राम के राज्याभिषेक के कुछ समय बाद, अनेक ऋषि-मुनि उनकी आराधना करने और उनकी आध्यात्मिक लीलाओं का गुणगान करने के लिए अयोध्या पहुँचे। राजमहल में सप्तऋषि वशिष्ट कश्यप, अत्रि, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और भरद्वाज तो पहुँचे ही, साथ ही कौशिक, कण्व, अगस्त्य और धौम्य ऋषि भी आये। जब राजमहल के दरबान ने राम की इन महान ऋषियों के आगमन की सूचना दी, तो उन्होंने इन ऋषि-मुनियों को ससम्मान दरबार में बुलवाया और स्वयं उनका स्वागत करने के लिए हाथ जोड़कर खड़े हो गये। राम ने उनके लिए विशेष आसन मँगवाए और उनका कुशल क्षेम पूछते हुए उनका हार्दिक स्वागत-सत्कार किया।
इस पर ऋषिगण बोले, प्रिय राम, आपने अपनी भव्य आध्यात्मिक लीलाओं का प्रदर्शन करने के लिए पृथ्वी पर अवतरित होकर हमें अत्यंत प्रसन्नता व संतुष्टि प्रदान की है। रावण का संहार हो जाने पर, हमें बहुत शांति और प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है, क्योंकि वह जगत् के कल्याण व प्रगति की राह में एक बड़ी रुकावट था। केवल रावण ही नहीं, बल्कि खर, मारीच, कुंभकर्ण, अतिकाय, निकुंभ और कुंभ जैसे अन्य अनेक राक्षसों ने सभी जीवधारियों को आतंकित कर रखा था। हम आपके बहुत आभारी है कि आपने उन सबका संहार कर दिया।
इंद्रजित का संहार करने के लिए, हम विशेष रूप से आपके आभारी हैं क्योंकि उसकी बराबरी कोई भी नहीं कर सकता था। आपके और लक्ष्मण के अतिरिक्त, तीनों लोकों में अन्य कोई भी उसका वध करने की सामर्थ्य नहीं रखता।
राम ने विनम्रता से ऋषियों की बात काटते हुए, उत्सुकतावश पूछा, आप इंद्रजित की इतनी अधिक प्रशंसा क्यों कर रहे हैं कि मानो वह रावण और कुंभकर्ण से भी अधिक शक्तिशाली रहा हो ?
इस प्रश्न के जवाब में, ऋषियों की ओर से अगस्त्य ऋषि ने विस्तारपूर्वक राक्षसों के इतिहास की कथा सुनाई। पुलस्त्य ब्रह्माजी के पुत्र थे। वह तपस्या के लिए तृणबिंदु के आश्रम में गये और बाद में उनकी पुत्री से विवाह कर लिया। उनके पुत्र का नाम विश्रवा था और उनके इस नाम से पता चलता है कि उन्हें वेदों का पाठ सुनने का बेहद शौक था। विश्रवा ने भरद्वाज की पुत्री से विवाह किया और उनको एक पुत्र हुआ जिसका नाम वैश्रावण रखा गया।
बाद में, वैश्रावण की तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने उन्हें चौथा लोकपाल बनाया वैश्रावण को धन के भगवान कुबेर का पद दिए जाने के साथ ही पुष्पक विमान भी दिया गया। इसके बाद, वैश्रवण ने अपने पिता से कहा कि वह उन्हें निवास करने के लिए कोई स्थान बताएँ।
विश्रवा ने उत्तर दिया, प्रिय पुत्र, तुम त्रिकूट पर्वत पर स्थित लंका नगरी में रह सकते हो, जिसे विश्वकर्मा ने राक्षसों के रहने के लिए बनाया था। चूँकि भगवान विष्णु के डर से राक्षस वहाँ से भागकर रसातल में रहने चले गये हैं. इसलिए लंका अब खाती है।
राम ने अनुरोध किया, कृपया मुझे मूल राक्षसों का इतिहास बताएँ। वे रावण की तुलना में कितने शक्तिशाली थे? उन्हें भगवान् विष्णु ने लंका से क्यों भगाया, जिसकी वजह से उन्हें पाताल में रहने जाना पड़ा ?
अगस्त्य ऋषि ने अपनी कहानी आगे बढ़ाई सृष्टि के आरंभ में प्राणियों की एक श्रेणी राक्षस कहलाती थी और उनके दो मुखिया, हेति व प्रहेति स्वभावतः धर्मः की ओर झुकाव रखते थे। हेति ने भय के साथ विवाह किया, जो बहुत गुस्सैल स्त्री थी और उन दोनों के पुत्र का नाम विद्युतकेश रखा गया। युवा होने पर विद्युतकेश ने शलकटंकट से विवाह किया, परंतु माता ने अपने पुत्र को इसलिए त्याग दिया क्योंकि वह केवल अपने पति के साथ मैथुन करना चाहती थी और गर्भवती नहीं होना चाहती थी।
भगवान शिव और पार्वती ने सुकेश नामक इस बालक की रक्षा की उनसे वरदान पाकर सुकेश बेहद घमण्डी हो गया। बाद में, उसने देवस्वाती में विवाह किया और उसके तीन पुत्र हुए, जिनके नाम माल्यवान, सुमालि और मालि पड़े। जब उन्हें पता चला कि उनके पिता वरदान प्राप्त करके इतने अधिक शक्तिशाली बने हैं, तो वे भी वरदान पाने के लिए तपस्या करने निकल पड़े।
उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर जब ब्रह्माजी उनकी मनोकामनाएँ पूरी करने आये, तो सुकेश के पुत्रों ने कहा, हे प्रभु हमें दीर्घायु बनाएँ और हमें इतना अधिक शक्तिशाली बना दें कि हमारे सभी शत्रुओं का हृदय हमारे नाम सुनने मात्र से ही काँप उठे। हमें अंतर्ध्यान होने की शक्ति प्रदान करें और आशीर्वाद दें कि हम तीनों भाइयों में सदैव आपसी प्रेम बना रहे।
ब्रह्माजी ने उनकी सभी इच्छाएँ पूरी कर दी। तदुपरांत, माल्यवान, सुमालि और मालि ने देवताओं और असुरों, दोनों ही को प्रताड़ित करना आरंभ कर दिया। अपने मुखियाओं के पराक्रम से उत्साहित होकर, राक्षस सीधे विश्वकर्मा के पास पहुँचे और उनसे अपने लिए एक निवास स्थान देने का अनुरोध किया। विश्वकर्मा ने राक्षसों को बताया कि उन्होंने महाराज इंद्र के आदेश पर सोने की दीवारों से घिरी लंका नगरी बनाई थी। विश्वकर्मा के कहने पर राक्षस वहाँ रहने चले गये।
बाद में, मालि की पत्नी ने चार पुत्रों को जन्म दिया जो विभीषण के मंत्री बने। माल्यवान की पत्नी ने विरुपाक्ष सहित अनेक संतानों को जन्म दिया। सुमालि की पत्नी ने सुपार्थ, प्रहस्त और अन्य संतानों को जन्म दिया। इन सभी संतानों को अपने पिताओं की तरह स्वयं पर बहुत घमण्ड हो गया। अंत में, बहुत अधिक प्रताड़ित किए जाने पर देवताओं ने भगवान् विष्णु की शरण ली। देवताओं की विनती सुनकर, भगवान् विष्णु ने उन्हें आश्वासन दिया कि वह पहले ही सुकेश के पुत्रों का संहार करने का निर्णय कर चुके हैं, क्योंकि सुकेश के पुत्र घमण्ड के मद में चूर होकर शिष्टता की सीमाएँ लाँघ चुके हैं।
इसके बाद, भगवान् विष्णु और सुकेश के पुत्रों के बीच भीषण युद्ध हुआ। इस युद्ध में भगवान् विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से मालि का सिर धड़ से अलग कर दिया। इसके बाद, राक्षस गण लंका नगरी से भागकर पाताल लोक में रहने चले गये।
अगस्त्य ऋषि ने कहा, आपने रावण सहित जिन अन्य राक्षसों का वध किया है, उनकी तुलना में माल्यवान, सुमालि व मालि कहीं अधिक शक्तिशाली थे। इसके बावजूद, पुलस्त्य के वंशज होने के कारण आपके हाथों अंतिम गति को प्राप्त हुए ये राक्षस भी बहुत अधिक शक्तिशाली थे। प्रिय राम, अंत में यही कहा जा सकता है कि आप ही भगवान् नारायण है क्योंकि आपके अतिरिक्त अन्य कोई भी इन राक्षसों का संहार नहीं कर सकता था।
वैश्रावण ने लंका में रहना आरंभ कर दिया। एक दिन सुमालि अपनी पुत्री के लिए उपयुक्त वर की तलाश में पृथ्वी पर घूम रहा था, कि तभी उसे पुष्पक विमान में बैठकर जाता वैश्रावण दिखायी दिया। सुमालि उस दिव्य विमान को देखकर अत्यधिक प्रभावित हुआ और पाताल लोक लौटकर उसने अपनी पुत्री कैकाशी का विवाह विश्रवा से करने का निर्णय किया। सुमालि के कहने पर कैकाशी विश्रवा के पास पहुँची, परंतु उस समय वह धार्मिक अनुष्ठान करने में व्यस्त थे।
कैकाशी उनके सामने सकुचाकर सिर झुकाए खड़ी हो गई और अपने पैरों को अंगुलियों से जमीन खुरचने लगी। यह देखकर विश्रवा ने पूछा, हे प्रिय युवती, तुम कौन हो ? यहाँ आने का तुम्हारा क्या उद्देश्यहै ?
कैकाशी बोली, मैं सुमालि की पुत्री कैकाशी हूँ मेरा आपसे अनुरोध है कि इसके अतिरिक्त आप जो भी जानना चाहें, उसके लिए अपनी आध्यात्मिक शक्ति का प्रयोग करें।
विश्रवा ध्यान में लीन हो गये। कैकाशी के मन की बात जानकर वह बोले "मैं जान गया हूँ कि तुम मेरे पुत्रों को जन्म देना चाहती हो। मैं तुम्हारी इच्छा पूरी करूँगा, परंतु तुम मेरे पास एक अशुभ घड़ी में आई हो, इसलिए तुम्हारे पुत्र भयानक राक्षस बनेंगे।
यह सुनकर कैकाशी ने विनती की, मुझे आपसे ऐसे पुत्र नहीं चाहिए। इसलिए कृपा करके मुझ पर दया करें।
विश्रवा ने स्वीकृति देते हुए कहा, तुम्हारी प्रसन्नता के लिए, मैं केवल इतना कह सकता हूँ कि तुम्हारा सबसे छोटा पुत्र अत्यंत धर्मपरायण व्यक्ति के रूप में प्रसिद्ध होगा।
उसके बाद, निश्चित समय पर कैकाशी ने एक अत्यंत डरावने पुत्र को जन्म दिया जिसके दस सिर और बीस भुजाएँ थीं और उसका मुख विशाल था और लंबे लंबे दाँत थे। दस सिर वाला होने के कारण इस पुत्र का नाम दशग्रीव पड़ा।
फिर कुछ समय उपरांत, कुंभकर्ण का जन्म हुआ। इस पुत्र का शरीर पृथ्वी पर सबसे विशाल था। इसके बाद शूर्पनखा नामक एक कुरूप पुत्री का जन्म हुआ और अंत में विभीषण पैदा हुआ।
एक दिन कुबेर (वैश्रावण) अपने पिता विश्रवा से मिलने आये। कुबेर को देखकर कैकाशी ने अपने पुत्र दशग्रीव से आग्रहपूर्वक कहा कि वह भी अपने सौतेले भाई जितना शक्तिशाली और ऐश्वर्यपूर्ण बने। यह सुनकर दशग्रीव कुबेर के प्रति बहुत ईर्ष्यालु हो उठा और उसने हर प्रकार से कुबेर से श्रेष्ठतर बनने का निर्णय किया।
यही सोचकर, दशग्रीव, अपने छोटे भाइयों के साथ गोकर्ण गया। वहाँ पर उसने अभूतपूर्व रूप से कठिन तपस्या की, जिसके परिणामस्वरूप ब्रह्माजी उससे बहुत प्रसन्न हुए। दशग्रीव ने 10,000 वर्ष तक पानी की एक बूँद भी पिए बिना निरंतर तप किया और प्रत्येक 1000 वर्ष के अंत पर वह अपना एक सिर काटकर पवित्र अग्नि को अर्पित कर देता। जब वह अपने अंतिम सिर की बलि देने वाला था, कभी ब्रह्माजी उसे मनचाहा वरदान देने के लिए उसके सामने प्रकट हो गये।
ब्रह्माजी द्वारा वरदान माँगने का आग्रह किए जाने पर, दशग्रीव ने हर्षातिरेक से रुँथे गये गले से बहुत प्रयास करके कहा, हे प्रभु, मुझे केवल मृत्यु का भय सताता है इसलिए, कृपया मुझे अमर हो जाने का वरदान प्रदान करें।
यह सुनकर भगवान् ब्रह्माजी बोले, इस भौतिक जगत् में पूर्ण अमरता प्राप्त करना किसी भी व्यक्ति के लिए संभव नहीं है। यहाँ तक मुझे भी एक दिन मरना होगा, इसलिए मैं तुमसे कोई और वरदान माँगने का अनुरोध करता हूँ।
दशग्रीव (रावण) ने विनती की, "हे प्रभु, मुझे वरदान दें कि नागों, दैत्यों, दानवों, राक्षसों और देवताओं के हाथों मेरी मृत्यु न हो। मुझे मनुष्य व पशुओं जैसे अन्य जीवधारियों के हाथों मृत्यु से रक्षा की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि मैं इन्हें पथ पर पड़े तिनके से अधिक महत्व नहीं देता।
ब्रह्माजी ने इन सभी इच्छाओं को स्वीकार कर लिया और दशग्रीव के दसों सिर भी वापस प्रदान कर दिए। इसके बाद उन्होंने विभीषण से कहा, तुम भी अपना मनोवांछित वरदान मांग सकते हो।
विभीषण बोले, प्रिय प्रभु, मेरे प्रति आपके प्रसन्न होने मात्र से ही मेरा जीवन धन्य हो गया है। मेरी एकमात्र कामना यही है कि भीषण कठिन स्थितियों में भी मेरा मन सदैव धर्म के मार्ग पर दृढ़ रहे।
ब्रह्माजी बोले, राक्षस के रूप में जन्म लेने के बावजूद, तुम अत्यंत धर्मपरायण हो, इसलिए मैं तुम्हें प्रमुख देवताओं के समान दीर्घायु होने का वरदान देता हूँ।
इसके बाद, ब्रह्माजी कुंभकर्ण को वरदान देने ही वाले थे, कि तभी उनके साथ आये देवताओं ने उनसे हाथ जोड़कर विनती की, यह बहुत दुष्ट स्वभाव का है और पहले ही असंख्य अप्सराओं, ऋषियों और अन्य जीवों को निगल चुका है। इसका एकमात्र कर्म समूचे विश्व को आतंकित व प्रताड़ित करना है। यह बिना किसी वरदान के ही इतना उत्पात मचा चुका है, तो आपकी कृपा दृष्टि मिलने पर तो यह तीनों लोकों को तहस-नहस कर डालेगा। हे प्रभु, हम आपसे अनुरोध करते हैं कि कुंभकर्ण को वरदान देने से पहले उसे भ्रमित कर दें।
देवताओं के अनुरोध पर सावधानीपूर्वक विचार करने के उपरांत, ब्रह्माओं ने अपनी मानसिक शक्ति से अपनी पत्नी, देवी सरस्वती को बुलाया और वह तत्क्षण वहाँ प्रकट होकर ब्रह्माजी के बगल में खड़ी हो गईं।
देवी सरस्वती ने पूछ, हे प्रभु, मैं आपको क्या सेवा कर सकती हूँ? इस पर ब्रह्माजी ने अनुरोध किया, मैं चाहता हूँ कि आप कुंभकर्ण के मुख की वाणी बन जायें।
इस तरह, जब ब्रह्माजी ने कुंभकर्ण से पूछा कि वह क्या वरदान चाहता है, तो उस विशालकाय राक्षस ने उत्तर दिया, यदि आप मेरी इच्छा पूरी करना चाहते हैं, तो मुझे अनेक, अनेक वर्ष तक सोते रहने का आशीर्वाद दें।
ब्रह्माजी ने स्वीकृति देते हुए कहा, "तथास्तु"
कुंभकर्ण को ठीक उस समय होश आया जब ब्रह्माजी जाने वाले थे और उसने आश्चर्य से पूछा, "ये अनर्थकारी शब्द मेरे मुँह से कैसे निकले ? अवश्य ही देवताओं ने मुझे बेसुध कर दिया होगा!
सुमालि को जब ज्ञात हुआ कि उसके तीन पौत्रों को ब्रह्माजी से वरदान मिलें हैं, तो उसके मन से भगवान् विष्णु का भय मिट गया और वह दशग्रीव से मिलने पहुँच गया।
सुमालि ने दशग्रीव को बताया कि लंका मूलतः राक्षसों की थी और कैसे उन्हें वहाँ से हटा दिया गया। फिर उसने दशग्रीव से कहा कि वह कुबेर से लंका वापस ले ले।
पहले तो दशग्रीव ने यह कहते हुए ऐसा करने से इंकार कर दिया कि, प्रिय नानाजी, आपको इस तरह की बात नहीं करनी चाहिए, क्योंकि कुबेर मेरा बड़ा भाई है।
सुमालि चुप हो गया, लेकिन बाद में प्रहस्त ने दशग्रीव से भेंट करके कहा, आपको पता होना चाहिए कि महान नायक रक्त संबंधों को स्वहित के आड़े नहीं आने देते। जरा कश्यप की पत्नियों, दिति और अदिति की शत्रुता पर विचार करें। राक्षसों में सर्वोपरि हे दशग्रीव, सम्प्रभुता के लिए अपने भाई से युद्ध करने वाले आप पहले व्यक्ति नहीं हैं।
वास्तव में, लंका पर विजय के विचार मात्र से ही दशग्रीव बेहद प्रसन्न था। पहले उसने त्रिकूट पर्वत जाकर प्रहस्त को अपने दूत के रूप में कुबेर के पास भेजा और विनम्रतापूर्वक उससे कहा कि वह लंका नगरी राक्षसों को लौटा दे।
वैश्रावण ने कहा, यह स्थान मुझे मेरे पिता ने दिया है, इसलिए मैं इसे छोड़कर नहीं जाना चाहता, परंतु यदि दशग्रीव चाहे, तो वह यहाँ आकर हमारे साथ ही लंका में रह सकता है ताकि हम लोग बिना शत्रुता के एक साथ रह सकें।
प्रहस्त के जाने के बाद, वैश्रावण अपने पिता के पास गया और उन्हें दशग्रीव की मंशा के बारे में बताया।
विश्रवा ने कहा, “दशग्रीव लंका नगरी को वापस माँगने के लिए पहले ही मेरे पास आ चुका है, लेकिन मैंने उसके लालच के लिए उसकी कठोर निंदा की। ब्रह्माजी के वरदानों के कारण दशग्रीव को इतना घमंड हो गया है कि वह यह अंतर तक नहीं कर सकता कि उसे किसका सम्मान करना चाहिए और किसका नहीं। और अब, मेरी अप्रसन्नता के कारण वह और अधिक दुष्ट हो गया है। मेरा सुझाव है कि तुम लंका नगरी छोड़ दो और कैलाश पर रहने चले जाओ, ताकि तुम्हारे और रावण के बीच शत्रुता न बढ़े।
कुबेर ने लंका खाली कर दी, प्रहस्त से इसकी सूचना मिलने पर दशग्रीव अन्य राक्षसों के साथ वहाँ गया। वहाँ जंगल में घूमते हुए दशग्रीव की मुलाकात माया दानव से हुई, जिसने अपनी बेटी मंदोदरी की शादी रावण से करा दी। उसी समय माया दानव ने दशग्रीव को वह भाला दिया जिससे लक्ष्मण बुरी तरह घायल हो गये थे। कुछ समय बाद मंदोदरी ने मेघनाद को जन्म दिया जिसे बाद में इंद्रजित के नाम से जाना गया।
दशग्रीव ने देवताओं और ऋषियों को प्रताड़ित करना जारी रखा। पारिवारिक स्नेह के कारण कुबेर ने अपने सौतेले भाई के पास एक दूत भेजकर चेतावनी दी कि वह अपने तौर-तरीके सुधार ले अन्यथा परिणाम सुखद नहीं होगा। इससे दशग्रीव नाराज हो गया और कुछ ही समय बाद उसने कुबेर पर आक्रमण कर दिया, भयंकर युद्ध के बाद दशग्रीव ने अपने भाई को बुरी तरह घायल कर दिया और उसका पुष्पक विमान छीन लिया।
कार्तिकेय के जन्म-स्थान की ओर जाते समय हिमालय में सुनहरे नकर्टों के एक झाड़ पर पहुंचकर, दशग्रीव यह देखकर आश्चर्यचकित रह गया कि पुष्पक विमान ने पर्वत पर ऊपर चढ़ना बंद कर दिया है और यह थम गया है। तभी उस स्थान पर नंदीश्वर दिखाई दिए। भगवान् शिव के यह अनन्य सेवक नाटे आकार के, भौड़े आकृति के, गंजे व भयानक रूप वाले थे। उन्होंने दशग्रीव को आदेश दिया, इसी समय वापस लौट जाओ क्योंकि भगवान् शंकर इस पर्वत पर मनोरंजन कर रहे हैं।
यह सुनकर, दशग्रीव बहुत क्रुद्ध हो उठा। अपने रथ से नीचे उतरकर उसने पूछा, यह शंकर कौन है ? तभी ऊपर देखने पर दशग्रीव को वानर समान मुख वाले नंदी दिखाई दिए जो अपने हाथ में ज्वालामय भाला लेकर भगवान् शिव के पास खड़े थे। भगवान् शिव के वानर समान मुख वाले बैल रूपी वाहन, नंदी को देखकर, रावण उनका तिरस्कार करते हुए अट्टहासपूर्ण हँसी हँस पड़ा।
इसके उत्तर में, नंदी ने दशग्रीव को शाप देकर कहा, भविष्य में शक्तिशाली वानर - गण तुम्हारे संपूर्ण कुल का विनाश कर देंगे। निःसंदेह, यदि मैं चाहूँ तो इसी समय तुम्हारा वध कर सकता हूँ, परंतु मैं तुम्हें छोड़ रहा हूँ ताकि तुम्हारे पाप ही। तुम्हारा संहार करें।
दशग्रीव ने नंदी की बातों की परवाह नहीं की और बोला, तुमने अपमानजनक ढंग से मेरा विमान रोका है, इसलिए मैं तुम्हारे स्वामी, भगवान् शंकर का वध करके इसका बदला लूँगा!
यह कहकर, दशग्रीव ने कैलाश पर्वत के नीचे हाथ लगाकर उसे उठाने का प्रयास किया। उसकी शक्ति के कारण पर्वत हिलने लगा और पार्वती लड़खड़ा गई और उन्होंने सहारा लेने के लिए अपने स्वामी को कसकर पकड़ लिया। तब महादेव ने, हँसते हुए कैलाश पर्वत को अपने पैर के अंगूठे से दबाया जिसके परिणामस्वरूप दशग्रीव के हाथ कुचल गये।
अत्यधिक पीड़ा के कारण दशग्रीव चीख उठा और उसका आर्तनाद सुनकर तीनों लोक कांप उठे। यहाँ तक कि पथ पर चलते-चलते राजा इंद्र तक लड़खड़ा गये। अपने स्वामी की यह दुर्दशा देखकर, दशग्रीव के मंत्रियों ने उसे भगवान् शिव को शरण में जाने का सुझाव दिया क्योंकि उन्हें आशुतोष के नाम से भी जाना जाता है जिसका अर्थ है कि वह आसानी से दयार्द्र हो उठते हैं। और कोई रास्ता न देखकर, दशग्रीव ने अपना सिर झुका दिया और वह सामवेद के मंत्रों का पाठ करता हुआ भगवान् शिव का महिमामंडन करने लगा।
इस प्रकार उसे शिव की आराधना करते हुए एक हजार वर्ष बीत गये और तब शिव ने प्रसन्न होकर अपने अंगूठे का भार पर्वत से हटा लिया ताकि दशग्रीव अपनी बाँहें उसके नीचे से निकाल सके। अपनी भुजाओं के कुचलने पर दशग्रीव ने जो भयानक चीत्कार किया था, उसके कारण भगवान् शिव ने उसे रावण नाम दिया। दूसरे शब्दों में कहें, तो दशग्रीव की भयानक चीत्कार के कारण ही उसे रावण के नाम से जाना गया और उसकी इस गर्जनकारी चीत्कार ने देवताओं तक के कलेजे भय से दहला दिए थे।
इसके बाद, रावण का एकमात्र कार्य पराक्रमी क्षत्रियों को चुनौती देना रह गया था। समझदार राजाओं ने रावण के आगे समर्पण कर दिया और बाकी राजाओं को उसने आसानी से हरा दिया। एक दिन, जब रावण हिमालय के निकट एक जंगल, से गुजर रहा था तब उसे एक सुन्दर युवती दिखी। जिसके बाल उलझे हुए थे और उसने हिरण की खाल के वस्त्र पहने हुए थे। उसकी ओर आकर्षित होकर रावण ठहाका लगाकर हँसा और बोला, जंगल में तपस्या करना तुम्हारी जैसी सुंदर युवती के लिए उचित नहीं है। प्रिय युवती, तुम कौन हो? तुम जंगल में रहकर कष्टदायी जीवन क्यों व्यतीत कर रही हो?
