महेंद्र पर्वत के नीचे पहुँचकर, धर्मपरायण हनुमान ने सबसे पहले सूर्य, इंद्र, वायु, ब्रह्मा और भगवान् राम को नमन किया। इसके बाद, पर्वत की चोटी पर चढ़कर उन्होंने अपने शरीर को भीमकाय आकार में बड़ा करके पर्वत को अपने हाथों और पैरों से पकड़ लिया। कुछ समय तक उसी मुद्रा में स्थिर रहकर, हनुमान ने महान छलाँग के लिए अपने मन-मस्तिष्क को तैयार किया।
उनके विशालकाय शरीर के भार से समूचा पर्वत हिलने लगा। विशाल सर्प चट्टानों पर अग्नि-वमन करने लगे जिसके कारण वे चटखकर जलते हुए इधर - उधर उड़ने लगे। इस अद्भुत छलांग के साक्षी बनने के लिए, विद्याधर उड़कर आकाश में पहुँच गये और उनकी आश्चर्य से सराबोर चीख-चीत्कार को सुनकर हनुमान ने विशाल मेघ राशि के समान गर्जन किया और अपनी पूँछ सीधी कर लो।
जिस समय हनुमान ने अपनी पूरी शक्ति से महेंद्र पर्वत पर नीचे की ओर दबाव डाला, तो पर्वत-शिखर भरभराकर टूटने लगा और इस भयानक दबाव के कारण पर्वत शिखर के नीचे से अत्यन्त वेग के साथ पानी की बौछार ऊपर उठने लगी। उस स्वर्ग समान सुंदर क्षेत्र में आनन्द मनाने वाले गंधर्व युग्म और साथ ही अगणित ऋषि-मुनि भयभीत होकर वहाँ से जल्दी-जल्दी भागने लगे। हनुमान ने वानरों की ओर देखकर घोषणा की, या तो मैं सीता को वापस लेकर आऊँगा. या फिर समूची लंका नगरी को जड़ समेत उखाड़कर, रावण सहित उठा लाऊँगा ।
हनुमान ने गहरी साँस भरी और उनकी माँसपेशियाँ तन गई। तब अचानक ही, भगवान् राम के धनुष से छूटे किसी बाण की भाँति वह हवा में उछल पड़े। जिस समय हनुमान हवा में उछले, तब पर्वत-शिखर के वृक्ष उनको छलाँग लगाने से उत्पन्न हुए दबाव के कारण जड़ सहित उखड़कर कुछ समय तक हनुमान। पीछे-पीछे उड़ चले और फिर समुद्र में गिर गये। वृक्षों में मुकुलित ढेरों पुष्प अपनी के शाखा प्रशाखाओं से अलग होकर हवा में उड़ने लगे और फिर पानी की सतह पर बिखर गये जिसके कारण वहाँ अत्यन्त मनमोहक दृश्य उत्पन्न हो गया।
हनुमान की तीव्र गति के कारण चक्रवात पैदा करने की क्षमता रखने वाली हवा बहने लगी जिसके कारण समुद्र उत्तेजित हो उठा और उसमें पर्वत के समान ऊँचाई वाली विशाल लहरें उठने लगीं जो ऊपर उठकर हनुमान के सीने से टकरा रही थीं। जल की सतह पर पड़ती हनुमान की छाया महाकाय थी। हवा में अत्यन तोव्र वेग से उड़ने के कारण पैदा हुई रिक्तता से, आकाश में मौजूद बादल उनके पास आ गये। इस प्रकार हनुमान चंद्रमा के समान कभी बादलों में छिप जाते, तो कभी उनके बीच से बाहर निकलकर दिखाई देने लगते। पितृत्व स्नेह से, वायु ने शीतल हवाएँ प्रवाहित की ताकि सूर्य की तेज धूप से हनुमान को तपन न महसूस हो।
जिस समय हनुमान वायु-मार्ग से बढ़ रहे थे, तब समस्त जीवधारियों ने उनकी सराहना की। भगवान् राम के प्रति आदर प्रकट करने के लिए, समुद्र देव भी हनुमान की सहायता करना चाहते थे। राम का जन्म इक्ष्वाकु वंश में हुआ था और उनके पूर्वज महाराज सगर ने समुद्र की सीमाओं को विस्तारित किया था। समुद्र में मैनाक नामक एक विशाल पर्वत डूबा हुआ था जिसे इंद्र ने पाताल से धरती पर आने के राक्षसों के मार्ग को अवरुद्ध करने के लिए समुद्र के बीचों-बीच स्थापित कर दिया था। समुद्र देव ने मैनाक पर्वत को जल सतह से ऊपर उठने का आदेश दिया ताकि वह हनुमान को अल्प विश्राम करने की एक जगह दे सके। परंतु, हनुमान ने जब विशाल पर्वत शिखर को समुद्र की जल सतह से ऊपर उठते हुए देखा, तो उन्हें लगा कि यह उनके आगे बढ़ने में रुकावट डालेगा और इस कारण से उन्होंने अपने सोने से इसे नीचे धकेल दिया।
हनुमान की अतुलनीय शक्ति की प्रशंसा करते हुए, मैनाक ने मानव रूप धारण किया। अपने ही शिखर पर प्रकट होकर, वह बोले, "हे पवन पुत्र, आप यहाँ कुछ देर विश्राम करने के बाद अपनी यात्रा जारी रख सकते हैं। कृपा करके, मेरी यह विनम्र सेवा स्वीकार करें क्योंकि इस प्रकार से आपकी सहायता करके मैं आपके पिता की आराधना करने की कामना करता हूँ।
सत्ययुग के समय, सभी पर्वतों के पंख थे और हम सभी अनेकानेक गरुडों की भाँति आकाश मार्ग में उड़ सकते थे, परंतु देवताओं और ऋषि-मुनियों को यह भय हुआ कि यदि हम जमीन पर गिर पड़े तो वहाँ की समस्त वस्तुओं को नष्ट कर सकते हैं। अंततः, इंद्र ने अपना वज्र उठाया और क्रोध से भरकर हजारों पर्वतों के पंख काट डाले। मुझ पर भी इसी प्रकार से आक्रमण किया गया, परंतु वायु देव ने मेरी रक्षा की और मुझे समुद्र में फेंक दिया। इस प्रकार मेरे पंख सुरक्षित बच गये और इस उपकार का बदला चुकाने के लिए, मैं आपसे अनुरोध करता हूँ कि कुछ पल मेरा आतिथ्य स्वीकार करके यहाँ विश्राम करें।"
हनुमान बोले, मुझे क्षमा करें क्योंकि मैं रुक नहीं सकता। मेरे पास बहुत कम समय है और मैंने अन्य वानरों को यह वचन दिया है कि में विलंब नहीं करूंगा।
यह कहकर, हनुमान ने आदर प्रकट करने हेतु पर्वत-शिखर का स्पर्श किया और फिर आकाश में ऊपर उठकर अपनी उड़ान जारी रखी। इंद्र प्रसन्न होकर वहाँ आये और मैनाक से बोले, आपको अपने पंखों के बारे में भयभीत होने की अब कोई आवश्यकता नहीं है। अब से आप अपनी इच्छा से जहाँ चाहे वहाँ जा सकते हैं।
इसी बीच, देवता और दिव्य लोकों में रहने वाले ऋषिगण, नागों की माता सुरसा के पास गये और उनसे अनुरोध किया, हम हनुमान की वास्तविक शक्ति को सुनिश्चित करना चाहते हैं। इस उद्देश्य से हमारा अनुरोध है कि आप एक विशाल राक्षसी का रूप धारण करके हनुमान को आगे बढ़ने से रोकें। या तो हनुमान आपको शीघ्रता से परास्त कर देंगे, अन्यथा ऐसा करने में असमर्थ रहने पर वह हताश हो जायेंगे।
सुरसा ने एक कुरूप राक्षसी का रूप धारण किया और समुद्र से बाहर निकलकर हनुमान का रास्ता रोक लिया। उन्होंने कहा, ब्रह्माजी के वरदान से, मैं अपने सामने आने वाले किसी भी भोजन को खा लूँगी। हे वानर श्रेष्ठ, भाग्यवश आप मेरे रास्ते में आ गये हैं, इसलिए मैं आपको अपने मुँह के अंदर आने के लिए आमंत्रित करती हूँ।
हनुमान बोले, मैं भगवान् राम को अपहृत पत्नी का पता लगाने में उनकी सहायता करने का प्रयास कर रहा हूँ। इसलिए आपको मेरी सहायता करनी चाहिए परंतु यदि आप मुझे खाने का हठ नहीं छोड़तीं, तो मैं वचन देता हूँ कि सीता का पता लगाने के बाद राम को इसकी सूचना देकर मैं यहाँ लौट आऊँगा और तब मैं निश्चित ही आपके मुँह के अंदर चला जाऊँगा।
सुरसा अपनी बात पर अड़ते हुए बोली, ब्रह्माजी के वरदान के कारण, आप इसी क्षण मेरे मुँह के अंदर जाने के लिए बाध्य हैं! इसके बाद, सुरसा ने अपना मुँह फैला लिया और यह देखकर क्रोधित हनुमान ने अपने शरीर को बड़ा कर लिया और चुनौती दी, यदि आप मुझे अपने मुँह के अंदर डालना चाहती हैं, तो आपको अपना मुँह और अधिक खोलना होगा।
यह सुनकर, सुरसा ने अपने मुँह को दो गुना बड़ा कर लिया, तब हनुमान ने भी अपना आकार और अधिक बढ़ा कर लिया। सुरसा ने अपने मुँह को और अधिक फैला लिया, जिस पर हनुमान ने स्वयं को उससे भी अधिक बड़ा बना लिया। इस प्रकार, सुरसा अपना मुँह फैलाती रही और हनुमान भी अधिकाधिक विशाल रूप बनाते रहे। सुरसा जल्दी से उन्हें निगलने को मुँह फैलाती तो हनुमान और अधिक विशालकाय हो जाते। अंततः, जब सुरसा ने अधिकतम सीमा तक मुँह फैला लिया, तो पलक झपकने से भी कम समय में हनुमान ने अंगूठे जितना आकार ले लिया और तेजी से उसके मुँह के अंदर चले गये और शीघ्र ही उससे बाहर निकल आये। तब हनुमान बोले, हे दक्ष पुत्री, आपके वरदान की शर्त अब पूरी हो गई है, इसलिए मैं अब अपनी यात्रा जारी रखूँगा।
हनुमान की चतुराई देखकर सुरसा प्रसन्न हो गई। अपने वास्तविक रूप में लौटकर, वह बोली, अति उत्तम, हे वानरश्रेष्ठ! अब जायें और अपना कार्य संपन्न करें। मेरा आशीर्वाद है कि आप शीघ्र ही सीता का भगवान् से पुनर्मिलन कराएँ।
जिस समय हनुमान आकाश मार्ग पर तेजी से आगे बढ़ रहे थे, तभी सिंहिका नामक एक राक्षसी ने अचानक उनकी छाया को पकड़ लिया। इससे अनजान हनुमान ने महसूस किया कि उनकी शक्ति कम हो रही है, परंतु तभी इधर-उधर देखने पर उन्होंने समुद्र से एक भयानक जंतु को बाहर निकलते देखा। सिंहिका अपना मुँह फैलाए, उन्माद से भरकर हनुमान की ओर बढ़ी, तो हनुमान ने अपना आकार बढ़ाना आरंभ किया। तीक्ष्ण बुद्धि वाले हनुमान को शीघ्र ही यह अहसास हो गया कि अपनी सम्पूर्ण क्षमता का प्रयोग करने पर भी उनका शरीर राक्षसी के मुँह में समा जायेगा।
इसलिए अपनी रणनीति बदलकर, हनुमान ने अत्यन्त लघु रूप धारण कर लिया। सिंहिका के मुँह में प्रवेश करने के बाद, हनुमान उसके भयानक शरीर के अंदर चले गये और फिर अपने पंजों से उन्होंने राक्षसी के हृदय को चीरकर उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले। सिंहिका का मृत देह जब पानी में गिरा तब हनुमान उसमें से बाहर निकले और अपना विशाल रूप पुनः धारण कर लिया, जबकि सिद्धों, चारणों और विद्याधरों ने इस विजय के लिए उनका प्रशस्तिगान किया।
कुछ ही देर बाद, वृक्षों से ढंका हुआ लंका का समुद्र तट दूर दिखाई देने लगा। राक्षस आसानी ने उन्हें न देख पाएँ, यह सोचकर हनुमान अपने सामान्य आकार में लौट आये और त्रिकूट पर्वत पर उतरे। 100 योजन की छलाँग लगाने पर भी हनुमान को रत्ती भर थकान तक नहीं हुई और उनकी साँसों की सामान्य लय में तनिक भी तेजी नहीं आई।
हनुमान ने सिर उठाकर अद्भुत लका नगरी को देखा जो त्रिकूट पर्वत के शिखर पर बसी थी और इसके चारों तरफ पानी से भरी खाई थी जो कमल के फूलों से भरी हुई थी। समूची लंका नगरी के चारों ओर सोने की बेहद ऊँची दीवार थी और सीता का अपहरण करने के बाद से ही भयानक राक्षसों को भारी सेना द्वारा इसकी सुरक्षा अत्यन्त कड़ी कर दी गई थी।
हनुमान इसके उत्तरी द्वार की तरफ बढ़े जहाँ से वह नगर के अंदर का दृश्य देख सकते थे। अंदर अत्यधिक ऊँचे-ऊँचे सफेद राजमहल थे और नगर के चीड़े- चौड़े मार्गों की सोने की मेहराबों से सुसजित किया गया था और ये पथ अगणित राक्षसों से भरे हुए थे। हनुमान ने मन ही मन सोचा, वानरों को सेना की तो विसात ही क्या, यह नगर तो देवताओं के लिए भी अपराजेय जान पड़ता है। भला राम राक्षसों का संहार करने की आशा ही कैसे कर सकते हैं? केवल सुग्रीव, नौल, अंगद और मैं ही समुद्र को पार करके यहाँ तक आ सकते हैं। जो भी हो, मैं इस पर बाद में विचार करूँगा, क्योंकि मेरा पहला कर्तव्य यह पता लगाना है कि सीता अब भी जीवित है या नहीं। मुझे सावधानी से इस पर विचार करना होगा कि मैं उनसे कैसे भेंट कर सकता हैं, क्योंकि एक अक्षम दूत सबसे श्रेष्ठतम योजनाओं पर भी पानी फेर सकता है। यहाँ के पहरेदार बहुत सतर्क दिखाई दे रहे हैं, इसलिए मुझे अपने सामान्य रूप में इस नगर के अंदर नहीं घुसना चाहिए। ऐसा जान पड़ता है कि लंका के भीतर वायु भी बिना जाँच-पड़ताल के प्रवेश नहीं कर सकता है। इसलिए अच्छा यही होगा कि मैं कोई ऐसा वेश धारण करूँ जिससे सन्देह न हो और फिर रात के समय नगर में प्रवेश करूँ।
हनुमान ने अत्यन्त व्यग्रता से सूर्यास्त होने तक प्रतीक्षा की। अंततः जब अंधेरा हो गया, तो उन्होंने अपने शरीर का आकार बिल्ली जितना छोटा कर लिया और फिर ऊँची दीवार को फांदकर नगर में प्रवेश किया। नगर को देखकर हनुमान आश्चर्य से अवाक् रह गये। यह नगर उनकी कल्पना से भी परे अद्भुत था और यहाँ सात-आठ मंजिले भव्य राजमहल थे जिन्हें सोने और रत्नों से अत्यन्त ऐश्वर्यपूर्वक सुसज्जित किया गया था।
क्षितिज पर चंद्रमा के उदय होने पर, चारों तरफ फैली चांदनी ने देखने में हनुमान को सहायता की। ठीक तभी, लंका नगरी एक भयानक राक्षसी के रूप में हनुमान के सामने प्रकट हुई और उन पर क्रोध करती हुई बोली, तुम बिना जाँच पड़ताल के इस नगर में कैसे घुस आये? तुम्हारे जैसा वानर राक्षसों के इस राज्य में क्या कर रहा है?
