भरत और शत्रुघ्न कुछ समय तक अपने मामा युधाजित के साथ रहे, जिन्होंने उनका बहुत अच्छा स्वागत-सत्कार किया। अयोध्या में, राम महाराज दशरथ के सबसे लाडले बेटे बन गये थे और सारी प्रजा उनसे प्यार करती थी।


राम ही भगवान् विष्णु थे जिन्होंने दुष्ट रावण का वध करने के उद्देश्य से मानव समाज में अवतार लिया था। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् होने के कारण, भगवान् राम ने सर्वगुण सम्पन्न पुरुष के रूप में स्वयं को प्रदर्शित किया। राम को देखने वाले व्यक्ति के नेत्र उनके सुंदर रूप को देखकर पूरी तरह तृप्त हो जाते थे।


राम ने सबसे साहसी और शूरवीर क्षत्रिय की भूमिका निभाई, परंतु इसके बावजूद वह संयमित संतुष्ट, द्वेष-रहित थे और उनकी वाणी व कार्यों में विनम्रता थी। दूसरों द्वारा आलोचना किए जाने पर वह नाराज नहीं होते थे और रत्ती भर करुणा व दया देखकर भी प्रसन्न हो जाते थे। वह क्षमाशील थे और अपने कार्यों व स्थिति के बारे में अत्यन्त विनम्र थे। राम उन्हीं लोगों के साथ रहते थे जो पुण्यात्मा और ज्ञानी होते थे और अतिथियों का आदर-सत्कार करने में सबसे आगे रहते थे। राम दृढ़तापूर्वक सत्य का साथ देते थे, ब्राह्मणों का सम्मान करते थे, प्रजा से प्रेम करते थे और इसीलिए प्रजा भी उनसे अत्यधिक स्नेह करती थी।


राम सदैव धार्मिक नियमों व सिद्धांतों के अनुसार ही आचरण करते थे और वह समस्त शास्त्रों के प्रकाण्ड विद्वान थे। उनमें युवासुलभ उत्साह था और साथ ही वह किसी व्यक्ति के चरित्र को पहचानने में सक्षम थे। गलत आचरण करने वालों को दंडित करने और गुणी व्यक्तियों को पुरस्कृत करने में वह विवेकवान थे। घुड़सवारी और धनुर्विद्या में राम अत्यन्त निपुण और सर्वश्रेष्ठ थे और साथ ही रथ-युद्ध में वह सर्वोत्कृष्ट थे। सच कहें तो राम तीनों लोकों के स्वामी और शाश्वत समय के नियंता थे और इस प्रकार वह सर्वश्रेष्ठ देवताओं और असुरों तक के लिए अपराजेय थे।


महाराज दशरथ ने बहुत लंबे समय तक शासन किया, परंतु अंततः वह बूढ़े और कमजोर हो गये। साथ ही उनके मन में राज-काज के दायित्व से संन्यास लेने और अपनी मरणशील देह का त्याग करने के बाद उच्च आध्यात्मिक स्थान प्राप्त करने की तैयारी करने की इच्छा तीव्र से तीव्रतर होती गई। महाराज दशरथ को नाना प्रकार के अशुभ संकेत भी दिखने लगे जिनसे भयभीत होकर उनके मन में राम को 


शीघ्रातिशीघ्र अपने उत्तराधिकारी के तौर पर नियुक्त करने की इच्छा भी बलवती होती गई। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए, महाराज दशरथ ने अपने मंत्रियों विशिष्ट नागरिकों और अधीनस्थ राजाओं की एक बैठक बुलवायी, परंतु उन्हें समय हाथ से निकलता हुआ जान पड़ रहा था इसीलिए उन्होंने राजा जनक या केकय को आमंत्रित नहीं किया, जिसका एक कारण उनका यह विश्वास भी था कि वे उनके निर्णय से अवश्य सहमत होंगे।


इसलिए जब सभी लोग एकत्रित हो गये, तो महाराज दशरथ ने यह घोषणा की 'मैं अब बूढ़ा हो गया हूँ, अतः मैं अब राज्य के शासन का कार्यभार अपने ज्येष्ठ पुत्र राम को सौंपना चाहता हूँ जो अब सत्ताइस वर्ष के हो गये हैं। इस समय चैत्र का पवित्र माह चल रहा है और कल पुष्य की शुभ घड़ी आयेगी। इसलिए, आपकी अनुमति लेकर, मैं राम को अपने उत्तराधिकारी के रूप में सिंहासनारूढ़ करने में संबंधित अनुष्ठान कल ही आरंभ करना चाहता हूँ।”


सभी लोग महाराज के इस प्रस्ताव से अत्यन्त हर्षित थे और उन्होंने राम के अतुलनीय गुणों का जयघोष किया। महाराज दशरथ बहुत खुश थे। उन्होंने चैन की साँस ली और सभा समाप्त हो जाने के बाद, उन्होंने वशिष्ठ मुनि से अनुरोध किया कि वे तत्काल तैयारियाँ आरंभ कर दें। यह सुनकर वशिष्ठ ने प्रधानमंत्री सुमंत्र और अन्य लोगों को यह निर्देश दिए कि नगर को दुल्हन की तरह सजाया जाये और अन्य तैयारियाँ आरंभ की जायें ताकि सिंहासना-रोहण संबंधी अनुष्ठान अगली सुबह से शुरू किए जा सकें। इसके बाद महाराज दशरथ ने सुमंत्र से राम को बुलाकर लाने को कहा। महाराज का संदेश मिलते ही कौशल्या पुत्र अपने पिता से मिलने दौड़ पड़े। राजसभा में प्रवेश करके, राम दोनों हाथ जोड़कर अपने पिता के पास पहुँचे और उनके चरणों में दंडवत प्रणाम किया।


महाराज दशरथ ने अपने पुत्र को जमीन से उठाया। राम को स्नेहपूर्वक गले से लगाने के बाद, महाराज बोले, "प्रिय राम, मैं अब बूढ़ा और कमजोर हो गया हूँ, इसलिए मेरा विचार है कि अब मुझे राज-काज से संन्यास ले लेना चाहिए। मैंने सभी प्रकार के राजसी ऐशो-आराम का भरपूर आनन्द उठाया है, मैंने अनगिनत यज्ञ कराये हैं और ब्राह्मणों को अपार दान-दक्षिणा दी है।


प्रिय राम, तुम मेरे ज्येष्ठ और सबसे प्रिय पुत्र हो और सभी मंत्रीगण और प्रजाजन तुम्हें बहुत स्नेह करते हैं। इसलिए मैंने निर्णय किया है कि कल तुम मेरे उत्तराधिकारी के रूप में कौशल नरेश का पदभार ग्रहण करोगे।


राम के कुछ मित्रों ने यह समाचार सुना, तो वे माता कौशल्या तक सबसे पहले यह शुभ समाचार पहुँचाने के लिए दौड़ पड़े। कौशल्या को जब यह पता चला कि उनके पुत्र का राज्याभिषेक होने वाला है, तो वह खुशी से भर उठीं। परंपरा के अनुसार, उन्होंने यह शुभ समाचार लाने वाले को सोना, रत्न और माणिक, व गायें देकर पुरस्कृत किया। यह समाचार इतनी शीघ्रता से चारों ओर फैला कि जब राम राजसभा से अपने महल को लौट रहे थे, तब रास्ते में उन्हें बधाई देने के लिए लोग उमड़ पड़े।


महाराज दशरथ अपने शयनकक्ष में विश्राम करने चल पड़े। परंतु, उनकी आँख लगी ही थी कि उन्हें बार-बार दिखने वाला अपशगुनकारी सपना फिर से दिखाई दिया। वह घबराकर उठ बैठे और उन्होंने राम को बुलवाने के लिए सुमंत्र को भेजा क्योंकि उन्हें सन्देह था कि अगले दिन होने वाले राम के राज्याभिषेक में कुछ रुकावट पड़ सकती है। पिता द्वारा फिर से बुलवाये जाने का समाचार मिलते ही, राम को कुछ आशंका हुई और वह भागे-भागे उनके पास जा पहुँचे। पिता के कक्ष में पहुँचते ही राम ने उन्हें साष्टांग प्रणाम किया।


महाराज दशरथ ने उन्हें उठाकर गर्व मिश्रित स्नेह के साथ उन्हें गले से लगाया और बोले, "मेरे परमप्रिय राम तुम्हारे राज्याभिषेक को छोड़कर, मेरे जीवन भर की समस्त कामनाएँ पूरी हो गई हैं। सूर्य, मंगल और राहु के प्रभाव से, ज्योतिषीय गणना के अनुसार, दुर्भाग्यवश, यह मेरे लिए बहुत अशुभ समय है। मुझे कुछ अमंगलकारी स्वप्न दिख रहे हैं जिनके कारण मेरी यह धारणा पुष्ट हुई है कि मेरे साथ कोई अत्यन्त अशुभ व अमंगलकारी घटना घटने वाली है। इसी कारण से, मैं राज-काज संबंधी मामलों को अतिशीघ्र पूरा करके, तत्काल ही राज्याभिषेक अनुष्ठान आरंभ कर देना चाहता हूँ और इसके लिए मैं तुम्हारे भाइयों, भरत और शत्रुघ्न के आने तक भी नहीं रुकना चाहता। शुद्धिकरण के लिए तुम्हें और सीता को आज राज निराहार रहना होगा क्योंकि तभी कल उषा वेला में तुम लोग इसके लिए तैयार रह पाओगे।"


महाराज दशरथ को अपने विवाह के समय राजा कैकेयी को दिया हुआ एक वचन निरंतर कष्ट पहुँचा रहा था कि उनके राज-काज से संन्यास लेने के उपरांत कैकेयी का पुत्र राजसिंहासन का उत्तराधिकारी होगा। दशरथ यह जानते थे कि भरत राम के प्रति अत्यन्त निष्ठावान हैं, परंतु उनके मन में यह विचार उठा कि "पुरुषों का चित्त बहुत चंचल और असंयमित होता है और विशेषकर जब सत्ता और प्रतिष्ठा के प्रलोभन सामने आते हैं तो किसी का भी मन डोलते देर नहीं लगती। इसी कारण से महाराज दशरथ, भरत के वापस आने से पहले ही राम का राज्याभिषेक कर देने के लिए इतने उतावले थे।



पिता से अनुमति लेकर राम अपने महल वापस लौट आये ताकि वह सीता अपने पिता की इच्छा के बारे में बता सके। सीता को अपने महल में नहीं पाकर राम अपनी माता के महल में गये। कौशल्या के कक्ष में प्रवेश करने पर, राम माता कौशल्या को कुल के इष्टदेव भगवान् नारायण की श्रीमूर्ति के सामने दोनों हाथ जोड़कर और सांस थामकर अपने कुशल-मंगल के लिए प्रार्थना करते हुए देखा। सुमित्रा, सीता और लक्ष्मण उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। 


जब कौशल्या राम का स्वागत करने के लिए खड़ी हुई, तो राम बोले, "प्यारी माँ, पिताजी अगले कौशल नरेश के रूप में मेरा राज्याभिषेक करना चाहते हैं, वह कल उषा वेला में ही अनुष्ठान आरंभ कर दिए जाने के लिए बहुत उत्सुक हैं, इसलिए उन्होंने मुझे और सीता को आज रात निराहार रहने को कहा है। 


आँखों में प्रसन्नता के अश्रु लिए हुए कौशल्या बोलीं, “यह मेरा परम सौभाग्य है कि भगवान् विष्णु को प्रसन्न करने के लिए मैंने जो तप किया वह व्यर्थ नहीं गया। प्रिय पुत्र, मेरी यही कामना है कि तुम दीर्घायु हो और सदा प्रसन्न रहो!" 