इस पर वह युवती बोली, मैं ब्रह्मऋषि कुशद्वाज को पुत्री हूँ और मेरा नाम वेदवती है। अनेक योग्य पुरुषों और देवताओं तक ने विवाह के लिए मेरे पिता से मेरा हाथ माँगा, परंतु मेरे पिता ने उन सभी को मना कर दिया। उन्हें लगता था कि केवल भगवान् विष्णु ही उनके उपयुक्त दामाद हो सकते हैं। यह सुनकर दैत्यों का राजा शंभू आया और मेरे पिता की उस समय हत्या कर दी जब वह सो रहे थे। मेरी माँ ने मेरे पिता को चिताग्नि में जलकर अपने प्राण त्याग दिए।
तभी से मैंने भगवान् नारायण को अपने दिल में बसाया हुआ है और उन्हें अपने पति के रूप में पाने की आशा से कठोर तप कर रही हूँ। हे रावण अपनी योग शक्तियों से मैं तुम्हारे बारे में सबकुछ जानती हूँ। अब कोई झमेला किए बिना तुम यहाँ से चले जाओ।
अपने रथ से उतरते हुए रावण ने कहा, प्रिय युवती, मैं तुमसे अपनी अर्द्धांगिनी बनने का अनुरोध करता हूँ। भला मेरी तुलना में भगवान् विष्णु की बिसात ही क्या है ?
वेदवती क्रोधित होकर बोली, तुम्हारे सिवाय भला और कौन है जो भगवान् नारायण के बारे में इस तरह को अपमानजनक बातें करे?
वेदवती अभी अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाई थी कि तभी रावण ने अचानक उसे बालों से पकड़ लिया। गुस्से से भन्नाई हुई वेदवती ने तुरंत अपनी एक बाँह को तलवार में बदल दिया और अपने बाल काटकर उसने स्वयं को रावण के चंगुल से मुक्त कर लिया।
इसके बाद, वेदवती ने अग्नि प्रज्वलित करके कहा, तुम्हारे द्वारा मेरा स्पर्श कर लिए जाने के कारण, मेरो अब जीने की कामना नहीं रही है। परंतु मैं तुम्हें शाप नहीं दूंगी, क्योंकि ऐसा करने से मेरे द्वारा अब तक अर्जित पुण्य में कमी आ जायेगी। इसके बजाय मैं दैवीय रूप में दूसरा जन्म लूँगी, ताकि मैं तुम्हारे सर्वनाश का कारण बन सकूँ।
वेदवती ने जैसे ही अग्नि में प्रवेश किया, वैसे ही स्वर्ग से उस पर पुष्प वर्षा हुई। अपने शरीर को त्याग करने के बाद, वेदवती कमल के एक फूल में से प्रकट हुई। रावण फुर्ती से आगे बढ़ा और उसे पकड़कर जबर्दस्ती पुष्पक विमान में बिठा लिया और लंका लौट गया। रावण ने अपने मंत्रियों को वह कन्या दिखाई, तो उन्होंने रावण को उसे अपने पास न रखने की चेतावनी दी क्योंकि वह कन्या उसके विनाश का कारण बनने वाली थी। मंत्रियों की इस सलाह को मानकर, रावण ने वेदवतों को समुद्र में फेंक दिया।
समुद्र के किनारे पर पहुँचने के बाद अपनी योग शक्तियों के द्वारा वेदवती महाराजा जनक की यज्ञ भूमि पर पहुँच गई। उसके बाद, जिस समय राजा जनक यज्ञ भूमि को कुदाल से समतल कर रहे थे तब हल की लकीर से वह एक नवजात कन्या के रूप में प्रकट हुई। इस तरह सतयुग में वेदवती के रूप में जन्मी वह कन्या त्रेता युग में जानकी बन गई।
एक बार, रावण इधर-उधर घूमते विचरते हुए अयोध्या पहुँच गया और उसने राजा अनरण्य को युद्ध की चुनौती दी। भीषण संग्राम के बाद रावण ने अपने प्रतिद्वंद्वी को घातक रूप से घायल कर दिया। रणभूमि में मरणासन्न पड़े राजा अनरण्य ने रावण को शाप दिया कि भविष्य में, मेरा एक वंशज राम, तुम्हारा वध करेगा! अनरण्य द्वारा यह शाप देते ही, स्वर्ग से पुष्पवर्षा हुई और देवताओं ने ढोल-नगाड़े बजाकर तुमुल ध्वनि की।
इसके बाद, रावण यमराज से लड़ने गया। ब्रह्माजी ने आकर यमराज को अपने काल- दण्ड का प्रयोग करने से नहीं रोका होता, तो वह निश्चित तौर पर युद्ध में हार गया होता। रावण ने वरुण के पुत्रों को भी पराजित किया और लंका नगरी को वापस लौटते समय, अनेक राजाओं, ऋषियों, देवताओं और असुरों की कुँवारी पुत्रियों का अपहरण कर लिया। रावण को जब भी कोई कन्या आकर्षक लगती, तो वह सबसे पहले उसके सभी संबंधियों को मार डालता और फिर उसे अपने विमान पर बिठा लेता। इस तरह रावण का विमान भय और दुख से करुण विलाप करती सैकड़ों कन्याओं से भर गया।
अपनी दुर्दशा से अत्यंत शोकाकुल होकर, इन अपहृत युवतियों ने रावण को शाप दिया, एक दिन इस दुष्ट राक्षस का अंत स्त्री के कारण ही हो!
युवतियों के ऐसा कहते ही स्वर्ग से पुष्पवर्षा हुई। इन सच्चरित्र व धर्मपरायण स्त्रियों द्वारा शाप दिए जाने के तुरंत बाद ही रावण की दैहिक आभा व भव्यता का ह्रास होना आरंभ हो गया। अपने एक विजयाभियान के दौरान, रावण ने भूलवश अपनी बहन शूर्पणखा के पति को मार डाला। उसके लंका लौटने पर, शूर्पणखा उसके पास आई। उसने रावण के पाव पकड़कर शोकाकुल स्वर में कहा, तुम स्वयं अपनी बहन के प्रति कितने क्रूर और हृदयहीन हो गये हो। मेरे पति को मारकर तुमने मुझे विधवा बना दिया है।
सूर्पणखा को शांत करने के लिए रावण बोला, "दुखी मत हो, बहन, मैं तुम्हारी सारी कामनाएँ पूर्ण करूंगा। कृपा करके मुझे क्षमा कर दो युद्ध की प्रचंडता में, मैं दोस्त और दुश्मन के बीच अंतर नहीं कर पाया और गलती से तुम्हारे पति को मार डाला।
रावण ने शूर्पणखा को अपने चचेरे भाई खर के संरक्षण में दण्डक वन में रहने भेज दिया। इसके बाद रावण ने देवताओं पर अपना विजय अभियान शुरू किया। वह सूरज के डूबते समय कैलाश पर्वत पहुँचा, इसलिए उसने वहीं शिविर लगा दिया। पर्वत के शिखर पर आराम करते हुए, रावण ने उन वनों और झीलों का सर्वेक्षण किया जो देवताओं के विलास के काम आते थे। उसे कुबेर के महल से। आती अप्सराओं के गाने की आवाजें सुनाई दे रही थीं और सुगंधित हवाओं के मंद-मंद झोके वातावरण को सुखद अनुभूति प्रदान कर रहे थे।
उसी समय रंभा नामक अप्सरा वहाँ से गुजरी। रावण ने आकर्षक पोशाक और चमचमाते हुए जवाहरात से सजी उसकी सुंदर देहयष्टि देखी, तो वह उसे भोगने के लिए इतना उतावला हो गया कि तुरंत अपने आसन से कूदकर उसके हाथ पकड़ लिए।
कामदेव के प्रेम बाणों से घायल रावण ने उससे कहा, हे कोमल सौंदर्य की स्वामिनी, तुम्हारे सुंदर मुस्कुराते चेहरे, तुम्हारे पुष्ट व सुघड़ वक्षों, सुडौल नितंबों और जांघों ने मेरा मन हर लिया है। तुम्हें देखने के बाद, मैं तुम्हें जाने नहीं दे सकता। भला मुझसे श्रेष्ठ कौन है जिससे तुम मिलने जा रही हो? मुझे अपने पति के रूप में स्वीकार करके मेरे साथ रहो, क्योंकि किसी अन्य पुरुष के द्वारा रसपान करने पर तुम्हारा अतुलनीय सौंदयं व्यर्थ होगा।
रंभा क्रोध से आग-बबूला होकर बोली, तुम्हें इस तरह मुझसे बात नहीं करनी चाहिए, क्योंकि तुम मेरे पिता समान हो और मैं तुम्हारी पुत्रवधू के समान हूँ।
यह सुनकर रावण ने कहा, केवल पुत्र की पत्नी को ही पुत्रवधू माना जा सकता है।
रंभा ने कहा, हाँ, यह सही है, परंतु तुम्हें पता होना चाहिए कि मैं तुम्हारे भाई के पुत्र, नलकूवर को विधिसम्मत पत्नी हूँ और अभी मैं उन्हीं से मिलने जा रही हूँ।
इसलिए, हे राक्षस राज, धर्म के मार्ग पर चलो और मुझे जाने दो।
इस नेक सलाह में अरुचि प्रकट करते हुए रावण ने उत्तर दिया, तुम्हारा तर्क केवल उन्हीं स्त्रियों पर लागू होता है जिनका एक ही पति हो। अप्सराओं का कोई भी वास्तविक पति नहीं होता, इसलिए तुम्हें पाने के लिए मुझे धर्म-अधर्म संबंधी नैतिकता का विचार करने की आवश्यकता नहीं है।
यह कहकर, रावण ने बलपूर्वक रंभा को एक समतल चट्टान पर खींच लिया और उसके साथ बलात्कार किया। आखिरकार रावण द्वारा छोड़ दिए जाने पर, बिखरे बालों और अस्त-व्यस्त वस्त्रों में भागते हुए रंभा अपने पति नलकूबर के पास पहुँची और उसे पूरी घटना कह सुनाई। रावण के दुराचार के बारे में सुनकर नलकूवर क्रोधोन्मत्त हो उठा, लेकिन रंभा के कहे की पुष्टि करने के लिए वह ध्यान में लीन हो गया। सच जानने के बाद नलकूवर ने हाथ में पानी लेकर रावण को शाप दिया, यदि रावण ने आगे कभी भी किसी स्त्री के साथ उसकी इच्छा के विरुद्ध संभोग करने की कोशिश भी की तो उसका सिर सात हिस्सों में फटकर बिखर जायेगा!
यह घोषणा सुनकर देवता गण अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने कुबेर के पुत्र पर पुष्पवर्षा की। रावण को इस शाप का पता चला, तो उसने किसी भी स्त्री से उसकी इच्छा के विरुद्ध संभोग करने की इच्छा पूर्णतः त्याग दी।
अगली सुबह रावण ने अपनी सेना को लामबंद करके, इंद्र-लोक पर आक्रमण कर दिया। इंद्र ने देवताओं को उसके साथ युद्ध करने भेजा और वह स्वयं भगवान् विष्णु के पास पहुँच गये और उनसे बोले, रावण को ब्रह्माजी से मिले वरदानों के कारण, मैं उससे लड़ने में असहाय महसूस कर रहा हूँ। हे प्रभु, कृपया मुझे रावण को मारने की पर्याप्त शक्ति प्रदान करें, या फिर आप स्वयं ही उसका संहार करें।
भगवान् विष्णु ने उत्तर दिया, आपको डरने की आवश्यकता नहीं है। आपके लिए रावण को मारना संभव नहीं है, फिर भी उसके साथ युद्ध करें। मैं इस समय उसका अंत नहीं करना चाहता, बल्कि सही समय आने पर ही मैं उसका संहार करूँगा और तब मैं केवल रावण को ही नहीं बल्कि उसके सभी संबंधियों को भी मार डालूंगा।
इसके बाद हुए युद्ध में, मेघनाद और इंद्र के पुत्र जयंत के बीच लड़ाई छिड़ी। वह दोनों एकसमान पराक्रमी जान पड़ रहे थे, परंतु तभी मेघनाद ने राक्षसी मायाजाल का प्रयोग किया और जयंत की तबियत बिगड़ गई। अंधेरे में, युद्ध और अधिक भयंकर एवं उलझन भरा हो गया और तब इंद्र की पत्नी शची के पिता पुलोम वहाँ प्रकट हुए और जयंत के बाल पकड़कर उसे बलपूर्वक युद्ध स्थल से ले गये।
यह देखकर देवता घबरा गये और तब इंद्र भी युद्ध में शामिल हो गये। दूसरी और से, स्वयं रावण स्वर्ग के राजा इंद्र से भिड़ने के लिए रणभूमि में उतर पड़ा। इसी समय, मेघनाद अदृश्य होकर देवताओं के बीच घुस आया और इंद्र के ठीक सामने आ गया। मेघनाद ने अपने बाणों को बौछार करके अपने शत्रु को पस्त कर दिया। इसके बाद, उसने ब्रह्माजी के वरदान से मिली मायावी शक्तियों का उपयोग करके इंद्र को बाँध दिया। इससे देवता निराश हो गये और रावण ने अपने पुत्र को आदेश दिया कि वह बंदी बनाए गये इंद्र को लंका ले चले।
उसके बाद ब्रह्माजी देवताओं को साथ लेकर लंका गये, जबकि बाकी के देवता आकाश लोक में ही रहे। ब्रह्माजी ने रावण से कहा, तुम्हारे पुत्र ने श्रेष्ठ पराक्रम और वीरता का प्रदर्शन किया है, इसलिए आज से उसे इंद्रजित के नाम से जाना जायेगा। अब मैं तुमसे अनुरोध करता हूँ कि तुम स्वर्ग के राजा इंद्र को मुक्त कर दो और इसके बदले में तुम्हारे पुत्र को अतुलनीय वरदान दूँगा।
यह सुनकर इंद्रजित बोला, मैं अमरता का वरदान मिलने पर ही इंद्र को मुक्त करूंगा।
ब्रह्माजी ने उत्तर दिया, किसी भी सृजित प्राणी के लिए बिना शर्त अमरता प्राप्त करना संभव नहीं है। इसलिए प्रिय राजकुमार तुम मुझसे कुछ और माँगी।
तब इंद्रजित बोला, मेरा अनुरोध है कि युद्ध के समय यदि मैं यज्ञ-अग्नि में आहुति दूं, तो उसकी लपटों से एक रथ निकले और मैं जब तक उस रथ पर बैठा रहूँ, तब तक मेरी मृत्यु न हो। दूसरे शब्दों में, मेरा बंध केवल तभी हो जब मैं मंत्रोच्चार किए बिना और यज्ञ में आहुति दिए बिना युद्ध करूं। कुछ लोग तपस्या करके अमरता का वरदान मांगते हैं, परंतु मैंने अपने पराक्रम का प्रदर्शन करने मात्र से ही यह प्राप्त किया है!
ब्रह्माजी ने इंद्रजित के अनुरोध को स्वीकार किया और बदले में उसने इंद्र देव को छोड़ दिया।
राम ने पूछा, "हे ऋषिश्रेष्ठ, क्या किसी समय कोई ऐसा क्षत्रिय भी हुआ था जो रावण को पराजित कर पाया हो ?
इसके उत्तर में, अगस्त्य ऋषि ने बताया कि किस तरह हैहय नरेश कार्तवीर्या अर्जुन ने भीषण द्वंद्वयुद्ध के उपरांत रावण को पकड़कर बाँध दिया था। जब पुलस्त्य मुनि ने माहिष्मती जाकर अपने पोते को मुक्त कर देने के लिए कहा, तो कार्तवीर्या अर्जुन तुरंत मान गया।
कुछ समय बाद, रावण किष्किंधा गया और उसने वालि से युद्ध करने की इच्छा प्रकट की। परंतु जब उसे यह पता चला कि वालि दक्षिणी समुद्र तट पर गया हुआ है, तो रावण भी वहाँ चला गया। राक्षस-राज ने वालि को प्रार्थना में तल्लीन होकर, मौन साधना करते पाया। उस वानर को पकड़ने की इच्छा से, रावण चुपचाप पंजों के बल चलते हुए वालि की ओर पीछे से आगे बढ़ा, परंतु वालि अपनी आँखा के कोनों से रावण को देख सकता था।
वालि ने बिना परेशान हुए सोचा, "जैसे ही यह राक्षस मेरे नजदीक आयेगा, तो मैं इसे पकड़कर अपनी काँख में दवा लूंगा। यह मेरी काँख में दबा हुआ उछल-कूद करता रहेगा और इस बीच मैं अन्य तीन समुद्रों पर जाकर अपनी आराधना पूर्ण कर लूँगा।
रावण हालांकि वालि के पीछे से आया था, लेकिन वालि को उसके पदचाप सुनाई दे रहे थे। राक्षस- राज वालि के पास पहुँचा ही था कि वह फुर्ती से पलटा और उसने रावण को पकड़ लिया। फिर रावण को कसकर अपनो काँख में दबाए हुए, बाली अपने अगले गंतव्य की ओर उड़ चला। अंततः, जब वालि किष्किंधा लौट आया, तो इतनी दूरी तक रावण को काँख में दबाए रहने के कारण उसे थकान महसूस हुई और उसने रावण को एक उद्यान में छोड़ दिया। राक्षस राज पर तिरस्कारपूर्वक हँसते हुए, वालि ने स्तब्ध रह गये रावण से उसकी पहचान बताने के लिए कहा।
रावण ने वास्तविक सराहना के भाव से वालि को अपना परिचय दिया और कहा, "तुम हवा में जिस आश्चर्यजनक गति से यात्रा करते हो, उसकी बराबरी केवल मन, वायु और गरुड़ ही कर सकते हैं। हे वानर राज, तुम सच में एक असाधारण पराक्रमी हो, इसलिए मेरी हार्दिक इच्छा है कि मैं तुम्हारे साथ मित्रता करूँ।
इसके बाद, उन दोनों ने पवित्र अग्नि जलाई और इस तरह जब दोनों में मित्रता हो गई तो वालि और रावण ने उत्साह से भरकर आलिंगन किया। उसके बाद रावण एक महीने तक किष्किंधा में वानर राज वालि का सम्मानित अतिथि बनकर रहा।
राम ने कहा, हे ऋषिवर, रावण और वालि निश्चित ही पराक्रमी और शूरवीर थे, परंतु मुझे लगता है कि हनुमान उन दोनों से अधिक शक्तिशाली हैं। लंका पर मेरे विजय अभियान में अकेले हनुमान की वजह से ही में विजय प्राप्त करके सीता को वापस ला सका। मैं हनुमान का इतना अधिक ऋणी हूँ कि इसे शब्दों में व्यक्त कर पाना भी मेरे लिए संभव नहीं है और वह मेरे सभी विशुद्ध सेवकों में सर्वश्रेष्ठ हैं।
हे ऋषिवर, मैं चाहता हूँ कि आप मेरी एक शंका का निवारण करें। जब वालि और सुग्रीव के बीच शत्रुता थी, तब हनुमान ने वालि को परास्त क्यों नहीं किया? मुझे लगता है कि हनुमान को अपनी वास्तविक शक्ति के बारे में पता ही नहीं होगा, अन्यथा, वह चुपचाप हाथ पर हाथ रखकर सुग्रीव को कष्ट उठाते हुए भला कैसे देख सकते थे? हे ऋषिश्रेष्ठ, आप सभी रहस्यों को जानते हैं। कृपया मुझे हनुमान की भव्य लीलाओं के बारे में बताएँ, ताकि मेरा संदेह दूर हो सके।
हनुमान भी अन्य लोगों के साथ इस वार्तालाप को सुन रहे थे और उन्हें राम की बातें सुनकर अत्यधिक आध्यात्मिक प्रसन्नता का अनुभव हुआ। अगस्त्य मुनि ने उत्तर दिया, यह सच है कि बल, गति या बुद्धि के मामले में हनुमान की बराबरी कोई नहीं कर सकता, परंतु वह अपनी वास्तविक शक्तियों को भूल गये थे और यह कैसे हुआ इसकी जानकारी हनुमान की जीवन-कथा से मिलेगी।
वायुदेव ने पहले मेरु पर्वत पर रहने वाले वानर राज केसरी की पत्नी अंजना के माध्यम से हनुमान को जन्म दिया। पुत्र के जन्म के बाद, अंजना फल एकत्रित करने चली गई, परंतु अपनी माँ को अपने पास न पाकर बालक हनुमान रोने लगे और ठीक उसी समय क्षितिज पर सूर्योदय हुआ। बाल हनुमान ने सूर्य रूपी चमकते हुए नारंगी गोले को देखा तो उन्हें लगा कि यह कोई फल है और उसे पकड़ने के लिए उन्होंने हवा में छलांग लगा दी।
देवताओं ने पवन पुत्र को हवा में तेजी से उड़ते देखा, तो वे आश्चर्यचकित रह गये और घोषणा करके बोले, मन या गरुड़ भी इतनी तेज गति से नहीं उड़ सकते! यदि यह नवजात वानर के रूप में ऐसी शक्ति का परिचय दे सकता है, तो बड़ा होने पर यह कितना अधिक शक्तिशाली बनेगा ?