हनुमान ने प्रतिप्रश्न किया, मैं तुम्हारे प्रश्नों के उत्तर तभी दूंगा जब तुम मुझे अपनी पहचान बताओगी।
क्रोध से कुपित होकर वह राक्षसी बोली, "मैं लंका की अधिष्ठात्री देवी हूँ और अत्यन्त सावधानी से रावण की नगरी की पहरेदारी करती हूँ। तुम बिना अनुमति के यहाँ घुस आये हो इसलिए तुम्हें अभी मेरे हाथों से अपने प्राण गँवाने होंगे।
हनुमान बोले, मैं यहाँ पर नगर का भ्रमण करने आया हूँ, क्योंकि मैं यहाँ के सभी भव्य राजमहल और उद्यान देखना चाहता हूँ।
लंका ने कटु स्वर में उत्तर दिया, "यह राक्षसों की नगरी है, इसलिए कोई भी आवारा वानर यहाँ की गलियों में चक्कर नहीं काट सकता। यदि तुम्हें लंका के ऐश्वर्य को देखना है, तो पहले तुम्हें मुझे पराजित करना होगा।
हनुमान ने साहसपूर्वक कहा, मैं जी भरकर इस नगरी को देखने के बाद, जैसे यहाँ पर आया था वैसे ही यहाँ से चला जाऊँगा।
यह सुनकर क्रुद्ध लंका चिल्लाई, नहीं, ऐसा कदापि नहीं हो सकता। और इसके साथ ही उसने अपने बायें हाथ से हनुमान पर प्रहार किया। क्रोध से आग- बबूला होकर हनुमान गर्जना करते हुए दहाड़े और उन्होंने अपने बाएँ हाथ से लंका पर प्रहार किया, परंतु लंका को एक स्त्री जानकर उन्होंने पूरी शक्ति लगाए बिना हल्का वार किया। तब भी उनके इस प्रहार से लंका दर्द से बिलबिलाकर जमीन पर गिर पड़ी।
उसने विनती करते हुए कहा, दया करके मेरे प्राण न लें क्योंकि सच्चा वीर वही होता है जो कभी किसी स्त्री पर वार नहीं करता है। बहुत समय पहले ब्रह्माजी ने मुझसे कहा था कि 'भविष्य में जब एक वानर तुम्हें पराजित करेगा, तो तुम समझ जाना कि तुम्हारे नगर का विनाश और सभी राक्षसों का संहार शीघ्र ही होने वाला है।' मैं पराजय स्वीकार करती हूँ क्योंकि अब मैं यह जान गई हूँ कि रावण का अंत निकट है। हे वानर, आप लंका के अंदर जो कोई भी कार्य संपन्न करने की इच्छा रखते हैं, उसके लिए आपको अंदर प्रवेश करने हेतु मेरी अनुमति है।
इसके बाद, हनुमान एक छत से दूसरी छत में छलांग लगाते हुए जल्दी-जल्दी नगर में विचरण करने लगे। उन्होंने अलग-अलग वेशभूषा वाले अगणित गुप्तचरों को वहाँ देखा और जम्बू नदी से प्राप्त शुद्ध सोने से निर्मित चार दीवारी से घिरे रावण के राजमहल के सामने 1,00,000 राक्षसों की सेना को पहरा देते देखा।
सीता की खोज में सारी नगरी की खाक छानते हनुमान ने वहाँ एक से बढ़कर एक राजमहल देखे जिनके प्रवेश द्वारों पर रत्न जड़े हुए थे। इन राजमहलों की भीतरी दीवारों पर धूल का एक कण तक नहीं था और वे स्वच्छता से चमचमा रही थीं। इनके फर्श इतने शानदार बनावट वाले थे कि इन्हें देखने वाला मंत्रमुग्ध होकर एकटक देखता रह जाता था। महीन नक्काशी वाली सीढ़ियाँ, सोने और चांदी मे मढ़े हुए छज्जों तक जाती थीं और फिर उनके ऊपर अद्भुत गुम्बद और छतें थीं। वाद्य यंत्रों से निकलते सुमधुर संगीत के बीच, राक्षस पत्नियाँ अपने कामोन्मत पतियों की बाँहों में लेट जाती थीं।
हनुमान एक के बाद दूसरे आवास में जाते और कहीं वह किसी राक्षस की स्नेहपूर्वक अपनी प्रेमिका को सहलाते हुए पाते, तो कहीं किसी को अपनी प्रियतमा की सारी देह पर चंदन का लेप लगाते देखते। कोई सो गया था, तो कोई हँस रहा था और किसी अन्य स्थान पर कोई अपनी संगिनी के साथ कामक्रीड़ा का आनन्द लेने में मगन था। कहाँ अपने पति द्वारा छोड़ दी गई कोई स्त्री बाहर पड़ी थी, तो किसी अन्य स्थान पर फूलों और आभूषणों से लदी कोई स्त्री अपने प्रेमी का स्वागत कर रही थी।
इस प्रकार, हनुमान ने चंद्रमा जैसे सुंदर मुख वाली हजारों स्त्रियों को अपनी कमल की पंखुड़ी जैसे नेजों को तिरछी धार से अपने प्रिय को कामोन्मत करते देखा। परंतु, सीता का कहीं कोई पता नहीं था जिससे हनुमान तनिक निरुत्साहित से हो उठे।
इसके बाद हनुमान ने रावण के रिश्तेदारों और रानियों के महलों का भ्रमण करने का निश्चय किया। दूर से देखने पर वे सावन के बादलों के विशाल झुंड की भाँति और बिजली की चकाचौंध कर देने वाली चमक के समान प्रकाशित दिखाई देते थे। अंततः, कुंभकर्ण, इंद्रजित और अन्य राक्षसों के आवास को अच्छी तरह देख लेने के बाद, हनुमान बहुत आशा के साथ रावण के महल में घुसे जो अति सुंदर स्त्रियों से भरा था और वहाँ चारों और आभूषणों की मधुर झंकार गूँज रही थी।
त्रिकूट पर्वत के सर्वोच्च शिखर पर होने के कारण, हनुमान को ऐसा प्रतीत हुआ। मानों वह सफेद हंसों द्वारा खींचे जा रहे किसी दिव्य रथ में बैठकर आकाशलोक का भ्रमण कर रहे हों।
असल में, रावण के राजमहल को भीतरी साज-सज्जा इतनी अद्भुत थी मानो वह रत्न समान पुष्पों से लदे कल्प वृक्षों वाला स्वर्ग हो। वहाँ विचरण करते हुए हनुमान ने अनेक आनन्द-कक्ष देखे जिनके फर्श सदैव ही शराब और सोमरस से तर रहते थे। वहाँ समस्त प्रकार के खजानों से भरे कक्ष थे, अस्त्र-शस्त्रों को रखने वाले कक्ष थे, परंतु वहाँ कहीं भी सीता नहीं दिखी और इससे हनुमान निराश हो गये। परंतु, अब भी रावण का निजी महल देखना शेष था जिसके कमरे विशालकाय थे।
रावण के महल के भीतरी कक्षों में जाने का रास्ता ढूंढने में, इधर-उधर भटकते हनुमान एक ऐसे स्थान पर पहुँच गये जहाँ पुष्पक विमान को रखा गया था। यह विमान विश्वकर्मा द्वारा ब्रह्माजी के लिए बनाया गया था और यह विमान चालक के मन की इच्छा का अनुसरण करके आकाश मार्ग में यात्रा करता था। पुष्पक रथ को रत्नों से बने पक्षियों से सुसज्जित किया गया था जो यांत्रिक रूप से अपने पंख फड़फड़ाते थे और साथ ही यह रथ सोने और चाँदी से बने सर्पों से भी सुसज्जित था। अंदर में अत्यन्त सुघड़ सूँड वाले हाथियों की प्रतिमाएँ एक तालाब में अत्यन्त मोहक मुद्रा में खड़ी सौभाग्य की देवी लक्ष्मी की मूर्ति पर सुगंधित जल बरसा रहे थे। लक्ष्मी देवी के चारों सुंदर हाथों में एक-एक कमल का फूल था।
रावण के कक्षों को अच्छी तरह देखने के लिए हनुमान छलाँग लगाकर पुष्पक रथ पर चढ़ गये। इस सुविधाजनक स्थान से, हनुमान को मोतियों, हीरों से जड़ा और सोने से बना एक चमचमाता हुए फर्श वाला एक विशाल कक्ष दिखाई दिया जिसके फर्श पर बिछे विशाल कालीन पर सम्पूर्ण पृथ्वी का एक मानचित्र था जिसमें सभी पर्वत और समुद्र अंकित थे। रत्नों से बनी सौड़ियाँ ऊपरी मंजिलों को जाती थीं। मद्धम प्रकाश के लिए सोने के दीपक लगे थे और अगणित रत्नों में उनकी रोशनी परावर्तित हो रही थी।
इस विशाल कक्ष की प्रत्येक वस्तु मनुष्य की पाँचों इंद्रियों को तृप्ति प्रदान करने वाली थी जिसे देखकर हनुमान ने मन ही मन सोचा, मैं कहाँ हूँ? क्या यह स्वर्ग है? संभव है कि यह ब्रह्माजी का सर्वोच्च लोक हो।
सीता की खोज में हनुमान भीतरी कक्षों में गये, तो उन्होंने रंग-बिरंगे वस्त्रों से सजी हजारों सुंदरियों को एक बहुमूल्य कालीन के ऊपर लेटे पड़े हुए देखा। आधी रात बीत जाने के कारण वे शराब के नशे में चूर होकर और साथ ही आनन्ददायी कामक्रीड़ा से थककर गहरी नींद में डूबी हुई थीं। इन स्त्रियों के रत्न जड़ित कंगन, कमरबंद और पायलें इस समय शांत थीं, परंतु उनकी चमक देखकर ऐसा प्रतीत होता था मानो यह कोई कमल के फूलों से भरी झील हो जिसमें हंस शान्ति से विश्राम कर रहे हो।
जिस प्रकार संध्या हो जाने पर कमल के सुगंधित फूल अपनी पंखुड़ियाँ बंद कर लेते हैं, उसी प्रकार आँखें बंद करके और होंठ भींचकर सोई हुई उन स्त्रियों को हनुमान ने देखा। घोर निद्रा में सोई हुई उन स्त्रियों के केश अस्त-व्यस्त हो गये थे और उनके आभूषण इधर-उधर बिखर गये थे। शराब पीकर नृत्य करते समय, उनकी पायले टूटकर गिर गई थीं और उनके माथे पर लगे तिलक के निशान मिट गये थे और उनके गलहार टूट गये थे। उनके कमरबंद ढीले पड़ गये थे और वा पर सलवटें आ गई थीं और उनकी फूलों की मालाएँ कुचल गई थीं। इस प्रकार, ये स्त्रियाँ फूलों से लदी उन लताओं के समान प्रतीत हो रही थीं जिन्हें जंगली हाथि ने कुचल दिया हो।
सोई हुई कुछ स्त्रियों ने अपनी बाँहों का तकिया बनाकर उन पर सिर टिका रखा था, तो कुछ ने अपनी सौतों की छातियों पर सिर टिका रखे थे। कुछ स्त्रियाँ दूसरी स्त्रियों की गोद, पेट या नितंबों पर सिर रखकर सो रही थीं, तो कुछ अन्य स्त्रियों प्रेमोन्मत्त होकर एक-दूसरे की बाँहों में बाहें डाले आपस में लिपटकर सो रही थीं। पता ही नहीं चलता था कि कौन-सी किसकी बाँह है ? कौन-से किसके पैर हैं? किसकी माला है? किसके आभूषण हैं? रावण की पत्नियां एक-दूसरे से इस तरह गुंथी बुनी हुई सोई थीं कि इन बातों का पता लगाना मुश्किल था।
वासना के वशीभूत होकर राजाओं, ब्राह्मणों, दैत्यों और गंधर्वों की अगणित कन्याएँ रावण की पत्नियाँ बन गई थीं। रावण ने अपने रिश्तेदारों को पराजित करके उनमें से कुछ का अपहरण किया था, परंतु उन सभी ने काम-वासना के वशीभूत होकर रावण को स्वीकार किया था। उनमें से कोई भी निम्रकुल को, कुरूप, अनगढ़ या मूर्ख नहीं थी और लंका-नरेश रावण उनमें से किसी की भी अवहेलना नहीं करता था।
हनुमान ने इन सभी स्त्रियों के मध्य में, एक भव्य उच्चासन पर रखे श्वेत चंदोवे से घिरे बिस्तर पर रावण को सोते देखा। रावण का सिर्फ एक सिर और दो हाथ ही दिख रहे थे क्योंकि वह युद्धक्षेत्र में ही दस सिरों और बीस भुजाओं वाला दैत्याकार रूप धारण करता था। हनुमान ने रावण की देह पर लगे अगणित घावों के निशान देखे जो इंद्र के वज्र और भगवान् विष्णु के चक्र जैसे महा-अस्त्रों को चोट से बने थे।
रावण की काली देह पर चंदन का लेप लगा हुआ था और वह रात को छककर भोजन करने, शराब पीने और कामुक आनन्द-भोग करने के बाद थककर सोया हुआ था। हनुमान ने आदरपूर्वक रावण को देखा और उसकी शक्तिशाली व तेजस्वी देह- यष्टि को देखकर वह आश्चर्य से थोड़ा पीछे हट गये।
हनुमान ने एक बार फिर रावण की पत्नियों पर अपना ध्यान केंद्रित किया जो रावण के चारों तरफ इस प्रकार से लेटी हुई थीं मानो पूर्णमासी के चंद्रमा के चारों ओर जगमगाते हुए ढेर सारे तारे बिखरे हुए हों। कुछ स्त्रियाँ अपने प्रिय स्वामी की बांहों में सोई हुई थीं, जबकि कुछ स्त्रियों रात को उनके द्वारा बजाये गये वाद्य यंत्रों से लिपटकर सो रही थीं। नदी की धार में बहती किसी शाखा से लिपटे कमल के फूल की भाँति पतली कमर वाली एक सुंदरी अपनी वीणा से लिपटी हुई थी। एक दूसरी स्त्री ने अपना मड्डूक मृदंग अपनी गोद में इस तरह रखा था मानो वह उसका नवजात शिशु हो। भरे स्तनों वाली एक अन्य स्त्री ने अपनी खंजड़ी को इस तरह कसकर गले से लगा रखा था मानो वह बहुत समय बाहर बिताकर लौटा उसका प्रेमी हो।
दूसरों से थोड़ा हटकर, एक भव्य व सुसज्जित उच्चासन पर गौर वर्ण वाली रावण की पटरानी मंदोदरी सो रही थी हनुमान ने उस युवा, सुंदर व भव्य रूपसी को देखकर सोचा, हो न हो, यही सीता है।
सीता को खोज लिया जानकर खुशी से रोमांचित हनुमान, किसी वानर के समान तालियाँ बजाकर, प्रसन्नता से उछल-कूद करके, अपनी पूँछ को चूमकर और राजमहल के स्तंभों पर ऊपर-नीचे चढ़-उतरकर आनंदित होने लगे, परंतु कुछ क्षण बाद उन्होंने ध्यान से इस संभावना पर विचार किया, यह सीता नहीं हो सकती है। निश्चित ही यह कोई अन्य स्त्री है। मुझे पूरा विश्वास है कि राम के वियोग में, सीता न तो भोजन कर पाएँगी और न ही सो पाएँगी और न ही इतने अच्छे वस्त्र पहनकर सज-धज पाएँगी। वह किसी अन्य पुरुष का सहचर्य स्वीकार नहीं करेंगी, फिर भले ही वह स्वर्गाधिपति इंद्र ही क्यों न हों। राम की तुलना में जब देवगणों की ही कोई विसात नहीं है, तो भला रावण जैसे दुष्ट राक्षस की बात हो क्या करनी ?
रावण के राजमहल के बचे हुए कक्षों में इधर से उधर भटकते हुए, हनुमान ने सीता की खोज जारी रखी। उन्होंने चंद्रमा के समान सुंदर मुख वाली हजारों स्त्रियाँ देखीं जो ढेर सारी मात्रा में रखे हुए मांस और शराब के पात्रों के बीच सोई हुई थीं और उनके आस-पास हर तरफ शराब के गिलास बिखरे पड़े थे। सीता की खोज करने के लिए, हनुमान ने इन सभी स्त्रियों को ध्यान से देखा और इस कारण से उनके मन में कुछ शंकाएँ प्रकट हुई।
हनुमान ने सोचा, दूसरे पुरुषों को सोती हुई, नग्न पत्नियों को देखकर संभवतः मैंने पाप किया है। अब मुझे इस पाप का क्या दंड भोगना होगा ?
