काट गिराया। उत्तेजित होकर रावण ने बाणों की वर्षा कर दी परंतु लक्ष्मण ने सभी बाणों को निष्फल कर दिया।
इसके बाद, लक्ष्मण ने रावण को चकित करते हुए उस पर बाण चलाकर आक्रमण करना आरंभ कर दिया, परंतु राक्षस राज रावण ने भी लक्ष्मण के बाणों को काट गिराया। आखिरकार रावण ने एक ब्रह्मास्त्र चलाकर लक्ष्मण के माथे को वेध दिया और लक्ष्मण जमीन पर गिर पड़े। बड़ी कठिनाई से स्वयं को संभालकर, धनुष उठाने के बाद लक्ष्मण ने नए सिरे से रावण पर आक्रमण किया।
लक्ष्मण ने रावण का धनुष तोड़ दिया। फिर उन्होंने तीन शक्तिशाली बाणों से रावण को वेध डाला जिनसे घायल होकर रावण मूर्च्छित होकर जमीन पर गिर पड़ा। बहुत प्रयास के बाद सामान्य होने के पश्चात, रावण ने एक बार फिर से स्वयं को उठाया।
अपने प्रतिद्वंदी को समाप्त करने की इच्छा से, रावण ने ब्रह्माजी द्वारा दिए गये एक अस्त्र का आवाहन करके इसे पूरी शक्ति से लक्ष्मण पर चला दिया। लक्ष्मण ने अपने अस्त्रों से ब्रह्माजी के अस्त्र को काटने का पूरा प्रयास किया, परंतु उस शक्तिशाली अस्त्र ने लक्ष्मण के सीने को वेध डाला जिसके कारण वह दर्द से कराहते हुए जमीन पर गिर पड़े। जिस समय लक्ष्मण चेतना खो रहे थे, उसी समय रावण उन्हें बंदी बनाने आया, परंतु जैसे ही राक्षस राज लक्ष्मण को पकड़कर ले जाने वाला था उसी समय सुमित्रानंदन को याद आया कि वह भगवान् विष्णु का अंश हैं और परिणामस्वरूप उन्होंने अपनी असीमित शक्ति का प्रदर्शन करना आरंभ किया। इसके कारण, सम्पूर्ण पर्वत तक को उठाने में समर्थ रावण अपनी पूरी शक्ति लगाकर भी लक्ष्मण को नहीं उठा सका।
फिर, जब रावण अपने रथ पर वापस चढ़ रहा था, तभी हनुमान ने अचानक उस पर धावा बोला और उसके सीने पर अपने मुक्के से भयानक प्रहार किया। इस घातक प्रहार के कारण रावण के दसों सिरों, बीसों कानों और बोसों नेत्रों से खून बहने लगा और रावण मूर्च्छित होकर अपने रथ के फर्श पर गिर पड़ा और यह देखकर सभी वानर-गण खुशी से चीख उठे। इसके बाद, हनुमान मूर्च्छित पड़े लक्ष्मण के पास गये। लक्ष्मण ने स्नेहवश स्वयं को इतना हल्का कर लिया कि हनुमान उन्हें लेकर राम के पास जा सकें। तभी लक्ष्मण के शरीर से ब्रह्माजी का अस्त्र बाहर निकल आया और अपना कार्य सम्पन्न हो जाने के कारण वह रावण के रथ की ओर लौट गया।
इस बीच, रावण की चेतना लौट आई थी। उसने फिर से अपना धनुष उठा लिया तब तक लक्ष्मण उठ चुके थे और भगवान् विष्णु की अजेय शक्तिमत्ता के कारण उनके सारे घाव भर चुके थे। इधर, रावण ने अनेक वानरों पर प्रहार करके उन्हें गिरा दिया था, इसलिए राम ने स्वयं उसके साथ युद्ध करने का निर्णय लिया हनुमान के अनुरोध पर राम उनके कंधों पर चढ़ गये और रावण को युद्ध के लिए -ललकारते हुए शीघ्रता से उसकी ओर बढ़ने लगे।
राम के प्रति घनघोर शत्रुता का अनुभव करके, रावण ने पहले हनुमान पर अपने बाणों की वर्षा की। हनुमान इससे विचलित नहीं हुए, और इस तरह राम के रावण के ठीक सामने पहुँचकर उसके रथ को चूर-चूर कर दिया। इसके बाद, एक तेजोमय बाण चलाकर राम ने रावण के सीने को गंभीर रूप से घायल कर दिय जिसके प्रहार से रावण का सिर चकरा गया और उसके हाथ से धनुष गिर पड़ा।
रावण का ध्वज काटने के बाद, राम ने घोषणा की, युद्ध क्षेत्र में अगणित वानरों का वध करके तुमने पराक्रम का प्रदर्शन किया है, परंतु इसके कारण तुम थके हुए होंगे, इसलिए मैं अभी तुम्हारा वध नहीं करूँगा। तुल लंका लौट और आराम करो। बाद में, मैं तुमसे पुनः युद्ध करूँगा।
अपनी पराजय और राम के शब्दों को सुनकर रावण का अभिमान चकनाचूर हो गया। जब वह सिर झुकाए लंका वापस लौट रहा था, तब राम व लक्ष्मण घायल पड़े हुए वानरों के पास जाकर उनके शरीरों को वेधने वाले बान निकालने लगे। रावण के इस मान-मर्दन को देखकर आकाश लोक से देख रहे देवताओं और ऋषियों का मन हर्ष से पुलकित हो उठा और उन्हें यह भरोसा हुआ कि शीघ्र ही उनका उद्देश्य पूर्ण हो जायेगा।
रावण हताशा से भरकर अपने सिंहासन पर बैठ गया। उसने अपने मंत्रियों को बुलवाकर उनसे कहा, बहुत समय पहले जब मुझे ब्रह्माजी से वरदान मिले थे, तो उन्होंने मुझे मनुष्यों से सावधान रहने की चेतावनी दी थी। इसके बाद इक्ष्वाकु वंश के अनरण्य नामक एक राजा ने मुझे शाप देकर कहा था कि भविष्य में मेरे ही वंश का कोई व्यक्ति तुम्हारे समस्त संबंधियों सहित तुम्हारा वध करेगा।
बाद में, मेरे द्वारा बलात्कार किए जाने के बाद, वेदवती ने मुझे शाप दिया कि मेरा विनाश होगा और मेरा विचार है कि वह राजा जनक की पुत्री के रूप में पैदा हुई। फिर, एक बार जब मैंने कैलाश पर्वत को उठा लिया, तो उमा भयभीत हो उठीं और उन्होंने मुझे शाप देते हुए कहा, 'दुष्ट राक्षस। एक दिन एक स्त्री ही तुम्हारी मृत्यु का कारण बनेगी।' उसके बाद, एक बार मैं नंदीश्वर के वानर-जैसे चेहरे-मोहरे को देखकर हँस पड़ा। तब उन्होंने मुझे शाप दिया कि वानरों की एक सेना द्वारा तुम्हारे सम्पूर्ण वंश का नाश हो जायेगा! रंभा, पंजिकास्थल, नलकूवर और ब्रह्माजी सहित सभी ने मुझे नादान स्त्रियों का बलात्कार करने के लिए शाप दिए। अब मैं यह देख या रहा हूँ कि मेरे पिछले पापों का फल मुझे मिलने ही वाला है।
इसी समय जाकर कुंभकर्ण को जगाओ क्योंकि युद्ध क्षेत्र में उसका सामना और कोई नहीं कर सकता है। ब्रह्माजी के शाप के कारण वह नौ दिन पहले ही सोया है और सामान्यतः वह लगातार छह माह तक सोता रहता है। परंतु यदि वह इस समय मेरी सहायता नहीं करता, तो भला उसकी अतुलनीय शक्ति का क्या लाभ है?
तब रावण के मंत्री ढेर सारे अनुचरों के साथ कुंभकर्ण के आवास पर गये, परंतु उनकी उलझन यह थी कि कुंभकर्ण के जागने के सामान्य समय से पहले उसे किस तरह से जगाया जाये। वे अपने साथ भारी मात्रा में भोजन व अन्य वस्तुएँ लेकर गये, जैसे कि इत्र और फूलों के हार आदि। राक्षसों ने कुंभकर्ण के विशाल गुफा जैसे भूमिगत आवास में प्रवेश किया जिसकी लंबाई और चौड़ाई एक-एक योजन की थी।
जैसे ही उन लोगों ने कुंभकर्ण के कक्ष का द्वार खोला, तो उसके नासिका- छिद्रों से बहने वाली प्रचंड चक्रवात के समान वायु-प्रवाह के वेग से वे उड़कर दूर गिर गये। आखिरकार बहुत कठिनाई के बाद कक्ष में प्रवेश कर लेने पर, उन्होंने उस महाकाय राक्षस को नींद से जगाने का प्रयास करना आरंभ किया।
सबसे पहले, माँस के पहाड़ और रक्त के पात्र सोते हुए कुंभकर्ण के सामने रखे गये। इसके बाद, राक्षसों ने घने रुखे बालों से भरी उसकी पूरी देह पर चंदन का लेप और इत्र आदि मलना आरंभ किया। फिर, राक्षसों ने चीख-चीखकर उसके शौर्य का गुणगान करना आरंभ किया, परंतु तब भी कुंभकर्ण गहरी नींद में सोया रहा। इसके बाद, राक्षसों ने उसके कान के एकदम पास में घनघोर गर्जन करना, शंख बजाना और ढोल-नगाड़े पीटना आरंभ किया। उन्होंने जोर जोर से तालियाँ बजाई और पैर पटके। वे चिल्लाए, रोए और चीख-पुकार करने लगे उन्होंने घड़ियाल बजाए. करताल पीटे और उसके हाथ-पैर खींचे, परंतु इन सवका कुंभकर्ण पर कोई असर नहीं हुआ।
इसके बाद, राक्षसों ने बड़े-बड़े हथौड़े और गदाएँ लेकर कुंभकर्ण के शरीर पर प्रहार करना आरंभ किया, जबकि अन्य राक्षसों ने अपने मुक्कों से उन्हें बार-बार पीटना शुरू किया। समस्या यह थी कि कुंभकर्ण के नासिका छिद्रों से निकलती प्रचंड वेगवाही वायु के कारण उसके सामने टिके रहना मुश्किल था। परिणामतः कुंभकर्ण की आती-जाती श्वासों के साथ 10000 राक्षस समुद्र की लहरों के समान कभी उसके पास आते तो कभी उससे दूर चले जाते।
इसके बाद, शक्तिशाली हाथियों, घोड़ों, ऊँटों और गधों को कुंभकर्ण की देह पर चलाया गया, जबकि कुछ राक्षसों ने विशाल वृक्षों के कुंदों से उसके हाथ-पैरो पर चोट करनी आरंभ की। फिर भी, इन सबके बावजूद, महाकाय कुंभकर्ण की नींद नहीं टूटी। अंततः, राक्षस गण क्रोधित होकर कुंभकर्ण के बाल खींचने लगे और उसके कानों को काटने लगे। उन्होंने उसके कानों में बाल्टियों से पानी भी डाला, परंतु वह हिला तक नहीं। इसके बाद, राक्षसों ने कुंभकर्ण को गदाओं से पीटा और नाखूनों से खरोचा और 1000 हाथियों को उसके शरीर पर चढ़ाकर चलाया। तब कहीं जाकर विशालकाय राक्षस की नींद खुली और उसे महसूस हुआ कि मानो किसी ने बहुत स्नेह से उसके शरीर को सहलाया हो।
कुंभकर्ण पर अब भी नींद की खुमारी छाई थी और उसने अपने हाथों को तानकर जम्हाईं ली। हालाँकि कुछ राक्षस अब भी उस पर बड़े-बड़े पत्थर फेंक रहे थे, परंतु कुंभकर्ण को कुछ भी महसूस नहीं हुआ। वह समस्त जीवधारियों के लिए काल के समान प्रतीत हो रहा था। कुंभकर्ण ने लोलुपता के साथ सारा माँस खा लिया और अपने सामने रखा सारा रक्त पी गया। राक्षसों ने जब देखा कि अब वह संतुष्ट हो गया है, तो वे दोनों हाथ जोड़कर उसके सामने आये।
नींद से मुँदती जा रही पलकों के बीच से कुंभकर्ण ने उन पर नजर डाली और क्रोध से पूछा, "तुमने मुझे असमय क्यों जगाया ? निश्चित ही किसी भयानक संकट । तुम लोगों का चैन छीन लिया है और केवल मैं ही उस संकट से उबार सकता हूँ। अन्यथा, कोई भी यहाँ आकर मेरी नींद में रुकावट डालने का दुःसाहस नहीं कर सकता।
युपाक्ष नामक एक मंत्री बोला, राम व लक्ष्मण के नेतृत्व में, वानरों की एक विशाल सेना ने लंका को घेर लिया है। अनेक राक्षस योद्धा मारे जा चुके हैं और जब रावण युद्ध करने गये तो राम ने उन्हें पराजित करके वापस भेज दिया
कुंभकर्ण बोला, मैं इसी समय जाकर राम व लक्ष्मण का खून पी जाऊँगा। रावण के भय का कारण दूर करने के बाद ही मैं रावण के सामने जाऊँगा।
महोदर ने सुझाव दिया, बेहतर होगा कि पहले आप रावण के पास जाकर उनसे आदेश प्राप्त करें, क्योंकि वह आपके बड़े भाई और साथ ही महाराज भी हैं।
कुछ राक्षसों ने जाकर रावण को सूचना दी, बहुत प्रयास के बाद, हम कुंभकर्ण को जगाने में सफल हो गये हैं। क्या आप पहले उनसे मिलना चाहते हैं या फिर वह सीधे युद्ध क्षेत्र में जाकर राम के साथ युद्ध करें ?
इस पर रावण बोला, कुंभकर्ण को पहले यहाँ आने को कहो, ताकि मैं उसका उचित आदर-सम्मान कर सकूँ। परंतु उससे पहले, उसे भरपूर माँस और मदिरा खिलाओ पिलाओ, ताकि जब वह यहाँ आये तो प्रसन्नचित्त हो।
कुंभकर्ण ने उठकर अपना मुँह धोया। रावण के निर्देशानुसार, राक्षस गण भोजन का एक विशाल पहाड़ और सैकड़ों बाल्टी शराब लेकर पहुँच गये। यह सबकुछ खा-पी लेने के बाद, कुंभकर्ण तरो-ताजा हो गया।
इसके बाद, जब वह विशालकाय राक्षस अपने भूमिगत गुफा-कक्ष से बाहर निकलकर अपने बड़े भाई से मिलने जाने लगा, तो उसे देखकर वानर-गण चकित रह गये। अत्यधिक भय के कारण, कुछ वानर तत्काल जमीन पर गिर पड़े। जिनमें कुछ ज्यादा साहस था, वे राम की शरण में चले गये, जबकि जो इतने अधिक साहसी नहीं थे वे इधर-उधर भागने लगे।
कुंभकर्ण ने अपने विशालकाय आकार को और अधिक बड़ा कर लिया था, ताकि शत्रु भयभीत हो जाये। जब राम ने कुंभकर्ण को देखा, तो वह आश्चर्य से बोले, मैंने अपने जीवन में इतना विशाल जीव कभी नहीं देखा ! हे विभीषण, मेरु पर्वत के समान विशालकाय यह राक्षस कौन है ?
विभीषण बोले, यह विश्रवा ऋषि का पुत्र कुंभकर्ण है। वह सभी राक्षसों में सबसे विशाल है और उसने मृत्यु के देवता यमराज तक को परास्त किया है। विभीषण ने राम को कुंभकर्ण का इतिहास इस प्रकार बताया कुंभकर्ण ने पैदा होते ही हजारों जीवधारियों को खाना आरंभ कर दिया। इस कारण जीवधारियों ने इंद्र को शरण ली। स्वर्गाधिपति इंद्र सारा घटनाक्रम जानकर बहुत अधिक क्रोधित हुए। तब इंद्र ने अपने वज्र से कुंभकर्ण पर प्रहार किया, जिसके कारण विश्रवा ऋषि का वह पुत्र अचेत हो गया, परंतु शीघ्र ही चेतना लौटने पर कुंभकर्ण ने ऐरावत हाथी का एक दाँत उखाड़कर, उससे इंद्र के सोने पर प्रहार किया और इंद्र को गंभीर रूप से घायल कर दिया। स्वर्ग के राजा इंद्र सभी जीवधारियों को साथ लेकर ब्रह्माजी के दर्शन करने पहुँचे।
ब्रह्माजी को नमन करने के बाद, उन्होंने अपनी समस्या का वर्णन करते हुए कहा, विश्रवा का पुत्र, कुंभकर्ण ऋषि-मुनियों को सता रहा है और अनेक पुरुषों की पत्नियों का अपहरण कर रहा है। इसके अतिरिक्त, वह इतनी अधिक गति से हमारा भक्षण कर रहा है कि शीघ्र ही हम सभी लुप्त हो जायेंगे।
ब्रह्माजी ने गहन ध्यान लगाया। अपनी दिव्य दृष्टि से कुंभकर्ण को देखने के बाद, ब्रह्माजी अत्यन्त व्यग्र हो उठे। इस विकट स्थिति पर विचार करने के बाद वह कुंभकर्ण के पास जाकर बोले, तुम्हें संसार के विनाश के लिए निर्मित किया गया है. परंतु इस समय ब्रह्माण्ड को सुरक्षित रखने का समय है। इसलिए सभी जीवधारियों की सुरक्षा व कल्याण के लिए, तुम आज से निरंतर गहरी नींद में सोए रहोगे।
ब्रह्माजी के शाप से कुंभकर्ण तत्काल निद्रामग्न होकर, अपने बड़े भाई के देखते-देखते वहीं गिर पड़ा। तब रावण ने याचना करके कहा, 'हे पितामह, आपने एक फल देने वाले वृक्ष को असमय ही काट गिराया। हे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के परम गुरु! अपने पौत्र को इस प्रकार से आपका शाप देना उचित नहीं है। मैं जानता हूँ कि आपकी कही बात असत्य नहीं हो सकती है, परंतु आप कुंभकर्ण को कम से कम कुछ समय तो जागृत अवस्था में रहने के लिए भी दें।
ब्रह्माजी बोले, मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ण करता हूँ। कुंभकर्ण छह माह तक निरंतर सोता रहेगा और फिर एक दिन के लिए जागेगा। इस दौरान वह पृथ्वी का। भ्रमण कर सकता है और जो भी चाहे खा सकता है, परंतु दिन पूरा होते ही वह फिर से गहन निद्रा में डूब जायेगा।
विभीषण ने कथा समाप्त करते हुए कहा, रावण ने युद्ध के भीषण दबाव में कुंभकर्ण को असमय जागृत किया है। इस विशालकाय राक्षस को देखने मात्र से हमारे वानर सैनिक उधेड़बुन में पड़ गये हैं। मेरा सुझाव है कि हम वानरों से यह कहें कि कुंभकर्ण एक विशाल यांत्रिक उपकरण है। इस प्रकार, उनका भय दूर हो जायेगा।
जब कुंभकर्ण ने रावण के राजमहल में प्रवेश किया, तो राम ने नील को आदेश दिया कि वह वानरों को लेकर लंका नगरी के द्वारों पर आक्रमण कर दें। इस प्रकार, जिस समय कुंभकर्ण अपने हजारों अनुगामियों के साथ रावण के पास गया, तब भीषण युद्ध छिड़ा हुआ था। रावण बहुत परेशानी भरी मनःस्थिति में अपने पुष्पक रथ पर बैठा हुआ था। परंतु अपने भाई को देखकर रावण को जान में जान आ गई। कुंभकर्ण को अपने पास बिठाकर, रावण ने स्नेह के साथ उसका आलिंगन किया।
कुंभकर्ण ने पूछा, मेरे प्रिय भाई, मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूँ ?