राम मुस्कुराते हुए लक्ष्मण की ओर मुड़े और उनसे बोले, "प्रिय लक्ष्मण राज्य के शासन का उत्तरदायित्व निभाने में तुम्हें अवश्य ही मेरी सहायता करनी होगी, क्योंकि तुम मेरी आत्मा का ही एक अंश हो। राजसी ठाठ-बाट तो एक तरफ रहा, तुम्हारे बिना मैं सामान्य जीवन में भी प्रसन्न रहने की कल्पना तक नहीं कर सकता।"


इसके बाद सीता के साथ राम अपने महल को लौट गये। वह अत्यधिक प्रसन्न थे। महाराज दशरथ राज्याभिषेक के कुशल-मंगलपूर्वक पूर्ण हो जाने की चाह में इतने व्यग्र थे कि उन्होंने राम के कुशल क्षेम का पता लगाने के लिए वरिष्ठ मुनि को भेजा। राम को जब वशिष्ठ के आने की सूचना मिली, तो वह दौड़कर अपने महल से बाहर आये और रथ से नीचे उतरने में सहायता करने के लिए उन्होंने वशिष्ठ ऋषि का हाथ पकड़ा। कुल पुरोहित होने के कारण वशिष्ठ ने राम को कुछ सुझाव दिए और शीघ्र ही वहाँ से चले गये।


महाराज दशरथ के महल की ओर जाते हुए, वशिष्ठ मुनि यह देखकर मंत्रमुग्ध रह गये कि समस्त प्रजाजन अगले दिन के अनुष्ठान समारोह की प्रतीक्षा में दुल्हन सी सजी सड़कों पर एकत्रित हो गये थे। मार्गों को इत्र मिश्रित जल से धोकर उन पर फूल बिछा दिए गये थे। प्रत्येक घर और दुकान में जगमग करते हुए रंगीन दीपक जल रहे थे जिनके प्रकाश ने रात को दिन जैसा उजला बना दिया था। शोरगुल करते लोगों की भीड़ समुद्र की लहरों की तरह जान पड़ रही थी और अनगिनत हाथी, घोड़े व ऊँट इस विशाल जन समुद्र में तैरते जलीय जीव प्रतीत हो रहे थे।


भगवान् नारायण की आराधना करने के लिए सीता और राम एक साथ बैठे और पूजा-अर्चना सम्पन्न कर लेने के बाद वे कुश से बनी चटाइयों पर रात्रि विश्राम के लिए लेट गये। राम सूर्योदय से तीन घंटे पहले ही जाग गये और उन्होंने भगवान् विष्णु की पूजा की और गायत्री मंत्र का जाप किया। जिस समय वह पूजा-अर्चना कर रहे थे, उस समय पूरे नगर में राज्याभिषेक की पूर्वकल्पना के रोमांच से चहल- पहल मची हुई थी।


कैकेयी से महाराज दशरथ के विवाह के समय, कैकेय के राजा और कैकेयी के पिता अश्वपति ने उन्हें मंधरा नाम की एक कुबड़ी दासी भेंट की थी। मंथरा असल में, एक अप्सरा थी जिसे देवताओं ने रावण का संहार करने में सहायता करने के उद्देश्य से नियुक्त किया था, राम के राज्याभिषेक की पूर्व संध्या पर, मंथरा राजमहल की छत पर गई। वहाँ से उसने पूरे नगर को दुल्हन की भाँति सजे हुए और विशाल जन समुदाय को उत्सव मनाने जैसे उत्साह से भरा हुआ देखा।


यह देखकर आश्चर्यचकित मंथरा ने अपने पास खड़ी राम की धाय से पूछा, "इतनी चहल-पहल वाला ऐसा कौन-सा विशाल आयोजन हो रहा है? कौशल्या इतनी खुश क्यों हैं कि दोनों हाथों से ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा दे रही हैं ?"


धाय ने खुशी से चहकते हुए कहा, "तुमको अब तक नहीं पता? कल से पुष्य नक्षत्र का समय शुरू हो रहा है। इस शुभ समय का लाभ उठाकर महाराज दशरथ अपने उत्तराधिकारी के रूप में राम का राज्याभिषेक करने वाले हैं।"


इस अनपेक्षित समाचार ने मंथरा के इर्ष्यालु हृदय को गहराई तक वेध दिया। राजा के इस अन्याय को देखकर, उत्तेजना से भरी हुई वह कैकेयी के पास पहुँची। मंधरा जब अपनी स्वामिनी के कक्ष में पहुँची, तो उसे यह देखकर बहुत आश्चर्य हुआ कि कैकेयी अपने आराम झूले में शान्ति के साथ विश्राम कर रही थीं।


मंथरा अत्यन्त उत्तेजित स्वर में बोली, "अरी मूर्ख, उठ बैठ! क्या तुझे दिखाई नहीं देता कि तेरे साथ कैसा अनर्थ होने जा रहा है ? क्या तुम अपने पति की मीठी- मीठी बातों में फंसकर यह भी नहीं समझ पा रही हो कि तुम्हारी आँखों के सामने तुम्हारे साथ कितना बड़ा अन्याय हो रहा है?"


ऐसे कटु वचन सुनकर कैकेयी को गहरा झटका लगा। वह बोला, "क्या बात है? क्या अनाप-शनाप बक रही हो ? 


मंथरा को मंशा से अनजान कैकेयी के प्रश्नों ने उसके क्रोध को और अधिक बढ़ा दिया। दासी होने पर भी, वह बात करने में बहुत चतुर थी। कैकेयी के मन में ईर्ष्या का बीज डालकर राम के साथ मनमुटाव पैदा करने के उद्देश्य से मंथरा बहुत चतुराई से बोली, "क्या तुम जानती हो कि तुम्हारे पति राम को अपना उत्तराधिकारी बनाकर उसका राज्याभिषेक करने वाले हैं? क्या तुम्हें यह छल नहीं दिखता? दशरथ तुमसे बड़ी मीठी-मीठी बातें करते हैं, लेकिन दूसरी तरफ अपने लाडले राम को राजसिंहासन पर बिठाने के लिए उन्होंने भरत को यहाँ से दूर भेज दिया। अगर राम राजसिंहासन पर बैठ गया, तो तुम स्वयं को दुखों के सागर में गोते लगाते हुए पाओगी और साथ ही तुम्हारे प्रिय पुत्र भरत को भी दुर्दिन देखने पड़ेंगे।


"हे कैकेयी, मात्र तुम्हारा पुत्र ही नहीं, बल्कि में भी पूरी तरह से तुम्हारे भरोये हूँ। तुम्हारा सौभाग्य ही मेरा सौभाग्य है और तुम्हारा दुर्भाग्य मेरा भी दुर्भाग्य है। इससे पहले कि बहुत देर हो जाये, कुछ करो। मैं तुम्हारे पैर पड़ती हूँ कि जितनी जल्दी हो सके स्वयं को और अपने पुत्र को बचा लो।"


अपनी दासी को इस प्रकार की बातें करते देखकर कैकेयी हक्का-बक्का रह गई थीं। वह बोलों, "मेरी प्यारी मंथरा, राम के राज्याभिषेक का समाचार सुनकर मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ। मैं अपने पुत्र भरत और कौशल्या के पुत्र राम में कोई फर्क नहीं करती हूँ। मुझे यह शुभ समाचार तुमने ही सबसे पहले सुनाया है, इसके लिए मैं तुम्हें यह मूल्यवान मणि उपहार में देती हूँ। यदि तुम्हारे मन में किसी और वस्तु की कामना हो, तो तुम वह भी माँग सकती हो।"


यह कहकर कैकेयी ने मंथरा के हाथ में एक मूल्यवान मणि रख दी। परंतु उस दासी ने इसे तिरस्कारपूवर्क एक तरफ फेंक दिया और अत्यधिक रोष में भरकर बोली, "मुझे घोर आश्चर्य हो रहा है कि ऐसी अनर्थकारी घटना घटित होने से पहले दिन आखिर तुम ऐसे प्रसन्न कैसे हो सकती हो। भरत के स्थान पर राम का राज्याभिषेक होना तुम्हारा घोर अपमान है। तुम हमेशा यह सोचा करती थी कि तुम ही दशरथ की प्रिय रानी हो, परंतु सत्य अब प्रकट हुआ है कि वह सबसे ज्यादा कौशल्या को चाहते हैं। क्या तुम्हें घोर अपमान का अनुभव नहीं हो रहा है? तुम कह रही हो कि राम के राज्याभिषेक से तुम प्रसन्न हो, परंतु राम के राजा बन जाने पर कौशल्या का मान बढ़ेगा तुम्हें कौशल्या की दासी बनने को बाध्य होना पड़ेगा और भरत राम का दास बन जायेगा।"


मंथरा ने कैकेयी के सामने जो भयावह तस्वीर खींची थी उससे रुष्ट होकर वह बोली, "अरे मंथरा, तुम आखिर ऐसी बातें सोच भी कैसे सकती हो ? राम सभी व्यक्तियों में सबसे उदार हृदय हैं और वह सद्गुणों की खान हैं। वह सबसे ज्येष्ठ राजकुमार है, इसलिए मेरे पति के बाद राजा बनने का अधिकार उसी का है। इसके अतिरिक्त, मुझे पूरा विश्वास है कि सौ वर्ष तक शासन करने के पश्चात, राम प्रसन्नतापूर्वक भरत को राज-काज सौंप देगा। राम के इरादों के बारे में मुझे तनिक भी शंका नहीं है, क्योंकि वह अपनी माता से अधिक लगनपूर्वक मेरी सेवा करता है। मैं राम को अपने पुत्र से अधिक प्रतापी मानती हूँ। सिंहासन पर चाहे राम बैठे या फिर भरत, क्या फर्क पड़ता है ? राम अपने सभी भाइयों को अपने से बढ़कर चाहता है।"


कैकेयी के मुख से ऐसी बातें सुनकर मंथरा का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। वह चीखकर बोली, "अरे मूर्ख! राम कभी भी भरत को राज-सिंहासन पर नहीं बैठने देगा! वह अपने पुत्र को राज-सिंहासन पर बिठाएगा! सच तो यह है कि राजा बनते ही, राम भरत को वनवास दे देगा, या उसकी हत्या कर देगा। भरत को दूर करने के बाद ही वह बेखटे राज कर पाएगा।


"हे कैकेयी, मैं तुम्हें होश में लाने का प्रयास कर रही है, परंतु तुम तो अपनी सौत की जीत की खुशी मना रही हो, क्या यह सीधी-सरल बात तुम्हारे समझ में नहीं आती कि कौशल्या तुम्हारी सौतन, तुम्हारी दुश्मन है और ठीक इसी कारण से भरत का भविष्य खतरे में है ? राम की माता तुमसे घृणा करती है क्योंकि तुम जवान और सुंदर हो और तुम्हारी सुंदरता व यौवन के कारण महाराज तुम्हें उससे अधिक चाहते हैं। मेरी सलाह है कि तुम शीघ्र ही ऐसा कुछ करो जिससे राम को वनवास हो और भरत का राज्याभिषेक हो जाये।"


मंथरा की घृणा से भरी बातें सुनकर, कैकेयी का हृदय धीरे-धीरे विष से भर गया। अपने पुत्र के राजा बनने की बात सोच-सोचकर उसे हमेशा ही प्रसन्नता होती थी, जबकि अपनी सौत कौशल्या के बड़ी पत्नी होने पर उसे रोष होता था।


कौशल्या के प्रति उसकी द्वेष भावना जागृत हो गई और उसका चेहरा क्रोध से तमतमा उठा। अंततः कैकेयी बोली, "मंथरा, तुम सत्य कह रही हो मुझे किसी न किसी तरह से राम को वनवास भेजना होगा ताकि मेरा अपना पुत्र राजसिंहासन पर बैठ सके परंतु में यह कैसे करूँ ?"


मंथरा ने उत्तर दिया, "इसका उपाय तो पहले से ही तुम्हारे पास है। अगर तुम तो भूल गई हो, तो मैं तुम्हें याद दिला सकती हूँ, परंतु तुम्हें यह वचन देना होगा कि तुम ऐसा ही करोगी।"


जब कैकेयी ने वचन दे दिया कि वह उसके कहे अनुसार ही काम करेगी, तो कुबड़ीदासी बोली, "हे रानी, क्या तुम्हें वह कथा याद नहीं है जो तुमने मुझे सुनाई थी? बहुत समय पहले, महाराज दशरथ ने इंद्र की तरफ से असुरों के साथ युद्ध किया था, जब देवगण पराजय के कगार पर पहुँच गये थे, तो तुम्हारे पति ने असुरों की राजधानी वैजयंत पर धावा बोल दिया था। अत्यन्त पराक्रम और साहस से युद्ध करने पर भी, दशरथ गंभीर रूप से घायल हो गये और अचेत होकर युद्धक्षेत्र में ही गिर पड़े। ऐसे विकट संकट में तुमने ही उन्हें युद्धक्षेत्र से उठाया और उनकी सेवा सुश्रुषा करके उन्हें स्वस्थ किया। इस पर सच्चे हृदय से आभार प्रकट करते हुए, महाराज दशरथ ने तुम्हें दो वरदान माँगने को कहा, परंतु तुमने उनसे कहा कि तुम दोनों वरदान भविष्य में किसी समय माँग लोगी। 


हे कैकेयी, अब उन दोनों वरदानों को माँगने का समय आ गया है। पहले वरदान से तुम अपने को राजा बनाने को कहना। दूसरे वरदान में तुम राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास माँगना। राम के यहाँ नहीं रहने से, भरत को प्रजा में अपनी लोकप्रियता की साख जमा लेने का एक अच्छा अवसर मिल जायेगा। ऐसा हो जाने पर, अयोध्या के एक न्यायप्रिय शासक के रूप में सिंहासन पर भरत का दावा पक्का हो जायेगा।"


भरत को सिंहासन पर बिठाने और राम को वनवास भेजने का उपाय बताने के बाद, मंथरा ने कैकेयी को कुछ रणनीतिक सलाहें दीं जिनकी सहायता से वह अपने मन की मुराद पूरी कर सकती थी।


मंथरा बोली, "अब तुम कोप भवन में चली जाओ अपने सारे आभूषण और राजसी वस्त्र उतार फेंको और फटे-पुराने कपड़े पहन लो। इसके बाद, खाली जमीन पर लेट जाओ और जब तुम्हारे पति तुमसे मिलने आयें, तो ऐसे दहाड़ें मारकर रोना मानो दुख से तुम्हारा कलेजा छलनी हो गया हो। महाराज जब तुमसे बात करने का प्रयास करें, तो तुम एकदम चुपचाप रहना। चिंता की कोई बात नहीं है क्योंकि महाराज दशरथ तुमसे इतना प्यार करते हैं कि वह तुमको दुखी देख ही नहीं सकते, तुम इस बात पर पूरा विश्वास रखो कि तुम्हें मनाने के लिए वह कुछ भी करने को तैयार हो जायेंगे।



