वसंत ऋतु में पम्पा सरोवर के आस-पास फैली मंत्रमुग्ध कर देने वाली सुंदरता को देखकर, राम के हृदय में सीता के साथ की हुई प्रेमपूर्ण लीलाओं की याद ताजा हो उठी और इस कारण से उनका दुख और अधिक गहरा गया। निरंतर सीता का हो स्मरण करते हुए, राम के मन में विचार उठा कि क्या सीता भी उनसे बिछुड़कर जीवित रह सकती है, वह भी विशेषकर वसंत की इस ऋतु में ?

अपनी असहनीय पीड़ा को व्यक्त करते हुए, राम शोक से भरकर विलाप कर उठे, हे लक्ष्मण, यह चैत्र का महीना है और नीले रंग की यह गहरी झील कितनी मोहक हो उठी है। वह प्रेम की ऋतु है और समस्त वृक्ष फलों और फूलों से लदे हुए हैं। जरा चटख लाल रंग के फूलों से भरे कर्णिकार के वृक्षों को देखो। इसके फूलों को लाल-लाल पंखुड़ियों की वर्षा ने घास के हरे कालीन को लाल चित्रों से रंग दिया है।

सीता के बिना जीवन निरर्थक प्रतीत होता है। जब वह मेरे साथ थी तो मैं प्रसन्न था, परंतु अब उसकी यादों से मुझे पीड़ा होती है, जब मुझे कोयल की कूक सुनाई देती है, तो मुझे सीता के मधुर स्वर की याद आती है। जब मुझे लहरों पर तैरते कमल के गुलाबी रंग के फूल दिखते हैं, तो मुझे सीता को आँखें याद आती हैं। सौम्य सुगंधित हवा प्रवाहित होने पर मुझे सीता की सुगंधित साँसों की याद आती है। हे लक्ष्मण, यह वसन्त अत्यन्त क्रूर है! ये दुख मेरे लिए असहनीय हो उठा है। मैं सीता के बिना अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकता हूँ। बेहतर यही होगा कि तुम अयोध्या लौट जाओ और भरत की सेवा करो, जबकि मैं यहीं रहकर अपने प्राण त्याग दूँगा!"

राम के मन में थोड़ी आशा का संचार करने के इरादे से, लक्ष्मण बोले, मेरे प्रिय भाई, यह मानने का कोई कारण नहीं है कि सीता जीवित और सकुशल नहीं हैं। रावण चाहे जहाँ भी रहता हो चाहे वह स्वर्ग में हो या पृथ्वी में, समुद्र के अंदर हो या पाताल लोक में हम उसे खोज निकालेंगे और हमारा क्रोध उसका अंत कर देगा! अपने इस व्यर्थ शोक को त्याग दें और सीता को खोज निकालने का संकल्प करें! हम अपने गंभीर प्रयासों से ही सफलता प्राप्त कर सकते हैं, न कि विलाप करके!

लक्ष्मण द्वारा सतर्क किए जाने के कारण, राम ने अपने प्राणांतक अवसाद का त्याग कर दिया। एक-दूसरे से बातें करते हुए, राम व लक्ष्मण ऋष्यमूक पर्वत पर पहुँच गये। सुग्रीव को बहुत दूर से ही वे आते दिख गये। उन्हें वालि के सहयोगी समझकर, सुग्रीव बहुत भयभीत हो उठे। वह अपने सहयोगियों के साथ शीघ्र ही मतंग ऋषि के आश्रम में शरण लेने के लिए चल पड़े, क्योंकि मतंग ऋषि के चमत्कार से यह स्थान सुरक्षित था। परंतु फिर भी, सुग्रीव इतने भयभीत और बेचैन थे कि वह एक पर्वत शिखर से दूसरे पर्वत शिखर तक भटकते रहे और एक पल के लिए भी शांत होकर नहीं बैठ पाए।

हनुमान अपने परेशान स्वामी से बोले, आपको वालि से इतना अधिक भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। चंचल मना वानर होने के कारण, आप जल्दबाजी में किसी ऐसे निष्कर्ष तक पहुँच जाते हैं जो ध्यान से विचार करने मात्र से ही बदल जाता है।

सुग्रीव बोले, "यहाँ आ रहे ये लोग भले ही वालि के मित्र न हों, परंतु निश्चित ही वे खतरनाक जान पड़ते हैं। वे देवों के देव प्रतीत होते हैं और उनके पास धनुष-बाण और तलवारें हैं। याद रखो कि वालि अत्यन्त धूर्त है और उसके बहुत सारे मित्र हैं।

मेरे प्रिय हनुमान, मैं चाहता हूँ कि तुम उनके पास जाओ और पता लगाओ कि ये दोनों यहाँ किस प्रयोजन से आये हैं। उन पर सावधानी से ध्यान दो उनकी बातों और भाव- मुद्राओं का निरीक्षण करो। पता लगाओ कि वे कौन हैं और वे क्या चाहते हैं। यदि तुम जान-बूझकर उनके सामने मेरी बड़ाई करोगे, तो तुम यह पता लगा पाओगे कि वे मित्र हैं या फिर शत्रु।

हनुमान एक साधु का वेश धरकर राम और लक्ष्मण के पास गये। उन्हें लेटकर दंडवत प्रणाम करने के बाद, हनुमान बोले, हे महान योद्धाओं, कृपा कर मुझे बताएँ कि आपके जैसी महान आत्माएँ इस निर्जन क्षेत्र में किस उद्देश्य से आई हैं। आप दोनों की सुगठित देहयष्टि से पता चलता है कि आप लोग क्षत्रिय हैं, परंतु फिर भी आपने ऋषि वेश धारण कर रखा है। मेरा नाम हनुमान है और मैं सुग्रीव का मंत्री हूँ। सुग्रीव को उसके बड़े भाई वालि ने राज्य से निकाल दिया है। मैं पवन पुत्र हूँ और मैं अपनी इच्छा मात्र से किसी भी स्थान पर जा सकता हूँ और इच्छानुसार कोई भी वेश धर सकता हूँ। सुग्रीव ने आपकी ओर मित्रता का हाथ बढ़ाने और आपका आतिथ्य सत्कार करने की मंशा से मुझे आपके पास भेजा है। तब, लक्ष्मण को संबोधित कर राम बोले, यह हनुमान उसी उदार हृदय वानर राज सुग्रीव के मंत्री हैं जिन्हें हम खोज रहे हैं। हनुमान कितने विनम्र स्वभाव के हैं और वह कितने काव्यात्मक ढंग से बोलते हैं। इनकी आँखों, अंगों और भाव- मुद्राओं में ऐसा कुछ भी नहीं है जो तनिक भी अप्रसन्नता अथवा शंका का कारण बने, इनको चारित्रिक गहराई, शक्ति व आत्मविश्वास तथा इनका स्वर इनके हृदय वाणी व बुद्धिमता के परिपक्वतापूर्ण ताल मेल को दर्शाता है। इनकी बातें सुनकर शत्रु का हृदय भी मंत्रमुग्ध रह जायेगा! मेरे प्रिय लक्ष्मण, कृपा करके हनुमान को उन घटनाओं के विषय में बताओ जिनके कारण हम यहाँ तक आ पहुँचे हैं। लक्ष्मण बोले, यह हमारा सौभाग्य है कि हमारी आपसे भेंट हो गई, क्योंकि हम सुग्रीव के साथ मित्रता करने के लिए बड़ा उत्सुकता से उन्हें खोज रहे थे। यह महाराज दशरथ के पुत्र राम हैं और मैं इनका छोटा भाई लक्ष्मण हूँ। राम के पिता इन्हें अपने उत्तराधिकारी के रूप में सिंहासनारूढ़ करना चाहते थे, परंतु राजनीतिक विवाद के कारण उन्हें राज-सिंहासन की जगह वनवास मिल गया। कुछ ही समय पहले, राक्षसराज रावण ने राम की प्रिय पत्नी सीता का अपहरण कर लिया है। इसी दुख में डूबे हुए, हम वन प्रदेशों में सीता को खोज रहे हैं। इधर-उधर भटकते हुए, हमारा सामना कबंध नामक एक भयानक राक्षस से हुआ। उसका संहार करने पर हमें ज्ञात हुआ कि वह शापित था और अपनी मुक्ति के बदले में उसने हमें सुग्रीव से मित्रता करने की सलाह दी। इसी उद्देश्य से हम यहाँ आये हैं और हम आपके तथा आपके उदार हृदय राजा के कल्याण के लिए सब कुछ करने को तैयार हैं। अपनी दुर्दशा का वर्णन करते हुए, लक्ष्मण का स्वर भर्रा गया और उनकी आँखों में आँसू भर आये। हनुमान बोले, आपकी ही भाँति, सुग्रीव भी अपने राज्य और अपनी पत्नी से हाथ धो बैठे हैं, मैं निश्चयपूर्वक कह सकता हूँ कि उनके अनुयायी सीता को खोजने में आपकी सहायता अवश्य करेंगे। कृपया अब मेरे साथ आकर सुग्रीव से भेंट करें। वह आपके यहाँ आने का प्रयोजन जानने को अत्यन्त उत्सुक हैं।

यह कहकर, हनुमान अपने वास्तविक महाकाय वानर रूप में आ गये। राम व लक्ष्मण को अपने कंधों पर बिठाकर, वह तत्काल प्रश्रवण पर्वत की ओर चल पड़े। सुग्रीव को राम के मित्रतापूर्ण इरादे की सूचना देने के लिए, पहले हनुमान अकेले ही उनके पास गये। फिर, सुग्रीव ने साधु वेश धारण किया और वह राम व लक्ष्मण से मिलने गये। उनके पास पहुँचते ही, सुग्रीव ने उनकी ओर मित्रता का हाथ बढ़ाया। यह देखकर, राम ने तत्काल ही अपना हाथ आगे बढ़ाकर, वानर राज सुग्रीव का हाथ थाम लिया और उन्हें गले से लगा लिया। राम व सुग्रीव की मित्रता को औपचारिक रूप से सुदृढ़ करने के लिए, लक्ष्मण ने उन दोनों के बीच पवित्र अग्नि प्रज्वलित की। समारोहपूर्वक अग्नि की प्रदक्षिणा करने के बाद, राम व सुग्रीव ने प्रसन्नतापूर्वक एक-दूसरे को देखा।

सुग्रीव बोले, मेरे प्रिय राम, आज से मैं और आप एक-दूसरे के कष्टों और प्रसन्नता के साझीदार हो गये हैं।

यह कहकर, सुग्रीव ने साल वृक्ष की फूलों से भरी एक डाल तोड़कर, राम के बैठने के लिए उसे जमीन पर स्थापित कर दिया। हनुमान ने पुष्प-युक्त चंदन की एक डाल लक्ष्मण के बैठने के लिए तोड़ी।

सबके बैठ जाने पर, सुग्रीव बोले, हे राम, अपने भाई वालि के कारण मेरा जीवन निरंतर दुख और परेशानी में कट रहा है। जब उसने बलपूर्वक मुझसे मेरी पत्नी और मेरा राज्य छीन लिया, तो मैंने इस वन में शरण ली। परंतु अब भी, मुझे इस बात का भय सताता रहता है कि वालि किसी भी समय यहाँ आ सकता है और इस प्रकार मुझे एक पल के लिए भी मानसिक शान्ति नहीं मिलती।

राम सौम्यता से मुस्कुराए और बोले, सेवा ही मित्रता का वास्तविक फल है, इसलिए वालि का वध करके आपकी पत्नी और आपका राज्य आपको वापस दिलाना ही मेरा कर्तव्य है।

सुग्रीव बोले, हनुमान ने मुझे बताया कि किस प्रकार आपको वनवास हुआ और किस प्रकार आपकी पत्नी का अपहरण हुआ। आपका मित्र होने के नाते, मैं यह शपथ लेता हूँ कि आपकी पत्नी को पुनः प्राप्त करने में मैं आपकी सहायता करूंगा, चाहे वे स्वर्ग में, पृथ्वी पर अथवा पाताल लोक में ही क्यों न हों। मेरे प्रिय राम, मुझे पूरा विश्वास है कि मैंने एक शक्तिशाली राक्षस द्वारा सीता को ले जाते हुए देखा है और वह "राम राम!" कहकर चीख रही थीं। उन्होंने हमें इस पर्वत पर बैठे देखा, तो अपनी ओढ़नी और कुछ आभूषण नीचे फेंक दिए। हमने इन वस्तुओं को संभालकर रख दिया।

राम उन वस्तुओं को देखने के लिए अत्यन्त व्यग्र हो उठे, अतः सुग्रीव एक गुफा में संभालकर रखी इन वस्तुओं को वापस लाने चल दिए। जैसे ही अंधेरी सुग्रीव ये वस्तुएँ लेकर आये, तो राम वस्त्र और आभूषणों को पहचान गये और "हे प्रिये, हे प्राण प्रिये ।" कहकर चीख पड़े। राम के कमल नयनों से आँसुओं की धार बह निकली और वह दुख से भाव-विह्वल होकर जमीन पर गिर पड़े और दुख से व्याकुल स्वर में विलाप करने लगे। कुछ समय बाद थोड़ा सामान्य हो जाने पर, राम बोले, हे लक्ष्मण, ये सीता के हैं। क्या तुम इन्हें पहचानते हो ?