वायु देव ने अपने पुत्र को सूर्य की जलाकर राख कर देने वाली तपिश से बचाने के लिए उसका पीछा किया। बाल हनुमान जब सूर्य के निकट पहुँचे, तो सूर्य देव ने उनके बचपने और भविष्य में राम के अभियान में हनुमान की सहायक भूमिका के बारे में सोचकर उन्हें नहीं जलाया। पवन पुत्र सूर्य के रथ पर उनके बगल में बैठ गये, लेकिन उसी समय राहु सूर्य देव पर हमला करने आ गया। शिशु बानर ने बाल्य उत्सुकतावश राहु को पकड़ लिया, परंतु वह उनकी पकड़ से निकल भागने में सफल हो गया।
तब राहु इंद्र देव के पास पहुँचा और उनसे शिकायत की, यद्यपि सूर्य और चंद्र को मेरी भूख मिटाने के लिए मेरे अधिकार में दिया गया है, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि मेरा हिस्सा किसी और ने ले लिया है। अभी-अभी मैं सूर्य देव के पास पहुँचा, तो देखा कि उन पर किसी दूसरे राहु ने आक्रमण कर दिया है।
यह सुनकर इंद्र हैरान रह गये, इसलिए तत्काल ऐरावत को बुलवाकर उन्होंने सूर्य की ओर कूच कर दिया। राहु आगे-आगे चल रहा था। पवन पुत्र ने राहु को आते देखा, तो उसे फल समझ लिया और सूर्य के रथ से कूदकर उसे पकड़ने के लिए बढ़े। राहु वहाँ से भागने लगा और अपनी ही और बढ़ रहे इंद्र देव से मदद की गुहार लगाने लगा और तब स्वर्ग के राजा इंद्र ने उसे सुरक्षा का आश्वासन दिया। शिशु हनुमान ने ऐरावत हाथी को देखा, तो उन्होंने सोचा कि यह हाथी कोई विशाल सफेद फल है और तुरंत उनकी और लपका। यह देखकर, इंद्र ने उन पर अपने वज्र से प्रहार किया, जिसके कारण हनुमान निष्प्राण होकर एक पर्वत पर गिर पड़े।
यह देखकर वायु देव अत्यधिक कुपित हो गये और अपने पुत्र के निष्प्राण शरीर को उठाकर एक पर्वत की गुफा में चले गये। वायु देव ने वायु प्रवाह बंद कर दिया जिसके कारण सभी जीवधारियों का दम घुटने लगा और उनकी आँतें तथा मूत्राशय बाधित हो गये। अपने फूले हुए पेट लिए, देवतागण तत्काल ब्रह्माजी के पास पहुँचे और बेचैनी के साथ उन्हें अपनी व्यथा कह सुनाई।
ब्रह्माजी बोले, आप लोगों की पीड़ा का कारण वायु देव का क्रोधित हो जाना है। वायु देव की महत्ता को समझने का प्रयास करें। हालाँकि उनका स्वयं कोई गोचर शरीर नहीं है, परंतु तब भी वह सभी सृजित प्राणियों में जीवन का संचार करते हैं। सच तो यह है कि हवा के बिना भौतिक शरीर एक लकड़ी के कुंदे से अधिक कुछ भी नहीं है। मेरा सुझाव है कि विश्व कल्याण के लिए हम सभी वायु देव के पास जाकर उन्हें शांत करें।
ब्रह्माजी के नेतृत्व में देवतागण उस पर्वतीय गुफा में पहुँचे जहाँ वायु देव ठहरे हुए थे। वह अपने पुत्र की मृत्यु पर संतप्त थे और अब भी उसका पार्थिव शरीर अपनी बाँहों में लिए हुए थे। वायु देव का अभिवादन ग्रहण करने के उपरांत, ब्रह्माजी ने प्रेमपूर्वक अपना हाथ शिशु हनुमान के सिर पर रखा और इसके परिणामस्वरूप वह फिर से जीवित हो गया। इसके बाद, वायु देव ने सभी प्राणियों के लिए वायु प्रवाह को पुनः स्थापित कर दिया।
ब्रह्माजी ने कहा, भविष्य में यह बालक आप लोगों के कल्याण के लिए कार्य करेगा, इसलिए आप सभी देवताओं को इसे वरदान देने चाहिए।
इंद्र ने कमल के फूलों की अपनी माला उतारकर शिशु हनुमान के गले में डाल दी। स्वर्ग के राजा इंद्र ने कहा, इसकी टूटी हुई ठुड्डी के कारण, आज के बाद यह बालक हनुमान के नाम से जाना जायेगा मैं इसे वरदान देता हूँ कि इसे अब मेरे वज्र से डरने की आवश्यकता नहीं है।
सूर्यदेव ने घोषणा की, मैं हनुमान को अपने तेज का एक प्रतिशत अंश देता है। इसके अतिरिक्त, मैं इसे वाक्पटुता के साथ ही शास्त्रों का संपूर्ण ज्ञान प्रदान करता है।
यमराज ने कहा, हनुमान पर मेरे काल- दण्ड का असर नहीं होगा और वह निरोग रहेगा।
कुबेर ने घोषणा की, हनुमान पर मेरी गदा का कोई असर नहीं होगा और वह युद्ध में कभी नहीं थकेगा।
भगवान् शिव ने कहा, मैं हनुमान को वरदान देता हूँ कि मेरे द्वारा, या मेरे किसी अस्त्र-शस्त्र से उसका वध नहीं होगा।
विश्वकर्मा ने घोषणा की, मैं हनुमान को वरदान देता हूँ कि मेरे द्वारा बनाए गये किसी भी हथियार से उसे नहीं मारा जा सकेगा।
अंत में, ब्रह्माजी बोले, मैं हनुमान को दीर्घायु, उदारशीलता, बह्मास्त्र से रक्षा का और ब्राह्मणों के शापों से सुरक्षित बचे रहने का वरदान देता हूँ।
इसके बाद ब्रह्माजी ने वायु को संबोधित करते हुए कहा, यह बालक अपनी इच्छानुसार अपना रूप बदलने में सक्षम होगा और यह अपराजेय होगा। यह किसी भी मनचाहे स्थान के लिए किसी भी मनचाही गति से यात्रा कर सकेगा। भविष्य में, यह ऐसे यशस्वी कार्य करेगा जिनसे रावण का संहार करने में सहायता मिलेगी। ऐसा करके, यह भगवान् राम का बेहद प्रिय पात्र बनेगा।
देवताओं के जाने के बाद, वायु देव ने हनुमान को उसकी माँ अंजना की देखभाल में छोड़ दिया। इतने वरदान प्राप्त करने के कारण हनुमान में अपार ऊर्जा का प्रवाह होने लगा, इसलिए वह निडर होकर कार्य करने लगे, यहाँ तक कि वह श्रेष्ठ ऋषियों के तप व यज्ञ में व्यवधान डालने लगे और उनकी पूजन सामग्रियों को नष्ट करके उन्हें कुपित करने लगे।
हनुमान की इन धृष्टताओं को ऋषिगण चुपचाप सहन करते रहे, क्योंकि वे जानते थे कि उनके शापों से उनकी मृत्यु नहीं होगी। हनुमान के पालक-पिता कसरी और उनके वास्तविक पिता वायु देव ने उन्हें अनुशासित करने का यथासंभव प्रयास किया, परंतु तब भी हनुमान मर्यादा की सीमाएँ लाँघते रहे।
अंततः, ऋषियों ने थोड़ा क्रोधित होकर उन्हें शाप दिया कि 'अब तुम्हें अपनी वास्तविक शक्तियों का स्मरण नहीं रहेगा। बाद में, उचित समय आने पर जब तुम्हें इन शक्तियों का स्मरण कराया जायेगा, तब तुम्हें दोबारा अपनी संपूर्ण शक्ति की याद आ जायेगी।
इसके बाद, अपनी शक्तियों को भूलकर हनुमान शांत भाव से जंगलों में घूमने लगे। इसी समय, अत्यंत वृद्ध हो जाने के कारण वानर राज ऋक्षराज की मृत्यु हो गई और अगला राजा उनके ज्येष्ठ पुत्र वालि को बनाया गया, जबकि सुग्रीव को वालि का उत्तराधिकारी बनाया गया।
बचपन से ही हनुमान और सुग्रीव के बीच प्रगाढ़ मित्रता थी जब वालि और सुग्रीव के बीच दुश्मनी हुई, तब हनुमान को अपनी वास्तविक शक्तियों का भान नहीं था, इसलिए उन्होंने अपने मित्र की सहायता करने का प्रयास नहीं किया। उनके भुलक्कड़पन का एक परिणाम यह भी था कि धीरे-धीरे वह अदम्य शक्ति का प्रदर्शन करने के बजाय ज्ञान प्राप्ति में अधिक रुचि लेने लगे। वैदिक ज्ञान की सभी शाखाओं का अध्ययन करने के लिए, वह सूर्य देवता को गुरु बनाकर, उनके उदय होने से लेकर अस्त होने तक की पूरी दूरी तय किया करते। उनसे असंख्य प्रश्न पूछ-पूछकर हनुमान बृहस्पति के समान वेदों के ज्ञाता हो गये।
इस प्रकार अगस्त्य ऋषि ने हनुमान के माहात्म्य का वर्णन किया। इसे सुनकर राम, लक्ष्मण और सभी वानर तथा राक्षस अत्यधिक चकित हुए। इसके बाद, समस्त ऋषि राम से विदा लेने के लिए एकत्र हुए, तो राम ने कहा, अब मुझे राजा बना दिया गया है, तो मैं विश्व के कल्याण के लिए अनेक यज्ञ करना चाहता हूँ। आप सभी से मेरा अनुरोध है कि यज्ञ के आयोजन के समय आप सभी पुनः यहाँ आयें, क्योंकि मैं आप लोगों को देखरेख में ही ये यज्ञ करना चाहता हूँ।
राम के अनुरोध को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करने के बाद, ऋषिगण वहाँ से चले गये। चूंकि अब तक अंधकार छा चुका था, इसलिए राम ने सभा में एकत्रित सभी लोगों को विदा कर दिया और रात्रि विश्राम के लिए चले गये। अगली सुबह चारण कवियों-गायकों द्वारा गाये जा रहे अपने महिमामंडन को सुनकर जागने के बाद, राम ने स्नान किया और फिर अग्निहोत्र यज्ञ करने के लिए बैठ गये। इसके बाद राम राजमहल के मंदिर में गये और फिर वहाँ से अपने राज दरबार चले गये। अपने मंत्रियों, सेवकों और बीस प्रमुख वानर नायकों से घिरे हुए, राजसिंहासन पर विराजमान राम ने राजकीय प्रशासन का अनुकरणीय रूप से संचालन किया।
राम के राज्याभिषेक समारोह में भाग लेने आये अनेक राजाओं में राजा जनक भी शामिल थे। कुछ दिनों के बाद, राम उनके पास जाकर बोले, मेरे प्रिय ससुर जी, अब आपको अपने राज्य वापस लौट जाना चाहिए ताकि वहाँ लापरवाही न हो। भरत और शत्रुघ्न एक विशाल सेना के साथ आपको पहुँचाने जायेंगे।
राजा जनक ने अपनी सहमति दे दी और तब राम ने उन्हें अनेक मूल्यवान उपहार दिए। राजा जनक को जो भी उपहार मिले थे, वे उन्होंने अपनी प्रिय पुत्री सीता को दे दिए।
इसके बाद, राम ने अपने मामा, केकय नरेश, युधजित से कहा, आपके पिता बहुत वृद्ध हैं, इसलिए अब आपको वापस लौट जाना चाहिए। लक्ष्मण एक सेना के साथ आपको पहुँचाने जायेंगे।
युधजित ने अपनी सहमति दे दी और तब राम ने अपने मित्र काशी नरेश को विदा किया। साथ ही, राम ने अपने राज्याभिषेक समारोह में भाग लेने के लिए अयोध्या आये तीन सौ राजाओं व राजकुमारों को विदा किया। इन सभी राजाओं ने अपने राज्य वापस लौटने के बाद, पहुँचाने गये लोगों के हाथों राम के लिए अनेक मूल्यवान उपहार भिजवाए। ये सभी उपहार मिलते ही, राम ने तत्काल इन्हें सुग्रीव, विभीषण व अन्य वानरों व राक्षसों को दे दिया।
एक दिन, राम ने हनुमान व अंगद को अपनी गोद में बिठा लिया और फिर वह सुग्रीव से बोले, ये दोनों पराक्रमी शूरवीर हर संभव सम्मान के पात्र हैं।
यह कहकर, राम ने अपने शरीर की शोभा बढ़ा रहे आभूषणों को उतारकर उन्हें हनुमान व अंगद को पहना दिया। राम ने वहाँ पर उपस्थित सभी शूरवीर वानरों से कहा, आप सभी मेरे अत्यन्त प्रिय मित्र ही नहीं, वरन् मेरे भाइयों के समान हैं।
यह कहकर, राम ने सभी वानरों का बारी-बारी से आलिंगन किया और उन्हें उपहार भेंट किए। वानर-गण एक माह से भी अधिक समय तक अयोध्या में रहे और वहाँ पर छककर खाते-पीते हुए और पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के सानिध्य का आनन्द उठाते हुए उन्होंने अपना समय व्यतीत किया। भगवान् के प्रति उनके अत्यधिक प्रेम के कारण, समय इतनी जल्दी व्यतीत हो गया कि ऐसा जान पड़ा मानो वानरों को वहाँ आये एक घंटे से अधिक समय न हुआ हो।
राम ने जिस समय सुग्रीव से किष्किंधा और विभीषण से लंका वापस लौट जाने का अनुरोध किया, उस समय हनुमान उनके पास आये और उन्हें संबोधित करके यह प्रार्थना की, हे मेरे प्रभु, आशीष दें कि आपके प्रति मेरी भक्ति सदैव इसी प्रकार रहे और आपके प्रति मेरा प्रेम कभी भी कम न हो और न ही किसी अन्य से यह प्रेम साझा हो। हे प्रभु, आशीष दें कि जब तक इस पृथ्वी पर आपकी आध्यात्मिक लीलाओं का गुणगान होता रहे, तब तक में जीवित रहूँ। सच तो यह है कि रामायण का पाठ सुनने मात्र से ही मेरी आपके वियोग की असह्य पीड़ा दूर हो जाती है।
राम अपने राजसिंहासन से उतर पड़े और हनुमान को गले से लगाकर उन्होंने घोषणा की, जब तक रामायण का पाठ किया जायेगा, तब तक आप जीवित रहेंगे और रामायण का पाठ तब तक किया जाता रहेगा, जब तक कि यह पृथ्वी रहेगी। मेरे प्रिय हनुमान, आपने मेरी जो सेवा की है, उससे में कभी भी उऋण नहीं हो पाऊँगा। मैं सदैव आपका ऋणी रहूँगा।
यह कहकर, राम ने अपने वक्ष की शोभा बढ़ा रही मोतियों और वैदूर्य रत्नों की माला उतार ली और उसे हनुमान के गले में पहना दिया। सभी वानर-गण उठ खड़े हुए और उन्होंने बारी-बारी से भगवान् राम के चरण कमलों का स्पर्श किया। जिस समय राम ने सुग्रीव व विभीषण का आलिंगन किया, तब सभी वानरों की आँखें भर आई और आसन्न बिछोह की अभिभूत कर देने वाली भावनाओं में भटकते उनके चित्त के कारण वे साफ-स्पष्ट ढंग से बोल तक नहीं पाए। अंततः, वानरों ने प्रस्थान किया। हालांकि, राम को अपने मित्रों से बिछुड़ने की अत्यधिक पीड़ा हो रही थी, परंतु वह यह सोचकर प्रसन्न थे कि वे लोग अपने परिवार के सदस्यों से पुनः मिल पायेंगे।
बाद में, अपराह्न के समय, राम की आकाश से आती एक वाणी सुनाई दी और जब उन्होंने ऊपर देखा तो पाया कि पुष्पक विमान उन्हें संबोधित कर रहा था। पुष्पक विमान ने राम से कहा, आपके आदेश के अनुसार मैं कुबेर के पास वापस गया, परंतु धन के देवता ने मुझसे कहा, चूँकि राम ने रावण को पराजित किया है, इसलिए अब न्यायसंगत ढंग से राम ही आपके स्वामी हैं। कुबेर ने मुझे आपको सेवा के लिए भेज दिया है। कृपा करके बिना किसी हिचक के मुझे स्वीकार करें।
राम ने पुष्पक विमान को फूल, धूप और चंदन का लेप अर्पित किया। वह बोले, यदि मुझे आपकी सेवा की आवश्यकता हुई, तो मेरे द्वारा बुलाए जाने पर आप प्रकट हो सकते हैं। इस बीच आप अपनी इच्छा से विचरण करने के लिए स्वतंत्र हैं।
इस प्रकार से निर्देश मिलने पर, पुष्पक विमान अपनी इच्छा से विचरण करने निकल पड़ा।
इस घटना के कुछ समय बाद, राम के पास भरत आये और राज्य में उनके शासन का महिमामंडन करते हुए बोले, आपका राज्याभिषेक हुए अभी एक महीने से कुछ ही अधिक समय व्यतीत हुआ है, परंतु अभी से राज्य पूर्णतः रोग- मुक्त हो गया है, असमय मृत्यु होना बंद हो गया है और स्त्रियों की प्रसव पीड़ा नहीं होती है। बादल सही समय पर आकर वृष्टि करते हैं और सभी लोग प्रसन्नचित मनःस्थिति में जीवन-यापन कर रहे हैं।
भरत के इन मधुर शब्दों को सुनकर राम को बहुत प्रसन्नता हुई। ईश्वर के प्रति सचेत रहने वाले राज्य में सभी जीवधारी जीवन की सर्वोच्च संतुष्टि प्राप्त कर सकते हैं, इस बात की पुष्टि भरत की सूचना से हो जाने पर राम को बहुत संतुष्टि मिली। सर्दियाँ बीत गई और बसन्त के आगमन के साथ ही, राम अपना अधिकांश समय सीता के साथ राजमहल के मनोरम उद्यानों में व्यतीत करने लगे।
दिन के समय, राम निष्ठापूर्वक राजकीय प्रशासन के काम-काज पूरे करते । संध्या वेला में, वह सीता के साथ अशोक के एक विशाल वृक्ष की छाँव में बैठते। उनके चारों ओर फूल से लदे चंपक, बकुल और चंदन के वृक्षों के बीच, अप्सराएँ गाया और नाचा करतीं। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् राम और सौभाग्य की देवी सीता नित नवीन आनन्दों का उपभोग करते हुए समय व्यतीत करते, जिसके कारण उन्हें एक-दूसरे के सानिध्य में मिलने वाला आनन्द असीमित रूप से बढ़ता चला गया।
एक दिन, सीता के गर्भवती होने की बात जानकर, राम ने अत्यधिक प्रसन्नता प्रकट करते हुए कहा, हे प्रिय महारानी, क्या आपके हृदय में ऐसी कोई इच्छा है जो अब तक पूर्ण नहीं हुई है? यदि ऐसी कोई इच्छा है, तो मुझे बताएं और में निःसन्देह आपकी इच्छा पूरी करूँगा।
सीता ने मुस्कुराते हुए कहा, हे प्रभु, आपके सानिध्य में, मेरी समस्त इच्छाएँ प्रचुरता से पूर्ण हुई हैं, परंतु आपके द्वारा यह प्रश्न किए जाने पर मुझे निश्चित ही आपको यह बताना चाहिए कि मेरे हृदय में गंगा नदी के तट पर निवास करने वाले ऋषियों के आश्रमों के दर्शन करने की प्रबल इच्छा है। मैं वहाँ पर रहने वाले सभी महान ऋषियों के पास जाकर उनके चरण स्पर्श करना चाहती हूँ।
राम बोले, मेरी प्रिय सीता, आप एकदम निश्चिंत रहें, क्योंकि शीघ्र ही आपको वन में रहने वाले ऋषियों से भेंट करने का सुअवसर मिलने वाला है।
राम संध्या वेला में गुप्तचरों को नगर में यह देखने-जानने भेजा करते कि उनकी प्रजा उनके बारे में क्या सोचती कहती है। एक गुप्तचर एक धनी व्यक्ति के घर में गया। वहाँ पर उसने एक सुंदर स्त्री को देखा जो अपने बच्चे को स्तनपान करा रही थी। वह बोली, मेरे पुत्र, जी भरकर दूध पी लो क्योंकि बाद में ऐसा करना कठिन होगा। राम हमारी नगरी के भगवान् हैं। यहाँ के निवासी इस संसार में पुनर्जन्म नहीं लेंगे। जब पुनर्जन्म नहीं होगा, तब भला माता का दूध कहाँ मिलेगा? जो लोग हमेशा भगवान् राम के बारे में सोचते हैं उन्हें अपनी माता का दूध फिर से पीने का अवसर नहीं मिलता है!
दूसरा गुप्तचर एक अन्य घर में गया जहाँ उसने एक आसन पर बैठी एक सुंदर स्त्री को देखा। वह स्त्री अपने पति से बोली, आप मुझे दूसरे राम जैसे दिखते हैं आप इतने सुंदर हैं, आपके नेत्र कमल की पंखुड़ियों के समान हैं और आपका सीना विशाल और मजबूत है।
उसका पति बोला, हे धर्मपरायण स्त्री, तुम्हारी वाणी किसी पतिव्रता स्त्री के समान मधुर है, परंतु भला राम की तुलना में मेरी क्या बिसात है ? उनकी तुलना में, मैं केवल एक कीट के समान हूँ भला तुम एक खरगोश की तुलना एक सिंह से कैसे कर सकती हो ? भला गंगा की तुलना पथ के किनारे बहने वाले किसी गंदले पानी के नाले से कैसे की जा सकती है ?
तब उस पतिव्रता स्त्री ने स्नेहपूर्वक अपने पति को आलिंगनबद्ध कर लिया। तीसरा गुप्तचर जिस घर में गया वहाँ उसने एक स्त्री को फूलों की पंखुड़ियाँ बिखेरकर बिस्तर सजाते देखा। इसके बाद उस स्त्री ने चंदन के लेप व कर्पूर से उसे सुगंधित किया। जब वह बिस्तर प्रेम का आनन्द लेने के लिए तैयार हो गया, तो वह अपने पति से बोली, कृपा करके बिस्तर पर लेट जायें क्योंकि अब यह आनन्द-भोग के लिए तैयार है। आपके समान व्यक्ति सदैव प्रसन्न रहने के पात्र होते हैं, परंतु भगवान् राम से विमुख होने वाले लोग प्रसन्नता पाने के पात्र नहीं होते। अब भगवान् राम की कृपा से मिले आनन्द का भोग करें। मेरे समान प्रेम करने वाली स्त्री और फूलों से सुसज्जित यह विस्तर- यह सभी कुछ भगवान् राम की कृपा है।
पति बोला, तुम सच कहती हो मेरे पास जो कुछ भी है, वह भगवान् राम की कृपादृष्टि के कारण ही है। चौथा गुप्तचर एक घर में गया जहाँ उसने एक स्त्री को वाद्य यंत्र बजाते देखा जबकि उसका पति संगीत की धुन पर भगवान् राम की महिमा का गान कर रहा था। वह स्त्री बोली, हम कितने भाग्यशाली हैं कि हम राम की नगरी में निवास करते हैं क्योंकि वह अपनी प्रजा का पालन पोषण व संरक्षण अपनी संतान की भाँति करते हैं।
पति बोला, ब्रह्माजी के अनुरोध पर भगवान् ने कौशल्या के पुत्र के रूप में मानव अवतार लिया। सच तो यह है कि वह तीनों लोकों के स्वामी हैं। हम बहुत सौभाग्यशाली हैं कि हमें राम के कमल समान मुखमंडल के दर्शन मिल सकते हैं। ब्रह्माजी जैसे देवताओं को भी भगवान् के दर्शन दुर्लभ होते हैं।
पाँचवें गुप्तचर ने एक घर के अंदर प्रवेश करने पर पति-पत्नी को पासा फेंककर चौपड़ खेलते हुए देखा। स्त्री बोली, मैं सब कुछ जीत गई हूँ। अब आप क्या करेंगे ?
यह कहकर उस स्त्री ने प्रसन्न होकर अपने पति को आलिंगनबद्ध कर लिया। पति बोला, हे मनमोहिनी, सुंदर देह वाली प्रिये, जीता तो केवल मैं ही हूँ। मैं सदैव भगवान् राम का स्मरण करता हूँ। अब यह देखो, मैं किस प्रकार तुम पर विजय पाता हूँ।
यह कहकर उसने पासा फेंका और जीत गया। वह प्रसन्न होकर बोला, मैंन तुम्हें पराजित कर दिया है। जो व्यक्ति भगवान् राम का स्मरण करता है उसे किसी भी शत्रु से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं रह जाती। अपनी पत्नी के प्रति प्रेमातुर होकर उस पति ने अपनी पत्नी को कसकर गले से लगा लिया।
छठा गुप्तचर एक धोबी के घर में घुसा और उसने क्रोध से भरे, लाल-लाल आँखों वाले भीबी को अपनी पत्नी पर लातों से वार करते देखा क्योंकि उसकी पत्नी ने किसी अन्य पुरुष के घर पर रात बिताई थी। वह बोला, चली जा यहाँ से और जाकर उसी आदमी के घर पर रह मैं अब तुझे स्वीकार नहीं कर सकता। धोबी की माँ ने याचना करके कहा, अपनी पत्नी का त्याग मत करो। उसने कोई पाप नहीं किया है।
गुस्साया हुआ धोबी बोला, मैं राम के समान महान नहीं हूँ कि किसी अन्य पुरुष के घर रही पत्नी को वापस स्वीकार कर लूँ। वह राजा है, इसलिए जो चाहे कर सकते हैं, परंतु मैं ऐसी पत्नी को स्वीकार नहीं करूँगा।
यह सुनकर गुप्तचर को क्रोध आ गया। उसने धोबी का वध करने के लिए तलवार को म्यान से बाहर खींच निकाला, परंतु तभी उसे राम का निर्देश याद आया, मेरी प्रजा में से किसी भी व्यक्ति का वध नहीं किया जाना चाहिए। इसलिए उसने अपनी तलवार वापस म्यान में डाल दी और उस स्थान को चला गया जहाँ अन्य गुप्तचर उसके आने की प्रतीक्षा कर रहे थे।
कथा के इस बिंदु पर, उस धोबी के पूर्व-जन्म के बारे में एक कहानी है कि पिछले जन्म में वह धोबी कौन था राजा जनक जिस समय एक यज्ञ की तैयारी के लिए जमीन तैयार कर रहे थे, तभी जमीन की हल-रेखा से सीता अवतरित हुई। राजा जनक ने प्रसन्न होकर उस कन्या को अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया। एक बार, सीता एक उद्यान में अपनी सहेलियों के साथ खेल रही थी, तभी उन्हें तोता पक्षियों का एक आकर्षक युग्म दिखाई पड़ा। नर और मादा तोते सीता नामक एक स्त्री और राम नामक एक पुरुष के बारे में अत्यन्त स्नेहपूर्वक वार्तालाप कर रहे थे। सीता को सन्देह हुआ कि ये पक्षी उन्हीं के बारे में बात कर रहे हैं, इसलिए उन्होंने अपनी सहेलियों को उस पक्षी युगल को पकड़ने का आदेश दिया। सीता की सहेलियों ने पक्षियों को पकड़ लिया और तब सीता ने पूछा, तुम दोनों किस सीता और राम की बात कर रहे हो? तुम्हें उनके बारे में कैसे पता चला ?
उन तोता पक्षियों ने बताया कि किस तरह वाल्मीकि मुनि के आश्रम में उन्होंने अनेक बार भगवान् राम को भावी लीलाओं के बारे में सुना था। उन्होंने सीता को बताया कि भविष्य में वह भगवान् राम को पत्नी बनेंगी। इसके बाद, उन तोता पक्षियों ने सीता की प्रसन्नता के लिए उन्हें भगवान् राम की लीलाएँ सुनाई।
सीता ने उन तोता पक्षियों को सदैव अपने पास रहने को कहा, परंतु उन पक्षियों ने यह कहकर मना कर दिया कि वे स्वतंत्र होकर वन में रहने के अभ्यस्त हैं। इसके बाद, मादा तोते ने सीता को बताया कि वह गर्भवती है और उसने सीता को वचन दिया कि बच्चों के जन्म के बाद वह उनके पास लौटकर आयेगी। तब भी, सीता ने तोता पक्षियों की मुक्त नहीं किया। नर तोते ने सीता से विनती की कि वह उसको पत्नी को मुक्त कर दें। इस पर सीता ने नर तोते को जाने की अनुमति दे दी, परंतु कहा कि वह मादा तोते को पालतू बनाना चाहती हैं।
नर तोते ने अपनी पत्नी के बिना वहाँ से जाने से मना कर दिया। तब मादा तोते ने जानकी को शाप देकर कहा, "जिस प्रकार आप मुझे मेरे पति से अलग कर रही हैं, उसी प्रकार जब आप गर्भवती होंगी तो आपका राम से बिछोह हो जायेगा।
यह कहकर, राम का स्मरण करते हुए मादा तोते ने अपने प्राण त्याग दिए। निराशा से भरकर, नर तोते ने गंगा नदी में कूदकर प्राण त्यागने से पहले कहा, मैं राम की नगरी में एक शूद्र के रूप में जन्म लूँगा। तब मेरे ही शब्दों के कारण, सीता को अपने पति से बिछुड़ना होगा। चूँकि नर तोते ने सीता का अपमान करके प्राण त्यागे थे, इसलिए अगले जन्म में उसने क्रोधान नामक एक धोबी के रूप में जन्म लिया।
अगली सुबह, राम ने राजसभा में प्रवेश करने के बाद, अपने सलाहकारों के साथ हँसी-मजाक व हल्की-फुल्की चर्चाएँ करते हुए अपना समय बिताना आरंभ किया। फिर भद्र की ओर मुड़कर, राम ने पूछा, आजकल नागरिक किस विषय पर बात कर रहे हैं? वे सीता, भरत, लक्ष्मण व शत्रुघ्न के बारे में क्या कहते हैं ? हमारी माता कैकेयों के बारे में वे क्या महसूस करते हैं और मेरे बारे में उनके क्या विचार हैं? आखिरकार, एक राजा सदैव ही अपनी प्रजा की आलोचना का विषय बनता है।
भद्र ने दोनों हाथ जोड़कर उत्तर दिया, मेरे प्रभु, सभी लोग दस सिरों वाले रावण पर आपकी विजय की प्रशंसा करते हैं। वे आपको सभी नायकों में सर्वश्रेष्ठ मानते हैं।
तब भी राम ने आग्रह किया, मैं चाहता हूँ कि जो कुछ भी प्रजाजनों ने कहा है वह आप मुझे सच सच बताएँ। अपनी कमियों और कमजोरियों को उनके वास्तविक रूप में जानने पर ही उन्हें दूर किया जा सकता है और आत्म-सुधार का प्रयास किया जा सकता है। हे भद्र, मुझसे भयभीत होने की कोई आवश्यकता नहीं है। मैं यह समझ चुका हूँ कि ईर्ष्यालु लोग मेरे बारे में सम्पूर्ण अयोध्या नगरी में अफवाहें फैला रहे हैं। मैंने स्वयं भी कुछ लोगों को मेरी यह आलोचना करते सुना है कि किसी अन्य पुरुष के घर में इतने समय तक रही स्त्री को मैं मूर्खतापूर्ण ढंग से वापस ले आया।
यह सुनकर, भद्र ने पहले शीश झुकाकर राम को प्रणाम किया और फिर बोले, मैं नहीं जानता कि यह अच्छा है या बुरा, परंतु हाट-बाजारों में और नगर के रास्तों पर लोग इस प्रकार की बातें कर रहे हैं: समुद्र पर सेतु बनाकर और शक्तिशाली रावण को पराजित करके, राम ने असाधारण पराक्रम प्रदर्शित किया है। परंतु क्या उन्हें इतना भी समझ में नहीं आया कि वह उस स्त्री को घर वापस ले जा रहे हैं. जिसका रावण ने अपहरण किया था और फिर जिसे उसने बलपूर्वक अपनी गोद में बिठाया था? क्या राम को उस स्त्री के साथ आनन्द-भोग करते हुए घृणा नहीं होती जो लगभग एक वर्ष तक रावण के पास रही थी? जैसा काम राजा करता है वही प्रजा भी करती है और इसलिए अब हमें भी अपनी निष्ठा रहित पत्नियों को सहन करना पड़ेगा।
हे प्रभु, अयोध्या के लोग आपके बारे में ऐसी ही या इससे मिलती-जुलती बातें कर रहे हैं।
यह सुनकर राम को आघात लगा और निराशा हुई। उन्होंने अन्य मंत्री- गणों से पूछा कि जो भद्र कह रहे हैं क्या वह सच है और तब उन सभी ने इस बात की पुष्टि की कि यह सच है। वास्तव में, राम बहुत अच्छी तरह से जानते थे कि सीता पूर्णतः शुद्ध और पतिव्रता है। परंतु तब भी, वह लोगों द्वारा इस प्रकार से अपना मखौल उड़ाए जाने की बात सुनकर उपजी लज्जा को सहन नहीं कर पाए। इस कारण, राम ने अपनी असंदिग्ध पत्नी का त्याग कर देने का निश्चय किया।
इसके बाद, राम ने गुप्तचरों से पूछा कि पिछली शाम को उन्होंने प्रजाजनों को क्या बात करते सुना। बहुत अनचाहे ढंग से और बार-बार बताने का आग्रह करने के बाद, छठे गुप्तचर ने राम को बताया कि धोबी ने क्या कहा था। यह सूचना पाकर राम को बहुत गहरा आघात लगा वास्तव में, वह मूर्च्छित होकर जमीन पर गिर पड़े। सामान्य अवस्था में लौटने के बाद, राम ने भरत को बुलवाया और सारी बात उन्हें बता दी।
राम ने भरत से पूछा, मैं क्या करूँ? क्या में आत्महत्या कर लूँ? क्या मुझे सीता का त्याग कर देना चाहिए ?