"मेरी प्यारी कैकेयी, सबसे जरूरी बात यह है कि तुम एक पल को भी अपने मन से यह विचार न हटने देना कि तुम अपने पुत्र को राजा के रूप में देखना चाहती हो सोने या आभूषणों या अन्य किसी भी वस्तु के बदले अपने क्रोध का त्याग मत करना। महाराज को बार-बार उन दो वरदानों को याद दिलाते रहना जो उन्होंने तुम्हें दिए थे। जब वह वचन दे दें कि वह तुम्हारी हर माँग पूरी करने को तैयार हैं। तो भरत को तत्काल राजा बनाने और राम को वनवास भेजने का वरदान माँगना।"


कैकेयी के मन में डाह और लालच समा गया था, इसलिए वह मंथरा की योजना सुनकर खुश हुई। उसने अपनी दासी को आश्वस्त किया कि वह उसकी सलाह का अक्षरश: पालन करेगी। भरत को संसार का सम्राट बनाने की बात कैकेयी के मन में इतने गहरे पैठ गई कि उसे अपने समस्त सौभाग्य का कारण मंथरा ही जान पड़ी।


किसी पागल स्त्री की भाँति उसने दासी मंथरा का गुणगान करते हुए कहा, "मेरी प्यारी मंथरा, कुबड़े सामान्यतः दुष्ट और पापी होते हैं, परंतु तुम बुद्धिमान् और सम्माननीय हो। दूसरों के लिए तुम शारीरिक रूप से कुरूप हो सकती हो, परंतु मेरे लिए तुम अत्यन्त सुंदर हो। तुम्हारा कुबड़ हवा के मंद-मंद झोके से मुड़ा हुआ कमल के फूल जैसा है और तुम अत्यन्त आकर्षक हो। तुम्हारे स्तन बड़े-बड़े और प्यारे हैं, जो नीचे झुककर तुम्हारे नाजुक नाभि क्षेत्र पर परदा करते हैं। तुम्हारे नितंब बहुत पुष्ट है और तुम्हारी जांघें रेशमी और सुगठित हैं। तुम्हारे कोमल पाँवों के इर्द-गिर्द लिपटी पायल जब सुमधुर स्वर में बजती है, तो हल्के व चमकदार रेशमी वस्त्रों में तुम एक छटा सो बिखेरती जान पड़ती हो। ऐसा जान पड़ता है मानो कूटनीति का समस्त विज्ञान रथ के पहिए के केंद्र जैसे विशाल तुम्हारे कुबड़ पर विराजमान है।


"मेरी प्यारी मंथरा, भरत के सम्राट बनते हो मैं तुम्हारे कुबड को शुद्ध सोने की लड़ियों से अलंकृत कर दूंगी। राम को वनवास हो जाने पर, मैं तुम्हारे कुबड़ पर चंदन का लेप लगवाऊँगी। हे मंथरा, मैं तुम्हें अति सुंदर वस्त्रों और आभूषणों से पुरस्कृत करूंगी और तुम्हारे पैरों को मालिश करने के लिए दूसरी सभी कुबड़ी स्त्रियों को तुम्हारी दासी बना दूंगी।'


अपनी प्रशंसा सुनकर अभिभूत हो जाने पर भी, कैकेयी को बीच में टोकते हुए मंथरा बोली, "जब तक हम महाराज को राम का राज्याभिषेक करने से नहीं रोकते तब तक यह सब बातें व्यर्थ हैं।"


मंथरा कैकेयी को कोप भवन लेकर गई। कोप भवन की ओर जाते समय वह अपनी बातों से रानी के क्रोध को बार-बार भड़का रही थी। वह बोली, "भूलना मत कि अगर तुम इस कार्य में सफल नहीं हुई तो भरत का अंत निश्चित है। तुम्हें दृढ़ संकल्प लेना होगा कि या तो तुम विजयश्री प्राप्त करोगी या फिर निराहार रहकर प्राण त्याग दोगी।"


इस बीच राम के राज्याभिषेक के लिए सभी आवश्यक तैयारियाँ पूरी करने के बाद, महाराज दशरथ अपने महल लौट आये। अपनी युवा रानी के सानिध्य के लिए लालायित महाराज उसके शयनकक्ष में गये और उसे वहाँ नहीं देखकर आश्चर्यचकित रह गये। कैकेयी को आस-पास ही जानकर, वह बार-बार उसका नाम पुकारने लगे। जब उन्हें कोई प्रत्युत्तर नहीं मिला, तो वह शंकित हो गये।


अंततः एक दास से पूछने पर राजा को पता चला कि कैकेयी कोप भवन चली गई हैं। महाराज दशरथ अत्यन्त व्याकुल और उत्तेजित अवस्था में महल के गलियारों से होकर दौड़ पड़े। कोप भवन पहुँचकर जब उन्होंने कैकेयी को खाली जमीन पर पड़े हुए और उसके आभूषणों व फूल-मालाओं को इधर-उधर बिखरे पड़े हुए देखा, तो उन्हें ऐसा जान पड़ा मानो कोई अप्सरा स्वर्ग से धूल-धूसरित जमीन पर गिर गई हो।


सुंदर और युवा कैकेयी महाराज दशरथ को अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय थीं। उन्होंने जब उसे मुरझाई हुई दशा में, रोते-सुबुकते हुए जमीन पर पड़ा पाया, तो वह अत्यधिक शंकाकुल हो गये और उनका हृदय पीड़ा से व्याकुल हो उठा।


अपने घुटनों के बल जमीन पर बैठकर, कैकेयी के चेहरे को स्नेहपूर्वक सहलाते हुए महाराज दशरथ ने इस प्रकार उनसे बोलना शुरू किया, "मेरी प्राणप्रिय कैकेयी, क्या बात है ? मुझे अपने शोक का कारण बताओ, मैं तुम्हें आश्वासन देत हूँ कि तुम्हारे शोक के कारण को दूर करने के लिए मैं कुछ भी करूँगा। मैं अत्यन्त व्यस्त था और इस कारण से मैं तुम्हारा ठीक से खयाल नहीं रख पाया, क्या यही तुम्हारे दुख का कारण है? क्या दूसरी रानियों में से किसी के साथ तुम्हारा झगड़ा हुआ है? क्या किसी ने तुम्हें अपमानित किया है ?


"हे प्रिये, मैं पूरी तरह से सिर्फ तुम्हारा हूँ। तुम्हें जो बात पसंद नहीं हो, तो मैं वह काम करने का साहस कभी भी नहीं कर सकता हूँ। बेहिचक होकर मुझे बताओ कि तुम्हारे मन में क्या बात है। हे सर्वश्रेष्ठ सुंदरी, तुम तो जानती हो कि मैं तुम्हें स्वयं अपने प्राणों से भी अधिक प्यार करता हूँ। जिस प्रकार उदय होता हुआ सूर्य ओस के कणों को वाष्पित करके सोख लेता है, उसी प्रकार मैं तुम्हारे दुख को दूर कर दूँगा।"


कामदेव के बाणों ने महाराज दशरथ के हृदय को बींध दिया था और इस तरह वह कामनाओं के आवेग के दास बन गये थे। अपने पति के शब्दों को सुनकर कैकेयों का आत्मविश्वास बढ़ा कि वह अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेगी। कुछ पलों तक चुप्पी साधे रखने के बाद, वह बोली, "किसी ने भी मेरा अपमान या अनादर नहीं किया है। हे स्वामी, मैं आपको अपने हृदय की बात बताऊँगी, परंतु उससे पहले आपको मुझे इस बात का पूर्ण आश्वासन देना होगा कि मैं आपसे जो कुछ भी माँगूँगी आप मुझे वह दे देंगे।"


महाराज दशरथ ने कैकेयी का सिर अपनी गोद में रख दिया। फिर उसके बिखरे हुए केशों को स्नेहपूर्वक ठीक करते हुए बोले, "हे प्रिया, तुम जानती हो कि राम के अतिरिक्त मैं तुमसे अधिक प्रेम अन्य किसी से भी नहीं करता। में शपथ लेता हूँ कि तुम जैसा कहोगी मैं वैसा ही करूंगा। तुम बेहिचक अपने मन की बात कहो और इस बारे में निश्चित रहो क्योंकि मैं बिना किसी चूक के तुम्हारी इच्छा पूरी करूँगा। हे प्रिये, तुम तो जानती हो कि मैं हमेशा ही तुम्हारी हर इच्छा पूरी करता हूँ। कृपा करके मुझे बताओ कि तुम्हें कौन-सा कष्ट सता रहा है।"


इस तिहरे आश्वासन को सुनकर, कैकेयी को पूर्ण विश्वास हो गया कि अब उसका पति पूरी तरह उसके नियंत्रण में है। अपने पुत्र के मोह की अदम्य इच्छा से प्रेरित होकर, युवा महारानी ने एक भयानक घोषणा की जो स्वयं मृत्यु के समान विकट थी "मैं बारह आदित्यों, ग्यारह रुद्रों, आठ वसुओं और जुड़वा अश्विनों को साक्षी बनाती हूँ। गंधवों, राक्षसों, पितरों, भूत-प्रेतों और अन्य समस्त जीवधारियों के साथ-साथ, सूर्य और चंद्र, दिन और रात, व चारों दिशाओं को भी साक्षी बनाती हूँ। हे परमेश्वर, धर्म के पालक और सत्यनिष्ठ रहने वाले मेरे स्वामी ने मेरी इच्छा पूर्ण करने का वचन दिया है।


"मेरे प्राणनाथ, आपको याद है कि किस प्रकार असुरों के साथ युद्ध करते हुए एक बार आप गंभीर रूप से घायल होकर रणक्षेत्र में मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहे थे? मैंने आपकी सेवा सुश्रुषा करके आपकी प्राण रक्षा की थी और आपने मेरा आभार प्रकट करते हुए दो वरदान माँगने को कहा था। हे उदारहृदय सम्राट, आज में आपसे वे दो वरदान माँगती हूँ। या तो आप मुझे ये दोनों वरदान दें, अन्यथा मैं दुख से अपने प्राण त्याग दूंगी। आपने राम के राज्याभिषेक के लिए जो तैयारियों की हैं उन्हों का उपयोग करके भरत को कौशल नरेश के रूप में सिंहासनारूढ़ करें। यह मैं आपसे पहले वरदान के रूप में माँगती हूँ और दूसरे वरदान के रूप में मैं चाहती हूँ कि राम को आज ही मात्र पेड़ की छाल और मृगचर्म में दण्डकारण्य वन भेज दिया जाये और चौदह वर्ष का वनवास दे दिया जाये।"


महाराज दशरथ ने जब कैकेयी के मुख से ऐसी चेतावनियाँ सुनीं, तो वह आश्चर्य से जड़ हो गये। उन्होंने हैरत से सोचा, "ये मुझे क्या हो रहा है? क्या में पिछले किसी जन्म की घटनाएँ देख रहा हूँ? या संभवतः मैं पूरी तरह से पागल हो गया हूँ!"


अत्यधिक भावुक होकर, महाराज अचानक मूर्च्छित होकर जमीन पर गिर पड़े। कुछ देर बाद उन्हें होश आया तो इस दुखद स्थिति को जस का तस अपने सामने देखकर वह पुनः होश खो बैठे। बहुत समय के बाद ही कहीं उन्हें पूरी तरह होश आया। होश आने पर उन्होंने स्थिति का सामना करने के लिए अपना सारा साहस बटोरा जबकि उनके हृदय में क्रोध का ज्वालामुखी भड़क रहा था।


क्रोध के आवेश में आकर महाराज दशरथ कैकेयी को फटकारने लगे, "अरे दुष्ट औरत ! मैंने ऐसा क्या पाप किया कि मुझे यह सब देखना पड़ रहा है ? राम ने तुम्हारे साथ क्या अनुचित बर्ताव किया है ? राम तुमसे उतना ही प्यार करता है। जितना कि वह अपनी माता से करता है। तुम उसे नुकसान पहुँचाने पर क्यों तुली हुई हो ? राम से सभी लोग बहुत अधिक प्यार करते हैं और मैं तो उसके बिना जीवित ही नहीं रह सकता। आवश्यकता पड़ने पर मैं अपनी अन्य दो पत्नियों का त्याग कर सकता हूँ, परंतु मैं कभी भी राम से अलग नहीं हो सकता हूँ।"


अपना गुस्सा निकाल लेने के बाद, दशरथ की मनोभावना अचानक बदल गई। कैकेयी के चरणों पर अपना शीश रखकर महाराज ने गिड़गिड़ाते हुए विनती की "मेरी परमप्रिय और सबसे सुंदर रानी, कृपा करके अपनी यह भयानक जिद छोड़ दो। राम समस्त सद्गुणों का मूर्त रूप है- वह दयालु, क्षमा करने वाले, सत्यनिष्ठ सौम्य कर्तव्यनिष्ठ और सभी लोगों के कल्याण की कामना करने वाले हैं। राम ने सदैव ही तुम्हारी सेवा बिल्कुल तुम्हारे पुत्र भरत के समान ही बहुत लगन के साथ की है। यदि तुम अपने निर्णय पर अडिग हो, तो मैं भरत का राज्याभिषेक कर दूँग, परंतु मैं राम को वनवास भेजने की कल्पना तक नहीं कर सकता। और तुम भी राम को नुकसान पहुँचाने की बात भला सोच भी कैसे सकती हो ? राम तो त्रुटिहीन है। और उसने कभी तुमसे एक कठोर शब्द तक नहीं कहा है। 


मेरी प्रिये, मुझ पर दया करो। मुझसे और कोई भी वरदान माँग लो। मैं तुम्हें पूरी पृथ्वी देने को तैयार हूँ, परंतु मुझसे राम का वनवास मत माँगो। अगर मैं राम से दूर हो गया, तो निश्चित हो मेरी मृत्यु हो जायेगी। कृपा करके मुझे यह निष्ठुर और अधार्मिक कार्य करने से बचा लो।


यह बोलते समय महाराज दशरथ दुख व पीड़ा से कांप रहे थे और कातर होकर विलाप कर रहे थे। परंतु कैकेयी अडिग रही। अपने संकल्प को पूरा करने के लिए दृढ़, कैकेयी बोली, "आपने मुझे जो वरदान देने का वचन दिया था अब आप स्वयं उससे मुकरने का प्रयास कर रहे हैं और इस पर भी धृष्टतापूर्वक आप मुझे ही धर्म के बारे में उपदेश दे रहे हैं ? राजा शिवि को याद करें, जिन्होंने एक कबूतर की रक्षा करने के अपने वचन को पूरा करने लिए एक बाज को स्वयं अपना मांस काटकर दिया। अगर आप अपने वचन की रक्षा नहीं कर पाए, तो आप अपने कुल में पैदा हुए महान राजाओं की बेदाग प्रतिष्ठा को धब्बा लगाने के उत्तरदायी होंगे। हे स्वामी, स्थितियाँ चाहे जो भी हों, परंतु आपने मुझे वचन दिया है और अब आपको निश्चित ही उसे पूरा करना होगा!"