परंतु, कुछ और सोच-विचार करने पर हनुमान इस निष्कर्ष पर पहुँचे, उद्देश्य से यह निर्धारित होता है कि कोई कार्य पुण्यमय है या पापमय। इन स्त्रियों की ओर देखते समय, मेरा हृदय पवित्र था और मेरा ध्यान सिर्फ सीता को खोजने में लगा था। मुझे एक स्त्री की खोज करनी है, तो भला में स्त्रियों के बीच उसे न खोजूँ तो और कहाँ खोजूँ? मैं प्रभु राम की सेवा के मंतव्य से ही यह कार्य कर रहा हूँ, इसलिए दूसरे पुरुषों की पत्नियों को देखना मेरे लिए पाप नहीं माना जा सकता।
हनुमान ने सीता को खोजना जारी रखा, परंतु सीता का कहीं कोई चिह्न न देखकर उन्होंने सोचा कि संभवतः वह अब जीवित नहीं हैं। अत्यन्त दुखी हृदय के साथ उन्होंने सोचा कि वापस लौटकर वह अन्य वानरों से क्या कहेंगे जो इतनी व्यग्रता के साथ मेरे लौटने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। फिर हनुमान ने स्वयं को याद दिलाया कि कभी हार न मानना ही सफलता की एकमात्र कुंजी है और इस तरह उन्होंने अपने मन में छाए निरुत्साह को दूर किया। सीता को खोज लेने की आशा से, उन्होंने कुछ ऐसे स्थानों में खोज कार्य जारी रखा जहाँ वह पहले नहीं गये थे।
अंततः, बार-बार लंका को अच्छी तरह खंगाल लेने के बाद, हनुमान पूरी तरह हताश हो गये। संपति ने उन्हें आश्वासन दिया था कि सीता लंका में ही है, परंतु हनुमान जब किसी भी जगह पर उन्हें नहीं खोज पाए तब उन्होंने अनुमान लगाना आरंभ किया। उन्होंने सोचा, हो सकता है आकाश मार्ग से लंका को लाए जाते समय, सीता ने भयभीत होकर प्राण त्याग दिए हों, या संभव है कि रावण ने हो राम के भय से उन्हें नीचे गिरा दिया हो। हो सकता है कि रावण की कैद से मुक्त होकर सीता समुद्र में गिर पड़ी हो या फिर रावण की पत्नी बनने से मना कर दिए जाने पर, शायद रावण उन्हें खा गया हो।
हनुमान के विचार भटकते हुए इस बात पर पहुँचे कि जब वह राम के पास असफलता को सूचना लेकर जायेंगे तो कैसा घोर अनर्थ होगा। उन्होंने सोचा "सीता के बिना, राम निश्चित ही अपने प्राण त्याग देंगे और लक्ष्मण भी उन्हीं का अनुसरण करेंगे। भरत और शत्रुघ्न को जब यह पता चलेगा कि राम और लक्ष्मण ने प्राण त्याग दिए हैं, तो वे भी अपने प्राण हर लेंगे। इस प्रकार चारों पुत्रों के जीवित नहीं रहने पर उनकी तीनों माताएँ भी प्राण गँवा देंगी और अपनी असफलता के कारण सुग्रीव, अंगद व अन्य वानर भी लज्जा से अपने प्राण त्याग देंगे। इसलिए, मैं इस हाल में किष्किंधा नहीं लौटूंगा या तो मैं आत्महत्या कर लूँगा, अन्यथा एक संन्यासी की भाँति शेष जीवन काट दूंगा।
इन हतारा कर देने वाले विचारों से उबरने के लिए जूझते हुए, हनुमान ने सोचा, "शायद मुझे रावण का वध कर देना चाहिए, या फिर उसे घसीटते हुए राम के पास वापस ले चलना चाहिए ताकि भगवान् शिव को उसके रूप में मानव बलि चढ़ाई जा सके।
लंका की रक्षा करने के लिए बनाई गई ऊंची दीवार पर बैठकर हनुमान इसी प्रकार से सोच-विचार कर रहे थे कि तभी उनकी नजर नगर के सीमांत क्षेत्र पर स्थित अशोक वृक्षों के एक विशाल कुंज पर पड़ी, जहाँ वह अब तक नहीं गये थे। सीता की खोज जारी रखने का मन बनाकर हनुमान ने राम, लक्ष्मण और सभी प्रमुख देवताओं को प्रणाम किया और फिर दीवार से छलांग लगाकर अशोक वाटिका में पहुँच गये।
कुछ समय तक यूं ही इधर-उधर भटकने के बाद, हनुमान उस जगह को बेहतर ढंग से देखने-परखने के लिए एक लंबे वृक्ष पर चढ़ गये। वृक्ष के शिखर से उन्हें एक पर्वतीय धारा बहकर पास ही स्थित कमल फूलों से भरे एक सरोवर में समाती हुई दिखाई दी। फूल के वृक्षों से भरी यह सुखद जगह उन्हें सीता के ठहरने के लिए एकदम उचित जान पड़ी। यह सोचकर हनुमान ने उसी वृक्ष के शिखर पर बैठकर प्रतीक्षा करने का निश्चय किया क्योंकि उन्हें आशा थी कि सीता इस स्थान पर स्नान करने और प्रातः कालीन पूजा-आराधना करने के लिए आयेंगी।
अपना सिर घुमाने पर हनुमान को एक उद्यान के पास ही में 1000 स्तंभों वाला एक ऊँचा मंदिर दिखाई दिया। मंदिर के सामने, मैले-कुचैले व फटे हुए एकमात्र पीले वस्त्र में एक स्त्री बैठी हुई दिखाई दी। ऐसा लगता था कि वह निराहार रहने के कारण बहुत कमजोर हो गई है और अपने दुख व क्रोध के कारण वह बार-बार ठंडी आहें भर रही थी। आँसुओं से भीगे उसके चेहरे पर उद्विग्नता व थकान दिखाई दे रही थी, परंतु तब भी उसके मुखमंडल पर एक ऐसा दिव्य तेज दमक रहा था जिसे उसका दुख भी क्षीण नहीं कर पाया था। वह धुएँ से आच्छादित अग्नि की तरह जान पड़ती थी और उसके आस-पास अनेक राक्षसियों बैठी हुई थीं।
हनुमान पहचान गये कि यह वही स्त्री है जिसे उन्होंने रावण द्वारा आकाश- मार्ग से ले जाये जाते हुए देखा था। उन्होंने उसके आभूषण भी देखे और मैली होते हुए भी वह राम द्वारा बताए गये विवरण से मेल खाती थी। हनुमान ने उस स्त्री के पूर्णमासी के चाँद जैसे दमकते चेहरे, सौम्य भौंहों, भरे स्तनों, चटख लाल रंग के होंठों, पतली कमर, कमल की पंखुड़ियों जैसे नेत्रों और नाजुक व सम आकार वाले हाथ-पैरों को ध्यान से देखा और यह निष्कर्ष निकाला कि निश्चित ही यह सीता है। प्रेम की देवी के समान सुंदर व मनमोहक होने पर भी, जमीन पर बैठी सीता तपस्या में रत किसी तपस्विनी के समान दिख रही थीं। अति भव्य होने पर भी वह अत्यन्त कष्ट झेल रही थीं और इस प्रकार वह धन-संपदा को गँवाए हुए, आस्था को गहरा धक्का लगे हुए, टूटी आशाओं वाले, खंडित आदर्श वाले भ्रष्ट प्रतिभा वाले या यश पर कलंक लगे हुए किसी व्यक्ति के समान दिख रही थीं।
हनुमान ने सोचा, यही वह स्त्री है जिससे राम प्रेम करते हैं और जिसके लिए वह कष्ट उठा रहे हैं, कभी वह करुणा का, तो कभी सहानुभूति का और कभी दुख का अनुभव करते हैं। अपने जिस प्रिय की रक्षा करने में वह असफल रहे उनके लिए करुणा । जो स्त्री पूर्णतः उन्हीं पर निर्भर थी उसके लिए सहानुभूति और अपनी प्रिय पत्नी को अचानक गंवा देने का दुख, सीता की भव्यता और सुंदरता राम के समान है और निश्चित ही उनके लिए समुद्र पार करके लंका की और छलाँग लगाना और सभी राक्षसों का संहार करना उचित ही है। यदि तराजू के एक पलड़े पर सीता को और दूसरे पलड़े पर तीनों लोकों का साम्राज्य रखा जाये, तब भी सीता का पलड़ा ही भारी रहेगा। सीता के सामने तीनों लोकों का राज्य भी तुच्छ है। मुझे यह देखकर कष्ट हो रहा है कि उन्हें रावण के कारण कितनी अधिक पीड़ा सहन करनी पड़ रही है। हालाँकि, मैं यह जानता हूँ कि राम के खयालों में डूबे रहने के कारण, संभवतः उन्हें अपनी बाहरी पीड़ा का तनिक भी अनुभव नहीं हो रहा होगा।
आकाश में चंद्रमा के और अधिक ऊपर उठ जाने से, सीता और उनके आस- पास पहरा दे रही अगणित राक्षसियों को हनुमान अच्छी तरह से देख पा रहे थे। इन भयानक राक्षसियों में से कुछ के सिर्फ एक आँख या एक कान थे और उनमें से एक के पूरे शरीर पर कान ही कान थे। एक राक्षसी के माथे के बीचो-बीच एक नाक थी। कुछ राक्षसियाँ गंजी थीं तो कुछ बौनी थीं। कुछ कुबड़ी थीं तो कुछ के होंठ उनकी ठुड्डियों के नीचे तक लटक रहे थे। कुछ के सिर जंगली सुअरों, हिरणों, ऊँटों, बाघों और घोड़ों से मिलते-जुलते थे। कुछ के एक हाथ या एक ही पैर थे। कुछ राक्षसियों के सिर कबंध के समान उनके घड़ों में धंसे हुए थे और उनमें से अधिकाँश का पूरा शरीर माँस और रक्त से सना हुआ था।
सीता को खोज लेने के कारण, हनुमान आनन्द से आँसू बहा रहे थे। अशोक वृक्ष के शिखर पर छुपे रहकर वह सीता को देख रहे थे और रात धीरे-धीरे समाप्त होने को थी।
उषा वेला से पहले ही वाद्य यंत्रों के साथ आये चारण कवियों द्वारा रावण का स्तुति गान किए जाने के कारण, रावण जाग चुका था। जागते हो, रावण का मन सीता के बारे में सोचने लगा क्योंकि उसके मन में सीता को पाने को अत्यन्त प्रबल लालसा थी। सीता के लिए अपनी लालसा को दबा नहीं पाने के कारण रावण सीधे अशोक वाटिका की ओर चल पड़ा और उसके साथ सोने के दीपक, चामर, गद्दे, पानी और दूसरी वस्तुएँ लिए एक सौ सुंदर स्त्रियाँ भी थीं। पिछली रात को शराब की खुमारी में, रावण लड़खड़ाते हुए चल रहा था और उसके पीछे-पीछे सुंदर स्त्रियाँ थीं जो काले बादलों के पीछे चमकती बिजली की कौंध के समान दिखाई दे रही थीं।
रावण को आते देखकर, हनुमान सावधानीपूर्वक पत्तों के घने झुरमुट में छिप गये। रावण को आते देख, सीता ने अपने वस्त्र से अपने शरीर को यथासंभव अच्छी तरह ढँक लिया और फिर क्रोध से थर-थर काँपती हुई वह बैठ गई और रोने लगी। नंगी धरती पर बैठी हुई सीता इस प्रकार आगे-पीछे हिल-डुल रही थी मानो किसी तूफानी समुद्र में फँसकर डोलती हुई कोई जीर्ण-शीर्ण नौका हो।
अपनी इस दयनीय अवस्था में सीता ऐसी जान पड़ रही थी मानो कोई ज्ञान पुंज मद्धम पड़ गया हो, मानो कोई आशा की किरण निरुत्साहित हो गई हो, मानो कोई व्यवस्था अव्यवस्थित हो गई हो, या कोई पवित्र वेदी अपवित्र हो उठी हो। वह ग्रहण लगे पूर्णमासों के चंद्रमा के समान थीं, पस्त पड़ गई किसी सेना के समान या अकाल के कारण सूख गई किसी धारा के समान थीं। वह एक ऐसे सरोवर की भाँति दिख रही थीं जिसमें से कमल के सारे फूलों को उखाड़ दिया गया हो, वह किसी बुझी हुई ज्वाला के समान, या भय से उड़ गये पक्षियों के समान दिख रही थीं। निराहार व चिंतामग्न रहने और दुख व भय के कारण सीता की देह दुर्बल हो। गई थी और उनका मन अवसाद से भर गया था।
सीता के सामने पहुँचकर उनके मन में काम वासना जागृत करने की आशा से रावण बोला, "हे गौर वर्णवाली, हे सर्वश्रेष्ठ सुंदरी, तुम अपने सुगढ़ स्तनों और पतली कमर को क्यों ढँक रही हो? हे कमल नयनी सुंदरी, मैं तुम्हारे प्रेम का प्यासा हूँ, इसलिए अपनी लज्जा त्याग दो। प्रिये, मुझ पर दया करो और मेरे मन में तुम्हें भोगने की जो असहनीय लालसा है उसे पूरा करो। दूसरों की पत्नियों क अपहरण करना या उनके साथ बलात्कार करना बहुत पुरानी राक्षसी परंपरा है, परंतु मैं तब तक तुम्हारा स्पर्श नहीं करूँगा जब तक कि तुम स्वेच्छा से मुझे अपना प्रेम नहीं दे देती।
तुम तो देवी हो। भला फिर तुम नंगी धरती पर क्यों पड़ी हो? तुम अकारण ही अन्न-जल का त्याग करके मैले कुचले वस्त्र क्यों पहने हुए हो? तुमने अपने बालों को एक चोटी में क्यों गूँथ रखा है और सदैव चिंतामग्न क्यों रहती हो? तुम्हारे समान अतिसुंदरी को यह बिल्कुल भी शोभा नहीं देता है। मेरी रानी बन जाओ और तीनों लोकों में अप्राप्य राजसी ऐश्वर्य का आनन्द-भोग करो। तुम्हें सर्वश्रेष्ठ फूल- मालाएँ, चंदन का लेप, इत्र और आभूषण मिलेंगे। तुम सर्वाधिक सुस्वादु भोजन करोगी, सर्वाधिक अद्भुत पेय पदार्थों का रसपान करोगी और सर्वाधिक आरामदेह बिस्तरों पर आराम करोगी। सदैव नाचते, गाते और संगीत का आनन्द लेते हुए जीवन का लुत्फ उठाओ!
हे सुंदरी यौवन बहुत जल्दी बीत जाता है। इसलिए, तुम्हारा यह हठ एकदम बेतुका है। तुम्हारा मुखमंडल पूर्णमासी के चंद्रमा से भी अधिक गोरा और सुंदर है और तुम्हारी शारीरिक रचना किसी मँजे हुए कलाकार की श्रेष्ठतम रचना के समान है।
तुम मेरी प्रिय पत्नी बन जाओ और इसके बदले में तुम्हें प्रसन्न करने के लिए कुछ भी कर दूंगा। यदि तुम चाहो तो मैं सम्पूर्ण पृथ्वी को जीतकर तुम्हारे पिता, राजा जनक को उपहार में दे दूँगा। मुझे मना करने का दुस्साहस भला कौन कर सकता है ? हे सीता, तुम्हें देखने के बाद मैं इतना व्याकुल हो उठा हूँ कि मुझे अपनी किसी भी पत्नी से सुख नहीं मिलता है, यहाँ तक कि मंदोदरी से भी नहीं। भला तुम उस राम के प्रति एकनिष्ठ रहने पर क्यों अड़ी हुई हो जो मेरी तुलना में सड़क पर पड़े हुए एक तिनके के समान एक मनुष्य मात्र है। मुझे इस बात पर भी सन्देह है कि राम अब भी जीवित है और यदि वह जीवित है तब भी तुम आश्वस्त रह सकती हो कि अब तुम उसे फिर कभी नहीं देख पाओगी।
सीता ने अपने व रावण के बीच में एक तिनका रखकर संकेत से यह जतला दिया कि वह उससे कोई भी सीधा संपर्क नहीं रखना चाहती है। इसके बाद वह विनम्रता से बोली, "तुम्हें मुझसे अपना मन हटा लेना चाहिए और तुम्हारे पास पहले से जो अनगिनत पत्नियों है उनसे संतुष्ट रहो। जिस प्रकार एक पापों को कभी भी पूर्णता प्राप्त नहीं होती, उसी प्रकार तुम भी मुझे कभी नहीं पा सकोगे। मेरा जन्म एक श्रेष्ठ व धर्मपरायण परिवार में हुआ है और मेरा विवाह धार्मिक सिद्धांतों से हुआ है। मैं कभी भी धर्म के विरुद्ध कोई कार्य नहीं करूंगी, इसलिए तुम्हें मुझसे कृपा-दृष्टि पाने की कोई भी आशा नहीं रखनी चाहिए।
सीता ने रावण की तरफ पीठ फेर ली और बोलती रहीं, चूँकि तुम विकृत आचरण कर रहे हो और स्वयं को धर्म के मार्ग से दूर ले जा रहे हो, इसलिए शीघ्र ही तुम अपने सम्पूर्ण राज्य के विनाश का कारण बनोगे। तुम उन सद्-पुरुषों के मार्ग का अनुसरण क्यों नहीं करते जो अपनी और साथ ही दूसरों की पत्नियों की भी रक्षा करते हैं? अपनी पत्नी से असंतुष्ट रहने वाले व्यक्ति मूर्ख होते हैं और दूसरों की पत्नियों से आनन्द-भोग की कामना करने वाले विनाश के पथ पर चलते हैं। तुम बुद्धिमानों की सलाह की अनदेखी करके, अच्छाई को क्यों नकारते हो? आखिर तुम समस्त राक्षसों के विनाश का कारण बनने पर क्यों तुले हुए हो ? क्या तुम नहीं जानते कि दुष्टों की मृत्यु पर सभी लोग आनंदित होते हैं ?
मैं कभी भी तुम्हारे तुच्छ ऐश्वर्य और तुच्छ राजसी सुखों के प्रलोभनकारी प्रस्तावों के झांसे में नहीं आऊँगी। जिस प्रकार सूर्य से धूप अलग नहीं हो सकती है। उसी प्रकार मैं भी राम से अलग नहीं हो सकती हूँ। तुम अपनी रक्षा मात्र एक ढंग से कर सकते हो और वह यह कि तुम स्वेच्छा से मुझे राम को सौंप दो। तुम्हें राम से मित्रता करने का प्रयास करना चाहिए क्योंकि वह अपनी शरण लेने वालों के प्रति असीम दया-दृष्टि रखते हैं। अन्यथा, वह दिन दूर नहीं जब राम और लक्ष्मण यहाँ आकर अपने बाणों से तुम्हारे प्राण हर लेंगे। संभव है कि तुम इंद्र के वज्र से अपनी रक्षा कर लो, परंतु राम के क्रोध से तुम कभी भी नहीं बच सकते। राम के लिए तुम्हें ढूँढने की ही थोड़ी देर है और तुम्हारा पता चलते ही वह तुम्हारी दुष्टता के लिए तुम्हें दंडित करेंगे!