क्रोध से भरे हुए, भरत उस धोबी का वध करने के लिए जाने को तैयार हो गये। उन्होंने बहुत प्रयास करके, राम को सीता की पवित्रता के बारे में संतुष्ट करने का प्रयास किया। तब राम बोले, मैं जानता हूँ कि मेरी पत्नी पवित्र और शुद्ध है, परंतु तब भी, मैं उसका त्याग कर दूँगा क्योंकि मैं प्रजाजनों की निंदा से भयभीत हूँ। अपनी तलवार उठाकर मेरा सिर काट दो, अन्यथा सीता को वन में छोड़ आओ।
यह सुनकर, भरत अचेत होकर गिर पड़े। तब राम ने लक्ष्मण को बुलवाया और फिर उनसे बोले, "मेरे प्रिय भाई, मैं जो कहने जा रहा हूँ वह अत्यन्त कष्टकारक है, परंतु कृपा करके बहुत ध्यान से और शान्तिपूर्वक मेरी बात सुनो। मुझे अभी-अभी पता चला है कि अनेक नागरिक सीता को लंका से वापस लाने के लिए मेरी निंदा कर रहे हैं। जरा देखो, मेरी कैसी दुर्दशा हो गई है। मैं राजसी इक्ष्वाकु वंश में पैदा हुआ हूँ, इसलिए अपने नाम पर कलंक का धब्बा लगाने के बजाय में मृत्यु का वरण करना चुनूँगा। रावण का वध करने के बाद, मैंने भी यह सोचा था कि भला मैं सीता को अयोध्या वापस कैसे ले जा सकता हूँ ?' इन आशंकाओं को शांत करने के लिए ही मैंने मिथिला की राजकुमारी को सभी देवताओं और ऋषि मुनियों के सामने अग्नि परीक्षा देने को बाध्य किया था। उस समय वायु और अग्नि ने सीता' की पवित्रता की घोषणा की थी और मेरे हृदय को यह पता था कि सीता पतिव्रता थी. इसलिए मैंने प्रसन्नतापूर्वक उसे स्वीकार कर लिया, परंतु अब सर्वत्र अफवाहें उड़ रही हैं और मुझ पर स्वयं अपने राज्य में आरोप लगाए जा रहे हैं।
हे लक्ष्मण, जब तक व्यक्ति का दुराचरण अफवाहों का विषय होता है, तब तक व्यक्ति को अत्यधिक अपमान और प्रताड़ना झेलनी पड़ती है। अनुचित कार्यों की सदैव ही निंदा होती है और इसी कारण उदारमना लोग अच्छे कार्य करने के लिए प्रेरित होते हैं। सार्वजनिक कुत्सा प्रचार को रोकने के लिए, आवश्यकता होने पर मैं अपने प्राण भी त्याग सकता हूँ। सच तो यह है कि अपने यश और प्रतिष्ठा के लिए, आवश्यकता पड़ने पर, मैं तुम्हारा भी त्याग कर सकता हूँ, मेरे प्रिय भाई, तो भला सीता की क्या बात करें। ऐसा जान पड़ता है कि मैं दुख के समुद्र में डूब रहा हूँ। आज से पहले मुझे कभी भी ऐसे दुर्भाग्य का अनुभव नहीं हुआ !
मेरे प्रिय लक्ष्मण, मैं चाहता हूँ कि कल उपावेला में, तुम सीता को लेकर गंगा नदी के तट पर जाओ और सीता को वहाँ रहने वाले सभी महान ऋषियों के आश्रमों का दर्शन कराओ। जब तुम तामस नदी के तट पर स्थित वाल्मीकि ऋषि के आश्रम पर पहुँचो, तो सीता को वहीं छोड़कर, अकेले ही अयोध्या लौट आना।
मेरे प्यारे भाई, तुम्हें बिना कोई तर्क-वितर्क किए मेरे आदेश का पालन करना होगा, क्योंकि यदि तुमने इसमें तनिक भी हिचकिचाहट दिखाई तो मैं तुमसे अत्यन्त अप्रसन्न हो जाऊँगा। वास्तव में, सभी को यह जान लेने दो कि मेरे निर्णय का विरोध करने वाला कोई भी व्यक्ति तत्क्षण मेरा सबसे बुरा शत्रु बन जायेगा! अभी कुछ ही समय पहले, सीता ने मुझसे कहा कि वह गंगा नदी के तट पर स्थित सभी आश्रमों के दर्शन करना चाहती हैं। इसलिए, अब जाओ और उसकी इच्छा पूर्ण करो।
राम की बातें सुनकर लक्ष्मण का हृदय सन्न हो गया, परंतु अपने बड़े भाई के अत्यधिक आज्ञाकारी सेवक होने के नाते उन्होंने बिना हिचकिचाए अपनी सहमति दे दी। अगली सुबह उषावेला में, लक्ष्मण ने सीता के पास जाकर कहा, आपके पति ने मुझे आपकी इच्छा पूर्ण करने का आदेश दिया है। मैं आपको गंगा नदी के तट पर ले जाऊँगा ताकि आप वहाँ रहने वाले महान ऋषियों की आराधना कर सके। सुमंत्र रथ लेकर तैयार खड़े हैं, इसलिए मेरा अनुरोध है कि आप तत्काल मेरे साथ चलें।
सीता बहुत प्रसन्न हुईं। अपनी सर्वोत्तम पोशाक पहनने और सर्वाधिक बहुमूल्य आभूषणों से श्रृंगार करने के बाद, उन्होंने लक्ष्मण से कहा, मैं अन्य उपहारों के साथ इन्हें भी महान ऋषियों की पत्नियों को बाँट दूँगी।
लक्ष्मण ने रथ पर चढ़ने में सीता को सहायता की और शीघ्र ही वे वहाँ से चल पड़े, परंतु आगे बढ़ते हुए सीता ने उद्विग्न होकर कहा, हे लक्ष्मण, मेरी दाहिनी आँख फड़क रही है और मेरे मन में अजीब-सी बेचैनी हो रही है। अचानक ही मुझे बहुत कमजोरी महसूस हो रही है और पूरा संसार बहुत उदास सा दिखाई दें रहा है। मैं आशा करती हूं कि राम कुशल पूर्वक होंगे।
अपने पति व अन्य संबंधियों की कुशल क्षेम के लिए सीता ने देवताओं की प्रार्थना की। आँसुओं के कारण रुँध गये गले से लक्ष्मण ने भर्राई आवाज में कहा, मैं यही आशा करता हूँ कि आपका किसी दुर्भाग्य से सामना न हो।
शाम होने तक, सीता, लक्ष्मण और सुमंत्र गोमती नदी के तट पर पहुँच गये और उन्होंने वहीं रात्रि विश्राम किया। अगली सुबह उषावेला में, उन्होंने आगे की यात्रा जारी रखी और अपराह्न तक वे गंगा नदी के तट पर पहुँच गये। परंतु रथ से उतरने के बाद लक्ष्मण अपने हृदय पर संयम नहीं रख सके और रो पड़े।
सीता ने बहुत चिंता के साथ पूछा, प्रिय लक्ष्मण, क्या बात है ? अब तो हम लोग गंतव्य स्थान पर पहुँच गये हैं, इसलिए तुम्हें तो प्रसन्न होना चाहिए। तुम्हारी उदासी को देखकर मुझे उद्विग्नता हो रही है। क्या राम से केवल दो दिन अलग रहने पर तुम इतने अधिक दुखी हो गये हो? मैं राम से अत्यधिक प्रेम करती हूँ, परंतु फिर भी मैं तुम्हारी तरह परेशान नहीं हूँ! हे लक्ष्मण, कृपा करके स्वयं को शांत करें। महान ऋषियों से भेंट करने के लिए हमें गंगा पार करनी है। इसके बाद, हम जल्दी ही अयोध्या लौट जायेंगे क्योंकि मुझे भी राम की बहुत अधिक याद आ रही है।
अपनी आँखों से आँसू पोंछ लेने के बाद, लक्ष्मण ने एक नाव का प्रबंध किया और सीता को गंगा पार कराई। नदी के दूसरे तट पर पहुँचकर, लक्ष्मण ने अश्रुपूरित नेत्रों से कहा, हे मिथिला-कुमारी, सर्व-कल्याणकारी भगवान् राम ने मुझे एक अत्यन्त कष्टकर कार्य सौंपा है और यह कार्य करने के कारण में संसार भर में कुख्यात हो जाऊँगा। आपके पति के इस आदेश का पालन करने से बेहतर तो है कि मैं मर जाऊँ! हे देवी, मुझे जो कार्य करने के लिए बाध्य किया जा रहा है, उसके लिए कृपा करके मुझे क्षमा कर दें।
यह कहकर, लक्ष्मण जमीन पर गिर पड़े और बहुत फूट-फूटकर रोने लगे। सीता ने अत्यधिक उत्तेजित होकर पूछा, हे लक्ष्मण! क्या बात है? तुम क्या कह रहे हो, मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है। कृपा करके, साफ-स्पष्ट रूप से बताओ कि तुम्हारी परेशानी का कारण क्या है। क्या राम पर कोई घोर विपत्ति टूट पड़ी है जिसे तुम मुझसे कहने का साहस नहीं जुटा पा रहे हो?
लक्ष्मण खड़े हो उठे और अपना सिर झुकाकर भर्राई आवाज में बोले, राजसभा में राम को सम्पूर्ण अयोध्या नगरी में फैल रही उन अफवाहों के बारे में पता चला। जिनमें राम द्वारा अनुचित ढंग से कार्य करने का आरोप लगाया गया था। हर कहीं, लोग आपको पुनः स्वीकार कर लिए जाने के कारण राम को दोषी ठहरा रहे हैं और अपने यश पर लगे इस कलंक से उन्हें असह्य पीड़ा हो रही है। हे सीता, मैं जानता हूँ कि आप निर्दोष और निष्पाप हैं और राम भी यह जानते हैं। कृपा करके अपने पति को गलत न समझें। वह आपका त्याग करने के लिए बाध्य हैं, ताकि इक्ष्वाकु वंश की प्रतिष्ठा कायम रहे।
हे महारानी, आप दिल छोटा नहीं करें क्योंकि यहाँ आस-पास स्थित ब्रह्मर्षियों के आश्रम दिव्य रूप से सुंदर है। आप महान ऋषि वाल्मीकि के आश्रम में शरण लें क्योंकि वह आपके ससुर महाराज दशरथ के बहुत अच्छे मित्र हैं। अपने हृदय में सदैव राम के नाम का स्मरण करें और उनके प्रति अटूट श्रद्धा-भक्ति रखें। इस प्रकार आप सर्वोच्च प्रसन्नता प्राप्त करेंगी। इस बारे में कोई सन्देह नहीं है।
अपने निष्ठुर भाग्य के बारे में सुनकर, सीता तत्काल जमीन पर गिर गई। चेतना वापस लौटने के बाद, सीता करुण स्वर में रो उठीं, अब मैं साफ-साफ देख पा रही हूँ कि यह जीवन मुझे केवल दुख भोगने के लिए मिला है। अतीत में मैंने भला क्या पाप किए थे ? भला मैंने किस कन्या के विवाह में व्यवधान डाला था कि अब राम अपनी निर्दोष पत्नी का त्याग कर रहे हैं? मैंने वनवास के समय निष्ठापूर्वक अपने पति का अनुसरण किया और सभी कठिनाइयों के बावजूद हमेशा संतुष्ट रही।
हे लक्ष्मण, भला मैं यहाँ पर अकेली कैसे रह पाऊँगी ? ऋषि-मुनि जब मुझसे यह पूछेंगे कि मैंने अपने पति का त्याग क्यों किया, तब भला मैं उनसे क्या कहूंगी ? मैं प्रसन्नतापूर्वक स्वयं को गंगा नदी में फेंककर अपने प्राण त्याग देती, परंतु ऐसा करने पर राम का वंश समाप्त हो जायेगा।
अंततः, कुछ सामान्य स्थिति में लौटने पर, सीता ने लक्ष्मण से कहा, मैं जानती हूँ कि तुम केवल अपने दायित्व का निर्वाह कर रहे हो, इसलिए मैं तुम्हें दोष नहीं देती हूँ। जाओ, अयोध्या लौट जाओ और मेरी सासु माँओं को मेरा प्रणाम कहना। मेरे पति के चरणों का स्पर्श करना और उन्हें यह संदेश देना. 'हे राम, आप जानते हैं कि मैं सदैव अविचल भाव से आपके प्रति निष्ठावान रही हूँ। आप मेरे पतिव्रत और अविचल प्रेम से परिचित हैं, परंतु इसके बाद भी लोकलाज और अपमान के भय से आपने मेरा त्याग कर दिया। हे राम, मेरे स्वामी और मेरे शरणदाता, आपको ऐसा नहीं करना चाहिए था।
मेरे प्रिय स्वामी, मुझे अपने लिए इतना अधिक दुख नहीं है क्योंकि मैं जानती हूँ कि मैं निर्दोष हूँ और एक पतिव्रता स्त्री के लिए उसका स्वामी ही उसका भगवान् होता है। इसलिए मेरे कल्याण के लिए आप जो भी आदेश देंगे, उसे मैं शिरोधार्य करूँगी, फिर चाहे आप मुझे अपने प्राण त्याग देने का आदेश ही क्यों न दें।
लक्ष्मण ने सीता की प्रदक्षिणा की और नाव में जाकर बैठ गये। दूसरे तट पर पहुँचकर वह प्रतीक्षारत रथ में जा बैठे। इसके बाद, अयोध्या के लिए प्रस्थान करते हुए, लक्ष्मण ने सीता की एक अंतिम झलक पाने के लिए सिर पीछे मोड़ा। सीता ने भी दूर जाते लक्ष्मण को दुखी मन से देखा। अकेली और असुरक्षित हो जाने के कारण, सीता जमीन पर गिरकर, संयम की सारी सीमाएँ तोड़कर, फूट-फूटकर रोने लगीं और इस प्रकार अपना दुख हल्का करने लगीं।
लक्ष्मण बोले, हे सुमंत्र, अपनी प्रिय पत्नी का त्याग कर देने के कारण, राम को अब कितनी भयानक पीड़ा सहन करनी होगी। ऐसा जान पड़ता है कि राक्षसों का महान संहारक स्वयं ही निष्ठुर नियति की पीड़ा भोगने को विवश हो। मुझे विश्वास है कि अब राम को जो दुख होगा वह अपने पिता के आदेश पर वनवास में रहने के दुख से कहीं अधिक है।
सुमंत्र ने लक्ष्मण को शांत किया और नदी के तट पर रात बिताने के बाद, उन्होंने अगली सुबह अपनी यात्रा जारी रखी। इसी बीच, वाल्मीकि के कुछ शिष्यों ने सीता को रोते हुए देखा। वे दौड़कर अपने गुरु के पास गये और बोले, शीघ्र चलें! सौभाग्य की देवी के समान सुंदर एक स्त्री वन में अकेली बैठी रो रही है!
अपनी योग- शक्ति से वाल्मीकि सब कुछ समझ गये। वह उस स्थान की ओर तेजी से बढ़े जहां शोकाकुल सीता बैठी हुई थी और तब वाल्मीकि अत्यन्त विनम्रता से उनकी ओर बढ़े। वाल्मीकि ने विन्रमता से कहा, "हे भगवान् राम की निष्ठावान पत्नी व राजा जनक की पुत्री, अपने तप की शक्ति से मैं तीनों लोकों में घटने वाली सभी घटनाओं से परिचित हूँ, इसलिए मैं आपको पीड़ा समझ सकता हूँ। कृपया भयभीत नहीं हों। पास ही में स्थित मेरे आश्रम में, कुछ स्त्री साध्वी रहती हैं और वे इतने समर्पण-भाव से आपकी देखभाल करेंगी मानो आप उन्हीं की पुत्री हों। इसे अपना नया घर समझें।
वाल्मीकि सीता को लेकर आश्रम गये और उन्हें साध्वियों की देखरेख में छोड़ दिया। इसी बीच, अयोध्या वापस पहुँच जाने के बाद, लक्ष्मण राजमहल के अंदर गये। वहाँ उन्होंने राम को अत्यन्त भयानक अवसादग्रस्त मनःस्थिति में देखा। उन्होंने देखा कि राम गहन चिंतन की अवस्था में आँसू बहा रहे हैं। यह देखकर लक्ष्मण की आँखों में भी आँसू भर आये।
लक्ष्मण ने शीश झुकाकर प्रणाम करने के बाद, अत्यन्त दुख से भरी आवाज में कहा, मेरे प्रिय भाई, आपके आदेश के अनुसार, मैंने सीता को वाल्मीकि के आश्रम के निकट गंगा नदी के तट पर छोड़ दिया है। हे राम, इतना दुखी होने का कोई लाभ नहीं है। आखिरकार, इस संसार में मिलना और बिछुड़ना साथ-साथ चलते रहते हैं। किसी व्यक्ति की पत्नी, पुत्र और यहाँ तक कि व्यक्ति का स्वयं अपना जीवन भी एक दिन साथ छोड़ देता है। इस कारण, बुद्धिमान व्यक्ति सदैव जीवन की यात्रा को अनासक्ति का दृष्टिकोण रखते हुए तय करते हैं।
मेरे प्रिय भाई, आपकी असीम शक्ति तीनों लोकों को नियंत्रित करती है। तब भला आप इस हताशा को दूर क्यों नहीं करते ? इस कमजोरी का त्याग कर दें! अन्यथा और अधिक अफवाहें उड़ने लगेंगी। भला लोग क्या सोचेंगे ?