इस पर रावण बोला, जैसा कि तुम जानते हो, राम ने वानरों की एक विशाल । सेना के साथ लंका पर आक्रमण कर दिया है और अनेक अग्रणी राक्षस गण मारे जा चुके हैं। मेरे प्रिय भाई, राम व लक्ष्मण को मारने के लिए मैं अब तुम्हारे भरोसे हूँ, क्योंकि मुझे अन्य कोई यह काम करने में सक्षम नहीं दिख रहा है।
कुंभकर्ण ने खुलकर हँसते हुए कहा, विभीषण और अन्य बुद्धिमान मंत्रियों ने जो भविष्यवाणी की थी वह अब दिखाई दे रही है। हे रावण, तुम मूर्ख हो क्योंकि तुमने अपने सच्चे शुभचिंतकों की अच्छी सलाह मानने से इंकार कर दिया। विभीषण और मंदोदरी ने तुम्हें ठीक ही सलाह दी थी कि सीता को राम के पास लौटा दो।
हे राजन, अब भी गलती सुधारने के लिए बहुत देर नहीं हुई है, परंतु यह निर्णय तुम्हें ही करना होगा।
रावण यह सुनकर क्रोधित हो गया, परंतु स्वयं पर संयम रखकर वह बोला, "इस समय जबकि युद्ध प्रचंड रूप से छिड़ चुका है, ऐसे में इस तरह की बातें करना व्यर्थ है। मेरे प्रिय भाई, मान लो कि सीता का अपहरण करके मैंने भूल की, परंतु तब भी मैं तुमसे अनुरोध करता हूँ कि तुम अपनी अतुलनीय शक्ति प्रदर्शित करके मेरी यह भूल ठीक कर दो।
अपने भाई को शांत करने के लिए, कुंभकर्ण ने स्नेहपूर्वक कहा, हे राजन, चिंता न करें। मैं वचन देता हूँ कि मैं राम व लक्ष्मण का वध कर दूंगा और साथ ही सुग्रीव व हनुमान सहित सभी वानरों का संहार कर दूँगा। इन तथाकथित शूरवीरों ने मेरी अनुपस्थिति का लाभ उठाकर तुम्हारी सेना को इतना अधिक नुकसान पहुँचाया हैं अब तुम देखना कि मेरी परम शक्ति के सामने शत्रु कितना तुच्छ दिखाई देता है ।
रावण को प्रसन्न करने की इच्छा से, महोदर ने कुंभकर्ण को टोकते हुए कहा, तुम अहंकारी और मूर्ख हो, जो अपने बड़े भाई की इस प्रकार से आलोचना कर रहे हो। वह राजा है, इसलिए वह जो चाहें कर सकते हैं। रावण द्वारा सीता का अपहरण करने में कोई बुराई नहीं है क्योंकि राजा-महाराजा इस प्रकार के कार्य करके अपनी शक्तियों का प्रदर्शन स्वाभाविक रूप से किया करते हैं। हे अहंकारी महाकाय राक्षस, मैं विश्वासपूर्वक कहता हूँ कि अपने दावे के अनुसार तुम केवल अपनी शक्ति के दम पर राम को परास्त नहीं कर पाओगे।
फिर रावण की ओर मुड़कर, महोदर बोला, हे राजन, मैंने सीता को जीतने के लिए एक शानदार योजना बनाई है। आप कुंभकर्ण और मुझे अन्य राक्षस शूरवीरों के साथ इसी समय राम पर अचानक आक्रमण करने की अनुमति दें। यदि हम उनका वध करने में सफल रहे, तो विजय हमारी होगी. परंतु यदि हम राम का वध नहीं कर पाए, तब भी हम लंका वापस आकर यह दावा कर सकते हैं कि हमने राम को खा लिया है। तब इस झूठी कहानी को ढोल-नगाड़े बजाकर पूरी लंका नगरी में प्रसारित कर दिया जाये और सैनिकों व सेवकों को पुरस्कृत किया जाये। इस प्रकार शीघ्र ही यह अफवाह सीता तक पहुँच जायेगी।
मेरे प्रिय रावण, जब सीता दुख के सागर में डूब जाये, तब आप वहाँ जायें। उसे राजसी आराम और ऐश्वर्य का लालच दें और उसका विश्वास जीतने का पूरा प्रयास करें। जब सीता को यह महसूस होगा कि अब उसका कोई रक्षक नहीं रह गया है, तो मुझे विश्वास है कि वह आपके सामने आत्म समर्पण कर देगी।
हे राजन, यदि आप राम के साथ युद्ध करते हैं, तो आप निश्चित ही युद्ध क्षेत्र में प्राण गँवा देंगे, परंतु यदि आप मेरी सलाह मानते हैं, तो आप बिना किसी युद्ध के सीता पर विजय पा सकते हैं।
कुंभकर्ण ने उसे फटकारते हुए कहा, हे महोदर, तुम्हारी सलाह कायर राजाओं के मन को ही भा सकती है। मैंने राम का वध करने का निश्चय कर लिया है और मेरा संकल्प व्यर्थ नहीं जा सकता है। तुम लोगों ने युद्ध का सत्यानाश कर दिया है, इसी कारण लंका की जनसंख्या बहुत कम रह गई है। अब मैं सबकुछ सुधार दूँगा और मुझे किसी और की सहायता की आवश्यकता नहीं है।
रावण ने अट्टहास करके हँसते हुए कहा, तुम सत्य कहते हो। महोदर निश्चित ही राम से बहुत भयभीत हो गया है। मेरे प्रिय कुंभकर्ण, युद्ध क्षेत्र में तुम्हारे क्रोध के सामने कोई भी नहीं टिक पाएगा। कृपा करके अब जाओ और हमारी चिंताएँ समाप्त करके लौटो। परंतु, अकेले मत जाना। अपने साथ एक विशाल सेना लेकर जाओ ताकि तुम पूरी तरह अपराजेय हो सको।
अपने महाकाय भाई की शक्तियों के बारे में सोचकर रावण में नया प्राण- संचार हुआ। युद्ध क्षेत्र में जाने की तैयारी करते हुए जब कुंभकर्ण ने एक भयानक भाला उठाया तो रावण उसके पास पहुँचा और उसने कुंभकर्ण के गले में एक सोने का हार और अनेक फूल मालाएँ डाली। एक अभेद्य कवच धारण करने के बाद, कुंभकर्ण ने रावण की प्रदक्षिणा की और उसे शीश झुकाकर प्रणाम किया। रावण ने कुंभकर्ण को गले से लगाकर उसे आशीष दिया।
युद्ध क्षेत्र की ओर बढ़ते समय कुंभकर्ण ने अपने शरीर को छह सौ धनुष लंबा और एक सौ धनुष चौड़ा फैला लिया। परंतु राम व लक्ष्मण का वध करने व समस्त वानरों का भक्षण कर लेने के उसके दृढ़ संकल्प के बावजूद, कुंभकर्ण को अनेक अपशगुन दिखाई देने लगे। आकाश में उल्कापात दिखने लगा और उसकी बाँई भुजा व बायीं आँख फड़कने लगी। एक गिद्ध उसके भाले के ऊपर आकर बैठ गया, परंतु नियति के लेखे की ओर बढ़ते अहंकारी कुंभकर्ण ने इस आपशगुनों पर ध्यान नहीं दिया।
लंका की रक्षा के लिए बनी चाहरदीवारी को फाँदकर जब कुंभकर्ण ने युद्ध क्षेत्र में कदम रखा, तो सभी वानर आतंकित होकर भाग गये। अंगद ने किसी तरह एक सेना संगठित की और फिर उन्होंने कुंभकर्ण पर अगणित वृक्षों और शिलाओं की वर्षा कर दी, परंतु ये सभी वस्तुएँ उस विशालकाय राक्षस के शरीर से टकराकर चूर-चूर हो जाती थीं। इस आक्रमण के प्रतिकार-स्वरूप, कुंभकर्ण ने अगणित बानरों को मार डाला और एक बार फिर वानर-गण आतंकित होकर भाग खड़े हुए। युद्ध क्षेत्र में मची इस भगदड़ से कुछ वानर पर्वत की चोटों से समुद्र में जा गिरे परंतु तब भी भय के कारण उन्होंने आँखें बंद ही किए रखीं।
अंगद ने वानरों को प्रोत्साहित करके कहा, युद्ध क्षेत्र से प्राण बचाकर भागने की अपेक्षा शान से मृत्यु का आलिंगन करना कहीं बेहतर है। क्योंकि कायरों को अपना शेष जीवन संबंधियों के उपहास का पात्र बनकर गुजारना पड़ता है और ऐसा अपमान मृत्यु से अधिक कष्टदायक होता है।
तब भी, अपने प्राणों के मोह में फँसे वानरों ने इधर-उधर भागना जारी रखा। अंततः जब अंगद ने यह आश्वासन दिया कि राम कुंभकर्ण का वध कर देंगे, तभी कही जाकर वे धीरे-धीरे युद्ध-क्षेत्र को लौटने लगे।
इसके बाद, जब वानरों ने कुंभकर्ण पर आक्रमण किया, तो वह अपनी गदा के प्रत्येक प्रहार से हजारों वानरों का वध करने लगा। साथ ही, वह विशालकाय राक्षस अपने हाथ से एक बार में कम से कम तीस वानरों को पकड़कर अपने मुँह में ठूँस लेता। द्विविद ने कुंभकर्ण पर एक विशाल चट्टान फेंकी. परंतु उनक निशाना चूक गया और यह चट्टान राक्षस सेना पर जा गिरी जिसके कारण अनेक राक्षस सैनिक मारे गये।
हनुमान ने आकाश से कुंभकर्ण पर विशाल शिला खंड बरसाने का प्रयास किया, पर इस महाकाय राक्षस ने उन्हें अपने हाथ से ही चकनाचूर कर दिया। तभी कुंभकर्ण एक भाला उठाकर वानरों की ओर बढ़ा, तो हनुमान ने उसका रास्ता रोककर उस पर चट्टानों की वर्षा कर दी। परंतु कुंभकर्ण ने इस आक्रमण की अनदेखी की और क्रोध से हनुमान पर भाले से प्रहार किया और भाले ने हनुमान का सीना छलनी कर दिया और भयानक प्रहार के कारण वह भयानक पीड़ा से कराहते हुए खून की उल्टियों करने लगे।
राक्षसों को हनुमान की दशा देखकर बहुत प्रसन्नता हुई, परंतु वानर यह सब देखकर पीछे भागने लगे। ऋषभ, शरभ, नोल, गवाक्ष और गंधमादन ने तब एक साथ मिलकर कुंभकर्ण पर हमला बोल दिया। परंतु उनके भीषण प्रहार उस विशालकाय राक्षस को स्नेह से हाथ फेरने जैसे महसूस हुए। कुंभकर्ण ने ऋषभ को पकड़ लिया और अपने हाथों से उसे मसलकर जमीन पर पटक दिया। इसके बाद कुंभकर्ण ने अन्य वानर शूरवीरों को घायल करके जमीन पर पटक दिया।
यह देखकर अन्य वानर-गण अत्यधिक क्रोध से भर गये। उन्होंने एक साथ मिलकर, एक ही समय पर हजारों की संख्या में कुंभकर्ण पर धावा बोल दिया और उसके शरीर पर ऐसे चढ़ गये मानो वह कोई विशाल पर्वत हो। इधर वानर गण अपने तीखे दाँतों से उसे नोंच-खसोट रहे थे, तो उधर कुंभकर्ण उन्हें जल्दी-जल्दी पकड़कर अपने खुले मुंह में ठूँसता जाता था।
इस प्रकार, कुंभकर्ण ने युद्ध-क्षेत्र में अफरा-तफरी मचा दी और अगणित वानरों को खा गया, परंतु उनमें से कुछ उसके मुँह में जाने के बाद भी उसके नासिका छिद्रों और कानों के रास्ते बच निकलने में सफल हो गये।
जिस समय वानरों ने भगवान् राम के पास शरण लो, तभी अंगद ने अचानक कुंभकर्ण के सिर पर एक विशाल चट्टान फेंककर आक्रमण किया। इससे उस दैत्य का क्रोध भड़क उठा और उसने अपना भाला लहराते हुए अंगद पर धावा बोल दिया। अंगद भाले के वार से बच निकले और फिर उन्होंने कुंभकर्ण के सीने पर जोरदार प्रहार करके उसे जमीन पर गिरा दिया। कुंभकर्ण ने जल्दी ही स्वयं को संभाल लिया और फिर खड़ा उठकर उसने उल्टे हाथ से अंगद पर प्रहार किया जिसके आघात से अंगद अचेत होकर जमीन पर गिर पड़े।
इसके बाद, कुंभकर्ण अपना भाला उठाकर सुग्रीव की ओर दौड़ा, परंतु सुग्रीव ने शीघ्रता से एक चट्टान उठा ली और अपने प्रतिद्वंद्वी से भिड़ने का अवसर देखने लगे। सुग्रीव ने कुंभकर्ण पर चट्टान फेंककर मारा जो उसके शरीर से टकराकर चूर-चूर हो गया। यह देखकर राक्षस खुशी से चिल्ला उठे, जबकि वानरों में निराशा फैल गई। कुंभकर्ण ने घोर गर्जना करते हुए अपना भाला फेंक दिया।
हनुमान बहुत ध्यान से यह द्वंद्व देख रहे थे और सुग्रीव को कठिन स्थिति देखकर उन्होंने अचानक छलाँग लगा दी। भाले को बीच रास्ते में ही पकड़कर हनुमान ने उसे अपने घुटने के सहारे दो टुकड़ों में तोड़ दिया। यह देखकर वानर- गण प्रसन्नता से चिल्लाने लगे, जबकि कुंभकर्ण घोड़ा निराश हुआ। परंतु, अत्यधिक उत्तेजित होकर उसने चट्टानों का एक विशाल पुँज उठाकर बहुत वेग से उसे सुग्रीव की ओर फेंक दिया। चट्टानों के प्रहार से सुग्रीव अचेत होकर जमीन पर गिर पड़े और तब कुंभकर्ण ने शीघ्रता से जाकर उन्हें उठा लिया। फिर, सुग्रीव को अपनी काँख में दबाकर वह दैत्य लंका को लौट पड़ा।
यह देखकर, हनुमान ने मन ही मन सोचा, यदि सुग्रीव को बंदी बना लिया जाता है, तो हमारा उद्देश्य असफल हो जायेगा। मुझे अपना आकार पर्वत के समान विशाल बनाकर कुंभकर्ण का वध कर देना चाहिए।
परंतु अगले ही क्षण हनुमान ने सोचा, मुझे विश्वास है कि सुग्रीव को शीघ्र ही होश आ जायेगा और वह स्वयं को मुक्त कर लेंगे। यदि किसी राजा के प्राणों की रक्षा कोई अन्य करे, तो इससे निश्चित ही राजा को निराशा होगी।
सुग्रीव को अपनी काँख में दबाए हुए, कुंभकर्ण ने लंका में प्रवेश किया तो सभी नागरिक प्रसन्नता से भर गये और वे विजेता नायक पर भुने हुए अन्न और सुगंधित जल को वर्षा करने लगे। इन वस्तुओं के कारण सुग्रीव शीघ्र होश में आ गये। स्थिति का आकलन करते के बाद, उन्होंने मुक्त होने का प्रयास आरंभ कर दिया। पहले, सुग्रीव ने अपने तीखे नाखूनों में कुंभकर्ण के कानों की लवों को नोच डाला। फिर, अपने पंजों से उस राक्षस के नासिका द्वार को फैलाकर काट दिया। अचानक हुए तीखे दर्द के कारण, कुंभकर्ण ने क्रोध से सुग्रीव को जमीन पर गिरा दिया और फिर उन्हें मारने-पीटने लगा। सुग्रीव ने अंततः हवा में छलांग लगाई और पल भर में ही वह राम के पास वापस लौट आये।
क्रोधित कुंभकर्ण को भूख लग गई थी, इस कारण वह एक विशाल हथौड़ा उठाकर फिर से शत्रु सेना में घुस पड़ा ताकि वह वानरों को खाकर भूख शांत कर सके। उस राक्षस ने मुट्ठी भर वानरों को पकड़कर मुँह में ठूँस लिया जिससे उसके मुँह के कोरों से रक्त और चर्बी की एक धार बह निकली। तब आतंकित वानरों ने राम की शरण ली, परंतु कुंभकर्ण इधर-उधर दौड़ने लगा और उसने बाँहें फैलाकर एक बार में सैकड़ों वानरों को घेर लिया।
तब लक्ष्मण उस दैत्य कुंभकर्ण पर आक्रमण करने के लिए उसकी ओर बढे और उस पर अपने बाणों की वर्षा कर दी। उस विशाल दैत्य ने इन बाणों को आसानी से परे हटा दिया और घृणापूर्वक बोला, मैं राम के साथ युद्ध करता चाहता हूँ, उसके छोटे भाई के साथ नहीं।
उत्तर में लक्ष्मण ने राम की ओर इशारा कर दिया और तब कुंभकर्ण राम की ओर बढ़ा। राम ने शीघ्र ही रुद्र अस्त्र का आवाहन किया और उसे दौड़कर आते राक्षस पर चला दिया। कुंभकर्ण के सीने पर जब वह अस्त्र लगा, तो वह लड़खड़ाया और उसने अपना गदा व अन्य अस्त्र-शस्त्र गिरा दिए। तब अनेक वानर कुंभकर्ण की दयनीय दशा का लाभ उठाने की आशा से उसके ऊपर चढ़कर कूदने और मारने लगे, परंतु उस राक्षस ने अपने मुक्कों से मारकर उन्हें पीछे फेंक दिया।
खड़े हो जाने पर कुंभकर्ण ने चट्टानों का एक ढेर उठा लिया और एक बार फिर राम पर धावा बोल दिया। राम ने शीघ्र ही इन चट्टानों को सात बाणों से चूर- चूर कर दिया और चट्टानों के इस मलबे के नीचे गिरने से दो सौ से अधिक वानर सैनिक दबकर मारे गये।
लक्ष्मण ने राम से कहा, रक्त पीने के कारण कुंभकर्ण अत्यधिक उन्मत्त हो उठा है और वह वानरों व राक्षसों को बिना देखे खाता जा रहा है। मेरे विचार से हजारों वानरों को जाकर कुंभकर्ण के पूरे शरीर पर चढ़ जाना चाहिए। इस प्रकार उसका भार बढ़ जायेगा और उसे आसानी से परास्त किया जा सकेगा।
इसके बाद, अगणित वानर कुंभकर्ण के शरीर पर चढ़ने लगे। जिस समय कुंभकर्ण अपना शरीर झटककर उन्हें गिरा रहा था और साथ ही इधर-उधर भटककर कुछ खाने को देख रहा था. उसी समय राम ने उस पर आक्रमण करने का अवसर देखा। अपने धनुष की प्रत्यंचा को कान तक खींचकर राम ने उसे ललकारते हुए कहा, अरे अधम राक्षस, मेरे सामने एक क्षण के लिए आकर खड़ा हो और देख कि कैसे मेरे बाण तुझे यमराज के धाम पहुँचाते हैं।
राम को अपने सामने देखकर, कुंभकर्ण प्रसन्न हो गया। अट्टहासपूर्वक हँसता हुआ वह गर्जनकारी स्वर में बोला, अहोभाग्य मेरे आपने कृपापूर्वक मुझे यह अवसर दे ही दिया है, तो अब में आपको तत्काल खा जाऊँगा।
राम ने उस पर बाणों की वर्षों कर दी, परंतु कुंभकर्ण ने विचलित हुए बिना एक भयानक गदा उठा ली ताकि वह बिना विलंब किए तत्काल अपने शत्रु का वध कर सके। प्रत्युत्तर में, राम ने एक शक्तिशाली वायु अस्त्र चलाकर, कुंभकर्ण के दाहिने हाथ की काट गिराया जिससे उसने एक विशाल गदा थाम रखा था। वह दैत्याकार राक्षस भयानक पीड़ा से बिलबिला उठा। उसका हाथ जब जमीन पर गिरा, तो उसके भार से वानर सैनिकों की एक पूरी टुकड़ी कुचलकर मारी गई। क्रोध से पागल होकर, कुंभकर्ण ने अपने बाएँ हाथ से एक विशाल वृक्ष उखाड़ लिया और राम की ओर दौड़ पड़ा। तब भगवान् राम ने शक्तिशाली ऐन्द्र अस्व चलाकर कुंभकर्ण का बायाँ हाथ भी काट गिराया और इसके जमीन पर गिरने से ढेरों वानर और राक्षस मारे गये।
हाथों के कट जाने पर भी, कुंभकर्ण पागलों के समान गर्जना करता हुआ राम की ओर दौड़ा। राम ने दो बाणों से उसके विशाल पैर काट गिराए। तब भी कुंभकर्ण अपना भयानक मुख खोले हुए और उन्माद से हिलते लुढ़कते हुए राम को निगल लेने की आशा के साथ उनकी ओर बढ़ा। कुंभकर्ण को लगातार अपनी ओर बढ़ता देखकर, राम ने उसके खुले मुख को बाणों से इस कदर भर दिया कि साँस लेने की जगह भी नहीं बची। अंततः, भयानक पीड़ा के कारण चेतना खोकर लुढकने लगे राक्षस पर राम ने एक और ऐन्द्र अस्त्र से प्रहार किया। इस अस्त्र ने अपने तेज से दशों दिशाओं को आलोकित करने के बाद, कुंभकर्ण के सिर को काट गिराया।
कुंभकर्ण का विशाल धड़ जब समुद्र में गिरा तो इसके भार से विशाल जलीय जीव कुचलकर मर गये, जबकि पूर्ण चंद्र के समान चमकता हुआ उसका कटा सिर लंका नगरी में विशाल राजमहलों को चकनाचूर करता हुआ और साथ ही प्रतिरक्षी चाहरदीवारी के एक हिस्से को गिराता हुआ राक्षस-राज के मुख्य मार्ग पर जा गिरा। आकाश-लोक में देवगण प्रसन्नता से चिल्लाने लगे जबकि वानर-गण अथक रूप से राम को इस विजय का गुणगान करने लगे। यह पराक्रमपूर्ण कार्य संपन्न करके राम को अत्यन्त शान्ति महसूस हुई।
जब रावण को कुंभकर्ण की मृत्यु का समाचार मिला और यह पता चला कि किस प्रकार उसका आधा शरीर समुद्र में डूब गया जबकि उसका सिर नगर के द्वार पर गिरकर रास्ता रोके हुए है, तो रावण यह सहन नहीं कर सका और अपने सिंहासन पर ही लुढ़ककर अचेत हो गया।
चेतना वापस लौटने पर रावण विलाप करने लगा, कुंभकर्ण के बिना अब मेरा जीना व्यर्थ है। मैं भी कितना मूर्ख हूँ कि मैंने अपने धर्मात्मा भाई विभीषण की अच्छी सलाह तक नहीं मानी!
तब रावण का एक पुत्र त्रिशिर बोला, मेरे प्रिय पिता, कृपा करके इस प्रकार से विलाप नहीं करें। मैं अत्यन्त शक्तिशाली हूँ और मेरे पास ब्रह्माजी से मिले अस्त्र शस्त्र भी हैं। मेरे भाई – देवांतक, नरांतक और अतिकाय अत्यधिक शक्तिशाली हैं और मायावी शक्तियों में निपुण हैं। वे आकाश में उड़ते हुए युद्ध कर सकते हैं। हम सब एक साथ जायेंगे और राम, लक्ष्मण तथा वानर योद्धाओं का वध कर देंगे। अब कृपा करके अपनी निराशा का त्याग करें!
त्रिशिर का आश्वासन सुनकर रावण को थोड़ी तसल्ली मिली। अपने चारों पुत्रों को आभूषणों व फूल-मालाओं से अलंकृत करने के बाद, राजा ने उन्हें महापार्श्व व महोदर के साथ युद्ध करने भेज दिया। छह पराक्रमी राक्षसों और एक विशाल सेना के लंका नगरी से बाहर निकलने पर दोनों पक्षों के सैनिकों ने घोर गर्जन-ध्वनि की। शीघ्र ही रणभूमि में घमासान मच गया और मृत शरीरों, कटे हाथ-पैरों, टूटे हुए रथों, वृक्षों व चट्टानों से भर जाने के कारण वहाँ चलना तक मुश्किल हो गया।
सुग्रीव द्वारा रावण के पुत्र नरांतक पर आक्रमण करने का आदेश मिलने पर अंगद बिना अस्त्र-शस्त्र के आगे बढ़ते हुए ललकारने लगे, सामान्य वानरों के साथ युद्ध करके अपना समय व्यर्थ क्यों कर रहे हो ? यदि तुम स्वयं को एक शूरवीर मानते हो, तो अपने भाले से मेरे सीने पर प्रहार करो!
क्रोध से अपना होंठ काटते हुए, नरांतक ने अंगद की ओर अपना भाला फेंका, परंतु अंगद के सीने से टकराकर भाला टूट गया और जमीन पर गिर गया। अंगद ने चपलता से आगे दौड़कर अपनी बँधी हुई मुट्ठी से नरांतक के घोड़े के सिर पर प्रहार किया। घोड़े का सिर फट पड़ा और वह मृत होकर जमीन पर गिर गया। जिसके कारण क्रोध से उन्मत्त नरांतक जमीन पर कूद गया। तब उसने अपने मुक्के अंगद के सिर पर जोरदार प्रहार किया। इस प्रहार के कारण अंगद के घावों से रक्त उमड़ने लगा और वह चकराकर पीछे की ओर लुढ़क पड़े। शीघ्र ही स्वयं को सामान्य करके, अंगद आगे की ओर दौड़े और नरांतक पर अपने मक्के का भरपूर प्रहार किया। इस प्रहार से राक्षस का सीना फट गया और वह मृत होकर रणभूमि पर गिर पड़ा।
राजकुमार की शक्ति देखकर राम चकित और प्रसन्न हुए, परंतु महोदर से अपने भतीजे की मृत्यु सहन नहीं हुई, इसलिए वह देवांतक और त्रिशिर के साथ क्रोध से भरकर अंगद की ओर दौड़ पड़े। अंगद ने एक विशाल वृक्ष उखाड़कर देवांतक की ओर फेंका। त्रिशिर ने अपने बाणों से वृक्ष के टुकड़े-टुकड़े कर दिए, इसलिए अंगद ने तीन और वृक्ष तथा शिलाखंड फेंककर आक्रमण किया परंतु ये सभी व्यर्थ गये।
तभी महोदर एक हाथी पर चढ़कर अंगद के सामने आया और उसने अपनी काँटेदार गदा से अंगद के सीने पर प्रहार किया। अंगद इस प्रहार से तनिक भी विचलित नहीं हुए और उन्होंने उसके हाथी पर भयानक मुक्के बरसाने शुरू कर दिए। जब हाथी निष्प्राण होकर जमीन पर गिर पड़ा, तो अंगद ने उसका एक दाँत उखाड़कर देवांतक पर इससे प्रहार करके उसे गंभीर रूप से घायल कर दिया। देवांतक को शीघ्र ही होश आ गया और उसने अंगद पर अपने गदा से प्रहार किया जिसके कारण अंगद घुटनों के बल गिर पड़े। जैसे ही अंगद अपने पैरों पर खड़े हुए तभी त्रिशिर ने तीन बाणों से उनके माथे को वेध दिया और तभी नील और हनुमान उनकी सहायता के लिए वहाँ पहुँच गये।
देवांतक ने अपना गदा लहराते हुए हनुमान पर धावा बोला। गदा के प्रहार से बचने के लिए हनुमान हवा में उछल गये और साथ ही उन्होंने मुट्ठी भींचकर उस राक्षस के सिर पर प्रहार किया। सिर के चकनाचूर हो जाने के कारण, देवांतक निष्प्राण होकर रणभूमि पर गिर गया।
इसी बीच, त्रिशिर ने नील पर बाणों की वर्षा कर दी और महोदर एक अन्य हाथी पर सवार होकर युद्ध करने लगा। नील के सभी हाथ-पैर बाणों से विंध जाने के कारण, कुछ क्षण के लिए वह अचेत हो गये। इसके बाद, होश लौट आने पर उन्होंने एक पर्वत-शिखर से कुछ चट्टानें उखाड़ लीं। फिर, नील ने अचानक हवा में छलाँग लगा दी और उन चट्टानों को महोदर के सिर पर पटक दिया। महोदर को अपनी आँखों के सामने निष्प्राण होकर गिरते देख, त्रिशिर क्रोध से पागल हो उठा। त्रिशिर ने जब बाणों की वर्षा करनी आरंभ की, तो हनुमान ने उनका सामना किया, परंतु तीन सिरों वाले उस राक्षस ने हनुमान के सभी अस्त्र-शस्त्रों को चूर चूर कर दिया।
हनुमान ने हतोत्साहित होकर, त्रिशिर के घोड़े पर छलाँग लगा दी और अपने तीखे नाखूनों से उसे मार डाला। त्रिशिर ने अपने भाले से हनुमान को छलनी करने का प्रयास किया, परंतु पवन पुत्र ने उसके हाथ से भाला छीनकर उसे तोड़ा डाला त्रिशिर ने तत्काल अपनी तलवार निकाल निकाल ली और हनुमान के सीने को इसके तिरछे प्रहार से घायल कर दिया। घायल हो जाने पर भी, हनुमान ने त्रिशिर के सीने पर जोरदार प्रहार किया जिसके कारण वह चकराकर अपने घोड़े से नीचे गिर पड़ा। हनुमान ने भी घोड़े से नीचे छलाँग लगा दी और त्रिशिर के हाथों से गिर पड़ी तलवार उठाकर भयानक गर्जना की।
त्रिशिर के लिए यह असह्य था वह तेजी से उछला और उसने हनुमान के सीने पर जोरदार मुक्का मारा। हनुमान ने क्रोध से भरकर त्रिशिर को तीन गर्दनों में से एक को पकड़ लिया और फिर उसी की तलवार से एक-एक करके उसके तीनों सिरों को काट डाला।
यह देखकर, वानर-गण विजयोल्लास से चिल्लाए, परंतु तभी ऋषभ की चुनौती सुनकर महापार्श्व ने अपना लोहे का मुद्गर उठा लिया। महापार्श्व ने अपने मुद्गर से ऋषभ के सोने पर चोट की जिसके कारण वह लड़खड़ाकर जमीन पर गिर पड़े। परंतु ऋषभ तत्काल उठ खड़े हुए और महापार्श्व पर धावा बोलते। हुए उन्होंने अपने मुक्के से उसके सीने पर जोरदार वार किया। इस भयानक वार के कारण अपने ही रक्त से नहाया हुआ वह राक्षस नीचे गिर पड़ा। महापार्श्व ते बची- खुची ताकत बटोरने की कोशिश की, पर तब तक ऋषभ ने उसका लोहे का मुद्गर उठा लिया।
थोड़ी देर तक कहा सुनी होने के बाद, ऋषभ ने महापार्श्व के सीने पर प्रहार किया और उसके घावों से रक्त फूट पड़ा। राक्षस ने अपना हथियार वापस पाने का प्रयास किया, परंतु इससे पहले कि वह ऐसा कर पाता, ऋषभ ने काँटेदार मुद्गर को राक्षस के सिर पर पटक दिया जिसके कारण वह निष्प्राण होकर जमीन पर गिर गया और उसकी आँखें और दाँत पूरी तरह कुचल गये।
यह देखकर, राक्षस सेना भय से तितर-बितर होने लगी, परंतु तभी विशाल शरीर वाले अतिकाय ने अपने रथ पर सवार होकर वानरों पर आक्रमण आरंभ कर दिया। वानरों ने जब उसका विशालकाय शरीर देखा, तो वे सोचने लगे कि कुंभकर्ण के प्राण लौट आये हैं, इसलिए वे भयभीत होकर भगवान् राम की शरण में चले गये।
राम भी उस विशालकाय दैत्य को देखकर आश्चर्यचकित हुए, इसलिए उन्होंने विभीषण से उसके बारे में पूछा। विभीषण बोले, विशालकाय देह वाला यह राक्षस, रावण व धन्यमालिनी का पुत्र है और इसका नाम अतिकाय है। कठोर तपस्या करने के बाद, इसने ब्रह्माजी से असाधारण शक्तिशाली बनने का वरदान प्राप्त किया था। मेरे प्रिय राम, अतीत में हुए युद्धों में, यह अतिकाय स्वर्ग के राजा इंद्र के बज्र का और वरुण के पाशों का सामना करने में सफल रहा था। इसलिए, आप इसे तत्काल मार डालें, अन्यथा शीघ्र ही यह वानरों को सम्पूर्ण सेना का नाश कर डालेगा।
इसके बाद छिड़े युद्ध में, अतिकाय ने कुछ समय तक वानरों के साथ युद्ध किया। फिर, उन्हें छोड़कर वह राम की ओर बढ़ा और उन्हें अपमानजनक शब्द कहने लगा। यह सुनकर लक्ष्मण को अत्यधिक क्रोध आ गया और वह अतिकाय पर आक्रमण करने के लिए आगे बढ़े।
विशाल देह वाला यह राक्षस, लक्ष्मण के धनुष की टंकार सुनकर आश्चर्यचकित रह गया, परंतु विचलित हुए बिना उसने एक बाण निकालकर लक्ष्मण से कहा, तुम अभी बच्चे हो, इसलिए बड़े होने तक रणभूमि से दूर रहने में हो तुम्हारी भलाई है। क्या तुम्हें अपने प्राणों का मोह नहीं है, जो तुम मुर्खता दिखाते हुए मेरे सामने आ रहे हो ?