लक्ष्मण बोले, "मुझे इस पीले रेशमी वस्त्र, इन चूड़ियों या कर्णफूलों के बारे में नहीं पता है। क्योंकि सीता के प्रति आदर के कारण मैंने कभी भी उनके पैरों के ऊपर नजर नहीं डाली, परंतु मैं प्रतिदिन सुबह उनके चरण-कमलों को स्पर्श किया करता था, इसलिए मैं उनकी पायल को पहचानता हूँ।

इसके बाद जब राम ने रावण के बारे में पूछा, तो सुग्रीव बोले, दुर्भाग्यवश, मैंने रावण का नाम तक नहीं सुना है, परंतु आप आश्वस्त रहें कि मैं उसकी खोज करने में आपकी सहायता करूँगा। मेरे प्रिय राम, आपको अपनी प्रिय पत्नी को गंवा देने पर इतना अधिक विलाप नहीं करना चाहिए। मात्र दुख करके कोई भी व्यक्ति कभी प्रसन्न नहीं रह सकता। वास्तव में, इस प्रकार का दुख व्यक्ति को शक्ति छीन लेता है और इस प्रकार वह स्वयं अपने प्राण संकट में डाल लेता है। मैं तो एक मूर्ख वानर हैं, परंतु तब भी ऐसी स्थिति में मैं आपके समान विलाप नहीं करता हूँ।

सुग्रीव की बात सुनकर, राम थोड़ा शांत हुए। एक-दूसरे को फिर से गले लगाने के बाद, वे दोनों शान्ति से बैठ गये। सुग्रीव द्वारा वालि के प्रति अपने भय की बात पुनः कहे जाने पर, राम बोले, मित्र और शत्रु की पहचान उनके द्वारा किए जाने वाले उचित और अनुचित कार्यों से होती है। मेरे प्रिय सुग्रीव, आप निश्चिंत रहें क्योंकि मैं आज ही वालि का वध कर दूंगा, परंतु पहले मैं यह जानना चाहूँगा कि आप दोनों भाइयों के बीच इतनी कटु शत्रुता कैसे हो गई ?

सुग्रीव बोले, व्यक्ति अपना शोक एक सच्चे मित्र के सामने ही खुलकर प्रकट कर सकता है। मेरे प्रिय राम, मैं आपको पूरी कथा सुनाता हूँ। मेरे पिता की मृत्यु के बाद, ज्येष्ठ राजकुमार होने के कारण वालि किष्किंधा का राजा बना और मैं उसकी सेवा करने लगा।

परंतु वालि के राज्याभिषेक से पूर्व ही, माया दानव का पुत्र मायावी, एक स्त्री के कारण वालि का शत्रु बन चुका था। मायावी किष्किंधा आया और उसने वालि को युद्ध के लिए ललकारा। मैंने और उसकी पत्नियों ने उसे ऐसा न करने के लिए रोकने का प्रयास किया, परंतु क्रोध से कुपित वालि अपने शत्रु से लड़ने के लिए राजमहल से बाहर निकल गया।

मैं भी अपने भाई के पीछे चल पड़ा और जब मायावी ने हम दोनों को देखा, तो वह भयभीत हो उठा और वहाँ से भाग गया। जब हमने उसका पीछा किया, तो वह एक गहरी और अंधकारमय गुफा में घुस गया जिसका प्रवेश द्वार घनी जंगली झाड़ियों से ढँका हुआ था। वालि ने मुझे गुफा के प्रवेश-द्वार पर पहरा देने का आदेश दिया जबकि वह स्वयं उस राक्षस से युद्ध करने के लिए गुफा के भीतर चला गया।

मैं पूरे एक वर्ष तक अपने भाई के लौटने की व्यर्थ प्रतीक्षा करता रहा। एक दिन मैंने गुफा के प्रवेश द्वार से झाग मिश्रित रक्त बाहर निकलते देखा और मुझे एक आवाज सुनाई दी जो किसी शत्रु को नहीं बल्कि मेरे भाई की थी। मैंने सोचा कि वालि की मृत्यु हो गई है। मैंने गुफा के प्रवेश द्वार को एक विशाल चट्टान से बंद कर दिया और फिर अपने भाई की दिवंगत आत्मा के कल्याण के लिए जल अर्पित किया। जब मैं किष्किंधा वापस लौटा, तो मंत्रियों ने मुझे सिंहासनारूढ़ कर दिया और मैं न्यायोचित ढंग से राज-काज संभालने लगा।

कुछ समय पश्चात् मायावी का वध करके वालि किष्किंधा वापस लौट आया। उसे सकुशल देखकर सभी को अत्यन्त आश्चर्य हुआ। जब उसने मुझे राज- सिंहासन पर बैठे देखा, तो वह क्रोध से पागल हो उठा और उसने सभी मंत्रियों को बंदी बनाकर उन्हें बेड़ियाँ पहना दीं, मैं अपने भाई से युद्ध कर सकता था, परंतु आदरवश, मैंने उसके सामने शीश झुकाया और राजमुकुट उसके चरणों पर रख दिया क्योंकि मुझे आशा थी कि इससे वह शांत हो जायेगा। परंतु वालि क्रोध से भरा हुआ था और उसने मुझे अत्यधिक डाँटा फटकारा।

नगर के प्रतिष्ठित लोगों को बुलाकर, वालि ने घोषणा की, राक्षस मायावी का वध करने के लिए मैंने पृथ्वी के अंदर प्रवेश किया और पूरे एक वर्ष तक उसे खोजने के बाद मुझे वह मिला। मैंने मायावी को उसके समस्त संबंधियों सहित मार डाला, जिससे इतना रक्त बहा कि गुफा रक्त से भर गई और मुझे इससे बाहर निकलने में बहुत कठिनाई हुई। अंततः, किसी प्रकार जब मैं गुफा के प्रवेश-द्वार पर पहुँचा, तो मैंने पाया कि एक विशाल चट्टान से प्रवेश द्वार को बंद कर दिया गया है। मैंने बार-बार सुग्रीव को आवाज लगाई। जब मुझे कोई उत्तर नहीं मिला, तो मैंने लात मारकर वह चट्टान हटा दी और घर लौट आया। पर आश्चर्य, यहाँ आकर देखता हूँ कि सुग्रीव राज-सिंहासन पर बैठा हुआ है। मैं बहुत आराम से यह समझ गया कि सुग्रीव ने मुझे उस गुफा के अंदर कैद करने का प्रयास किया था ताकि वह आसानी से राज्य पर शासन कर सके। 

सुग्रीव अपनी बात समाप्त करते हुए बोले, क्रोधित होने के कारण, वालि ने मेरी पत्नी सहित मेरी समस्त संपत्ति छीन ली और मुझे केवल एक वस्त्र में किष्किंधा से निकाल दिया। तब से ही मैं इस पर्वत पर अपने सहयोगियों के साथ रह रहा हूँ।

राम बोले, मेरे प्रिय सुग्रीव, आप निश्चिंत रहें कि मैं वालि का वध कर दूंगा। ताकि आप अपनी पत्नी और अपना राज्य वापस पा सकें।

किन्तु सुग्रीव को वालि का वध करने के लिए राम के पर्याप्त रूप से शक्तिशाली होने पर सन्देह था। इसलिए, अपने भाई की शक्तियों का वर्णन करते हुए सुग्रीव ने यह कथा सुनाई: एक समय की बात है, तब दुंदुभि नामक एक भयानक राक्षस हुआ करता था और वह भैंसे का रूप धारण करके पृथ्वी पर विचरण किया करता था। जब वह समुद्र तट पर पहुँचा, तो उसने समुद्र को युद्ध करने के लिए ललकारा।

समुद्र देव तब दुंदुभि के समक्ष प्रकट होकर बोले, हे असुर-श्रेष्ठ, मैं आपका उचित प्रतिद्वंद्वी बनने की सामर्थ्य नहीं रखता। मेरा सुझाव है कि आप भगवान् शिव के ससुर, हिमालय राज हिमवान के पास जायें।

समुद्र देव को युद्ध करने से डरता देखकर, दुंदुभि हिमालय-राज के पास गया और उसकी चोटियों को चकनाचूर करने लगा। तब हिमवान एक पर्वत- शिखर पर प्रकट हुए और बोले, मैं अनेक अहिंसक व शान्तिप्रिय ऋषि-मुनियों की शरण स्थली हूँ और युद्ध कला में अकुशल हूँ। हे असुर श्रेष्ठ, कृपा करके हमें शान्ति से रहने दें और कोई गड़बड़ी न फैलाएँ।

तब उस क्रुद्ध राक्षस ने पूछा कि वह किससे लड़े और दुंदुभि को हिमवान ने अपने भाई व इंद्र के पुत्र, वालि के बारे में बताया। यह सुनकर दुंदुभि किष्किंधा पहुँच गया और जोर-जोर से चिंघाड़ते हुए उसने धरती को अपने खुरों से खोदकर उलट-पुलट करना, विशाल वृक्षों को उखाड़कर फेंकना और नगर के दरवाजों को अपने सींगों से गिराना आरंभ कर दिया। वालि तत्काल बाहर निकला और उसने उस अहंकारी राक्षस को युद्ध के लिए ललकारा।

थोड़ी देर तक एक-दूसरे को कटु शब्द कहने के बाद, वालि ने दुंदुभि को सींग से पकड़ लिया और उसे घुमाकर जमीन पर पटक दिया जिससे उस राक्षस के कानों से खून बहने लगा। दोनों के बीच घमासान मच गया और वे एक-दूसरे पर प्राणांतक वार करने लगे, परंतु शीघ्र ही वह राक्षस कमजोर पड़ने लगा। यह देखकर, वालि ने दुंदुभि को हवा में उछालकर, अपनी पूरी शक्ति से जमीन पर पटक दिया। दुंदुभि के शरीर के प्रत्येक अंग से रक्त की भीषण धार बह निकली और अंततः उसने प्राण त्याग दिए।

फिर, वालि ने दुंदुभि के मृत शरीर को उठाकर अपने सिर के ऊपर घुमाया और उसे छह किलोमीटर दूर फेंक दिया। जिस समय उस राक्षस की मृत देह हवा में उड़कर दूर जाने लगी, तब उसकी देह से निकल रही रक्त की बूंदें मतंग ऋषि के आश्रम की धरती पर गिरीं। यह देखकर वह महान ऋषि कुपित हो उठे और आश्चर्य करने लगे कि किस मूर्ख ने यह कार्य किया है।

मतंग ऋषि को जब यह पता चला कि वालि ने उस राक्षस का वध किया हैं, तो उन्होंने वालि को शाप देकर कहा, यदि वह वानर कभी मेरे आश्रम के छह किलोमीटर की परिधि में भी आया, तो उसकी तत्क्षण मृत्यु हो जायेगी। यदि उसके मंत्री यहाँ आये, तो वे हजारों वर्ष तक पत्थर की मूर्ति बने रहेंगे। 

अंत में सुग्रीव बोले, वालि ने ऋषि को समझाने-बुझाने का प्रयास किया,परंतु वह ऐसा करने में सफल नहीं हो पाया। उसी समय से वह इस स्थान पर आने से डरता है। दुंदुभि की सूखी हड्डियों वाली मृत देह आप दूर वहाँ पर देख सकते हैं। इसे देखकर, आप स्वयं ही यह कल्पना कर सकते हैं कि दुंदुभि कितना शक्तिशाली रहा होगा। ऐसे में आप वालि को पराजित करने की आशा कैसे करते हैं ?

वालि का वध करने की राम की क्षमता पर सुग्रीव को सन्देह करते देखकर, लक्ष्मण को हँसी आई। उन्होंने पूछा, आपके विचार से राम ऐसा क्या कार्य करें ताकि आपको उनकी शक्तियों पर विश्वास हो जाये ?