यह बोलते हुए कैकेयी मनचाहा वरदान पाने के लिए अधिकाधिक संकल्पबद्ध होती गईं। क्रोध और लालच के वशीभूत होकर, उसने लज्जा और शिष्टता की सारी सीमाएँ लांघ दी थीं। कुछ पलों की चुप्पी के बाद, कैकेयी बोली, "हे राजन, मैं आपकी वास्तविक मंशा जान गई हूँ। राम का राज्याभिषेक करने के बाद, आप धीरे-धीरे मुझे और भरत को यहाँ से दूर कर देंगे ताकि आप बिना किसी खटके के कौशल्या के साथ जीवन का आनन्द उठा सकें। परंतु आप यह निश्चित जानो कि यदि आपने अपना वचन पूरा नहीं किया, तो मैं आज ही जहर पीकर प्राण त्याग दूँगी।'


यह कहकर कैकेयी चुप हो गई जबकि दशरथ कष्ट से आहें भरते रहे और आश्चर्यचकित नेत्रों से अपलक अपनी रानी की तरफ देखते रहे। अंततः, राजा ने अपना संतुलन खो दिया और "राम, राम" कहते हुए अचेत होकर जमीन पर गिर पड़े।


कुछ समय बाद, महाराज दशरथ तनिक शांत हुए और बोले, "अरे निर्बुद्ध स्त्री ! तुझे यह निर्लज्ज दुष्टता किसने सिखाई है ? क्या तुझे यह अहसास भी नहीं रहा कि यदि भरत का राज्याभिषेक कर भी दिया जाये, तो वह राम के बिना राज-काज का कार्यभार लेने से मना कर देगा? जरा सोचो, यदि तुम मुझे यह अक्षम्य कार्य करने के लिए बाध्य करोगी, तो लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे ? लोग मेरी खिल्ली उड़ाते हुए कहेंगे कि 'यही है वह राजा जो अपनी पत्नी पर इतना रीझ गया था कि उसने अपने प्राणप्रिय पुत्र का वनवास कर दिया। कैकेयी, क्या तुम्हें नहीं लगता कि ऐसे कार्य करके स्वयं तुम्हें भी कोई प्रसन्नता नहीं मिलेगी ?"


इसके बाद महाराज दशरथं चुप होकर यह सोचने लगे कि हमेशा राजसी ऐशो-आराम में पले-बढ़े राम जंगल का कठिन जीवन कैसे सहन कर पाएँगे। यह सोचकर अधिकाधिक दुखी और क्रोधित होते हुए, महाराज अचानक उलाहना दे हुए बोले, " ओ धार्मिक, न्यायप्रिय महारानी मैं तुम्हें शुभकामनाएँ देता हूँ कि अपने सभी संबंधियों से छुटकारा पाकर, तुम इस राज्य पर कुशलता से शासन करो। मुझसे यह आशा मत करो कि मैं तुम्हारी इस कपटपूर्ण योजना में कोई भूमिका निभाऊँगा मैं कभी भी तुम्हें ये वरदान नहीं दूंगा । कभी नहीं!"


कोप भवन में पसरे सन्नाटे में, महाराज दशरथ के हृदय में हताशा की भावना व्याप्त होने लगी। इसके बाद वह अत्यन्त विनीत भाव से कैकेयी के पाँव छूने के लिए बढ़े। दुख से विलाप करते हुए, वह गिड़गिड़ाने लगे, "हे रानी, कृपा करके अपने इन दुष्टतापूर्ण इरादों को त्याग दो, " और यह कहकर वह पुनः अचेत हो गये। कैकेयी ने अपने पति को धर्म की दुहाई देते हुए बार-बार अत्यन्त कटु वचन करे और इस प्रकार महाराज दशरथ लगभग एक घंटे तक अचेत पड़े रहे।


होश में आने पर, महाराज दशरथ ने पुनः कैकेयी को फटकार लगाई, "स्त्रियाँ कितनी नीच होती हैं, क्योंकि वे नैसर्गिक रूप से ही दुष्ट, निष्ठुर और स्वार्थ होती हैं। संभव है कि सभी स्त्रियाँ ऐसी न होती हों, पर तुम, भरत की माता , कम से कम तुम तो ऐसी ही हो। तुम्हारी माँगें दुष्टतापूर्ण और कुटिल हैं, इसलिए मैं कभी भी इन्हें पूरा नहीं करूँगा! तुम चाहे चीखो चिल्लाओ, या विषपान करो या जो जी में आये वह करने की धमकी दो, परंतु मैं कभी भी राम को बनवान नहीं दूंगा!"


सूर्यास्त हो गया था, परंतु महाराज दशरथ सारी रात दुख से विलाप करते रहे। कई बार वह अपने दोनों हाथ जोड़कर याचना करते, " हे सुंदर अंगों वाली देवी कृपा कर मुझ पर दया करो। मैं बूढ़ा हो रहा हूँ और अधिक समय तक जीवित रहने की आशा नहीं रखता हूँ। मुझ पर दया करो और राम पर, हमारे गुरुओं पर और प्रजाजनों पर और साथ ही भरत पर भी अपनी दवादृष्टि करो, हे सुनयनी कृपा करके मुझ पर तरस खाओ।"


रोते-रोते महाराज दशरथ की आँखें लाल हो गई थीं और उनका करुण स्वर सुनकर अत्यन्त दुख होता था। इस पर भी, कैकेयी उनसे मुँह मोड़कर, बिना कुछ बोले चुपचाप बैठी रही। कभी-कभी महाराज डराने के स्वर में अपनी रानी को फटकारते और कभी वह उसे तर्क और बुद्धि से मनाने का प्रयास करते। यह सब करते हुए भी दशरथ यह प्रार्थना करते रहे कि यह रात कभी समाप्त न हो, ताकि उन्हें अगले दिन राम को वनवास भेजने के दुष्कार्य का सामना न करना पड़े।


अंततः, जब उन्हें यह अहसास हुआ कि कैकेयी अपने निश्चय से पीछे नहीं हटने वाली है, तो वह हताश होकर एक बार फिर मूर्च्छित हो गये। अगले दिन सुबह जब चारण कवि दशरथ के द्वार पर आकर उनका प्रशस्तिगान करने लगे, तब वह उठे । अत्यन्त घृणा का अनुभव करते हुए, राजा ने गायकों और संगीतज्ञों को चले जाने को कहा।


कैकेयी ने जब अपने पति को जागे हुए देखा, तो उसने अपनी निष्ठुर बातें करनी फिर शुरू कर दीं, "क्या बात है, स्वामी? आपने मुझे जो दो वरदान देने का वचन दिया था क्या उन्हें पूरा करना आपके लिए अधर्म है ? धार्मिक सिद्धांतों के ज्ञाता पंडितों ने बताया है कि सत्य ही सर्वश्रेष्ठ नैतिक गुण है। सच तो यह है कि सत्य ही धर्म का आधार है और सत्य ही इसका अंतिम उद्देश्य है। हे राजन, यदि आप धर्मपरायण हैं, तो सत्य का पालन करें। मुझे मेरे वरदान दे दें!"


महाराज दशरथ क्रोधपूर्वक बोले, "अरे दुष्टा, जा, मैं तेरा त्याग करता हूँ! तुम अब से मेरी पत्नी नहीं हो।"


कैकेयी कठोर स्वर में बोली, "हे स्वामी, आप इतने उत्तेजित क्यों हैं? शांत होकर राम को बुलवाएँ और फिर उसे भरत को अपने उत्तराधिकारी के रूप में राज- सिंहासन पर बिठाने की सूचना देकर अपने कर्तव्य का पालन करें।"


किसी घोड़े पर लगातार चाबुक बरसाने के समान, कैकेयी बार-बार अपनी माँगें महाराज दशरथ पर थोपने लगीं। अंततः, राजा ने राम को बुलवाया। ठीक उसी समय, राज्याभिषेक के अनुष्ठान के लिए आवश्यक सामग्री एकत्रित करके, वशिष्ठ मुनि अपने शिष्यों के साथ अयोध्या में प्रवेश कर रहे थे। महाराज दशरथ के राजमहल में पहुँचकर उनकी भेंट सुमंत्र से हुई और उन्होंने सुमंत्र से कहा, "कृपया महाराज को मेरे आगमन की सूचना दें। साथ ही उन्हें यह भी बताएँ कि हर कोई राम का राज्याभिषेक अनुष्ठान आरंभ होने की अत्यन्त उत्सुकता के साथ प्रतीक्षा कर रहा है और सभी आवश्यक तैयारियाँ पूरी हो चुकी हैं।'


सुमंत्र महाराज दशरथ के कक्ष में गये और दरवाजे पर खड़े होकर उन्होंने सर्वप्रथम महाराज का यशगान किया। इसके बाद उन्होंने वशिष्ठ मुनि का संदेश सुनाकर महाराज से बाहर आकर अपने कुल पुरोहित का स्वागत करने का अनुरोध किया। परंतु, सुमंत्र के शब्दों ने महाराज दशरथ के दुख को और अधिक भड़का दिया। उन्होंने कर्कश स्वर में कहा, "चले जाओ! मुझे तुम्हारा यशगान नहीं चाहिए।"


महाराज को इतने चिड़चिड़े मनःस्थिति में पाकर, सुमंत्र कुछ कदम पीछे हट गये। तभी कैकेयी ने कूटनीतिपूर्ण स्वर में कहा, "महाराज राम के राज्याभिषेक अनुष्ठान के बारे में सोचकर इतने उत्तेजित थे कि कल सारी रात वह सो ही नहीं पाए। अत्यधिक थके होने के कारण, उन्हें अब जाकर थोड़ा विश्राम मिला है। यही कारण है कि आपके व्यवधान डालने के कारण वह चिड़चिड़े हो रहे हैं। राम को यहाँ बुलवाएँ, तभी महाराज उठेंगे और अनुष्ठान आरंभ हो सकेगा। सुमंत्र बोले, "महाराज का स्वर सुने बिना, मैं किसी भी आदेश का पालन नहीं कर सकता हूँ।"


महाराज दशरथ तेज आवाज में बोले, "मैं सो नहीं रहा हूँ। मैंने राम को बुलावा भेजा है। मेरे आदेश का अब तक पालन क्यों नहीं हुआ ? राम को तत्काल यहाँ लाया जाये!"