यह सुनकर लक्ष्मण के क्रोध की ज्वाला और भी अधिक भड़क उठी और उन्होंने भी उस राक्षस को कटु शब्दों में जवाब दिया। इसके बाद, जब अतिकाय ने अपने धनुष की प्रत्यंचा पर बाण चढ़ाया, तो आकाश-लोक में स्थित देवराण उत्सुकता के साथ यह द्वंद्व देखने लगे। इधर से यह राक्षण वाण पर बाण चलाता जाता और दूसरी तरफ से लक्ष्मण उसके बाणों को काटते जाते फिर लक्ष्मण ने एक बाण से अतिकाय के मस्तक को वेध दिया जिसके कारण वह अत्यधिक दर्द से बिलबिलाता हुआ चकरा गया। होश संभालने पर, अतिकाय ने लक्ष्मण को योग्य प्रतिद्वंद्वी कहकर उनकी सराहना की।
दोनों के बीच युद्ध जारी था। तभी अतिकाय ने एक विशेष रूप से शक्तिशाली बाण चलाकर लक्ष्मण का सीना छलनी कर दिया। तेजी से उमड़ते रक्त की परवाह किए बिना, लक्ष्मण ने एक बाण निकाला और अग्नि देव का आवाहन करने वाला एक मंत्रोच्चार करके उस बाण को शक्ति प्रदान की। जब लक्ष्मण ने वह बाण चलाया, तो अतिकाय ने उसे निष्फल करने के लिए एक सूर्य अस्त्र छोड़ दिया। वायु मार्ग से आगे बढ़ते ये दोनों बाण आपस में टकराए और हवा में ही जलकर राख हो गये। इसके बाद, अतिकाय ने एक त्वष्ट अस्त्र चलाया और लक्ष्मण ने ऐन्द्र अस्त्र चलाकर इसे निष्फल कर दिया। इसके बाद, अतिकाय ने एक यम अस्त्र चलाया और लक्ष्मण ने वायु अस्त्र चलाकर उसे काटा।
फिर, लक्ष्मण ने बाणों की सतत वर्षा करनी आरंभ कर दी, परंतु ये बाण अतिकाय के कवच से टकराकर निष्फल हो जाते और जमीन पर गिर पड़ते। लक्ष्मण ने बाण चलाना जारी रखा, परंतु तभी अतिकाय ने अपने एक बाण से उनके सीने को घायल कर दिया जिसके कारण लक्ष्मण अचेत होकर जमीन पर गिर पड़े।
चेतना लौटने पर, लक्ष्मण ने आक्रमण जारी रखा और अतिकाय के घोड़ों व सारथी को मार गिराया, परंतु सर्वाधिक शक्तिशाली बाण चलाने के बावजूद वह रावण के पुत्र को तनिक भी घायल नहीं कर पाए। इसी समय, वायु देव लक्ष्मण के सामने प्रकट होकर उनसे बोले, अतिकाय को यह कवच ब्रह्माजी ने प्रदान किया था और यह अभेद्य है। इसी कारण से, अपने शत्रु का नाश करने के लिए आपको अपने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करना होगा।
लक्ष्मण ने उस महाशक्ति-संपन्न अस्त्र को अपने धनुष की प्रत्यंचा पर चढ़ाकर अतिकाय की ओर छोड़ दिया। अतिकाय ने अनेक बाण चलाकर ब्रह्मास्त्र को रोकते। का प्रयास किया, परंतु जब उसने देखा कि इसे रोकना असंभव प्रायः है, तो उसने भाले, गदाएँ और कुल्हाड़ियाँ फेंकना आरंभ कर दिया। परंतु इसका कोई लाभ नहीं हुआ और ब्रह्मास्त्र ने अतिकाय के विशाल सिर को काट गिराया। जब उसका कटा हुआ सिर जमीन पर लुढ़कने लगा, तो हताश राक्षस गण प्राण बचाने के लिए लंका नगरी की ओर दौड़ पड़े जबकि वानर-गण लक्ष्मण को बधाई देने के लिए उनकी ओर दौड़ पड़े।
अतिकाय की मृत्यु का समाचार सुनकर, रावण अत्यधिक दुखी और अवसादग्रस्त हो गया। निराशा से भरकर, उसने विलाप करना आरंभ कर दिया. राम और लक्ष्मण अपराजेय और अदम्य शक्तिमान हैं। वे पहले ही मेरे श्रेष्ठतम योद्धाओं का वध कर चुके हैं। अब मेरी समझ में आ गया है कि राम मानव रूप में स्वयं भगवान् नारायण हैं। यद्यपि मुझे पहले भी इस बारे में सूचना मिली थी, परंतु तब मुझे यह लगा था कि यह कायरों और पागलों की बातें हैं। अब भला राम को कौन पराजित कर सकता है ?
अपने पिता की आँखों में भरे आँसू देखकर और उसे दुख से अभिभूत दशा में पाकर, इंद्रजित बोल उठा, जब तक में जीवित हूँ, तब तक आपको ऐसे शोकाकुल होने की भला क्या आवश्यकता है। मेरे प्रिय पिता, मैं वचन देता हूँ कि मैं आज ही राम व लक्ष्मण का वध कर दूंगा।
अपने पिता से आशीर्वाद लेने के बाद, इंद्रजित पहले यज्ञवेदी पर गया। उसने एक बकरे को गर्दन से पकड़कर यज्ञ की अग्नि में आहुति-स्वरूप चढ़ा दिया। तत्क्षण हो, अग्नि अत्यन्त चमक के साथ प्रज्जवलित हो उठी और इस प्रकार अग्नि ने रावण के प्रिय पुत्र को विजय संकेत प्रदान कर दिया।
यज्ञ की अग्नि की लपटों से स्वयं अग्नि देव आहूति स्वीकार करने के लिए प्रकट हुए। इंद्रजित ने मंत्रों का पाठ करना आरंभ किया जिसके परिणामस्वरूप वह और गधों से खींचा जाने वाला उसका रथ, अपने सभी अस्त्र-शस्त्रों व सामग्रियों के साथ अदृश्य हो गये। अपनी सेना को भेजने के बाद, इंद्रजित अदृश्य रहकर ही आकाश में उड़ गया और उसने वानर सैनिकों पर वाणों की वर्षा आरंभ कर दी ।
वानरों ने बाणों के आने की दिशा में पत्थर और वृक्ष फेंककर आक्रमण करने का प्रयास किया, परंतु इंद्रजित ने इन सभी को चूर-चूर कर दिया। इसके बाद उसने ब्रह्मास्त्र का आवाहन किया जिसके कारण स्वर्ग लोक और पृथ्वी लोक काँप उठे और उस परम अस्त्र से अगणित बाण उत्पन्न हो गये जिन्होंने सभी पराक्रमी वानर योद्धाओं को जमीन पर गिरा दिया। अदृश्य अवस्था में रहते हुए ही, इंद्रजित अपने शत्रु पर भालों, तलवारों और कुल्हाड़ियों की वर्षा करने लगा।
आश्चर्य से स्तब्ध वानर-गण केवल आकाश से गिर रहे चमकदार अस्त्र-शस्त्र ही देख पा रहे थे और उन्हें चलाने वाला नहीं दिख रहा था। यहाँ तक कि हनुमान, सुग्रीव, जाम्बवान और नील भी घायल होकर जमीन पर गिर पड़े और राम व लक्ष्मण भी इंद्रजित के अस्त्र-शस्त्रों के सामने दुर्बल जान पड़ने लगे।
राम का पूरा शरीर बाणों से ढंक गया था, परंतु उनसे विचलित हुए बिना, राम बोले, हे लक्ष्मण, मैं समझ सकता हूँ कि इंद्रजित ब्रह्माजी की शक्ति का प्रयोग करके बाण चला रहा है। जब तक यह शक्तिशाली राक्षस अदृश्य रहेगा, तब तक कोई भी उसे पराजित नहीं कर सकता है। इसलिए, मेरे विचार से उसके आक्रमण को सहन करना ही सर्वोत्तम उपाय है। जब इंद्रजित यह देखेगा कि हम अचेत होकर गिर पड़े हैं, तब निश्चित ही वह स्वयं को विजयी समझकर रावण को सूचित करने लंका जायेगा।
इस प्रकार, इंद्रजित के बाणों से गंभीर रूप से घायल होकर राम व लक्ष्मण मूर्च्छित हो जमीन पर गिर पड़े। अपने शत्रुओं को जमीन पर पड़ा देखकर, इंद्रजित विजयोल्लास से चिल्लाया और अपने पिता को यह शुभ समाचार देने के लिए लंका लौट गया।
राम व लक्ष्मण को दयनीय दशा देखकर, वानर-गण निराशा से भर गये, परंतु विभीषण ने उनसे कहा, आप लोगों को इस प्रकार से विलाप नहीं करना चाहिए। राम व लक्ष्मण ने ब्रह्माजी के अस्त्र का सम्मान करने मात्र के लिए ही स्वेच्छा से स्वयं को इस असहाय दशा में डाला है। शीघ्र ही, वे पुनः उठ खड़े होंगे और शत्रु का संहार कर देंगे।
हनुमान ने ब्रह्मास्त्र को प्रणाम किया और यह प्रस्ताव रखा, युद्ध थम गया है और रात हो चुकी है। हमारा पहला काम यह है कि हम वानर सैनिकों का मनोबल बढ़ाएँ।
हनुमान और विभीषण मशालें लेकर रणभूमि में विचरण करने लगे। उन्होंने सुग्रीव, अंगद, नील, नल और अन्य 67 करोड़ वानरों को इंद्रजित के ब्रह्मास्त्र से चोट खाकर जमीन पर पड़ा देखा। वे जाम्बवान को ढूँढने लगे और वह उन्हें गंभीर रूप से घायल स्थिति में मिले और वह देखने में अक्षम हो गये थे। परंतु जाम्बवान ने पूछा, क्या हनुमान अब भी जीवित हैं ?
विभीषण ने प्रश्न किया, आपने राम, लक्ष्मण, सुग्रीव व अंगद के बारे में पूछे बिना, सबसे पहले हनुमान के बारे में ही क्यों पूछा?
इस पर जाम्बवान बोले, यदि हनुमान जीवित हैं, तो सेना का संहार हो चुका जान पड़ने के बाद भी सेना को कुशल स्थिति में समझें। जबकि, यदि हनुमान जीवित नहीं हों, तो भले ही सारे सैनिक जीवित हों, पर आप यह मान लें कि सम्पूर्ण सेना का संहार हो चुका है।
यह सुनकर, हनुमान जाम्बवान के पास गये और उनके पैर पकड़कर बोले, आप निश्चिंत रहें क्योंकि मैं सकुशल हैं।
तब जाम्बवान बोले, हे हनुमान, शीघ्र ही हिमालय जायें और ऋषभ पर्वत की खोज करें। ऋषभ और कैलाश पर्वत के बीच, शक्तिशाली चिकित्सकीय गुणों से भरपूर जड़ी-बूटियों वाला एक दैदीप्यमान पर्वत है जिसकी जड़ी-बूटियों की चमक सभी दिशाओं को आलोकित करती है। आपको उनमें से चार जड़ी-बूटियाँ लेकर यहाँ शीघ्र आना होगा। ये औषधियाँ हैं-मृत संजीवनी, जो मृत व्यक्ति में भी प्राण-संचार कर सकती है; शल्य-करणी, जिसका प्रयोग शरीर से अस्त्र निकालते समय किया जाता है और यह घाव भरने के काम आती है; सावर्ण-करणी, जो शरीर की सामान्य काँति लौटाती है; और संधान-करणी, जो टूटी हुई हड्डियों और कटे हुए हाथ-पैरों को जोड़कर स्वस्थ करने के काम आती है। यदि आप इन चार जड़ी-बूटियों को ला सके, तो सभी वानर शूरवीरों के प्राण लौटाए जा सकते हैं।
यह आदेश पाकर हनुमान अत्यन्त प्रसन्न हुए और उनमें नई ऊर्जा का संचार होने लगा। त्रिकूट पर्वत के शिखर पर पहुँचकर, एक प्रचंड उलाँग लगाने की तैयारी में वह पैर मोड़कर बैठ गये। हनुमान के पैरों के दबाव से, पर्वत-शिखर भरभराकर टूटने लगा और घर्षण के कारण गिरते हुए वृक्षों में आग लग गई। सम्पूर्ण लंका नगरी के काँपकँपाने के कारण वहाँ के राजमहल ढह कर गिरने लगे। इस कारण से सभी नागरिक बहुत भयभीत हो उठे।
सबसे पहले हनुमान ने समुद्र की दूसरी तरफ स्थित मलय पर्वत पर छलाँग लगाई। इसके बाद, स्वयं को और अधिक विस्तारित करते हुए, उन्होंने सूर्य देव को प्रणाम किया और आकाश में छलांग लगा दी और उनकी इस भीषण छलाँग की शक्ति के कारण विशाल चट्टानें और वृक्ष उनके साथ ही ऊपर को उड़ने लगे।
अत्यधिक वेग से हवा में उड़ते हुए, शीघ्र ही हनुमान को सुनहरे शिखरों वाली हिमालय पर्वत श्रृंखला दिखने लगी। उन्होंने ब्रह्माजी का आसन, हयग्रीव का आवास, ब्रह्मास्त्र के अधिष्ठाता देव का आवास देखा और साथ ही इंद्र, यम, कुबेर तथा अग्नि के आवास भी देखे ऋषभ पर्वत तथा कैलाश पर्वत को ढूँढ लेने के बाद, हनुमान ने जाम्बवान के निर्देशानुसार उनके बीच स्थित पर्वत को खोजा और वह इसके जगमग करते तेजोमय आलोक को देखकर आश्चर्यचकित रह गये।
हनुमान ने पागलों की भाँति सम्पूर्ण पर्वत पर मँगाई गई जड़ी-बूटियों की खोज की, परंतु बाहरी जीव के आ जाने का अनुभव करके पौधों ने स्वयं को छुपा लिया था और इसीलिए हनुमान उन्हें नहीं खोज पाए। अंततः, हताश होकर हनुमान ने घनघोर गर्जना की और ललकारते हुए कहा, हे पर्वत, राम की सेवा के इस कार्य में तुम्हारे द्वारा डाली जा रही इस प्रकार की रुकावट अक्षम्य है और यदि तुमने सहयोग नहीं किया तो मैं तुम्हें चकनाचूर कर दूंगा!
जब कोई प्रत्युत्तर नहीं मिला, तो हनुमान ने पर्वत का शिखर ही उखाड़ लिया और हवा में छलाँग लगा दी और शीघ्र ही वह 1000 योजन दूर लंका में वापस पहुँच गये। हनुमान जब त्रिकूट पर्वत पर उतरने के लिए नीचे आये, तो सभी वानरों ने प्रसन्नता से उनकी जय-जयकार की।
इसके बाद, राम व लक्ष्मण को जड़ी-बूटियों की सुगंध सुँघाई गई, जिससे उनके सभी घाव तत्काल ठीक हो गये। इसके बाद, सभी घायल वानरों को जड़ी सुधाई गई और परिणामस्वरूप वे सभी मानो गहन निद्रा से जागकर तत्काल अपने पैरों पर खड़े हो गये। यहाँ तक कि मारे जा चुके वानर-गण भी तत्काल स्वस्थ होकर पुनर्जीवित हो उठे।
अपना उद्देश्य पूर्ण हो जाने के बाद, हनुमान शीघ्र ही हिमालय लौट गये और उन्होंने पर्वत-शिखर को उसके उचित स्थान पर वापस रख दिया। यह पूरा घटनाक्रम मात्र एक दिन में ही घटित हो गया था, इसलिए हनुमान के लंका वापस लौटने के समय अंधेरा छा चुका था।
सुग्रीव बोले, मेरे प्रिय हनुमान, सभी मृत राक्षसों को रावण के आदेश से समुद्र में फिंकवा दिया गया है, इसलिए हम यह अनुमान नहीं लगा सकते कि शत्रु के कितने सैनिक मारे गये हैं। परंतु हम यह जानते हैं कि इंद्रजित को छोड़कर, रावण के अन्य सभी पुत्र मारे जा चुके हैं, इसलिए लंका अब व्यवहारतः अपना बचाव करने की स्थिति में नहीं रह गई है। मेरा सुझाव है कि हम सभी मशालें लेकर रात के समय नगर में घुस जायें और शत्रु को अस्त-व्यस्त कर दें।
इसके बाद शीघ्र ही वानर-गण लंका के लिए कूच कर गये। जब वे नगर के द्वारों पर पहुँचे, तो राक्षस पहरेदार भयभीत होकर भाग गये और इस तरह बानर- गण बिना किसी युद्ध के लंका के अंदर घुस गये। मशालें थामे हुए वानरों ने सारे राजमहलों को आग लगा दी। कुछ ही देर में, चारों ओर आग भड़क उठी और हजारों भवन धूल में मिल गये। आग से जल रहे राक्षस और जीव-जंतु दर्द से बिलबिलाते हुए सभी दिशाओं में दौड़ने लगे और सम्पूर्ण लंका नगरी में अफरा-तफरी फैल गई।
तभी, राम ने अपने धनुष से टंकार की लंका में फैले शोर को भेदती हुई यह टंकार चारों ओर गूँज उठी जिससे राक्षसों के हृदय भय से दहल उठे। राम ने अपने बाणों की वर्षा से लंका के मुख्य द्वार को नष्ट कर दिया और इस बर्बादी को देखकर रावण अत्यधिक क्रोध से कुपित हो उठा। उसने कुंभकर्ण के पुत्रों- कुंभ और निकुंभ के साथ अनेक पराक्रमी राक्षस योद्धाओं को भेजा जिनमें युपाक्ष, शोणताक्ष प्रजंध और कंपन शामिल थे। राक्षस और वानर, दोनों ही युद्ध के लिए तत्पर थे, इसलिए दोनों के बीच भयंकर रण छिड़ गया।
अंगद ने कंपन का वध कर दिया और फिर अपने हाथों से हो प्रजंध का सिर उखाड़ फेंका। इसके बाद, युपाक्ष और शोणताक्ष ने मैंद और द्विविद पर आक्रमण कर दिया। द्विविद ने शोणताक्ष का चेहरा अपने नाखूनों से फाड़ डाला और फिर उसे जमीन पर पटककर अपने घुटनों से उसके प्राण हर लिए। मैंद ने युपाक्ष को अपने सशक्त बाजुओं से भींचकर उसके शरीर से प्राण बाहर निकाल दिए।
कुंभ ने मैंद और द्विविद को गंभीर रूप से घायल कर दिया और अपने दोनों मामाओं की दुर्गति देखकर अंगद का क्रोध भड़क उठा। वह प्रतिशोध लेने के लिए कुंभ की ओर दौड़ पड़े और तब दोनों के बीच घमासान युद्ध छिड़ गया। ढेरों घावों से घायल होकर, अंगद अचेत अवस्था में जमीन पर गिर पड़े और तब कुछ वानर राम को इसकी सूचना देने गये। भगवान् राम ने तब जंभ और सुग्रीव को अंगद, की सहायता के लिए भेजा। एक-दूसरे पर अस्त्र-शस्त्रों की बौछार करने के बाद, सुग्रीव किसी तरह कुंभ के रथ के पास पहुँच गये।
सुग्रीव ने यकायक कुंभ के रथ पर छलाँग लगाकर, उसके हाथ से धनुष छीन लिया और इसके दो टुकड़े कर दिए। फिर वापस जमीन पर कूदकर, सुग्रीव बोले, हे कुंभ, तुमने आज रणभूमि में अद्वितीय पराक्रम का परिचय दिया है। रावण ने ब्रह्माजी से मिले वरदानों के कारण श्रेष्ठ शक्तियाँ अर्जित की हैं, जबकि तुम्हारे पिता के पास नैसर्गिक रूप से अतुलनीय शक्ति थी। तुम दोनों प्रकार से शक्तिशाली हो। मैं इसी समय तुम्हारा वध कर सकता हूँ, परंतु अभी तुम युद्ध से थके हुए हो, इसलिए मैं तुम्हें लंका वापस जाकर विश्राम करने की अनुमति देता हूँ। अगली बार हम उचित स्थितियों में युद्ध कर सकते हैं।
कुंभ ने सुग्रीव के उदार शब्दों को प्रशंसा की, परंतु उसका प्रस्ताव स्वीकार किए बिना, उसने अचानक ही अपने शक्तिशाली हाथों से वानर राज को पकड़ लिया। इन दोनों ने एक-दूसरे को कसकर भींच लिया और उनके इस शक्ति-प्रदर्शन से उत्पन्न हुए दबाव के कारण जमीन धँसने लगी। अंततः, सुग्रीव ने कुंभ को उठाकर समुद्र में फेंक दिया और समुद्र में उस विशाल राक्षस के गिरने से चारों और पर्वत के समान ऊँची-ऊँची लहरें उठने लगीं। कुंभ उछलकर वापस जमीन पर आ गया और तत्काल सुग्रीव पर धावा बोलकर उसने सुग्रीव को जमीन पर पटक दिया और उनके सीने पर बार-बार अपने मुक्कों से मारने लगा। सुग्रीव का कवच टूट गया और उनके घावों से रक्त उमड़ने लगा, परंतु इसके बावजूद, सुग्रीव ने अपनी शक्तिशाली मुट्ठी भींचकर अपनी पूरी शक्ति से कुंभ के सीने पर प्रहार किया। परिणामस्वरूप, वह विशाल राक्षस निष्प्राण होकर जमीन पर गिर पड़ा।
अपने मृत भाई को देखकर, निकुंभ ने इतनी भयंकर गर्जना को और अपनी गदा इतने प्रचंड वेग से लहराने लगा कि सभी वानर और राक्षस भय से स्तब्ध रह गये। जब हनुमान निकुंभ के सामने गये, तो उसने भयानक शक्ति से अपना गदा चलाकर उनके सीने पर प्रहार किया। परंतु इस प्रहार के परिणामस्वरूप उसका गदा टूटकर चूर-चूर हो गया।
इसके उत्तर में, हनुमान ने तत्क्षण अपनी बंधी मुट्ठी से निकुंभ के सीने पर वार किया जिसके कारण वह लड़खड़ाकर पीछे गिर गया। चेतना लौटने पर निकुंभ ने हनुमान को अपनी बाँहों में बंदी बना लिया और उन्हें साथ लेकर जाने लगा। हनुमान ने स्वयं को मुक्त कर लिया और फिर निकुंभ को जोर से जमीन पर पटक दिया। फिर उस राक्षस पर मुक्के बरसाने के बाद हनुमान ने अपने घुटनों से उसका मलीदा बना डाला और साथ ही उसके धड़ से उसका सिर उखाड़ लिया। इस जुगुप्सापूर्ण परंतु वीरता से भरे कृत्य को देखकर वानर- गण उत्साहित होकर प्रसन्नता से चीख उठे।
कुंभ और निकुंभ के वध की सूचना मिलने पर रावण ने खर के पुत्र महरक्ष को राम व लक्ष्मण के साथ युद्ध करने भेजा। यूँ तो महरक्ष ने रावण के सामने अपनी शक्तियों का बढ़-चढ़कर बखान किया, परंतु रणभूमि की ओर जाते समय उसकी पराजय की पूर्वसूचना देने वाले अपशगुनकारी चिह्न दिखने लगे। उसके सारथी के हाथों से चाबुक छूट गया और उसकी ध्वजा जमीन पर गिर पड़ी। उसके घोड़े मानो अवसादग्रस्त होकर लड़खड़ाने लगे और उनको आँखों से आँसू बहने लगे। तभी घने धूल से भरा एक गुबार उठने लगा जिसके कारण चारों ओर उदासी भरा अंधकार छा गया, परंतु महारक्ष ने इन सभी अपशगुनों की परवाह किए बिना आत्म-विश्वास के साथ युद्ध भूमि में प्रवेश किया।
युद्ध आरंभ होते हो, अनेक वानर महरक्ष के बाणों से विंधकर निष्प्राण होकर गिर पड़े। तब उस राक्षस ने विजय ध्वनि करते हुए हुँकार भरी जिसे सुनकर वानर गण अपने प्राण बचाकर इधर-उधर भागने लगे। यह देखकर राम ने अपना धनुष उठा लिया। जब भगवान् राम ने उस पर अपने बाणों की बौछार की, तो क्रुद्ध महरक्ष ने कटु शब्द कहकर उन्हें ललकारा। उस अहंकारी राक्षस के शब्द सुनकर, राम मुस्कुरा दिए और जोर से बोले, अरे मूर्ख, अहंकारी राक्षस! केवल शब्दों में युद्ध नहीं जीता जाता!