सुग्रीव बोले, इस स्थान पर वालि ने एक बार साल के सात विशाल वृक्षों को सात बाणों से भेद दिया था। यदि राम इनमें से किसी एक वृक्ष को एक बाण से भेद पाएँ और फिर दुंदुभि के अवशेष को अपने पैर से 200 धनुष की दूरी तक फेंक पाए, तो मैं समझेंगा कि वह वालि से युद्ध करने का उचित सामर्थ्य रखते हैं।

यह सुनकर, राम ने बिना किसी प्रयास के दुंदुभि के कंकाल को अपने पैर के अंगूठे से उठा लिया और हँसते हुए उसे अनेक किलोमीटर दूर फेंक दिया। परंतु, सुग्रीव बोले, जिस समय वालि ने राक्षस की देह फेंकी थी, तब मांस व रक्त से युक्त उसकी देह अत्यन्त भारी थी और राक्षस के साथ युद्ध करने के कारण वालि थका हुआ था। चूँकि यह कंकाल अब अपेक्षाकृत हल्का है इसलिए इस बात का निर्णय करना असंभव है कि राम और वालि में अधिक शक्तिशाली कौन है।

राम ने अपना धनुष उठाया और एक शक्तिशाली बाण चला दिया जिसने साल के सातों वृक्षों को भेद दिया और फिर धरती के अंदर सीधे पाताल तक चल गया। एक घंटे के बाद यह बाण वहाँ से लौटा और राम की तरकश में वापस समा गया। 

सुग्रीव सचमुच आश्चर्यचकित रह गये और उन्होंने अत्यन्त श्रद्धापूर्वक राम के चरण कमलों में प्रणाम किया। राम ने उन्हें उठाकर गले से लगा लिया। इसके बाद राम बोले, "आइए, अब हम किष्किंधा चलें। सुग्रीव, आप आगे-आगे चलें और जाकर वालि को युद्ध के लिए ललकारें, जबकि मैं और लक्ष्मण नगर द्वार के बाहर कुछ वृक्षों के पीछे छुप जायेंगे।

सुग्रीव किष्किंधा गये और गर्जन करके उन्होंने अपने भाई को ललकारा। यह सुनकर, पर्वत के पीछे से उगते सूर्य की भांति, क्रोध से कुपित होकर, वालि दौड़ता हुआ नगर के बाहर आया। वालि और सुग्रीव एक-दूसरे पर मुक्के बरसाते हुए क्रोध से युद्ध करने लगे, परंतु राम धनुष हाथ में लिए उन्हें युद्ध करते देखते रहे। क्योंकि वह यह समझ ही नहीं पा रहे थे कि एक जैसे दिखते इन भाइयों में से वालि कौन है। इस कारण से, राम अपना बाण नहीं चला सके।

सुग्रीव ने सोचा कि राम उनकी सहायता नहीं करेंगे और चूँकि वह युद्ध में हार रहे थे इसलिए वह वहाँ से भाग गये। सुग्रीव की पूरी देह पर घावों के निशान थे और वह खून से लथपथ थी। सुग्रीव का पीछा करते हुए, वालि ने उसे ताना मारा, कायर! जा, प्राण बचाकर भाग! इस बार मैं तुझे छोड़ रहा हूँ!

सुग्रीव ने मतंग ऋषि के आश्रम के पास स्थित वन में शरण ली और शीघ्र ही राम व लक्ष्मण भी वहाँ पहुँच गये। सुग्रीव क्रोधित होकर बोले, हे राम, यदि आप वालि का वध नहीं करना चाहते थे, तो फिर आपने मुझे वहाँ जाकर उसे ललकारने को क्यों कहा? इससे तो अच्छा यह था कि आप मुझे ईमानदारी से यह कह देते कि मैं तुम्हारे बड़े भाई को नहीं मारना चाहता।

राम ने उन्हें समझाया, आप दोनों को युद्ध करते देखकर, मैं शंका में पड़ गया क्योंकि आपकी आवाज, शारीरिक बनावट और पोशाक हू-ब-हू आपके बड़े भाई जैसी थी। केवल यही कारण था कि मैं बाण नहीं चला पाया। आप उससे अलग दिखने वाला कोई चिह्न धारण करें और इसी समय एक बार फिर वहाँ जाकर बालि को ललकारें। 

तब लक्ष्मण की और मुड़कर, राम बोले, गजपृष्पी की एक लता उखाड़कर सुग्रीव के गले में इसकी माला पहना दो। इस तरह से मैं आसानी से उन्हें पहचान लूँगा।

सुग्रीव एक बार फिर राम, लक्ष्मण, हनुमान, नल, नील और तार के साथ किष्किंधा की ओर चल पड़े। नगर की सीमा में पहुँचकर सभी लोग वृक्षों के एक कुंज में छिप गये, जबकि सुग्रीव प्रवेश द्वार की ओर बढ़े और जोर-जोर से गर्जन करते हुए अपने भाई को ललकारने लगे।

वालि ने जिस समय सुग्रीव की ललकार सुनी, तब वह राजमहल के अंदर स्त्रियों वाले कक्ष में था। क्रोध से पागल होकर, वह अपने आसन से उछलकर खड़ा हो गया और लंबे-लंबे डग भरता हुआ तूफान की तरह सुग्रीव से लड़ने दौड़ पड़ा। वालि की पत्नी, तारा व्याकुल होकर उससे लिपट गई और उसे शांत करने का प्रयास करने लगी।

तारा गिड़गिड़ाकर बोली, "हे स्वामी, कृपा करके इस समय क्रोध का त्याग करें और इस मामले पर सावधानीपूर्वक विचार करें। आपने अभी-अभी सुग्रीव को गंभीर रूप से घायल किया है और यह कितना आश्चर्यजनक है कि वह इतनी जल्दी वापस लौट आया है और पूरे आत्मविश्वास के साथ आपको ललकार रहा है। मुझे निश्चित तौर पर ऐसा जान पड़ता है कि आपके भाई के साथ कोई अत्यन्त शक्तिशाली मित्र है और यही कारण है कि वह इतने गर्व से आपको ललकारने का साहस कर रहा है।

हमारे पुत्र अंगद को उसके जासूसों ने बताया है कि राम व लक्ष्मण यहाँ आये हैं और उन्होंने सुग्रीव से मित्रता कर ली है। राम के पास भगवान् विष्णु के समान बल है और उन्हें पराजित करना असंभव है, इसलिए आपको उनसे वैर मोल लेने का जोखिम नहीं उठाना चाहिए क्यों न आप सुग्रीव को अपना उत्तराधिकारी बनाकर इस झगड़े को समाप्त कर दें और इस तरह राम की मित्रता भी प्राप्त कर लें ?

परंतु वालि के सिर पर काल मंडरा रहा था, इसलिए उसने यह अच्छी सलाह नहीं मानी और बोला, मैं अपने छोटे भाई का ऐसा अहंकार सहन नहीं कर सकता। जहाँ तक राम का प्रश्न है, तो उनसे मेरा कोई वैर नहीं है। वह एक महान् क्षत्रिय हैं और इसलिए मुझे इस बात का डर नहीं है कि वह किसी ऐसे निरपराध व्यक्ति पर आक्रमण करेंगे जिससे कि उनका कोई वैर नहीं है।

वालि क्रोध से फुफकारता हुआ, तेजी से नगर के बाहर दौड़ पड़ा और सुग्रीव के साथ घमासान युद्ध में भिड़ गया। पहले की ही भाँति, शीघ्र ही वालि अपने छोटे भाई पर हावी हो गया और तब सुग्रीव ने राम को इशारा किया कि अब उसकी शक्ति चुक रही है। राम यह समझ गये कि सुग्रीव परास्त होने को हैं, इसलिए उन्होंने अपने धनुष की प्रत्यंचा पर एक शक्तिशाली बाण चढ़ा दिया। बिजली जैसी चमक के साथ उड़ते उस बाण ने वालि के सोने को वेध दिया। खून से लथपथ होकर, वालि जमीन पर गिर पड़ा परंतु उसके प्राण नहीं निकले क्योंकि उसने अपने पिता महाराज इंद्र की दी हुई सोने की दिव्य माला पहनी हुई थी।

राम और लक्ष्मण वृक्षों के कुंज से बाहर निकलकर मरणासन्न वालि के पास पहुँचे। आवेश से भरकर, वालि ने राम को कटु और घृणास्पद शब्दों से फटकारकर कहा, मैंने तो सुना था कि आप एक धर्मात्मा और न्यायी राजा है और आप दयालु और शूरवीर हैं। मैंने यह कल्पना भी नहीं की थी कि आप इतने तुच्छ और कपटी होंगे। गंदगी से भरे किसी कूप की भाँति, आप सद्गुणों का बाहरी दिखावा करते हैं, परंतु आपके पापपूर्ण कार्य आपके दुष्टता से भरे हृदय का पर्दाफाश कर देते हैं। मैंने सुग्रीव से युद्ध इसलिए किया क्योंकि मुझे विश्वास था कि आप मुझ पर आक्रमण नहीं करेंगे। स्वयं को क्षत्रिय और शूरवीर कहने वाला कोई व्यक्ति भला युद्ध लड़ते दो व्यक्तियों में से किसी एक को कैसे मार सकता है जबकि उसके साथ उस व्यक्ति की कोई शत्रुता भी न हो? मैंने कभी भी न तो आपको कोई हानि पहुँचाई और न ही कभी आपका अपमान किया। मैंने आपके राज्य पर कभी आक्रमण नहीं किया। तब भला ऐसे अन्यायपूर्ण ढंग से मुझ पर वार करके आपको क्या मिल गया? पुण्यात्माओं के मध्य आप अपने इस कार्य को कैसे न्यायोचित ठहराएँगे? यदि आपने ईमानदारी के साथ युद्ध किया होता, तो मेरी जगह पर अभी आप यहाँ पर गिरे पड़े होते! जिस प्रकार एक सर्प किसी सोए हुए व्यक्ति को धोखे से डंसता है, उसी प्रकार आपने चोरी-छुपे मुझ पर बाण चलाया है। मैं आपको चुनौती देता हूँ कि आप अपने इस पापपूर्ण कार्य को सही सिद्ध करें।

राम बोले, तुम्हारे आक्षेप यह दर्शाते हैं कि तुम्हें सच्ची नैतिकता के बारे में तनिक भी ज्ञान नहीं है। अपने चंचल चित्त के कारण, वानर स्वभाव से ही छिछोर होते हैं। तुम एक वानर हो और तुम्हारे सलाहकार भी वानर हैं, इसलिए तुम धर्म को नहीं समझ सकते।

समस्त पर्वतों, वनों और नदियों सहित यह सम्पूर्ण पृथ्वी इक्ष्वाकु राजवंश के शासन के अधीन है। सभी मनुष्यों और पशु-पक्षियों पर इक्ष्वाकु राजवंश के शासकों का पूर्ण अधिकार है। उनके पास किसी को भी दंडित या पुरस्कृत करने की शक्ति है। वह तुम हो, जिसने लोभ और वासना के वशीभूत होकर पाप कार्य किए हैं। तुमने अपने छोटे भाई की पत्नी, रूमा को छीन लिया और उसके साथ अपनी पत्नी के समान आनन्द-भोग किया। अपने इस पाप के कारण तुम मेरे हाथों से मृत्यु पाने के अधिकारी हो।

जो व्यक्ति अपनी पुत्री, पुत्रवधू, बहन या छोटे भाई की पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बनाता है, उसके लिए मृत्युदंड ही सर्वाधिक उचित है। यदि एक राजा किसी पापी को दंडित नहीं करता, तो वह स्वयं पापी बन जाता है। यही कारण है कि मैंने तुम्हारा वध करने और सुग्रीव को उसकी पत्नी तथा राज्य दिलाने का वचन दिया था। इसके अतिरिक्त, शिकार के दौरान बेपरवाह पशु-पक्षियों पर छिपकर बाण चलाना एक मान्य क्षत्रिय परंपरा है। चूँकि तुम केवल एक वानर हो, इसलिए मेरे इस कार्य में कोई भी दोष नहीं है।"

यह सुनकर, वालि को अपने अक्षम्य कार्यों पर ग्लानि महसूस हुई। श्रद्धापूर्वक अपने दोनों हाथ जोड़कर, वह बोला, मैं यह स्वीकार करता हूँ कि आपने सत्य कहा है। अपने पापों की अनदेखी करने और अपने अतिशय अहंकार के कारण ही, मैंने आप पर आरोप लगाने का दुस्साहस किया।

मेरे प्रिय राम, मेरी आपसे विनती है कि आप मेरे और मेरी पत्नी तारा के पुत्र अंगद की रक्षा करें। मेरी मृत्यु का समाचार सुनकर वह निश्चित ही स्वयं को अनाथ व असहाय महसूस करेगा। मैंने मूर्खतावश आपसे जो अपशब्द कहे और आप पर अन्यायपूर्ण कार्य करने का जो आरोप लगाया, उसके लिए कृपा करके मुझे क्षमा करें।

राम ने वालि को अंगद की देखभाल करने का आश्वासन दिया। तारा को जब अपने पति की पराजय का समाचार मिला, तो वह दौड़ती हुई अपने पुत्र के साथ नगर के बाहर आई। वालि के मंत्रीगण तारा को चारों तरफ से घेरे हुए उसके साथ चल रहे थे, परंतु राम को देखते ही वे भयभीत होकर भागने लगे। तारा ने उन्हें रोकने का प्रयास किया, परंतु मंत्रीगण बोले, वालि को देखने न जायें। किष्किंधा के दुर्ग के भीतर रहकर अपने पुत्र की रक्षा करें और सिंहासन पर उसका राज्याभिषेक करें। 

तारा बोली, मुझे संप्रभुता की कोई परवाह नहीं है। यह राज्य और इसका राजसी ऐश्वर्य मेरे पति के बिना मेरे लिए व्यर्थ है।

दुख से अपनी छाती पीटकर, करुण स्वर में फूट-फूटकर रोती हुई, तारा उस स्थान पर पहुँची जहाँ वालि जमीन पर गिरा पड़ा हुआ था। उसने अपने मरते पति को गले से लगाया और विलाप करने लगी, तभी वालि की अन्य पलियाँ भी वहाँ पहुँच गईं और उनके चारों ओर खड़ी हो गई। तारा के मन में सदैव अपने पति के साथ रहने की ही एकमात्र इच्छा थी। उसने निराहार रहकर मृत्यु का वरण करने का इरादा किया और वालि के पास में बैठ गई।