रावण कुपित होकर गुर्राया, "सामान्यतः, जब कोई पुरुष किसी स्त्री से आदर का व्यवहार करता है, तो वह स्त्री उस पुरुष के साथ अधिक अनुकूल व्यवहार करती है, परंतु तुम्हारे मामले में इसकी उल्टी बात लागू होती है। तुम्हारे कटु शब्दों के लिए मुझे तुम्हारा वध कर देना चाहिए! तुम भाग्यशाली हो क्योंकि जिस प्रकार एक सारथी बेलगाम घोड़ों को वश में करता है उसी प्रकार तुम्हारे प्रति मेरे प्रेम ने मेरे क्रोध पर लगाम लगा रखा है। प्रेम अत्यंत्र विचित्र ढंग से आचरण करता है, अर्थात कोई प्रेयसी अपने प्रेमी के साथ जितना ही अधिक दुर्व्यवहार करती है तो प्रेमी उस पर उतना ही अधिक स्नेह लुटाता है। एकमात्र इसी कारण से से तुम्हारा वध नहीं कर रहा हूँ, वरना तुम तो वध कर दिए जाने लायक और बेइज्ज्त किए जाने लायक हो।
मैंने तुम्हें जो एक वर्ष का समय दिया था उसमें से दस माह बीत चुक हैं। इसलिए मैं अब केवल दो माह प्रतीक्षा करूँगा। इसके बाद भी यदि तुमने मेरे प्रेम का प्रत्युत्तर देने से मना किया, तो मैं अपने रसोइयों से तुम्हारे टुकड़े-टुकड़े करवाकर, सुबह के नाश्ते में खा जाऊंगा! रावण द्वारा अपहृत की गई उसकी कुछ पत्नियाँ उस समय वहाँ पर उपस्थित थीं और रावण द्वारा सीता को दी गई धमकी सुनकर उन्हें सीता के प्रति सहानुभूति महसूस हुई। रावण जब वहाँ से जाने को हुआ, तो वे सीता को तसल्ली देने लगीं और उनकी सहानुभूतिपूर्ण बातों से सीता को कुछ ढांढस मिला।
उनकी बातों से उत्साहित होकर, सीता ने एक बार फिर रावण को फटकारा, तुम्हारे राज्य में संभवत: तुम्हारा एक भी शुभचिंतक नहीं है क्योंकि तुम स्वयं अपने विनाश को आमंत्रित करने का जो दुष्कार्य कर रहे हो कोई भी तुम्हें वह करने से नहीं रोक रहा है। राम एक विशाल हाथी हैं, तो तुम एक छोटे-से खरगोश हो। इस समय राम यहाँ पर नहीं हैं इसलिए तुम इतने अभिमान से बातें कर रहे हो। मैं अपनी योग शक्तियों का प्रयोग करके तुम्हें इसी क्षण जलाकर भस्म कर सकती हूँ, परंतु राम का आदेश न होने के कारण इस समय मैंने स्वयं को ऐसा करने से रोक रखा है। राम की पत्नी का अपहरण करना वास्तव में किसी भी व्यक्ति के लिए असंभव है। तुम ऐसा केवल इसलिए कर पाए, क्योंकि भाग्य ने तुम्हारे वध के लिए, मुझे एक कारण के रूप में चुना।
ऐसे कटु शब्द सुनकर, रावण किसी घायल नाग की भाँति फुफकारा और क्रोध से लाल हो उठे नेत्रों से सीता को घूरने लगा। वह चिंघाड़कर बोला, मैं आज ही तुम्हारा वध कर दूँगा। इसके बाद, सीता की पहरेदारी कर रही राक्षसियों को संबोधित करके बोला, सीता को समर्पण करने के लिए जो भी संभव उपाय हो उसका प्रयोग करो। साम-दाम-दंड-भेद जो भी जरूरी ही वह करो, परंतु सीता को मुझे अपनाने के लिए मनाओ।
रावण एक बार फिर भयानक मुद्रा में सीता की और मुड़ा। तभी रावण की सबसे छोटी पत्नी,धन्यमालिनी के साथ मंदोदरी वहाँ आ पहुँची। रावण के हिंसक हो उठने की आशंका से धन्यमालिनी वहाँ गई और अपने पति को गले से लगाते हुए बोलो, "अपने राजमहल में चलकर हमारे साथ आनन्द-भोग करें। इस बीमार और दुखी सीता को भूल जायें। जब एक पुरुष किसी ऐसी स्त्री के साथ आनन्द- भोग करने की कामना करता है जो उससे प्रेम नहीं करती, तो इससे उस पुरुष को मात्र कष्ट ही पहुँचता है, परंतु जब पुरुष किसी ऐसी स्त्री की कामना करता है जो उससे प्रेम करती है, तब उसे अत्यन्त आनन्द प्राप्त होता है।
इस प्रकार से, रावण द्वारा सीता को और अधिक डराए-धमकाये जाने से रोक लिया गया। रावण मिथ्याभिमान से हँसते हुए अपने राजमहल को लौट गया। उसके जाने के बाद भयानक रूप वाली पहरेदार राक्षसियाँ सीता के पास पहुँची और उसे डराने-धमकाने लगीं।
एकजटा नामक राक्षसी बोली, "अपना झूठा अहंकार त्याग दो और रावण को स्वीकार कर लो क्योंकि रावण सबसे महान् हैं। पुलस्त्य छह प्रजापतियों में से चौथे और ब्रह्माजी के मानस पुत्र थे। पुलस्त्य के मानस पुत्र का नाम ऋषि विश्रवा था और रावण उन्हीं के पुत्र हैं। राक्षस-राज को अपने लिए अयोग्य मानकर उन्हें स्वीकार करने में संकोच न करो। परंतु यदि इस पर भी तुम अपने हठ पर अड़ी रही, तो निश्चित ही तुम्हारा विनाश हो जायेगा।
दुर्मुखी नामक एक अन्य राक्षसी बोली, तुम मूर्ख हो जो रावण की रानी बनने से मना कर रही हो। क्या तुम नहीं जानती कि रावण के आदेश पर वृक्ष अपने फूल बिखेर देते हैं और बादल मूसलाधार वृष्टि करने लगते हैं? यदि रावण सूर्य और पवन से अप्रसन्न हो जायें तो सूर्य रोशनी बिखेरना और पवन हवा चलाना बंद कर देते हैं। हे स्मित मुस्कान वाली देवी, हमारी बात मान लो, अन्यथा तुम्हारी बहुत भवानक मृत्यु होगी।
सीता शान्ति से बोलीं, तुम लोग मुझे खाना चाहते हो, तो खा लो, परंतु मैं कभी भी रावण के सामने आत्म-समर्पण नहीं करूँगी।
सीता को जिद पर अड़े हुए देख, राक्षसियों ने भाले कुल्हाड़ियाँ और छुरियाँ उठा ली और उसे घेरकर डराने-धमकाने लगीं। उनमें से एक चिल्लाकर बोली, "तुम युवा, मुलायम और नाजुक हो। यदि तुमने इसी क्षण रावण की पत्नी बनना स्वीकार नहीं किया, तो मैं तुम्हारा हृदय, यकृत और प्लीहा खा जाऊँगी। अन्य राक्षसियाँ चीखकर बोलों, मैं तुम्हारी रसीली जंघाएँ खाऊँगी! मैं तुम्हारा गर्म-गर्म रक्त पिऊँगी !
अजमुखी नामक एक राक्षसी बोली, "मुझे व्यर्थ की बड़बड़ से चिढ़ है। चलो इसे काटकर आपस में बराबर बाँट लेते हैं। शराब लाने का आदेश दी। मनुष्य के माँस को खाकर जश्न मनाते हैं और देवी भद्रकाली के सामने नृत्य करते हैं। आखिरकार, सीता इन घृणित बातों को और अधिक सहन नहीं कर पाईं और फूट-फूटकर रोने लगीं। भय से थर-थर काँपते हुए वह बार-बार "हे राम । हे लक्ष्मण!" कहकर चिल्लाने लगीं।
अनवरत् रोते और अश्रु बहाते हुए सीता विलाप करने लगी, "हे राम, आप यहाँ आकर मेरी रक्षा क्यों नहीं करते ? शायद उन्हें यह पता ही नहीं है कि मैं कहाँ हूँ। शायद वह अब तक मेरे वियोग के दुख से प्राण त्याग चुके हैं और अब स्वर्ग में वास कर रहे हैं। हो सकता है कि रावण ने किसी दुष्ट चाल से राम का वध कर दिया हो। आह, राम कब यहाँ आयेंगे और कब इन सारे राक्षसों का वध करके मुझे अयोध्या वापस ले जायेंगे? मैं इतनी अभागी क्यों हूँ कि तत्काल अपने प्राण भी नहीं त्याग सकती? काश कि मैं मर सकती, क्योंकि इस दुख से निश्चित ही मृत्यु बेहतर है।"
जिस समय राक्षसियाँ सीता को डरा-धमका रही थी उसी समय त्रिजटा नामक एक प्रौढ़ स्त्री गहरी नींद से अचानक जाग उठी। वह अन्य राक्षसियों के पास जाकर विवेकपूर्ण ढंग से बोली, अरे दुष्टात्माओं। सीता को इस तरह पीड़ित करने का तुम्हें इतना दुस्साहस कैसे हुआ ? तुम कभी भी उसे नहीं खा पाओगी और इसका कारण मैं तुम्हें बताती हूँ। अभी-अभी मैंने एक स्वप्न देखा कि राम यहाँ आये और सभी राक्षसों का संहार करके सीता को ले गये।"
इस पर अन्य राक्षसियों ने उससे अनुरोध किया कि वह अपना पूरा सपना बताए। तब त्रिजटा बोली, मैंने राम और लक्ष्मण को सफेद वस्त्र और सफेद फूल-मालाएँ पहने हुए देखा। वे 1000 श्वेत अश्वों द्वारा चालित एक दिव्य रथ में बैठकर आकाश मार्ग से आ रहे थे।
इसके बाद दृश्य बदल गया और मैंने देखा कि राम एक विशाल चार दाँत वाले हाथी पर बैठे हुए हैं। वह ऊपर से लेकर नीचे तक श्वेत वस्त्रों से सज्जित हैं। सीता ने भी श्वेत वस्त्र धारण कर रखे हैं और वह समुद्र के मध्य में स्थित एक श्वेत पर्वत पर खड़ी हैं। राम के निकट आते ही, सीता उनके हाथी पर चढ़ गई और इस प्रकार अपने पति से उनका पुनर्मिलन हो गया। इसके बाद, मैंने देखा कि राम सीता और लक्ष्मण पुष्पक-रथ पर सवार होकर आकाश-मार्ग से उत्तर दिशा की ओर बढ़ रहे हैं।
इसके बाद मैंने अपने सपने में रावण को देखा उसका सिर मुंडा हुआ था और उसकी देह पर लाल चंदन का लेप लगा हुआ था। वह गधों द्वारा खींचे जा रहे एक रथ पर सवार था और तेल पीते हुए ऐसे हँस रहा था मानो वह पागल हो गया हो। उसका रथ आगे गंदगी से भरी हुई चीजों की एक नरक जैसी जगह पर जाकर गायब हो गया जहाँ से बहुत ही असह्य दुर्गंध उठ रही थी।
इसी तरह की दशा में, मैंने कुंभकर्ण और रावण के अन्य पुत्रों को भी देखा, परंतु विभीषण को नहीं विभीषण सफेद चंदोवे से बॅंके, चार दाँत वाले एक हाथी पर बैठा था। उसके आगे शंख और ढोल-नगाड़े बज रहे थे। अंत में, मैंने समूची लंका नगरी को भरभराकर समुद्र में गिरते हुए देखा। इसलिए, मेरा यह मानना है कि राम बहुत शीघ्र ही आकर समस्त राक्षसों का संहार करेंगे और फिर सीता को ले जायेंगे। इसलिए अच्छा यही है कि तुम लोग सीता को डराना सताना बंद कर दो और उससे क्षमा माँग लो।
इसी समय, सीता के बेदाग शरीर पर शुभ चिह्न प्रकट हुए जो मानो किसी संपत्तिशाली व्यक्ति के नौकरों की भाँति उत्सुकतापूर्वक अपने स्वामी की प्रतीक्षा कर रहे थे। उनका कमल समान वायाँ नेत्र और बायाँ हाथ फड़कने लगा। सीता की पुष्ट- कोमल बाँयों जंघा भी इस प्रकार फड़कने लगी मानो उनके सामने स्वयं राम खड़े हो गये हो।
यह देखकर त्रिजटा ने घोषणा की ये शुभ संकेत चिह्न देखकर, मैं विश्वासपूर्वक कह सकती हैं कि शीघ्र ही सीता को कोई शुभ समाचार मिलने वाला है।
यह सुनकर सीता बहुत प्रसन्न हुई और बोली, " आपका सपना यदि सच हुआ, तो मैं अपने पति के क्रोध से निश्चित ही आपकी रक्षा करूँगी।
परंतु शीघ्र ही अपने आस-पास खड़ी राक्षसियों को ओर देखते ही, सीता को फिर से निराशा और उदासी ने घेर लिया। सीता ने सोचा, यदि राम के यहाँ आकर मेरा उद्धार करने से पहले ही रावण मेरा वध कर दे, तो क्या होगा? इस अधम दुखमय स्थिति के गर्त में, मैं और अधिक दुख सहन नहीं कर सकती हूँ।
अपने प्राण त्याग देने की इच्छा से, सीता ने अपने वालों को बांधने वाली डोरी निकाली। अपने गले में इसका फंदा बनाने के बाद, सीता उसके दूसरे छोर को अपने शरणदाता अशोक वृक्ष की एक शाखा से बाँधने लगी। ठीक तभी, उसे अपने शरीर में एक शुभ फड़कन महसूस हुई और इसके कारण सीता के मन में आशा का संचार हुआ ।
इस दौरान, हनुमान छिपे रहकर सीता और राक्षसियों के बीच हो रही बातें सुनते रहे। उन्होंने स्थिति पर इस प्रकार विचार किया, बेहतर यहीं है कि मैं सीता के पास जाऊँ और उन्हें सांत्वना दूँ क्योंकि अत्यधिक दुख के कारण उनकी बुद्धि पर पर्दा पड़ गया जान पड़ता है। यदि मैं उन्हें ढाँढस बँधाए बिना राम के पास लौट जाता हूँ, तो निश्चित ही यह मेरी एक बड़ी भूल होगी। हताशा के मारे, सीता किसी भी समय अपने प्राण त्याग सकती हैं, परंतु मैं क्या करूँ ? ये सारी राक्षसियों उन्हें घेरकर खड़ी हैं। मैं उनसे कैसे बात करूँ? कोई बात नहीं! मुझे किसी न किसी तरीके से ऐसा करना ही होगा ! यदि राम मुझसे पूछें कि क्या सीता ने मेरे लिए कोई संदेश भेजा है और मैं उन्हें बताऊँगा कि कोई संदेश नहीं भेजा, तो वह अपने क्रोध से मुझे जलाकर राख कर देंगे। हाँ, राम और सीता दोनों को ही एक-दूसरे के सांत्वना देने वाले संदेशों की बहुत आवश्यकता है।
जिस समय पहरेदार बेपरवाह होंगे, तब में जाकर सीता से भेंट करूँगा।। यदि मैं उनसे संस्कृत में वार्तालाप करूँगा, तो निश्चित ही उन्हें मुझ पर विश्वास हो जायेगा नहीं, नहीं, यदि मैं किसी ब्राह्मण की भाँति उनसे बात करूँगा, तो वह यह सोच सकती हैं कि मैं साधु के वेश में रावण हूँ। मेरे विचार से यदि मैं अयोध्या की बोली में उनसे बात करूँ, तब वह मेरा विश्वास कर लेंगी। नहीं, नहीं, यह कारगर नहीं होगा। यदि सीता एक वानर को मानव की तरह बोलते सुनेंगी, तब भी वह मुझे रावण ही समझेंगी। आखिर, राक्षसों का राजा अपनी इच्छा से कोई भी रूप धारण कर सकता है।
मुझे जरा सावधान रहना चाहिए। यदि सीता चिल्ला पड़ीं, तो पहरेदार सचेत । हो जायेंगे और रावण के सैनिकों को बुलवा लेंगे। अगर ऐसा हुआ, तो मैं पकड़ा जा सकता हूँ। यदि मैं सभी राक्षसों को हरा दूँ, तब संभवतः मैं इतना थक जाऊँगा कि समुद्र पार करके वापस पहुँचने के लिए शायद छलाँग नहीं लगा पाऊँ। मुझे सीता के पास पहुँचने का सबसे अच्छा उपाय सोचना होगा, क्योंकि एक मूर्ख संदेशवाहक शानदार से शानदार योजना को भी चौपट कर सकता है।
अपनी दुविधा पर इस प्रकार विचार करने के बाद, हनुमान ने अंततः निर्णय ले लिया, पहले मैं राम की महिमा का गुणगान करूँगा। इसके बाद सीता का विश्वास अर्जित करने के बाद, मैं राम का संदेश उन तक पहुँचाऊँगा।
वृक्ष की शाखों के बीच छिपे रहकर, हनुमान ने इस प्रकार से यह कविता सुनाई कि सीता उसे सुन लें:
इक्ष्वाकु के वंशज ,राजा दशरथ उनका नाम, धर्मात्मा और प्रतापी अयोध्या के शासक, उनका गूँजे चहूँ और यशगान। अंततः हुए चार पुत्र जिनमें प्राणप्रिय थे राम, असीमित शक्तियों से पूर्ण, वह थे विष्णु का मानव अवतार। कैकेयी को वरदान देकर, राम को भेजा वनवास, अपने पिता के वचन की खातिर, सीता व लक्ष्मण सहित किया प्रस्थान ।ऋषियों को आतंकित करते, राक्षसों का किया जब संहार, रावण ने हर लिया सीता को,हिरण बने मारीच के छल से।सीता को खोजने की खातिर, सुग्रीव के राम मित्र बने, दक्षिण दिशा में खोजने को, मुझ हनुमान को राम भेजे।अनेक पर्वत पार करके, समुद्र के ऊपर से लगाई छलाँग, तब जाकर मिली सफलता, खोज लिया, हे देवी, आपको, राम आयेंगे आपके उद्धार को, आप ही हैं उनकी प्राणप्रिये, अपने प्रियतम की जीवनरक्षा को, हे देवी अब मुझे दें अपना संदेश,
यह कविता सुनकर सोता आश्चर्यचकित रह गई और ऊपर की ओर देखकर। इसे सुनाने वाले को ढूँढने लगीं और उन्होंने हनुमान को देखा। हनुमान को देखकर सीता अत्यन्त भयभीत हो उठीं और यह सोचकर रोने लगों कि सपने में एक बार को देखना अत्यन्त अशुभ होता है।
भय और अत्यधिक पीड़ा से निढाल होकर सीता अचेत हो गई। कुछ देर बाद चेतना लौटने पर, सीता ने सोचा, अपने दुःस्वप्न में एक वानर को देखने के कारण, मुझे राम और लक्ष्मण को कुशलता के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। परंतु भला मैं स्वप्न कैसे देख सकती हूँ? राम से वियोग के पश्चात, मैं एक क्षण के लिए भी नहीं सोयी हूँ। यह मेरा कोई भ्रम होगा। यह वानर सचमुच का नहीं हो सकता है क्योंकि मुझे हर जगह सिर्फ राम हो राम दिखाई देते हैं। मेरे कान सिर्फ राम का आवाज सुनते हैं और मेरा चित सिर्फ राम के ही बारे में सोचता है और कुछ नहीं। फिर भी, इस बात पर विश्वास करना कठिन है कि वह वातर मेरा भ्रम था क्योक यह सचमुच का जान पड़ता था।
तभी हनुमान वृक्ष से नांचे उतरे। सीता के समक्ष दोनों हाथ जोड़कर खड़े होने के बाद, उन्होंने पूछा, आप कौन हैं? आप कोई देवी जान पड़ती हैं इसलिए मेरा अनुमान है कि आप राम की पत्नी हैं।
"राम" का नाम सुनकर सीता अत्यन्त प्रसन्न हुई और इस प्रश्न के उत्तर में उन्होंने अपनी पूरी जीवन-गाथा कह सुनाई। इतने लंबे समय के बाद हनुमान वह पहले व्यक्ति थे जिनसे सीता ने मित्रतापूर्ण ढंग से बात की थी। सीता ने अंत में कहा, "रावण ने मुझे मात्र दो माह तक जीवित रखने की धमकी दी है। यदि इससे पहले राम नहीं आते, तो मैं स्वेच्छा से अपने प्राण त्याग दूंगी।"
सीता द्वारा इस प्रकार विश्वास करके अपने हृदय की बात कहने से, हनुमान का आत्मविश्वास बढ़ गया। वह बोले, "मैं राम का दूत हूँ और मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि राम कुशलपूर्वक हैं। राम ने मुझे यहाँ पर आपका पता लगाने के लिए भेजा है और वह आपको कुशल-क्षेम जानना चाहते हैं।
यह सुनकर सीता बहुत प्रसन्न हुई और फिर कुछ देर तक वह दोनों प्रसन्नतापूर्वक बातें करते रहे। परंतु सीता की बातें बहुत मनोयोग से सुनने के कारण, हनुमान। धीरे-धीरे उनके निकट आते गये। यह देखकर, सीता के मन को एक भयानक विचार ने जकड़ लिया कि यह वानर संभवतः वेश बदलकर आया रावण हो सकता है। वह यकायक चिल्ला उठी, ओह कितनी घृणित बात है कि मैं तुम्हारे चलावे में आकर तुमसे बात करने लगी।
दुख व पोड़ा से जमीन में धंसते हुए सीता के मन में एक और विचार आया। सीता ने सोचा, इस वानर को देखकर मुझे एक प्रकार की प्रस्रता का अनुभव हो रहा है। हो सकता है कि मेरे सन्देह निराधार हों। हो सकता है कि यह सचमुच ही राम का संदेश वाहक हो।
स्वयं को शांत करने के बाद सीता ने फिर से आदरपूर्वक बात करना आरंभ किया और बोली, "कृपा करके मुझे राम के बारे में और बताओ उनके बारे में आपकी कही बातें मेरे कानों और हृदय को अत्यन्त प्रसन्नता प्रदान कर रही है।
असल में, राम से वियोग के कारण सीता गहन भावनात्मक आनन्द में डूब गई थीं। परिणामस्वरूप उनकी बातें आध्यात्मिक उन्माद की अभिव्यक्तियों थीं। किसी विक्षिप्त व्यक्ति को भाँति, सीता ने अनुमान लगाया, हो सकता है कि यह वानर कोई भूत हो या फिर शायद अपनी पीड़ा के कारण मानसिक रूप से असंतुलित हो जाने के कारण, यह मेरी कोई कल्पना मात्र है नहीं। मुझे इस प्रकार से नहीं सोचना चाहिए। भला मैं अपने मन के बहकावे में क्यों आऊँ? इसके बात करने के ढंग से यह निश्चित ही प्रकट होता है कि यह वानर राम के दूत के रूप में हो यहाँ आया है। परंतु मैं भला इस बात पर कैसे विश्वास कर सकती हैं कि एक वातर समुद्र पार करके लंका तक आ गया है ? निश्चित ही यह बदले हुए वेश में रावण है!