तब महरक्ष ने बाणों की वर्षा कर दी, परंतु राम ने अपने बाणों से उसके सभी बाणों को काट गिराया। एक-दूसरे के निकट पहुँचने पर, दोनों के बीच इतना भीषण युद्ध छिड़ा कि उस शानदार रण का नजारा देखने के लिए आकाश लोक में देवतागण एकत्रित हो गये। राम और महरक्ष दोनों ने एक-दूसरे को घायल किया, परंतु इससे उन दोनों को ही शक्ति कम होने के बजाय और अधिक बढ़ती हुई जान पड़ी। उन दोनों ने इतने बाण चलाए कि रणभूमि में कुछ भी साफ-साफ देखना कठिन हो गया। क्रोध से भड़ककर, राम ने महरक्ष का धनुष तोड़ डाला, उसके रथ को चकनाचूर कर दिया और उसके सारथी व घोड़ों को मार डाला। अपने टूटे रथ से कूदकर, महारक्ष ने रुद्र देव से मिला एक भाला उठा लिया और बहुत वेग के साथ इसे राम की ओर फेंक दिया।
राम ने अपने बाणों से भाले के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। फिर, राम ने अपने धनुष की प्रत्यंचा पर सावधानी के साथ एक अग्नि अस्त्र चढ़ाया, पर तभी महरक्ष अपनी मुट्ठी तानकर लहराता हुआ उनकी ओर दौड़ पड़ा। इससे पहले कि महरक्ष राम तक पहुँच पाता, राम ने अपना दिव्य वाण उस पर छोड़ दिया और इस बाण द्वारा राक्षस का हृदय वेधते ही वह निष्प्राण होकर जमीन पर गिर पड़ा। अपने सेनापति को मृत देखकर, बची हुई राक्षस-सेना जल्दी-जल्दी लंका को वापस भाग गई।
रावण ने इंद्रजित को युद्ध क्षेत्र में पुनः जाने का आदेश दिया, इसलिए राजकुमार पहले अपनी यज्ञ वेदी पर गया। आहुति की अग्नि में घी अर्पित करने के पश्चात इंद्रजित ने एक जीवित बकरे को गर्दन से पकड़कर अग्नि में फेंक दिया और इस प्रकार अग्नि को आहुति दी। अग्नि देव पहले की ही भाँति आहुति स्वीकार करने के लिए स्वयं उपस्थित हुए, जिसके कारण आहुति की अग्नि अत्यन्त तेजी के साथ प्रज्वलित हो उठी। इसके बाद, इंद्रजित ने ब्रह्माजी की शक्ति से अपने रथ और अपने सभी अस्त्र-शस्त्रों को सुरक्षित किया और रथ पर चढ़ गया।
इंद्रजित ने आकाश में अदृश्य रहते हुए, राम व लक्ष्मण पर अपने बाणों की बौछार कर दी। दशरथ के पुत्रों ने अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्रों से उसके आक्रमण को रोकने का प्रयास किया, परंतु उनमें से कोई भी रावण के उसे शक्तिशाली पुत्र को छू तक नहीं पाया। अपनी मायावी शक्ति का इस्तेमाल करके, इंद्रजित ने घना अंधकार फैला दिया और इसके बाद उसने फिर से राम व लक्ष्मण पर अपने बाणों की वर्षा करके उनके पूरे शरीर को बाणों से वेध डाला। जिस दिशा से बाणों की वर्षा हो रही थी, उधर निशाना साधकर राम ने इंद्रजित को घायल कर दिया, परंतु रावण का पुत्र इससे अविचलित हो रहा।
अंततः, लक्ष्मण अपनी असहाय दशा को देखकर हताशा से इतने उत्तेजित से उठे कि उन्होंने घोषणा करके कहा, मैं ब्रह्मास्त्र का आवाहन करके सभी राक्षसों को इसी क्षण सदा सर्वदा के लिए नष्ट कर दूँगा।
राम बोले, मेरे प्यारे भाई, शत्रु के साथ युद्ध करते समय, युद्ध में भाग नहीं ले रहे लोगों का वध करना उचित नहीं है। मैं भी इस शक्तिशाली राक्षस का वध करने को बहुत उत्सुक हूँ। धैर्य धरो आओ, हम उस पर पहले कुछ और दिव्य अस्त्र चलाएँ।
इंद्रजित समझ गया कि राम उसे शीघ्र ही मार डालना चाहते हैं, इसलिए वह जल्दी से लंका लौट गया। कुछ देर बाद, अपने रथ पर सवार होकर फिर से लंका से बाहर निकला, परंतु इस बार वह दिखाई दे रहा था और साथ ही उसके बगल में मायावी सीता बैठी हुई थी। इंद्रजित को देखकर, हनुमान के नेतृत्व में सभी वानर उस पर आक्रमण करने दौड़ पड़े, परंतु जब उन लोगों ने सीता को उसके रथ पर बैठे हुए देखा, तो वह अत्यधिक निराश हो उठे।
वानर- गण अभी असहाय होकर उसे देख ही रहे थे कि तब तक इंद्रजित ने अपनी तलवार निकाल ली और सीता को बालों से पकड़ लिया। मायावी सीता राम राम! कहकर चिल्ला उठी और इंद्रजित ने उस पर अपने मुक्के से भीषण प्रहार किया। असह्य वेदना का अनुभव करके, हनुमान चिल्लाए, तू सभी राक्षसों में सबसे नीच और सबसे दुर्बुद्धि है। यह निश्चित है कि तेरे जैसे स्त्रियों का वध करने वालों को शीघ्र ही नरक में दंड का भागी बनना पड़ेगा!
यह कहकर, हनुमान ने इंद्रजित पर धावा बोल दिया और उनके पीछे-पीछे ढेर सारे वानर-गण भी दौड़ पड़े, परंतु उस राक्षस ने अपने बाणों से उन लोगों को पीछे धकेल दिया। इंद्रजित ने घोषणा की, अब तुम लोग देखो कि किस प्रकार मैं सीता का वध करता हूँ। जिस कार्य से शत्रुओं को पीड़ा पहुँचती हो, युद्ध जीतने के लिए वह कार्य करने का प्रयास अवश्य ही करना चाहिए!
यह कहकर, इंद्रजित ने अपनी तलवार का भीषण प्रहार करके मायावी सीता की देह तिरछे काट दी और वह अपने ही रक्त के कुंड में जमीन पर गिर पड़ी। इंद्रजित ने हनुमान को ताना मारकर कहा, सीता मर चुकी है, इसलिए उसे पुनः प्राप्त करने के तुम लोगों के सभी प्रयास समय व ऊर्जा का व्यर्थ अपव्यय मात्र सिद्ध हो गये हैं।
कुछ देर तक, हनुमान ने प्रतिक्रिया में आक्रमण करने का प्रयास किया। परंतु फिर उन्होंने सोचा, चूंकि सीता की मृत्यु हो चुकी है, इसलिए अब बानरों के लिए कुछ समय तक पीछे हट जाना ही उचित रहेगा और इस बीच में राम को इस बारे में सूचित करके उनसे निर्देश प्राप्त करने चाहिए।
जब हनुमान युद्धस्थल से चले गये, तो इंद्रजित अपने उद्यान निकुंभिल की वापस लौट गया ताकि वहाँ पर वह राक्षसों के कल्याण के लिए यज्ञ की अग्नि में आहुति अर्पित कर सके। इस बीच, हनुमान ने राम से भेंट की और उन्हें बताया कि इंद्रजित ने किस निष्ठुरता के साथ सोता का वध किया। यह सुनकर, राम मूर्च्छित होकर जमीन पर गिर पड़े और तब वानर- गण शीघ्रता से उनके पास आये और उन्होंने राम पर पानी छिड़का।
लक्ष्मण ने राम को अपनी बाँहों में उठाकर विलाप किया, कैसा भयानक दुर्भाग्य है। ऐसा जान पड़ता है कि अच्छाई और बुराई ने अपने पक्ष बदल लिए हैं। या संभवतः धर्म इतना शक्तिशाली नहीं है कि शक्ति के बिना वह अच्छे परिणाम दे सके। मेरे विचार से सबसे अच्छा यही है कि हम स्वयं अपनी शक्ति पर निर्भर रहें और नैतिकता के बारे में कोई विचार नहीं करें। मैं यहाँ पर इस समय यह शपथ लेता हूँ कि मैं आज ही इंद्रजित व रावण सहित सम्पूर्ण लंका नगरी को नष्ट कर दूँगा। हे राम कृपा करके भगवान् विष्णु के रूप में अपने अवतार को याद करें और अपने भीषण दुख का त्याग कर दें।
इसी समय विभीषण वहाँ पहुँचे। जब उन्होंने शोकाकुल लक्ष्मण की गोद में अचेत पड़े हुए राम को देखा, तो उन्होंने उत्सुकतापूर्वक पूछा, क्या हुआ है ?" जब लक्ष्मण ने उन्हें सीता की मृत्यु के बारे में बताना आरंभ किया, तो विभीषण ने उन्हें टोककर कहा, यह संभव नहीं है कि इंद्रजित सीता का वध कर दे क्योंकि रावण कभी भी स्वेच्छा से सीता को उसके साथ नहीं जाने देगा। जिस सीता को आपने देखा था वह एक मायावी रचना थी। हे लक्ष्मण, आपको इसी समय निकुंभिल जाकर इंद्रजित का वध कर देना चाहिए और आपको यह कार्य इंद्रजित द्वारा यज्ञ की अग्नि में आहुति चढ़ाते समय ही करना होगा। यदि आप उस पर इसी समय आक्रमण नहीं करते, तो वह आहुति अर्पित करके फिर से स्वयं को अदृश्य कर लेगा और फिर वह अभेद्य हो उठेगा।
राम इतना अधिक शोकाकुल थे कि वह विभीषण द्वारा कही गई बात ठीक से समझ ही नहीं सके और इसलिए उन्होंने विभीषण से अपनी बात फिर से कहने का अनुरोध किया। विभीषण ने समझाया, बहुत समय पहले, इंद्रजित ने कठोर तपस्या करके ब्रह्माजी को प्रसन्न कर लिया था। ब्रह्माजी ने इंद्रजित को ब्रह्मास्त्र तथा हवा में उड़ने वाले अश्व प्रदान करते हुए कहा, 'जिस समय तुम निकुंभिल में यज्ञ को अग्नि को आहुतियाँ अर्पित करने में व्यस्त होगे, केवल उसी समय एक शत्रु तुम्हारा वध करेगा। इसलिए यदि लक्ष्मण इसी समय जाकर इंद्रजित का वध नही करते, तो वह इतना शक्तिशाली हो जायेगा कि सभी वानरों का वध कर देगा।
तब राम ने आदेश दिया, हे लक्ष्मण, जाकर इंद्रजित पर आक्रमण करो। अपने साथ हनुमान, विभीषण तथा शेष बची सेना को ले जाओ।
लक्ष्मण ने राम के चरण-कमलों का स्पर्श किया और एक बार फिर से इंद्रजित का वध करने की शपथ लेकर वह वहाँ से चल पड़े। जब वह निकुंभिल पहुँचे, तो लक्ष्मण ने देखा कि अगणित राक्षस वहाँ की पहरेदारों कर रहे हैं, इसलिए विभीषण ने उन्हें सलाह दी पहले उनकी सेना को आक्रमण करने दें। जब राक्षस मुसीबत में फँस जायेंगे, तब इंद्रजित सामने आयेगा।
इस तरह, जब इंद्रजित ने देखा कि किस प्रकार उसकी सेना पर आक्रमण हो गया है, तो वह आहुति अर्पित करने का कार्य बीच में ही छोड़कर अपने रथ पर सवार हो गया। जिस समय इंद्रजित हनुमान के साथ युद्ध करने में उलझा हुआ था, तभी विभीषण लक्ष्मण को लेकर एक बरगद के वृक्ष के नीचे गये जहाँ पर इंद्रजित रणभूमि में अदृश्य होकर उतरने से पहले यज्ञ की अग्नि में आहुति अर्पित किया करता था। विभीषण जानते थे कि इंद्रजित शीघ्र ही अपने धार्मिक कर्मकांड को पूरा करने के लिए वापस आयेगा, इसलिए उन्होंने लक्ष्मण से आग्रह किया कि वे वहीं पर प्रतीक्षा करें और उसके वापस आते ही उसका वध कर दें।
लक्ष्मण ने विभीषण की सलाह मान ली और निःसन्देह ही इंद्रजित शीघ्र वापस लौट आया। लक्ष्मण ने जब इंद्रजित को युद्ध के लिए ललकारा, तो इंद्रजित ने वहाँ पर विभीषण को देखा और वह क्रोधित होकर बोला, आप, मेरे चाचा होकर, मुझे हानि पहुँचाने के लिए यहाँ आये हैं। मैं आपके बड़े भाई का सबसे लाडला पुत्र हूँ। क्या आपको अपने परिवार के लोगों के साथ कोई स्नेह नहीं है? आप भी राक्षस कुल में ही पैदा हुए हैं। क्या आपको अपने कुल पर तनिक भी अभिमान नहीं है? दुष्ट मूर्ख! क्या तुम यह नहीं देख पा रहे हो कि धार्मिक सिद्धांतों का पालन करने वाले लोगों को तुम्हारा त्याग कर देना चाहिए था क्योंकि तुम स्वयं अपने रक्त-संबंधियों के साथ गद्दारी करके शत्रु का साथ दे रहे हो? किसी व्यक्ति का सबसे बुरा रिश्तेदार भी सदैव बाहरी लोगों से अच्छा ही होता है। केवल तुम ही ऐसा धूर्ततापूर्ण कार्य कर सकते हो।
इस पर विभीषण ने उत्तर दिया, मेरे प्रिय भतीजे, यदि तुम्हें धर्म की इतनी ही चिंता है, तो फिर तुम मुझे, अर्थात अपने बुजुर्ग को क्यों कोस रहे हो ? यह सत्य है कि मेरा जन्म राक्षस कुल में हुआ है, परंतु मेरा स्वभाव सर्वधा भिन्न है। मुझे धृष्टता और निष्ठुरता से घृणा है। हमारे परिवार में हुए इस विभाजन का कारण मैं नहीं, तुम्हारे पिता हैं। धार्मिक सिद्धांतों के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति का यह दायित्व है कि वह पापी लोगों के साथ कोई संबंध नहीं रखे, भले ही वे उनके पारिवारिक संबंधी क्यों न हों।
जो व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति की पत्नी का अपहरण करता है वह सबसे नीच होता है और जिस प्रकार साँप अपनी केंचुली का त्याग करता है उसी प्रकार से उस व्यक्ति का त्याग कर देना चाहिए। मित्रों के साथ धोखा करना, किसी अन्य व्यक्ति की पत्नी के साथ संभोग करना और किसी अन्य व्यक्ति की संपत्ति चुराना - ये तीन पाप कार्य व्यक्ति को सदैव उसके विनाश की ओर ले जाते हैं। इसलिए, रावण का विनाश निश्चित है और उसके साथ तुम्हारा और सम्पूर्ण लंका का भी विनाश हो जायेगा। हे इंद्रजित, तुम एक अहंकारी, मूर्ख और बुरे संस्कारों वाले बालक हो। तुम चाहे जो कुछ भी कहो, परंतु शीघ्र ही लक्ष्मण के बाणों से तुम्हारा अंत हो जायेगा।
लक्ष्मण हनुमान के कंधे पर चढ़ गये और फिर एक-दूसरे को थोड़ा ललकारने के बाद, दोनों के बीच रण छिड़ गया। कुछ समय बाद, लक्ष्मण के बाणों के प्रहार से इंद्रजित का मुख पीला पड़ गया और वह दुर्बल लगने लगा। तब विभीषण ने लक्ष्मण से आग्रह किया कि वह अपने शत्रु का शीघ्र वध कर दें। लक्ष्मण ने कुछ और शक्तिशाली बाण चलाए जिनसे रावण का पुत्र कुछ क्षण के लिए चकरा गया।
जल्दी ही होश में लौटकर, इंद्रजित ने ताना मारकर कहा, तुम्हें याद है पहले मैंने तुम्हें किस प्रकार पराजित किया था! और फिर उसने सात बाण चलाकर लक्ष्मण को, दस बाण चलाकर हनुमान को और सौ बाण चलाकर विभीषण को वेध डाला।
लक्ष्मण ने हँसते हुए इतने अधिक बाण चलाए कि इंद्रजित उनसे ढँक गया और उसका सोने का कवच टूटकर बिखर गया। लक्ष्मण के आक्रमण के जवाब में उस राक्षस ने 1000 बाण चलाकर लक्ष्मण के कवच को भी थोड़ा नुकसान पहुँचाया। इस प्रकार लंबे समय तक चले उस युद्ध में कोई भी दूसरे पर हावी न हो सका, परंतु दोनों ही विजय प्राप्त करने के लिए संकल्पबद्ध थे। अगणित बाण उनके शरीरों को वेधकर जमीन में धँस गये थे और दोनों योद्धा अपने ही रक्त से नहा गये। इसके अतिरिक्त, एक-दूसरे को काट चुके अनगिनत बाण धरती पर इस प्रकार बिखरे हुए थे मानो वे कुश पास हों।
विभीषण अपने भतीजे से युद्ध नहीं करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने अन्य राक्षसों पर आक्रमण किया। दोनों पक्षों के बीच छिड़े घमासान युद्ध में जाम्बवान ने भी शत्रु का भयानक विनाश किया। हनुमान ने लक्ष्मण को नीचे उतार दिया ताकि वह भी शत्रु सेना का सफाया करने में हाथ आजमा सकें। सूर्य अस्त हो गया था, परंतु हनुमान ने हजारों राक्षसों का संहार करना जारी रखा। निरंतर चल रहे बाणों के प्रवाह से आसमान बैंक गया था जिसके कारण कुछ पहले ही अंधेरा छा गया, वास्तव में, लक्ष्मण और इंद्रजित इतनी चपलता से अस्त्र चला रहे थे कि देखने वालों को उनके अस्त्रों की स्थिति व गति का पता ही नहीं चल पा रहा था।
लक्ष्मण ने इंद्रजित के सारथी का सिर काट डाला, जिसके कारण बाण चला रहे इंद्रजित का रथ से नियंत्रण खो गया। इससे लक्ष्मण के हाथ एक अच्छा अवसर आ गया और इंद्रजित धीरे-धीरे निराश होने लगा। चार वानर योद्धा इंद्रजित के चार घोड़ों पर कूद पड़े और उन्होंने अपने तीखे दाँतों और पंजों से घोड़ों के चिथड़े- चिथड़े कर दिए। इन वानरों ने उसके रथ को भी चकनाचूर कर दिया जिसके कारण इंद्रजित उससे उत्तर जाने को बाध्य हो गया।
गहन अंधकार में लक्ष्मण इंद्रजित पर हावी होने लगे, इसलिए इंद्रजित ने अपनी सेना को आदेश दिया कि वह वानरों को युद्ध में उलझाए रखें, जबकि वह स्वयं नया रथ लाने के लिए लंका के अंदर चला गया। कुछ समय बाद, इंद्रजित नए उत्साह के साथ रणभूमि में वापस लौटा और उसने हजारों वानरों का संहार करना आरंभ कर दिया जिसके कारण बचे हुए वानर लक्ष्मण को शरण में चले गये।
लक्ष्मण ने इंद्रजित के धनुष के दो टुकड़े कर दिए और उसके सीने को पाँच बाणों से वेध डाला। उसके बाद छिड़े भयंकर युद्ध में, लक्ष्मण का क्रोध भड़क उठा और उन्होंने इंद्रजित के सारथी का सिर काट डाला जिससे रथ में जुते घोड़े असमंजस में पड़ गये। यद्यपि, इंद्रजित ने प्रति आक्रमण करने का प्रयास किया, परंतु शीघ्र ही उसे महसूस हुआ कि उसके बाण लक्ष्मण से टकराकर गिर जा रहे हैं। लक्ष्मण के कवच को अभेद्य समझकर, उसने लक्ष्मण के ललाट पर प्रहार करना आरंभ किया। लक्ष्मण ने चपलता से पाँच बाण चलाकर इंद्रजित के चेहरे को वेध डाला।
इंद्रजित ने तीन बाणों से विभीषण के चेहरे पर प्रहार किया। क्रोध से भरकर, विभीषण अपने भतीजे पर धावा बोलने दौड़े। विभीषण ने अपनी गदा से इंद्रजित के घोड़ों को यमलोक पहुँचा दिया। अपने टूटे रथ से नीचे कूदने के बाद, इंद्रजित ने अपने चाचा पर एक भाला चलाया। इसी समय, लक्ष्मण ने अपने बाणों से भाले के टुकड़े-टुकड़े करके, युद्ध में हस्तक्षेप किया। जब विभीषण ने पाँच बाणों से उसका सीना छलनी कर दिया, तो इंद्रजित ने अपने धनुष पर भयानक यम अस्त्र चढ़ा दिया। भयानक संकट को सामने देखकर, लक्ष्मण ने एक दिव्य अस्त्र का आवाहन किया जिसे कुबेर ने लक्ष्मण को स्वप्न में भेंट किया था। जब दोनों अस्त्र छूटे, तो बीच मार्ग में ही दोनों हवा में टकराए और उनकी इस टकराहट से पूरा आकाश तेज रोशनी से चमक उठा। दोनों अस्त्रों के सैकड़ों टुकड़ों में खंड-खंड होकर बिखरने से धरती को कँपा देने वाला भयानक धमाका हुआ और भीषण चिंगारी व धुएँ के बादल जैसे फूट पड़े।
इसके बाद, लक्ष्मण ने एक वरुण अस्त्र छोड़ा जिसे इंद्रजित ने रुद्र अस्त्र से काट दिया। फिर इंद्रजित ने एक अग्नि बाण चलाया, परंतु लक्ष्मण ने सूर्य बाण चलाकर उसे शमित कर दिया। तब इंद्रजित ने अपने धनुष से एक असुर अस्त्र चलाया जिसके कारण तत्काल ही अनगिनत तलवार, बरछियाँ, गदाएँ, चक्र और कुल्हाड़ियाँ बरस पड़ीं, परंतु लक्ष्मण ने एक रुद्र अस्त्र चलाकर इंद्रजित के आक्रमण को विफल कर दिया। अब इंद्रजित के मन में निराशा घर करने लगी। यह महसूस करके, लक्ष्मण ने सावधानी से इंद्र से मिला एक अत्यन्त शक्तिशाली बाण उठा लिया।
इस बाण को अपने धनुष की प्रत्यंचा पर चढ़ाकर उसे अपने कान के पास तक खींचते हुए, लक्ष्मण ने प्रार्थना की, हे देवताओं, यदि राम वास्तव में अपराजेय ईश्वर हैं और धर्म तथा सत्य के रक्षक हैं, तो इस बाण से रावण का पुत्र मारा जाये।
लक्ष्मण द्वारा बाण छोड़ते ही, वह तेजोमय अस्त्र अत्यन्त वेग से आकाश मार्ग पर चल पड़ा और उसने इंद्रजित का सिर काट डाला। रावण का यह अपराजेय पुत्र भगवान् राम की सेना के विजय-अभियान में सबसे बड़ी रुकावट था। उसकी मृत्यु से वानर-गण प्रसन्नता से भरकर चिल्ला उठे और उछलने-कूदने लगे जबकि राक्षस गण आतंकित होकर इधर-उधर दौड़ने भागने लगे।
आकाश लोक में उपस्थित, देवगणों व महान ऋषियों ने लक्ष्मण की इस विजय पर उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। जिस समय स्वर्ग से लक्ष्मण पर पुष्प वृष्टि हो रही थी, उसी समय विभीषण, हनुमान और जाम्बवान उन्हें बधाई देने पहुँच गये। अपने पूँछों को बार-बार लहराते और फटकारते हुए, वानर गण बार-बार चिल्लाकर बोले, "जय लक्ष्मण जय श्री राम"
लक्ष्मण बहुत थक गये थे और घायल थे, इसलिए वह विभीषण व हनुमान के कंधों का सहारा लेकर खड़े हो गये और फिर राम के पास पहुँचकर उन्होंने राम की प्रदक्षिणा की। विभीषण ने संक्षेप में इंद्रजित को मृत्यु का हाल कह सुनाया और यह सुनकर राम को अत्यधिक दिव्य आनन्द प्राप्त हुआ।
लक्ष्मण के सिर की महक लेने और अत्यन्त स्नेहपूर्वक उन्हें बधाई देने के बाद, राम बोले, इंद्रजित रावण का दाहिना हाथ था। तीन दिन और तीन रात तक युद्ध करने के बाद अब जबकि उसका वध हो चुका है, तो इससे निश्चित ही राक्षम- राज युद्ध करने के लिए बाहर आयेगा।
लक्ष्मण अपने शरीर पर लगे अनगिनत घावों के कारण दर्द से पीड़ित थे इसलिए राम ने सुषेण को उनका व ढेरों अन्य वानर सैनिकों का उपचार करने का आदेश दिया। सुषेण ने जैसे ही लक्ष्मण को एक जड़ी की गंध सुँघाई, तो लक्ष्मण यह देखकर प्रसन्न हो उठे कि उनका सारा दर्द दूर हो चुका था और उनके सारे घाव तत्काल भर गये थे।
इसी बीच, रावण के मंत्रियों ने रावण के पास जाकर उसे बताया कि किस प्रकार लक्ष्मण ने विभीषण की सहायता से इंद्रजित का वध कर दिया है। यह समाचार सुनते ही रावण मूर्च्छित हो गया और बहुत देर बाद ही कहीं उसकी चेतना लौट पाई। राक्षस राज ने अपने लाडले पुत्र की मृत्यु पर रो-रोकर अत्यन्त दुख के साथ विलाप किया क्योंकि इंद्रजित ही उसका उत्तराधिकारी था और विलाप करते हुए वह भयानक क्रोध से भर उठा।
क्रोध की इसी मनःस्थिति में, रावण ने सीता का वध करके प्रतिशोध लेने का निर्णय किया। उस समय वह इतना अधिक क्रोधित था कि अन्य राक्षस गण भयभीत होकर इधर-उधर छुप गये। युद्ध करने को तत्पर रावण ने अपना अभेद्य कवच मँगाया और कठोर तपस्या करने के उपरांत ब्रह्माजी द्वारा उसे दिए गये बाण व अपना धनुष मँगवाया।
रावण ने घोषणा की, इंद्रजित ने शत्रुओं को पीड़ित करने के लिए जो चाल चली, अब मैं उसे सचमुच में करूँगा ताकि शत्रुओं को घोर पीड़ा पहुँचे। यह कहकर, रावण ने उग्रता से अपनी तलवार खींच निकाली और वह अशोक वाटिका की ओर दौड़ पड़ा और उसके पीछे-पीछे मंदोदरी व कई मंत्री भी थे। यद्यपि, रावण के इन सभी शुभचिंतकों ने उसके क्रोध को शांत करने का भरपूर प्रयास किया, परंतु शीघ्र ही रावण भयाकुल सीता के पास प्रचंड तरीके से अपनी तलवार लहराता हुआ पहुँच गया।
सीता समझ गई कि रावण उनका वध करना चाहता है, इसलिए उन्होंने चकित होकर सोचा, आखिर ऐसा क्या हो गया कि यह दुष्ट राक्षस इस दशा में, मुझे दी गई बारह माह की अवधि समाप्त होने से पहले ही यहाँ आ पहुँचा है? क्या वह बार-बार मेरे मना करने से हताश निराश हो उठा है, या फिर राम व लक्ष्मण को पराजित करने में असफल रहने के कारण, निराशा से व्यग्र होकर मुझे मारने आया है? मुझे हनुमान की सलाह मान लेनी चाहिए थी और उसे अपनी पीठ पर बिठाकर मुझे राम के पास ले जाने देना चाहिए था। ऐसा होने पर, मैं कभी भी इस भयानक दशा में नहीं फँसती!