हनुमान ने विनती की, हे रानी, कृपा करके उठ जायें। दुख के कारण न्याय व धर्म के मार्ग से विचलित न हों। आपको ही अपने मृत पति का दाह संस्कार संपन्न करना होगा और इसके बाद अंगद को राज-सिंहासन पर बिठाकर सावधानीपूर्वक उसकी रक्षा करनी है।

तारा हठपूर्वक बोली, जहाँ तक अंगद को राज-सिंहासन पर विराजमान करने का प्रश्न है, तो यह उसके चाचा सुग्रीव के हाथ में है। मेरी एकमात्र इच्छा यही है कि मैं सदैव अपने पति के साथ ही रहूँ।

वालि बोला, मेरे प्रिय सुग्रीव, कृपा करके मेरे द्वारा किए गये सभी गलत कार्यों के लिए मुझे क्षमा कर दो। अब मुझसे राज्य पर शासन का दायित्व स्वीकार करो और मेरे पुत्र का खयाल रखना क्योंकि वह सदैव तुम्हारे प्रति निष्ठावान रहेगा।

यह कहकर वालि ने महाराज इंद्र से मिली सोने की दिव्य माला सुग्रीव को दी। फिर, वह अंगद की ओर मुड़कर बोला, मेरे प्यारे पुत्र, अब मैं जा रहा हूँ, परंतु तुम सदैव सुग्रीव की आज्ञा का पालन करना। पर्याप्त सोच-विचारकर ही काम करना और शांत संतुलित मन से तथा एकसमान भाव से दुख व सुख को स्वीकार करना । अत्यधिक लगाव करने और अत्यधिक घृणा करने से बचना क्योंकि दोनों की अति हमें पतन की ओर ले जाती है। "

यह कहने के बाद, राम के बाण से प्राणांतक रूप से घायल वालि ने अपने प्राण त्याग दिए। दुख से विलाप करती तारा बार-बार अपने मृत पति का आलिंगन करने लगी कि तभी नील ने वालि के सीने से बाण बाहर निकाल दिया। तारा ने अंगद से कहा, अपने पिता के चरण स्पर्श करो, और तब, अपने पिता के चरण स्पर्श करके, युवा राजकुमार अंगद भी गहन दुख से भर गया।

तारा के दुख को देखकर, सुग्रीव भी हताश-निराश हो गये। दुख से भारी स्वर में वह बोले, "हे राम, व्यक्ति को उसकी इच्छा पूरी होने पर प्रसन्नता का अनुभव होता है, परंतु मेरी इच्छा पूर्ण होने के बाद मुझे अब अपनी आशा के विपरीत दुख का अनुभव हो रहा है। राज्य पर शासन करने का विचार आते ही मुझे वितृष्णा महसूस हो रही है। अपने बड़े भाई के मारे जाने पर मुझे यह जीवन बेस्वाद प्रतित हो रहा है। अपने इस पाप का प्रायश्चित करने के लिए मैंने अग्नि में प्रवेश करके प्राण त्याग करने का निर्णय किया है। मेरे प्रिय राम, ये अन्य शक्तिशाली वानर आपकी प्रिय पत्नी की खोज करने में आपकी सहायता करेंगे।

सुग्रीव को ऐसी बातें करते देखकर राम बहुत दुखी हुए और उनकी आँखों से अश्रु निकल पड़े। तारा भी राम से विनती करते हुए बोली, "मैं जानती हूँ कि मेरे पति मेरे बिना स्वर्ग में रहने पर भी दुखी रहेंगे। कृपा करके, मेरा भी वध कर दें ताकि मैं उनके साथ जा सकूं। हे राम, यदि आप एक स्त्री का वध करना पाप समझते हैं, तो आप मुझे भी वालि के समान वानर ही समझें।

राम ने तारा को सांत्वना दी और फिर सुग्रीव से बोले, अपने भाई के वियोग में आपको जो दुख हुआ है और आपने जो आँसू बहाए हैं, वह आपके भाई की दिवंगत आत्मा के लिए पर्याप्त हैं। अब यह आपके लिए अपने उत्तरदायित्वों का पालन करने का समय है। यह विश्व चिरंतन समय के अधीन गतिमान है और इस प्रकार सभी जीवधारी यहाँ जन्म लेते हैं और मृत्यु को प्राप्त होते हैं। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के अधीन समय कभी भी अपनी सीमा का उल्लंघन नहीं करता और न ही अपने पथ से विचलित होता है। चूंकि समय ही प्रत्येक चीज की नियति तय करता है, इसलिए व्यक्ति को नियति की अपरिहार्यता के लिए विलाप नहीं करना चाहिए।"

सुग्रीव धीरे-धीरे शांत हो गये। लक्ष्मण की सहायता से उन्होंने अपने मृत भाई की देह का दाह संस्कार करने की तैयारी शुरू कर दी। तारा अपने साथ किष्किंधा से एक पालकी लेकर आई थी। सुग्रीव व अंगद ने वालि की देह को इस पर रखा और वे वालि के शव को पास ही में स्थिति एक पहाड़ी धारा पर ले गये। जिस समय चिता तैयार की जा रही थी, तब तारा वालि का सिर अपनी गोद में रखकर फूट-फूटकर रोए जा रही थी जिससे इस करुण दृश्य को देखने वाले सभी लोगों को दुख का अनुभव हो रहा था।

अंततः, दूसरी स्त्रियों ने आकर तारा को वहाँ से हटाया, ताकि सुग्रीव और अंगद मृत देह को चिता पर रख सकें। दाह-संस्कार संपन्न हो जाने पर, तुंगभद्रा नदी से जल लाकर शूरवीर वानर राज की दिवंगत आत्मा के कल्याण के लिए तर्पण किया गया।

हनुमान ने राम से सुग्रीव के साथ किष्किंधा चलकर उनका राज्याभिषेक करने का अनुरोध किया। राम ने ऐसा करने से मना करते हुए कहा, इस समय वनवास में होने के कारण, मैं किसी भी नगर में प्रवेश नहीं कर सकता हूँ। मेरा सुझाव है। कि हे हनुमान, आप सुग्रीव का राज्याभिषेक करें राज्याभिषेक के समय पर ही, अंगद को उत्तराधिकारी घोषित किया जा सकता है। वर्षा ऋतु आरंभ होने वाली है और सीता की खोज के लिए यह उचित समय नहीं होगा। इसलिए, आप सभी वानर प्रमुख चार माह तक किष्किंधा में रह सकते हैं जबकि मैं और लक्ष्मण किसी पर्वत की गुफा में रहकर समय व्यतीत करेंगे। पतझड़ की ऋतु आते ही, हम रावण के राज्य को चतुर्दिक खोज का काम आरंभ कर सकते हैं। 

किष्किंधा में सुग्रीव के प्रवेश पर सभी नागरिकों ने उनका हार्दिक स्वागत- अभिनंदन किया। सुग्रीव के सिंहासनारूढ़ होते समय, अग्रणी वानरों ने स्नान- अनुष्ठान संपन्न कराया। इन अग्रणी वानरों में मैंदा, द्विविदा और हनुमान के साथ ही रीतराज जाम्बवान भी थे। सुग्रीव को अपनी पत्नी रूमा वापस मिल गई और उन्होंने अंगद को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया।

राम व लक्ष्मण ने चार महीने तक प्रस्रवण पर्वत की एक गुफा में वास किया। सीता के वियोग की गहन पीड़ा से व्याकुल राम को इस पर्वतीय अंचल की रमणीय सुंदरता में कोई आनन्द नहीं मिला। निरंतर रोते रहने के कारण, रात को उन्हें नींद भी नहीं आती थी।

एक दिन राम लक्ष्मण से बोले, "आठ महीने तक समुद्र से जल वाष्पीकृत होने के बाद, आसमान से वर्षा की तेज फुहारें बरसती हैं। पहाड़ों के समान विशालकाय काले बादलों का आसमान में जमघट लग जाता है और चारों ओर उदासी का अंधकार छा जाता है। जरा, इन काले बादलों के बीच चमकती बिजली को कौंध को तो देखो, ऐसा प्रतीत होता है मानो रावण की बांहों में सीता हो! सुंदर हरी घास धरती माता को मानो भाँति-भाँति के फूलों से सुसज्जित रंगीन पोशाक पहना देती है। पंछी चहचहा रहे हैं, भंवरे गुंजन कर रहे हैं, मेंढक टर्रा रहे हैं और बादलों के गरजने व बारिश की बूंदों की टपटप की आवाज मानो किसी संगीत की तरह गूंज रही है। सुग्रीव की इच्छा पूर्ण हो जाने के कारण, वह इस वर्षा ऋतु का आनन्द ले रहा होगा, परंतु सीता के बिना मैं उस नदी-तट के समान हूँ जो जल से प्लावित, वेगवाही नदी के कारण टूट रहा हो।"

ऐसे समय पर, लक्ष्मण यह कहकर राम को उत्साहित करने का प्रयास करते कि दुख से विलाप करने वाले व्यक्ति का उद्देश्य कभी भी पूरा नहीं होता है। परंतु निरंतर वृष्टि करता हुआ मेघों से ढँका जो आसमान उस उष्णकटिबंधीय वन को हरा-भरा बना रहा था, उसके कारण सीता से मिलन को छटपटाते राम का दुख और अधिक गहरा रहा था।

राम यह मान रहे थे कि सुग्रीव को उसका राज्य वापस दिलाने के कारण वानर राज सीता की खोज करने में सहायता देने का वचन कभी नहीं भूलेंगे और जब पतझड़ ऋतु आ गई और आसमान साफ-स्वच्छ और नीला हो गया, तब भी सुग्रीव राम से मिलने नहीं आये। अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेने पर और निर्भय हो। जाने के कारण, सुग्रीव पूरी तरह युवा स्त्रियों के सानिध्य का सुख भोग करने में, विशेषकर अपनी पत्नी रूमा और नई अर्जित तारा के साथ आनन्द-भोग में डूब गये। इसके कारण, राज-काज की देखभाल करने में भी सुग्रीव लापरवाही करने लगे।

हनुमान ने जब देखा कि सुग्रीव किस तरह से इंद्रिय-भोगी बन गये हैं और अपने दायित्वों को पूर्णतः अवहेलना कर रहे हैं, तो उन्होंने राजा के पास जाकर उन्हें सलाह दो, आपको राम को दिए गये वचन का निर्वाह करके उसकी लाज रखनी चाहिए। आपके प्रति मित्रतापूर्ण आदर दर्शाते हुए, राम अब तक यहाँ पर आपको आपके वचन की याद दिलाने नहीं आये हैं, परंतु आपको सदैव यह याद रखना चाहिए कि उनकी कृपा से ही आपको यह ऐश्वर्य प्राप्त हुआ है। अब समय आ गया है कि आप अपने अधीन सभी वानरों को बुलवाएँ और सीता की चतुर्दिक खोज का कार्य आरंभ करें।

हनुमान की बात सुनकर सुग्रीव चेत गये। राजा ने नील को बुलवाकर आदेश दिया, सभी वानर योद्धाओं तक मेरा आदेश पहुँचा दिया जाये कि उन्हें पंद्रह दिन के अंदर यहाँ पहुँच जाना चाहिए अन्यथा आज्ञा का उल्लंघन करने वाले को मृत्यु दंड मिलेगा!

यह आदेश देकर, सुग्रीव अंतःपुर को लौट गये। इसी बीच, सीता से वियोग के कारण पतझड़ ऋतु की सुंदरता ने राम के वियोग की पीड़ा को और अधिक बढ़ा दिया। चूँकि राम यह समझ रहे थे कि सुग्रीव इंद्रिय तुष्टि के जीवन का उपभोग कर रहे हैं, इसलिए उनकी हताशा और अधिक बढ़ गई। राम का दुख देखकर, लक्ष्मण भी निराश हो गये और उन्होंने राम को प्रसन्न करने का बहुत अधिक प्रयास किया। 

एक दिन राम बोले, अब पतझड़ ऋतु भी आ गई है, जमीन सूखकर सख्त हो गई है और हवा ताजगी से भर गई है। सैन्य अभियान आरंभ करने के लिए यह सर्वथा उचित समय है, परंतु सुग्रीव अब भी नहीं आये। ऐसा प्रतीत होता है कि अगणित स्त्रियों के साथ इंद्रिय-भोग में डूबे होने के कारण वह दायित्व निभाने की अपनी चेतना गँवा चुके हैं।

मेरे प्रिय लक्ष्मण, मैं चाहता हूँ कि तुम किष्किंधा जाकर, सुग्रीव को मेरी ओर से धिक्कारते हुए कहना कि 'हे वानर-राज, आपके समान वचन न निभाने वाला व्यक्ति सभी जीवों में निकृष्ट होता है। मैं यह देखकर आश्चर्यचकित हूँ कि आपको अपने बड़े भाई का वध करने वाले, मुझसे वचन नहीं निभाने का तनिक भी भय नहीं है। मैं आपको चेतावनी देता हूँ कि यदि आपने सीता को खोजने में मेरी सहायता करने का वचन नहीं निभाया, तो मैं स्वयं किष्किंधा आकर आपके समस्त संबंधियों सहित आपका वध कर दूँगा।

राम को इस प्रकार अत्यधिक क्रोध में देखकर, लक्ष्मण भी क्रोध से भर उठे। अपना धनुष उठाकर वहाँ से जाने की तैयारी करते हुए, लक्ष्मण ने कहा, यदि वह दुष्ट सुग्रीव आपका आदेश सुनकर तत्काल नहीं चेत जाता, तो मैं आज ही उसका वध कर दूँगा !