हनुमान सीता के सन्देह को समझने में सक्षम थे, इसलिए सीता को पुनः आश्वस्त करने के लिए वह राम की महिमा का बार-बार गुणगान करते रहे। इसके बाद, हनुमान की जाँच करने के लिए, सीता बोलों, कृपा करके मुझे यह बताएँ कि राम से आपको भेंट किस प्रकार हुई। साथ ही, राम और लक्ष्मण, दोनों के शारीरिक गठन के बारे में विस्तार से बताएँ।
इसके उत्तर में, हनुमान ने अत्यन्त सुंदर ढंग से राम और लक्ष्मण के रूप का बखान किया। फिर वह बोले, मैं उन भाइयों से ऋष्यमूक पर्वत पर मिला था। राम ने जब आपके आभूषणों को देखा, जिन्हें आपने रावण द्वारा ले जाये जाते समय वानरों के बीच गिराया था, तो वह इतने प्रसन्न हुए कि उनकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगी। सुग्रीव के साथ मित्रता करने के लिए राम ने वालि का वध किया। उनके उपकार का बदला चुकाने के लिए, सुग्रीव ने सम्पूर्ण पृथ्वी में आपकी खोज करने के लिए एक महान अभियान छेड़ दिया और इसके लिए लाखों वानरों को जगह- जगह भेजा। सौभाग्य से, मुझे इस एकांत स्थान में आपका पता चला।
मेरा नाम हनुमान है। मैंने महान वानर राज केसरी की पत्नी के गर्भ से वायु देव की कृपा से जन्म लिया।
हनुमान द्वारा राम के रूप का वर्णन सुनकर सीता को पूरा विश्वास हो गया कि वह राम द्वारा भेजे गये दूत हो हैं। सीता की आँखों से प्रसन्नता के आँसू छलक पड़े, तभी हनुमान ने सीता को राम की अंगूठी दी जिसके छल्ले के अंदर की तरफ रामः का नाम लिखा हुआ था। अंगूठी को हाथ में लेते ही, सीता का मुखमंडल प्रसन्नता। से इस प्रकार दमक उठा, मानो राम स्वयं वहाँ आ गये हों।
वह बोली, हे हनुमान, इस उपहार के लिए मैं सदैव आपकी आभारी रहूँगी। आप अत्यन्त उदार हैं, जो मेरी खातिर यहाँ तक आये हैं। कृपा करके मुझे राम के बारे में और अधिक बताएँ।
हनुमान ने दोनों हाथ जोड़कर कहा, आपका पता नहीं चल पाने के कारण ही राम यहाँ आकर आपका उद्धार नहीं कर पाए हैं। आपके बिना, राम का चित एक क्षण के लिए भी शाँत नहीं रह पाता है। आप निश्चित रहें कि जितनी जल्दी मैं यहाँ से जाकर राम को आपके बारे में सूचना दूँगा, उतनी ही शीघ्रता से राम यहाँ आकर रावण का संहार करेंगे।
तब सीता ने हनुमान से आग्रह किया, आप राम को अवश्य ही बताएँ कि उनका शीघ्रातिशीघ्र यहाँ आना कितना आवश्यक है क्योंकि दो माह बाद रावण मेरा वध कर देगा। रावण का छोटा भाई विभीषण बार-बार उससे याचना करता रहा है कि वह मुझे राम को लौटा दे। विभीषण की सबसे बड़ी बहन, कला ने मुझे बताया कि अविंध्य नामक एक वृद्ध व बुद्धिमान मंत्री ने रावण को यह चेतावनी दी कि शीघ्र ही राम द्वारा राक्षसों का संहार होना निश्चित है। परंतु रावाण इस तरह की सलाह नहीं सुनना चाहता है।
हनुमान बोले, यदि आप चाहें, तो मैं इसी समय आपको अपनी पीठ पर बिठाकर किष्किंधा वापस ले जा सकता हूँ। मुझे विश्वास है कि समुद्र पार करने के लिए छलाँग लगाने के बाद, राक्षस मुझे नहीं पकड़ पायेंगे।
सीता इस सुझाव को सुनकर रोमांचित हो उठीं, परंतु फिर भी वह बोली, आपका प्रस्ताव वानरों के चंचल चित्त के बिल्कुल अनुरूप जान पड़ता है। भला कोई इतने छोटे आकार का होकर भी मुझे पीठ में बिठाकर समुद्र पार करने को बात सोच भी कैसे सकता है ?
यह सुनकर हनुमान थोड़ा रुष्ट हो गये। उन्होंने सोचा, सीता मुझे कितना हेय समझती हैं।
सीता को अपनी शक्ति का विश्वास दिलाने के लिए हनुमान ने अपना विशाल रूप धारण किया और आत्म-प्रशंसा करते हुए बोले, यदि मैं चाहूँ तो रावण समेत पूरी लंका नगरी को उखाड़कर राम के पास वापस ले जा सकता हूँ। आप मुझ पर सन्देह न करे।
सीता हनुमान के दावे को स्वीकार करते हुए बोलों, आप निश्चित हो मुझे समुद्र पार करके ले जाने में पर्याप्त समर्थ हैं, परंतु तब भी मेरे अनुसार यह अच्छा विचार नहीं है। यदि आकाश में आपको उलाँग के समय मैं अचेत हो गई और आपकी पीठ से नीचे गिरकर शार्क मछलियों और मगरमच्छों से भरे जल में गिर गई तो क्या होगा? यदि राक्षस इकट्ठा होकर आप पर आक्रमण कर दें तो ? जिस समय आप उनसे युद्ध करने में पूरी तरह उलझे रहेंगे, तब मेरा क्या होगा? यदि आप सभी राक्षसों का संहार कर भी दें, तब भी इससे राम को ही प्रतिष्ठा कम होगी ?
प्रिय हनुमान में पूरी तरह से अपने पति के प्रति समर्पित हूँ और इसलिए, मैं उनके अतिरिक्त अन्य किसी के शरीर का स्पर्श नहीं करना चाहती हूँ। जिस समय रावण ने मेरा अपहरण किया था, तब मैं असहाय थी। मेरे पास कोई विकल्प नहीं था। अब राम को स्वयं ही यहाँ आकर दुष्ट रावण का वध करने के बाद मेरा उद्धार करना होगा। उनकी महिमामय प्रतिष्ठा को बढ़ाने के लिए यही कार्य सर्वोत्तम होगा।
हनुमान बोले, मैं आपकी भावनाओं को प्रशंसा करता हूँ और यह भावनाएँ भगवान राम की पतिव्रता व धर्मपरायण पत्नी को ही शोभा देती हैं। अब मुझे उनके पास लौटना चाहिए, इसलिए कृपा करके मुझे कुछ ऐसी निशानी दें जिससे राम इस बात के प्रति संतुष्ट हो सकें कि मैंने सचमुच आपसे भेंट की थी। आँसू भरी आँखों से सीता ने मद्धम स्वर में कहा, मेरे प्रिय हनुमान, राम को यह आश्वस्त करने के लिए कि आप मुझसे मिले थे, आप उन्हें यह घटना सुना सकते हैं। चित्रकूट में रहते समय एक दिन जलक्रीड़ा करने के बाद राम पानी से तर-बतर भीगे हुए मेरी गोद में आकर विश्राम कर रहे थे। उसी समय एक कौआ आकर मुझे चोंच मारने लगा मानो वह मेरा माँस खाना चाहता हो। मैंने कौए को डराकर भगाने के लिए मिट्टी का एक लोटा उठाकर मारा, परंतु कौआ हठी था इसलिए पास ही में छिप गया। मुझे कौए पर बहुत क्रोध आ गया था और इस कारण गलती से मेरी ओढ़नी खुलकर उत्तर गई। मेरी घबराहट को देखकर, राम जोर-जोर से हँसने लगे, जबकि इसी बीच वह कौआ फिर से मुझे चोंच मारने लगा। मैंने राम की शरण ली और उनकी गोद में जाकर बैठ गई। तब राम ने मेरे आँसू पोंछकर मुझे शांत किया। थकात के कारण, मैं शीघ्र ही राम की बाँहों में सो गई। कुछ देर बाद, राम की भी आँख लग गई। मौके का फायदा उठाकर कौए ने नीचे उतरकर मेरे स्तनों में पंजे गड़ा दिए और हड़बड़ाहट में मेरी आँख खुल गई। कौआ तब तक ऊपर उड़ गया और फिर से नीचे उतरकर उसने दोबारा मेरे स्तनों पर पंजा मारा। परिणामस्वरूप, मेरे चोटों से निकले खून के छोटों से राम की भी आँख खुल गई। उन्होंने मेरे दोनों स्तनों पर चोट के निशान देखें तो वह बहुत क्रोधित हो गये और उन्होंने मुझसे यह धृष्टता करने वाले की पहचान पूछो। इससे पहले कि मैं कुछ उत्तर देती, राम ने थोड़ी दूरी पर बैठे कौए को देखा जिसके पंजों से खून टपक रहा था।
अत्यन्त क्रोध के कारण, राम ने अपनी चटाई से कुश पास का एक तिनका उठाया और इसे ब्रह्मास्त्र से अभिमंत्रित करके शक्ति प्रदान की। उस तिनके से ज्वालाएँ निकलने लगी, तो राम ने उसे कौए की तरफ फेंक दिया। यह देखकर कौआ आसमान में उड़ने लगा, परंतु कुश घास का वह अस्त्र उसका पीछा करने लगा। वह कीओ असल में इंद्र का पुत्र था। जिस समय ब्रह्मास्त्र उस कौए का पीछा कर रहा था, तब उसने सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में भटकते हुए हर जगह शरण माँगी, परंतु उसके पिता तक उसकी सहायता न कर सके। आखिरकार वह कौन राम को शरण में आया और उसने आत्म समर्पण कर दिया। राम ने दयालुता का परिचय देकर उस थके माँदे पक्षी को क्षमादान दिया, परंतु फिर वह बोले, 'यह ब्रह्मास्त्र व्यर्थ नहीं जा सकता, इसलिए इसे कहीं न कहीं चोट तो करती ही होगी।' यह कहकर, राम ने ब्रह्मास्त्र को कौए की दाहिनी आँख नष्ट करने का आदेश दिया। इसके बाद, राम को आदरपूर्वक प्रणाम करके, इंद्र का पुत्र वहाँ से चला गया।
यह लोला सुनाते हुए सीता बहुत उदास हो गईं। उनकी आँखों में आँसू भर गये और वह बोली, हे हनुमान राम ने एक तुच्छ कौए के विरुद्ध ब्रह्मास्त्र चला दिया था। परंतु अब वह रावण पर आक्रमण क्यों नहीं करते? क्या राम अब मुझसे स्नेह नहीं करते? पिछले जन्म में मैंने निश्चित ही कुछ पाप किए होंगे सभी राम को अब मेरी परवाह नहीं है।"
सीता को उत्तरहित करने के लिए, हनुमान बोले, मैं स्वयं इस बात को सत्यापित करके कह सकता हूँ कि आपसे वियोग के कारण, राम दुख के अथाह समुद्र में पूर्णतः दूबे हुए हैं। अब कृपा करके मुझे कोई ऐसी वस्तु दें जिसे मैं राम को दिखा सकूँ। सीता ने गहरी आह भरो और बोली, कम से कम अब मेरे पास सचमुच थोड़ी आशा है कि राम मेरा उद्धार करेंगे, परंतु आप उनसे यह आग्रह करना कि यदि एक माह बाद भी मुझे उनके दर्शन नहीं हुए, तो मैं निश्चित ही दुख से अपने प्राण त्याग दूंगी।
यह कहकर सोता ने अपने वस्त्र से एक चमचमाता हुआ रत्न निकाला जिसे पहले वह अपने माथे पर पहनती थीं। हनुमान की यह आभूषण देकर वह बोली, इस आभूषण को देखकर राम को तीन व्यक्तियों की याद आयेगी, क्योंकि यह आभूषण राम के पिता और मेरे पिता की उपस्थिति में मेरी माता द्वारा मुझे दिया गया था। हे हनुमान कृपा करके आपको जो भी करना है कुछ इस प्रकार करें ताकि राम और लक्ष्मण मेरो भयानक पीड़ा का अंत करने के लिए यहाँ यथासंभव शीघ्रता से आ सके।
हनुमान ने सीता की प्रदक्षिणा की और फिर वह वहाँ से प्रस्थान करने ही वाले थे कि तभी अश्रू भरे नेत्रों व रूँधे हुए कंठ से सीता फिर से बोलीं दया करके, राम को मेरे बारे में कुछ इस तरह से बताना कि वह मेरा शीघ्रातिशीघ्र उद्धार करने के लिए आतुर हो उठे।
हनुमान बोले, "चिंता न करें। शीघ्र ही आप राम, लक्ष्मण और अन्य प्रतापी वानरों द्वारा यहाँ आकर राक्षसों का संहार होते हुए देखेंगी।
सीता ने अनुरोध किया, "आप केवल एक दिन और यहाँ रुक जायें क्योंकि आपका सानिध्य मुझे अपनी असहनीय पीड़ा से थोड़ी सी राहत दे सकता है। ओह भला मेरो आशाएँ बढ़ ही कैसे सकती हैं? भला वानर-गण समुद्र कैसे पार कर सकेंगे? मेरे विचार से राम और लक्ष्मण भी ऐसा करने में सक्षम नहीं हो सकते हैं केवल गरुड़, वायु या आपमें ही यह क्षमता है। हे हनुमान, मुझे पता है कि आप अकेले ही मुझे यहाँ से ले जा सकते हैं, परंतु मेरा अनुरोध है कि किसी प्रकार राम को समस्त राक्षसों का संहार करके मेरी रक्षा करने में सहायता करें क्योंकि इससे उनको महिमामय प्रतिष्ठ सदा-सर्वदा के लिए वढ़ जायेगी।
हनुमान बोले, सुग्रीव को सेना के सभी वानरों की शक्ति मेरे समान या मुझ अधिक है, इसलिए आप उनके आसानी से लंका तक पहुँच जाने के संबंध में आश्वस्त रह सकती है। आप अवश्य ही जानती होंगी कि मेरे जैसे तुच्छ प्राणियों को ही दूतकार्य के लिए भेजा जाता है, इसलिए अपनी सभी शंकाएँ तत्क्षण त्याग दें। यदि आवश्यकता पड़ी तो मैं राम और लक्ष्मण को अपनी पीठ पर बिठाकर समुद्र पार करा लाऊंगा।
सीता बोलो, "मेरे प्रिय हनुमान, मुझे बचाने के काम को शीघ्र से शीघ्र करने का प्रयास करें क्योंकि पता नहीं मैं कितने समय तक इन कष्टकारी स्थितियों को सहन करके जीवित रह पाऊँगी। राम के लिए मेरा एक और संदेश है। उन्हें याद दिलाना कि एक बार उन्होंने मेरे गालों पर लाली के लिए एक लाल खनिज का उपयोग किया था क्योंकि मेरे पास सौंदर्य प्रसाधन नहीं थे।
हनुमान फिर से प्रस्थान की तैयारी करने लगे और सीता बार-बार उन्हें अनुरोधपूर्वक याद दिलाती रहीं कि उसे यहाँ से ले जाने का कार्य शीघ्रातिशीघ्र संपन्न किया जाये। हनुमान ने सोचा, राक्षसों की वास्तविक शक्ति का अनुमान किए बिना मेरा यहाँ पर कार्य पूर्ण नहीं होगा। मैं रावण के सुख-आनन्द के लिए बनी इस अशोक वाटिका को तहस-नहस कर दूँगा ताकि उसे गुस्सा आ जाये। जब राक्षसराज रावण मुझे मारने के लिए अपनी सेना भेजेगा तो मैं उसे नष्ट करके राम के पास लौट जाऊँगा।
ऐसा मन बनाकर हनुमान ने कुछ वृक्षों को तोड़कर और कुछ को जड़ सहित उखाड़कर अशोक वाटिका को नष्ट करना आरंभ कर दिया। उन्होंने वहाँ बनाए गये सरोवरों को खाली कर दिया और पर्वत शिखरों को नष्ट कर डाला। अशोक वाटिका को तहस-नहस करने के बाद हनुमान उसके प्रवेश-द्वार पर खड़े हो गये। भयाक्रांत पशु पक्षियों की आवाजें सुनकर और हनुमान द्वारा मचाए जा रहे उत्पात का शोर सुनकर, पहरेदारी कर रही राक्षसियाँ हड़बड़ाकर जाग उठीं। हनुमान को अपने विशालकाय आकार में वाटिका के प्रवेश द्वार पर खड़े देखकर, राक्षसियों का हृदय आतंकित हो उठा। सीता को घेरकर, राक्षसियों ने पूछा, यह प्राणी कौन है? तुम उससे किस बारे में बात कर रही थी?