सुमंत्र तत्काल वहाँ से निकल पड़े, क्योंकि वह सोच रहे थे कि महाराज राज्याभिषेक समारोह पूरा करने के लिए अत्यधिक उत्सुक हैं। परंतु ब्राह्मणजन उद्विग्न हो रहे थे क्योंकि यज्ञ-क्षेत्र तैयार हो चुका था और समय व्यर्थ ही व्यतीत हो रहा था, ऐसे में महाराज दशरथ की अनुपस्थिति शंकित कर रही थी। सुमंत्र जब राजमहल के प्रवेश द्वार पर पहुँचे, तो पहरेदार उन्हें सीता और राम के पास ले गये। सुमंत्र ने राम को सूचित किया कि उनके पिता ने उन्हें बुलवाया है। तभी राम ने सीता से कहा, "निश्चित ही, मेरे पिताजी और माता कैकेयी राज्याभिषेक समारोह शुरू करने के लिए अधीर हो रहे हैं, तभी वह मुझे बुला रहे हैं।"


अपने महल से बाहर निकलते समय राम ने देखा कि लक्ष्मण द्वार पर दोनों हाथ जोड़े खड़े हैं। राम ने अपने भाई को अपने साथ लिया और प्रतीक्षा करते पर चढ़कर अयोध्या की भीड़-भरी सड़कों पर निकल पड़े। भगवान् राम का रूप इतना मनोहर है कि उन्हें देखने वाला कोई भी व्यक्ति एक बार उन्हें देखकर उनसे अपनी नजरें नहीं हटा सकता। अपने पिता के राजमहल के भीतर द्वार तक पहुँच जाने पर राम रथ से नीचे उतरे और अपने पीछे-पीछे आते प्रजाजनों से विदा ली।


अपने पिता के कक्ष में राम अकेले ही गये। वहाँ उन्होंने महाराज दशरथ को कैकेयी के साथ एक आसन पर बैठे हुए देखा और उनके चेहरे पर छाई उदासी व बेचैनी स्पष्ट दिख रही थी। राम ने पहले महाराज दशरथ को और फिर कैकेयी को प्रणाम किया, परंतु महाराज अश्रु-पूरित नेत्रों से सिर्फ "राम, राम" ही कह सके।


असल में, महाराज दशरथ अपने पुत्र से आँख मिलाने का साहस नहीं कर पा रहे थे और उन्हें इस अवस्था में देखकर राम अत्यन्त शंकित हो उठे। वह आश्चर्य से बोले, "ऐसी कौन-सी बात है जिसने मेरे पिताजी को इतना उदास कर दिया है, मानो किसी संततुल्य व्यक्ति से कोई अक्षम्य और निकृष्ट कार्य हो गया हो ? आज से पहले, यहाँ तक कि जब उनकी मनोदशा खराब होती थी, तब भी वह मुझे देखते ही अत्यन्त प्रसन्न हो जाते थे। तो भला आज वह मुझे देखकर प्रसन्न क्यों नहीं है ?"


राम ने कैकेयी से पूछा, "मेरे पिताजी की उदासी का क्या कारण है ? क्या मैंने अनजाने ही कुछ ऐसा कर दिया जिससे उन्हें ठेस पहुँची हो ?"


अपने पापपूर्ण आचरण के कारण कैकेयी बहुत निर्दयी हो गई थी। वह धृष्टता से बोली, "महाराज न तो गुस्से में हैं, न उन्हें ठेस पहुँची है और न ही वह दुखी हैं। उन्हें तुमसे कुछ कहना है, परंतु वह यह सोचकर भयभीत हैं कि इससे तुम्हें ठेस पहुँचेगी। बहुत समय पहले जब मैंने युद्धक्षेत्र में एक भयानक संकट से तुम्हारे पिता की रक्षा की थी, तो उन्होंने मुझे दो वरदान माँगने को कहा था। अब, पौरुषपूर्ण साहस की कमी के कारण वह अपना वचन पूरा करने से हिचकिचा रहे हैं।


"प्रिय राम, तुम्हें अपने पिता को अधर्म के मार्ग पर जाने से रोककर उनके धर्म की रक्षा करनी होगी। यदि तुम यह वचन दो कि तुम महाराज के आदेश का पालन करने को तैयार हो, तो मैं अपने माँगे हुए दोनों वरदान तुम्हें बताती हूँ।"


राम अत्यन्त दुखी मन से बोले, "मेरी प्यारी माता, मुझे यह सुनकर अत्यन्त आश्चर्य हो रहा है कि आपके मन में इस बात को लेकर किसी प्रकार की शंका है कि मैं अपने पिताजी की इच्छा का बेधड़क पालन करूँगा, क्योंकि यदि वे मुझे अग्नि में प्रवेश करने को भी कह दें तब भी मैं प्रसन्नतापूर्वक ऐसा ही करूंगा। कृपया मुझे बेहिचक होकर बताएँ कि मेरे पिताजी क्या चाहते हैं और आप आश्वस्त रहें कि मैं उनको इच्छानुसार ही कार्य करूँगा। यह मेरा आपसे वचन है।" 


राम से वचन प्राप्त करके, निष्ठुर कैकेयी बोली, “बहुत समय पहले, शंबरासुर से युद्ध करते समय जब तुम्हारे पिता गंभीर रूप से घायल हो गये थे, तो मैंने बहुत स्नेहपूर्वक उनकी सेवा सुश्रुषा करके उनकी प्राण-रक्षा की थी। मेरे इस कार्य के प्रति हार्दिक आभार प्रकट करते हुए, महाराज ने मुझसे दो वरदान माँगने का अनुरोध किया था। उस समय मैंने अपने पति से कहा कि मैं ये दो वरदान बाद में किसी ऐसे समय माँगूँगी जब मुझे उनकी आवश्यकता होगी। अब मैं चाहती हूँ कि मुझे ये दो वरदान दिए जायें और मैं बताती हूँ कि मैं क्या चाहती हूँ।


"पहले वरदान में, मैं तुम्हारे पिता से भरत को अगला कौशल-नरेश बनाने का वर चाहती हूँ। दूसरे वरदान में, मैं चाहती हूँ कि महाराज तुम्हें चौदह वर्ष का वनवास दें, जिसमें तुम्हें एक संन्यासी की भाँति जटा बढ़ाकर और वृक्षों की छाल व मृगांबर पहनकर रहना होगा। राम, अब यह सुनिश्चित करना तुम्हारा कर्तव्य है कि तुम्हारे पिता अपने वचन से पीछे हटकर अधर्म के मार्ग पर नहीं चलें।"


यद्यपि, कैकेयी ने अत्यन्त द्वेष के साथ ये बातें कहीं, परंतु इसे सुनकर राम न तो उत्तेजित हुए और न ही दुखी। तनिक भी दुख प्रकट किए बिना, वह प्रसन्न मुख से बोले, "मेरी प्यारी माता, आपकी इच्छा के अनुसार मैं इसी समय वन में रहने चला जाऊँगा। संदेशवाहक भेजकर भरत को यहाँ बुलवा लिया जाये। मुझे कोई दुख नहीं है। मेरी मात्र एक ही इच्छा है कि मुझ पर हमेशा मेरे पिताजी की अनुकंपा बनी रहे। कृपा करके मेरे प्रति अपने मन में कोई दुर्भावना न रखें।"


यह सुनकर, कैकेयी खुशी से चिल्लायी, "अब यह सुनिश्चित हो गया। मेरे भाई के घर पर दूत भेजो जिससे मेरा पुत्र जल्दी से जल्दी यहाँ आ सके। राम, तुमसे मेरा आग्रह है कि बिना देर किए तुम यहाँ से चले जाओ। अपने पिता के बारे में चिंता नहीं करो। अभी वह किंकर्तव्यविमूढ़ हैं, परंतु तुम्हारे जाते ही वह पहले की तरह ठीक हो जायेंगे।"


राम बोले, "मेरी प्यारी माता, मुझे यह दुख है कि मेरे पिताजी ने स्वयं मुझे वनवास जाने का आदेश नहीं दिया। बेशक, मैं मात्र आपके आदेश पर भी तत्कल वन जाने के लिए बिल्कुल तैयार हैं।"


कैकेयी बोली, "तुम्हारे पिता को यह बोलने में बहुत अपमान महसूस हो रहा है क्योंकि तुम उनके लाडले हो। असल में, मुझे लगता है कि जब तक तुम यहाँ से चले नहीं जाते, तब तक वह स्नान या भोजन भी नहीं कर पाएँगे।"


यह सब सुनकर, महाराज दशरथ सिर्फ यही कह पा रहे थे कि "ओह, कितने दुख की बात है, " और "कितने शर्म की बात है।" कैकेयी ने जब अपनी बात पूरी की, तो राजा अपनी चेतना खो बैठे और जमीन पर गिर पड़े।


राम ने अपने पिताजी को जमीन से उठाते हुए कैकेयी से कहा, "मैं इस संसार में लालच और कामनाओं का दास बनकर नहीं रहना चाहता हूँ। में ऋषियों की भांति धर्म के प्रति समर्पित हूँ। मैं एक राज्य पर शासन करने मात्र की आकांक्षा से धर्म के मार्ग से नहीं हटना चाहता हूँ। मेरी प्यारी माता, आपको मेरे पिताजी को परेशान करने की आवश्यकता नहीं थी। यदि आपने मुझसे सीधे ही कह दिया होता, तब भी मैं बेहिचक आपको राज-काज सौंपकर वन चला गया होता।"


यह कहकर, राम ने महाराज दशरथ और कैकेयी को सिर झुकाकर प्रणाम किया और फिर अपनी माता को यह समाचार सुनाने के लिए चल पड़े। लक्ष्मण दरवाजे पर खड़े यह सब सुन रहे थे और बड़ी मुश्किल से अपने क्रोध को दबाए हुए थे क्योंकि वह अपने बड़े भाई के पदचिह्नों पर चला करते थे जब वे दोनों महल से जाने लगे, तो उन लोगों के विलाप करने की आवाज सुनाई देने लगी जिन्हें राम के आसन्न वनवास का पता चल चुका था। महाराज दशरथ ने रोने-कलपने की आवाज सुनी तो उन्होंने लज्जा के मारे स्वयं को चादरों के नीचे छुपा लिया।


कौशल्या के महल में प्रवेश करते हो, महल की परिचारिकाओं ने प्रसन्नतापूर्वक राम का स्वागत किया और फिर उनकी माता को उनके आगमन की सूचना देने दौड़ पड़ीं। जिस समय राम ने कौशल्या के कक्ष में प्रवेश किया, उस समय वह भगवान् विष्णु की आराधना कर रही थीं, परंतु वह तत्काल उठ खड़ी हुई और राम को गले से लगा लिया। कौशल्या बोली, "प्रिय राम, मैं बहुत प्रसन्न हूँ कि तुम आज ही के दिन मेरे पति के उत्तराधिकारी के रूप में कौशल नरेश बनने वाले हो।"


राम ने सौम्यता और विनम्रता के साथ कहा, "मेरी प्यारी माँ, मैं आपसे जो कहने वाला हूँ उसे सुनकर अधिक दुखी और परेशान न हों। मेरे पिताजी ने बहुत समय पहले माता कैकेयी को दो वरदान देने का वचन दिया था जिनके परिणामस्वरूप भरत का राज्याभिषेक किया जायेगा और मैं आज ही चौदह वर्ष के वनवास के लिए अयोध्या छोड़कर चला जाऊँगा।"


यह सुनते ही कौशल्या मूर्च्छित होकर जमीन पर गिर पड़ीं। राम ने अत्यन्त सौम्यता से अपनी माँ को पैरों पर खड़ा किया। होश में आते ही, कौशल्या ने दुख से विलाप करना आरंभ कर दिया, "मेरे साथ भला इससे बड़ा अनर्थ और क्या हो सकता था? इससे तो अच्छा था कि मैं निःसंतान ही रहती। इस विपत्ति का समाचार सुनते ही, मुझे तत्काल मौत क्यों नहीं आ गई? अब, मेरी युवा सौतें निश्चित हो मेरा तिरस्कार करेंगी और उनके कटाक्ष सुनकर मेरा जीवन और भी अधिक दुखमय हो जायेगा।"


लक्ष्मण ने अब तक किसी तरह से अपना क्रोध दबा रखा था, परंतु कौशल्य की बात सुनकर वह चुप नहीं रह सके। लक्ष्मण का क्रोध शब्दों में फूट पड़ा "हमारे पिता वासना के वशीभूत होकर सठिया गये हैं और उनकी मति भ्रष्ट हो गई है। वह दुष्ट कैकेयी के हाथों की कठपुतली बन गये हैं। आखिर हम क्यों अकर्मण्य बने रहकर यह सब स्वीकार कर लें ? जिस पिता, राजा या आध्यात्मिक गुरु को इतना ज्ञान भी न रह जाये कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए ऐसे मनुष्य को पदच्युत कर अस्वीकार कर देना चाहिए।


हे राम, इससे पहले कि सबको भरत का राज्याभिषेक करने के महाराज के निर्णय का पता चले, आप तत्काल ही राज्य पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लें। यदि समस्त मंत्रीगण और प्रजाजन इसके बारे में जानते हैं और आपके विरुद्ध है। तब भी मैं आवश्यकता पड़ने पर अयोध्या को निर्जन करने को तैयार हूँ। 


इसके बाद, कौशल्या की ओर मुड़ते हुए लक्ष्मण बोले, "मेरी प्यारी माता, आपको यह पता होना चाहिए कि मैं सिर्फ और सिर्फ राम के प्रति निष्ठावान् हूँ, राम को राज सिंहासन पर बिठाने के लिए यदि मूर्ख दशरथ का वध करने की आवश्यकता हो, तो मैं उसके लिए भी तैयार हूँ।"


परंतु कौशल्या को राज्य की कोई चिंता नहीं थी। उसे तो मात्र अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय पुत्र से दूर होने का भय था। वह बोली, "हे राम, कृपा करके तुम वन मत जाओ। अपने पिता की आज्ञा का पालन करके वन जाने से अधिक धर्म इसमें है कि तुम अपनी असहाय माता को प्रसन्न रखने के लिए यहाँ रहो। यदि तुम गये, तो मैं अन्न-जल छोड़कर प्राण त्याग दूंगी, क्योंकि तुम्हारे बिना मेरा जीवन असह्य हो जायेगा।"


राम बोले, "मेरी प्यारी माँ, अपने पिताजी की आज्ञा का उल्लंघन करना मेरे लिए संभव नहीं है। इसलिए, आपको मुझे जाने की अनुमति देनी ही होगी ताकि मैं जल्दी से जल्दी यहाँ से जा सकूँ। व्यक्ति को अपने पिता की आज्ञा का अनादर नहीं करना चाहिए। जरा सोचिए कि परशुराम ने कैसे अपने पिता जमदग्नि की आज्ञा का पालन करते हुए स्वयं अपनी माता रेणुका का सिर काट दिया था।" 