लक्ष्मण की बातें सुनकर राम शांत हो गये और धीरे-धीरे उन्होंने अपने दुख का त्याग कर दिया। राम बोले, मेरे प्रिय लक्ष्मण, पिछले चार दिनों से मैंने अपने राजकीय कर्तव्य को पूर्णतः अवहेलना कर रखी थी अब कृपया मंत्रियों, पुरोहितों और राजकीय काम-काज से जुड़े लोगों को बुलाएँ। जो राजा प्रतिदिन राज्य के प्रशासन का संचालन नहीं करता है, उसे निश्चित ही नरक में कष्ट भोगने पड़ते हैं।
इसके बाद, राम ने अतीत में जन्मे अनेक अनुकरणीय राजाओं का इतिहास बताना आरंभ किया और तब राम व लक्ष्मण एक सुखद वार्तालाप करने में व्यस्त ही गये। इसके बाद, राजकीय प्रशासन के कर्तव्यों का निर्वाह करने के लिए राम शीघ्रता से राजसभा को चले गये। उन्होंने लक्ष्मण को आदेश दिया, राजमहल के द्वार पर जाकर उन सभी प्राणियों को यहाँ ले आओ जी कुछ प्रार्थना लेकर आये हो।
लक्ष्मण शीघ्र ही वापस लौट आये और बोले, हे प्रिय प्रभु ऐसा जान पड़ता है कि कौशल प्रांत में किसी भी व्यक्ति को किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं है। तब भी राम ने आग्रहपूर्वक कहा, एक बार फिर जाओ और ध्यान से देखो। मैं रत्ती भर लापरवाही करने का आरोप भी नहीं लगने देना चाहता हूँ। साथ ही, मैं यह भी नहीं चाहता कि मेरे राज्य में तनिक भी अधर्म की अनदेखी हो।
इस बार, लक्ष्मण ने देखा कि राजमहल के द्वार के पास एक कुत्ता बैठा हुआ है। उसके सिर से रक्त बह रहा था और वह लक्ष्मण की ओर टकटकी बाँधकर देखते हुए, कष्ट के साथ किकिया रहा था। लक्ष्मण ने पूछा, क्या बात है ? तुम यहाँ क्यों आये हो? तुम निर्भय होकर मुझे सब कुछ बता सकते हो।
कुत्ता बोला, "मैं सीधे भगवान् राम से बात करना चाहता हूँ क्योंकि उनके चरण कमल किसी भी प्राणी को निर्भय होने का आश्वासन देते हैं और वह असहाय लोगों को आश्रय प्रदान करते हैं।
लक्ष्मण बोले, यदि तुम्हें कुछ कहना हो, तो राजसभा के अंदर तुम्हारा स्वागत है। अंदर आओ और राजा से अपने मन की बात कहो।
इस पर कुत्ता बोला, मैं अत्यन्त नीच जीव हैं, इसलिए मैं मंदिरों, ब्राह्मणों के घरों और राजसभा के अंदर जाने का पात्र नहीं हूँ। एक राजा समस्त धार्मिक सिद्धांतों का मूर्त रूप होता है, सभी देवताओं का प्रतिनिधि होता है और सभी जीवधारियों का कल्याण करने वाला होता है। इसलिए राजा राम की आज्ञा के बिना, मैं उनके समक्ष जाने का दुःसाहस नहीं कर सकता।
लक्ष्मण ने राजसभा में जाकर इस मामले की सूचना दी, तो राम ने तत्काल आदेश दिया, वह चाहे जो भी हो, उसे अविलंब यहाँ लेकर आओ।
वह कुत्ता अत्यन्त विनयपूर्वक राम के समक्ष आया और बोला, हे प्रभु, राजा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का प्रतिनिधि होता है और इस प्रकार वह सभी जीवों का रक्षक और पालनहार होता है। जिस समय अन्य प्राणी शान्ति से सो रहे होते हैं, उस समय भी राजा सचेत रहता है और सदा प्रत्येक व्यक्ति के कल्याण के लिए कार्यरत रहता है।
दूसरी ओर, सबकुछ राजा के ऊपर निर्भर होने के कारण, यदि राजा लापरवाह हो जाये, तो उसकी प्रजा शीघ्र ही नष्ट हो जाती है। राजा ही धार्मिक सिद्धांतों का ध्वजवाहक होता है और इस प्रकार वह धर्म को ऊँचा उठाने के साथ ही बुराई की शक्तियों का संहार भी करता है। जो लोग धार्मिक सिद्धांतों का पालन करते हैं उन्हें इस जन्म के साथ ही अगले जन्म में भी प्रसन्नता मिलती है। इसी कारण, धर्म की ध्वजा फहराते रहने से राजा को बहुत यश मिलता है।
हे राम, आप एक आदर्श धार्मिक राजा है। मैं अपना सिर आपके चरण- कमलों में रखकर, आपकी दया दृष्टि पाने का आकांक्षी हूँ। मुझे जो कहना है, उसे सुनकर कृपया क्रुद्ध न हों।
राम ने कुत्ते को आश्वस्त करके कहा, अपनी बात कहो। तुम निर्भय होकर अपने मन की बात कह सकते हो।
इस प्रकार प्रोत्साहन मिलने पर, कुत्ते ने कहा, सर्वथा सिद्ध नामक एक भिक्षुक ब्राह्मण ने मेरे सिर को चोटिल किया है, जबकि इसमें मेरा कोई दोष नहीं था।
राम ने तत्काल अपने सेवकों को भेजकर, सर्वथा सिद्ध को बुलवाया। थोड़ी हो देर बाद, जब ब्राह्मण राम के सामने आया, तो राम ने उससे पूछा, आपने इस कुत्ते को क्यों मारा? इसकी क्या गलती थी? क्रोध मनुष्य का सबसे घातक शत्रु होता है। यह उस धारदार तलवार की भाँति होता है जो किसी व्यक्ति के सभी सदगुणों को काट डालता है। क्रोध के कारण व्यक्ति दीर्घ समय में तप से अर्जित किए गये पुण्यों को गँवा देता है। इसीलिए बुद्धिमान लोग मन, कर्म और वचन से क्रोध का त्याग करके स्वयं को इससे मुक्त कर लेते हैं।
हे ब्राह्मण, कोई व्यक्ति अपने वास्तविक चरित्र को ढँकने छुपाने का चाहे कितना भी प्रयास क्यों न करे, परंतु वह अपने वास्तविक चरित्र को कभी भी छुपाए नहीं रह सकता। काम-वासना, क्रोध और लालच को पराजित नहीं करने वाले व्यक्ति के कुकृत्य सदैव उस व्यक्ति को धोखा देते हैं।
ब्राह्मण बोला, मैं भिक्षा माँगने के लिए इधर-उधर विचरण कर रहा था कि तभी पथ के बीचो-बीच बैठा यह कुत्ता मेरे रास्ते में पड़ गया। मैंने इससे कहा रास्ता छोड़ो! परंतु यह इतने धीरे-धीरे उठा कि मैंने अपनी लाठी से इसके सिर पर प्रहार कर दिया। मैं भूखा था, इसलिए मेरा क्रोध आसानी से भड़क गया।
हे राजन्, मैं अपना अपराध स्वीकार करता हूँ। आप मुझे जो भी उचित दंड देना चाहें वह मुझे स्वीकार है, केवल मुझे जीवन की अधम स्थिति में गिरने से बचा लें।
राम अपने मंत्रियों की और मुड़कर बोले, इसका क्या दंड होना चाहिए? न्याय अवश्य किया जाना चाहिए क्योंकि प्रजा के मन में सर्वाधिक आत्म-विश्वास केवल सभी पैदा होता है जबकि सभी कुकर्मियों की निष्पक्ष भाव से दंडित किया जाये।
धार्मिक सिद्धांतों को जानने वाले, भृगु, अंगिरा, वशिष्ठ, कश्यप और अन्य लोगों ने कहा, एक ब्राह्मण को कभी भी दंडित नहीं किया जा सकता है। राज-धर्म को भलीभाँति जानने वाले लोग इस बारे में एकमत हैं। तब भी मेरे प्रिय राम, आप ही सर्वोच्च न्यायाधीश है क्योंकि आप ही इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के भगवान् हैं। आप भगवान् विष्णु है और इस प्रकार आप जो भी कहेंगे वहीं शाश्वत धर्म बन जायेगा।
इसी बिंदु पर, कुत्ते ने बात काटते हुए कहा, हे राजन, आपने पूछा था कि 'मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूँ? यदि आप सचमुच मुझे प्रसन्नता प्रदान करने वाला कार्य करना चाहते हैं, तो कृपा करके इस ब्राह्मण को कालंजर मठ का आचार्य नियुक्त कर दें।
राम ने कुत्ते का अनुरोध पूरा कर दिया और इस प्रकार प्रसन्नचित्त ब्राह्मण सर्वथा सिद्ध को एक आध्यात्मिक नेता बनने का सम्मान मिला और उसे शानदार ढंग से सुसज्जित एक हाथी पर बिठा दिया गया। मंत्रियों ने अत्यधिक चिंतित होकर, विरोध करते हुए कहा, हे राजन, भला यह दंड कैसे हो सकता है। ब्राह्मण को लज्जित करने के बजाय आपने उसे एक उच्च पद पर आसीन कर दिया।
राम ने उत्तर दिया, आप लोग कर्म के नियम की बारीकियों को नहीं समझते हैं, परंतु यह कुत्ता समझता है।
राम द्वारा निर्देश दिए जाने पर, कुत्ते ने कहा, "पिछले जन्म में, मैं कालंजर मठ का प्रमुख था। मैंने देवताओं और ब्राह्मणों की आराधना की, मैंने अपने धार्मिक कार्यों का सावधानीपूर्वक निर्वाह किया और सभी दास-दासियों का अच्छी तरह पालन-पोषण किया, परंतु इतना अधिक ध्यान देने और सजग रहने पर भी, किसी अज्ञात त्रुटि के कारण, अगले जन्म में मुझे कुत्ते की योनि मिली।
अब आप लोग तनिक इस ब्राह्मण के बारे में विचार करें, जो अपने क्रोध पर भी संयम नहीं रख सकता। निश्चित ही वह आचार्य होने के योग्य नहीं है। अपनी अहमंयता के कारण इस पद को स्वीकार करके, वह अपने परिवार की सात पीढ़ियों को पतित कर लेगा। जो व्यक्ति अपने क्रोध को संयमित नहीं कर सकता, भला वह ब्राह्मणों, गायों और श्रीमूर्ति को आराधना करने का प्रभारी बनने योग्य कैसे हो सकता है ? जिस प्रकार स्वतंत्र इच्छा से दिए गये उपहार को वापस लेने वाला व्यक्ति नरक में जाता है, ठीक उसी प्रकार ब्राह्मणों, देवताओं, स्त्रियों या बच्चों से चुराने वाला व्यक्ति भी नरक का भागी बनता है। वास्तव में, देवताओं और ब्राह्मणों से चोरी करने का विचार तक भी व्यक्ति को सबसे अधम नरक में धकेल देता है।
यह कहकर, वह कुत्ता अचानक अंतर्ध्यान हो गया, जबकि राम व राजसभा में बैठे अन्य लोग आश्चर्य से फटी आँखों से यह देखते रह गये। पूर्व जन्म में अत्यन्त उच्च परिवार में जन्म लेने वाला वह प्राणी, इस जन्म में किसी कारण से कुत्ते का शरीर स्वीकारने को बाध्य हुआ था। अयोध्या की राजसभा से जाने के बाद, उस कुत्ते ने अन्न-जल का त्याग करके, बेहतर योनि प्राप्त करने की आशा में अपना देह त्याग कर दिया।
एक दिन, च्यवन ऋषि के नेतृत्व में कुछ ऋषि राम के दर्शन करने आये। उन्होंने राम को मधु नामक दैत्य के पुत्र लवणासुर के बारे में सूचित किया जो उस समय मधुवन में रह रहा था और वहाँ रहने वाले ऋषि-मुनियों को प्रताड़ित करता था। राम ने ऋषियों को आश्वासन दिया कि वह लवणासुर का संहार कर देंगे और तब शत्रुघ्न ने विनती की कि यह कार्य उन्हें सौंपा जाये।
राम ने उनसे कहा, मेरे प्रिय शत्रुघ्न, ऐसा ही हो मैं इसी समय तुम्हें मधुवन का राजा घोषित करता हूँ।
अपनी सेना को भेजने के बाद, शत्रुघ्न ने मधुवन के लिए कूच कर दिया और तीसरे दिन वह वाल्मीकि के आश्रम पहुँच गये। उस रात जब शत्रुघ्न वाल्मीकि ऋषि के आश्रम में ठहरे थे, तभी सीता ने मध्यरात्रि के समय जुड़वा पुत्रों को जन्म दिया। अपने शिष्यों से यह समाचार मिलने पर वाल्मीकि ऋषि वहाँ गये और उन्होंने भूत-प्रेतों को दूर भगाने के लिए कुश घास से कुछ धार्मिक कृत्य किए। वाल्मीकि ने कुछ वृद्ध लोगों को पहले जन्मे पुत्र के शरीर को कुश घास के ऊपरी हिस्से से और बाद में जन्मे पुत्र के शरीर को कुश घास के निचले हिस्से से रगड़ने को कहा। इस प्रकार, बड़े पुत्र का नाम कुश और छोटे पुत्र का नाम लव (अर्थात् "निचला सिरा") पड़ा। भगवान् राम और सीता के जुड़वाँ पुत्र होने का समाचार सुनकर शत्रुघ्न अत्यन्त प्रसन्न हुए।
अगली सुबह, शत्रुघ्न आगे की यात्रा पर निकल पड़े। लवणासुर का वध करने के पश्चात, शत्रुघ्न वहाँ मधुवन में निवास करने लगे और उन्होंने वहाँ एक विशाल नगर का निर्माण किया। बारह वर्ष बीत जाने के बाद शत्रुघ्न ने अयोध्या लौटने का निश्चय किया और मार्ग में वह वाल्मीकि के आश्रम में ठहरे। ऋषि द्वारा अत्यन्त सुखद आतिथ्य सत्कार प्राप्त करने के बाद, शत्रुघ्न वहाँ बैठकर सांगीतिक वाद्य यंत्रों की संगत में लव तथा कुश द्वारा किए जा रहे वाल्मीकि ऋषि की रचना रामायण का पाठ सुनने लगे।
इसकी काव्यात्मक अभिव्यक्ति इतनी मंत्रमुग्धकारी थी और भगवान् राम की आध्यात्मिक लीलाएँ इतनी चित्र सद्दश थी कि शत्रुघ्न की आँखों से आँसू निकल पड़े। यहाँ तक कि अतीत की इन घटनाओं को सुनकर सैनिक भी मंत्रमुग्ध रह गये और उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ मानो सब कुछ दोबारा से उनकी आँखों के सामने घट रहा है।
एक व्यक्ति ने आचर्य प्रकट करते हुए अन्य व्यक्ति से पूछा, यह पाठ कितना सुंदर है। ऐसा जान पड़ता है मानो हम स्वप्न देख रहे हैं। मेरे प्रिय शत्रुघ्न, कृपया वाल्मीकि मुनि से पूछें कि इस शानदार काव्य की रचना किसने की है।
शत्रुघ्न बोले, मेरे प्रिय सैनिको, हमें ऋषिवर से इस बारे में नहीं पूछना चाहिए क्योंकि उनके आश्रम में अनेक सुंदरतम घटनाएँ घटती रहती हैं। हमें इतना अधिक चकित नहीं होना चाहिए और न ही अनावश्यक रूप से उत्सुकता प्रकट करनी चाहिए।
उस रात विश्राम करते समय, शत्रुघ्न के मनो मस्तिष्क में वाल्मीकि ऋषि के आश्रम में सुनी अपने आराध्य भाई की लीलाओं का वर्णन करने वाली मधुर काव्यात्मक अभिव्यक्ति के सिवाय अन्य कोई विचार नहीं आ पाया। अगली सुबह, वाल्मीकि ऋषि से जाने की अनुमति लेकर शत्रुघ्न अयोध्या की ओर चल पड़े और शीघ्र ही अयोध्या पहुँच गये। राजसभा में प्रवेश करने के बाद, शत्रुघ्न को मंत्रियों से घिरे हुए राम स्वर्ग के राजा इंद्र के समान दिखाई दिए।
अपने बड़े भाई के सामने शीश झुकाने के बाद, शत्रुघ्न बोले, मेरे प्रिय राम, मैंने आपका आदेश पूरा करके दुष्ट लवणासुर का वध कर दिया। तभी से मैं मधुपुरी (आधुनिक नाम मथुरा) में निवास कर रहा हूँ और आपकी दया से यह अत्यधिक समृद्ध राज्य बन चुका है।
मेरे प्रिय भाई, पिछले बारह वर्ष तक आपसे दूर रहने के कारण में बहुत उदास हो गया था। मेरी आपसे विनती है कि अब आप मुझे भविष्य में किसी अन्य स्थान जाने का आदेश न देकर यहीं अयोध्या में रहने की अनुमति दें।
राम ने स्नेहपूर्वक शत्रुघ्न को गले से लगाकर कहा, "मेरे प्रिय भाई, आपको इस प्रकार की बात नहीं करनी चाहिए। एक पराक्रमी क्षत्रिय को इस प्रकार दुख प्रकट नहीं करना चाहिए और न ही किसी दूरवर्ती राज्य में रहने के कारण किसी प्रकार की असुविधा प्रकट करनी चाहिए। एक राजा का दायित्व है कि उसे अपनी प्रजा पर धार्मिक सिद्धांतों के अनुसार शासन करना चाहिए, इसीलिए आपको मधुपुरी वापस लौटना होगा। निःसन्देह आप समय-समय पर अयोध्या आकर मुझसे मिल सकते हैं।
मेरे प्रिय शत्रुघ्न आप मुझे अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं। मधुपुरी के लिए प्रस्थान करने से पहले, कृपया सात दिन यहाँ निवास करें।
एक दिन, अयोध्या के बाहर के एक गाँव से एक वृद्ध ब्राह्मण अपने हाथों में अपने मृत पुत्र की देह लेकर राम के राजमहल आया। दुख से पगलाया हुआ वह ब्राह्मण निरंतर रोते हुए चीत्कार करने लगा, ओह मेरे पुत्र अरे मेरे प्रिय पुत्र! पिछले जन्म में आखिर मैंने ऐसा कौन सा भयानक पाप किया था कि मुझे अपने एकमात्र पुत्र को निष्प्राण स्थिति में देखना पड़ रहा है? यह तो अभी शिशु ही है, चौदह वर्ष का भी नहीं हुआ था और अब इसकी माता और मैं दुख के कारण अपने प्राण त्याग देंगे। मैंने भला क्या पाप किया है? मैंने कभी असत्य नहीं बोला और न ही किसी व्यक्ति या जीव-जंतु को कभी कोई ठेस चोट पहुँचाई।
आज से पहले, राम के राज्य में कभी भी किसी माता-पिता का पुत्र उनकी आँखों के सामने नहीं मरा। इसलिए मेरे पुत्र की मृत्यु निश्चित ही स्वयं राम की किसी भूल के कारण हुई है। सभी जानते हैं कि जब राजा अपने दायित्वों का निर्वाह करने में लापरवाह हो जाता है तो ऐसी विपदाएँ टूट पड़ती हैं।
हे राम, आपको मेरे निर्दोष पुत्र को जीवनदान देना होगा, अन्यथा मेरी पत्नी और मैं आपके द्वार पर ही अपने प्राण त्याग देंगे। इस प्रकार आप ब्राह्मणों की हत्या करने के दोषी हो जायेंगे।
हे राजन, आप इक्ष्वाकु वंश के महान शासक होने का दावा करते हैं। भला आप कैसे सुखी व प्रसन्नतापूर्ण जीवन व्यतीत कर सकते हैं जबकि आपके कारण होने वाले बड़े-बड़े पाप कार्य आपका पीछा कर रहे हों?
ब्राह्मण की करुण पुकार सुनकर, राम ने शीघ्र अपने सलाहकारों मार्कण्डेय, मौदगल्य, कश्यप, कात्यायन, जाबालि, गौतम और नारद को बुलवाया। उन महान ऋषियों को आसन पर बिठाने और प्रणाम करने के बाद, राम ने उन्हें वृद्ध ब्राह्मण द्वारा लगाए गये अभियोग के बारे में बताया।
नारदजी बोले, "हे राजन, इस बालक की मृत्यु का कारण मैं आपको बताता हूँ। इसके बाद आप जो भी उचित समझें करें। सतयुग में प्रत्येक व्यक्ति ब्राह्मण होने की योग्यता रखता था और तपस्या करके वे भौतिक बंधनों से मोक्ष प्राप्त करते. थे। उस स्वर्ण युग में बुद्धिमत्ता का राज था और किसी भी व्यक्ति को असमय मृत्यु नहीं होती थी।
इसके बाद, त्रेता युग के आरंभ में चार सामाजिक वर्ण बनाए गये। इनमें से क्षत्रिय लोग लगभग ब्राह्मण होने की योग्यता रखते थे, इसलिए इन दोनों वर्णों को तपस्या करने की अनुमति थी। द्वापर युग में अधार्मिकता बढ़ेगी और इस प्रकार अनेक अनियमितताएँ प्रकट होने लगेंगी। इसलिए छूट के रूप में, वैश्यों को भी तप कार्य करने की अनुमति मिल जायेगी, परंतु शूद्रों को ऐसा करने से सख्त रूप से प्रतिबंधित रखा जायेगा। इसके बाद कलि युग में शूद्रों को भी तप कार्य करने की अनुमति मिल जायेगी, क्योंकि उस पतित युग में व्यवहारतः कोई भी ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य होने के योग्य नहीं रह जायेगा।
मेरे प्रिय राम, इस युग में किसी शुद्र के लिए तप कार्य करना एक गंभीर अपराध है और आपके राज्य में एक व्यक्ति यह अपराध कर रहा है। आपके राज्य में एक शूद्र अत्यन्त कठिन तप साधना कर रहा है और वही इस बालक को मृत्यु का कारण है।
हे राजन, अधार्मिकता किसी राज्य का सबसे बड़ा शत्रु है। इसलिए, जो शासक अधार्मिक व गलत कार्य करने वालों को दंडित नहीं करता उसे नरक में पीड़ा भोगनी पड़ती है। आपको इस अपराधी का तत्काल पता लगाना चाहिए, ताकि धार्मिक सिद्धांतों को अक्षुण्ण रखा जा सके और ब्राह्मण के पुत्र को पुनः जीवनदान मिल सके।
इस सलाह से प्रसन्न होकर, राम ने लक्ष्मण को आदेश दिया, इसी समय राजमहल के द्वार पर जायें। उस ब्राह्मण से कहें कि वह अपने पुत्र को मृत देह पर आवश्यक जड़ी-बूटियाँ मलकर, उसे एक तेल-पात्र में संरक्षित रखे।
राम ने मन ही मन पुष्पक विमान का आवाहन किया और अयोध्या नगरी को लक्ष्मण व भरत की देखरेख में छोड़कर, वह अपराधी की खोज करने निकल पड़े। पश्चिम, उत्तर और पूर्व दिशाओं में देख लेने के बाद, राम ने दक्षिण की यात्रा आरंभ की। दक्षिण दिशा में एक विशाल पर्वत के पास स्थित एक विशाल झील के किनारे, राम को एक तपस्वी दिखाई दिया जिसका सिर नीचे की ओर लटका हुआ था और वह कठिन तप साधना में व्यस्त था।
राम जोर से बोले, कैसी महान तपस्या है। कितना दृढ़ संकल्प है। अरे घोर तपस्वी, तुम कौन हो? मैं दशरथ का पुत्र राम हूँ और तुमने मेरी उत्सुकता बढ़ा दी है। भला किस उद्देश्य को पूरा करने के लिए तुम इतना कठिन कार्य कर रहे हो ? क्या तुम्हें स्वर्ग लोक में स्थान प्राप्त करना है, अथवा तुम्हारा कोई अन्य लक्ष्य है ? क्या तुम एक ब्राह्मण हो, पराक्रमी क्षत्रिय हो, वैश्य हो, या शुद्र हो ? कृपया मुझे सच-सच बताओ।
अपने सिर को नीचे लटकती स्थिति में ही रखकर, उस तपस्वी ने कहा, हे प्रतापी राजन, मैंने एक शूद्र स्त्री के गर्भ से जन्म लिया है। तथापि इस दुर्दशा के बावजूद मैं इस आशा के साथ तपस्या कर रहा हूँ ताकि अगले जन्म में मुझे देवलोक प्राप्त हो सके। मेरा नाम शम्बुक है।
शम्बुक ने अपनी बात पूरी ही की थी कि राम ने यकायक अपनी तलवार खींच निकाली और उसका सिर काट दिया। आकाश लोक से "बहुत अच्छा!" और "साधु साधु!" की पुकार होने लगी और चारों ओर पुष्प वर्षा होने लगी। अत्यधिक प्रसन्न होकर बड़े-बड़े देवतागण राम के समक्ष प्रकट होकर बोले, हे भगवन्, आपने हम पर यह बहुत बड़ा उपकार किया है। यह महान कार्य करके, आपने यह सुनिश्चित कर दिया कि यह शुद्ध धार्मिक सिद्धांतों का उल्लंघन करने की वजह से स्वर्ग लोक को नहीं जा सकेगा।
राम ने इंद्र के सामने दोनों हाथ जोड़कर कहा, हे स्वर्गाधिपति, यदि आप सचमुच मुझसे प्रसन्न हैं, तो कृपा करके ब्राह्मण के पुत्र को जीवनदान दे दें। मेरी गलती के कारण ही उस बालक की मृत्यु हुई, इसलिए मैंने उसके पिता को वचन दिया है कि में उसका जीवन वापस लौटाऊंगा। हे सर्वश्रेष्ठ देवता-गण, कृपा करके मेरे वचन को सत्य करें।
इंद्र ने प्रसन्नतापूर्वक कहा, मेरे प्रिय भगवन्, आप निश्चिंत रहें क्योंकि उस बालक को जीवित कर दिया गया है और वह अपने माता-पिता के साथ हैं। इस शूद्र का सिर कटकर जमीन पर गिरते ही उसे जीवन वापस मिल गया।
बाद में, राम को राजसूय यज्ञ करने की इच्छा हुई, परंतु भरत ने उन्हें ऐसा करने से रोकते हुए कहा, मेरे प्रिय बड़े भाई, पृथ्वी के समस्त राजा-महाराजा आपको अपने पिता के समान मानते हैं। आपको ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए जिससे उन्हें कष्ट हो सभी राजा आपके प्रति पूर्ण आज्ञाकारी हैं और आपको उन्हें उनके विनाश से भयभीत नहीं करना चाहिए।
राम ने प्रसन्नतापूर्वक भरत को सलाह स्वीकार कर ली और तब लक्ष्मण ने प्रस्ताव रखा कि राम अश्वमेध यज्ञ करें। राम ने अपनी सहमति दे दी।
एक दिन महान अगस्त्य ऋषि भगवान् राम के दर्शन करने के लिए राजसभा में आये। उनके साथ वार्तालाप करते हुए, भगवान् राम ने अप्रसन्नता प्रकट करते हुए कहा कि रावण एक ब्राह्मण का पुत्र था इसलिए उसका वध करके उन्हें दुख हुआ है। अगस्त्य ऋषि ने भगवान् राम को आश्वस्त करते हुए कहा कि इसमें उनका कोई दोष नहीं था, परंतु तब भी उन्होंने राम को अथमेध यज्ञ करने का सुझाव दिया।
राम ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और अगस्त्य मुनि से कहा कि वह उनके अस्तबल में जाकर इस यज्ञ के लिए एक उपयुक्त अश्व का चुनाव करें। इसके बाद, समस्त पूजन सामग्री एकत्रित की गई। फिर अगस्त्य मुनि के साथ राम सरयू नदी के तट पर गये। वहाँ पर राम ने सोने के एक हल से यज्ञ का क्षेत्र तैयार किया और अनेक भव्य महल सदृश भवनों का निर्माण कराया। इसके बाद, सभी महान ऋषियों को आमंत्रित किया गया। भगवान् राम के दर्शन करने को उत्सुक नारदजी, असित, पर्वत, कपिल, अंगिरा, व्यास, अत्रि, याज्ञवल्क्य और शुकदेव सहित अगिणत ऋषि-मुनि शीघ्र ही अयोध्या पहुँच गये। भगवान् राम ने उन सभी को उपहार स्वरूप गायें और स्वर्ण प्रदान किया।
इसके बाद, जब सभी ऋषि-मुनि एक साथ बैठ गये, तो भगवान् राम ने विभिन्न विषयों के बारे में उनसे प्रश्न किए जिन पर उन सभी ने राम को निर्देश दिए। कुछ दिन बाद, वशिष्ठ मुनि ने राम को सूचित किया कि चुनौती देने वाले अश्व को मुक्त करने का उचित समय आ गया है। तब राम ने लक्ष्मण को एक उपयुक्त अश्व लाने का आदेश दिया। लक्ष्मण ने सेनापतियों से बात करके, उन्हें चुनौती देने वाले अश्व को सुरक्षा प्रदान के लिए प्रस्थान करने के लिए तैयार रहने का आदेश दिया।
इसके बाद, प्रमुख सेनापति, कालजित आहुति दिए जाने वाले अश्व को लेकर आये। इस अश्व को अत्यन्त सुरुचिपूर्ण ढंग से सुसज्जित किया गया था और तब आवश्यक अनुष्ठान संपन्न किया गया।
शत्रुघ्न को अश्व का संरक्षक निर्दिष्ट किया गया ताकि जिस समय यह अश्व अपनी इच्छा से सम्पूर्ण पृथ्वों का भ्रमण करे, तब वह उसकी रक्षा कर सकें। अंततः, अश्व को मुक्त कर दिया गया। राम ने शत्रुघ्न को अश्व का पीछा करने और इसे बंदी बनाने का प्रयास करने वाले किसी भी व्यक्ति को पराजित करने का आदेश दिया।
भरत के पुत्र, पुष्कल ने भगवान् राम के हाथों से एक तलवार ग्रहण की और शत्रुघ्न के पिछले हिस्से की रक्षा करने के लिए अपनी स्थिति संभाल ली। ठीक इसी समय, राम ने हनुमान से अनुरोध किया कि वह भी साथ ही जायें और शत्रुघ्न की रक्षा करें।
अश्वमेध का अश्व पूर्व दिशा की ओर बढ़ा। यह अश्व अगणित राज्यों से होकर गुजरा, परंतु भगवान् राम की शक्तियों के प्रति आदर भावना के कारण किसी ने भी इसे बंदी बनाने का प्रयास नहीं किया। इसके बाद, अश्वमेध का अश्व अहिच्छत्र राज्य में पहुँचा जिसके शासक का नाम सुमद था। यह अश्व एक सुंदर उद्यान में पहुँचा, तब शत्रुघ्न भी इसके पीछे-पीछे वहाँ पहुँच गये।
शत्रुघ्न ने उस उद्यान के अंदर एक सुंदर मंदिर देखा। उन्होंने अपने मंत्री सुमति से इसके बारे में पूछा। उत्तर में, सुमति ने बताया कि यह राजा सुमद की आराध्य देवी कामाक्षी का मंदिर है और वह राज्य की सुरक्षा के लिए यहीं निवास करती हैं। मंत्री ने शत्रुघ्न को सुझाव दिया कि वह भी देवी की आराधना करें।
शत्रुघ्न ने सुमति से कहा कि वह उन्हें राजा सुमद के बारे में बताएँ और तब मंत्री ने उन्हें यह कथा सुनाई शत्रु राजाओं द्वारा अपने माता-पिता का वध कर दिए जाने पर, सुमद जंगल में चले गये और वहाँ पर उन्होंने भगवान् शिव की पत्नी देवी भवानी का ध्यान करके कठोर तपस्या की।
उनकी तपस्या की शक्ति से भयभीत होकर, इंद्र ने अनेक अप्सराओं के साथ कामदेव को वहाँ भेजा ताकि उनकी तपस्या भंग की जा सके, परंतु दिव्य बालाओं की उपस्थिति से भी राजा की दृढ़ संकल्पशक्ति विचलित नहीं हुई। अंततः, कामाक्षी देवी ने राजा को दर्शन देकर उन्हें सलाह दी कि भविष्य में भगवान् राम का भाई उनके राज्य में अश्वमेध यज्ञ के घोड़े का पीछा करते हुए आयेंगे, तब वह उनका साथी बन जायें।
यह सुनकर शत्रुघ्न प्रसन्न हुए। इसी बीच, राजा सुमद को एक दूत से पता चला कि उनके राज्य में अश्वमेध यज्ञ का एक घोड़ा आया हुआ है। राजा सदैव ही सोचा करते कि "आखिर, कामाक्षी देवी की भविष्यवाणी के अनुसार, भगवान् राम के अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा यहाँ कब आयेगा ?