यह कहकर, लक्ष्मण शीघ्रता से प्रस्थान करने लगे। तब राम ने लक्ष्मण के क्रोध को शांत करते हुए कहा, पहले सुग्रीव से मित्रतापूर्ण स्वर में बात करना, क्योंकि मुझे विश्वास है कि उसे होश में लाने के लिए इतना ही पर्याप्त होगा।

इसके बाद, अत्यन्त आवेश में भरकर लक्ष्मण ने किष्किंधा में प्रवेश किया जो एक विशालकाय गुफा के अंदर निर्मित एक सुंदर नगरी थी। लक्ष्मण किसी मदोन्मत्त हाथी की भाँति सुग्रीव के राजमहल की ओर बढ़ चले और अपने रास्ते में पड़ने वाले वृक्षों को क्रोध से उखाड़ फेंकने लगे।

राजमहल के प्रवेश-द्वार की रक्षा में अनेक भयानक वानर तैनात थे। पहरा देने वाले इन वानरों ने देखा कि लक्ष्मण क्रोध से काँपते अपने होंठों को भींचकर, विशाल वृक्षों को जड़ समेत उखाड़ फेंकते हुए और विशाल चट्टानों को उलटकर आगे बढ़ते चले आ रहे हैं। तभी लक्ष्मण ने देखा कि सैनिक स्वयं को अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित कर रहे हैं, तो वह प्रचंड क्रोध से भर उठे जिसे देखकर आतंकित वानर इधर-उधर भागने लगे। मंत्रीगण शीघ्रता से सुग्रीव को यह सूचना देने भागे कि लक्ष्मण भयानक क्रोध से भरकर वहाँ आ रहे हैं। परंतु सुग्रीव वासनापूर्ण इच्छा के वशीभूत तारा के साथ थे, इसलिए उन्होंने मंत्रियों की चेतावनी पर ध्यान नहीं दिया। 

इसी बीच, मंत्रियों ने वानरों को आदेश दिया कि वे युद्ध के लिए स्वयं को अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित कर लें। तभी, लक्ष्मण की भेंट अंगद से हुई और उन्होंने अंगद से कहा कि वह सुग्रीव को उनके आगमन की सूचना दें। अंगद सुग्रीव के पास गये और उनके पैर पकड़कर उन्हें लक्ष्मण के आने की सूचना दी। सुग्रीव मद्य के नशे में चूर होकर पड़े थे, इसलिए वह अंगद की पुकार सुनकर भी नहीं जागे। जब लक्ष्मण के भय से थर-थर काँपते अनेक वानर वहाँ पहुँचे, तब कहीं जाकर उनके शोर से सुग्रीव की आँख खुली।

सुग्रीव ने जब अपनी नशे से लाल आँखें खोलीं, तो मंत्रियों ने उनसे कहा, लक्ष्मण अत्यन्त क्रोध से राजमहल के प्रवेश-द्वार पर आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। हमारी सलाह है कि आप वहाँ जायें और उन्हें शांत करने के लिए आप उन्हें आदर से प्रणाम करके समर्पण भाव प्रकट करें।

अंततः, मामले की गंभीरता को समझकर, सुग्रीव झटपट अपने बिस्तर से उठे और आश्चर्य प्रकट करने लगे कि आखिर लक्ष्मण उनसे इतने अधिक नाराज क्यों हैं। तब हनुमान ने उन्हें याद दिलाया, हे राजन, आप इंद्रिय-भोग में इतने डूब गये थे कि आपको समय बीतने का ध्यान ही नहीं रहा। पतझड़ ऋतु आये हुए बहुत समय हो गया है, परंतु आपने सीता को खोजने में राम की सहायता करने के अपने वचन की अवहेलना की। लक्ष्मण यहाँ पर केवल आपको अपने दायित्व का ध्यान दिलाने आये हैं, इसलिए बेहतर यही होगा कि आप हाथ जोड़कर उनके सामने जायें और उनसे शांत हो जाने की विनती करें।

सुग्रीव ने अंगद से लक्ष्मण को राजमहल में लाने को कहा। जिन वानरों ने पहले युद्ध के लिए अस्त्र-शस्त्र उठा लिए थे, वे अब दोनों हाथ जोड़कर उनका अभिवादन कर रहे थे। लक्ष्मण अंतःपुर में पहुँचे, तो उन्हें वाद्य यंत्रों की धुन पर स्त्रियों के गाने की ध्वनि और पायलों की झंकार सुनाई दी।

वास्तव में सभी युवा व सुंदर स्त्रियों को देखकर, लक्ष्मण को लज्जा का अनुभव हुआ क्योंकि उन्होंने दूसरे व्यक्तियों की पत्नियों का सानिध्य नहीं रखने की प्रतिज्ञा ली थी। यद्यपि, इसके कारण वह अंदर प्रवेश नहीं कर सके, परंतु उन्होंने सुग्रीव को चेतावनी देकर भयभीत करने के लिए अपने पराक्रमी धनुष की प्रत्यंचा खींचकर टंकार-ध्वनि उत्पन्न की। उस भयानक गर्जनकारी टंकार-ध्वनि को सुनकर सुग्रीव थर-थर काँपने लगे और तारा से बोले, पता नहीं लक्ष्मण इतना अधिक क्रोधित क्यों हैं। मेरे विचार से पहले आप जायें और उन्हें शांत करने का प्रयास करें।

तारा जब लक्ष्मण के पास आई, तो उसकी पोशाक थोड़ी ढलक गई और नशे के कारण उसकी आँखें मंदने लगीं जिसके कारण लक्ष्मण का क्रोध शांत हो गया। लक्ष्मण आदरवश उनके पैरों को देखने लगे, तब तारा ने पूछा, मेरे प्रिय राजकुमार, आप सुग्रीव से इतने नाराज क्यों हैं ?

लक्ष्मण ने रूखेपन से कहा आपके पति ने राम को दिए गये वचन की अवहेलना की है और वचन पूरा करने के बजाय वह अंतःपुर में स्त्रियों के साथ आनन्द-भोग करते हुए दिन व्यतीत कर रहे हैं।

तारा ने विनती की, आप सुग्रीव को क्षमा कर दें, क्योंकि वासना के वशीभूत होकर वह सद्बुद्धि गंवा बैठे हैं। हम सभी जानते हैं कि कभी-कभी महान ऋषि- मुनि तक इंद्रियभोग में बहक जाते हैं, तो फिर भला एक चंचल-चित्त वानर के बारे में क्या कहना ? कृपा करके यह न सोचें कि सुग्रीव ने राम से किया गया वचन भुला दिया है। वे लाखों वानरों को यहाँ आने का आदेश दे चुके हैं ताकि वे सीता को खोजने के काम में जुट सकें। आप इसी समय अंदर आकर सुग्रीव से बात क्यों नहीं करते ?

लक्ष्मण राजमहल के अंत:पुर में चले गये। जब उन्होंने वहाँ सुंदर स्त्रियों के जमघट सहित अपार ऐश्वर्य को देखा, तो उनका क्रोध फिर से खौल उठा। सुग्रीव एक पलंग पर रूमा का आलिंगन करके बैठे हुए थे, परंतु लक्ष्मण को देखते ही वह लज्जा के मारे दोनों हाथ जोड़कर तत्काल उठ खड़े हुए और सभी स्त्रियाँ भी हाथ जोड़कर उठ खड़ी हुईं।

लक्ष्मण ने क्रोध से सुग्रीव को फटकारते हुए कहा, आपने राम को व्यर्थ वचन दिया और आप झूठ में ही उनके मित्र बने और ऐसे में आप सभी जीवों में सबसे अधम हैं, किसी निष्ठावान मित्र से सहायता लेने वाला व्यक्ति जब अपने मित्र की सेवा का भुगतान नहीं करता है, तो वह अत्यन्त क्रूर-हृदय होता है और निश्चित ही उसका वध कर दिया जाना चाहिए!

एक बार ब्रह्मा जी ने ऐसे कृतघ्न व्यक्ति को देखा, तो वह चिल्लाकर बोले, शास्त्रों में गौ-वध करने वाले व्यक्ति के प्रायश्चित के लिए दंड निश्चित है और यही बात मद्यपान करने वाले, चोरी करने वाले और पवित्र वचन को भंग करने वाले व्यक्ति पर भी लागू होती है, परंतु एक कृतघ्न व्यक्ति के लिए कोई प्रायश्चित नहीं हो सकता है!' हे सुग्रीव, मैं आपको चेतावनी देता हूँ। यदि आपने तत्काल राम की सहायता करनी आरंभ नहीं की, तो आपकी आज ही अपने भाई वालि से यमराज के दरबार में भेंट हो जायेगी!

तारा ने अपने पति की ओर से उत्तर दिया, हे लक्ष्मण, सुग्रीव झूठे नहीं हैं और न ही वह क्रूर हृदय हैं। राम ने उनकी जो सहायता की है, उसे वह भूले नहीं हैं। उनकी एकमात्र भूल यह है कि वह इंद्रिय-भोग में डूबकर समय की चेतना भुला बैठे। हमने यह सुना है कि रावण के निवास स्थान लंका में लाखों राक्षस हैं। चूँकि उन राक्षसों का संहार किए बिना रावण का वध करना संभव नहीं है, इसलिए सुग्रीव ने सम्पूर्ण धरती से लाखों वानर योद्धाओं को बुलवाया है। सुग्रीव ने अब तक राम से भेंट नहीं की, न ही उन्होंने सीता की खोज आरंभ की है और ऐसा इसलिए है क्योंकि वे उन वानर योद्धाओं के आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। सुग्रीव ने पंद्रह दिन की समय सीमा निर्धारित की है, इसलिए आज से हजारों वानरों और भालुओं के किष्किंधा पहुँचने की आशा है।

यह सुनकर लक्ष्मण ने क्रोध त्याग दिया। सुग्रीव ने विनम्रता से अपनी फूल- माला एक ओर फेंक दी और बोले, राम ने मेरे लिए जो किया है उससे मैं कभी भी उऋण नहीं हो सकता। वह मेरे स्वामी और मेरे भगवान् हैं। वह जहाँ भी जायेंगे मैं उनका अनुसरण करूंगा और उनके आदेश का पालन करूँगा और इस समय मैं आपसे क्षमादान करने की प्रार्थना करता हूँ।

लक्ष्मण ने कोमल स्वर में उत्तर दिया, कृपया मेरे क्रोध के लिए मुझे क्षमा करें। मेरे विचार से उत्तम यही होगा कि आप इसी समय राम से भेंट करने चलें। आपकी गंभीरता देखकर उन्हें प्रोत्साहन मिलेगा।

सुग्रीव ने हनुमान को आदेश दिया, एक बार फिर से, हिमालय, महेंद्र, मन्दार और कैलाश पर्वतों पर रहने वाले सभी वानरों को आने का आदेश दें। इंद्रिय-भोग में डूबे सभी वानरों को जगाएँ और विलंब करने वालों को यह चेतावनी दें कि जो भी दस दिन के अंदर यहाँ नहीं आयेगा, वह मारा जायेगा।

हनुमान ने तत्काल ही अग्रणी वानरों को सभी दिशाओं में भेज दिया। इसके परिणामस्वरूप, एक घंटे के अंदर ही लाखों वानरों की फौज किष्किंधा में उमड़ने लगी। राजा को उपहार देने के पश्चात् वानरों को उस समय राज दरबार से भेज दिया गया। लक्ष्मण द्वारा सुग्रीव से पुनः राम से भेंट करने का आग्रह किए जाने पर, वानर राज ने पालकी मंगवाई। इसके बाद, सुग्रीव और लक्ष्मण को राम के निवास स्थल पर ले जाया गया और उनके साथ अनगिनत वानर भी वहाँ गये।  

लक्ष्मण और सुग्रीव जब राम के समक्ष हाथ जोड़कर खड़े हुए, तो राम ने वानरों को सेना को संतुष्ट नजरों से देखा। सुग्रीव ने एक पूर्ण समर्पित आत्मा के समान राम के चरण-कमलों पर स्वयं को साष्टांग अर्पित कर दिया। राम ने दयार्द्र होकर, सुग्रीव को उठाया और उनकी पिछली लापरवाहियों को भुलाकर उन्हें गले से लगा लिया।