सीता ने हनुमान को पहचानने से इंकार कर दिया। वह बोली, वह अवश्य हो कोई राक्षस होगा। तुम सब राक्षसियाँ हो, इसलिए तुम्हें पता होना चाहिए। कि वह कौन है न कि मुझे मैं भी इस विशाल और अद्भुत प्राणी को देखकर भयभीत हूँ।
कुछ राक्षसियों सीता की पहरेदारी के लिए वहीं रुकी रहीं, जबकि अन्य राक्षसयाँ रावण को इसकी सूचना देने दौड़ पड़ीं। अपने राजा के सामने शीश झुकाने के बाद वे बोलों, वाटिका में एक भीमकाय वानर है जिसने पहले तो सीता से बातें की और उसके बाद सीता वाले छोटे से हिस्से को छोड़कर सम्पूर्ण अशोक बाटिका को तहस-नहस कर डाला। जब हमने सीता से उस वानर की पहचान के बारे में पूछा तो उसने यह दावा किया कि वह उसे नहीं जानती है।
क्रोध से उत्तेजित होकर रावण ने हनुमान को बंदी बनाने के लिए किंकर नामक 80000 राक्षसों को भेजा। हनुमान ने अस्त्र-शस्त्र लहराते हुए राक्षसों को अपनी ओर बढ़ते हुए देखा, तो उन्होंने अपना आकार और अधिक बढ़ाते हुए अपनी पूँछ को इतने उग्र ढंग से लहराना आरंभकिया कि इसके लहराने की आवाज पूरी लंका मे गूंज उठी।
हनुमान ने चुनौती देकर कहा, मैं भगवान् राम का एक सेवक हूँ। यदि मैं चाहूँ तो 1000 रावणों का संहार कर सकता हूँ।
यह कहकर हनुमान ने भयानक गर्जना की। किंकर भयभीत हो उठे थे, परंतु उन्होंने चारों ओर से हनुमान पर धावा बोल दिया। हनुमान ने पास ही में पड़ी लोहे की एक बड़ी छड़ उठा ली। फिर हवा में उड़ते हुए उन्होंने बहुत ही कम समय में सभी राक्षसों का वध कर दिया। कुछेक किंकर बच गये और वे दौड़े-दौड़े रावण के पास पहुँचे और रावण को राक्षसों के संहार की सूचना दी। यह समाचार सुनकर रावण की आँखें क्रोध से लाल हो उठीं। इसके बाद, उसने अपने प्रधानमंत्री प्रहस्त के शक्तिशाली पुत्र जाम्बुमालीं को युद्ध करने भेजा।
इस बीच, हनुमान अशोक वाटिका में स्थित राक्षसों की अधिष्ठात्री देवों के विशालकाय मंदिर को ध्वंस करने में लगे थे। किसी विशालकाय पर्वत के समान उस मंदिर पर चढ़कर, हनुमान अपने पंजों से उसे चूर-चूर करने लगे। मंदिर के मलबे के जमीन पर गिरने की आवाज पूरी लंका नगरी में सुनाई दे रही थी।
हनुमान चिल्लाकर बोले, राम और लक्ष्मण की विजय हो! मेरा नाम हनुमान है और मैं राक्षसों की आँखों के सामने लंका को नष्ट कर दूंगा!
हनुमान की गर्जना ने राक्षसों के दिल में आतंक पैदा कर दिया, परंतु फिर भी मंदिर के एक सौ पहरेदारों ने अपने अस्त्र-शस्त्र उठाकर उन्हें चारों ओर से घेर लिया। क्रोध से कुपित हनुमान ने मंदिर का एक स्तंभ उखाड़ लिया। भयावह रूप धारण करके, उन्होंने इसे इस प्रकार से चारों तरफ घुमाना आरंभ किया कि अन्य स्तंभों से इसके टकराने के कारण वहाँ आग लग गई। हनुमान ने जब इस अग्निमय स्तंभ से पहरेदारों का संहार करना आरंभ किया, तो पूरा मंदिर ही भयानक आग की लपटों में समा गया। हनुमान बारंबार चिल्लाने लगे, राम, लक्ष्मण और समस्त वानरों की विजय हो!
तभी गधों द्वारा खींचे जा रहे रथ पर सवार होकर जाम्बुमाली वहाँ आ पहुँचा और उसके धनुष को टंकार से पूरा आकाश गूंज उठा। समय नष्ट किए बिना जाम्बुमाली ने एक बाण से हनुमान के मुख में और दस बाणों से उनको बाँहों पर आक्रमण कर दिया। हनुमान का पूरा चेहरा रक्तराजत हो उठा और तब क्रोधित होकर हनुमान ने एक विशाल चट्टान उठाई और पूरी शक्ति से उसे जाम्बुमाली की ओर फेंक दिया। जाम्बुमाली ने दस बाण चलाकर इसे चूर-चूर कर दिया. तो हनुमान ने एक विशाल वृक्ष को जड़ समेत उखाड़कर उसे घुमाते हुए फेंका। जाम्बुमाली ने हनुमान के हाथों से वृक्ष छूटने से पहले ही चार बाणों से इसके टुकड़े टुकड़े कर दिए। इसके बाद, उस राक्षस ने पाँच बाणों से हनुमान की बाँहों को वेध दिया और दस बाणों से उनके सीने को छलनी कर दिया।
हनुमान तनिक भी भयभीत नहीं हुए और उन्होंने एक बार फिर लोहे के विशाल छड़ को उठा लिया। इसे अत्यन्त वेगपूर्वक घुमाकर, हनुमान ने पूरी शक्ति से इसे फेंक दिया। लोहे की विशाल छड़ जाम्बुमाली को इतने उग्र ढंग से आकर लगी कि उसका सिर, पैर, रथ और गधे मलीदा बन गये।
जाम्बुमाली की मृत्यु का समाचार सुनकर रावण बहुत उत्तेजित हो उठा। इसके बाद, उसने अपने प्रधानमंत्री के सात अन्य पुत्रों को एक विशाल सेना के साथ हनुमान पर आक्रमण करने भेजा। राक्षस अपने रथ पर सवार होकर जब अशोक वाटिका पहुंचे, तो उन्होंने हनुमान को वाटिका के मेहराबदार प्रवेश द्वार पर खड़ा देखा।
इसके बाद हुई बाणों को बारिश से कुछ देर तक हनुमान अपने सामने कुछ भी नहीं देख पाए, परंतु उन्होंने आकाश में छलाँग लगा दी और इस प्रकार उस बाण वृष्टि का शिकार होते से बच गये। हनुमान ने गर्जना करते हुए आक्रमण कर दिया। कुछ हो क्षणों में, हनुमान के हाथों और पैरों से अगणित-राक्षस कुचलकर मारे गये, जबकि उनके नाखूनों ने बाकियों को चीरकर रख दिया। हनुमान के सोने और जंघाओं के तले ढेरों राक्षस परलोक सिधार गये और कुछ राक्षस तो हनुमान की गर्जना से हतप्रभ होकर जमीन पर गिर पड़े। प्रधानमंत्री के सातों पुत्रों का संहार हो जाने पर, बचे हुए राक्षस योद्धा आतंकित होकर भाग गये। हनुमान प्रवेश द्वार पर वापस आ गये और अगली लड़ाई की प्रतीक्षा करने लगे।
इसके बाद रावण ने एक विशाल सेना के साथ अपने पाँच प्रमुख सेनापतियों को यह कहकर भेजा कि मैं चाहता हूँ कि आप इस हनुमान को बंदी बना लें क्योंकि वह कोई साधारण वानर नहीं हो सकता है। वह निश्चित ही कोई अति शक्तिशाली प्राणी है।
कुछ ही देर बाद राक्षसों ने हनुमान को चारों ओर से घेर लिया और सेनापति दुर्धार ने पाँच बाण चलाकर उनके माथे को घायल कर दिया। क्रोध से कुपित हनुमान ने अपना महाकाय रूप धारण करके आकाश में उलाँग लगाई और फिर तड़ित प्रहार की तरह दुर्धार के रथ पर कूद पड़े। इस प्रचंड टक्कर से रथ चूर-चूर हो गया और दुर्धार व उसके घोड़े कुचलकर मृत्यु को प्राप्त हो गये।
अपने साथी को मृत्यु से क्रोधित होकर, विरूपाक्ष और यूपाक्ष नामक दो अन्य सेनापतियों ने अचानक हवा में छलाँग लगा दी और हनुमान के सोने पर अपनी गदाओं से प्रहार किया। अविचलित हनुमान शीघ्रता से नीचे कूदे और उन्होंने एक विशाल साल वृक्ष को उखाड़ लिया। फिर इस वृक्ष के प्रहार से उन्होंने दोनों सेनापतियों को मौत के घाट उतार दिया।
प्रघास और भासकर्ण नामक बचे हुए दो सेनापति तत्काल हनुमान के सामने पहुँचे और उन्होंने अपने भाले और बरछी से हनुमान पर प्रहार किया। हनुमान रक्तरंजित हो चुके थे, परंतु उन्होंने पास हो में स्थित एक पर्वत का शिखर उखाड़ लिया और पशुओं व वृक्षों समेत इस पर्वत शिखर को दोनों राक्षसों के ऊपर गिराकर उनका मलीदा बना दिया।
पाँचों सेनापतियों का सफाया करने के बाद, हनुमान बिना किसी विशेष प्रयत्न के बाकी बची सेना का संहार करने लगे। उन्होंने मृत घोड़ों को फेंककर अन्य घोड़ों को और हाथियों को फेंककर हाथियों को मारा। हनुमान ने मृत सैनिकों की सहायता से अन्य बचे हुए सैनिकों को मारा और रथों के टूटे टुकड़े फेंककर अन्य रथों को तोड़ा। अगणित प्राणहीन देहों से जमीन पाट देने के बाद, हनुमान फिर से वाटिका के मेहराबदार प्रवेश द्वार पर खड़े हो गये।
इस नरसंहार को सूचना पाकर रावण ने अपने पुत्र अक्ष की और देखा, जो उसके पास में हो बैठा हुआ था। युद्ध करने को उत्सुक राजकुमार अपने का संकेत समझ गये और राजदरबार के अपने आसन से उछलकर खड़े हो गये। अपने रथ पर सवार होकर अक्ष ने अशोक वाटिका को कूच किया। आठ घोड़ों द्वारा खींचा जा रहा उसका रथ आकाश मार्ग पर भी उड़ने में समर्थ था। उसने दूर से ही हनुमान पर बाणों की वर्षा कर दी। फिर नजदीक आने पर, दोनों के बीच घमासान रण छिड़ गया।
अक्ष अत्यन्त शक्तिशाली था। इन दोनों के बीच छिड़े भयानक युद्ध को देख धरती डोलने लगी सूर्य निस्तेज हो गया और हवा थम गई अक्ष ने तीन बाणों से हनुमान का माथा वेध दिया तो हनुमान ने अपना आकार बढ़ा लिया। जिस प्रकार कोई हाथी घास से ढँके छिपे हुए किसी कुएँ की ओर बढ़ता है, उसी प्रकार युवा राजकुमार को अपनी शक्ति पर बालकों जैसा घमण्ड था इसलिए वह बिना हो हनुमान के सामने आ गया। अक्ष के बाणों से घायल होने के बाद, हनुमान ने विकट महाकाय रूप धारण कर लिया और हवा में उछल पड़े। अक्ष निरंतर बाण चलाते हुए उनका पीछा करने लगे, परंतु हनुमान ने आकाश में अत्यधिक ऊँचाई पर जाकर उनके लागों को चकमा दे दिया।
तभी एक बाण ने हनुमान के सीने को घायल कर दिया और तब हनुमान ने मन ही मन अपने शत्रु के रण कौशल की सराहना की और सोचा, "यह राक्षस अभी बहुत कम उम्र का बालक ही है, परंतु यह बहुत वीरता के साथ युद्ध कर रहा है और इसी कारण से मुझे इसका वध करने की इच्छा नहीं हो रही है। दूसरी ओर, यह युद्ध जैसे-जैसे बढ़ रहा है मुझे इसकी शक्तियाँ बढ़ती दिख रही हैं। यदि मैं इसकी अनदेखी करता हूँ, तो मेरी पराजय हो सकती है। इसलिए, मुझे इसी क्षण इसका बंध करना होगा। क्योंकि भड़कती हुई आग को शीघ्रातिशीघ्र बुझा देना चाहिए।"
हनुमान ने अपनी गति बढ़ा दी और अपने हाथ के एक प्रहार से अक्ष घोड़ों को मार गिराया। इस प्रकार, आगे बढ़ने में असमर्थ रथ जमीन पर गिरकर के चूर-चूर हो गया। अपना धनुष और तलवार लेकर अक्ष उस टूटे हुए रथ से कूद पड़ा और जिस प्रकार कोई ऋषि अपने गूढ़ योग को शक्ति से अपने भौतिक देह का त्याग करके स्वर्गारोहण करते हैं उसी प्रकार वह आकाश में उड़ने लगा। परंतु हनुमान ने चतुराई से अक्ष को उसके पैरों से पकड़ लिया और उसे कई बार घुमाने के बाद पूरी शक्ति से जमीन पर पटक दिया। इससे उसके चारों हाथ-पैर टूट गये और सीना चूर-चूर हो गया और रावण के पुत्र ने मुँह से रक्त को उल्टी करते हुए प्राण त्याग दिए।
आकाश से यह युद्ध देख रहे दिव्य ऋषिगण हनुमान को देखकर आश्चर्यचकित थे, जबकि रावण का हृदय भय से दहल उठा। जिस समय हनुमान वाटिका के प्रवेश द्वार पर प्रतीक्षा कर रहे थे, तब प्रचंड क्रोध से उन्मत ने किसी तरह स्वयं को नियंत्रित करके अपने सबसे बड़े पुत्र इंद्रजित को बुलवाया।
राक्षसराज बोला, "युद्धकला में तुम्हारा कोई सानी नहीं है क्योंकि शक्ति में तुम मेरे समान हो। तुमने स्वर्णाधिपति इंद्र को उसके सभी देवगणों के साथ परास्त किया है और ब्रह्माजी से दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्राप्त किए हैं। अब दया करके जाओ और इस रहस्यमय शत्रु को वश में करने के लिए जो भी संभव हो वह करो।
अपने रथ पर सवार होकर हनुमान की ओर बढ़ते इंद्रजित के धनुष की टंकार सुनकर हनुमान बहुत प्रसन्न हुए। इंद्रजित ने बाणों की वृष्टि आरंभ कर दी जिनमें बचने के लिए हनुमान भयंकर गर्जना करते हुए अपना आकार बढ़ाकर आकाश में उड़ने लगे। इसके बाद किड़े युद्ध में, इंद्रजित को ऐसा कोई भी अवसर नहीं मिला जिससे वह हनुमान को अपने बाणों से वैध पाते और न ही हनुमान को इंद्रजित पर प्रहार करने का कोई अवसर मिला।
अपने अस्त्र-शस्त्रों की निरर्थकता देखकर इंद्रजित ने यह मान लिया कि वह हनुमान का वध करने में समर्थ नहीं है, इसलिए उसने हनुमान का वध करने के बजाय उन्हें बंदी बनाने के विकल्प पर सोच-विचार शुरू कर दिया। इसे ध्यान में रखकर इंद्रजित ने एक विशेष ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करके हनुमान को तत्काल बांध दिया और इसके कारण हनुमान धरती पर गिरकर अचेत हो गये।
हनुमान भलीभांति यह जानते थे कि यह एक शस्त्र के रूप में भगवान् ब्रह्मा की शक्ति से बाँधे जा रहे हैं। साथ ही, उन्हें ब्रह्माजी के उस वरदान को भी याद आ गई कि हनुमान के सामने इस प्रकार का कोई भी अस्त्र अभिमंत्रित होने के कुछ ही समय बाद अपना प्रभाव खो देगा। इस कारण, हनुमान ने सोचा, "मैं तत्क्षण स्वयं को इससे मुक्त नहीं कर सकता, परंतु फिर भी इससे भयभीत होने की कोई बात नहीं है। इसे अपनी पराजय मानने के बजाय, मुझे इसे रावण को नजदीक से देखने-मिलने का सुअवसर समझना चाहिए। भले ही मुझे बंदी बना लिया गया है, परंतु ब्रह्माजी के वरदान के कारण मुझे पूरा विश्वास है कि मैं शीघ्र ही स्वयं को इससे मुक्त कर लूँगा।
तभी कुछ राक्षस आये और उन्होंने मजबूत रस्सियों से हनुमान की बाँध दिया और उन्हें इस प्रकार से बांधते समय वे अत्यन्त कटु शब्दों में उन्हें भला-बुरा कहने लगे। परंतु जैसे ही हनुमान को रस्सियों से बाँधा गया, वैसे ही ब्रह्मास्त्र का प्रभाव समाप्त हो गया, क्योंकि यह ब्रह्मास्त्र अपने साथ किसी अन्य प्रकार के बंधन का प्रयोग किए जाने को सहन नहीं कर सकता था। इस प्रकार हनुमान ने स्वेच्छा से राक्षसों द्वारा स्वयं को बाँधने दिया और ऐसा जतलाया कि उन्हें अत्यधिक कष्ट हो रहा है ताकि उन्हें रावण से मिलने का अवसर मिल सके।
इंद्रजित यह देख रहा था कि ब्रह्मास्त्र के प्रभाव से मुक्त होने के बाद रस्सियों से बांध रहे हनुमान कैसे कष्ट का बहाना कर रहे हैं। इंद्रजित ने मन ही मन सोचा, इन मूर्ख राक्षसों ने हनुमान पर ब्रह्मास्त्र द्वारा बंदी बनाए जाने के प्रभाव को नष्ट कर दिया है। ब्रह्मास्त्र के निष्प्रभावी हो जाने के कारण, अब इसे उसी शत्रु पर दोबारा नहीं चलाया जा सकता है।
इंद्रजित इस प्रकार से सोच-विचार कर ही रहा था कि तभी राक्षस गण बंदी
बनाए गये हनुमान को घसीटकर रावण के सामने ले आये और एक-दूसरे से उत्तेजित स्वर में चीख-पुकार करने लगे।
किसी ने प्रश्न किया, यह वानर जैसा प्राणी कौन है ? जबकि दूसरे राक्षस गुस्से से चीखकर बोलने लगे, इसे तुरंत मार डालो! चलो, इसे खा लें। चलो, इसे भून डालते हैं।'
हनुमान को अपने सामने बंदी के रूप में देखकर, रावण ने अपने मंत्रियों से कहा कि वे उससे पूछताछ करें। मंत्रियों के प्रश्नों के उत्तर में, हनुमान बोले, ' वानरराज सुग्रीव का दूत हूँ। उन्होंने मुझे आपके पास आपके कुशल मंगल की कामना से भेजा है। उदार हृदय सुग्रीव को आशा है कि आप धार्मिक सिद्धांतों के अनुरूप राज-काज कर रहे होंगे और यही कारण है कि आपका राज्य फल-फूल रहा है।
बंदी बना लिए जाने के कारण, हनुमान निश्चित ही बहुत क्रुद्ध थे और रावण द्वारा सीता का अपहरण किए जाने की जानकारी से उनका क्रोध और अधिक भड़क उठा था, परंतु जब हनुमान ने रत्नों-मणियों से जड़े सिंहासन पर बैठे राक्षस-राज रावण को देखा, तो वह मन ही मन सोचने लगे, रावण यदि अधार्मिक व पापी न होता तो निश्चित ही अपने आकर्षक व्यक्तित्व बुद्धिचातुर्य साहस, प्रताप और सुंदर दैहिक विशेषताओं के बल पर इंद्र की महिमा को भी धूमिल कर चुका होता।
रावण भी क्रुद्ध और उत्तेजित था, परंतु साथ हो उसे हनुमान को देखकर शंका हो रही थी। उसने आचर्य से सोचा, कहाँ यह भगवान् शिव का वाहन नंदी तो नहीं जिसने बहुत समय पहले मेरे द्वारा चिढ़ाए जाने पर मुझे कुचल दिया था? या वानर वेश में असुरों का राजा बान तो नहीं ?