राजा ने शत्रुघ्न और उनकी सेना के लिए भव्य राजसी स्वागत-सत्कार का प्रबंध किया। उनसे भेंट होने पर, राजा सुमद ने शत्रुघ्न और पुष्कल को एक हाथी पर बिठाया ताकि वे शान से उनकी नगरी में प्रवेश करें। तीन रात तक वहाँ ठहरने के बाद, शत्रुघ्न अश्वमेध के अश्व का पीछा करने के लिए आगे बढ़ गये। वह अश्व जब अगणित ऋषि-मुनियों के निवास स्थानों से होकर आगे बढ़ा, तो शत्रुघ्न ने सर्वत्र अपने बड़े भाई की लीलाओं का गुणगान होते हुए सुना।
एक दिन वह अश्व च्यवन मुनि के आश्रम में चला गया। जब शत्रुघ्न ने आश्रम में प्रवेश किया, तो उन्होंने च्यवन ऋषि को सुकन्या के पास बैठे देखा। शत्रुघ्न ने भगवान् राम के भाई के रूप में अपना परिचय दिया और बातचीत के दौरान शत्रुघ्न ने च्यवन ऋषि को राम के अश्रमेध यज्ञ में आमंत्रित किया और हनुमान को आज्ञा दी कि वह ऋषि को अयोध्या लेकर जायें।
इसके बाद, इधर-उधर विचरण करता हुआ अक्षमेध यज्ञ का अश्व नील पर्वत पर पहुँचा। एक राजा का दमन नामक पुत्र वहाँ शिकार कर रहा था। अश्व को देखते ही, उसने सैनिकों को उसे बंदी बना लेने का आदेश दिया। दमन ने अश्व के सिर पर लगी सूचना पढ़ी, जो इस प्रकार थी दशरथ नामक एक राजा हुए थे। उनके पुत्र का नाम रामभद्र है और वह सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर हैं। उन्होंने इस अश्व को विचरण के लिए मुक्त किया हुआ है और उनके भाई शत्रुघ्न इसकी सुरक्षा कर रहे हैं। जो व्यक्ति स्वयं को महान पराक्रमी योद्धा समझते हैं वे अश्व को बंदी बना सकते हैं, परंतु यह निश्चित है कि शत्रुघ्न आसानी से इसे मुक्त करा लेंगे। अन्यथा, बिना युद्ध किए रामचंद्र के चरणों में शीश नवाएँ।
राजकुमार ने सोचा, क्या केवल राम ही श्रेष्ठ धनुर्धर हैं और हम कुछ नहीं हैं ?
तब उसने अपने सेनापतियों को आदेश दिया कि वे युद्ध के लिए सेनाएँ तैयार करें और वह अश्वमेध के अश्व को अपने राज्य में ले आया। ठीक तभी, अश्व के संरक्षक उस स्थान पर पहुँच गये।
शत्रुघ्न के साथ आये प्रतापागृय नामक एक राजा ने विरोधी सेना की चुनौती स्वीकार की। तब प्रतापागृय और दमन के मध्य भयानक रण छिड़ गया। अंततः, दमन ने प्रतापागृय के हृदय को अपने बाण से वेध दिया और तब उनका सारथी। अचेत राजा को युद्ध क्षेत्र से दूर ले गया।
राजा को पराजित करने के बाद, दमन ने शत्रुघ्न के आने की प्रतीक्षा की। अपनी सेना का नरसंहार देखकर, शत्रुघ्न बहुत क्रोधित हो गये और तब उन्होंने भरत के पुत्र पुष्कल को दमन से युद्ध करने भेजा। भयानक युद्ध के बाद, पुष्कल ने दमन के हृदय को अपने बाण से वेध डाला। दमन को अचेत होते देखकर, सारथी उसे युद्ध क्षेत्र से दूर ले गया और तब उसके सैनिक अपनी सुरक्षा के लिए नगर के अंदर वापस भाग गये।
तब राजा सुबाहु ने युद्धक्षेत्र में प्रवेश किया। उसने अत्यन्त पराक्रम के साथ युद्ध किया, परंतु अंततः वह पराजित हो गया और उसने शत्रुघ्न के सामने आत्म- समर्पण कर दिया।
अश्रमेध यज्ञ के अश्व ने एक बार फिर सम्पूर्ण पृथ्वी का भ्रमण करना आरंभ कर दिया और इस बीच शत्रुघ्न और उनके सहयोगियों ने अनेक राक्षसों के साथ युद्ध किया। इन राक्षसों का नेतृत्व विद्युन्माली कर रहा था जो रावण का मित्र रहा था और इसी कारण से उसकी मृत्यु का बदला लेना चाहता था।
इसके बाद, एक दिन, रेवा नदी के तट पर पहुँचकर अश्व ने पानी में छलाँग लगा दी और फिर पानी की सतह पर वापस नहीं आया। अश्व के संरक्षक असमंजस में पड़ गये कि अब क्या किया जाये। अंततः, शत्रुघ्न वहाँ पहुँचे। सारी घटना सुनने के बाद, वह पुष्कल और हनुमान के साथ जल के अंदर चले गये।
शत्रुघ्न ने नदी के भीतर अनेक मनोहारी उद्यानों वाली एक सुंदर नगरी देखी। उन्हें राम का अश्व भी दिख गया जिसे सोने के एक खूँटे से बाँधा गया था। निकट ही अनेक सुंदर युवतियों से घिरी एक स्त्री एक उच्च आसन पर विराजमान थी। शत्रुघ्न और उनके सहयोगियों को देखकर, उन युवतियों ने रानी से कहा, ये तीनों आपके लिए उत्तम भोजन हैं। ये स्वास्थ व पोषण से भरपूर हैं, इसलिए निश्चित ही इनका रक्त अत्यन्त मधुर होगा।
यह सुनकर रानी हँस पड़ी। तब, शत्रुघ्न, पुष्कल और हनुमान उन रूप से दमकती स्त्रियों के पास पहुंचे और उन्हें आदरपूर्वक प्रणाम किया। रानी बोली, यहाँ आने वाले आप लोग कौन हैं? मेरा क्षेत्र देवगणों तक के प्रवेश के लिए अगम्य है। यहाँ आने वाला व्यक्ति वापस नहीं लौटता। यह अश्व किसका है? कृपया मुझे सारी बात बताएं।
हनुमान ने उत्तर दिया, हम भगवान् रामभद्र के सेवक हैं और यह अश्व उन्हीं का है। वह अश्रमेध यज्ञ की तैयारी कर रहे हैं। अब आपको इस घोड़े को छोड़ देना चाहिए। हम सभी अस्त्र-शस्त्रों के संचालन में निपुण हैं और अश्व को रोककर इसकी यात्रा बाधित करने वाले किसी भी जीव का वध करने के लिए तैयार हैं।
रानी हँसते हुए बोली, मेरे द्वारा रखे गये इस अश्व को कोई भी मुक्त नहीं कर सकता है, परंतु चिंता न करें क्योंकि मैं भी भगवान् राम की सेवक हूँ। अब मैं यह समझ गई हूँ कि यह अश्व राम का है, इसलिए मैं स्वयं को अपराधी महसूस कर रही हूँ। भगवान् राम से मेरी विनती है कि वह मुझे क्षमा करें। आप मुझसे वरदान माँग सकते हैं ताकि आपके राजा मुझसे प्रसन्न हो जायें।
हनुमान बोले, भगवान् राम की दया दृष्टि से हमारे पास सर्व सुख है। तब भी मैं आपसे यह वरदान माँगता हूँ कि प्रत्येक जन्म में राम ही हमारे भगवान् बने रहें।
रानी फिर से हंसकर बोली, आपकी इच्छा निश्चित ही पूर्ण होगी। आगे जाकर, भगवान् शिव से संरक्षण प्राप्त राजा वीरमानी आपके अश्व को बंदी बना लेंगे। आप मुझसे एक शानदार अस्त्र ले जायें जिसकी सहायता से आप उस राजा को परास्त कर पायेंगे। हे शत्रुघ्न, आपको वीरमानी के साथ रथों पर बैठकर एक ही युद्ध करना चाहिए। जब आप इस अस्त्र को चलाएँगे, तो राजा को राम की वास्तविक स्थिति का अहसास हो जायेगा और वह स्वेच्छा से आपको अश्व लौटा देंगे।
शत्रुघ्न ने रानी से वह शानदार अस्त्र ले लिया। इसके बाद, वह अश्वमेध यज्ञ के अश्व को लेकर जल से बाहर निकलकर तट पर आ गये। यह देखकर, नदी के तट पर प्रतीक्षा में बैठे सैनिक अत्यन्त प्रसन्न हुए।
कुछ समय तक इधर-उधर विचरण करने के बाद, उस अश्व ने देवपुर की सीमा में प्रवेश किया। यह शहर इतना अधिक समृद्ध था कि यहाँ के सामान्य नागरिकों के घर भी चांदी से बने थे। यहाँ के राजा वीरमानी थे और उनके पुत्र का नाम रुक्मांगद था।
एक दिन रुक्मांगद अनेक सुंदर स्त्रियों के साथ वन में गया हुआ था। उस मनोहारी परिवेश में कुछ स्त्रियों ने नृत्य करके, तो कुछ स्त्रियों ने गीत गाकर, व अन्य स्त्रियों ने अपने स्नेहपूर्ण आलिंगनों से राजकुमार को प्रसन्न किया। ठीक तभी, अश्वमेध का घोड़ा वहाँ पहुँच गया। उस अश्व को देखकर, स्त्रियों ने अनुरोध किया, मेरे प्रिय राजकुमार, इस सुंदर अश्व को पकड़ लें। देखिए, इसके ललाट पर एक स्वर्ण-पत्र में सूचना भी लिखी है।
रुक्मांगद ने एक ही हाथ से आसानी से अश्व को पकड़ लिया और फिर स्त्रियों को अश्व के ललाट पर लिखी सूचना पढ़कर सुनाई। इसके बाद, वह बोला, यह राम कौन है? मेरे पिता सबसे शक्तिशाली राजा हैं और उन्हें भगवान् शिव का संरक्षण प्राप्त है। इस अश्व को हमारे अस्तबल ले चलो, ताकि मेरे पिता अश्वमेध यज्ञ कर सकें।
इसके बाद, राजकुमार अपनी पत्नियों के साथ राज्य में वापस लौट आया और उसने अपने पिता को वह अश्व उपहार किया। सारी बात सुनने के बाद, अत्यन्त बुद्धिमान राजा वीरमानी ने अश्व लाने के इस कार्य को अपनी सहमति नहीं दी। वास्तव में, राजा ने सोचा कि उनके पुत्र ने एक चोर की भाँति कार्य किया है।
इस अश्व को लेकर, वौरमानी भगवान् शिव के पास परामर्श करने गये। महादेव ने राजा से कहा, तुम्हारे पुत्र ने अच्छा काम किया है। आज एक भीषण युद्ध होगा जिससे मुझे अपने भगवान् राम को देखने का सौभाग्य प्राप्त होगा मैं सदैव उन्हीं का ध्यान करता हूँ। राम भले ही मेरे भगवान् हैं, परंतु तब भी मुझे विश्वास है कि तैंतीस कोटि देवगण मिलकर भी इस अश्व को तुम्हारे पास से नहीं ले जा सकेंगे क्योंकि मैं तुम्हारा संरक्षक हूँ।
इस बीच, शत्रुघ्न को अश्वमेध का अश्व नहीं मिल पाया, तो उन्होंने अपने मंत्री सुमति से इस बारे में पूछा। इस पर सुमति ने उन्हें बताया कि इस राज्य के राजा का नाम वीरमानी है। उन्होंने शत्रुघ्न को सचेत किया कि यहाँ के राजा को स्वयं भगवान् शिव का संरक्षण प्राप्त है।
इधर सुमति जिस समय शत्रुघ्न को यह बता रहे थे, तब दूसरी तरफ राजा वीरमणि अपनी सेना को लामबंद करके, युद्ध की तैयारी कर रहे थे। शीघ्र ही, शत्रुघ्न ने एक विशाल सेना को युद्ध के लिए आगे बढ़ते देखा। सुमति ने शत्रुघ्न को सलाह दी कि पुष्कल को राजा के साथ युद्ध करने दें ताकि आप भगवान् शिव के साथ युद्ध कर सकें।
पहले, रुक्मांगद ने पुष्कल के साथ युद्ध किया। भीषण युद्ध के बाद, पुष्कल ने एक अस्त्र चलाया जिसने रुक्मांगद के रथ को जलाकर राख कर दिया और राजकुमार को अचेत करके रणभूमि में गिरा दिया। अपने पुत्र की पराजय देखकर, वीरमानी क्रोधित होकर बदला लेने की चाह से पुष्कल की ओर बढ़े हनुमान शीघ्र ही वीरमानी की और दौड़ पड़े, परंतु पुष्कल ने उन्हें यह कहकर रोक दिया कि यह शत्रु इतना तुच्छ है कि आपको इसके बारे में चिंतित नहीं होना चाहिए। इस प्रकार, हनुमान रुक गये और वीरमानी का सामना करने के लिए पुष्कल आगे बढ़े।
राजा बोला, “तुम अभी बच्चे हो। मेरे साथ युद्ध करने का प्रयास न करो, क्योंकि मैं बहुत क्रोधित हूँ और रणभूमि में कोई भी मुझे परास्त नहीं कर सकता है।
पुष्कल बोले, आप कहते हैं कि मैं बच्चा है, परंतु मैं कहता है कि आप एक वृद्ध पुरुष हैं। मैंने आपके पुत्र को परास्त कर दिया है और अब मैं अपने अस्त्रों से आपको भी आपके रथ से रणभूमि पर गिरा दूंगा।
इसके बाद, भयानक युद्ध छिड़ गया जिसमें दोनों पक्षों के अगणित लोग मारे गये। पुष्कल और वीरमानी ने अपने अस्त्रों से एक-दूसरे को भीषण रूप से घायल कर दिया, परंतु आखिरकार राजा के सीने पर एक शक्तिशाली बाण से प्रहार हुआ जिसके कारण वह अचेत होकर अपने रथ से रणभूमि पर गिर पड़े। इस प्रकार, पुष्कल ने एक बार फिर विजय प्राप्त की।
अपने भक्तों को पराजित होते देखकर, भगवान् शिव ने वीरभद्र को पुष्कल से और नंदी को हनुमान से युद्ध करने भेजा। भयानक युद्ध के बाद, वीरभद्र द्वारा रथ तोड़ दिए जाने पर पुष्कल रथ से नीचे उतर पड़े। इसके बाद, ये दोनों पराक्रमी योद्धा मुष्ठि युद्ध करने लगे। वास्तव में, यह युद्ध अनेक दिन तक, दिन-रात लगातार चलता रहा।
पाँचवें दिन, वीरभद्र ने पुष्कल को जमीन पर पटक दिया और फिर अपने त्रिशूल से उनका सिर काट दिया।
इस पर भगवान् शिव ने शत्रुघ्न को युद्ध करने के लिए ललकारा और फिर उन दोनों के बीच घमासान रण छिड़ गया जो ग्यारह दिन तक चलता रहा। बारहवें दिन, शत्रुघ्न ने एक ब्रह्मास्त्र चलाया, परंतु इसकी प्रतिक्रिया में भगवान् शिव ने एक भयानक बाण चलाकर शत्रुघ्न का सीना वेध डाला। इसके कारण शत्रुघ्न अचेत हो गये और तब हनुमान क्रोध से भरकर भगवान् शिव से युद्ध करने पहुँचे।
हनुमान बोले, हे रुद्र, आप धार्मिक सिद्धांतों के विरुद्ध आचरण कर रहे हैं। मैंने तो यह सुना था कि आप सदैव भगवान् राम के चरण-कमलों का ध्यान किया करते हैं। परंतु अब मैं देख रहा हूँ कि यह मात्र एक मिथ्या प्रचार था ! इस धोखाधड़ी के लिए, मैं आपको आज ही रणभूमि में गिरा दूँगा।
यह कहकर, हनुमान ने एक विशाल चट्टान से प्रहार करके भगवान् शिव के रथ को चकनाचूर कर दिया। तब नंदी भगवान् के पास आये और उनसे अपनी पीठ पर बैठ जाने का अनुरोध किया। तब भगवान् शिव ने हनुमान पर अपने त्रिशूल से प्रहार किया, परंतु हनुमान ने इसे पकड़कर चूर-चूर कर दिया। युद्ध आगे बढ़ने पर, दोनों ने एक-दूसरे पर ढेरों अस्त्र-शस्त्रों से प्रहार किया। अंततः, हनुमान भगवान् शिव को अपनी पूंछ से लपेटकर बाँध दिया और उन पर चट्टानों, पर्वतों ने व वृक्षों की वर्षा करने लगे। यह देखकर, नंदी भयभीत हो गये और भगवान् शिव भी असमंजस में पड़ गये।
भगवान् शिव ने हनुमान से कहा, तुमने अत्यन्त शीर्यपूर्ण कार्य किया है। मैं तुमसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ, इसलिए मैं चाहता हूँ कि तुम मुझसे एक वरदान माँगी।
हनुमान ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, भगवान् राम की दया से, मेरे पास वह सब कुछ है जो मुझे चाहिए। तब भी मैं आपसे यह माँगता हूँ पुष्कल की मृत्यु हो गई है और शत्रुघ्न अचेत हैं। कृपया उन सभी हताहत योद्धाओं की रक्षा करें ताकि कोई भूत-प्रेत, गिद्ध या जीव-जंतु उनकी देह को खाने के लिए वहाँ से न ले जा पाए। मैं प्राण लौटाने वाली जड़ी-बूटियों से भरपूर द्रोण पर्वत को लेने जा रहा हूँ।
भगवान् शिव ने सहमति दे दी। तब हनुमान शीघ्र ही क्षीर सागर की ओर चल पड़े और वहाँ पहुँचकर उन्होंने द्रोण पर्वत को उठाया और रणभूमि में लौट आये। द्रोण पर्वत की रक्षा करने वाले देवताओं ने क्रोधित होकर अपने अस्त्र-शस्त्र चलाकर हनुमान पर प्रहार किया, परंतु पवन पुत्र ने उन सभी को आसानी से भगा दिया और तब वे रक्षक इंद्र की शरण में गये। जब स्वर्ग के राजा इंद्र ने हनुमान के कारनामों के बारे में सुना, तो उन्होंने देवताओं को आदेश दिया कि ये उस उत्पाती वानर को बाँधकर बंदी बनाएँ और उसे यहाँ लेकर आयें।
तब देवताओं ने हनुमान पर आक्रमण कर दिया, परंतु हनुमान ने उन्हें आसानी से पराजित कर दिया। पराजित देवगण इंद्र के पास लौट आये और उन्होंने इंद्र को सारी घटना के बारे में बताया, तो स्वर्ग के राजा इंद्र भयभीत हो उठे और उस वानर की पहचान जानने के लिए वह बृहस्पति के पास गये।
बृहस्पति ने इंद्र से कहा, वह रावण तथा कुंभकर्ण का वध करने वाले भगवान् का सेवक है। उसका नाम हनुमान है जिसने अपनी पूँछ से लंका नगरी को जला डाला था। वह द्रोण पर्वत को इसलिए ले जाना चाहते हैं ताकि रणभूमि में मृत पड़े योद्धाओं को पुनः जीवित कर सकें। यदि आप हनुमान से एक सौ वर्ष तक भी युद्ध करेंगे, तब भी उन्हें परास्त नहीं कर पायेंगे। उन्हें जिन जड़ी-बूटियों की आवश्यकता है, वह उन्हें दे दें।
यह सुनकर, इंद्र का भय दूर हो गया। इसके बाद, इंद्र व अन्य देवताओं के साथ बृहस्पति हनुमान के पास गये। बृहस्पति ने देवताओं की ओर से हनुमान से क्षमा माँगी और फिर हनुमान से अनुरोध किया कि वह अपना क्रोध त्याग दें।
रणभूमि में लौटकर, हनुमान पुष्कल के पास गये और उनके सीने पर जड़ी-बूटियाँ लगाई और भगवान् राम से प्रार्थना की कि वह उन्हें पुनः जीवित कर दें। पुष्कल उठ खड़े हुए और क्रोध से पूछा कि वीरभद्र कहाँ है। इसके बाद, हनुमान शत्रुघ्न के पास पहुँचे और पुनः राम से प्रार्थना करते हुए उनके सीने पर जड़ी- बूटियों का लेप लगाया। शत्रुघ्न तत्काल उठ खड़े हुए और उन्होंने पूछा, "भगवान् शिव कहाँ हैं ?"
इसके बाद, हनुमान ने सभी घायल व मृत सैनिकों पर जड़ी-बूटियों का लेप लगाया और तब एक बार फिर युद्ध आरंभ हो गया। पुष्कल ने वीरभद्र पर आक्रमण कर दिया, हनुमान ने नंदी से और शत्रुघ्न ने भगवान् शिव से युद्ध आरंभ कर दिया।
राजा वीरमानी ने भगवान् शिव की ओर बढ़ते शत्रुघ्न को रोक दिया। इसके बाद, दोनों के बीच घमासान युद्ध छिड़ गया, परंतु तभी शत्रुघ्न को भगवान् राम की भक्तिन द्वारा दिए गये अस्त्र की याद आई। उस दिव्य अस्त्र ने वीरमानी का सीना वेध दिया और वह अचेत होकर गिर पड़े। जब भगवान् शिव राजा की सहायता करने आये, तो शत्रुघ्न ने उन पर आक्रमण कर दिया।
इसके बाद, एक-दूसरे पर भयानक अस्त्र-शस्त्र चलाकर शत्रुघ्न और भगवान् शिव के बीच जो युद्ध छिड़ा, वैसा युद्ध आज तक कभी भी देवताओं और राक्षसों के मध्य भी नहीं देखा गया था। अंततः, शत्रुघ्न इतने घायल हो गये कि हनुमान ने उन्हें भगवान् राम का स्मरण करने को कहा।
शत्रुघ्न ने प्रार्थना की, “हे मेरे भगवन और मेरे भाई, भगवान् शिव इस युद्ध में मेरे प्राण हरने पर तुले हुए हैं। आप कृपा करके अपने धनुष से मेरी रक्षा करें। "हे राम, असंख्य भक्तजनों ने आपके पवित्र नाम का जाप करने मात्र से जन्म और मृत्यु का भवसागर पार कर लिया है।
ठीक तभी रणभूमि पर भगवान् राम प्रकट हो गये। अपने बड़े भाई को देखकर, शत्रुघ्न आश्चर्यचकित रह गये। भगवान् शिव वहाँ आये और राम के चरण कमलों में गिर गये और उनकी प्रार्थना करते हुए उनसे क्षमायाचना करके कहने लगे कि उन्होंने अपने भक्तों की खातिर ही यह युद्ध किया है। उन्होंने भगवान् राम को आश्वस्त किया कि राजा वीरमानी अब उनके अश्वमेध का अश्व लौटा देंगे।
भगवान् राम बोले, "देवताओं का यह कर्तव्य है कि वे अपने भक्तों की रक्षा करें, इसलिए आपने जो किया उसमें कुछ भी गलत नहीं है। हे शिव, आप मेरे हृदय में निवास करते हैं और मैं आपके हृदय में बसता हूँ। हमारे बीच कोई अंतर नहीं है। सिर्फ दुष्टमति मूर्ख ही हमारे बीच में विभेद करते हैं।
इसके बाद, राम ने वीरमानी का स्पर्श करके उन्हें पुनः जीवित किया। तब, राजा अश्रमेध यज्ञ के अब को लेकर वापस आया और भगवान् शिव के आग्रह पर उन्होंने अपना सम्पूर्ण राज्य भगवान् राम को सेवा के लिए अर्पित कर दिया। भगवान् राम ने उनकी प्रशंसा की और यकायक अंतर्ध्यान हो गये।
अश्वमेध यज्ञ का अश्व जब पृथ्वी भ्रमण के लिए वहाँ से आगे बढ़ा, तो राजा वीरमानी भी अपनी सेना के साथ शत्रुघ्न के साथ चल पड़े। इसके बाद, एक दिन अत्यन्त विचित्र घटना घटित हुई। अश्रमेध यज्ञ का अश्व अचानक एक मूर्ति की भाँति अपनी जगह पर रुक गया और वहाँ से हिला ही नहीं। रक्षकों ने अश्व को चाबुक लगाए, परंतु तब भी वह अपनी जगह पर अड़ा रहा। जब शत्रुघ्न को इस बारे में सूचित किया गया, तो उन्होंने पुष्कल से अश्व को उठाने को कहा। तब भी, अश्व जस का तस रहा। तब हनुमान ने जाकर अश्व को घसीटा, परंतु यह मूर्तिवत खड़ा रहा।
शत्रुघ्न अपने मंत्री, सुमति के पास गये और उनसे इस विचित्र घटना के बारे में पूछा। सुमति ने कहा कि निश्चित ही ऐसा किसी शक्तिशाली ऋषि के चमत्कार के कारण हुआ है तब सैनिकों को उस ऋषि की खोज में भेजा गया और अंततः, बहुत दूर जाकर एक आश्रम का पता चला।
शत्रुघ्न को बताया गया कि ऋषि शौनक का आश्रम पास में ही है हनुमान, पुष्कल व अन्य लोगों के साथ वह वहाँ गये और तब ऋषि ने उनका आदर-सत्कार किया और उनके आगमन का कारण पूछा। उत्तर में शत्रुघ्न ने बताया कि किस प्रकार अश्वमेध यज्ञ का अश्व अचल हो गया है।
एक क्षण तक ध्यान लगाने के बाद, शौनक बोले, बहुत समय पहले, सात्त्विक नामक एक महान ऋषि हुए थे जो कावेरी नदी के तट पर तप कार्य किया करते थे। एक बार, सात्त्विक ऋषि के सामने मृत्यु प्रकट हुई और उन्हें मेरु पर्वत के शिखर पर ले गई। वहाँ पर एक विशाल जम्बू वृक्ष था और उसके पास हो जम्बू नदी प्रवाहित होती थी। वहाँ पर सात्त्विक ऋषि ने अनेक दिव्य युवतियों के साथ अपनी इच्छा से आनन्द-भोग किया।
परंतु स्वयं पर अत्यधिक घमंड हो जाने के कारण, उन्होंने अभिमानपूर्वक उन युवतियों का अपमान किया, जिसके परिणामस्वरूप ऋषियों के शाप से वह एक राक्षस बन गये। जब उन्होंने क्षमा-याचना की, तो ऋषियों ने उनसे कहा कि जब आप राम के अश्रमेध यज्ञ के अश्व को अचल बना देंगे, तब आप राम की लीलाएँ सुन पायेंगे। राम की लीलाएँ सुनने के बाद, आप हमारे शाप से मुक्त हो जायेंगे।
इस प्रकार, शौनक ऋषि ने शत्रुघ्न से वापस जाकर उस राक्षस को राम की लीलाएँ सुनाने और इस प्रकार उन्हें ऋषियों के शाप से मुक्त करने को कहा। शत्रुघ्न ने वापस जाकर, अश्वमेध के अश्व के सामने राम की लीलाओं का गुणगान किया और तभी उन्होंने देखा कि एक दिव्य जीव एक विमान में बैठकर स्वर्ग लोक को जा रहा है। उस जीव ने कहा, राम की लीलाएं सुनकर मैं ऋषियों के शाप से मुक्त हो गया हूँ, इसलिए अब आपकी कृपा से मैं अपने दिव्य धाम को वापस लौट रहा हूँ।
उसी समय, अश्वमेध का अश्व अपनी जड़ता से मुक्त हो गया और फिर से पृथ्वी पर विचरण करने के लिए आगे बढ़ गया। इस प्रकार, अश्वमेध यज्ञ के अश्व को भ्रमण करते हुए सात माह बीत गये, तब वह अब सुरथ के राज्य में पहुँचा। सुरथ भी राम का अनन्य भक्त था। राजा के सेवकों ने जब अश्व को देखा, तो उन्होंने अपने स्वामी को इसकी सूचना देकर कहा, यह अश्व अयोध्या के राजा राम का है। यह अत्यन्त आकर्षक है, इसलिए आप इसे बंदी क्यों नहीं बना लेते ?