राम ने सुग्रीव को बिठाया और बोले, एक राजा को सबसे पहले धार्मिकता, आर्थिक विकास और इंद्रिय आनन्द-भोग के लिए उपयुक्त समयों की बहुत अच्छी तरह पहचान होनी चाहिए। केवल तभी वह जीवन का उचित आनन्द उठा सकता है। जब एक राजा वैदिक विधानों का त्याग करके, इंद्रिक-भोग में अत्यधिक संलग्न हो जाता है और इस प्रकार नियमित रूप से राज-काज के कार्य संपन्न नहीं कर पाता, तो उसे पतित मान लिया जाना चाहिए। मेरे प्रिय सुग्रीव, अब समय आ गया है कि आप अपने वचन के अनुसार सीता को खोजने का प्रयास करें और उसे खोज निकालें।

सुग्रीव बोले, मेरे प्रिय राम, आप पूरी तरह आश्वस्त रहें कि मैं और साथ ही यहाँ पर उपस्थित सभी वानर- गण आपकी सहायता करने को अत्यन्त उत्सुक हैं

राम ने सुग्रीव से अपनी मित्रता की पुनः पुष्टि करने के लिए उन्हें फिर से गले से लगाया। इसी समय, धूल के एक जबर्दस्त बादल ने सम्पूर्ण आकाश को इस कदर ढँक लिया कि सूर्य के आगे ओट-सी लग गई। सुग्रीव के आदेशानुसार किष्किंधा पहुँचने वाले वानरों के विशाल दल के कारण ऐसा हुआ था। वानरों के सभी अग्रणी नेता अपने अनुयायियों के साथ अपने आगमन की सूचना देने सुग्रीव के पास पहुँच गये। इनमें हनुमान के पिता केशरी, तारा के पिता सुषेण, रूमा के पिता तार, अश्विनी कुमारों के पुत्र मैदा और द्विविद और भालुओं के राजा जाम्बवान् शामिल थे। इस प्रकार आस-पास का समस्त वन्य अंचल और पर्वतीय अंचल वानरों से पूरी तरह भर गया।

वानरों के भिन्न-भिन्न समूहों की ओर इशारा करते हुए सुग्रीव बोले, मेरे प्रिय भगवान्, आप इन वानर योद्धाओं को अपनी ही सेना समझें। अब से, आप इन्हें जो भी उचित समझे वैसा आदेश दें।

राम बोले, हमारा पहला लक्ष्य रावण का पता लगाना है और फिर यह सुनिश्चित करना है कि सीता अब भी जीवित है या नहीं। मेरे प्रिय सुग्रीव, खोजी दल संगठित करें। सीता का पता चल जाने पर, मैं जरूरी आदेश दूँगा।

इस प्रकार का निर्देश मिलने पर, सुग्रीव ने पहले वानर-राज विंद को बुलाया और आदेश दिया, मैं चाहता हूँ कि आप और आपके योद्धा पूर्व दिशा में सातों महासमुद्रों और सातों महाद्वीपों सहित हर कहीं खोज अभियान चलाएँ। इस सम्पूर्ण क्षेत्र में खोज करने के लिए मैं आपको एक माह का समय देता हूँ, इस अवधि से देर में लौटकर सूचना देने वाले को राजाज्ञा का उल्लंघन करने वाला मानकर दंडित किया जायेगा।

इसके बाद, सुग्रीव ने अंगद, नील, हनुमान, जाम्बवान्, मैदा, द्विविद और अन्य वानरों को दक्षिण दिशा की ओर भेजा और वालि के पुत्र अंगद को उनका सेनापति बनाया। इस क्षेत्र के भूगोल का वर्णन करते हुए सुग्रीव बोले, खारे पानी वाले समुद्र के तट से एक सौ योजन की दूरी पर एक टापू है और मुझे विश्वास है कि रावण का निवास स्थल वही है। उसके आगे रसातल की राजधानी भोगवती है और उससे आगे यमराज का निवास स्थल है जो इस भू-मंडल की दक्षिणतम सीमा है। पितृलोक या उसके आगे नहीं खोजें, क्योंकि कोई भी मनुष्य वहाँ नहीं जा सकता है। 

इसके बाद सुग्रीव ने सुषेण और उसके अनुयायियों को पश्चिम दिशा में भेजा। उन्हें निर्देश देते हुए सुग्रीव बोले, खारे पानी वाले समुद्र के बीच में नरकासुर की नगरी प्राग्ज्योतिषपुर है और यही पश्चिम की सीमा है जहाँ सूर्यास्त होता है। उसके परे कौन-सा स्थान है इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है, इसलिए आप इससे आगे नहीं जायें।

अंत में, शतबलि को उत्तर दिशा को भेजा गया। सुग्रीव ने उन्हें बताया, सबसे पहले आप म्लेच्छों के देश पहुँचेंगे, फिर आप हिमालय की पर्वत श्रृंखला पर जायेंगे। इसके बाद एक सौ योजन तक निर्जन भूमि है और फिर कैलाश पर्वत है। इसके आगे, सुदूर उत्तर में क्रौंच पर्वत है और फिर उत्तर-कुरु प्रांत है जिसके परे खारे पानी वाला उत्तरी सागर है। उस समुद्र के तट तक पहुँचकर आप वापस लौट आयें क्योंकि उससे आगे जाना संभव नहीं है। 

सुग्रीव को सीता का पता लगाने के लिए सबसे अधिक उपयुक्त हनुमान ही प्रतीत हुए। उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए, वानर राज बोले, मेरे प्रिय हनुमान, सभी शूरवीर वानरों में आप असाधारण हैं। इस पृथ्वी पर आकाश में, या पाताल लोक में, ऐसा कोई भी नहीं है जो आपका रास्ता रोक पाए। आपमें न सिर्फ अतिमानवीय शक्ति है, बल्कि आप साहसी, बुद्धिमान और साधन-संपन्न हैं। इसलिए सीता का पता लगाने के इस कार्य में मुझे सबसे अधिक आशा आपसे है।

यह सुनकर और हनुमान के आत्म-विश्वास को देखकर, राम भी इस बात से संतुष्ट हो गये कि एकमात्र वही उनकी पत्नी का पता लगा सकते हैं। राम ने अपनी अंगूठी निकालकर हनुमान को दी और बोले, इसके अंदर मेरा नाम लिखा हुआ है। सीता को खोज लेने के बाद, उसे यह अंगूठी देना क्योंकि वह तत्काल इसे पहचान जायेगी और उसे विश्वास हो जायेगा कि आप मेरे विशेष दूत हैं। मेरे प्रिय हनुमान, मुझे पूर्ण विश्वास है कि मेरी ओर से इस महत्वपूर्ण कार्य को आप ही संपन्न करेंगे।

हनुमान ने अंगूठो लेकर इसे अपने सिर माथे से लगाया। इसके बाद उन्होंने भगवान् राम को शीश झुकाकर प्रणाम किया और वहाँ से प्रस्थान कर गये। एक माह की जिस नियत अवधि के दौरान, वानर-गण सम्पूर्ण धरा में सीता का पता लगाने के लिए विचरण कर रहे थे, उस समय राम व लक्ष्मण प्रस्रवण में ही रहे। सभी वानरों के चले जाने पर, राम ने सुग्रीव से पूछा, आपको पृथ्वी के भूगोल की इतनी विस्तृत जानकारी कैसे है ?

सुग्रीव ने उत्तर दिया, "वालि द्वारा किष्किंधा से निकाले जाने के बाद, में पूरी धरती पर शरणगाह खोजते हुए तब तक विचरण करता रहा, जब तक कि हनुमान ने मुझे मातंग ऋषि के शाप के बारे में सूचना नहीं दे दी।

सीता को खोजने के अभियान में जुटे वानर, दिन के समय अपने निश्चित क्षेत्र में खोज कार्य करने के लिए चारों ओर फैल जाते रात के समय वे अपने तंबुओं पर इकट्ठा होते और आराम करते। एक माह पूरा होने से पहले, विंद, शतवलि और सुषेण अपनी-अपनी नियत दिशाओं में भलीभाँति खोज करके प्रस्रवण को लौट आये। उन्होंने उदास चेहरों के साथ सुग्रीव को बताया कि उन्हें सीता के बारे में कोई भी संकेत तक नहीं मिला।

जिस समय वानर योद्धाओं ने वहाँ आकर अपने अनुभवों के बारे में बताया, उस समय सुग्रीव राम के पास बैठे हुए थे। अंततः, सभी ने यही निष्कर्ष निकाला कि अब हनुमान ही आशा की एकमात्र किरण हैं।

अंगद के नेतृत्व में गये खोजी-दल के वानरों ने, भूख-प्यास से तड़पते हुए भी सम्पूर्ण विंध्य पर्वत श्रृंखला में खोजबीन की क्योंकि वह क्षेत्र जल-रहित था। पर्वत श्रृंखला के बाद, जब वे उसके साथ वाले वन क्षेत्र में घुसे तो उन्हें यह देखकर बहुत निराशा हुई कि वहाँ वृक्षों पर फूलों-फलों की तो क्या कहें, उन पर पत्तियाँ तक नहीं थीं। उस वन की जल धाराएँ सूख गई थीं इसलिए वहाँ पशु-पक्षी तक नहीं रहते थे। किसी समय में, यह वन महान ऋषि कण्डु का निवास-स्थान था मात्र दस वर्ष की अल्पायु में अपने पुत्र की अकाल मृत्यु हो जाने पर, क्रोधित मुनि ने उस वन को मनुष्यों-पशु-पक्षियों से निर्जन हो जाने का शाप दे दिया।

उस निर्जन वन में वानरों के भटकते-भटकते, एक माह का नियत समय समाप्त हो गया। जल की तलाश करते हुए, अंगद और तार को एक गुफा दिखी जिसके प्रवेश द्वार पर घनी लताएँ उगी हुई थीं और वहाँ जलीय पक्षियों के झुंड जमा थे। जल पाने की आशा से, वानर जल्दी से दौड़कर इसके अंदर चले गये।

गुफा के अंदर घोर अंधकार था, इसलिए वानरों ने एक-दूसरे का हाथ पकड़कर एक श्रृंखला बनाते हुए गुफा में प्रवेश किया। आखिरकार, अंदर बहुत दूर तक जाने के बाद, उन्हें गुफा के काफी अंदर प्रकाश की एक रेखा दिखाई दी। इसकी तरफ बढ़ने पर उन्हें सुंदर सरोवरों से घिरा हुआ सोने का एक राजमहल दिखाई दिया। इसके चारों ओर बहुत ही सुंदर उद्यान थे जिनमें सुनहरे वृक्ष लगे हुए थे। उस स्वर्ग समान सुंदर उद्यान के बीच में, वानरों ने काला मृगाम्बर पहने हुए एक तपस्विनी को देखा जिसके मुख से आध्यात्मिक तेज टपक रहा था।

अपने दोनों हाथ जोड़कर हनुमान उस स्त्री के पास गये और बोले, कृप कर हमें बताएँ कि आप कौन हैं और यह गुफा किसकी है। यहाँ की प्रत्येक वस्तु स्वर्ण के समान रंग वाली क्यों है ? हम बहुत थके हुए हैं और प्यासे हैं, क्योंकि लंबे समय से हम जल-रहित क्षेत्रों में भटक रहे हैं।

वह स्त्री बोली, इस गुफा का नाम ऋक्षविल है और यह माया दानव द्वारा निर्मित है। इस स्थान पर तप करके, माया दानव ने ब्रह्माजी से शुक्र मुनि के समान समस्त मायावी शक्तियाँ अर्जित करने का वरदान प्राप्त किया था। इसके बाद माया दानव यहीं निवास करते रहे, परंतु बाद में उन्हें हेमा नामक एक अप्सरा से प्रेम हो गया और इस कारण इंद्र ने अपने वज्र का प्रयोग करके उन्हें इन क्षेत्रों से बाहर खदेड़ दिया। उसी समय ब्रह्माजी ने यह गुफा हेमा को दे दी।

मेरा नाम स्वयंप्रभा है और मैं मेरु पर्वत की रक्षा करने वाले देवता मेरु सावर्णि की पुत्री हूँ। मैं हेमा की मित्र हूँ और यहीं रहकर इस आश्रम की रक्षा करती हूँ। कृपया इसे अपना ही घर समझें और दया करके मुझे इन अगम्य क्षेत्रों में अपने आने का कारण बताएँ।

स्वयंप्रभा ने अपने अतिथियों का समस्त प्रकार से आदर-सत्कार करना आरंभ किया, तो हनुमान ने उन्हें राम के बनवास से लेकर सीता के अपहरण के बाद किए जा रहे अपने खोजी अभियान तक की सारी कथा सुना दी। इसके बाद हनुमान - बोले, आपकी इस सदाशयता के लिए हम आपका यथोचित आभार तक प्रकट नहीं कर सकते हैं। क्या इसके बदले हम आपकी कोई सेवा कर सकते हैं? स्वयंप्रभा ने उत्तर दिया, मैं तपस्या कर रही हूँ, इसलिए में दूसरों से कुछ भी देने अथवा करने को नहीं कह सकती हूँ।

हनुमान बोले, हमारे स्वामी, वानर राज सुग्रीव ने हमें सीता का पता लगाने के लिए एक माह का समय दिया था। यह समय अवधि पहले ही समाप्त हो चुकी है और इस कारण से हम स्वयं को विनाश के द्वार पर खड़ा महसूस कर रहे हैं। क्या आप किसी प्रकार से हमारी सहायता कर सकती हैं ?