रावण के प्रधानमंत्री प्रहस्त ने हनुमान को आश्वस्त करके कहा, "यदि तुम हमें अपने यहाँ आने का वास्तविक कारण बता दोगे, तो हम तुम्हें छोड़ देंगे। हनुमान बोले, मैं एक उत्सुक वानर हूँ जो रावण से मिलने यहाँ आया हूँ,
परंतु मैं जानता था कि मेरे समान तुच्छ जीव को राजा से मिलने में बहुत कठिनाई होगी, इसलिए मैंने उनके आनन्दवन को नष्ट कर डाला ताकि मुझे बंदी बनाकर राज दरबार में ले आया जाये मैं किसी को भी कोई नुकसान नहीं पहुंचाना चाहता था, परंतु जब राक्षस सैनिकों ने मुझ पर आक्रमण किया, तो आत्मरक्षा के लिए मुझे उनका वध करने को बाध्य होना पड़ा।
बहुत समय पहले, मुझे ब्रह्माजी से वरदान मिला था कि मुझे किसी भी अस्त्र-शस्त्र या रस्सियों द्वारा नहीं बाँधा जा सकेगा। इस कारण से, आप यह समझ सकते हैं कि मैंने स्वयं को जान-बूझकर बंदी बनाने दिया और इंद्रजित के ब्रह्मास्त्र का प्रभाव तो पहले ही समाप्त हो चुका है।
कृपया ध्यान से मेरी बात सुनें क्योंकि अब मैं आप लोगों को अपने यहाँ आने का वास्तविक कारण बताने जा रहा हूँ। मेरा नाम हनुमान है और में महाराज दशरथ के पुत्र भगवान् राम का दूत बनकर यहाँ आया हूँ। मैं बहुत समय से उनको अपहृत पत्नी सीता की खोज कर रहा था और सौभाग्यवश मुझे वह यहाँ पर मिल गई है। हे राक्षस-राज, आपको यह पता होना चाहिए कि राम व लक्ष्मण के वाणों से कोई भी अपनी रक्षा नहीं कर सकता है। युद्ध क्षेत्र में उनका सामना करने का दुःसाहस स्वयं स्व-जनित ब्रह्माजी, भगवान् शिव या इंद्र तक में नहीं है।
हे रावण, आप धार्मिक शास्त्रों से भलीभाँति परिचित हैं। जो व्यक्ति वास्तव में बुद्धिमान होता है वह कभी भी धर्म के मार्ग का त्याग नहीं करता है। कृपा करके मेरी अच्छी सलाह माने और सीता को राम के पास वापस भेज दें क्योंकि अब भी अधिक देर नहीं हुई है। अपने कठिन तप के कारण आपको देवताओं व असुरों के हाथ से नहीं मारे जाने का वरदान मिला था। उस पर विचार करके, क्या आपको यह नहीं दिखता कि सीता का अपहरण करने के अनैतिक अधार्मिक कार्य के अनर्थकारी परिणाम हो सकते हैं? मैं स्वयं ही लंका को धूल में मिला सकता हूँ, तो भला राम की क्या बात करें, क्योंकि राम तो इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को नष्ट करके उसको पुनर्रचना कर सकते हैं।
हनुमान की बात सुनकर रावण क्रोध से आग-बबूला हो उठा। क्रोध से लाल जलती आँखों से देखकर उसने आदेश दिया, "इस वानर को इसी मार डालो
तभी विभीषण अत्यन्त विनम्र स्वर में बोले, मेरे प्रिय बड़े भाई, किसी दूत की हत्या करना उचित नहीं है। आप निश्चित ही धार्मिक ग्रन्थों से भलीभाँत परिचित हैं, परंतु यदि आप अपने अनियंत्रित क्रोध के कारण इन सिद्धांतों से विमुख हो जाते हैं तो यह सारा जान व्यर्थ हो जायेगा।
रावण को इस प्रकार की बिना माँगी सलाह पसंद नहीं आई, इसलिए उसने उत्तर दिया, बुरा काम करने वाले किसी जीव की हत्या करना कोई पाप नहीं है। हनुमान को मरना ही होगा।
विभीषण ने तर्क किया, शास्त्रों में किसी दूत की हत्या करने का कोई विधान नहीं है। ऐसी बात अब से पहले कभी नहीं हुई। हाथ-पैर काटना, बेंत मारना, सिर मुड़ाना और कलंकित करना ही केवल ऐसे दंड हैं जो दिए जा सकते हैं।
मेरे प्रिय रावण, आपके समान महान शूरवीर को अनियंत्रित क्रोध के वश में हो जाना शोभा नहीं देता है। मेरा सुझाव है कि आप हनुमान को दूत के रूप में भेजने वाले अपने शत्रु का वध करने का प्रयास करना चाहिए न कि हनुमान का वध करने का। आप राम व लक्ष्मण के साथ युद्ध करने के लिए सेना क्यों नहीं भेजते क्योंकि वे आपसे बदला लेना चाहते हैं ?
अपने पुण्यात्मा भाई की बातों से कुछ-कुछ प्रभावित होकर, रावण ने अंततः थोड़ा नरम होकर कहा, वानर अपनी पूँछ को सदैव अत्यधिक प्रेम करते हैं। इसलिए इसकी पूँछ में आग लगा दो और मार्गों पर इसका जुलूस निकालो ताकि लोग यह देख सकें कि यह कितना शूरवीर है। इसके बाद, हनुमान को छोड़ दो, ताकि यह अपने संबंधियों के पास जली पूँछ के साथ लौटने का घोर अपमान सहन करें।
यह आदेश मिलने पर, राक्षसों ने हनुमान की पूँछ के चारों ओर सूती कपड़े लपेटे और फिर कपड़ों को तेल से भिगोया जब पूँछ पर लिपटे कपड़े जलने लगे, तो हनुमान ने विशाल रूप धारण करके क्रोध से अपनी पूंछ लहराकर राक्षसों पर प्रहार करना आरंभ किया। राक्षसों ने किसी तरह से हनुमान को पकड़कर उन्हें और अधिक कसकर बाँध दिया। परंतु वास्तव में हनुमान ने उन्हें ऐसा करने दिया, क्योंकि वह दिन के समय लंका नगरी का भ्रमण करना चाहते थे ताकि वह वहाँ को किलेबंदी को ज्यादा अच्छी तरह देख सकें।
शीघ्र ही, खुशी से चहकते राक्षस गण हनुमान को मार्गों पर घसीटकर ले जाने लगे और लोगों को घोषणा करके बताने लगे कि उन्होंने एक गुप्तचर को पकड़ा है। बंदी को देखने के लिए, सभी स्त्री, बच्चे और वृद्ध बाहर निकलकर आने लगे, तब राक्षसी पहरेदारों ने सीता को हनुमान की दयनीय दशा के बारे में सूचित किया। यह समाचार सुनकर सीता अत्यन्त दुखी हो उठीं और उन्होंने अग्नि देव का ध्यान करके उनसे प्रार्थना की, यदि अपने समर्पण और तप के परिणामस्वरूप मैंने कोई भी पुण्य अर्जित किए हैं, तो उनके बदले हनुमान को अग्नि ठंडी और पौड़ारहित जान पड़े।
ठीक तभी, सीता द्वारा जलाकर रखी जा रही आहुति अग्नि मद्धम जलने लगी। उसी समय, हनुमान की पूँछ में लगी आग ठंडी होकर जलने लगी, जबकि वायु देव ने बर्फ समान शीत वायु लहरी चला दी। हनुमान आश्चर्य से सोचने लगे मुझे अग्नि को जलन क्यों नहीं महसूस हो रही है, जबकि लपटें तो अत्यन्त तेज जल रही हैं। ऐसा लगता है मानो राक्षसों ने मेरी पूँछ के चारों तरफ बर्फ लपेट दी हो। निश्चित ही यह भगवान् राम या सीता की कृपा-दृष्टि होगी।
इसके बाद हनुमान ने मन ही मन विचार किया, भगवान् राम के सेवक या किसी महान योद्धा के लिए यह बिल्कुल भी उचित नहीं है कि उसे बाँधकर रखा जाये और इन राक्षसों द्वारा उसका उपहास किया जाये। यह अपमान सहन से परे है।
पलक झपकते ही, हनुमान ने अपना आकार बहुत छोटा कर लिया और वह बंधनों से मुक्त हो गये। इसके बाद, गर्जन करते हुए उन्होंने हवा में उलाँग लगा दी और अपना भीमकाय रूप धारण कर लिया और पास ही में पड़ा लोहे का एक छड़ बठा लिया। एक ही क्षण में उन्होंने पहरेदारों का वध कर दिया और फिर सोचा, भगवान् राम के पास वापस लौटने से पहले, रावण को और राक्षसों को सताने के लिए मैं और क्या कर सकता हूँ? मेरी पूँछ अब भी जल रही है, तो क्यों न मैं इसका प्रयोग करके पूरी लंका में भयानक आग लगा हूँ?
यह निश्चित करके, हनुमान प्रहस्त के महल की छत पर चढ़ गये और यहाँ आग लगा दी। इसके बाद एक छत से दूसरी छत पर कूदते हुए उन्होंने सम्पूर्ण लंका में भयानक आग लगा दी। उन्होंने मात्र पुण्यात्मा विभीषण महत छोड़ दिया। हनुमान रावण के महल सहित विभिन्न महलों के भीतर भी गये और तेज हवा चलने के कारण कहाँ लगी आग भड़ककर अनिमंत्रित हो गई। महलो की ऊपरी मंजिले आग से भरभराने लगीं और अमीन पर गिर पड़ी और भयानक आग के कारण उत्पन्न हुए भयानक तापने सोने और चांदी को पिघला दिया और ये पिघलकर मोतियों और रत्नों से उनों से मिल गये और मार्गों पर ज्वाला मुख से निकल तावा के समान उमड़ पड़े।
आत्मरक्षा और अपनी संपत्ति की रक्षा का व्यर्थ प्रयास करते हुए, राक्षसों में हाहाकार मच गया। अगणित राक्षसों पीड़ों और हाथियों के जलकर राख हो जाने से चीख-पुकार क्रमशः बढ़ती हो चली गई। जलते शरीरों की चर्बी के कारण आग ज्यादा ऊँची और भयानक होती गई और ऐसा प्रतीत हुआ मानो ब्रह्माण्डीय प्रलय का समय हो आतंकित हो उठे लंकावासी चिल्लाने लगे क्या एक वानर के वेश में स्वयं अग्नि हमारी नगरी को जलाकर राख कर रही है? या फिर यह स्वयं ब्रह्म या समय-काल का मूर्त रूप है अथवा हम सभी का संहार करने के लिए स्वयं भगवान विष्णु की असीमित शक्ति यहाँ जीव रूप में आ गई हैं?