शोक से अभिभूत सीता के प्रति करुणा का अनुभव करते हुए, सुपार्श्व नामक एक पुण्यात्मा मंत्री ने रावण से कहा, हे स्वामी, आपने वेदों का अध्ययन किया है और सबसे कठिन व्रत लिए हैं। भला आप एक स्त्री का वध करने का विचार तक कैसे कर सकते हैं? सीता को छोड़ दें और अपने भयानक क्रोध को अपने वास्तविक शत्रुओं पर उतारें। आज कृष्ण पक्ष का चौदहवाँ दिन है। कल नए चंद्र के उदय के साथ ही राम और उनकी वानर सेना पर आक्रमण करें और विजय प्राप्त करें। मुझे विश्वास है कि राम का वध करने के बाद, आप तृप्त होने तक सीता का भरपूर आनन्द-भोग कर सकेंगे। अपनी विकट इच्छा-लालसा को इस प्रकार से अपनी असामयिक निराशा के सामने क्यों गँवा रहे हैं ?
रावण ने चापलूसी भरी इस सलाह को स्वीकार कर लिया। सीता का वध करने का विचार त्यागकर, वह अपने राजमहल लौट गया। बाद में, अपने प्रिय पुत्र की मृत्यु से अत्यधिक दुखी होकर जब रावण शोकाकुल अपने राज-सिंहासन पर बैठा था, तो उसने इस प्रकार आदेश दिया, मैं चाहता हूँ कि बचे हुए सभी राक्षस इसी समय जाकर राम पर आक्रमण करें। यदि वे राम का वध करने में असफल रहते हैं, तो कल मैं स्वयं जाकर युद्ध करूँगा।
भोर के ठीक पहले सारे राक्षस वानरों के साथ युद्ध करने के लिए लंका से बाहर निकल पड़े। सूर्योदय होने तक घमासान युद्ध छिड़ चुका था। जब राक्षसों को शत्रु सेना के ढेरों वानरों का वध करने में सफलता मिल गई, तो जीवित बचे वानर-गण भगवान् राम के चरण कमलों में शरण लेने पहुँच गये। तब राम ने एक शक्तिशाली गंधर्व अस्त्र चलाकर बाणों की झड़ी लगा दी। बाणों की यह झड़ी इतनी घनी थी कि राक्षस गण राम को देख तक नहीं पा रहे थे। उन्हें सिर्फ उनके आक्रमण से हो रहा संहार और अगणित राक्षस सैनिकों को मृत देह दिखाई पड़ रही थी।
गंधव अस्त्र के प्रभाव से, राम कभी अदृश्य हो जाते। कभी-कभी, राक्षसों को अपने चारों ओर 1000 राम खड़े दिखते। केवल एक घंटे के समय अंतराल में राक्षस सेना के 2,00,000 पैदल सैनिक, 28,000 हाथी सवार योद्धा, 14,000 घुड़सवार और अनगिनत रथ सवार योद्धा मारे गये। अंततः, बचे हुए सैनिक प्राण बचाकर लंका भाग गये, जबकि आकाश लोक से देख रहे देवताओं ने आनन्द-विभोर होकर राम की विजय के लिए उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की।
राम ने वानर शूरवीरों से कहा, आपको यह जानना चाहिए कि दिव्य अस्त्रों का इस प्रकार का प्रयोग करने की क्षमता केवल शिवजी और मुझमें है।
इस बीच, लंका में मारे गये राक्षसों की विधवाएँ एक साथ जुटकर अपने पतियों की मृत्यु का विलाप करने लगीं और चीख-चीखकर कहने लगीं, हम सूर्पणखा को बददुआ देते हैं क्योंकि वही राम व रावण के बीच की शत्रुता का मूल कारण है और इसी कारण से हमारा वंश ही समाप्त हो गया है। अतीत में, राम ने अनेक बार राक्षसों को पराजित किया है, इसलिए रावण को यह पता होना चाहिए था कि राम अपराजेय हैं। हमारे मूर्ख राजा ने भला विभीषण की अच्छी सलाह क्यों नहीं मानी और क्यों इस भयंकर विनाश से हमें नहीं बचाया ?
राक्षसियों का यह विलाप सुनकर, रावण क्रोध से पागल हो उठा।। किसी सर्प की भाँति फुफकारते हुए, उसने अपने मंत्रियों को आदेश दिया, इसी समय युद्ध के लिए मेरी सेना तैयार करो। आज मैं अपने बाणों की वर्षा से राम, लक्ष्मण और समस्त वानरों का वध कर दूँगा। मेरा रथ लाओ और यह सुनिश्चित करो कि शारीरिक रूप से समर्थ प्रत्येक राक्षस मेरे पीछे-पीछे युद्ध क्षेत्र में चलें।
रावण के आदेश पर 1,00,000 रथ सवार योद्धा, 3,00,000 हाथी सवार योद्धा, 6 करोड़ घुड़सवार और अगणित पैदल सैनिक एकत्रित हो गये। रावण अपने दिव्य रथ पर सवार हो गया जिसे आठ घोड़े खींच रहे थे और जो प्रमुख देवताओं से मिले अगणित अस्त्र-शस्त्रों से भरा हुआ था। उसके आगे-आगे शंख और तुरही बजा रहे ढेरों प्रशंसक थे जो वाद्ययंत्र बजाकर और जोर-जोर से विजय-ध्वनि करके नागरिकों का उत्साहवर्द्धन कर रहे थे।
वानरों ने जब यह प्रचंड गर्जना सुनी, तो भीषण भय से उनके दिल दहल उठे। रावण लंका के उत्तरी द्वार से जब आगे बढ़ा तो चारों ओर का वातावरण अत्यन्त उदासी भरा सा हो उठा, सूर्य की चमक फीकी पड़ गई। उसके सिर के ऊपर घने काले बादल मंडराने लगे और उनसे रक्त की वर्षा होने लगी। अचानक, रावण के घोड़े लड़खड़ा उठे। उसकी बाँयी आँख व बाँया हाथ फड़कने लगे, उसका चेहरा पीला पड़ गया और उसकी आवाज फँसने लगी। आकाश में उल्कापात होने लगा और एक गिद्ध रावण के ध्वज स्तंभ पर आकर बैठ गया, परंतु इन सभी अपशगुनों की तनिक भी परवाह किए बिना, राक्षस-राज अपने विनाश की ओर आगे कदम बढ़ाता रहा।
युद्ध आरंभ होते ही, रावण ने तबाही मचानी शुरू कर दी और उसके बाणों की वर्षों से कोई भी बातर बच नहीं सका। सुग्रीव वानरों को इकट्ठा करने लगे और जिस समय रावण अपना ध्यान राम पर केंद्रित कर रहा था, उसी समय विरुपाक्ष एक हाथी पर सवार होकर वानर राज सुग्रीव की ओर बढ़ा। सुग्रीव ने एक विशाल वृक्ष उखाड़ लिया और अत्यन्त भयानक ढंग से हाथी पर प्रहार करके उसे पीछे गिरा दिया। विरुपाक्ष उस घायल हाथी की पीठ से कूद पड़ा और उसने अपनी तलवार व ढाल उठा ली और क्रोधपूर्वक सुग्रीव पर धावा बोलने दौड़ा। सुग्रीव ने तेजी से अपनी ओर आ रहे शत्रु पर एक चट्टान फेंककर वार किया, परंतु विरुपाक्ष उससे बच निकला और उसने सुग्रीव पर तलवार का वार किया।
सुग्रीव चकराकर जमीन पर गिर पड़े, परंतु तत्काल ही वह उछलकर खड़े हो गये और विरुपाक्ष के सीने पर अपने हाथ से जोरदार प्रहार किया। इस प्रहार के कारण उस राक्षस का क्रोध भड़क उठा और उसने सुग्रीव का कवच काट डाला और लात मारकर उन्हें पीछे गिरा दिया।
सुग्रीव फिर से अपने पैरों पर खड़े हो गये, परंतु जब उन्होंने विरुपाक्ष को अपनी हथेली से मारने का प्रयास किया, तो विरुपाक्ष ने बड़ी कुशलता से इस बार से स्वयं को बचा लिया और सुग्रीव के सीने पर अपने मुक्के से प्रहार किया। क्रोध से उन्मत्त होकर, सुग्रीव अपने प्रतिद्वंद्वी पर वार करने का उचित अवसर तलाशने लगे। तभी, सुग्रीव ने अपनी पूरी शक्ति से विरुपाक्ष के माथे पर अपनी हथेली का वार किया। इस शक्तिशाली वार के कारण विरुपाक्ष के शरीर के सभी नौ छिद्रों से रक्त उमड़ पड़ा और उसकी देह निष्प्राण होकर जमीन पर गिर पड़ी।
इस बीच, रावण राम की ओर वह चला और उसने राहु नामक अस्त्र चलाकर वानरों के बीच भारी तबाही ला दी। राम के पास से युद्ध कर रहे लक्ष्मण ने बाणों की झड़ी लगाकर रावण को रोकने का प्रयास किया। रावण ने आसानी से उनके बाणों को काट डाला और फिर वह लक्ष्मण को किनारे छोड़कर राम की तरफ बढ़ा। तब, राम और उनके भयानक शत्रु के बीच घमासान रण छिड़ गया और उन दोनों के चलाए हुए बाणों की वर्षा से सारा आकाश बैंक गया। इस अवर्णनीय दृश्य को देखने के लिए, वानरों व राक्षसों ने कुछ समय तक युद्ध रोक दिया।
रावण ने एक बाण से राम के मस्तक पर प्रहार किया। राम ने विचलित हुए बिना, रुद्र अस्त्र से रावण पर वार किया, परंतु उस अस्त्र से निकले अनगिनत बाण रावण के अभेद्य कवच से टकराकर, बिना कोई हानि पहुँचाए जमीन पर गिर गये।
तब, रावण ने मायावी असुर अस्त्र चलाया जिसके कारण सिंह, बाघ, गिद्ध सर्प और घड़ियालों के सिर वाले अनगिनत बाण राम की दिशा में अपने भयानक मुख खोले हुए दौड़ पड़े। राम ने अग्नि अस्त्र चलाकर रावण के बाणों को वायु- मार्ग में ही नष्ट कर दिया, परंतु तब तक हजारों वानर सैनिक मारे जा चुके थे। इसके बावजूद, राम और वानरों के प्रमुख योद्धा यह देखकर प्रसन्न हुए क्योंकि वह अस्त्र रावण के सबसे अपराजेय अस्त्रों में से एक था।
इसके बाद, रावण ने माया दानव द्वारा तैयार किया हुआ एक रुद्र अस्त्र छोड़ा जिसके परिणामस्वरूप अगणित गदाओं, बरछियों, वज्रों और पाशों वाले बाणों की झड़ी लग गई। राम ने तत्काल ही अपने गंधर्व अस्त्र से रावण के रुद्र अस्त्र की काट गिराया, परंतु तब रावण ने भीषण तेजोमय सूर्य अस्त्र चला दिया। इस अस्त्र के कारण विशाल, चमचमाते चक्रों की झड़ी सभी दिशाओं में चल पड़ी।
राम ने तब अपने अपराजेय युद्ध कौशल का परिचय देते हुए, इन सभी चक्रों को अपने बाणों से काट डाला, परंतु जिस समय वे चक्रों को काट रहे थे, उस समय रावण ने दस शक्तिशाली बाणों से उनका सोना वेध दिया। राम ने इससे तनिक भी विचलित हुए बिना, ढेरों बाणों से रावण को वेध डाला।
इस युद्ध में शामिल होने की इच्छा से, लक्ष्मण ने सात बाण चलाकर रावण का ध्वज काट गिराया। एक अन्य बाण से, लक्ष्मण ने रावण के सारथी का वध कर दिया और पाँच अन्य बाणों से उन्होंने रावण का धनुष तोड़कर चूर-चूर कर दिया।
उसी समय विभीषण दौड़ पड़े और उन्होंने अपनी गदा से रावण के घोड़ों को मार डाला और अपने क्रुद्ध भाई को रथ से कूदने पर विवश कर दिया। रावण ने जब विभीषण पर भाला चलाया, तो लक्ष्मण ने तीन बाणों से इसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले तब रावण ने माया दानव द्वारा निर्मित एक चमत्कारी भाला लिया विभीषण के जीवन को घोर संकट में देखकर, लक्ष्मण ने चपलता से रावण पर इतने अधिक बाण चलाए कि रावण हतप्रभ होकर भाला हाथ में लिए हुए खड़ा ही रह गया।
रावण तब लक्ष्मण से बोला, तुमने विभीषण के प्राण बचाने का दुस्साहस किया है, इसलिए अब यह भाला तुम्हारे प्राण लेगा।
यह कहकर, रावण ने सिंह के समान दहाड़ को और माया दानव का मायावी भाला चला दिया। तब वह मायावी भाला बिना रुके हवा में उड़ता हुआ लक्ष्मण की ओर द्रुत वेग से बढ़ चला और राम ने भाले से निष्प्रभावी हो जाने का अनुरोध किया। परंतु वह मायावी भाला लक्ष्मण के सीने को आर-पार भेदता हुआ जमीन में जा धँसा और सुमित्रानंदन लक्ष्मण गंभीर रूप से घायल होकर जमीन पर गिर पड़े।
जब राम ने लक्ष्मण की यह करुण दशा देखी, तो अत्यधिक निराशा से उनकी आँखों में आँसू भर आये। राम अपने गहन दुख को दबाकर लक्ष्मण के पास गये और उनके शरीर से वह भाला निकाल दिया, परंतु रावण तब भी लगातार उनकी और बाणों की वर्षा किए जा रहा था। राम ने भाले को दो टुकड़ों में तोड़ने के बाद, लक्ष्मण को उठाकर अश्रुपूरित नेत्रों से अपने गले से लगा लिया।
इसके बाद, हनुमान व सुग्रीव को लक्ष्मण की सुरक्षा करने का आदेश देकर राम ने क्रोधपूर्वक घोषणा करते हुए कहा, अब मैं दुष्ट रावण के विरुद्ध अपनी सम्पूर्ण शक्तियों का प्रदर्शन करूँगा, ताकि वह शीघ्र ही रणभूमि में मृत होकर गिर पड़े। सभी वानर-गण पर्वत-शिखरों पर विश्राम करने जा सकते हैं। देवगणों के साथ आप भी इस युद्ध के दर्शक बन जायें, क्योंकि अब मैं वह चमत्कारी पराक्रम दिखाऊँगा जिसका गुणगान इस सृष्टि के अंतकाल तक किया जायेगा !
इसके बाद, प्रतिशोध की भावना से राम ने रावण पर आक्रमण कर दिया। जिस समय वे दोनों अपने बाणों की वर्षा करते हुए अपनी धनुष की प्रत्यंचा खींचते तब उनके धनुष की भयानक टंकार आश्चर्यचकित कर देती। क्रोध से भरे हुए राम शीघ्र हो रावण पर भारी पड़ने लगे, इसलिए राक्षसों का राजा रावण अपने प्राणों की रक्षा करने के लिए युद्ध क्षेत्र से भाग खड़ा हुआ।
तब राम उस स्थान पर लौटे, जहाँ लक्ष्मण पड़े हुए थे। अत्यन्त दुख से भरकर वह सुषेण से बोले, अपने घायल भाई को देखते ही मेरी शक्ति कमजोर होने लगती है। लक्ष्मण के बिना विजय का मेरे लिए कोई अर्थ नहीं है। यदि लक्ष्मण की मृत्यु हो जाती है, तो मैं भी उसी प्रकार उसके पीछे-पीछे प्राण त्याग दूँगा जिस प्रकार लक्ष्मण ने मेरे वनवास के समय मेरा अनुसरण किया था।
सुपेण ने राम को आश्वस्त करते हुए कहा, मेरे प्रिय राम, लक्ष्मण नहीं मर रहे हैं जरा उनके चेहरे की कांति देखें, जो तनिक भी फीकी नहीं पड़ी है और उनके नेत्रों में अब भी कितनी चमक है। हनुमान को इसी समय महोदय पर्वत पर भेज ताकि वह वहाँ से विषल्य- करणी, संवर्ण्य-करणी, संजीव-करणी और संधनी- करणी नामक जड़ी बूटियाँ लेकर शीघ्र आ सके। इन औषधियों से उपचार करने पर, लक्ष्मण तत्काल स्वस्थ हो जायेंगे।
हनुमान ने एक बार फिर हिमालय की ओर द्रुत वेग से छलाँग लगा दी, परंतु महोदय पर्वत पर पहुँचकर वह इन जड़ी-बूटियों को नहीं ढूँढ सके। अंततः, निराश होकर उन्होंने सम्पूर्ण पर्वत-शिखर को ही उखाड़ लिया। अपने दोनों हाथों से पर्वत शिखर को थामे हुए, उन्होंने हवा में छलांग लगा दी और लंका पहुँच गये। सुषेण के पास पर्वत शिखर रखने के बाद, हनुमान एक पल को विश्राम करने के लिए लेट गये और बोले, मैं इन जड़ी-बूटियों को नहीं पहचान पाया, इसलिए मैंने पूरा पर्वत हो उठा लाने का निर्णय किया।
सुषेण ने हनुमान की भूरि-भूरि प्रशंसा की और फिर वह इन जड़ी-बूटियों को ढूँढने पर्वत पर चल दिए। उन्हें ढूँढ लेने के बाद, उन्होंने इन्हें पीस लिया। जब लक्ष्मण को इनकी गंध सुंघाई गई, तो तत्काल उनके सभी घाव भर गये। लक्ष्मण के खड़े होते ही, राम ने उन्हें कसकर गले से लगा लिया और बोले, यह मेरा सौभाग्य है कि तुम स्वस्थ हो गये हो मेरे प्रिय लक्ष्मण, तुम्हारे बिना सीता को वापस पाने का कोई अर्थ नहीं है और यहाँ तक कि तुम्हारे बिना में भी अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकता हूँ।
लक्ष्मण बोले, मेरे प्रिय भाई, कृपा करके अब ऐसा कोई दुख नहीं करें। शीघ्र ही रावण का संहार करने की अपनी शपथ पूरी करें और फिर विभीषण को लंका के राज- सिंहासन पर प्रतिष्ठित करें।
इसी बीच, राम के साथ युद्ध करने को तत्पर रावण एक अन्य रथ पर सवार होकर, लंका नगरी से बाहर निकल आया। राम ने अपना धनुष उठा लिया और रावण पर बाणों की वृष्टि कर दी और युद्ध अत्यन्त भयंकर हो गया। आकाश लोक से देवगण चिल्लाने लगे, युद्ध न्यायपूर्ण ढंग से नहीं लड़ा जा रहा है क्योंकि राम धरती पर खड़े हैं जबकि रावण रथ पर सवार है!
यह संकेत मिलने पर, इंद्र ने मातली को बुलाया और उसे अपना रथ लेकर रंगभूमि में राम के पास जाने का आदेश दिया। हरित वर्ण के 1000 घोड़ों से खाँचे जाने वाले इंद्र के सोने के रथ को हाँकते हुए, मातली राम के समक्ष आकर खड़े हो गये।
दिव्य सारथी ने घोषणा करके कहा, मेरे प्रिय भगवन्, महाराज इंद्र ने आपसे इस रथ को स्वीकार करने का अनुरोध किया है। इसके अंदर आपको महाराज इंद्र का धनुष और अस्त्र-शस्त्र मिलेंगे, साथ ही एक अतुलनीय भाला और विभिन्न दिव्य बाण भी रखे हुए हैं। मेरे प्रिय राम, कृपा करके इस रथ पर तत्काल सवार हो जायें क्योंकि देवतागण आपको धरती पर खड़े होकर युद्ध करते देख बहुत दुख अनुभव कर रहे हैं।
इंद्र के रथ की प्रदक्षिणा करने के बाद, राम उस पर चढ़ गये। इसके बाद, राम व रावण के बीच एक घमासान रण छिड़ गया। रावण ने एक गंधर्व अस्त्र चलाया, तो राम ने उसे निरस्त करने के लिए तत्काल एक और गंधर्व अस्त्र चला दिया। इसके बाद, रावण ने एक राक्षस अस्त्र चलाया जिसने तेज से दमकते, खुले मुँह वाले अगणित सर्पों का रूप धारण कर लिया। जिसके उत्तर में राम ने एक गरुड़ अस्त्र चलाया जो अगणित सुनहरे गरुड़ों में बदल गया और उसने शीघ्र ही रावण के सभी सर्प बाणों को खा लिया। यह देखकर रावण का क्रोध भड़क उठा। उसने चपलता से प्रतिकार स्वरूप, राम पर 1000 बाण चला दिए और इसके अतिरिक्त अन्य ढेरों बाणों से मातली को वेध डाला, जबकि एक बाण ने इंद्र की ध्वजा को गिरा दिया और अनेक बाणों ने घोड़ों पर प्रहार किया। ऐसा जान पड़ा, मानो राम अत्यन्त संकट में पड़ गये हैं, इसलिए सभी देवता गण और वानर योद्धा अत्यन्त चिंतित हो उठे।
तब राम ने क्रोध से भरकर अत्यन्त भयानक रूप धारण कर लिया, जिसके कारण धरती भय से थर-थर काँपने लगी। अनेक अपशगुनकारी संकेत प्रकट होने । लगे, जिन्हें देखकर रावण सहित सभी जीवधारी भयभीत हो उठे। इसी समय, रावण को उत्साहित करने के लिए अनगिनत दैत्य आकाश पर ठीक उसी प्रकार प्रकट हो गये जिस प्रकार देवता-गण राम को उत्साहित कर रहे थे। यह देखकर, रावण ने एक भयानक अस्त्र उठा लिया और इतने प्रचंड ढंग से गर्जना की कि स्वर्ग और पृथ्वी हिलने लगे। वह चिल्लाकर बोला, अरे राम, तैयार हो जाओ, क्योंकि अब तुम्हारा अंत आ गया है !