स्वयंप्रभा बोली, इस गुफा से किसी भी व्यक्ति का जीवित बाहर जाना बहुत कठिन है, परंतु मैं अपनी मायावी शक्ति से आपकी सहायता कर सकती हूँ, आँखें खुली रखकर कोई भी इस स्थान से बाहर नहीं निकल सकता, इसलिए आप सभी को अपनी आँखें बंद रखनी होंगी।

तब सभी वानरों ने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं और अचानक उन्होंने स्वयं को गुफा के बाहर खड़ा पाया अपनी आँखें खोलने पर वानरों ने देखा कि बाहर के सभी वृक्ष नए पत्तों और फूलों से लदे हुए हैं। वसंत ऋतु आ गई देखकर, वानरों को बहुत हैरानी हुई कि किस रहस्यमय ढंग से इतना अधिक समय व्यतीत हो गया।

अंगद ने प्रस्ताव रखते हुए कहा, हमें यहीं पर निराहार रहकर अपने प्राण त्याग देने चाहिए क्योंकि हमारी लापरवाही के कारण सुग्रीव द्वारा हमारा वध किए जाने से बेहतर है कि हम अपने प्राण त्याग दें।

सभी वानर इस बात से सहमत थे कि सीता के बारे में कोई सूचना लिए बिना किष्किंधा वापस लौटने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता है। तार ने कहा, आइए, हम इस अगम्य गुफा में शरण ले लें। हम इसमें निर्भय होकर रह सकते हैं क्योंकि यहाँ हमें कोई भी नहीं खोज पाएगा।

अंगद कुछ नहीं बोले, मानो उन्होंने इस योजना को अपनी मौन सहमति दे दी हो। तब हनुमान बोले, "मेरे प्रिय राजकुमार, मेरे विचार से आपने बुद्धिमत्ता के आठ गुणों को आत्मसात किया है। ये आठ गुण हैं - दूसरों की राय सुनने की प्रवृत्ति रखना, पर्याप्त मानसिक नियंत्रण होना ताकि दूसरे लोग जो कह रहे हैं उसे वास्तव में सुनना, जो कहा जा रहा है उसके बुनियादी अर्थ को समझ पाने में सक्षम होना, अच्छी स्मृति, किसी प्रस्ताव के पक्ष में तर्क करने की क्षमता, किसी प्रस्ताव के विरोध में तर्क करने की क्षमता, दूसरों की बातों में छुपे अर्थ की गहन अंतर्दृष्टि और सच्ची बुद्धिमत्ता।

मेरे प्रिय अंगद, इसके साथ ही आप चार प्रकार के राजनीतिक उपायों का प्रयोग करने में भी कुशल हैं अनुनय-विनय करके मनाना या सुलह करना उपहार देना या तुष्टिकरण करना, शत्रुओं के बीच फूट डालना और आवश्यकता होने पर हिंसा या बल का प्रयोग करना।

इनके अतिरिक्त, सर्वोपरि रूप से, आपको महान व्यक्तियों में पाई जाने वाली चौदह शानदार विशेषताएँ भी विरासत में मिली हैं। ये हैं समय व स्थान की अनुभूति, दृढ़ता, सभी प्रकार की कठिनाइयों को सहन करने की क्षमता, सभी विषयों का ज्ञान, विशेषज्ञता, साहस, दूसरों के राज को अपने तक सीमित रखना, निरंतरता, नायकत्व, शत्रु की तुलना में स्वयं की शक्ति का मूल्यांकन करने की क्षमता, दूसरे लोगों द्वारा की गई सेवाओं की सराहना करना, समर्पित आत्माओं के प्रति दया-भाव, अन्यायी व्यक्ति की उपस्थिति में आक्रोश का अनुभव करना और कर्तव्य निर्वाह करने में निरंतरता।

इस प्रकार, हनुमान ने अंगद की प्रशंसा करके पहले राजनीतिक उपाय का प्रयोग किया। इसके बाद, उन्होंने वानरों में थोड़ा मतभेद पैदा करके तीसरे राजनीतिक उपाय का प्रयोग किया, जिसके कारण उनमें इस बात को लेकर बहस छिड़ गई कि अब उन्हें क्या करना चाहिए।

अंततः, हनुमान ने अंगद को डराते हुए कहा, यदि आप इस गुफा में रहने को अपनी मूर्खतापूर्ण योजना को लागू करते हैं, तो शीघ्र ही आपका विनाश हो जायेगा। वर्तमान स्थिति में, दूसरे वानर आपके प्रति निष्ठावान नहीं रहेंगे। इसके परिणामस्वरूप, लक्ष्मण यह पता लगा लेंगे कि आप कहाँ छिपे हैं और वह आपके व अन्य वानरों के साथ ही इस गुफा को ध्वस्त कर देंगे। दूसरी ओर, यदि आप किष्किंधा लौट जाते हैं, तो सुग्रीव निश्चित ही आपको क्षमा कर देंगे और चूँकि आप ही एकमात्र पुत्र हैं, इसलिए बाद में वह आपका राज्याभिषेक भी कर देंगे।

परंतु, अंगद ने वितर्क किया, आप सुग्रीव का अतिमूल्यांकन कर रहे हैं और यह भूल रहे हैं कि वह अपने बड़े भाई को पत्नी के साथ आनन्द-भोग कर रहे हैं। सुग्रीव ने जान-बूझकर राम को दिए गये वचन की अवहेलना की और लक्ष्मण द्वारा धमकाए जाने के बाद ही वचन पूरा करने के लिए कार्य आरंभ किया। जो भी घर लौटना चाहे, वह जा सकता है, परंतु मैं निराहार रहकर यहीं प्राण त्याग दूँगा। अंगद रो रहे थे और यह कहने के बाद, वह कुश घास पर बैठ गये और उन्हें घेरकर खड़े हुए अन्य वानर भी अपने प्राण त्याग देने को संकल्पबद्ध थे। इसी समय, जटायु के बड़े भाई, संपति अपनी गुफा से बाहर निकले और एक पर्वत-शिखर पर चढ़कर बैठ गये जहाँ पर सभी वानर उन्हें देख सकते थे।

अत्यधिक प्रसन्न होकर, वह स्वयं से बोले, सौभाग्यवश, लंबे समय के बाद मुझे कुछ भोजन मिल गया है! भूख के कारण जब ये वानर मर जायेंगे, तो मैं एक- एक करके इन्हें खा जाऊँगा यह सुनकर, अंगद अत्यधिक उत्तेजित हो उठे। वह हनुमान को संबोधित करके बोले, हमारे भाग्य में भी कैसे दुर्दिन देखना लिखा है। यह सब दुष्ट कैकेयी की करनी है। पहले, उसके कारण महान आत्मा जटायु की मृत्यु हुई और अब वह हमारी मृत्यु का कारण भी बनने वाली है!

संपति ने पहली बार जटायु की मृत्यु का समाचार सुना था। वह उद्विग्न होकर बोले, कृपा करके मुझे बताएं कि मेरे छोटे भाई को क्या हुआ आपके मुख से जटायु का गुणगान सुनकर मुझे प्रसन्नता हुई, परंतु साथ ही उसकी मृत्यु का समाचार सुनकर मुझे अत्यन्त पीड़ा हो रही है। हे वानरश्रेष्ठों, मुझ पर एक कृपा करें। बहुत समय पहले, सूर्य के ताप से मेरे पंख जल गये थे और इसी कारण में उड़ने में असमर्थ हूँ। क्या आप सभी दया करके इस पर्वत-शिखर से नीचे उतरने में मेरी सहायता करेंगे?

वानरों को संपति पर विश्वास नहीं था क्योंकि एक क्षण पहले ही वह उन्हें खाने का विचार कर रहे थे। परंतु उन्होंने सोचा, यूं भी, हम निराहार रहकर प्राण त्याग देने की योजना बना रहे हैं, तो ऐसे में यदि यह विशाल गिद्ध हमें जीवित ही खा ले, तो इससे हमारी पीड़ा शीघ्र ही समाप्त हो जायेगी।"

वानरों ने पर्वत शिखर पर जाकर संपति को नीचे उतारने में उनकी सहायता की और इसी दौरान अंगद ने राम के वनवास और जटायु की साहसपूर्ण मृत्यु की पूरी कथा उन्हें कह सुनाई। तब संपति ने उन्हें अपनी कथा सुनानी आरंभ की, बहुत, बहुत समय पहले, इंद्र द्वारा वृत्रासुर का वध किए जाने के बाद, जटायु और मैं अपने बल की परीक्षा करने को उत्सुक थे और इस कारण से हमने स्वर्ग के राजा इंद्र को चुनौती देने का निर्णय किया। आकाश में अत्यधिक ऊँचाई तक उड़ने और स्वर्ग लोक के ग्रहों को पार करने के बाद, हमने इंद्र को युद्ध में पराजित किया। इसके कारण हमें अहंकार हो गया और हमने और अधिक ऊँचाई पर जाने का निर्णय लिया, परंतु जैसे ही हम सूर्य के पास पहुँचे, तो सूर्य के प्रबल ताप के कारण जटायु मूर्च्छित होने लगे। उसकी प्राण-रक्षा करने के लिए, मैंने उसे अपने पंखों से ढँक लिया जिसके परिणामस्वरूप मेरे पंख जल गये और मैं नीचे विंध्य पर्वत श्रृंखला पर आकर गिरा।

उनकी बात को बीच में ही काटकर, अंगद बोले, यदि आप वास्तव में जटायु के बड़े भाई और हमारे शुभचिंतक हैं, तो हमें यह बताएँ कि राक्षस-राज रावण कहाँ रहता है ?

संपति ने उत्तर दिया, मैं बहुत बूढ़ा हो चुका हूँ और मेरे पंख जल गये हैं, इसलिए मैं शारीरिक रूप से भगवान् राम की सेवा करने में असमर्थ हूँ। फिर भी, मैं अपनी वाणी से उनकी सेवा करूँगा। मुझे सूचना मिली थी कि रावण एक युवा स्त्री का अपहरण करके ले गया था और वह युवा स्त्री "राम! राम!" कहकर चिल्ला रही थी और उसने अपने कुछ आभूषण जमीन में गिराए थे। मुझे यह पता है कि यही रावण राक्षसों का राजा है और उसका राज्य लंका में है जो दक्षिणी समुद्र-तट से एक हजार योजन की दूरी पर स्थित एक द्वीप है। मैं विनता का वंशज हूँ इसलिए मैं एक सौ योजन से अधिक दूरी तक देखने की सामर्थ्य रखता हूँ और मैं यहाँ से भी सोने की नगरी को देख सकता हूँ।

मेरे प्रिय वानरों, आप राक्षसियों के पहरे में सुरक्षित सीता को लंका नगरी में ढूँढ सकते हैं। अब, यदि आप मुझ पर कृपा करके मुझे समुद्र तक ले जा सकें तो मैं अपने भाई की दिवंगत आत्मा के कल्याण के लिए तर्पण कर पाऊँगा।

सीता का समाचार सुनकर, वानरों को अत्यधिक प्रसन्नता हुई और उन्होंने निराहार रहकर मृत्यु का आलिंगन करने का संकल्प त्याग दिया। वे संपति को समुद्र-तट पर ले गये और वहाँ से लौटने पर जाम्बवान ने पूछा, आपको यह कैसे पता चला कि रावण ने ही सीता का अपहरण किया है ?