सुरथ ने आदेश दिया, यह हमारा महान सौभाग्य है कि हमें भगवान् राम के दर्शन प्राप्त होंगे। मैं इस अश्व को बंदी बना लूँगा और राम के यहाँ आने पर ही इसे मुक्त करूँगा। इस प्रकार, मेरे जीवन का लक्ष्य पूरा हो जायेगा।
राजा के सेवकों ने उस अश्व को पकड़कर बंदी बना लिया। इस बारे में पता चलते ही, शत्रुघ्न ने उस राज्य के राजा के बारे में सुमति से पूछा। सुमति ने उत्तर में कहा कि राजा सुरथ राम के एकनिष्ठ भक्त हैं और उन्होंने शत्रुघ्न को सलाह दी कि वे अंगद को अपना दूत बनाकर उनके पास भेजें।
इस प्रकार, अंगद राजा सुरथ को राजसभा में पहुँचे और उन्हें अश्रमेध यज्ञ का अश्व वापस कर देने की सलाह दी।
राजा सुरथ बोले, "मैंने जान-बूझकर भगवान् राम के अश्व को बंदी बनाया है और मैं इसे शत्रुघ्न के भय से वापस नहीं करूँगा। यदि राम स्वयं यहाँ आयें, तो मैं न सिर्फ अश्व वापस कर दूंगा बल्कि अपना सम्पूर्ण राज्य उनकी सेवा में अर्पित कर दूँगा। यदि राम यहाँ नहीं आते, तो मैं आसानी से शत्रुघ्न और उसके सहयोगियों को परास्त कर दूँगा।
यह सुनकर, अंगद जोर से हंसे और बोले, वृद्ध हो जाने के कारण आपकी मति भ्रष्ट हो गई है! आप शत्रुघ्न और उनके भाई के पुत्र पुष्कल को कमतर करके आँक रहे हैं। ऐसे में, भला हनुमान की शक्ति के बारे में क्या कहना ? उनकी तुलना में आप एक मच्छर के समान हैं। यदि आप अपना और अपने पुत्रों का कल्याण चाहते हैं, तो इसी समय अश्व को लौटा दें।
परंतु स्वयं को हनुमान से भी अधिक शक्तिशाली मानकर, राजा सुरथ अपनी हठ पर अड़े रहे। तब अंगद शत्रुघ्न के पास वापस लौट आये और उन्हें पूरी बात बता दी।
इसके बाद, भीषण युद्ध छिड़ गया। सुरथ के पुत्र चंपक ने पुष्कल के साथ युद्ध किया। अत्यन्त पराक्रम से युद्ध करते हुए, चंपक ने पुष्कल के सीने पर एक बाण चलाकर उन्हें बाँध दिया। इसके बाद, चंपक ने पुष्कल का रथ छीन लिया। यह देखकर, शत्रुघ्न ने हनुमान को आदेश दिया कि वह पुष्कल को मुक्त करें और इसके बाद छिड़े भीषण रण में चंपक ने सभी को चकित करते हुए हनुमान के आक्रमणों को निष्फल कर दिया।
क्रुद्ध होकर, हनुमान ने चंपक की बाँह पकड़ ली और उसे आकाश में ले गये। चंपक ने वहां भी अत्यन्त पराक्रम के साथ युद्ध किया, परंतु अंततः हनुमान ने उसका पैर पकड़कर उसे जमीन पर पटक दिया जिसके कारण राजकुमार अचेत हो गया। यह पराक्रम दिखाने के बाद, हनुमान ने पुष्कल को चंपक के बंधनों से मुक्त कर दिया।
सुरथ ने कुपित होकर, हनुमान को ललकारा और अनगिनत बाणों से उन्हें वेध डाला। तब हनुमान ने धावा बोलकर, सुरथ का धनुष छीन लिया और उसके टुकड़े टुकड़े कर दिए। परंतु सुरथ बार-बार नया धनुष उठा लेते और हनुमान बार-बार उनका धनुष तोड़ देते और इस प्रकार हनुमान ने उनके अस्सी धनुष तोड़ डाले।
तब सुरथ ने हनुमान पर शक्ति नामक अस्त्र से प्रहार किया। प्रतिक्रिया में, हनुमान ने राजा का रथ उठा लिया और उसे समुद्र की ओर लेकर जाने लगे। सुरथ ने अपनी गदा से हनुमान के सीने पर भीषण प्रहार किया जिसके कारण हनुमान के हाथ से रथ छूट गया और जमीन पर गिरकर चकनाचूर हो गया। तब सुरथ एक नए रथ पर सवार हो गये, परंतु हनुमान ने उसे भी तोड़ डाला। इस प्रकार, उनचास (49) रथों को तोड़ डालने पर भी युद्ध जारी रहा।
तव, सुरथ ने क्रुद्ध होकर पशुपत अस्त्र चला दिया जिसके कारण अचानक अगणित भूत-प्रेत, चुड़ैलें और पिशाच प्रकट हो गये। वास्तव में, भगवान् शिव के उस अस्त्र से हनुमान बँध गये, परंतु भगवान् राम का स्मरण करके उन्होंने आसानी से अपने बंधनों को तोड़ दिया।
अंततः, सुरथ ने अपने धनुष पर भगवान् राम का एक बाण चढ़ाकर चला दिया। हनुमान उस बाण से बंध गये, परंतु अपने स्वामी के प्रति आदर की भावना के कारण हनुमान ने स्वयं को उस बाण से मुक्त करने का कोई प्रयास नहीं किया। तब पुष्कल सामने आये और उन्होंने सुरथ पर आक्रमण कर दिया और घमासान युद्ध के बाद राजा ने उन्हें अचेत करके रणभूमि पर गिरा दिया। अंततः, शत्रुघ्न रणभूमि में आये और उन्होंने सुरथ को ललकारा।
भीषण संग्राम के बाद, सुरथ ने शत्रुघ्न के सीने पर एक बाण चलाकर उन्हें अचेत कर दिया। यह देखकर, शत्रुघ्न के साथ आये योद्धा भाग गये। तब सुग्रीव ने सुरथ को ललकारा, परंतु शीघ्र ही राजा ने भगवान् राम के एक बाण से सुग्रीव की भी बाँध दिया।
इसके बाद, सुरथ ने अपनी राजसभा में हनुमान से कहा, कृपा करके अपने भक्तों की रक्षा करने वाले भगवान् राम का स्मरण करें, ताकि वह यहाँ आकर आपको मुक्त कर सकें। अन्यथा, अनेक वर्ष बीत जाने पर भी मैं आपको मुक्त नहीं करूँगा।
हनुमान ने भगवान् राम की प्रार्थना करके उनसे स्वयं को मुक्त करने की विनती की। अपनी प्रार्थना के अंत में वह बोले, "हे भगवन मैं सुरथ के वाण से बंधा हुआ हूँ। यदि आप यहाँ आकर मुझे मुक्त नहीं करेंगे, तो संसार के समस्त प्राणी हमारा मजाक उड़ाएँगे, इसलिए कृपया विलंब न करें।
भगवान् राम तत्काल लक्ष्मण और भरत के साथ पुष्पक विमान पर सवार होकर वहाँ पहुँच गये। राम के आते ही, सुरथ ने सैकड़ों बार उन्हें प्रणाम किया और उनका आलिंगन किया। तब राम ने अपने प्रिय भक्तों को उनके बंधनों से मुक्त किया और सभी अचेत योद्धागणों की चेतना शीघ्र ही लौट आई। यह कार्य संपन्न हो जाने पर, सुरथ ने प्रसन्नतापूर्वक राम को अश्वमेध यज्ञ का अश्व लौटा दिया और उनके क्षमा याचना की। अंततः, सुरथ के राजमहल में तीन दिन तक रहने के बाद, भगवान् राम पुष्पक विमान में बैठकर अयोध्या नगरी को लौट गये।
इसके बाद, सुरथ ने चंपक को राज्य का कार्यभार सौंप दिया और वह स्वयं राम के अश्वमेध यज्ञ के अश्व की सुरक्षा के लिए शत्रुघ्न के साथ आगे की यात्रा पर चल पड़े। अपनी इच्छा से विचरण करता हुआ, वह अश्व अंततः वाल्मीकि मुनि के आश्रम पहुँचा।
उस समय, सीता का पुत्र, लव अनेक ऋषियों के साथ वन में ईंधन के लिए लकड़ियाँ एकत्रित कर रहा था कि तभी उसकी नजर अश्वमेध के अश्व पर पड़ी। लव उस अश्व के पास गया और उसके मस्तक पर लगी सूचना पढ़ने पर वह क्रोध से ऋषियों से बोला, तनिक इस क्षत्रिय का अहंकार तो देखिए! यह राम कौन है ? शत्रुघ्न कौन है ? ये अल्प शक्ति रखने वाले कीटों के समान हैं!
यह कहकर, लव ने उस अश्व को अपने अधिकार में ले लिया। शीघ्र ही उस अश्व के रक्षक वहाँ पहुँच गये और उन्होंने देखा कि किसी ने इसे अपने अधिकार में ले लिया है। लव ने बाणों की वर्षा करके उन रक्षकों को वहाँ से भगा दिया और तब अब के वे रक्षक शत्रुघ्न की शरण में पहुँचे।
शत्रुघ्न को अपने सैनिकों से जब यह पता चला कि अक्षमेध यज्ञ के अश्व को एक बालक ने बंदी बना लिया है जिसकी शक्ल राम से मिलती-जुलती है, तो शत्रुघ्न ने शीघ्र ही अपने सेनापति कालजित को एक सेना के साथ वहाँ भेजा। कालजित ने वहाँ जाकर लव को ललकारा।
भीषण युद्ध के बाद, लव ने अपनी तलवार से कालजित का सिर काट दिया। बचे हुए सैनिक शत्रुघ्न को अपने सेनापति की मृत्यु और सेना की पराजय का समाचार देने गये। तब शत्रुघ्न ने पुष्कल को युद्ध करने भेजा घमासान युद्ध के बाद, लव के बाण ने पुष्कल के सीने को वेध दिया और वह अचेत होकर अपने रथ से रणभूमि पर गिर पड़े।
इसके बाद, शत्रु को चुनौती देने के लिए हनुमान आगे बढ़े युद्ध करते समय हनुमान को अहसास हुआ कि लव को पराजित करना उनके लिए संभव नहीं है, इसलिए उन्होंने मूर्च्छित होने का बहाना किया ताकि उनकी जगह पर शत्रुघ्न युद्ध कर सकें। लव के सामने आने पर शत्रुघ्न ने देखा कि वह बालक ठीक वैसा ही दिखता था जैसे कि बचपन में राम दिखते थे। इसके बाद छिड़े युद्ध में, लव ने शत्रुघ्न को अपने प्रहार से अचेत कर दिया और वह अपने रथ पर ही गिर पड़े। तब सुरथ, वीरमानी व अन्य राजागण युद्ध करने उत्तर पड़े। परंतु शीघ्र ही शत्रुघ्न की चेतना लौट आई और वह एक बार फिर लव से युद्ध करने आगे बढ़े।
जब शत्रुघ्न ने एक तेजोमय बाण को अपने धनुष की प्रत्यंचा पर चढ़ाया, तो लव को अपने भाई कुश की याद आ गई और वह सोचने लगा, यदि मेरा भाई यहाँ होता, तो मुझे इस शत्रुघ्न से इतनी परेशानी नहीं हुई होती।
इस बाण ने लव के सीने पर प्रहार किया और वह अचेत होकर गिर पड़ा। शत्रुघ्न ने अचेत हो गये लव को उठाकर अपने रथ पर रखा और तभी वाल्मीकि मुनि के कुछ शिष्यों ने जाकर सीता को सारी बात बता दी। अपने पुत्र को बंदी बना लिए जाने की बात सुनकर, सीता जमीन पर गिरकर रोने लगीं।
ठीक तभी कुछ ऋषियों के साथ एक तीर्थस्थल के दर्शन करने को गये कुश वाल्मीकि के आश्रम में लौट आये। अपनी माता को दुख से भाव-विह्वल स्थिति में देखकर, कुश ने इसका कारण पूछा, परंतु अपनी माता से सारी घटना का पता चलने पर वह शत्रुओं का सामना करने निकल पड़े।
इसके बाद, शीघ्र ही शत्रुघ्न और कुश के बीच युद्ध छिड़ गया। जल्दी ही, एक शक्तिशाली बाण से शत्रुघ्न का सीना विंध गया और वह अचेत होकर रणभूमि पर गिर गये। तब, कुश से युद्ध करने के लिए हनुमान आये, परंतु शीघ्र ही वह भी अचेत हो गये। इसके बाद सुग्रीव ने कुश से युद्ध किया, परंतु कुश ने उन्हें अपने बाणों से बाँध दिया।
इसके बाद, लव और कुश ने हनुमान व सुग्रीव को बाँध दिया और उन्हें घसीटते हुए वाल्मीकि मुनि के आश्रम में ले आये जब सीता ने देखा कि उनके पुत्रों ने हनुमान व सुग्रीव को बाँध रखा है, तो वह उन पर हँस पड़ी। तब उन्होंने अपने पुत्रों से कहा, इन वानरों को इसी समय खोल दो यदि इन्होंने मुझे अपने पर हँसते हुए देख लिया, तो ये लज्जा से मर जायेंगे। यह हनुमान हैं और यह सुग्रीव हैं।
फिर, सीता ने लव व कुश से कहा कि उन्हें राम के अश्वमेध के अश्व को बंदी नहीं बनाना चाहिए था। सीता ने उन्हें यह भी बताया कि राम ही उनके पिता हैं। इसके उत्तर में, लव व कुश बोले कि भले ही पुत्र अपने पिता से युद्ध करें, या शिष्य अपने गुरु से युद्ध करें, परंतु यदि वे क्षत्रिय हैं, तो ऐसा करना उनके लिए पाप नहीं है। इसके बावजूद, लव व कुश ने अपनी माता की आज्ञा का पालन करते हुए हनुमान व सुग्रीव को मुक्त कर दिया और साथ ही अश्वमेध यज्ञ के अश्व को भी मुक्त कर दिया। इसके बाद, सीता ने राम से शत्रुघ्न को चेतना वापस लौटाने की प्रार्थना की और शीघ्र ही शत्रुघ्न को होश आ गया।
इसके बाद, सुमति ने शत्रुघ्न को सलाह दी कि अब अश्व मुक्त हो गया है. इसलिए उन्हें यथाशीघ्र अयोध्या वापस लौट जाना चाहिए। अश्वमेध यज्ञ के अक्ष के वापस लौटने का समाचार पाकर, राम ने लक्ष्मण को अपने भाई शत्रुघ्न और उनके सहयोगियों तथा अश्व का स्वागत करने के लिए भेजा।
इसके बाद, राम ने स्नेहपूर्वक शत्रुघ्न व पुष्कल को गले से लगाया और वे दोनों राम के चरण-कमलों में झुक गये। अंततः, राम के अनुरोध पर, सुमति ने अश्वमेध यज्ञ के अश्व द्वारा सम्पूर्ण पृथ्वी का चक्कर लगाने के दौरान घटी घटनाएँ संक्षेप में बता दीं।
पूरा घटनाक्रम सुनते ही, राम यह समझ गये कि वाल्मीकि मुनि के आश्रम में रहने वाले वह दोनों बालक उन्हीं के पुत्र हैं। इसके बाद, राम वाल्मीकि मुनि के आश्रम गये और उनसे दोनों बालकों के बारे में पूछा। इसके उत्तर में, वाल्मीकि बोले, हे भगवन, आप तो सभी प्राणियों के हृदय में वास करते हैं, तब भला आप इस बारे में क्यों नहीं जानते ?
इसके बाद, वाल्मीकि ने लक्ष्मण द्वारा सीता को वन में छोड़ दिए जाने के बाद की सारी कथा राम को सुना दी। साथ ही, उन्होंने यह भी बताया कि उन्होंने किस प्रकार रामायण की रचना की और फिर लव व कुश को इसकी शिक्षा दी। इसके बाद, उन्होंने राम से अनुरोध किया कि वह अपने पुत्रों सहित सीता को अयोध्या वापस ले जायें। तब यह निश्चय हुआ कि सीता को वापस ले जाने के लिए राम अपने भाई लक्ष्मण को वहाँ भेजेंगे और फिर अश्वमेध यज्ञ में सीता आईं और राम की बगल में बैठीं।
अगस्त्य मुनि ने राम के हाथ में अश्व की बलि चढ़ाने के लिए तलवार दी और जैसे ही राम ने तलवार से अश्व के गले का स्पर्श किया वैसे ही अब ने दिव्य रूप धारण कर लिया और वह एक दिव्य विमान में आरूढ़ हो गया। इस बारे में राम द्वारा पूछे जाने पर उस दिव्य पुरुष ने कहा, पिछले जन्म में, मैं एक धर्मात्मा ब्राह्मण था, परंतु बाद में मैं धर्म के विरुद्ध आचरण करने लगा। वास्तव में, मैं अत्यन्त पाखंडी हो गया क्योंकि मैं धर्म का गलत ढंग से आचरण करने लगा था।
एक दिन, दुर्वासा मुनि उस नदी के तट पर आये जहाँ पर मैं लोगों को मूर्ख बनाने के लिए झूठी, पाखंडपूर्ण तप साधना कर रहा था। मैंने ऋषि का स्वागत नहीं किया और न ही उनकी स्तुति-वंदना की। इस पर दुर्वासा मुनि ने क्रोधित होकर मुझे शाप देते हुए कहा, 'तुम पाखंडी हो। इसलिए, जाओ, तुम एक पशु बन जाओ। यह सुनकर मैं होश में आया और मैंने ऋषि के पाँव पकड़ लिए। तब उन्होंने मुझसे कहा, 'तुम भगवान् राम के अश्वमेध यज्ञ के अश्व बनोगे। जैसे ही वह तुम्हारा स्पर्श करेंगे, वैसे ही तुम दिव्य पुरुष बन जाओगे, यह कहकर, वह दिव्य पुरुष स्वर्ग लोक को चले गये।
इसी बीच, वाल्मीकि मुनि ने लव व कुश को बुलाकर, उन्हें निर्देश देते हुए कहा, अब मैं चाहता हूँ कि तुम दोनों सम्पूर्ण संसार में रामायण का पाठ करते हुए भ्रमण करो। तुम दोनों ब्राह्मणों के घरों में, ऋषियों के आश्रमों में और महान राजाओं के राजमहलों में जाओ। नगरों की गलियों में घूमते हुए रामायण का गान करो और सम्पूर्ण आर्यावर्त का भ्रमण करो।
परंतु मैं चाहता हूँ कि तुम दोनों सबसे पहले अयोध्या जाओ। यदि राम तुम दोनों से ब्राह्मणों की सभा में रामायण का पाठ करने को कहें, तो उनकी आज्ञा का पालन करना। परंतु इसका पाठ करने के बदले में कुछ भी ग्रहण न करना, केवल यही कहना कि फलों और कंद-मूलों का सेवन करने वालों को भला स्वर्ण की क्या आवश्यकता ?
यदि राम तुमसे यह पूछें कि तुम किसके पुत्र हो ?' तब कहना, 'हम वाल्मीकि मुनि के शिष्य है।' रामायण के छंदों का अत्यन्त मधुर स्वर में पाठ करना और इस बात का ध्यान रखना कि तुम दोनों की किसी भी बात से राजा को ठेस न पहुँचे, क्योंकि वह समस्त जीवधारियों के लिए पिता समान है।
तब लव और कुश बोले, हम आपकी आज्ञा का अक्षरश: पालन करेंगे
उस रात वह दोनों वाल्मीकि मुनि के आदेश को अपने हृदय में बसाकर शान्तिपूर्वक सोए। इसके बाद, लव और कुश वीणा की धुन पर रामायण का पाठ करते हुए अयोध्या नगरी में घूमने लगे। उन दोनों की आवाज में आध्यात्मिक माधुर्य भरा हुआ था जिसके कारण उनके द्वारा गाए गये रामायण के छंद गंधवों के गायन से भी अधिक माधुर्यपूर्ण प्रतीत होते थे। उनके द्वारा किए गये रामायण के पाठ को सुनने वाले लोग उनके मधुर गायन को सुनकर मंत्रमुग्ध रह गये और राम ने भी अत्यन्त उत्सुकतापूर्वक उनके पाठ को सुना।
तब लोगों ने एक-दूसरे से कहा, यदि इनकी जटा और मृगांबर को छोड़ दिया जाये, तो ये दोनों बालक बिल्कुल भगवान् राम की तरह दिखते हैं।
इसके बाद, जब लव और कुश कुछ समय के लिए रामायण का पाठ बंद करके विश्राम करने लगे, तब राम ने लक्ष्मण को आदेश दिया, इन होनहार बालकों को 20,000 स्वर्ण मुद्राएँ व बहुमूल्य वस्त्र दो और इसके अतिरिक्त ये जो भी चाहें, वह प्रदान करो।
परंतु लब तथा कुश ने ये उपहार लेने से मना कर दिया और बोले, फल और केंद-मूल खाकर जीवन व्यतीत करने वाले तपस्वियों को भला स्वर्ण की क्या आवश्यकता है?
राम ने अत्यधिक चकित होकर पूछा, प्रिय बालकों, इस महाकाव्य के कितने खंड हैं और किस विद्वान ऋषि ने इसकी रचना की है ?
दोनों बालक बोले, हे राजन, महान ऋषि वाल्मीकि हमारे आध्यात्मिक गुरु हैं और वही आपके सम्पूर्ण जीवन इतिहास का वर्णन करने वाले इस महाकाव्य के रचयिता है। यह महाकाव्य छह खंडों में हैं और एक अतिरिक्त खंड आपकी अंतिम लीलाओं का वर्णन करता है। यदि आप चाहें, तो आपके महायज्ञ के दौरान विश्राम के क्षणों में हम आपके लिए सम्पूर्ण रामायण का पाठ कर सकते हैं।
इसके बाद, लव तथा कुश ने अनेक दिन तक रामायण का पाठ किया जिसे सुनकर राम असीमित आनन्द से भर उठे। अंततः, राम ने निष्कर्ष निकालते हुए कहा, निश्चित ही ये जुड़वाँ बालक सीता के पुत्र हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं है!