अंततोगत्वा सम्पूर्ण लंका नगरी की प्रदक्षिणा करने के बाद हनुमान एक क्षण के लिए रुके और चारों और भड़कती आग की लपटों को देखने लगे जिससे उन्हें अत्यन्त संतोष का अनुभव हुआ। इसके बाद हनुमान वापस राम के पास लौटने के बारे में सोचने लगे, इसलिए उन्होंने सबसे पहले समुद्र में जाकर अपनी पूँछ डुबोकर उसकी आग बुझाई। इसके बाद वह फिर से लंका नगरी को लोलती आग को देखने वापस लौट आये और मर रहे राक्षसों की चीख-पुकार सुनकर उनका मन अकस्मात एक भयानक आशंका से भर उठा।
हनुमान ने सोचा, मैं भी कितना मूर्ख हूँ जो मैंने संका नगरी की आग लगा दी। यदि सीता भी इस आग में जल गई तो क्या होगा? ओह, जरा इस अनियंत्रित क्रोध का परिणाम तो देखो जो किसी भी जोवधारी के लिए सबसे पापमय स्थिति होती है क्योंकि इसके कारण वह बिना सोचे-विचारे काम कर डालता है। क्रोध के वंश में भला मनुष्य क्या कुछ नहीं कर सकता है अथवा क्या कुछ नहीं कह सकता है ? क्रोध के वशीभूत होकर तो व्यक्ति अपने गुरु की या अपने माता-पिता तक की हत्या कर सकता है और महात्माओं का अपमान कर सकता है। जिस व्यक्ति ने अपने क्रोध को नियंत्रित करना सीखा है, केवल वही मनुष्य कहलाने की योग्यता रखता है।
यदि मेरे कारण सोता की मृत्यु हुई, तो मैं अपने स्वामी का हत्यारा भी हूँ और इसलिए इसके प्रायश्चित के रूप में मुझे अपने प्राण भी त्याग देने चाहिए। वानरों का मूर्ख स्वभाव अत्यन्त हेय है क्योंकि इसके कारण वे भावना और क्रोध के वश में आकर काम करते हैं। भावनात्मक कार्यों के परिणाम सदैव अनिश्चित होते हैं और इस विषय में मैं अतिशय नर संहार का कारण बन गया हूँ।
यदि मेरे कारण सीता की मृत्यु हो गई, तो राम व लक्ष्मण भी जीवित नहीं रहेंगे। ऐसे में, भरत, शत्रुघ्न, सुग्रीव और अन्य बहुत से लोगों को भी अपने प्राण त्यागने होंगे। इन महान् लोगों की शरण के बिना, अन्य सभी जीवधारी भी धीरे- धीरे जीवित रहने की कामना का त्याग कर देंगे। इस प्रकार, संभवतः मैं अनजाने ही सम्पूर्ण विश्व के विनाश का कारण बन गया हूँ।
जिस समय हनुमान इस प्रकार से विलाप कर रहे थे, उसी समय उन्हें कुछ शुभ संकेत दिखाई दिए। तब उन्होंने निष्कर्ष निकाला, धर्मपरायण सीता को कोई भी हानि नहीं पहुँच सकती है। आखिर, भगवान् राम की कृपा दृष्टि के कारण ही मुझे अग्नि की तपिश तक का अनुभव नहीं हुआ, तो भला उनकी प्रियतमा की बात ही क्या करें। सीता के चरित्र की पवित्रता ही उनकी रक्षा करने के लिए स्वयं में पर्याप्त है। उनके तप की शक्ति, सत्य के प्रति उनको निष्ठा और भगवान् राम के प्रति उनका समर्पण अग्नि से कहीं अधिक शक्तिशाली हैं।
हनुमान के पराक्रमी कार्यों के लिए सिद्धों, चारणों और अन्य देवी जीवधारियों ने उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। अब उन्हें आश्वस्त करने के लिए उन्होंने हनुमान को सूचित किया कि सीता सुरक्षित हैं। हनुमान ने चैन की साँस ली और प्रसन्न होकर वह सीता के आश्रय-स्थल की ओर भागे और वहाँ पर उन्हें सुरक्षित देखकर अत्यधिक प्रसन्नता के कारण उनकी आँखों से अश्रुधारा बह निकली।
सीता बोली, मेरे प्रिय हनुमान, दया करके केवल एक दिन और यहाँ पर रुक जायें। आपके सानिध्य में, अथाह दुख से पीड़ित मेरे मन को आराम मिलता है। आपका वापस पहुँचना अनिश्चित है और इसी प्रकार भयानक कष्ट के कारण मेरा जीवित रहना भी अनिश्चित है। मुझे ऐसा लगता है कि राम, लक्ष्मण और वानर-गण कभी भी समुद्र पार नहीं कर पायेंगे। परंतु फिर भी, आप राम से अनुरोध करना कि वे शीघ्र ही यहाँ आये और मेरा उद्धार करें क्योंकि मुझे नहीं लगता कि ऐसी विकट स्थितियों में, मैं बहुत लंबे समय तक जीवित रह सकूँगी।
हनुमान ने सीता को तसल्ली देने का प्रयास करते हुए इस बात के प्रति आश्वस्त किया कि राम निश्चित ही उनकी रक्षा करेंगे। इसके बाद, वहाँ से प्रस्थान करने का मन बनाकर, हनुमान अरिष्ट पर्वत के शिखर पर चढ़ गये। अपने उद्देश्य के सफलतापूर्वक पूर्ण हो जाने के बाद, राम के पास वापस लौटने की अत्यन्त उत्कंठा के कारण, हनुमान अपने पैरों के दबाव से पर्वत को चूर-चूर करते हुए शीघ्र आगे बढ़ने लगे। जब हनुमान ने अपना भीम रूप धारण किया, तो पर्वत ऐसे ढहने लगा कि वहाँ रहने वाले गंधर्व और जीव-जंतु भयभीत होकर चारों ओर भागने लगे।
जब हनुमान ने वापसी की महान छलाँग लगाई तो वह उच्च पर्वत भरभराकर दढ पड़ा और धरती में मिलकर समतल हो गया। इसके बाद, हवा में उड़ते हुए हनुमान ने एक बार फिर आदर स्वरूप मैनक पर्वत का स्पर्श किया। अंततः, महेंद्र पर्वत पर पहुँचते हुए हनुमान ने खुशी से अपनी पूँछ लहराते हुए भयानक गर्जना की क्योंकि वह अपने वानर मित्रों से मिलने को अत्यन्त उत्सुक थे।
वानरों ने हनुमान की गर्जन ध्वनि सुनी तो समुद्र तट पर प्रतीक्षा कर रहे सभी वानर अपने शूरवीर नायक हनुमान की एक झलक पाने को व्याकुल हो उठे। जाम्बवान बोले, "हनुमान की शक्तिशाली हुँकार से यह प्रतीत होता है कि वह निश्चित हो अपने उद्देश्य में सफल रहे हैं।
रोमाँच से भरकर, सभी वानर एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष पर और एक पर्वत- शिखर से दूसरे पर्वत शिखर पर छलाँग लगाने लगे और अपने वस्त्र लहराने लगे। अंततः जब उन्हें हनुमान को झलक मिली, तो वे दोनों हाथ जोड़कर खड़े हो गये। और उन्हें महेंद्र पर्वत पर उतरते हुए देखने लगे। शीघ्र ही वानरों ने हनुमान को चारों ओर से घेर लिया और उन्हें फल और कंद-मूल का उपहार देकर प्रसन्नता से भरकर चिल्लाने लगे।
हनुमान ने सबसे पहले अपने अग्रजों को नमन किया और फिर राजकुमार अंगद को प्रणाम किया। उनके उत्तेजनापूर्ण प्रश्नों के उत्तर में, हनुमान ने इस बात की पुष्टि की कि उन्होंने सीता का पता लगा लिया है। सभी वानर- गण खुशी से विभोर हो गये और बार-बार हनुमान को गले से लगाने लगे। हनुमान के पराक्रमी कार्य के लिए उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए, अंगद उनके साथ वार्तालाप करने बैठ गये।
तब जाम्बवान ने हनुमान से कहा कि वह लंका के लिए उलाँग लगाने के बाद से पूरी कथा उन लोगों को सुनायें और फिर सभी वानर दोनों हाथ जोड़कर पूरी कथा सुनने के लिए हनुमान के चारों ओर बैठ गये। हनुमान ने पहले मन ही मन सीता को नमन किया और फिर व्यौरिवार सारो कथा सुना दी। हनुमान ने वानरों को आश्वस्त किया कि सीता कुशल से है और साथ ही उन्होंने वानरों को यह भी बताया कि सीता ने रावण को किस तरह से फटकार लगाकर कहा कि वह राम के दास बनने के योग्य भी नहीं है।
हनुमान ने अंत में कहा, हमें इसी क्षण लंका पर आक्रमण करके सीता को वापस राम के पास किष्किंधा ले जाना चाहिए। मैं जानता हूँ कि मैं सभी राक्षसों को अकेले हो परास्त कर सकता हूँ और अंगद भी ऐसा कर सकते हैं। जरा सोचो कि यदि हम केवल सीता का पता लगाकर ही नहीं, बल्कि उनकी रक्षा करके अपने साथ भी ले चलें, तो राम कितने प्रसन्न होंगे। मैं सीता को अपने साथ यहाँ ला सकता था, परंतु आपकी आज्ञा नहीं होने के कारण मैंने ऐसा नहीं किया।
अंगद बोले, एक बार अश्विनी कुमारों के प्रति आदर की भावना से ब्रह्माजी ने अपने पुत्रों, मैदा और द्विविद को यह वरदान दिया था कि उन्हें युद्ध में नहीं मारा जा सकेगा। इसलिए, ये प्रतापी वानर देवताओं की सम्पूर्ण सेना को परास्त करके, बलपूर्वक अमृत पीने में सफल रहे थे। चूँकि वे हमारे साथ हैं, इसलिए मेरे विचार से हम आसानी से रावण को परास्त कर सकते हैं। अतः हमें बिना विलंब किए लंका पर आक्रमण कर देना चाहिए और सीता की रक्षा करके उन्हें राम के पास से चलना चाहिए।
जाम्बवान बोले, हे राजकुमार, आपकी योजना में बुद्धिमत्ता का अभाव है। आप यह भूल गये हैं कि हमें केवल सीता का पता लगाने का आदेश मिला है, न कि उन्हें वापस लाने के लिए युद्ध करने का मान लें कि यदि हम इसमें सफल भी हो जाते हैं, तब भी मेरे विचार से राम इससे अप्रसन्न ही होंगे क्योंकि उन्होंने समस्त वानरों के सामने यह शपथ ली थी कि वह रावण का वध करके सीता का उद्धार करेंगे।
अंगद, हनुमान और अन्य वानरों ने जाम्बवान को सलाह स्वीकार कर ली और फिर अधिक वाद-विवाद किए बिना वे किष्किंधा को वापस लौट गये। रास्ते में, वानर मधुवन पहुंचे जो कि सुग्रीव के अधीन एक उद्यान था और स्वर्ग के समान सुंदर और परिपूर्ण था। शहद पीने के लिए उत्सुक वानरों ने अंगद से कुछ देर वहाँ पर रुकने का अनुरोध किया। कुछ ही समय वहाँ पर रुकने के दौरान, वानरों ने तृप्त होकर फल, कंद-मूल खाए और शहद पिया और इससे वे नशे में चूर हो गये। हँसते, नाचते, गाते, उन वानरों ने अत्यन्त उधम मचाते हुए मनोरंजन किया जिससे कि वह सुंदर उद्यान उजाड़ हो गया।
यह देखकर उद्यान का प्रभारी दधिमुख अत्यन्त क्रोधित हो उठा। जब उसने वहाँ पहुंचकर वानरों को यह सब बंद करने को कहा, तो वानरों ने कटु शब्द कहकर उसे अपमानित किया। उद्यान को पूरी तरह उजड़ने से बचाने के लिए, दधिमुख ने कुछ वानरों को फटकार लगाई कुछ को शांत करने का प्रयास किया और यहाँ तक कि कुछ वानरों को अपने हाथों से मारा भी, परंतु इसके कारण नशे में चूर वानर और अधिक क्रोधित हो उठे और उन्होंने लात व घूसों से उसे मारा, दाँतों से काटा और अपने पंजों से उसे नोचा।
हनुमान ने वानरों को यह कहकर उत्साहित किया कि जैसे चाहो, आनन्द मनाओ। यदि कोई तुम्हें रोकने-टोकने का प्रयास करेगा, तो उससे में निपट लूँगा।
अंगद ने भी हनुमान के सुर में सुर मिलाया और इसके कारण उद्यान की खाद्य वस्तुओं का मनचाहा आनन्द उठाकर उसे उजाड़ बनाने से रोकने के लिए आने वाले सभी रक्षकों को उद्दण्ड वानरों ने निर्भय होकर मारा-पीटा। इस प्रकार वानरों ने नशे में चूर व्यक्ति के सभी लक्षणों को प्रकट करते हुए विभिन्न प्रकार से उद्दण्ड आचरण करना जारी रखा। कुछ सुस्त पड़कर जमीन में लेट गये जबकि रूखे स्वभाव के अन्य वानर बिल्कुल उद्दण्ड हो गये और अपमान करने पर उतारू हो गये।
इसके बाद भड़के विवाद में, अंगद ने दधिमुख को (जो रिश्ते में उनके चचेरे दादा लगते थे) जमीन पर पटक दिया और निर्ममता से उसकी पिटाई की। अंततः दधिमुख और उद्यान के रक्षक इसकी शिकायत करने सुग्रीव के पास चले गये क्योंकि उन्होंने सोचा कि सुग्रीव इन वानरों को उनके दुराचरण के लिए कठोर दंड देंगे।
दधिमुख के किष्किंधा पहुँचने पर सुग्रीव ने उन्हें अत्यन्त उत्तेजित अवस्था में देखा। वानर-राज के प्रश्नों के उत्तर में दधिमुख ने अंगद और उनकी सेना के दुराचरण की कथा सुना दी।
ठीक तभी, लक्ष्मण यह देखने वहाँ पहुँच गये कि आखिर वहाँ चल क्या रहा है। सुग्रीव ने लक्ष्मण को बताया, अंगद का दल इस समय मधुवन में है और उनके उद्दण्ड आचरण का वर्णन सुनकर ऐसा जान पड़ता है कि वे अपने कार्य में सफल रहे हैं। मुझे विश्वास है कि हनुमान ने सीता का पता लगा लिया है, अन्यथा सारे के सारे वानर इस प्रकार का कार्य करने का दुःसाहस कभी नहीं करते।
यह सुनकर, राम और लक्ष्मण दोनों रोमांचित हो उठे और सुग्रीव भी बहुत प्रसन्न हुए। वह दधिमुख से बोले, असल में, आपकी शिकायत के पीछे एक शुभ समाचार छिपा हुआ है. इसलिए वानरों की इस उद्दण्डता को सहन किया जा सकता है। कृपा करके मधुवन वापस लौट जाये और अंगद तथा अन्य वातरों से कहें कि मैं इसी क्षण उनसे भेंट करना चाहता हूँ।
इस आदेश को शिरोधार्य करके, दधिमुख ने हवा में उलाँग लगा दी मधुवन पहुँचकर उन्होंने देखा कि वानर अब विनम्र हो गये हैं और मूत्र के रूप में परिवर्तितः हो चुके शहद को त्याग रहे हैं। दधिमुख अंगद के पास जाकर मधुर स्वर में बोले, कृपया मुझे क्षमा करें कि मैंने आप लोगों को इस उद्यान का सुख उठाने से रोकते का प्रयास किया हे राजकुमार, आपके चाचा आपके आगमन का समाचार सुनकर अत्यधिक प्रसन्न हैं और वह चाहते हैं कि आप लोग इसी समय किष्किंधा लाट जायें।
अपने अनुगामियों की ओर मुड़कर, अंगद विनम्रतापूर्वक बोले, "मेरा प्रस्ताव है कि हमें बिना विलंब किए किष्क्रिया लौट चलना चाहिए। निश्चित हो मैं राजकुमार हैं, परंतु में स्वयं को आपमें से किसी की भी तुलना में बेष्टतर नहीं मानता। इसके विपरीत, मैं स्वयं को पूर्णतः आप लोगों पर आश्रित मानता हूँ। इसलिए, आप जो भी कहेंगे में वहीं करूँगा। मैं यहाँ खड़ा हुआ आपके आदेश की प्रतीक्षा कर रहा हूँ।
अंगद को यह बात सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हो, बानरों ने उत्तर दिया, "हे राजकुमार, आपको विनम्रता आपकी महानता की परिचायक है और यह संकेत करती है कि आप अत्यन्त सौभाग्यशाली होंगे। हमें अब और अधिक नहीं रुकना चाहिए क्योंकि राम व सुग्रीव हमारे आगमन की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
शीघ्र ही वानरों ने हवा में ऐसे छलाँग लगाना शुरू की, मानो किसी गुलेल से एक साथ कई पत्थर छूट पड़े हों। सुग्रीव ने दूर से ही वानरों को आते देख लिया, इसलिए वह राम के पास जाकर बोले, "अंगद आ गये हैं। मैं जानता हूँ कि यदि । वह सीता का पता लगाने में असफल रहते तो कभी भी किष्किंधा वापस लौटने का दुस्साहस नहीं कर सकते थे और ऐसा होने पर, वह निश्चित ही मधुवन को उजाड़ने। का दुस्साहस भी नहीं करते। स्वर्ग के समान सुंदर यह उद्यान मेरे दादा, ब्रह्माजी ने मेरे पिता को सौंपा था।
अंगद का दल प्रस्रवण पर्वत की ढलान पर उतरा राम के समक्ष उत्सुकता के साथ आगे बढ़ते हुए हनुमान ने रोमांचित होकर घोषणा की, सीता सुरक्षित और कुशलपूर्वक हैं। उन्होंने कभी भी रावण के आग्रह को स्वीकार न करते हुए अपने पतिव्रता धर्म की शपथ की रक्षा की है।
यह सुनकर राम ने अत्यन्त प्रेम और आदर मिश्रित दृष्टि से हनुमान को निहारा। वानरों ने सुग्रीव, राम व लक्ष्मण को सादर नमन किया। शांत रह पाने में असमर्थ होकर, वे सभी उसी बात को दोहराने लगे जिसे उन्होंने हनुमान को सीता के बारे में कहते सुना था।
अंततः, जब वानर शांत हुए, तो राम बोले, मुझे रावण के राज्य का सही- सही पता बताओ और सीता के बारे में और अधिक समाचार सुनाओ मुझे बताओ कि मेरे बारे में अब उसके वास्तव में क्या विचार हैं ?
वानरों ने हनुमान को आगे की ओर धकेला ताकि वह प्रमाणिक उत्तर दे सकें। हनुमान ने पहले दक्षिण दिशा में झुककर प्रणाम किया और फिर सीता का पता लगाने तक की पूरी कथा कह सुनाई।
हनुमान ने राम को सीता के मस्तक पर सुशोभित होने वाला रत्न दिया और बोले, महाराज जनक की पुत्री तनिक भी विचलित हुए बिना पूर्णतः आपके प्रति समर्पित हैं। इसके कारण, आपके वियोग में वह बड़ी मुश्किल से अपने प्राण बचाए हुए हैं।
अपनी बात के अंत में हनुमान ने उन्हें सीता के तीन संदेश सुनाए। पहले उन्होंने बताया कि किस प्रकार इंद्र के पुत्र ने एक कौए का वेश धारण करके उनके स्तनों को घायल किया था। दूसरी कथा में हनुमान ने बताया कि किस प्रकार राम ने उनके मुखमंडल पर लाल चूर्ण से श्रृंगार किया था। तीसरी बात उन्होंने सीता की उस वचनबद्धता के बारे में बताई कि यदि राम एक माह के अंदर उनका उद्धार करने नहीं आते, तो राक्षसियों द्वारा दी जाने वाली निरंतर प्रताड़ना के कारण वह निश्चित ही अपने प्राण त्याग देंगी।
यह सब सुनते हुए, राम ने सीता के रत्न को अपने हृदय से लगाए रखा। राम व लक्ष्मण दोनों के नेत्रों से अविराम अश्रुधारा प्रवाहित होती रही। इसके बाद, राम ने अपना दुख प्रकट करते हुए कहा, यह रत्न सीता को उसके पिता द्वारा हमारे विवाह के अवसर पर उपहार के रूप में दिया गया था। बहुत समय पहले, महाराज जनक के यज्ञ कार्यों से प्रसन्न होकर महाराज इंद्र ने उन्हें यह दिया था। हे हनुमान, मैं अत्यधिक दुख व पीड़ा के कारण अचेत-सा हो गया था। कृपा करके मुझे फिर से सीता द्वारा कही गई बातें सुनाओ क्योंकि वे मेरे माथे पर पड़ने वाले शीतल जल की फुहारों के समान हैं।
हनुमान ने एक बार फिर से सीता द्वारा कही गई बातें दोहराई और अंत में बोले, मैंने उनके सामने यह प्रस्ताव रखा था कि मैं उन्हें अपनी पीठ पर बिठाकर आपके पास ले चलता हूँ, परंतु उन्होंने ऐसा करने से मना करते हुए कहा कि वह स्वेच्छा से किसी अन्य पुरुष का स्पर्श नहीं करना चाहती हैं। सीता ने बार-बार मुझसे कहा कि आप कुछ इस प्रकार से कार्य संपन्न करें ताकि राम शीघ्रातिशीघ्र यहाँ आकर मेरा उद्धार कर सकें। यह दुख मेरे लिए असह्य हो गया है, इसलिए मैं नहीं जानती कि मैं कितने दिन तक जीवित रह पाऊँगी।
हे हनुमान, राम, लक्ष्मण और वानर- गण समुद्र को पार करके यहाँ कैसे आ पायेंगे? मैं जानती हूँ कि आप रावण का वध करके मुझे राम के पास वापस ले जाने का सामर्थ्य रखते हैं, परंतु मेरी इच्छा है कि राम यहाँ आयें और वे स्वयं मेरा उद्धार करें ताकि उनकी त्रुटिहीन प्रतिष्ठा और अधिक बढ़े। मैं राम के पास उसी प्रकार से वापस नहीं लौटना चाहती हूँ जैसे कि मुझे लंका लाया गया था अर्थात मैं किसी अन्य पुरुष के साथ वापस नहीं जाना चाहती ।
मैंने सीता को आश्वस्त किया कि अन्य वानर- गण मुझसे श्रेष्ठतर हैं और वे आसानी से समुद्र पार करके लंका आ सकते हैं। मैंने उन्हें यह वचन भी दिया कि आवश्यकता पड़ने पर में आपको व लक्ष्मण को अपनी पीठ पर ले आऊंगा। इस प्रकार से मैं बड़ी मुश्किल से सीता को शांत कर सका, परंतु उनकी दारुण दयनीय दशा को देखते हुए, मेरा आपसे आग्रह है कि आप शीघ्र ही कोई ऐसा उपाय निकालें ताकि हम बिना देर किए शीघ्रातिशीघ्र लंका पर आक्रमण कर सकें।
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