संपति ने समझाते हुए कहा, “मेरे पंख जल जाने के बाद, मेरे पुत्र सुपार्श्व ने मेरा ध्यान रखना और मेरे लिए भोजन लाना आरंभ किया। एक बार की बात है, मैं बहुत भूखा था और सुपार्श्व बिना भोजन लिए घर लौट आया और तब मैंने उसे बहुत फटकारा। तब वह बोला, 'आज जब मैं मांस ढूंढ रहा था, तो मैंने एक विशालकाय राक्षस को एक युवा स्त्री को आकाश मार्ग से ले जाते हुए देखा। मैं उन दोनों को आपके भोजन के रूप में यहाँ लाना चाहता था, परंतु उस राक्षस ने अत्यन्त मित्रतापूर्ण स्वर में मुझसे यह आग्रह किया कि मैं उसे वहाँ से जाने दूँ और मैं उसे मना नहीं कर पाया। इसके बाद सिद्ध वहाँ आये और उन्होंने मुझे रावण के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि मैं बहुत सौभाग्यशाली हूँ कि राक्षस-राज ने मेरा बध नहीं किया।

संपति को वानरों का उसकी मित्रता पर बढ़ता विश्वास दिख रहा था, इसलिए उसने अपनी कथा जारी रखी, विध्य पर्वत श्रृंखला पर गिरने के बाद, मैं छह दिन तक अचेत पड़ा रहा। चेतना वापस लौटने के बाद, मैंने पास ही में रहने वाले ऋषि निशाकर को देखा। जब मेरी भेंट ऋषि से हुई, तो उन्होंने मुझसे मेरे पंख जलने का कारण पूछा जिस पर मैंने उन्हें बताया कि किस प्रकार मैंने और मेरे भाई ने पश्चिम दिशा में अस्त होते सूर्य का पीछा करने का प्रयास किया।

मैंने ऋषि से कहा, "जब हम सूर्य के निकट पहुंचने लगे, तो हम मूर्च्छा का अनुभव करने लगे। मैंने अपने भाई की रक्षा की, परंतु ऐसा करते हुए मेरे पंख जल गये और मैं इस पर्वत पर आ गिरा। तब से मुझे अपने भाई का कोई समाचार नहीं मिला और विकलांग हो जाने के कारण मेरे लिए जीवन असह्य हो उठा है। इसलिए, मैं पर्वत-शिखर से छलाग लगाकर आत्महत्या कर लूँगा।

मैं अश्रुपूरित नेत्रों के साथ उनके सामने खड़ा था, कि तभी निशाकर ऋषि बोले, 'हताश न हो, क्योंकि मैं तुम्हें एक वरदान देता हूँ : भविष्य में, जब तुम वानरों को सीता के बारे में जानकारी दोगे, तो तुम्हारे पंख फिर से उग आयेंगे और साथ ही तुममें युवा सुलभ ऊर्जा भी भर जायेगी।

यह कहकर, वह ऋषि अपनी कुटिया को लौट गये और मैं विंध्य पर्वत पर स्थित अपने स्थान पर रेंगता हुआ लौट आया। इसके बाद से मैं आप लोगों के आने को प्रतीक्षा करता हुआ समय व्यतीत कर रहा हूँ। इसके आठ हजार वर्ष बाद, वह ऋषि अपनी देह त्यागकर स्वर्गलोक को चले गये। अब जबकि वह इस संसार में नहीं हैं, तो मुझे उनके शब्दों की सत्यनिष्ठा पर सन्देह होने लगा है।

संपति के यह कहते-कहते, अचानक उनकी देह पर एक जोड़ा नए पंख उग आये और साथ ही उन्हें अपनी देह में युवा-सुलभ ऊर्जा भरती महसूस हुई। अत्यन्त प्रसन्न होकर, संपति अपने नए पंखों की जाँच करने के लिए आसमान में उड़ चले, परंतु जाने से पहले उन्होंने वानरों को प्रोत्साहित किया कि वे सीता के लिए अपना खोज अभियान जारी रखें। संपति के उड़ जाने के बाद, वानर नई आशा से भरकर दक्षिण दिशा की ओर बढ़ चले। 

समुद्र तट पर पहुँचकर वानरों ने एक बार फिर से स्वयं को असहाय महसूस किया। जल के विस्तार को देख, वानरों ने सोचा कि वे समुद्र पार करके लंका तक पहुंचने में असमर्थ हैं। अपने अनुयायियों को प्रोत्साहित करते हुए, अंगद बोले, असहायता सम्पूर्णतः व्यर्थ है, क्योंकि इसके कारण व्यक्ति कभी भी मनचाहा फल प्राप्त करने का कार्य नहीं कर पाता है। असल में, हताशा ही असफलता का मूल कारण है और इस तरह से यह एक जहरीले नाग की भाँति होती है। जो भी एक सौ योजन की छलांग लगाकर, सीता को रावण के पंजों से बचाने की सामर्थ्य रखता है, कृपा करके वह सामने आये। इस तरह से कृपा करके हमें सुग्रीव का कोपभाजन बनने से बचाए।

चूँकि किसी ने भी कोई उत्तर नहीं दिया, इसलिए अंगद ने वानरों से एक-एक करके यह पूछना आरंभ किया कि वे कितनी दूर तक छलाँग लगा सकते हैं। वानरों ने एक-एक करके जवाब देना आरंभ किया कोई बोला कि वह दस योजन तक छलाँग लगा सकता है, किसी ने बीस, किसी ने तीस, किसी ने चालीस तो किसी ने पचास योजन तक उलौंग लगाने की बात की। मैदा बोले कि वह साठ योजन की छलाँग लगा सकते हैं और द्विविद बोले कि वह सत्तर योजन तक की छलांग लगा सकते हैं।

सुषेण ने दावा किया कि वह अस्सी योजन तक छलाँग लगा सकते हैं और तब जाम्बवान बोले, युवावस्था में मैं असीमित दूरी तक छलाँग लगाने की क्षमता रखता था, परंतु अब जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुँचकर मैं नब्बे योजन से अधिक दूरी तक छलाँग नहीं लगा सकता हूँ। बहुत समय पहले, जब भगवान् वामनदेव ने तीन पग रखकर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को नाप लिया था तब मैंने उनको प्रदक्षिणा की थी। दुर्भाग्यवश, अब मैं लंका तक छलाँग लगाकर जाने और सीता को बचाने में सक्षम नहीं हूँ।

अंगद बोले, मैं संभवतः सौ योजन तक छलाँग लगा सकता हूँ, परंतु मुझे सन्देह है कि मैं वहाँ से वापस लौटते समय इतनी लंबी छलाँग न लगा पाऊँ।

जाम्बवान बोले, मुझे विश्वास है कि आपके पास 1000 योजन तक छलाँग लगाने की शक्ति है, परंतु आप खोजी अभियान के नेता हैं, इसलिए यह उचित नहीं होगा कि आप स्वयं यह कार्य करें। मेरे प्रिय राजकुमार, आप किसी अन्य को ऐसा करने का आदेश दें। 

अंगद ने उत्तर दिया, खोजी अभियान का प्रभारी कौन है, यह महत्वपूर्ण नहीं है। यदि मैं या कोई अन्य लंका तक नहीं जाता, तो हमारे पास मात्र एक ही विकल्प शेष रह जायेगा कि हम निराहार रहकर अपने प्राण त्याग दें। हे जाम्बवान, कृपा करके कोई ऐसा उपाय ढूँढें जिससे हम समुद्र पार कर सके और इस प्रकार सुग्रीव के क्रोध से बच सकें।

जाम्बवान बोले, "चिंता न करें, क्योंकि अब में जिनसे आग्रह करने वाला हूँ वे निश्चित ही इस कठिन कार्य को पूरा कर सकते हैं। मेरे प्रिय हनुमान, आपकी शक्ति भगवान् विष्णु के वाहन गरुड़ के समान है। आप अब तक चुप क्यों हैं ? कृपया सभी लोग ध्यान से सुनें क्योंकि अब मैं वानर- श्रेष्ठ हनुमान के अभूतपूर्व जीवन- इतिहास का वर्णन करने वाला हूँ: पुंजिकस्थला नामक एक अप्सरा को एक ऋषि ने वानर राज कुंजर की पुत्री अंजना के रूप में जन्म लेने का शाप दिया था। अंजना बड़ी होकर अत्यन्त रूपवती हुई और उनके पास इच्छानुसार रूप बदलने की शक्ति थी।

वानर राज केशरी से विवाह करने के उपरांत, अंजना ने मनुष्य का रूप धारण कर लिया और वह पर्वतों में विचरण करने लगीं। वायु ने उन्हें देखा तो वह उनके रूप को देखकर मुग्ध रह गये और तेज हवा के झोंकों से उन्होंने अंजना को निर्वस्त्र कर दिया। वायु देव ने जब अंजना की बेलनाकार और एक-दूसरे से कसी हुई जंघाएँ, उसके तने हुए स्तन और अन्य स्त्री-विषयक आकर्षण देखे, तो वह कामोद्दीप्त हो गये और उन्होंने अंजना को जबर्दस्ती आलिंगनबद्ध कर लिया।

अपने पर हमला करने वाले को नहीं देख पाने पर अंजना चिल्ला उठीं, 'कौन है जो मेरे सतीत्व को भंग कर रहा है? मैंने अपना सतीत्व मात्र अपने पति को समर्पित करने की शपथ ली है।' वायु देव ने उत्तर दिया, 'मैंने आपकी शारीरिक पवित्रता को दूषित नहीं किया है क्योंकि मैंने आपके मानसिक लोक में प्रवेश किया है। मैं वायु देव हूँ और मेरी कृपा से आप एक शक्तिशाली संतान को जन्म देंगी जो अपनी इच्छा मात्र से कहीं भी जाने में मेरे समान क्षमतावान होगा।

वायु की बात सुनकर, अंजना संतुष्ट हो गईं और इसके कुछ ही समय बाद उन्होंने पर्वत की एक गुफा में हनुमान को जन्म दिया। अगली सुबह, हनुमान ने जब उगते हुए सूर्य को देखा, तो उन्होंने समझा कि यह कोई चमकदार फल है। उसे पकड़ने के लिए, उन्होंने आकाश में 3000 योजन से भी लंबी छलाँग लगाई, परंतु सूर्य के तेज़ के कारण वह पृथ्वी पर वापस आ गिरे।

हनुमान को कोई चोट नहीं लगी और उन्होंने एक बार फिर आकाश में छलाँग लगा दी, परंतु एक वानर के इस दुस्साहस को देख क्रोधित इंद्र ने अपना वज । उन पर चला दिया। स्वर्गाधिपति इंद्र के इस परम अस्त्र के प्रहार के कारण हनुमान एक पर्वत के किनारे से टकराए जिससे उनकी ठुड्डी का बायाँ हिस्सा टूट गया। इसी कारण से उनका नाम हनुमान अर्थात 'टूटी ठुड्डी वाला' पड़ा।

इंद्र द्वारा अपने पुत्र पर किए गये प्रहार से वायु देव अत्यधिक रुष्ट हो गये। और उन्होंने तीनों लोकों में हवा की आपूर्ति बंद कर दी। इसके कारण देवतागण बहुत उद्विग्न हो गये और ब्रह्माजी के नेतृत्व में वे वायु के निवास पर गये। वायु देव को मनाने के लिए, ब्रह्माजी ने हनुमान को यह वरदान दिया कि वह युद्ध में अजेय होंगे

इंद्र भी यह देखकर अत्यन्त प्रसन्न और साथ ही आश्चर्यचकित रह गये कि उनके वज्र के प्रहार से भी यह बाल वानर मरा नहीं, इसलिए उन्होंने हनुमान को अपनी इच्छा से मृत्यु का वरण करने का वरदान दिया।

जाम्बवान अपनी बात समाप्त करते हुए बोले, "इसलिए, मेरे विचार से मात्र हनुमान ही हमारे कार्य को पूरा करने में सक्षम हैं। निःसन्देह, युवावस्था में मेरे लिए सौ योजन की छलाँग लगाना बहुत ही छोटी बात होती। क्योंकि जिस समय भगवान् त्रिविक्रम ने बलि महाराज का राज्य लेने के लिए अपने तीन पग बढ़ाए, तब उनकी प्रदक्षिणा करने के लिए मैंने इक्कीस बार विश्व की परिक्रमा की थी। जिस समय देवताओं और असुरों ने अमृत पाने की इच्छा से समुद्र मंथन किया था, तब मैंने ही अकेले वह सारी जड़ी-बूटियाँ एकत्रित कीं जिन्हें क्षीर सागर में डाला गया था। अब मैं बहुत बूढ़ा हो गया हूँ, इसलिए अब हनुमान की बारी है कि वह अपनी चमत्कारी शक्तियों का प्रदर्शन करें।

अपने इस महिमा मंडन को सुनकर हनुमान अत्यन्त उत्साहित हो उठे। उन्होंने स्वयं को अपने विशालकाय रूप में विस्तारित करना आरंभ किया जिसे देखकर वहाँ पर उपस्थित सभी वानर प्रसन्नता से भर गये और अपने विशालकाय रूप में आते हुए हनुमान ने अपनी महिमाओं का और अधिक वर्णन किया।

हनुमान बोले, "मैं बिना रुके 1000 बार मेरु पर्वत की परिक्रमा कर सकता हूँ और समुद्र की अगाध जलराशि को फैलाकर सम्पूर्ण विश्व को जल-प्लावित कर सकता हूँ। आकाश मार्ग पर गरुड़ के उड़ते समय, मैं 10-10 बार उनकी परिक्रमा कर सकता हूँ और अपनी इच्छा मात्र से मैं पूरी लंका नगरी को उखाड़कर जितनी दूर चाहे ले जा सकता हूँ।

हनुमान के मुख से इस प्रकार स्वयं उनकी शक्तियों का बखान सुनकर, सभी वानर रोमांचित हो उठे, परंतु उन्हें स्थिति की गंभीरता की याद दिलाते हुए वे बोले, जब तक आप वापस नहीं लौट आते, तब तक हम यहाँ पर एक पैर पर खड़े रहेंगे। हमारा जीवन अब आपके हाथ में है और साथ ही सीता को खोजने की सारी आशाएँ भी आप पर ही टिकी हैं।

हनुमान बोले, मैं महेंद्र पर्वत की चोटी से छलाँग लगाऊँगा क्योंकि छलाँग लगाने के लिए मेरे द्वारा डाले जाने वाले अत्यधिक दबाव को वही सहन कर सकते हैं।


यह कहकर हनुमान चल पड़े। एक ही क्षण में वह विशाल महेंद्र पर्वत पर पहुँच गये जो अब उनकी इस अविस्मरणीय छलाँग के लिए आधार देने वाले थे।