अपने पुत्रों के प्रति अत्यधिक स्नेह उमड़ने के कारण राम का हृदय पिघल गया। आखिरकार, इस विषय पर अत्यन्त गंभीरता के साथ विचार करने के बाद, राम ने वाक्कला में अत्यन्त निपुण संदेशवाहकों को बुलवाया और उन्हें यह आदेश दिया, "इसी समय वाल्मीकि ऋषि के आश्रम जाकर उन्हें यह संदेश दें: 'यदि सीता वास्तव में निर्दोष हैं, यदि उनका चरित्र शुद्ध है, तो आप उन्हें अपनी अनुमति देकर यहाँ भेजें ताकि वह यहाँ नागरिकों की सभा के सम्मुख स्वयं को निर्दोष सिद्ध कर सकें।' इसके बाद, वाल्मीकि ऋषि के उत्तर के साथ सीता को यहाँ शीघ्र लेकर आयें। सीता को कल उषावेला में यहाँ लेकर आयें ताकि वह मेरी उपस्थिति में अपनी पवित्रता को प्रमाणित कर सकें।
राम का संदेश सुनकर, सीता उनके प्रस्ताव को स्वीकार नहीं कर सकी क्योंकि नागरिकों के समक्ष स्वयं को निर्दोष प्रमाणित करने का यह क्रिया व्यापार उन्हें अत्यन्त अपमानजनक प्रतीत हुआ। अंततः, सीता ने मन ही मन एक दृढ़ निश्चय किया और फिर लाल रंग के वस्त्र धारण करके उन्होंने अयोध्या के लिए प्रस्थान किया। सच तो यह है कि ब्रह्माजी के नेतृत्व में सभी देवतागण और दिव्य जीवधारी तथा महान ऋषि-मुनि वहाँ पर सीता को अपनी पवित्रता प्रमाणित करते हुए देखने आ पहुँचे थे।
सीता के पीछे-पीछे, वाल्मीकि मुनि भी पहुँच गये। सीता ने वंदना के भाव से अपना शीश झुका लिया और दोनों हाथ जोड़ लिए। उनके विशाल नेत्रों में आँसू भर आओ, जबकि उनके हृदय में पूर्णतः भगवान राम की मूर्ति स्थापित की गई थी।
वहाँ पर एकत्रित नागरिक उद्विग्नता से किसी अनहोनी की आशंका में फुसफुसाकर बात करने लगे और तभी वाल्मीकि ऋषि भगवान् राम के पास जाकर बोले, हे दशरथ-नंदन, यह रही निष्कलंक और धर्मपरायण सीता जिसे आपने जन-सामान्य की आलोचना के भय से त्याग दिया था। वह यहाँ पर अपनी पवित्रता प्रमाणित करने आई है और आपकी आज्ञा की प्रतीक्षा कर रही है।
हे राम, मैंने आज तक कभी भी असत्य वचन नहीं बोले हैं और आज मैं घोषणा करता हूँ कि यदि सीता ने लेश मात्र भी अपराध किया है, तो मैंने अब तक तप साधना से जितना भी पुण्य अर्जित किया है वह नष्ट हो जाये। यद्यपि, आप सीता से अत्यधिक प्रेम करते हैं और विश्वासपूर्वक जानते हैं कि वह निर्दोष हैं, परंतु तब भी आपने लोक-लाज के भय से उसका त्याग कर दिया। मैं अपनी आध्यात्मिक दृष्टि से यह जानता हूँ कि सीता पूर्णतः पवित्र हैं, इसलिए मैं यहाँ पर यह सत्य उद्घाटित करने के लिए आपके समक्ष आया हूँ।
राम ने एक क्षण तक सीता को देखा और फिर सभा को संबोधित करके बोले, ऐसा ही हो महान् ऋषि ने जितनी बातें यहाँ पर कही मैं उन सभी को सत्य के रूप में स्वीकार करता हूँ। अतीत में, देवता गणों ने सीता की पवित्रता को प्रमाणित किया था और तब मैं प्रसन्नतापूर्वक उन्हें अपने साथ अयोध्या ले आया था। परंतु तब भी लोगों ने मेरी आलोचना की, इसलिए न चाहते हुए भी मैंने उन्हें यहाँ से दूर भेज दिया। अब मैंने यह निश्चय किया है कि यदि सीता इस सभा के समक्ष अपनी पवित्रता प्रमाणित कर देंगी, तो मैं पुनः उन्हें अपनी प्रियतमा पत्नी के रूप में स्वीकार कर लूँगा।
सभी लोग एकदम चुप हो गये और उन्होंने सीता पर अपनी दृष्टि टिका दी. जबकि सीता अपनी आँखें व सिर नीचे झुकाए खड़ी थीं। कुछ देर तक मौन रहने के बाद, सीता ने वहां पर एकत्रित सभी लोगों की सभा के बीच बोलना आरंभ किया, हे पृथ्वी माँ कृपा करके मेरी विनती सुनें। यदि मैंने अपने विवाह के क्षण से ही एकमात्र राम का ही विचार किया है और यदि मैंने अपने पति के अतिरिक्त अन्य किसी पुरुष को कभी भी प्रेम नहीं किया है, तो कृपा करके मुझे शरण दें। यदि मैंने मन, कर्म और वचन से केवल राम का ही स्मरण किया है, तो कृपा करके मुझे अपने में समाहित कर लें ताकि मुझे इन मिथ्याचारी लोगों के सामने लज्जित न होना पड़े।
सीता के इस प्रकार बोलते ही, धरती यकायक फट पड़ी और उसमें से भूमि देवी चमत्कारी ढंग से बाहर निकल आई। भूमि देवी दिव्य सर्पों से बने एक दिव्य सिंहासन पर विराजमान थीं। भू देवी ने मुस्कुराकर सीता का स्वागत किया और स्नेहपूर्वक उनकी बाँह पकड़कर अपने राजसिंहासन पर अपने साथ बिठा लिया। आकाश लोक और पृथ्वी लोक के सभी जीवधारी फटी आँखों से चकित होकर यह देख ही रहे थे कि तभी भू देवी का दिव्य सिंहासन पृथ्वी की अतल गहराइयों में उतर गया।
सभी जीवधारियों ने आश्चर्य की गर्जनकारी ध्वनि करते हुए, अपनी पवित्रता की इस भव्य पुष्टि करने के लिए सीता की भूरि-भूरि प्रशंसा की। स्वर्ग लोक पर स्थित देवगणों ने वाद्य यंत्र बजाये, गीत गाए और पुष्प वृष्टि की।
सीता के अंतर्ध्यान होने के बाद, राम ने यज्ञ के समय प्रयोग किए गये एक दंड का सहारा लेकर अपना असह्य दुख व्यक्त करना आरंभ कर दिया। उनके नेत्रों से अश्रुधारा प्रवाहित होने लगी और उनके चित्त में क्रोध व दुख का चक्रवात उमड़ पड़ा और तब राम ने अपना सिर झुकाकर कहा, हे पृथ्वी, आप तत्काल मेरी सीता मुझे लौटा दें, अन्यथा पुनः फट पड़ें ताकि मैं भी आपमें समाकर सीता के साथ एकाकार हो जाऊँ सीता आपकी पुत्री है और इस नाते मैं आपका दामाद हूँ। मेरी सीता अविलंब मुझे लौटा दें, अन्यथा मैं आपके पर्वतों को तोड़ डालूँगा, आपके वनों को जलाकर राख कर दूँगा और फिर आपको भी चूर-चूर कर डालूँगा।
तब ब्रह्माजी बोले, हे भगवन्, कृपा करके अपनी वास्तविक पहचान को याद करें। आप पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु हैं और सीता ही सौभाग्य को देवी हैं। वह नाग लोक में प्रवेश कर चुकी है और शीघ्र ही आपके आध्यात्मिक धाम, वैकुण्ठ में आप दोनों का पुनर्मिलन होगा।
हे सर्वोच्च नायक, हे ब्रह्माण्ड के स्वामी और सभी जीवों के पालनहार, भला मुझे आपको आपके दिव्य पद को याद क्यों दिलानी पड़ रही है? हे राम, कृपा करके अपने दुख का त्याग करें और अपने पुत्रों के मुख से अपनी आध्यात्मिक लीलाओं के अंतिम खंड का वर्णन सुनें। वाल्मीकि ऋषि द्वारा रचित यह महाकाव्य ब्रह्माण्ड के नष्ट होने तक सदैव तीनों लोकों में आपकी महिमा का गुणगान करेगा।
यह कहकर, ब्रह्माजी अंतर्ध्यान हो गये। इसके बाद, लव व कुश के साथ राम वाल्मीकि ऋषि के आश्रम गये। रात बीत जाने पर सीता को खो देने के दुख से व्यथित राम ने सभी ऋषि-मुनियों को बुलवाया और अपने पुत्रों से रामायण के उत्तर काँड का पाठ करने का अनुरोध किया।
इसके बाद, राम अयोध्या नगरी को वापस लौट गये, परंतु शीघ्र ही अपनी प्रिय पत्नी के बिना उन्हें जीवन सूना-सूना लगने लगा। राम ने सीता की एक स्वर्ण- प्रतिमा बनवाई थी और जब भी कभी वह धार्मिक अनुष्ठान करते तब वह अपने पास उस मूर्ति को बिठाते। राम ने धार्मिक सिद्धांतों का पूरी तरह पालन करते हुए शासन कार्य का संचालन किया और उनके राज्य में नियमित रूप से वर्षा होती थी, फसल सदैव ही प्रचुर मात्रा में हुआ करती और चारों और सुख, समृद्धि व शान्ति थी।
अनेक वर्ष बाद, पहले कौशल्या, फिर सुमित्रा व अंत में कैकेयी का देहावसान हो गया और आध्यात्मिक लोक में उनका महाराज दशरथ से पुनर्मिलन हो गया। कुछ समय पश्चात् केकय नरेश युधजित भगवान् राम के दर्शन करने अयोध्या आये और उनसे अनुरोध किया कि वे सिंधु नदी के उत्तर में राज कर रहे गंधर्व राज शैलूष पर विजय प्राप्त करें।
राम ने तत्काल ही भरत के दोनों पुत्रों, तक्ष और पुष्कल को गंधर्व राज्य का शासक नियुक्त कर दिया। इसके बाद, भरत ने एक विशाल सेना लेकर उस दिशा में कूच कर दिया और तक्षशिला में तक्ष को तथा पुष्कलावती में पुष्कल को शासक के रूप में स्थापित कर दिया। पाँच वर्ष बाद भरत अयोध्या को लौट आये। इसके बाद, राम ने लक्ष्मण के दो पुत्रों, अंगद व चित्रकेतु द्वारा करुपथ पर विजय प्राप्त कर लेने के बाद, उन्हें करुपथ का शासक नियुक्त किया। लक्ष्मण अपने दोनों पुत्रों के साथ वहाँ गये और लगभग एक वर्ष बाद अयोध्या वापस लौटे।
पृथ्वी पर राम की लीलाओं का समय समाप्त होने को था, इसलिए एक दिन स्वयं समय (काल) मानव रूप में अयोध्या आये। उन्होंने भ्रमणशील साधु का वेश धारण कर रखा था। राजमहल के द्वार पर पहुँचने के बाद, समय ने पास में खड़े लक्ष्मण को संबोधित करके कहा, मैं ब्रह्मा का दूत हूँ। मैं यहाँ पर एक अत्यन्त महत्वपूर्ण उद्देश्य से आया हूँ, इसलिए मैं इसी क्षण भगवान् राम के दर्शन करना चाहता हूँ।
समय को एक स्वर्ण सिंहासन पर आदरपूर्वक बिठाने के बाद, राम ने उनसे पूछा, हे दिव्यात्मा, आपके यहाँ आगमन का क्या प्रयोजन है? आप यहाँ क्या संदेश देने आये हैं?
संदेशवाहक ने कहा, हे राजन्, यदि आप ब्रह्माजी की इच्छाओं का सम्मान करते हैं, तब हमारी भेंटवार्ता एकांत में होनी चाहिए, क्योंकि उनके द्वारा कहे गये शब्द अन्य कानों के सुनने के लिए नहीं हैं। आपको यह ज्ञात हो कि यदि कोई भी हमारी इस वार्तालाप को सुनेगा, तो शीघ्र ही उसकी मृत्यु हो जायेगी। हे राम, आप वचन दें कि यदि कोई भी हमारी भेंटवार्ता के बीच में आकर व्यवधान डालता है। तो आप बिना हिचके उसके साथ अपने सारे संबंध तोड़ लेंगे।
इस पर राम बोले, "ऐसा ही होगा!" फिर लक्ष्मण की ओर मुड़कर, राम ने आदेश दिया, "द्वारपाल को जाने का आदेश दे दो। मैं चाहता हूँ कि आप स्वयं द्वार पर पहरा दें क्योंकि यह भेंटवार्ता अत्यन्त निजी है।
जब वे दोनों अकेले रह गये, तो संदेशवाहक के रूप में आये स्वयं काल ने ब्रह्माजी का संदेश सुनाते हुए कहा, "हे भगवन्, आपने इस संसार को अधर्म के बोझ से मुक्त कराने के अनुरोध पर अवतार लिया था रावण का संहार हो चुका है और आप पर्याप्त समय तक शासन कर चुके हैं, इसलिए यदि आप चाहें, तो अब आप अपने आध्यात्मिक लोक को लौट सकते हैं।
हे सर्वव्यापी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, आप ही मेरी शक्ति और मेरे अस्तित्व के स्रोत हैं। इसलिए, मैं आपको अपने सम्पूर्ण अस्तित्व से प्रणाम करता हूँ।
राम ने मुस्कुराते हुए कहा, आपने बहुत अच्छी तरह से अपनी बात कही है। आप सदैव सौभाग्यशाली रहें। अब कृपा करके ब्रह्माजी के पास जाकर उनसे कहें कि देवताओं द्वारा किए गये अनुरोध को मैं पूरा कर चुका हूँ, इसलिए शीघ्र ही मैं आध्यात्मिक लोक में स्थित अपने धाम को लौट आऊँगा।
जिस समय राम और संदेशवाहक इस प्रकार से बातें कर रहे थे, उसी समय दुर्वासा मुनि राजमहल में पहुँच गये। लक्ष्मण उनका स्वागत करने गये, तब ऋषि ने आग्रहपूर्वक कहा, "मैं यहाँ अत्यन्त आवश्यक कार्य से आया हूँ, इसलिए मैं इसी समय भगवान् राम के दर्शन करना चाहता हूँ।
लक्ष्मण ने कहा, राम ने मुझे अत्यन्त सख्त आदेश दिया है कि किसी भी स्थिति में उनके एकांत में विघ्न न डाला जाये हे ऋषिश्रेष्ठ, कृपया कुछ समय प्रतीक्षा करें।
यह सुनकर, दुर्वासा मुनि क्रोधित हो गये। उनकी आँखें क्रोध से लाल हो उठीं और वह कुपित होकर बोले, इसी समय उन्हें मेरे आगमन की सूचना दो! यदि तुम मेरे आदेश की अवहेलना करने की मूर्खता करोगे, तो मैं राम, भरत, तुम्हें और सम्पूर्ण इक्ष्वाकु वंश सहित कौशल प्रांत के सभी नागरिकों को शाप दे दूंगा! हे लक्ष्मण, मैं स्वयं को संयमित रखने का प्रयास कर रहा हूँ, परंतु मेरा धैर्य चुकता जा रहा है।
लक्ष्मण यह जानते थे कि राम की भेंटवार्ता में व्यवधान डालने का अर्थ उनकी मृत्यु के रूप में फलित होगा। परंतु तब भी, दुर्वासा मुनि के शाप के बारे में विचार करके उन्होंने सोचा कि "सभी को सर्वनाश से बचाने के लिए अच्छा है कि केवल मेरा ही सर्वनाश हो।
यह सोचकर, लक्ष्मण ने राम के कक्ष में प्रवेश करके उन्हें दुर्वासा मुनि के आगमन की सूचना दी। राम ने काल से विदा ली और शीघ्र ही दुर्वासा मुनि से मिलने चल पड़े। राम ने दुर्वासा मुनि के समक्ष हाथ जोड़कर खड़े होते हुए कहा, हे सर्वश्रेष्ठ तपस्वी और ब्राह्मण श्रेष्ठ, मैं आपकी किस प्रकार से सेवा कर सकता हूँ ?
दुर्वासा मुनि बोले, हे धर्मपरायण महाराज, मैंने अभी-अभी एक हजार वर्ष तक निराहार रहकर तप पूर्ण किया है। आप मुझे भोजन करा सकते हैं ?
राम ने तत्काल दुर्वासा मुनि को स्वादिष्ट भोजन कराया जिसके कारण वह अत्यन्त प्रसन्न हो गये। परंतु दुर्वासा ऋषि के जाने के उपरांत, राम को काल को दिए गये अपने वचन की याद आ गई और भयानक दुख ने उन्हें जकड़ लिया । अपने सबसे अंतरंग सहयोगी को खो देने के भय से, राम मूर्तिवत खड़े रह गये और मानो समस्त कार्य कारणों की चेतना से शून्य होकर उनका सिर दुखपूर्वक नीचे लटक गया।
तब, लक्ष्मण शोक से भाव विह्वल हो उठे अपने भाई के पास गये और मुस्कुराते हुए बोले, "मेरे प्रिय राम, नियति द्वारा जिसे अनिवार्य निर्धारित कर दिया गया है उसके लिए शोक न करें। हमें बिना किसी भी प्रकार के राग या द्वेष के अपने दायित्व का निर्वाह करना चाहिए। इसलिए अपने वचन का पालन करें और बिना हिचकिचाए मुझे देश निकाला दे दें।
राम ने अपने मंत्रियों को बुलाया और उन्हें पूरी घटना बताने के बाद, उनसे सलाह माँगी। वशिष्ठ मुनि बोले, मेरे प्रिय राम, मैं अपनी तप साधना के उन्होंने माध्यम से आपके साथ घट रही इस घटना को पहले ही देख सकता हूँ। अब आपको अपने वचन का निर्वाह करना चाहिए अन्यथा जीवन पर्यंत आपने जिस धर्म का पालन किया है उस पर कलंक लग जायेगा। धार्मिक सिद्धांतों का क्षरण होने से, यह संसार धीरे-धीरे दुख से भरकर नष्ट हो जायेगा। इसलिए, सदैव सत्यनिष्ठ बने रहने की अपनी शपथ का पालन करें और लक्ष्मण को देश निकाला दे दें।
राम ने अत्यन्त गहराई से इस विषय पर विचार किया। इसके बाद, उन्होंने सभा के सामने घोषणा की, “धर्म का अविचल पालन करते रहने की शपथ का निर्वाह करने के लिए मैं आप सभी के सामने लक्ष्मण को अयोध्या से निकल जाने का आदेश देता हूँ।
सभी मंत्रियों ने राम के निर्णय की प्रशंसा की। इसके बाद, लक्ष्मण सरयू नदी के तट पर गये और उन्होंने गूढ़ योग की साधना में अपना ध्यान केंद्रित किया। अंततः, उचित समय आ जाने पर, राजा इंद्र एक दिव्य रथ पर सवार होकर वहां आये। चूँकि उनका शरीर आध्यात्मिक व दिव्य था, अतः लक्ष्मण अपनी देह त्याग किए बिना ही मधुर स्वर में गाते हुए गंधर्वों, नृत्य करती अप्सराओं तथा सुगंधित पुष्पों की वर्षा के मध्य स्वर्ग लोक को प्रस्थान कर गये।
लक्ष्मण के अंतर्ध्यान हो जाने के पश्चात् राम ने भरत को राजसिंहासन पर स्थापित करने का निश्चय किया ताकि वह भी सुमित्रा नंदन द्वारा अपनाए गये पथ का अनुसरण कर सकें। भरत ने राजसिंहासन पर आरूढ़ होने का प्रस्ताव ठुकरा दिया, क्योंकि वह राम के बिना राज्य का सुख भोगने के बजाय उनके साथ वन जाना चाहते थे। वन जाने से पहले, राम ने अपने राज्य का विभाजन करके, कौशल का उत्तरी हिस्सा कुश को और दक्षिणी हिस्सा लव को प्रदान किया राज्याभिषेक समारोह हो जाने पर, राम ने अपने दोनों पुत्रों को अत्यन्त स्नेहपूर्वक गले से लगाया और उन्हें प्रचुर मात्रा में स्वर्ण और रत्न दिए हजारों रथ और अगणित हाथी और घोड़े दिए।
नागरिकों को जब पता चला कि राम राज-काज छोड़कर वन को जाना चाहते हैं, तो उन्होंने भी दृढ़ निश्चय कर लिया कि वे भी उनके पीछे-पीछे जायेंगे भले ही वे कहीं भी क्यों न जायें क्योंकि राम से बिछुड़ने का दुख उनके लिए असहा था। शत्रुघ्न भी राम का अनुसरण करने की इच्छा रखते थे, इसलिए अयोध्या नगरी से राम के निकलते ही भारी संख्या में लोग उनके पीछे-पीछे चलने लगे। वास्तव में, प्रेम और समर्पण की भावना से भरकर, प्रत्येक जीवधारी वन को जाते राम का अनुसरण करने लगा जिसके कारण अयोध्या नगरी में एक जंतु भी नहीं दिख रहा था।
पथ पर चलते हुए राम को देखकर, प्रत्येक व्यक्ति यह देख पा रहा था कि वह किस प्रकार पूर्ण निर्विकार व उदासीनता के भाव को प्रकट कर रहे थे, मानो वह इस संसार का त्याग करने की तैयारी कर रहे हों। इस अविस्मरणीय अवसर पर राम की समस्त शक्तियाँ मूर्त रूप धारण करके उनके साथ चल रही थीं। राम की दाहिनी और श्री और बाई और भूमि थीं। उनके सामने शक्ति चल रहीं थीं और उनके पीछे-पीछे अन्य अगणित ऊर्जाएं चल रही थीं जिसमें ॐकार, गायत्री और वेद शामिल थे। उनके पीछे-पीछे भरत, शत्रुघ्न और उनके परिवार जन चल रहे थे। उनके साथ पवित्र अग्नि का प्रतिनिधित्व करने वाले ब्राह्मण जन थे। ब्राह्मणों के पीछे-पीछे अन्य नागरिक अपनी सामाजिक स्थितियों के क्रम में चल रहे थे और सबसे अंत में जीव-जंतु थे।
सरयू नदी के तट पर पहुँचकर, राम कुछ क्षण के लिए रुके और उसी समय राम के ऊपर अपने-अपने दिव्य रथों पर सवार होकर ब्रह्माजी सहित समस्त देवता- गण अवतरित हुए। सम्पूर्ण आकाश लोक स्वर्गिक आभा से चमक उठा और सौम्य तथा सुगंधित वायु प्रवाहित होने लगी। गंधर्वों तथा अप्सराओं ने नृत्य व गान आरंभ कर दिया, जबकि स्वर्ग लोक के अन्य निवासियों ने अत्यन्त सुगंधित पुष्पों की वृष्टि करनी आरंभ कर दी।
कुछ समय बाद, जैसे ही राम ने जल में प्रवेश करना आरंभ किया, तो ब्रह्माजी ने उनकी स्तुति-वंदना आरंभ कर दी, हे भगवन्, हे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, अब आप पृथ्वी लोक पर अपनी लीलाओं का समापन कर रहे हैं और इस भौतिक जगत के परे स्थित अपने आध्यात्मिक धाम को लौटने की तैयारी कर रहे हैं। आप ही शाश्वत विष्णु हैं। यद्यपि आप विभिन्न अवतारों के रूप में अवतरित होते हैं, परंतु आपका शरीर अपरिवर्तनीय और मूल है। आप हो समस्त कारणों के मूल कारण हैं और समस्त अस्तित्व के आधार हैं। प्रत्येक वस्तु आपका हो अभिन्न अंग है, क्योंकि आप ही परम पूर्ण सत्य हैं और समस्त उद्गमों के स्रोत हैं।
हे भगवन्, इस धरा से अधर्म के बोझ को दूर करने के लिए ही आपने कृपा करके अवतार लिया, इसलिए अब हमें अनुमति दें कि हम आपको श्रद्धापूर्वक बारम्बार नमन कर सकें।
इस प्रकार, भगवान् राम और उनके पीछे-पीछे भरत व शत्रुघ्न आध्यात्मिक लोक में स्थित अपने चिरंतन धाम को लौट गये। वास्तव में, न केवल दशरथ के पुत्रों को, वरन उनके सभी अनुयायियों को भी वह वैकुण्ठ लोक प्राप्त हुआ जहाँ भगवान् राम चिरंतन वास करते हैं।
इस प्रकार, रामायण के नाम से प्रसिद्ध, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की लीलाओं का आध्यात्मिक वर्णन समाप्त होता है जिसकी रचना महान ऋषि तथा महान भक्त वाल्मीकि जी द्वारा की गई थी। रामायण का पाठ केवल उन्हीं लोगों को करना चाहिए जो परमेश्वर पर सम्पूर्ण निष्ठा रखते हों क्योंकि यह रामायण परमेश्वर का ही एक रूप हैं। इसके एक श्लोक तक में इतनी शक्ति है कि इसे सुनने मात्र से ही व्यक्ति के उस दिन तक के समस्त पाप मिट जाते हैं। इसी कारण से, जो लोग जन्म और मृत्यु के निरंतर चलने वाले चक्र से मोक्ष पाना चाहते हैं उन्हें सदैव ही इस महान आध्यात्मिक महाकाव्य को पढ़ने व सुनने का आनन्द लेना चाहिए।
रामायण का पाठ करने से व्यक्ति को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के फल प्राप्त होते हैं और इससे भी बढ़कर व्यक्ति को भगवान् के प्रति विशुद्ध प्रेम विकसित करने में सहायता मिलती है जो इस मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य है। पाठकों को ईश्वर आशीर्वाद दें और उन्हें चेतना प्राप्त करने के लिए प्रेरित करें। ईश्वर करें कि इस पाठ करने वाले व्यक्तियों के हृदय में सदा सर्वदा सीता और भगवान् रामचंद्र के आध्यात्मिक रूप का वास हो ।
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