फिर लक्ष्मण की तरफ मुड़कर राम बोले, "प्रिय लक्ष्मण, क्रोध के वशीभूत होकर सारे सद्गुणों को नष्ट न करो। बलपूर्वक राज-सिंहासन पर अधिकार जमाने का विचार त्याग दो और हमारे पिता की आज्ञा को शिरोधार्य करो।



कौशल्या फूट-फूटकर रो रही थी क्योंकि वह अपने पुत्र को विदा होने की अनुमति देने में समर्थ नहीं थी। राम के लिए यह अत्यन्त कष्टकर स्थिति थी इसलिए वह कठोर स्वर में लक्ष्मण से बोले, "तुम दोनों ही मुझे अपने पिताजी की आज्ञा का पालन करते हुए वनवास जाने से रोकने का प्रयास करके मेरे कष्ट को बढ़ा ही रहे हो। मेरे लिए अपने पिता की आज्ञा का पालन करना ही धर्म है और मैं कभी भी धर्म के मार्ग से विचलित नहीं होऊंगा।"


कुछ पल चुप रहने के बाद, लक्ष्मण को शांत करने का प्रयास करते हुए राम फिर से बोले, "मेरे प्यारे भाई, क्या तुम यह नहीं देख पा रहे हो कि जितनी जल्दी भरत का राज्याभिषेक हो जायेगा और जितनी जल्दी इन बातों को भुला दिया जायेगा, उतनी ही जल्दी तुम्हें दुख से छुटकारा मिल जायेगा ? माता कैकेयी को दोष मत दो, क्योंकि वह तो परमेश्वर के हाथों की कठपुतली मात्र है और परमेश्वर ही हमारी नियति या भाग्य का वास्तविक नियंता है।"


परंतु, लक्ष्मण को शांत करना इतना आसान नहीं था। वह क्रोध से बोले, "हे राम, ऐसा जान पड़ता है कि आप नपुंसक हो गये हैं। आपने अपनी शक्ति पर विश्वास करने के अपने क्षत्रिय उत्साह का त्याग कर दिया है और नियति के आगे हार मान ली है! मैं ऐसा कायर और नपुंसक नहीं हूँ। मैं स्वयं अपनी शक्ति से अपना भाग्य बदलूँगा और आज ही के दिन आपको राज-सिंहासन पर बिठाकर आपका राज्याभिषेक करूँगा!"


राम जानते थे कि लक्ष्मण उनके प्रति अपने असीम प्रेम के कारण ही ऐसी कड़वी बातें कर रहे हैं। उन्होंने अपने भाई की आँखों से अश्रु पोंछे और उसे शांत करने का प्रयास करने लगे। जबकि कौशल्या अब तक यह समझ चुकी थीं कि कोई भी चीज राम को उनके मार्ग से विचलित नहीं कर सकती है, इसलिए वह याचना करते हुए बोली, "मेरे प्यारे बेटे, यदि तुम अपने पिता की आज्ञा का पालन करने को संकल्पबद्ध हो, तो फिर मुझे भी अपने साथ जंगल ले चलो।"


राम बोले, "प्यारी माँ, कैकेयी द्वारा धोखा दिए जाने और फिर आपके द्वारा छोड़ दिए जाने के बाद, महाराज दशरथ निश्चित ही अपने प्राण त्याग देंगे। किसी भी धर्मपरायण और पतिव्रता स्त्री का सबसे पहला कर्तव्य यह है कि वह किसी भी स्थिति में अपने पति को न छोड़े। एक स्त्री को कभी भी अपने पति का त्याग करने के बारे में सोचना भी नहीं चाहिए क्योंकि जब तक वह जीवित है तब तक उसका पति हो उसका परमेश्वर है। कोई स्त्री चाहे कितनी भी सरल हृदय या धार्मिक हो, परंतु यदि वह अपने पति की सेवा नहीं कर पाती, तब वह पाप करती है। समस्त श्रुति और स्मृति (पीढ़ियों से सुनकर स्मरण रखे जाने वाले शास्त्र) यही बताते हैं। "मेरी प्यारी माँ, आप पिताजी के साथ रहिए और मेरे लौटकर आने की प्रतीक्षा कीजिए मैं चौदह साल बाद निश्चित ही वापस लौटेंगा।"


यह सुनकर, राम के साथ जाने और रहने की कौशल्या की सारी आशाओं पर पानी फिर गया और अंततः उसने राम को आशीर्वाद दिया। कौशल्या बोली, "ईश्वर करे कि तुम शीघ्र ही वापस आ जाओ ताकि मेरे जीवन में फिर से प्रसन्नता आ सके। ईश्वर करे कि जिस धर्म के प्रति तुम इतने अधिक निष्ठावान् हो, वह तुम्हारी रक्षा करे ! स्वर्ग में रहने वाले देवगण तुम्हारी रक्षा करें और विश्वामित्र से मिले अस्त्र- शस्त्र तुम्हारी सुरक्षा करें! समस्त चल और अचल जीव व पदार्थ, स्वर्ग और पृथ्वी वायु, धरती और जल तुम्हारी रक्षा करें! हे राम, ईश्वर की कृपा से तुम प्रसन्न रहो, यही मेरा आशीर्वाद है!"


कौशल्या ने अत्यन्त स्नेह के साथ राम के माथे को चूमा और उनको गले से लगाया। राम ने बार-बार अपनी माँ के चरणों को माथे से लगाया। इसके बाद वह विलंब किए बिना सोता से मिलने अपने महल की ओर चल पड़े। सीता अब तक के घटनाक्रम से अनजान थी और कई घंटे से वह राम के आने की प्रतीक्षा कर रही थी। अंततः राम जब सीता के कक्ष में पहुँचे, तो सीता ने देखा कि राम का चेहरा पीला पड़ गया था, वह पसीने से तर-बतर और बहुत अधिक परेशान दिख रहे थे और सामान्यतः उनके आस-पास जो लोग रहते थे वह भी आज साथ नहीं थे। सीता हड़बड़ाकर उठी और उसने पूछा, "प्रिय राम, क्या बात है ?"


राम बिना किसी भूमिका के बोले, "पिताजी ने मुझे अयोध्या छोड़कर जाने और वन में रहने का आदेश दिया है। मेरे स्थान पर भरत का राज्याभिषेक होगा। बहुत समय पहले, मेरे पिता युद्ध-क्षेत्र में घायल हो गये थे तब कैकेयी ने उनकी सेवा सुश्रुषा करके उन्हें ठीक किया। इस पर, पिताजी ने कैकेयी को दो वरदान देने का वचन दिया था। उस समय कैकेयी ने अपने पति से कहा कि वह बाद में किसी समय ये दो वरदान माँगेगी। अब उसने अपने पुत्र को अगला राजा बनाने और मुझे वनवास भेजने का वरदान माँगा है।


"मेरी प्यारी सीता, मेरे पास अपने पिता के आदेश का पालन करने के अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं है, परंतु मैं चाहता हूँ कि तुम यहीं रहो। प्रतिदिन मेरे पिता के चरण स्पर्श करके उन्हें आदर दो और बिना किसी शंका के भरत के निर्देशों का पालन करो। मेरी प्रिये, मैं वन जाने से पहले तुम्हें एक बार देखने आया हूँ।"


राम की बातें सुनकर, सीता अत्यधिक उत्तेजित हो उठीं। राम के प्रति अपने अगाध प्रेम के कारण सीता के मन में जो क्रोध पैदा हुआ, उसके वशीभूत होकर वह बोली, "हे राम, मेरे स्वामी, आप सभी श्रेष्ठतम पुरुषों में सर्वश्रेष्ठ होकर मुझे यह कैसी सलाह दे रहे हैं? प्रत्येक पत्नी का यह कर्तव्य है कि वह अपने पति के अच्छे-बुरे समय में उसके साथ रहे, इसलिए मैं भी आपके साथ वन को जाऊँगी। पिता, माता, भाई, पुत्र और पुत्रवधू, ये सभी भिन्न-भिन्न पहचानें हैं, परंतु एक पत्नी के लिए अपने पति का अनुकरण करने के अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं होता।


"हे राम, मैं अपने पिता, माता, मित्रों या संबंधियों की आश्रित नहीं बन सकती हूँ, यहाँ तक कि स्वयं अकेली भी नहीं रह सकती हूँ। मेरा पति ही मेरा एकमात्र आश्रय है, इसलिए मैं आपके साथ रहने को ही संकल्पबद्ध हूँ। मैं आपके पीछे- पीछे चलूंगी और आपके भोजन करने के बाद ही भोजन करूंगी। मैं कभी भी ऐसा कोई कार्य नहीं करूँगी जिससे आप अप्रसन्न हों और मैं पर्वतों, झीलों और नदियों को देखकर भी प्रसन्न रहूँगी। आपकी उपस्थिति में स्वयं को सुरक्षित महसूस करते हुए, मैं कभी भी थकान या ऊब का अनुभव नहीं करूँगी। आपके बिना मैं स्वर्ग में भी नहीं रहना चाहती। हे राम, मैं मात्र आपसे प्रेम करती हूँ। आपके बिना मैं निश्चित तौर पर मर जाऊँगी।"


सीता के सुकोमल और दुर्बल होने के कारण राम उसे अपने साथ ले जाने से हिचक रहे थे। उसे निरुत्साहित करने का प्रयास करते हुए वह बोले, "हे सुकोमल सीता, वन में रहने के लिए व्यक्ति को अनेक बड़ी-बड़ी कठिनाइयाँ सहन करनी पड़ती हैं। वहाँ पर सोने के लिए मुलायम बिस्तर नहीं होते और अत्यधिक गर्मी, सर्दी और मूसलाधार बारिश सहन करनी पड़ती है। वन में, खाने के लिए सिर्फ फल और कंद-मूल ही मिल सकते हैं। शिकार की तलाश में भटकते भयानक जानवरों के कारण सदैव खतरा रहता है। इन सब बातों पर विचार करते हुए, मैं तुम्हें अपने साथ जंगल चलने की अनुमति नहीं दे सकता।"


राम द्वारा अपने साथ ले चलने से इंकार किए जाने की बात सुनकर, सीता दुख और क्रोध से कांपने लगी। उसके गालों से बहते मोती के समान आँसू, किसी कमल की पंखुड़ी से फिसलती जल की बूंद के समान लग रहे थे। सीता बोली, 'जब तक मैं आपके साथ हूँ तब तक ये सारे कष्ट, असुविधाएँ और खतरे मेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते।"


"मेरे प्रिय राम, एक स्त्री अपने पति के बिना जीवित नहीं रह सकती है। यदि आप मुझे अपने साथ चलने की अनुमति नहीं देंगे, तो मैं विषपान करके, अग्नि में प्रवेश करके, या पानी में डूब के अपने प्राण त्याग दूंगी। मेरे विवाह से पहले, एक ज्योतिषी ने यह भविष्यवाणी की थी कि मुझे अपने जीवन का एक अंश जंगल में बिताना पड़ेगा। इस कारण से, मैं यह जानती हूँ कि आपके साथ रहना ही मेरी नियति हैं। आपके साथ हर स्थान स्वर्ग है और आपके बिना स्वर्ग भी नरक समान है। दया करके मुझे अपने साथ ले चलें!"


दिल को छू लेने वाली यह विनती सुनकर भी राम अपनी इस विपत्ति को सीता के साथ बाँटने के लिए अनिच्छुक थे। इसके कारण सीता को यह अनुभव हुआ कि मानो वह एक महान संकट में पड़ने वाली है। अपने पति से बिछुड़ने के भयानक डर से वह पागल सी हो गई।


राम के हठ को सहन करने में असमर्थ होकर, उनकी इस कठोरता के लिए उन्हें काफी खरी-खोटी सुनाते हुए सीता बोली, "मेरे पिता ने अपने दामाद के रूप में आपको चुनकर भारी गलती की! क्या आप अपनी पतिव्रता पत्नी को अकेली छोड़ जायेंगे जिसका विवाह उसके युवा होने से पूर्व ही आपके साथ कर दिया गया था ? क्या आप उसे असुरक्षित और दूसरों की नजरों का सामना करने के लिए छोड़ जायेंगे? अयोध्या के नागरिक मूर्ख हैं, जो यह कहते हैं कि, "राम सूर्य के समान तेजस्वी और प्रतापी हैं, क्योंकि उनकी महिमा अतुलनीय है!" हे राम, आपके जंगल चले जाने की स्थिति में, मैं यहाँ अकेली रहने से इन्कार करती हूँ! या तो आप मुझे अपने साथ ले चलें, या फिर मैं विषपान करके अपने प्राण त्याग दूँगी!"


फूट-फूटकर रोती सीता के हृदय में भय से हाहाकार मचा हुआ था, जिसके कारण वह अचेत होने वाली थी। अपनी प्रिय पत्नी को इस दशा में देखना राम की सहनशक्ति से परे था, इसलिए अंततः उनका हृदय पसीज गया। सीता को अपनी बाँहों में लेकर, राम ने उसे आश्वस्त किया कि वह उनके साथ चल सकती हैं।


वह बोले, "हे प्रिये, मैंने तुम्हें निरुत्साहित करने का प्रयास मात्र इसलिए किया क्योंकि मैं तुम्हारे मन की वास्तविक दशा से परिचित नहीं था। मेरी प्रिय सीता जिस प्रकार एक बुद्धिमान व्यक्ति दया और करुणा की अपनी भावना का त्याग नहीं कर सकता है, उसी प्रकार अब मैं भी तुम्हें छोड़कर नहीं जा सकता हूँ। तुम अप्रसन्न हो, यह जानकर भला मैं कभी भी शान्ति के साथ कैसे विश्राम कर सकता हूँ ? 