यह कहकर रावण ने वह भयानक अस्त्र चला दिया। जब यह अस्त्र आकास मार्ग में द्रूत वेग से उड़ा तो इसने भयानक गर्जनकारी ध्वनि पैदा की और इसके चारों ओर बिजली की चमक का घेरा बन गया। राम ने अनगिनत बाण छोड़कर उसे चमत्कारी अस्त्र को काटने का ठीक उसी प्रकार प्रयास किया, जिस प्रकार इंद प्रत्येक कल्प के अंत में लगने वाली प्रलय अग्नि को रोकने के लिए मूसलाधार वर्षा करते हैं। राम यह देख रहे थे कि किस प्रकार द्रुत गति से उनकी ओर बढ़ता वह अस्त्र उनके सभी बाणों को निगलता जा रहा है और तब उन्होंने इंद्र का दिव्य भाला उठाकर उसकी ओर फेंक दिया। हवा में बहुत ऊपर उठते हुए, उस भाले ने अपने तेज से दसों दिशाओं को प्रकाशित कर दिया और फिर रावण के चमत्कारी अस्त्र के टुकड़े-टुकड़े कर दिए और रावण का अस्त्र चूर-चूर होकर बिना कोई हानि पहुँचाए जमीन पर बिखर गया।
राम और रावण ने एक-दूसरे पर बाणों की इतनी भयानक वर्षा की, कि उनके शरीर अपने ही घावों से उमड़ते रक्त से नहा गये। परंतु लेशमात्र भी विचलित हुए बिना, राम खुलकर हँसे और रावण को फटकारते हुए बोले, अरे सीता का अपहरण करने वाले, मूर्खाधिराज रावण, तू स्वयं को पराक्रमी समझने वाला सबसे बड़ा मूर्ख है। सच तो यह है कि तू सबसे बड़ा कायर है क्योंकि तूने मुझे दूर भेजकर मेरी पत्नी को ले जाने का दुस्साहस किया। अपने पति की अनुपस्थिति में, एक बेचारी अबला नारी का अपहरण करके भला तू कैसे गर्व महसूस कर सकता है ? अरे रावण, आज तेरा अंत हो जायेगा और अपने जिस शरीर से तुझे इतना अधिक मोह है वह गिद्धों और भेड़ियों का भोजन बनेगा।
यह कहकर, राम ने दोगुनी ऊर्जा और पराक्रम के साथ रावण पर आक्रमण कर दिया। साथ ही वानरों ने भी चट्टानों की झड़ी उसकी ओर फेंक दी। अल्प समय में, रावण इतना चकरा गया और असमंजस में पड़ गया कि वह ठीक प्रकार से अपने अस्त्र-शस्त्र तक नहीं उठा पाया। यह देखकर, रावण का सारथी चपलता के साथ उसे राम के बाणों की पहुँच से दूर, युद्ध क्षेत्र के परे ले गया।
जब रावण को होश आया, तो उसने अपने सारथी को फटकारते हुए कहा. तुम्हारे इस लज्जाजनक व्यवहार को देखकर, मुझे लगता है कि तुम मुझे नपुंसक और कायर समझते हो! अपनी मर्जी से यह करके, तुमने मेरी प्रतिष्ठा को कलंक लगाया है। मुझे इसी क्षण युद्ध क्षेत्र में वापस ले चलो!
इस पर सारथी बोला, हे राजन, मैं आपके कल्याण के लिए हो आपको रणभूमि से दूर लाया हूँ। आप अपनी शक्ति खो चुके थे और घोड़े भी थककर चूर हो गये थे। अनेक अपशगुन दिखाई दे रहे थे, इसलिए मैंने वही किया जो मेरा सर्वोपरि दायित्व है।
सारथी के शब्द सुनकर रावण शांत हो गया। उसने आदेश दिया, तत्काल वहाँ ले चलो जहाँ पर राम खड़े हैं। एक बार निर्णय ले लेने के बाद, रावण अपने शत्रुओं का संहार किए बिना पीठ नहीं दिखाता है! इस बीच, रावण की अनुपस्थिति में, अगस्त्य ऋषि राम से भेंट करने आये। वह यह जानते थे कि राम युद्ध करते-करते थक गये हैं। उचित आदर- सम्मान व स्वागत प्राप्त कर लेने के बाद, अगस्त्य ऋषि बोले, मेरे प्रिय भगवन् राम, कृपा करके मुझसे आदित्य हृदय प्रार्थना स्वीकार करें जो सूर्य- देव को संतुष्ट करने वाली है। इस मंत्र से महान आशीर्वाद मिलता है और यह मंत्र व्यक्ति के समस्त पापों को नष्ट कर देता है। इस मंत्र का जाप करने वाले व्यक्ति को दीर्घायु प्राप्त होती है और वह सदा-सर्वदा धर्म के पथ पर चलता रहता है। यह प्रार्थना इस प्रकार है: हे सूर्य देव, मैं आपको नमन करता हूँ। आप सभी देवों में सर्वप्रमुख हैं क्योंकि आपके असीमित प्रताप से ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड चल रहा है। देवता और असुर दोनों ही अपने श्रेष्ठ कल्याण की कामना से आपकी आराधना करते हैं। आप ब्रह्माण्डीय ऊर्जा के भंडार हैं और सभी जीवधारियों के जीवन का स्रोत हैं। इस प्रकार आप परमेश्वर विष्णु के पराक्रमी विस्तार के रूप में, उनका सर्वोत्तम प्रतिनिधित्व करते हैं। वैदिक आराधना का ज्ञान रखने वाले पुरुष, सूर्य में स्थित भगवान् नारायण के रूप में प्रतिदिन तीन बार आपकी स्तुति करते हैं। केवल आप ही इसे ब्रह्माण्ड के गहन अंधकार का नाश करते हैं, इसलिए, हे प्रतापी भगवन्, में आपको नमन करता हूँ। है परमेश्वर के नेत्र और जगत के समस्त कार्य-व्यापार के साक्षी देव, मैं बार-बार आपको प्रणाम करता हूँ।
मेरे प्रिय राम, यदि आप सूर्य देव की आराधना करते हुए इस सम्पूर्ण मंत्र का जाप करेंगे, तो निश्चित ही आप अपने शत्रु पर विजय प्राप्त कर लेंगे। संकट में पड़ा हुआ जो भी व्यक्ति इस प्रार्थना से सूर्य देव की स्तुति करता है, उसके सभी दुख दूर हो जाते हैं।
अगस्त्य ऋषि के जाने के बाद, राम को अपने शरीर में नई शक्ति का संचार होता महसूस हुआ। उन्होंने पवित्र हरिनाम का जाप करते हुए तीन बार आचमन किया। फिर, सूर्य की और मुख करके, राम ने आदित्य हृदय मंत्र का जाप किया ऐसा करते ही उन्हें अत्यधिक दिव्य आनन्द प्राप्त हुआ। इसके बाद, राम ने अपना धनुष उठा लिया और रावण का पूर्णतः संहार करने का संकल्प लेकर, उसकी ओर बढ़ चले। इसी समय, सूर्य ने आकाश लोक से राम को संबोधित करके आग्रह किया, "विलंब न करें। शीघ्र जायें।"
राम ने आदेश दिया, हे मातली, शीघ्र ही रावण की ओर बढ़ें और साथ ही अत्यन्त सचेत रहें।
तभी राम को यह याद आया कि वह इंद्र के सारथी से बात कर रहे हैं और इससे राम ने लज्जा अनुभव की और वह क्षमा याचना करते हुए बोले, मुझे क्षमा करें क्योंकि मैंने आपको ऐसे निर्देश दिया मानो मैं आपका स्वामी होऊँ। रावण का वध करने की उत्सुकता में ऐसा हो गया, इसलिए कृपा करके मेरी भूल के लिए मुझे क्षमा करें।
राम की इस सहज विनम्रता ने मातली का दिल छू लिया। वह इंद्र के रथ को कुशलता से चलाते हुए रावण के पास ले गये और तब राम व उनके प्रतिद्वंद्वी के बीच बाणों का आदान-प्रदान आरंभ हो गया। शीघ्र ही युद्ध भीषण हो गया। बादलों से रावण के रथ पर रक्त की वर्षा होने लगी और उसके पीछे-पीछे गिद्धों का एक झुंड रावण के रथ पर आ पहुँचा। पास ही में एक भयानक उल्कापात हुआ और यह सब देखकर राक्षस गण अत्यन्त हताश हो उठे, जबकि रावण को यह विश्वास हो गया कि उसका अंत बहुत निकट है।
दूसरी ओर, राम के सामने बहुत शगुनकारी लक्षण प्रकट होने लगे और यह देखकर उन्हें विश्वास हो गया कि शीघ्र ही उनकी विजय होने वाली है। इसके बाद छिड़े भीषण रण में, राम व रावण, दोनों ने अपनी समस्त शक्तियों का प्रदर्शन करना आरंभ कर दिया। दोनों पक्षों के सैनिक आश्चर्यचकित होकर, बिना हिले-डुले इस युद्ध को देखने लगे, यहाँ तक कि वे एक-दूसरे पर आक्रमण करना तक भूल गये।
जब रावण ने इंद्र के ध्वज को काटकर गिराने का प्रयास किया, तो राम ने अपने बाणों से उसके बाणों की दिशा मोड़ दी। इसके बाद, रावण के प्रत्येक आक्रमण को निष्फल करने व प्रत्येक बाण को काट देने के लिए संकल्पबद्ध, राम ने राक्षसों के राजा का ध्वज काटकर गिरा दिया। रावण ने इंद्र के घोड़ों पर प्रहार किया, परंतु वे दिव्य घोड़े उसके प्रहार से तनिक भी विचलित नहीं हुए और यह देखकर रावण क्रोधित हो गया और निराशा से भर उठा।
अंततः, रावण ने अपनी मायावी राक्षसी शक्तियों का प्रयोग करके गदाओं, चक्रों, वृक्ष और पर्वत शिखरों की झड़ी लगा दी। राम ने इन्हें अपने रथ तक पहुंचने से पहले हो चूर-चूर कर दिया, परंतु इनका मलबा वानर सेना के ऊपर गिरने लगा। राम व रावण ने एक-दूसरे पर हजारों अस्त्रों की वर्षा करनी जारी रखी। ये अस्त्र- शस्त्र हवा में टकराकर रणभूमि पर गिर जाते।
इसी प्रकार से एक घंटे तक युद्ध चलता रहा। राम ने रावण के प्रत्येक प्रहार को निष्फल कर दिया और यह देखकर सभी जीवधारी मन ही मन विस्मित हो उठे। दोनों सारथियों ने अत्यन्त कुशल रथ- संचालन किया। जब रथ एक-दूसरे के आस-पास आ गये, तो राम ने अपने चार बाणों से चारों घोड़ों को वेधकर उन्हें मुड़ने के लिए बाध्य कर दिया। इससे रावण का क्रोध और अधिक भड़क उठा और उसने राम पर बार-बार प्रहार करना आरंभ कर दिया, परंतु राम तनिक भी विचलित नहीं हुए।
इसके बाद, इतने प्रचंड ढंग से विविध प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों को वर्षा होने लगी कि मानव इतिहास के सभी युद्धों में उसका कोई सानी नहीं मिलता। रावण कभी अपने दसों सिरों के साथ युद्ध करता, तो कभी अपने सामान्य रूप में एक सिर के साथ युद्ध करता। एक बार राम ने अपने एक बाण से रावण का एक सिर काट दिया, परंतु जैसे ही वह सिर जमीन पर गिरा वैसे ही चमत्कारिक ढंग से उसकी जगह एक और सिर उग आया। राम ने उस सिर को फिर से काट दिया, परंतु तत्क्षण ही उसकी जगह एक अन्य सिर उग आया। राम बार-बार रावण का सिर काटते रहे, परंतु हर बार उसकी जगह एक नया सिर उग आता और इस तरह रणभूमि में रावण के सौ सिर कटकर बिखर गये थे।
हर बार कटे हुए सिर की जगह पर नया सिर उग आने के कारण, राम चकित होकर सोचने लगे, "इन्हीं बाणों से मैं मारीच, खर और विराध का वध कर चुका हूँ। मैंने साल के सात वृक्षों को वेधा है और अपराजेय वालि का वध किया है। इन बाणों के कारण महान पर्वत और अगाध विस्तार वाला समुद्र भी विनम्र हो गये हैं। तब भला रावण के विरुद्ध ये बाण निष्प्रभावी क्यों हो जा रहे हैं ?
दोनों के बीच भयानक वेग से युद्ध चलता रहा। दोनों ही योद्धाओं के मन में केवल एक-दूसरे के प्राण हरने की ही इच्छा थी। वास्तव में, यह युद्ध कई दिन और कई रात तक अविराम गति से चलता रहा।
अंततः, जब मातली ने देखा कि राम को वाँछित विजय नहीं मिल पा रही है, तो उन्होंने पूछा, "आप बचावकारी मुद्रा में क्यों युद्ध कर रहे हैं? मेरे भगवान्, क्या आप अपनी असीमित शक्तियों के बारे में भूल गये हैं ? राक्षस राज के विनाश की घड़ी आ गई है। आप दिव्य ब्रह्मास्त्र का प्रयोग क्यों नहीं करते ?
इस प्रकार से उस महा-शक्तिशाली अस्त्र की याद दिलाए जाने पर, राम के अगस्त्य ऋषि द्वारा दंडकारण्य में हुई भेंट के समय उन्हें दिया गया यह बाण उठा लिया। इस बाण को स्वयं ब्रह्माजी ने इंद्र के प्रयोग के लिए सृजित किया था और बाद में यह बाण उपहार स्वरूप अगस्त्य ऋषि को दे दिया गया था। उस दिव्य बाण के फर गरुड़ ने दिए थे और इसके तीक्ष्ण सिर में अग्नि देव और सूर्य देव की सम्मिलित शक्ति निहित थी। मेरु पर्वत और महेंद्र पर्वत ने अपना गुरुत्व उस बाग के भार में जोड़ा था और इसका दंड सूक्ष्म आकाशीय तत्व से बना था।
यह ब्रह्मास्त्र सर्वशक्तिशाली और अपराजेय था और इसका प्रचंड तेज स्वयं सूर्य के उच्चल प्रकाश के समान था। ब्रह्मास्त्र को मंत्रों से जागृत करने व शक्ति प्रदान करने के बाद, राम ने इसे अपने धनुष की प्रत्यंचा पर चढ़ा दिया। लपट छोड़ते उस बाण को देखकर वानरों के हृदय प्रसन्नता से भर उठे, जबकि करोड़ों- करोड़ राक्षसों का हृदय प्रचंड भय से दहल उठा।
राम ने धनुष की प्रत्यंचा को कान के पास तक खींच लिया जिसके कारण धरती कांपने लगी और स्वर्ग लोग भी परेशान हो उठा। जब राम ने ब्रह्मास्त्र चलाया, तो यह वायु मार्ग पर इतने द्रुस वेग से उड़ा मानो स्वयं मृत्यु उग्र व भयानक मुद्रा के साथ दुष्ट रावण के सोने की ओर बढ़ रही हो। रावण के हृदय को बीचो-बीच वेधने के बाद, वह दिव्य प्रकाशमान बाण उसके शरीर के पार होकर, रावण की पापात्मा को अपने साथ लिए धरती की गहराइयों में विलीन हो गया। इसके बाद, वह चमत्कारी ब्रह्मास्त्र लौटकर, राम की तरकश में वापस समा गया। रावण के हाथ से धनुष गिर गया और वह निष्प्राण होकर अपने रथ से नीचे धरती पर जा गिरा।
यह देखकर वानर योद्धा-गण अद्भुत आध्यात्मिक आनन्द से भर उठे और राम के विजय को गर्जन स्वर में घोषणा करते हुए, प्राण बचाकर भागते राक्षसों पर आक्रमण करने लगे। आकाश लोक पर स्थित देवतागण "साधु साधु " कहकर चिल्ला उठे और उन्होंने राम के रथ को फूलों की वर्षा करके फूलों से ढँक दिया और अपने दिव्य ढोल-नगाड़े बजाने लगे।
रावण की मृत्यु से देवताओं और महान ऋषियों को अंततः भारी राहत और अपार मानसिक शान्ति मिली जिसका बहुत लंबे समय से वे आनन्द नहीं उठा सके थे। ठंडी और सुगंधित हवा के मंद-मंद झोंके प्रवाहित होने लगे और सूर्य ने बहुत कोमलता से अपनी किरणें बिखेरनी आरंभ की, जिसके कारण चारों और प्रसन्नता का वास प्रतीत होने लगा।
भगवान् राम को साधुवाद देने आने वालों में सुग्रीव, अंगद, विभीषण व लक्ष्मण सबसे पहले लोग थे परंतु जब विभीषण ने अपने बड़े भाई को धरती पर मृत पड़ा देखा, तो वह अत्यधिक दुख से भरकर रोने लगे।
इस बीच, रावण की मृत्यु का समाचार राजमहल के भीतरी कक्षों तक पहुँच चुका था। रावण की पत्नियाँ नगर से बाहर निकलकर युद्ध क्षेत्र में आ गई। उनके केश बिखरे हुए थे और पोशाकें तथा आभूषण अस्त-व्यस्त थे। असहनीय दुख से भरकर घोर विलाप करती स्त्रियों पागलों की भाँति धूल में लोटने लगीं जबकि अन्य स्त्रियों रावण की मृत देह के पास जाकर उसके अलग-अलग अंगों को गले से लगाने लगीं। एक स्त्री बार-बार "हे स्वामी हे पतिदेव।" बोलते हुए रावण के गले से लिपट गई, दूसरी स्त्री ने उसके पैर पकड़ लिए, कोई उसके घायल सीने को मलने लगी, कुछ स्त्रियों ने हताशा से हाथ उठा लिए, या फिर रावण की मृत्यु का दुख सहने में असमर्थ होने के कारण मूर्च्छित हो गई।
रोने-कलपने की इन आवाजों के बीच इस प्रकार के विलाप भरे स्वर सुनाई पड़ने लगे, ओह, प्रिय पतिदेव विभीषण के द्वारा दी गई और हमारी कही अच्छी सलाह न मानकर आपने स्वयं अपना विनाश कर लिया। अब जब आपके ही प्राण नहीं रहे, तो हमारा जीना भी व्यर्थ है क्योंकि एक पत्नी का अपने पति के अतिरिक्त अन्य कोई सहारा नहीं होता है। आपके समान निष्ठुर और कठोर- हृदय व्यक्ति का यही अंत होता है। भला और कौन है जो सीता का अपहरण करके, उसकी इच्छा के विरुद्ध उसे बलपूर्वक अपने पास रखने का दुःसाहस कर पाता ?
रावण की पटरानी मंदोदरी विलाप करते हुए बोली, मेरे प्रिय स्वामी, इतने अधिक शक्तिशाली होने पर भी, आप भगवान् राम का मुकाबला नहीं कर सके। अपनी अर्जित शक्तियों के कारण आपको अत्यधिक घमंड हो गया था, जिसके कारण आप धरती पर एक भारी बोझ बन गये थे। आप मूर्खतावश यह नहीं समझ सके कि भगवान् राम के रूप में स्वयं भगवान् विष्णु ने धरती पर अवतार लिया है। ताकि वह धरती को आपके बोझ से मुक्त कर सके।
हे रावण सीता के प्रति आपकी पापमय वासना ही समस्त राक्षसों के विनाश का कारण बनी है। आपको सदैव एक पराक्रमी शूरवीर के रूप में देखा जाता था परंतु धोखे से सीता का अपहरण करके आपने स्वयं को ही कायर सिद्ध कर दिया। परंतु, आपके इस नीच चरित्र के बावजूद, मुझे यह समझ में नहीं आता कि आपक बिना मैं कैसे जीवित रहूँ।
अंततः, रावण के सीने पर सिर रखे रखे ही मंदोदरी मूर्च्छित हो गई। उसको सह-रानियाँ उसे उठाकर होश में लाई। उसी समय राम ने विभीषण को आदेश दिया, आपको अब विलंब किए बिना अपने बड़े भाई के दाह संस्कार की तैयारी करनी चाहिए। रावण के शरीर का दाह संस्कार होने के बाद ही संभवतः उसको विधवाएं शांत हो पाएँगी।
इस पर विभीषण बोले, मैं दूसरों की पत्नियों का अपहरण करने वाले व्यक्ति का दाह संस्कार नहीं करना चाहता हूँ, क्योंकि रावण क्रूर और अत्याचारी था और अधर्म के मार्ग पर चलता था। निःसन्देह, रावण मेरा बड़ा भाई था, इसलिए उसका आदर करना मेरा कर्तव्य है, परंतु दूसरी तरफ उसके कार्य किसी शत्रु के समान थे इसलिए मेरे विचार से वह मेरे आदर का पात्र बनने योग्य नहीं है।
राम बोले, मेरे प्रिय विभीषण, मैं आपके विचारों से सहमत हूँ, क्योंकि ये धर्म के यश को बढ़ाते हैं। तब भी मैं चाहूँगा कि आप अपने भाई को मुखाग्नि दें। अंततोगत्वा, अपनी सभी भूलों के बावजूद, रावण अत्यन्त पराक्रमी शूरवीर था और यह भी सत्य है कि उसकी देह के निष्प्राण होने के साथ ही उसके प्रति समस्त शत्रुता का भी अंत हो गया है।
तब विभीषण लंका नगरी के भीतर गये और रावण के दाह संस्कार की तैयारी करने लगे। अपने नाना माल्यवान को लेकर आने के बाद, विभीषण ने रावण की देह को दाह संस्कार हेतु ले जाने के लिए रथ पर रखा और फिर दाह संस्कार के लिए लकड़ियाँ लेकर चल रहे अन्य राक्षसों के साथ वहाँ से चला गया। दक्षिण की ओर बढ़ते हुए, वह दल श्मशान घाट पर पहुंचा और फिर वैदिक नियमों के अनुसार रावण के शरीर का दाह संस्कार किया गया। तब रावण की पत्नियाँ शांत हो गई और सभी लोग लंका वापस लौट आये।
अपने आध्यात्मिक क्रोध का त्याग कर देने के बाद, राम ने सौम्य रूप धारण कर लिया था और अपना धनुष, बाण और कवच आदि किनारे रख दिए थे। देवतागण भी आकाश लोक पर युद्ध देखने के अपने स्थानों से, वापस अपने निवास स्थलों को लौट गये और जाते हुए वे अत्यन्त संतोष के साथ भगवान् राम की महिमाओं का गुणगान करने लगे। भगवान् राम से आदर-सम्मान प्राप्त करने के बाद, मातली ने उनसे वापस लौटने की अनुमति ली और फिर इंद्र के रथ पर सवार होकर स्वर्ग लोक को वापस लौट गये।
अपने डेरे पर वापस लौट आने के बाद, राम ने लक्ष्मण को आदेश दिया कि वह विभीषण के राज्याभिषेक अनुष्ठान को संपन्न करें। तब लक्ष्मण ने वानर प्रमुखों को सोने के पात्र दिए और उन्हें शीघ्रातिशीघ्र चार समुद्रों से पानी लेकर आने का आदेश दिया। शीघ्र हो, लक्ष्मण ने वैदिक नियमों का अक्षरशः पालन करते हुए राज्याभिषेक समारोह संपन्न किया। सभी लंका वासी उपहारों व शुभ वस्तुओं के साथ यज्ञ वेदी वाले क्षेत्र में आये विभीषण ने ये उपहार भगवान् राम को अर्पित कर दिए।
राम ने अपने पास ही में हाथ जोड़कर खड़े हनुमान से कहा, कृपया जाकर सीता की कुशल क्षेम का पता लगाएँ और उन्हें सूचित करें कि मैंने रावण का वध कर दिया है। इसके बाद, यदि सीता का कोई संदेश हो, तो उसे लेकर यहाँ वापस आ जायें।
महाराज विभीषण से अनुमति लेने के बाद, हनुमान अशोक वाटिका को चल पड़े। वहाँ पहुँचकर हनुमान ने देखा कि भयानक राक्षसियाँ दुख से व्याकुल सीता को घेरकर खड़ी थीं।
सीता के सामने विनीत भाव से खड़े होकर, हनुमान बोले, आपके पति ने मुझे यहाँ आपको यह संदेश देने भेजा है, अनेक निद्राविहीन महीनों के बाद, मैंने अंततः आपका उद्धार करने का कार्य संपन्न कर लिया है। आपको उत्पीड़ित करने वाला राक्षसों का राजा मारा जा चुका है, इसलिए अब आप अपनी समस्त चिंताओं का त्याग कर दें।
यह सुनकर, सीता इतनी अधिक प्रसन्न हुई कि कुछ देर तक उनके मुख से शब्द ही नहीं निकले। जब हनुमान ने उनसे पूछा कि संदेश सुनकर वह चुप क्यों हो गई, तो सीता बोली, प्रसन्नता का बाँध टूट जाने के कारण, मैं बोल पाने में असमर्थ थी। हे हनुमान, आपने मुझे जो संदेश दिया है वह स्वर्ण और रत्नों की अपरिमित मात्रा से भी कहीं अधिक मूल्यवान है।
हाथ जोड़कर खड़े हनुमान ने कहा, यदि आपकी इच्छा हो, तो मैं इन सभी कुरूप राक्षसियों का वध कर सकता हूँ जिन्होंने इतने दीर्घकाल तक आपको सताया है। सच तो यह है कि आपने जो पीड़ा सही है उसका प्रतिशोध लेकर मुझे प्रसन्नता होगी। मुझे केवल आपकी अनुमति भर चाहिए।
सीता स्वभाव से ही पद्दलितों के प्रति अत्यन्त दयालुता रखती थीं। वह बोलीं ये मूर्ख दासियाँ मात्र है जो राजा के आदेश का पालन करती हैं। मैंने जो कष्ट सहे, वह मेरे ही गलत कार्यों के परिणाम थे और ये राक्षसियाँ तो नियति के हाथों को कठपुतलियाँ मात्र हैं।
मेरे प्रिय हनुमान, संभवतः आपने एक भालू द्वारा कही गई एक पुरानी कहावत सुनी होगी : एक महान व्यक्ति कभी भी अपने विरुद्ध किए गये अपराधों का ब्योरा नहीं रखता। सच तो यह है कि वह यह शपथ निभाता है कि वह बुराई का उत्तर बुराई से नहीं देगा। यह कथा इस प्रकार है: एक समय की बात है, एक बाघ एक शिकारी का पीछा कर रहा था, तब शिकारी एक विशाल वृक्ष पर बड़ गया। ठीक तभी उसने देखा कि वृक्ष की एक शाख पर एक भालू बैठा हुआ है। यह देखकर, बाघ बोला, शिकारी हम दोनों का शत्रु है। इसलिए तुम उसे वृक्ष से नीचे धकेल दो, ताकि मैं उसे खा सकूँ।
भालू बोला, इस शिकारी ने मेरे घर पर शरण ली है, इसलिए मैं इसे कोई हानि नहीं पहुंचाऊँगा। ऐसा करना धर्म के घोर विरुद्ध होगा।
यह कहकर भालू सोने चला गया। तब बाघ ने शिकारी से कहा, यदि तुम भालू को पेड़ से नीचे गिरा दोगे, तो मैं भालू को खा लूँगा और तुम्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचाऊँगा।
बाघ की बातों के झाँसे में आकर, शिकारी ने सोते हुए भालू को धकेल दिया। परंतु नीचे गिरते समय भालू ने किसी तरह एक शाख पकड़कर अपनी प्राण-रक्षा की। तब बाघ उस भालू से बोला, इस शिकारी ने तुम्हें मारने की कोशिश की. इसलिए अब तुम्हें उसे नीचे धकेलकर प्रतिशोध लेना चाहिए।
बाघ द्वारा बार-बार भालू को इस प्रकार उकसाए जाने पर भी, भालू ने ऐसा करने से मना करते हुए बाघ से कहा, एक महान व्यक्ति कभी भी अपने विरुद्ध किए गये अपराधों का ब्योरा नहीं रखता। सच तो यह है कि वह यह शपथ निभाता है कि वह किसी भी मूल्य पर बुराई का उत्तर बुराई से नहीं देगा क्योंकि वह जानता है कि सदाचरण ही धर्मपरायण व्यक्तियों का गहना है।
वहाँ से जाने से पहले, हनुमान ने सीता से पूछा कि क्या राम के लिए उनका कोई संदेश है। सीता बोलीं, मुझे केवल यही कहना है कि मैं अपने प्रिय स्वामी से भेंट करने की प्रतीक्षा कर रही हूँ जो सदैव ही अपने विशुद्ध भक्तों के प्रति अत्यन्त स्नेहशील रहते हैं।
हनुमान बोले, निश्चिंत रहें, क्योंकि राम व लक्ष्मण से आपकी भेंट आज हो होगी। अब कृपया मुझे जाने की अनुमति दें ताकि मैं अधिक विलंब किए बिना राम के पास लौट सकूँ।
हनुमान ने वापस लौटकर राम को सीता का संदेश दिया। इसके बाद, उन्होंने राम से आग्रह किया कि वह तत्काल सीता से भेंट करने जायें। हनुमान ने विनती करके कहा, उन्होंने इतनी पीड़ा सही है और वह आपसे भेंट करने को तरस रही हैं, इसलिए आपको तत्काल अशोक वाटिका जाना चाहिए।
यह अनुरोध सुनकर, राम की आँखों से आँसू बहने लगे। अपनी आँखें नीची करके, राम ने विभीषण को आदेश दिया, सीता के स्नान करके, वस्त्रों तथा दिव्य आभूषणों से सुसज्जित हो जाने के उपरांत उन्हें मेरे पास लेकर आयें।
विभीषण अशोक वाटिका में गये और एक राक्षसी के माध्यम से उन्होंने अपने आगमन की सूचना भिजवाई। अत्यन्त विनम्रता के साथ सीता के पास पहुँचकर, विभीषण बोले, राम आपसे मिलना चाहते हैं। सबसे पहले, कृपा करके स्नान कर लें और इन दिव्य वस्त्रों तथा दिव्य आभूषणों को धारण कर लें। इसके बाद, मेरे द्वारा लाई हुई पालकी पर विराजमान हों क्योंकि यही राम की इच्छा है।
सीता बोली, मैं इसी समय राम से मिलना चाहती हूँ मैं पहले स्नान नहीं करना चाहती।
परंतु विभीषण ने कहा, आप अपने पति की इच्छा पूरी करें क्योंकि यही सर्वोत्तम है और यह आपके लिए शुभ व मंगलकारी होगा।
सीता स्नान करने चली गई और फिर बहुत सुंदर ढंग से वस्त्र धारण करने के उपरांत वह पालकी में बैठ गई और पालकी के द्वारा ही उन्हें राम के सामने लाया गया। विभीषण जब राम के पास आये, तो उन्होंने देखा कि राम का सिर झुका हुआ है मानो वह किसी गहन चिंतन में निमग्न हों।
विभीषण ने सीता के आगमन की सूचना दी और तब राम ने सीता को तत्काल उनके सामने लेकर आने को कहा। उत्सुकता के कारण वानरों का दल, सीता की एक झलक मात्र पाने के लिए एकत्रित हो गया। विभीषण ने अपने चार सहयोगियों की सहायता से उन्हें पीछे धकेला ताकि सीता और राम एकांत में भेंट कर सकें। इस कारण से वहाँ बहुत हल्ला-गुल्ला होने लगा।
अपने निष्ठावान् सेवकों के प्रति अपने प्रगाढ़ स्नेह के कारण, राम को यह देखकर कष्ट पहुँचा, इसलिए उन्होंने विभीषण से कहा, इन वानरों को परेशान न करें। किसी पतिव्रता स्त्री को विपन्नता या युद्ध के दौरान, स्वयंवर के समय, यज्ञ के समय, या किसी विवाह समारोह में सार्वजनिक रूप से देखे जाने में कोई बुराई नहीं है। यदि वानर-गण सीता के दर्शन करना चाहते हैं, तो कृपया उन्हें दर्शन करने दें।
राम ने आदेश दिया, सीता को पालकी से उतारकर पैदल हो मेरे पास लाएँ।
विभीषण जब सीता को साथ लेकर आने लगे, तो सभी वानर प्रमुखों को यह समझ आ गया कि राम बहुत कठोर और गंभीर मनःस्थिति में हैं। उन्हें न केवल यह देखकर आश्चर्य हुआ कि राम सर्वसाधारण के सामने सीता से पैदल आने की कह रहे हैं, बल्कि उनका पूरा व्यक्तित्व ही अत्यन्त गंभीर दिख रहा है। सीता बहुत शर्माते सकुचाते हुए, सरल हृदय के साथ राम की ओर बढ़ीं, मानो वह स्वयं अपने में समाती जा रही हों। तब, सीता ने जब अपने प्रिय पति का सुंदर मुख देखा, तो उनकी सारी पीड़ा दूर हो गई और उनका मुख-मंडल फिर से पूर्ण चंद्र के समान दमक उठा।
सीता उन्हें अत्यधिक प्रेम व स्नेह के साथ निहारने लगीं, तब राम ने अपने हृदय में दबी भावनाओं को प्रकट करना आरंभ किया। राम का हृदय अपने कुल की बेदाग प्रतिष्ठा पर दाग लगने के भय से पीड़ित था। इस कारण उन्होंने क्रुद्ध स्वर में सीता को संबोधित किया।
राम बोले, मैंने रावण द्वारा किए गये मेरे अपमान का प्रतिशोध लेकर आपको पुनः प्राप्त करने की अपनी शपथ पूर्ण कर दी है, परंतु आपको यह अवश्य जात लेना चाहिए कि राक्षस राज का वध करने का मेरा यह महान प्रयास वास्तव में आपकी खातिर नहीं था। मैंने यह कार्य केवल अपनी और इक्ष्वाकु कुल को प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए किया।
सच-सच कहूँ तो आपका मेरे सामने आना मेरे लिए बिल्कुल भी प्रसन्नतादायक नहीं है। आप जहाँ चाहें जाने के लिए स्वतंत्र हैं। कोई भी सुसंस्कृत भी व्यक्ति अपनी उस पत्नी को कभी स्वीकार नहीं करेगा जिसका किसी अन्य पुरुष ने आलिंगन किया हो या फिर जो किसी अन्य पुरुष के घर पर रही हो। मुझे विश्वास है कि कोई भी स्त्री ऐसी नहीं हो सकती जो रावण के साथ इतने अधिक समय तक रहने के बाद भी रावण के द्वारा भोगी न गई हो। रावण आपके प्रति वासना से भरा हुआ था। भला वह क्यों स्वयं को बलपूर्वक आपका आनन्द-भोग करने से रोकेगा? रावण का वध करके, मैंने अपनी प्रतिष्ठा पुनः प्राप्त कर ली है, परंतु अब मेरे लिए आपसे आसक्त रहने का कोई कारण नहीं बचा है। आप जो भी चाहें वह करने के लिए स्वतंत्र हैं। आप लक्ष्मण, भरत, या अन्य किसी भी पुरुष को अपने लिए चुन सकती हैं।
राम की बातें सुनकर सीता ने लज्जा से अपना सिर झुका लिया। सीता ने इस से पहले राम के मुख से केवल प्रेमपूर्ण बातें ही सुनी थीं, इसलिए उनकी इन बातों ने सीता के हृदय को बाणों के समान अंदर तक भेद डाला और वह फूट-फूटकर रोने लगीं। इतने अधिक दर्शकों की उपस्थिति में, अपने पति द्वारा लगाई गई फटकार को सहन करना सीता के लिए बहुत कठिन हो गया।
अंत में, अपने आंसुओं को पोछते हुए, सीता ने काँपते हुए स्वर में कहा, आप आखिर इतने गैर-जिम्मेदार ढंग से मेरे बारे में बोलने का दुःसाहस कैसे कर सकते हैं? मैंने एक क्षण के लिए भी देह, मन, या वचन से अपने पतिव्रता धर्म का त्याग नहीं किया। मेरा चरित्र निष्कलंक है, इसलिए मुझे कोई सामान्य स्त्री समझकर आपको मेरा इस प्रकार से मूल्यांकन नहीं करना चाहिए। यद्यपि, मुझे राजा जनक की पुत्री जानकी कहा जाता है, परंतु मेरा जन्म आध्यात्मिक रूप से हुआ था क्योंकि मैं धरती के गर्भ से पैदा हुई थी।
हे राम, यदि इस बीच सारे समय आपने इस निष्ठुरता के साथ मेरा त्याग करने की योजना बनाई थी, तो हनुमान को संदेशवाहक के रूप में यहाँ भेजते समय आपने मुझे इस बारे में सूचित क्यों नहीं किया ? यदि मुझे पता होता कि आप मुझे अपने साथ वापस ले जाने की मंशा नहीं रखते हैं, तो मैंने तत्काल अपने प्राण त्याग दिए होते और इस प्रकार कई महीनों तक मुझे असह्य पीड़ा सहन नहीं करनी पड़ती। साथ ही, आप यह भयानक युद्ध करने से भी बच जाते जिसमें अगणित राक्षसों और वानरों की मृत्यु हो गई। हे राम, भला आप इस प्रकार का व्यवहार क्यों कर रहे हैं? क्या आपके प्रति मेरे शुद्ध समर्पण का आपके लिए कोई अर्थ नहीं है ?
इसके बाद, सीता लक्ष्मण का रुख करके बोली, कृपा करके, एक विशाल अग्नि स्थल निर्मित करें ताकि मैं उसमें प्रवेश कर सकूँ क्योंकि जन साधारण के सामने अपने पति द्वारा त्याग कर दिए जाने के बाद एक पतिव्रता स्त्री के लिए मात्र यही मार्ग शेष रह जाता है।
लक्ष्मण ने अपनी उद्विग्नता को दबाते हुए राम को ओर देखा। लक्ष्मण ने देखा कि उनके बड़े भाई सीता की बात से सहमत हैं, तो वह अग्नि प्रज्वलित करने की तैयारी करने लगे। वास्तव में, राम इतने कठोर और गहन गंभीर दिख रहे थे कि कोई भी उनसे कुछ कहने तक का साहस नहीं कर सका, तो भला उन्हें शांत करने के लिए प्रयास करने का प्रश्न ही कहाँ उठता था। जब इसके बाद, जब अग्नि पूरी भव्यता के साथ प्रज्ज्वलित हो उठी, तो सीता ने पहले राम को प्रदक्षिणा की। इसके बाद अग्नि के सामने हाथ जोड़कर खड़ी हुई और फिर उन्होंने ब्राह्मणों व देवताओं को प्रणाम किया।
इसके बाद सीता ने अग्नि देव से प्रार्थना करते हुए कहा, हे अग्नि देव, मेरा हृदय कभी भी राम से विमुख नहीं हुआ, इसलिए कृपा करके मेरी रक्षा करें। यद्यपि मैंने कभी भी मन, कर्म या वचन से उनके प्रति अपनी निष्ठा में कमी नहीं की, परंतु तब भी वह मुझ पर कलंक लग जाने का आरोप लगा रहे हैं। इसलिए, तीनों लोकों में सबसे प्रतापी, हे अग्नि देव मैं विनती करती हूँ कि आप मेरी पवित्रता के साक्षी बनें।
यह कहकर, सीता ने अग्नि को प्रदक्षिणा की। इसके बाद, आश्चर्य से देखती हुई विशाल भीड़ के सामने हो, सीता निर्भय होकर अग्नि की लपटों में प्रवेश कर गई। चमचमाती लपटों के अंदर, चमकते हुए स्वर्ण आभूषणों से सुसज्जित सीता कुंदन के समान दमकने लगीं। जैसे ही सीता ने अग्नि की लपटों में प्रवेश किया, वैसे ही वहाँ उपस्थित सभी स्त्रियाँ भय से चीख उठीं और वहाँ पर एकत्रित वानरों व राक्षसों के मुख से गहरी वेदना की चीत्कार निकल पड़ी। इन चौखों-कराहों के बीच राम अत्यन्त गहन चिंतन में लीन दिखाई दिए। उसी समय सभी प्रमुख देवगण शीघ्रता से अपने दिव्य वाहनों पर सवार होकर राम के सम्मुख प्रकट हुए।
देवगणों के सामने हाथ जोड़कर खड़े हुए राम से, देवताओं की ओर से ब्रह्माजी व शिवजी ने कहा, हे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् रामचंद्र, हमें यह देखकर अत्यन्त कष्ट पहुँचा है कि आप अपनी चिरंतन अद्धांगिनी, माता सीता की इस प्रकार अवहेलना कर रहे हैं। आप ही इस सृष्टि के रचयिता हैं और सभी देवों के देव हैं।। भला आप अपने देवत्व को क्यों नहीं पहचान पा रहे हैं और किसी सामान्य पुरुष की भाँति सीता का परित्याग क्यों कर रहे हैं ?
राम बोलें, मैं स्वयं को महाराज दशरथ का पुत्र और एक साधारण मनुष्य मानता हूँ, परंतु हे ब्रह्माजी, यदि कोई और बात है जिसे आप संभवतः प्रकट करता चाहते हैं, तो आप वह बता सकते हैं।
ब्रह्माजी बोले, मेरे प्रिय प्रभु राम, अब मैं आपकी वास्तविक पहचान उद्घाटित करता हूँ। आप स्वयं भगवान् नारायण हैं और इस प्रकार आप विष्णु- तत्व के सभी रूपों से अभिन्न हैं। आप मूल पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्री विष्णु के मानव अवतार हैं और इस प्रकार आप ही समस्त कारणों के कारण हैं। आप सृष्टि के आदि रूप हैं और समस्त देवता- गण आपके ही अंश हैं, या दूसरे शब्दों में कहें, तो वे आपके चिरंतन सेवक हैं। सीता अन्य कोई नहीं, वरन परम सौभाग्य की देवी, माता लक्ष्मी हैं। आप दोनों ने धरती पर रावण का संहार करने के लिए अवतार लिया है। अब यह कार्य संपन्न हो चुका है, इसलिए आप पृथ्वी पर अपनी इच्छानुसार जब तक चाहें शासन करने के पश्चात् आध्यात्मिक लोक में स्थित अपने भगवद्धाम को वापस लौट सकते हैं।
जैसे ही ब्रह्माजी ने बोलना समाप्त किया, वैसे ही अग्नि देव सीता को अपने हाथों में उठाकर लपटों के बीच से प्रकट हुए। जब अग्नि देव ने सीता को राम के समक्ष रख दिया, तो सभी लोग यह देखकर आश्चर्यचकित हो उठे कि सीता के देह, चमकदार लाल वस्त्रों, आभूषणों व केशों पर अग्नि से तनिक भी जलने का कोई चिह्न तक नहीं था।
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में साक्षी रहने की अपनी अद्वितीय क्षमता के साथ, अग्नि देव ने घोषणा की, हे राम, यह हैं आपकी प्रिय पत्नी सीता वह पूर्णतः पवित्र हैं और उनमें लेशमात्र भी पाप नहीं है। सीता कभी भी मन, वचन और यहाँ तक कि दृष्टि से भी, आपसे विमुख नहीं रही हैं, तो भला कर्म से विमुख होने का प्रश्न ही कहीं उठता है।
मेरे प्रिय प्रभु राम, आप निःसंकोच सीता को स्वीकार करें और अपनी कटु वाणी और कठोर व्यवहार का त्याग कर दें।
अग्नि देव की साक्षी सुनकर राम बहुत प्रसन्न हुए। उनके नेत्रों से प्रसन्नता के अश्रु प्रवाहित होने लगे और वह बोले, हे अग्नि देव, सीता के लिए इस अग्नि परीक्षा से होकर गुजरना बहुत आवश्यक था ताकि सर्व-साधारण उनकी शुचिता और पवित्रता के प्रति संतुष्ट हो सकें। यदि मैंने सीता को अग्नि में प्रवेश करने से रोक दिया होता, तो लोगों ने यह कहकर मेरी आलोचना की होती कि मैंने उनकी पवित्रता की परीक्षा लिए बिना ही उन्हें स्वीकार कर लिया। मेरे ऐसा नहीं करने पर, वे यह निष्कर्ष निकालते कि मैंने केवल उनका आनन्द-भोग करने की वासना के प्रभाव में आकर उन्हें वापस स्वीकार कर लिया।
सच तो यह है कि मैं सीता की पवित्रता के बारे में जानता था और यह भी जानता था कि रावण कभी भी उन्हें कलुषित नहीं कर सकता है क्योंकि वह अपने पतिव्रता धर्म की शक्तियों से पूर्णतः सुरक्षित हैं। मैंने केवल इस संसार के समय सीता की पवित्रता को प्रमाणित करने के लिए उनकी अवहेलना की। सच तो यह है कि सीता मुझसे भिन्न नहीं हैं, बल्कि वह मेरी आंतरिक शक्ति अर्थात अह्नादिनी. शक्ति का प्रत्यक्ष रूप हैं। जिस प्रकार, सूर्य की किरणें सूर्य से अलग नहीं हो सकती हैं उसी प्रकार मेरे द्वारा सीता का त्याग किए जाने की कोई संभावना ही नहीं है।
वास्तव में, सीता के साथ हुए पुनर्मिलन के कारण राम को अत्यधिक आध्यात्मिक आनन्द प्राप्त हुआ क्योंकि उनकी समस्त लीलाएँ उनकी आंतरिक शक्ति की ही अभिव्यक्तियों थीं और आध्यात्मिक संबंधों का आस्वादन लेने के लिए ही इस प्रकार से कार्य कर रही थीं।
तब भगवान् शिव ने राम को संबोधित करके कहा, मेरे प्रिय भगवन् शक्तिशाली रावण का संहार करके, आपने एक चमत्कारी कार्य किया है जिसकी महिमा का गुणगान तीनों लोकों में इस सृष्टि के अंतकाल तक किया जाता रहेगा।
इसके बाद, आकाश लोक की तरफ संकेत करके, शिवजी बोले, मेरे प्रिय राम, ऊपर देखिए कि किस प्रकार आपके पिता दिव्य रथ पर आरूढ़ होकर आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। आपकी दया दृष्टि पाने के बाद, अब वह स्वर्गाधिपति इंद्र के लोक में निवास करते हैं। शीघ्र ही लक्ष्मण के साथ महाराज दशरथ के पास जाकर उनसे भेंट करें, क्योंकि वह यहाँ पर मात्र आपके दर्शन करने ही आये हैं।
राम व लक्ष्मण ने अपने पिता को शीश झुकाकर प्रणाम किया। महाराज दशरथ ने परम आनन्द का अनुभव करते हुए, राम को अपनी गोद में बिठाया और बोले, स्वर्ग लोक में रहते हुए भी मुझे वास्तविक आनन्द की प्राप्ति नहीं हो रही है। मेरे प्रिय राम, केवल अब तुम्हें देखने के बाद ही मुझे आनन्द का अनुभव हो रहा है। कैकेयी ने वरदान में तुम्हें वनवास भेजने की जो माँग रखी थी, वह सदैव मेरे हृदय में शूल के समान गड़ी हुई थी। अब जाकर तुम्हारे वनवास की अवधि समाप्त हो जाने पर, मुझे चैन मिला है। मैं तुम्हें अयोध्या वापस जाते हुए और भरत से पुनर्मिलन करने के बाद, सम्राट के रूप में तुम्हारा राज्याभिषेक होते हुए देखना चाहता हूँ । मैं अब यह जानता हूँ कि तुम ही परमेश्वर विष्णु हो और तुमने इस पृथ्वी पर रावण का संहार करने के उद्देश्य से अवतार लिया है।
राम बोले, मेरे प्रिय पिता, मुझे भी वनवास की अवधि समाप्त हो जाने और अपना उद्देश्य पूर्ण हो जाने से अत्यन्त शान्ति मिल गई है, परंतु मैं आपसे एक चीज माँगना चाहता हूँ। वह यह कि मेरे वनवास की घोषणा के समय आपने कैकेयी और भरत का त्याग कर देने के संबंध में जो कटु शब्द कहे थे, कृपा कर अब आप उन्हें वापस ले लें।
महाराज दशरथ ने तत्काल सहमति देकर कहा, "तथास्तु" इसके बाद उन्होंने लक्ष्मण को अत्यन्त स्नेहपूर्वक गले से लगाकर घोषणा की, "मेरे प्रिय पुत्र, तुमने राम के प्रति जिस समर्पित भाव से अपनी सेवा अर्पित की है, उसके कारण मैं सदा-सर्वदा के लिए तुम्हारा ऋणी हो गया हूँ। तुम्हें यह जानना चाहिए कि तुम्हारे बड़े भाई पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के प्रत्यक्ष मानव अवतार हैं और इस जगत के कल्याण के लिए पृथ्वी पर अवतरित हुए हैं। भला हम अपनी बात क्या कहें, श्रेष्ठ देवता- गण तक उनकी आराधना करते हैं।
फिर महाराज दशरथ सीता से बोले, दया करके राम द्वारा तुम्हारी पवित्रता की परीक्षा लिए जाने के कारण, राम के प्रति अपने मन में कोई द्वेष मत रखना। तुम अपने निष्कलंक चरित्र व धर्मपरायण आचरण के कारण इतिहास में सर्वाधिक गरिमामय स्त्री के रूप में स्थान अर्जित करोगी।
यह कहकर महाराज दशरथ पुनः अपने दिव्य रथ पर बैठकर स्वर्ग लोक को चले गये। इसके बाद, राम ने अपने सामने खड़े इंद्र देव को दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम किया और तब इंद्र बोले, मेरे दर्शन कभी भी व्यर्थ नहीं होते, इसलिए मैं चाहता हूँ कि आप मुझसे वरदान माँगें।
यह सुनकर राम बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने अनुरोध किया, हे दिव्य जीवों के राजा, कृपा करके उन सभी वानर-गणों के प्राण वापस लौटा दें जिन्होंने मेरी सेवा करते हुए अपने प्राण त्याग दिए। इसके अतिरिक्त, इन सभी पराक्रमी योद्धाओं के आवास-स्थल के पास बारहों महीने वृक्षों को फलों से लदा रहने का वरदान दें।
इंद्र बोले, यद्यपि, यह वरदान देना मेरे लिए भी बहुत कठिन है, तथापि मैं प्रसन्नतापूर्वक आपको यह वरदान देता हूँ।
तत्काल, युद्ध में मारे गये सभी वानर- गण धरती से उठ खड़े हुए। उनके घाव पूरी तरह भर गये थे, इसलिए ऐसा जान पड़ा मानो ये वानर-गण घोर निद्रा से जागे हों परंतु, जब इन वानरों ने राम को देखा और उनके सामने खड़े सभी देवताओं को देखा, तो वे यह समझ गये कि उन्हें अपने प्राण वापस मिल गये हैं, इसलिए वे परम आनन्द से भर उठे।
इसके बाद, इंद्र देव अन्य सभी देवताओं के साथ स्वर्ग लोक को चले गये। राम व सभी वानर- गणों ने वह रात उसी स्थान पर व्यतीत की। अगली सुबह विभीषण अनगिनत दासियों के साथ नाना प्रकार की स्नान सामग्री लेकर राम के दर्शन करने आये।
परंतु राम ने आदेश दिया, मेरे प्रिय विभीषण, सुग्रीव के नेतृत्व में सभी वानरों को बुलाएँ और उन्हें इस राजसी ऐश्वर्य का आनन्द उठाने दें। जब तक मैं भरत से दूर हूँ, तब तक ऐसा ऐश्वर्य मेरे मन को बिल्कुल नहीं सुहाता क्योंकि भरत मेरी ओर से कठोर तपस्या में रत हैं। मेरी आपसे एक ही विनती है कि आप मेरे शीघ्र अयोध्या लौटने के लिए कोई प्रबंध करें, क्योंकि वहाँ तक पैदल यात्रा करना अत्यन्त कठिन व कष्टसाध्य है।
तब विभीषण बोले, मैं आपको आज ही पुष्पक विमान पर बिठाकर अयोध्या पहुँचा सकता हूँ, परंतु मेरा आपसे अनुरोध है कि आप सीता व लक्ष्मण कुछ और समय तक वानर सेना के साथ यहाँ पर रहें, ताकि आपके प्रस्थान से पहले मैं आप सभी लोगों का राजसी स्वागत-सत्कार व मनोरंजन कर सकूँ।