अब जाओ और ब्राह्मणों को अपने समस्त मूल्यवान वस्त्र और आभूषण और अन्य समस्त संपत्ति दान दे दो।" सीता प्रसन्न होकर वहाँ से चली गई और तब, वहाँ पास ही में खड़े लक्ष्मण, राम के पास आये और उन्होंने राम के चरण-कमलों को पकड़ लिया। अश्रुपूरित नेत्रों से, लक्ष्मण गिड़गिड़ाकर बोले, "हे राम, मुझे भी अपने साथ वन ले चलिए।"


राम बोले, "मेरे प्रिय लक्ष्मण, तुम्हें यहीं रहकर हमारी दोनों माताओं की सेवा करनी होगी, क्योंकि तुम्हारे संरक्षण के बिना कैकेयी निश्चित ही उनके साथ बुरा व्यवहार करेंगी।"


लक्ष्मण बोले, "हमारी माताओं की देखभाल भैया भरत कर लेंगे, इसलिए उनके बारे में चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। हे राम, जब आप जंगल से होकर गुजरेंगे, तो मैं अपने हाथ में धनुष लेकर आगे-आगे चलूँगा ताकि आप और सीता बेखटके वहाँ के दृश्य का आनन्द उठा सकें। मैं फल और सब्जियों इकट्ठा करूँगा और जब आप सो जायेंगे तो मैं वहीं पास में खड़ा रहकर आपकी रक्षा करूंगा।"


अंततः राम प्रसन्न होकर बोले, "ठीक है, तुम मेरे साथ चल सकते हो, परंतु पहले अपनी माता के पास जाकर उनसे आशीर्वाद ले लो। इसके बाद दो शक्तिशाली धनुष ले आओ, जिन्हें वरुण ने महाराज जनक को दिया था। साथ ही, अभेद्य कवच, बाणों से कभी खाली नहीं होने वाले दो तरकश और एक जोड़ा सबसे अच्छी तलवारें ले आओ। वशिष्ठ मुनि को प्रणाम करके, अस्त्र-शस्त्रों के साथ यहाँ आ जाओ और तब हम यहाँ से प्रस्थान करेंगे।"


लक्ष्मण के वापस लौट आने पर, राम ने सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मणों को बुलवाया ताकि वह अपनी समस्त संपत्ति दान कर सकें। शीघ्र ही, वशिष्ट मुनि के पुत्र सुयज्ञ, अगस्त्य और विश्वामित्र के पुत्र और अन्य अनेक ब्राह्मणजन वहाँ पहुँच गये।


अयोध्या के पास के वन में त्रिजटा नामक एक ब्राह्मण रहते थे जो बहुत गरीब होने के कारण अत्यन्त दुर्बल और कृशकाय थे। एक दिन त्रिजटा की पत्नी ने उनसे कहा कि वह अयोध्या जायें और राम से कुछ दान-दक्षिणा देने को कहें। यह संयोग ही था कि त्रिजटा ठीक उसी समय वहाँ पहुँचे जिस समय राम अपनी सम्पूर्ण संपत्ति दान दे रहे थे। त्रिजटा उनके पास पहुँचे और उन्हें अपनी गरीबी के बारे में बताया, तो राम ने हँसते हुए कहा, "अपनी छड़ी उठाइए और इसे अपनी पूरी शक्ति से दूर तक फेंकिए। आपकी छड़ी जितनी गायों के ऊपर से होकर जायेगी, मैं वे सारी गायें आपको दान दे दूँगा।"


त्रिजटा ने अपनी कमर कसी, उसके बाद अपनी छड़ी को भरपूर शक्ति के साथ हवा में उछाल दिया। छड़ी को सरयू नदी पार कर नदी के तट पर चर रही लगभग हजार गायों के झुंड के पार गिरते देखकर, वहाँ पर उपस्थित सभी लोग आश्चर्यचकित रह गये। राम ने नदी के तट से लेकर उनकी छड़ी के गिरने की जगह तक मौजूद सभी गायें त्रिजटा को दान कर दीं। इसके बाद उन्होंने ब्राह्मण को गले से लगाया और बोले, "कृपया मेरे परिहास का बुरा न मानें। मैं बस यह चाहता। था कि आपको आपकी असाधारण ब्राह्मणीय शक्ति का प्रदर्शन करते हुए देखें।"


इसके बाद, राम ने अपनी समस्त संपत्ति दान कर दी ताकि कोई भी ब्राह्मण संबंधी, आश्रित या यहाँ तक कि कोई भिखारी भी आज के दिन दान पाने से वंचित न रह जाये। इसके बाद, सीता, राम और लक्ष्मण नंगे पैर अयोध्या के रास्तों से होकर महाराज दशरथ के राजमहल की ओर बढ़ चले। सड़कों के दोनों ओर खड़े लोगों और साथ ही अपनी खिड़कियों से झांककर देखते लोगों को भी यह दृश्य देखकर अत्यन्त दुख हुआ।


प्रजाजन एक-दूसरे से कह रहे थे, "कैसा दुर्भाग्य है। जो सीता पहले कभी भी जन साधारण के सामने नहीं आई थी, उसे तो सामान्य नागरिक भी देख सकता है। हम अपने परिवारों को लेकर राम के साथ चलेंगे ताकि अयोध्या किसी निर्जन वन के समान जन-विहीन हो जाये और जंगल किसी नगर की भाँति लोगों से बस जाये।"


कैकेयी के कक्ष में प्रवेश करने पर, राम ने वहाँ सुमंत्र को देखा और उनसे कहा कि वह महाराज को उनके आगमन के बारे में सूचित कर दें। इसके बाद, जैसे ही राम ने सीता और लक्ष्मण के साथ कक्ष में प्रवेश किया, महाराज दशरथ उन्हें गले से लगाने के लिए दौड़ पड़े। परंतु अपने प्रिय पुत्र के पास पहुँचने से पहले ही, अत्यधिक दुख । के कारण महाराज मूर्च्छित होकर जमीन पर गिर पड़े। राम ने शीघ्रता से अपने पिता को जमीन से उठाया। चारों और दुख और क्रोध से रोने की चीख-पुकार मची हुई थी। महाराज दशरथ को वापस बिस्तर पर लाए जाने के बाद ही होश आया।


राम बोले, "प्रिय पिताजी, मैं आपसे विदा लेने आया हूँ। कृपा करके, मुझे सीता और लक्ष्मण के साथ वन जाने की अनुमति दें। मैंने उन्हें निरुत्साहित करके अपने साथ चलने के लिए मना करने का प्रयास किया, परंतु वे मेरे बिना जीवित रहने के बारे में सोच भी नहीं सके।"


महाराज दशरथ बोले, "प्रिय राम, मेरी सलाह मानो। मुझे तत्काल बंदी बना लो और बलपूर्वक राज-सिंहासन पर बैठ जाओ। तुम्हें ऐसा करने से भला कौन रोक पाएगा ?"


राम बोले, "मेरे प्यारे पिताजी, मेरे मन में इस संसार पर शासन करने या किसी भी प्रकार का राजसी ऐशो-आराम भोगने की कोई कामना नहीं है।"


महाराज बोले, "ठीक है, मेरे प्यारे बेटे। मैं तुम्हें वन जाने की अनुमति देता हूँ, परंतु यहाँ पर मात्र एक दिन और रुक जाओ ताकि मुझे तुम्हें अंतिम बार जी भर कर देखने का अवसर मिल जाये।"


राम ने उत्तर दिया, "नहीं पिताजी, आपके वचन का निर्वाह करना मेरा दायित्व है और मैं माता कैकेयी के आदेश के अनुसार यह कार्य तत्काल करूँगा।"


महाराज दशरथ राम का आलिंगन कर रहे थे, परंतु राम का उत्तर सुनते ही वह फिर से मूर्च्छित हो गये। सुमंत्र रो रहे थे और यह देखकर वह भी जमीन पर गिर पड़े। एक कैकेयी के सिवाय अन्य सभी लोग दुख के कारण जोर-जोर से रो रहे थे। सुमंत्र इस शाही परिवार के सर्वाधिक अंतरंग सहयोगी थे इसलिए अन्य लोगों की तुलना में वही सबसे ज्यादा पीड़ा सहन कर रहे थे।


जमीन से उठकर, सुमंत्र कैकेयी के पास गये और उसे फटकारकर बोले, "अरे दुष्ट स्त्री ! राम को वनवास भेजकर, तू अपने पति की हत्यारी बन जायेगी। भरत का राज्याभिषेक करने की तेरी जिद उन धार्मिक सिद्धांतों के विरुद्ध है जो कहते हैं कि राज्य का शासन राजा के ज्येष्ठ पुत्र को सौंपा जाना चाहिए। यह तो निश्चित ही है कि तुझे अपने कुकर्मों का दंड अवश्य मिलेगा, क्योंकि जब राम अयोध्या छोड़कर जायेंगे, तो समस्त ब्राह्मण उनके साथ ही यहाँ से चले जायेंगे। परिणामस्वरूप, यह राज्य समस्त पुण्यों से वंचित हो जायेगा।"


इसके बाद सुमंत्र ने कैकेयी को एक कथा सुनाई, "बहुत समय पहले, तुम्हारे पिता महाराज केकय को एक ऋषि ने वरदान दिया कि वह सभी भाषाएँ समझ सकेंगे, यहाँ तक कि पशु-पक्षियों की भाषा भी। परंतु, उस ऋषि ने एक शर्त लगा दी। यदि केकय ने कभी भी किसी जंतु की भाषा का अर्थ किसी अन्य व्यक्ति को बताया, तो उनकी मृत्यु हो जायेगी। 'बाद में, एक बार राजा ने एक पक्षी की चीख सुनी। उसका अर्थ समझ जाने " के कारण वह हँसने लगे। आपकी माता को यह सन्देह हुआ कि वह उन पर हँस रहे हैं, इसलिए उसने उनसे कहा कि हँसने की ऐसी क्या बात है। राजा ने उसे ऋषि द्वारा दिए हुए वरदान के बारे में बताया और रानी को चेतावनी दी कि यदि उन्होंने उस पक्षी की बात का अर्थ रानी को बता दिया तो उनकी मृत्यु हो जायेगी। परंतु मूर्ख रानी बहुत जिद्दी और इर्ष्यालु थी, इसलिए वह बोली, 'आप चाहे जीवित रहे या मर जायें, परंतु आपको यह बताना ही होगा कि आप क्यों हँस रहे थे।'


दुविधा में पड़े राजा उस ऋषि के पास गये जिन्होंने उन्हें वरदान दिया था। और उनसे अपनी दुविधा कह सुनाई। ऋषि बोले, 'पक्षी की बात का अर्थ अपनी रानी को मत बताओ। बल्कि उसकी ढिठाई के लिए उसे फटकार लगाओ।"ऋषि की सलाह मानकर, महाराज केकय ने साहस बटोरकर अपनी पत्नी को फटकारा और इसके बाद वे प्रसन्नतापूर्वक जीवन व्यतीत करने लगे।" 


सुमंत्र बोले, "हे कैकेयी, ठीक इसी प्रकार तुम भी अपने पति के साथ अत्यन्त धृष्टता कर रही हो। अपनी गलती स्वीकार करो और अपनी इस दुष्टतापूर्ण योजना का त्याग कर दो ताकि महाराज दशरथ राम का राज्याभिषेक कर सकें।" परंतु कैकेयी पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। राम के वनवास को निश्चित मानकर, महाराज दशरथ ने सुमंत्र को आदेश दिया, "एक अक्षौहिणी सैनिकों को तैयार करो और ढेरों व्यापारियों, शिकारियों, सेवकों और शाही खजांची को बुलाओ, ताकि राम के वनवास के दौरान वे उसके साथ ही रहें। भले ही वह जंगल में रहेगा, परंतु मेरे प्यारे पुत्र को आराम और आनन्द की वस्तुओं से वंचित नहीं होना पड़ेगा।"


यह सुनकर कैकेयी भयभीत हो गई। वह भर्राए स्वर में चिल्लाई, "यदि भरत के राज्याभिषेक से पहले ही आप राज्य के समस्त संसाधनों का दोहन कर लेंगे,तो भरत यह राज्य स्वीकार नहीं करेगा!'


महाराज दशरथ ने कटु स्वर में उत्तर दिया, "मैं भरत का राज्याभिषेक करने और राम को वनवास भेजने के लिए पहले ही तैयार हो गया हूँ। अब तुम मुझे और अधिक दंडित करने का प्रयास क्यों कर रही हो? यदि तुम नहीं चाहती थी कि राम अपने वनवास के समय अपने साथ कुछ भी लेकर जायें, तो तुमने वरदान माँगते समय ही यह स्पष्ट क्यों नहीं किया ?"