इस पर राम बोले, निश्चित ही मैं आपके आतिथ्य को नहीं ठुकरा सकता, परंतु मेरे मन में भरत से और अपनी माताओं से मिलने की व्यग्रता इतनी अधिक है कि में आपसे अनुरोध करता हूँ कि आप मुझे अविलंब प्रस्थान करने की अनुमति दें।
विभीषण शीघ्र जाकर पुष्पक विमान ले आये। यह चमत्कारी वाहन मूल रूप से कुबेर का था, परंतु बाद में रावण ने इसे बलपूर्वक हथिया लिया था। पुष्पक विमान को विश्वकर्मा ने बनाया था और यह मुख्यतः सोने से बना था व इसमें वैदर्य रत्न के बने आसन थे। यह विमान अपने चालक की मनोभावनाओं को समझकर वायु मार्ग से किसी भी स्थान तक जा सकता था।
राम और लक्ष्मण ने जब देखा कि पुष्पक विमान उनके आदेशों की प्रतीक्षा कर रहा है, तो वे आश्चर्यचकित रह गये। वहाँ से जाने से पहले, राम ने विभीषण से अनुरोध किया कि वह सभी वानर सैनिकों को उपहार स्वरूप स्वर्ण और रत्न प्रदान करें।
लक्ष्मण व सीता के साथ पुष्पक विमान में आरूढ़ हो जाने पर, राम ने अपने चारों तरफ खड़े वानरों से कहा, "मेरी ओर से पराक्रम के साथ युद्ध में लड़ने के लिए, मैं किसी भी प्रकार से आप सभी वानर योद्धाओं के ऋण से मुक्त नहीं हो सकता। आपकी अविचल भक्तिमय सेवा भविष्य में भक्तगणों को प्रेरित करेगी। आपका यशगान अमर रहेगा। अब आप लोग कृपा करके किष्किंधा लौट जायें और महाराज सुग्रीव के नेतृत्व में आनन्दपूर्वक जीवन व्यतीत करें। मेरे प्रिय विभीषण, आपको इसी क्षण से लंका का शासन-कार्य संभाल लेना चाहिए, क्योंकि लंका के वासी राजा विहीन हो गये हैं।
राम के समक्ष हाथ जोड़कर खड़े, सुग्रीव व विभीषण ने विनती करके कहा, हे प्रभु कृपा करके हमें भी अपने साथ अयोध्या चलने की अनुमति दें। आपका राज्याभिषेक समारोह देखने के बाद, हम अपने निवास को लौट जायेंगे।
राम ने उत्तर दिया, अपने सभी प्रिय मित्रों के साथ अयोध्या वापस लौटने से अधिक सुखद भला मेरे लिए और क्या हो सकता है। आप दोनों ही पुष्पक विमान में आ सकते हैं और अन्य सभी वानर योद्धा और राक्षस गण भी यदि चलना चाहें तो पुष्पक विमान में आ सकते हैं।
अंततोगत्वा, जब सभी लोग पुष्पक विमान में आराम से बैठ गये, तो यह विमान चमत्कारी ढंग से हवा में ऊपर उड़ गया। जिस समय वानर-गण, भालू- गण और राक्षस गण पुष्पक विमान की उड़ान का आनन्द उठा रहे थे, तब राम ने सीता को विभिन्न स्थानों की ओर संकेत करके उनके बारे में बताना आरंभ किया।
राम बोले, इस महान रणभूमि को देखो जहाँ केवल तुम्हारी खातिर सभी पराक्रमी राक्षस मृत पड़े हुए हैं। वहाँ रावण है, वहाँ कुंभकर्ण है, वहाँ इंद्रजित है और वहाँ पर प्रहस्त है। उस स्थान पर जो सेतु है उसे नलसेतु कहते हैं जिस पर चलकर हमने समुद्र पार किया और लंका पहुँचे। समुद्र के दूसरे तट पर, वहाँ सेतुबंध है जहाँ भगवान् शिव मेरे सामने प्रकट हुए थे और वहीं से सेतु का निर्माण कार्य आरंभ किया गया। आज से सेतुबंध अत्यन्त पवित्र तीर्थस्थल हो जायेगा और यहाँ के दर्शन करने मात्र से व्यक्ति के सभी पाप नष्ट हो जायेंगे।
जब राम ने सीता को किष्किंधा के दर्शन कराए, तो सीता बोलीं, यदि वानर प्रमुखों की सभी पत्नियाँ भी हमारे साथ अयोध्या चल पातीं, तो मुझे बहुत प्रसन्नता होती।
राम ने सीता की इच्छा पूरी की और विमान को किष्किंधा में रोकने के बाद, उन्होंने सुग्रीव व अन्य वानर प्रमुखों को शीघ्र जाकर अपनी पत्नियों के साथ वापस आने का निर्देश दिया। जब सब लोग लौटकर आसनों पर विराजमान हो गये, तो पुष्पक विमान फिर से आगे की यात्रा के लिए उड़ चला।
राम ने संकेत करके कहा, यह ऋष्यश्रृंग पर्वत है, जहाँ मेरी सुग्रीव से भेंट हुई थी और इसके पास ही में स्वर्ग के समान सुंदर पंपा झील है जो नीले रंग के कमल के फूलों से परिपूर्ण है। इसके आगे तुम्हें गोदावरी नदी दिखेगी और इसके तट पर ही अगस्त्य ऋषि का आश्रम है। मेरी प्रिय सीता, उधर, वहाँ पर, वह स्थान है जहाँ रावण ने तुम्हारा अपहरण किया था। वह चित्रकूट है, जहाँ भरत मुझसे मिलने के लिए आये थे। वह यमुना नदी है और वह विशाल गंगा नदी है जहाँ पर राजा गुहा की राजधानी, श्रृंगवेरपुर दिख रही है।
इस प्रकार, सीता, राम व लक्ष्मण ने अयोध्या स्थित अपने आवास को लौटते हुए, अपने सम्पूर्ण वनवास काल के जीवन को उल्टे क्रम में याद किया। अंततः, सरयू नदी दिखाई दी और फिर अयोध्या का सीमावर्ती क्षेत्र दिखने लगा।
अयोध्या में प्रवेश करने से पहले, राम भरद्वाज ऋषि के आश्रम पर रुके ताकि वह अपने संबंधियों से भेंट करने से पहले उनकी कुशल-क्षेम जान सकें।
राम का हार्दिक स्वागत करने और उनसे प्रणाम के रूप में आदर-सम्मान प्राप्त करने के बाद, भरद्वाज मुनि बोले, आपको अनुपस्थिति में भरत ने मृगांबर पहनकर और जटा धारण करके कठोर तपस्वी जीवन व्यतीत किया है। वह आपके अधीनस्थ के रूप में राज्य का शासन संचालन कर रहे हैं और उन्होंने आपकी खड़ाऊ को राज-सिंहासन पर विराजमान कर रखा है। हे राम, आपके वनवास के दौरान घटी घटनाओं के विषय में, मैं अपनी दिव्य शक्ति से सब कुछ जानता हूँ। मैं बहुत प्रसन्न हूँ कि आपने धरती से रावण रूपी पाप का भार कम कर दिया है, इसलिए आप जो भी वरदान चाहँ माँग लें।
राम ने प्रसन्न होकर कहा, अयोध्या तक पहुँचने वाले मार्ग के पास स्थित सभी वृक्ष फलों व फूलों से लद जायें। इन वृक्षों से अमृत के समान सुगंध वाली शब्द की धारा प्रवाहित हो जाये।
राम के मुख से बात पूरी होते ही, अयोध्या जाने वाले मार्ग के पास स्थित सभी वृक्ष मधुर फलों से लद गये। इस चमत्कारी परिवर्तन को देखकर, हजारों-हजार वानर तत्क्षण पुष्पक विमान से कूद पड़े और छककर उनका आनन्द उठाने लगे। राम सदैव ही यह सोचा करते थे कि वह इन वानरों की निःस्वार्थ सेवा का उपकार कैसे चुकाएँ इसलिए उन्हें प्रसन्न करने का यह सुअवसर पाकर वह अत्यधिक प्रसन्न हुए।
फिर, हनुमान की ओर मुड़कर, राम बोले, मैं चाहता हूँ कि आप गुहा के पास जाकर उन्हें मेरे आगमन की सूचना दें। इसके बाद, आप नंदीग्राम जायें। मैं चाहता हूँ कि आप भरत को सीता के अपहरण से लेकर उनके उद्धार तक की सारी घटनाएँ सुना दें। मेरे आगमन की सूचना सुनकर भरत के चेहरे पर कैसे भाव प्रकट होते हैं इस पर विशेष रूप से ध्यान देना। फिर, हमारे इस स्थान को छोड़कर जाने से पूर्व मुझे इस बारे में सूचना देना। यदि भरत राज्य पर शासन करने की इच्छा रखते हैं, भले ही यह शासकीय पद और इसके कारण प्राप्त होने वाली शक्तियों के मोह के कारण हो, या राजसी ऐश्वर्य का भोग करने की इच्छा के कारण हो, या भले ही कैकेयी के आग्रह के कारण हो, तो मैं प्रसन्नतापूर्वक उन्हें ऐसा करने की अनुमति देता हूँ।
तब हनुमान मानव रूप धारण करके वायु मार्ग द्वारा वहाँ से चले गये। पहले वह गुहा के पास गये और उन्हें सूचित किया कि भरद्वाज ऋषि के आश्रम में रात व्यतीत करने के बाद राम उनसे भेंट करने आयेंगे। इसके बाद, नंदीग्राम पहुँचकर हनुमान ने भरत को वृक्ष की छाल के वस्त्र पहने और जटाजूट धारण किए हुए देखा। भरत एक छोटी-सी कुटिया में रह रहे थे और फल एवं कंद-मूल खाकर जीवन व्यतीत कर रहे थे। हनुमान को वह बहुत दुर्बल तथा दुखी जान पड़े।
भारत के पास पहुँचकर, हनुमान ने कहा, मैं यहाँ पर राम के दूत के रूप में आया है। उन्होंने आपकी कुशल क्षेम पूछी है और वह आपको यह सूचित करना चाहते हैं कि वह शीघ्र ही अयोध्या लौट आयेंगे।
इन अमृत समान शब्दों को सुनकर, भरत का चेहरा अत्यधिक प्रसन्नता के कारण दमक उठा। आध्यात्मिक भावोन्माद से उत्तेजित होकर, वह अचानक मूर्च्छित होकर जमीन पर गिर पड़े। चेतना लौटने पर, भरत उठ खड़े हुए और उन्होंने अत्यन्त संतुष्ट होकर हनुमान को गले से लगा लिया। हनुमान पर अपने अश्रुओं की वर्षा करते हुए, भरत बोले, आप मेरे पास यह परम आनन्ददायक समाचार लेकर आये हैं, इसलिए मैं इसी क्षण आपको पुरस्कार स्वरूप 1,00,000 गायें, एक सौ गाँव तथा विवाह के लिए सोलह कुंआरी कन्याएँ देता हूँ। कृपा करके, बैठ जायें और राम के वनवास के दौरान जो भी घटनाएँ घटित हुई वे मुझे बताएँ।
हनुमान ने संक्षेप में सब कुछ बता दिया और फिर उन्होंने अपनी वास्तविक पहचान उजागर की राम के शीघ्र ही लौट आने के बारे में सुनकर, भरत खुशी से चिल्ला उठे, मेरी चिर प्रतीक्षित मनोकामना अब पूरी होने वाली है।
भरत ने शत्रुघ्न को राम के स्वागत-सत्कार के लिए सभी प्रबंध करने का आदेश दिया। सुमंत्र तथा अन्य मंत्रीगण भी शीघ्र ही हाथियों पर सवार होकर नंदीग्राम पहुँच गये। कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी पालकी पर बैठकर आये। नंदीग्राम से लेकर अयोध्या तक एक नया मार्ग निर्मित करने के लिए, कारीगर और श्रमिक भी पहुँच गये।
सभी प्रबंध पूरे हो जाने पर, भरत ने राम की खड़ाऊ, श्वेत रंग का एक राजसी छत्र और चामर उठा लिए। अनेक ब्राह्मणों को साथ लेकर, वह अपनी कुटिया में बाहर निकलकर मार्ग पर खड़े हो गये और राम के आगमन की प्रतीक्षा में वहाँ शंख तथा ढोल-नगाड़े बजने लगे।
इस बीच, दावानल की भाँति अयोध्या नगरी में राम के आगमन का समाचार फैल गया और सम्पूर्ण अयोध्यावासी राम के दर्शन करने के लिए नंदीग्राम पहुँच गये। कुछ समय बाद भी, जब राम के आने का कोई चिह्न नहीं दिखाई दिया, तो भरत ने हनुमान से कहा, मुझे आशा है कि आप मेरे साथ ठिठोली करके अपने चंचल वानर स्वभाव का प्रदर्शन नहीं कर रहे हैं।
इसके उत्तर में, हनुमान ने वहाँ से दूर उठ रहे धूल के गुबारों की ओर संकेत किया जो वहाँ पहुँच रहे वानरों की धमाचौकड़ी से उड़ रही थी। ठीक तभी, दूर से आती तुमुलकारी गर्जन ध्वनि भी सुनाई देने लगी। हनुमान को जैसे ही पुष्पक विमान की झलक दिखी, वह चिल्ला उठे, "वह रहे श्री राम!" आकाश लोक में स्थित पूर्णमासी के चंद्र के समान दिख रहे पुष्पक विमान के दर्शन होते ही, बेचैन भीड़ ने गर्जना करना आरंभ कर दिया।
आदर प्रकट करने के लिए, सभी लोग अपने घोड़ों, हाथियों और रथों से नीचे उतर पड़े, जबकि भरत ने दूर से राम की झलक मिलते ही आराधना करनी आरंभ कर दी। दोनों हाथ जोड़कर, उन्होंने भगवान् के लिए अनेक प्रार्थनाएँ कहाँ, फिर उन्होंने नाना प्रकार की वस्तुएँ अर्पित की। अंततः, राम के स्पष्ट दर्शन मिलते ही। अत्यधिक श्रद्धा के कारण भरत ने प्रणाम करते हुए शीश झुका लिया। पुष्पक विमान में सबसे आगे बैठे हुए राम दिव्य रूप से तेज के साथ जगमगा रहे थे।
जब वह दिव्य विमान जमीन पर उतरा, तो भरत अपने बड़े भाई का अभिनंदन करने के लिए दौड़कर विमान में जा चढ़े। राम तत्काल अपने आसन से उठ खड़े हुए और अत्यन्त स्नेहपूर्वक भरत का आलिंगन करने के बाद, राम ने उन्हें अपनी गोद में बिठा लिया।
इसके बाद, भरत ने लक्ष्मण व सीता का अभिनंदन किया। सुग्रीव का आलिंगन करते हुए, वह बोले, हम लोग चार भाई है, परंतु अब आप हमारे पाँचवें भाई बन गये हैं।
ठीक इसी समय, राम अपनी माता कौशल्या की ओर बढ़े और उन्होंने प्रेमपूर्वक उनके पैर पकड़ लिए। इसके बाद, उन्होंने एक-एक करके सुमित्रा, कैकेयी व वशिष्ठ का अभिनंदन किया और साथ ही सभी अयोध्यावासी राम के स्वागत में दोनों हाथ जोड़कर खड़े हो गये।
भरत अपने हाथों में लकड़ी के खड़ाऊँ लेकर राम के पास गये। राम के चरण-कमलों में ध्यान से खड़ाऊँ पहनाने के बाद, भरत बोले, यह रहा वह राज्य जिसकी निगरानी में आपकी अनुपस्थिति में कर रहा था। आपकी दया से अयोध्या धन-धान्य से समृद्ध है और कोषागार, भंडारघर व सेना में दस गुना बढ़ोतरी हुई है। अब मेरा कर्तव्य पूरा हुआ, इसलिए मैं अब यह समस्त शासन-कार्य आपके सुपुर्द करता हूँ।
इसके बाद, राम ने पुष्पक विमान को अपने मूल स्वामी, अर्थात धन-संपत्ति के देवता कुबेर के पास वापस लौट जाने का आदेश दिया। तब वह दिव्य विमान उत्तर दिशा की ओर आकाश मार्ग में उड़ चला।
फिर, राम अपने आध्यात्मिक गुरु वशिष्ठ मुनि के चरण-कमलों में बैठ गये, तभी भरत वहाँ आये और उन्होंने अनुरोध किया, मेरे प्रिय बड़े भाई, कृपा करके अब आप अविलंब स्वयं को राज सिंहासन पर आरूढ़ करें और राजसी ऐश्वर्य का जीवन व्यतीत करें।
राम ने अपनी सहमति दे दी और तब शीघ्र ही नाइयों को बुलवाकर उनकी जटा काटी गई। फिर, राम के स्नान कर लेने पर उन्हें राजसी वस्त्रों से सुसज्जित किया गया, जबकि तीनों माताओं ने सीता को और वानरों की पत्नियों को राजसी वस्त्रों से सुसज्जित किया। शत्रुघ्न के आदेश पर, सुमंत्र ऐश्वर्यपूर्ण ढंग से सुसज्जित एक रथ लेकर राम के पास आये। राम गरिमामय तरीके से इस पर चढ़ गये और तब भरत ने घोड़ों की लगाम अपने हाथ में ले ली और शत्रुघ्न ने श्वेत रंग का राजसी छत्र पकड़ लिया। राम के एक तरफ लक्ष्मण और दूसरी तरफ विभीषण खड़े हो गये और पंखा तथा चामर डुलाने लगे। आकाश लोक से, देवताओं और दिव्य ऋषियों ने अत्यन्त ध्यान से चुने गये शब्दों में राम की महिमा का बखान किया।
राम जब अयोध्या की ओर बढ़े, तो उनके पीछे-पीछे एक विशाल जुलूस चलने लगा। सभी वानरों ने मानव-रूप धारण कर लिया और हाथियों पर सवार हो गये।
अपनी राजधानी में प्रवेश करने पर, राम ने देखा कि सभी नागरिक अपने घरों से बाहर निकल आये हैं और मार्ग के दोनों तरफ खड़े होकर उनका स्वागत कर रहे हैं। स्त्री-पुरुष, बूढ़े बच्चे सभी लोग राम को ऐसे निहार रहे थे मानो बहुत समय पहले बिछुड़ा हुआ कोई अपना सगा वापस आ रहा हो।
अपने कपड़े लहराकर, उत्तेजना से उछल-कूद करते हुए लोग चिल्ला उठे, हमारे प्रिय राजकुमार लौट आये है। अपने भक्तों का उद्धार करने वाले, भगवान राम की महिमा अमर रहे!
बीच-बीच में संगीतकार वाद्य यंत्र बना रहे थे और ब्राह्मण जन वैदिक मंत्रोच्चार कर रहे थे। राम ने अपनी प्रजा को स्नेह-दृष्टि से देखा। अपने पिता के महल की ओर बढ़ते समय, राम ने अपने मंत्रियों का अभिनंदन किया और उन्हें वानरों व विभीषण के साथ अपने राजनीतिक गठबंधन के बारे में बताया।
राम ने आदेश दिया कि उनके राजमहल में सुग्रीव के ठहरने का प्रबंध किया जाये और तब भरत ने वानर राज का हाथ थाम लिया और उन्हें राजमहल की ओर ले जाने लगे। भरत के अनुरोध पर जाम्बवान, हनुमान, गवय और ऋषभ चारों समुद्र से जल लेकर आये जबकि अन्य पांच सौ शक्तिशाली वानर -गण पाँच सौ पवित्र नदियों का पानी लेकर आये जल से भरे ये पात्र वशिष्ठ मुनि के सामने रख दिए गये।
कुछ ही देर बाद, ऋषि ने राम को सीता के साथ एक राज सिंहासन पर बिठा दिया। वामदेव, जाबालि कश्यप, कात्यायन, सुयज्ञ, गौतम और विजय ऋषि की सहायता से, वशिष्ठ मुनि ने अभिषेक समारोह संपन्न किया और पहला स्नान ब्राह्मणों द्वारा कराया गया। इसके बाद कुंआरी कन्याओं ने राम को स्नान कराया, फिर मंत्रियों, प्रमुख योद्धाओं और वैश्यों ने बारी-बारी से राम को स्नान कराया। अंतिम, स्नान समारोह हो जाने पर, वशिष्ठ मुनि ने राम पर चारों लोकपालों व अन्य प्रमुख देवगणों से प्राप्त जड़ी-बूटियों छिड़कों और उस समय वे सभी आकाश लोक से राज्याभिषेक अनुष्ठान देख रहे थे।
जब राम सोने से बने, रत्न- -जड़ित राज सिंहासन पर विराजमान हो गये, तो वशिष्ठ मुनि ने उनके पास आकर उनके मस्तक पर राज-मुकुट रखा और उनके शरीर को सीने के आभूषणों से अलंकृत किया। इस राज-मुकुट को इक्ष्वाकु वंश के सभी राजाओं ने धारण किया था और इसे ब्रह्माजी द्वारा वैवस्वत मनु के राज्याभिषेक के लिए विशेष रूप से निर्मित किया गया था।
इंद्र के कहने पर वायु देव वहाँ गये और उन्होंने सोने से बने एक सौ कमल के फूलों का एक हार राम के गले में पहना दिया। वायु देव ने मोतियों और मणियों से निर्मित एक दिव्य हार भी भेंट किया। शत्रुघ्न ने राम के सिर के ऊपर छत्र पकड़ रखा था, जबकि सुग्रीव व विभीषण दोनों तरफ से उन्हें पंखा झल रहे थे।
अनुष्ठान संपन्न हो जाने पर, गंधवों ने गीत गाए और अप्सराओं ने भावोन्माद से भरकर नृत्य किया। तब राम ने ब्राह्मणों को 1,00,000 गायों का और 30 करोड़ स्वर्ण मुद्राओं तथा नाना प्रकार के बहुमूल्य रत्नों का दान किया। राम ने सुग्रीव को सोने से बना दिव्य हार और रत्न दिए और अंगद को एक जोड़ा बाजूबंद दिए जिन्हें हीरों व वैदूर्य रत्नों से सुसज्जित किया गया था सीता को राम ने वायु देव से उपहार में मिला हार भेंट किया और साथ ही अनेक बहुमूल्य व ऐश्वर्यपूर्ण ढंग से सुसज्जित पोशाक भेंट की।
हनुमान ने सीता की जो सेवा की थी उसके कारण, सीता के मन में हनुमान को कुछ भेंट करने की इच्छा थी। यहीं सोचते हुए, सीता ने राम द्वारा भेंट किए गये हार को उतार लिया और प्रश्नपूर्ण नजरों से वह भगवान् की ओर ताकने लगीं। सीता के मनोभावों को समझकर, राम ने सीता से अनुरोध किया कि वह हनुमान को यह हार भेंट कर दें और तब सीता अत्यन्त प्रसन्न होकर हनुमान के पास गई और उनके गले में हार पहना दिया।
सभी वानर प्रमुखों को बहुमूल्य वस्त्र तथा आभूषण दिए गये और इस प्रकार से राम का राज्याभिषेक सफलतापूर्वक संपन्न हो गया। अत्यन्त संतुष्ट होकर सभी वानर - गण अपने-अपने राज्यों को लौट गये और विभीषण ने लंका को प्रस्थान किया।
सभी के चले जाने के उपरांत, राम ने लक्ष्मण से कहा, मेरे प्रिय भाई, राज- सिंहासन पर मेरा राज्याभिषेक हो जाने के बाद, अब मेरी इच्छा है कि मैं तुम्हें अपने उत्तराधिकारी के रूप में प्रतिष्ठित करूँ।
राम ने लक्ष्मण को संबोधित करके यह बात कई बार कही, परंतु तब भी लक्ष्मण ने कोई उत्तर नहीं दिया क्योंकि उन्हें यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं था। राम बहुत अच्छे से लक्ष्मण के मन की बात जान गये थे, इसलिए अंततः उन्होंने भरत को अपना उत्तराधिकारी बना दिया।
इसके बाद, राम ने अपनी राजधानी अयोध्या से पृथ्वी पर 11,000 वर्ष तक शासन किया। इस अवधि के दौरान, राम ने अनगिनत यज्ञ किए, जिनमें एक सौ अश्रमेध यज्ञ शामिल थे। भगवान् राम के शासन के दौरान, अपने पति की मृत्यु पर विलाप करने वाली कोई विधवा स्त्रीं नहीं हुई, कोई रोग नहीं थे और कहीं भी चोरी नहीं होती थी। सच तो यह है कि वन्य जीव-जंतुओं तक ने अपने नैसर्गिक शत्रु-भाव का त्याग करके, एक-दूसरे को मारना छोड़ दिया। सभी नागरिक पूर्णतः धर्मपरायण थे। वे राम को अपना भगवान्, अपना स्वामी और अपनी आत्मा व प्राण मानते थे। प्रत्येक नागरिक एक हजार वर्ष तक जीवित रहा और उनके अनेक पुत्र हुए। सभी चर्चाओं का केंद्र-बिंदु केवल राम ही हुआ करते थे। इस प्रकार, सम्पूर्ण पृथ्वी भगवान् के राज्य, वैकुण्ठ लोक में परिवर्तित हो गई जान पड़ती थी।
लव और कुश ने अपने वर्णन को यह कहकर समाप्त किया, जो कोई व्यक्ति रामायण के नाम से सुविज्ञ, आध्यात्मिक इतिहास को प्रतिदिन सुनता है, वह सभी पापों से पूर्णतः मुक्त हो जाता है। अपनी इंद्रियों को संयमित करके, पूरी आस्था के साथ इसका श्रवण करने वालों को, यह पवित्र कथा शक्ति, दीर्घायु और विजय प्रदान करती है।
यदि कोई स्त्री रामायण का पाठ करे, तो उसे पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है; यदि कोई राजा पढ़े, तो वह विश्व-विजयी होता है; यदि कोई यात्री पढ़े, तो वह अपने गंतव्य स्थल तक पहुँच जाता है; और यदि कोई पापी व्यक्ति रामायण का पाठ करे, तो उसके पाप मिट जाते हैं। इस पवित्र कथा का बार-बार पाठ करना चाहिए क्योंकि इसे सुनने वाले व्यक्ति को न केवल भौतिक वरदान प्राप्त होते हैं, बल्कि ऐसा करने से पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् भी प्रसन्न होते हैं और यह एक ऐसी उपलब्धि है जो धार्मिक, आर्थिक विकास, इंद्रिय-तुष्टि और निर्विशेष मोक्ष के सीमित हितों से कहीं बढ़कर है। परमेश्वर, रामचंद्र के प्रति विशुद्ध प्रेम विकसित करके, व्यक्ति को चिरंतन आध्यात्मिक लोक में प्रभु के चरण कमलों में सदा-सर्वदा के लिए शरण प्राप्त होती है।
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