कैकेयी तपाक से बोली, "आपके राजवंश में महाराज सगर का उदाहरण आपके सामने है जिन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र असमंजस को वनवास में भेजा था। आपको भी इसी प्रकार राम को बिना कोई सुख-सुविधा प्रदान किए वनवास देना चाहिए।"


सिद्धार्थ नामक एक वृद्ध मंत्री यह सहन नहीं कर सका, इसलिए वह रोषपूर्वक बोला, "असमंजस अपने साथ खेलने वाले मित्रों को सरयू में डुबो देने का घृणित आनन्द उठाता था। जब नागरिकों ने राजा सगर से शिकायत की, तो उन्होंने अपने क्रूर पुत्र का त्याग कर दिया। परंतु, भला राम ने क्या पाप किया है ? तुम राम और असमंजस के बीच तुलना करने की धृष्टता भला कैसे कर सकती हो ?"


महाराज दशरथ, यद्यपि, अत्यन्त दुर्बल हो गये थे, परंतु वह किसी प्रकार प्रयास करके खड़े हुए। उन्होंने शपथ ली, "हे कैकेयी, यदि तुम राम को सुखपूर्वक वन नहीं जाने दोगी, तो मैं समस्त प्रजाजनों को अपने साथ लेकर, स्वयं राम के साथ चला जाऊँगा !'


राम बोले, "प्रिय पिताजी, कृपा करके इतने दुखी और परेशान न हों आप मेरे लिए जो राजसी सुख-सुविधाएँ चाहते हैं, मेरे लिए उनका कोई उपयोग नहीं है। माता कैकेयी की दासियों को तत्काल वृक्ष की छाल लाने दें, ताकि मैं अपने वनवास के लिए उपयुक्त कपड़े पहनकर तैयार हो सकूँ।"


यह सुनकर निर्लज्ज कैकेयी स्वयं वहाँ से उठकर गई और वृक्ष की छाल से तैयार वस्त्र लेकर आई और राम से उन्हें पहनने को कहा। बिना किसी हिचक के, राम और लक्ष्मण ने अपने राजसी वस्त्र उतार दिए और कैकेयी द्वारा दिए गये वस्त्र पहन लिए। परंतु, सीता ने जब कैकेयी के हाथ से कुश और वृक्ष की छाल से बने वस्त्र लिए, तो उसे अत्यन्त दुख हुआ और उसकी आँखों में आंसू भर आये। इसके बाद, बनवास की पोशाक पहनते समय, बार-बार यह पोशाक सीता के शरीर से फिसलने लगी क्योंकि वह ऐसे वस्त्र पहनने की आदी नहीं थी। राम ने छाल से बना यह वस्त्र लिया और उसे सीता की रेशमी साड़ी के ऊपर लपेटने लगे। वशिष्ठ मुनि यह सहन नहीं कर सके।


अश्रुपूरित नेत्रों से राम को ऐसा करने से रोककर वशिष्ठ मुनि कटु शब्दों से कैकेयी को फटकारने लगे, "अरे दुष्ट, पतित स्त्री! क्या तुझे दिखाई नहीं देता कि सभी लोग राम के साथ जंगल जाने को तैयार हैं? मैं निश्चयपूर्वक कह सकता हूँ कि भरत और शत्रुघ्न भी राम का अनुसरण करेंगे, ताकि तुम अकेली ही यहाँ राज्य पर शासन करने के लिए रह जाओ। कम से कम सीता को तो सुविधाजनक वस्त्रों में और किसी प्रकार के वाहन में वन जाने की अनुमति मिलनी चाहिए।"


सीता अपने पति द्वारा दिखाए पथ पर चलना चाहती थी, इसलिए वह वनवास के लिए दिए गये वस्त्र ही पहने रही। राजमहल के वासियों ने जब सीता को वृक्ष की छाल पहने हुए देखा, तो उन्होंने कटु शब्दों में महाराज दशरथ को फटकारा और यह सब सुनकर राजा ने जीवित रहने की इच्छा भी त्याग दी। लगभग एक घंटे त वह आत्म- भर्त्सना करते हुए पागलों के समान व्यवहार करते रहे।


अंततः, जब महाराज दशरथ कुछ सामान्य हुए, तो उन्होंने राम को वन तक ले जाने के लिए सुमंत्र को एक रथ लाने का आदेश दिया। इसी समय कौशल्या ने सीता को गले से लगाया और उसे एक स्त्री होने के नाते सलाह दी, “सभी जानते हैं कि दुर्भाग्य और विपत्ति आने पर कुछ स्त्रियाँ अपने धर्मात्मा और प्यार करने वाले पति का भी त्याग कर देती हैं। ऐसी स्त्रियाँ अतीत में अपने पतियों द्वारा किए गये सभी उपकारों को भुला देती हैं क्योंकि अब उनके पतियों के पास उन्हें सुख- सुविधा देकर अपने साथ बांधे रखने के लिए कुछ नहीं होता है। इस कृतघ्नता के कारण ऐसी स्त्रियाँ बुद्धि, उपहार, या यहाँ तक कि विवाह के बंधनों को भी तोड़ बैठती हैं। परंतु ऐसी स्त्रियाँ भी होती हैं जो सौम्य, सत्यनिष्ठ और आज्ञाकारी स्वभाव की होती है और वे अपने पति के सम्मान को सबसे ऊपर रखती हैं।


"हे सीता, मेरे पुत्र को वनवास हुआ है इसलिए इस कारण से कभी भी उसका तिरस्कार न करना। उसे सभी स्थितियों में अपना आराध्य देव ही मानना।"


सीता ने दोनों हाथ जोड़कर यह सलाह ग्रहण की और वह बोली, अपने पति के प्रति अपने कर्तव्यों से मैं भलीभाँति परिचित है, इसलिए कृपा करके मुझसे कुलटा स्त्रियों की बातें न कहें। राम से मेरा वही नाता है जो चांदनी का चंद्रमा से होता है। जिस प्रकार कोई भी वीणा तारों से रहित नहीं होती अथवा कोई भी रख पहियों के बिना नहीं होता है, उसी प्रकार पति के बिना पत्नी का भी कोई भविष्य नहीं होता है, भले ही उसके एक हजार पुत्र ही क्यों न हों। राम मेरे परमेश्वर हैं और वह हमेशा यही रहेंगे। भला मैं उनका तिरस्कार कैसे कर सकती हूँ?"


अपने पुत्र से आसन्न विछोह की बात सोचकर कौशल्या रोने लगी, तब राम ने उसे आश्वस्त किया कि यह समय शीघ्र ही गुजर जायेगा। राम अपने पिता के पास गये और उनके चरण स्पर्श करने के बाद, सीता और लक्ष्मण के साथ मिलका उनकी प्रदक्षिणा की। इसके बाद, राम ने अंतिम बार अपनी माता के चरण स्पर्शश किए, जबकि लक्ष्मण ने अपनी माता सुमित्रा के चरण स्पर्श किए और सुमित्रा ने अपने पुत्र के माथे को चूमा। ठीक तभी सुमंत्र वहाँ पहुँच गये और उनके कहने पर राम रथ पर चढ़ गये और फिर सीता व लक्ष्मण भी रथ पर चढ़ गये। बिना देरी किए, वे जंगल की ओर चल पड़े।


जिस समय राम अयोध्या के रास्तों से होकर जा रहे थे, तो सभी नागरिक उनके दर्शनों के लिए आ गये। रथ से चिपटते हुए, नागरिकों ने सुमंत्र से गिड़गिड़ाकर कहना शुरू किया, "कृपा करके रथ को धीरे-धीरे हाँकिए ताकि हम अंतिम बार राम को जी भरकर देख सकें।"


राम ने पीछे मुड़कर देखा, तो उन्होंने अपने पिता को भीड़ के बीच से दौड़कर आते हुए देखा। वह चिल्ला-चिल्लाकर सुमंत्र से रथ रोकने का आग्रह कर रहे थे। परंतु अपने कर्तव्य से बंधे होने के कारण राम ने सारथी से कहा कि वह रथ को और तेजी से हाँक कर ले चलें इन विरोधी आदेशों से सुमंत्र दुविधा में पड़ गये कि वह रथ रोकें या इसे और तेजी से हाँके ।


यह देखकर राम जोर से बोले, "अपने वृद्ध पिता को इस दशा में देखने के मेरे कष्ट को और न बढ़ाएँ।" तब सुमंत्र ने निश्चयपूर्वक घोड़ों को और तेजी से हाँकना आरंभ किया। उसी समय एक मंत्री ने महाराज दशरथ को रोकते हुए कहा, "हे राजन, यदि कोई व्यक्ति यह आकांक्षा रखता है कि जाने वाला व्यक्ति लौट आये, तो उसे जाते हुए व्यक्ति के साथ उसके जाते समय बहुत देर तक साथ नहीं जाना चाहिए।"


जब तक राम के रथ से उठती धूल दिखती रही, तब तक महाराज दशरथ उस पर अपनी आँखें जमाए रहे। अंततः, आँखों से रथ के ओझल होते ही वह मूर्च्छित होकर जमीन पर गिर पड़े। जब कौशल्या और कैकेयी उन्हें उठाने के लिए पहुँचे, तो महाराज दशरथ ने कैकेयी को झिड़ककर कहा, "मुझे मत छूना मैंने तेरा त्याग कर दिया है और इसलिए अब मैं तुझे कभी देखना भी नहीं चाहता!'


कौशल्या अपने पति को उठाकर राजमहल वापस ले जाने लगी, तो उसका ध्यान इस बात पर गया कि सारी दुकानें बंद थीं और सभी नागरिकों के मुख पर दुख के बादल छाए हुए थे। राजमहल में प्रवेश करने के बाद, महाराज दशरथ ने सेवकों को आदेश दिया, "मुझे कौशल्या के कक्ष में ले चलो। अब से मैं वहीं रहूँगा।"


महाराज दशरथ ने वह रात अत्यन्त कठिनाई से बिताई और मध्यरात्रि के आस-पास वह कौशल्या से बोले, "कृपा करके मेरा स्पर्श करो, क्योंकि राम के जाने के बाद से मेरी दृष्टि वापस नहीं लौटी है।"


अपने पति की ऐसी दशा देखकर और राम के बारे में चिंता कर-करके, कौशल्या का कलेजा छलनी हो गया था। उसे शांत करने का प्रयास करते हुए सुमित्रा बोली, "अपने पुत्र के बारे में चिंता न करो। सीता और लक्ष्मण उनके साथ हैं, इसलिए राम को तनिक भी कठिनाई नहीं होगी। प्रिय कौशल्या राम को सामान्य मनुष्य नहीं हैं। वह समस्त देवों के देव हैं, वह सूर्य को प्रकाशित करने वाले और शाश्वत समय के नियंता हैं। जब राम जंगल में पहुंचेंगे, तो स्वयं माता पृथ्वी और समस्त प्रकृति उनकी भक्तिमय सेवा में जुट जायेंगी। आप यह निश्चित जानो कि आपका प्रिय पुत्र अवश्य ही एक दिन आपके पास लौट आयेगा। विलाए करने से कोई लाभ नहीं होगा। जरा देखो तो, राम के जाने के दुख से प्रवास कैसे काम-काज छोड़ चुके हैं। हे रानी आपको ही उन्हें ढाढस बंधाना है, इसलिए आपको स्वयं को इतना अधिक व्यथित और चिंतित नहीं होना चाहिए।"


इसी बीच, अयोध्या की प्रजा राम के रथ का पीछा करती हुई जंगल तक पहुँच गई और वे उनसे गिड़गिड़ाकर वापस लौट आने का अनुरोध कर रहे थे। राम उनसे बोले, "मैं अपनी प्रतिज्ञा नहीं तोड़ सकता और इसलिए अब आप भरत को भी वैसा ही प्यार दें जैसा कि आपने मुझे दिया है।"


उन लोगों के बीच कुछ वृद्ध ब्राह्मण भी थे जो दूसरों की तुलना में पर्याप्त तेजी से नहीं चल सकते थे अतः वे पीछे छूट जा रहे थे। अत्यन्त खिन्न होकर, उन्होंने रथ के घोड़ों को पुकारकर उन्हें और आगे न जाने की याचना की। इन विचलित कर देने वाली याचनाओं को सुनकर राम द्रवित हो उठे और रथ से उतर पड़े। इसके बाद, वह सीता और लक्ष्मण के साथ पैदल चलने लगे, ताकि ये वृद्ध ब्राह्मण उनके साथ ही चल सकें। परंतु इसके बाद भी राम ने पीछे मुड़कर नहीं देखा क्योंकि वह अपने वचन का पूर्णतः निर्वाह करने के लिए संकल्पबद्ध थे।


इस प्रकार, अंततः वे तामस नदी के तट पर पहुँच गये। सूर्यास्त होने को था, इसलिए सुमंत्र और लक्ष्मण ने राम के सोने के लिए पत्तियों का बिस्तर लग दिया। सीता के साथ लेटते ही, राम को जल्दी नींद आ गई। सुमंत्र के साथ बैठकर अपने बड़े भाई की महिमाओं पर चर्चा करते हुए लक्ष्मण सारी रात जागे रहे। अगली सुबह राम बहुत जल्दी जाग गये और उन्होंने देखा कि अयोध्या के सभी नागरिक वहीं पास में ही सो रहे थे।


राम ने एक योजना बनाई और वह लक्ष्मण से बोले, "ऐसा लगता है कि लोग मुझे वापस लौट चलने के लिए मनाने की जिद नहीं छोड़ने वाले हैं। हम इसी समय यहाँ से चलते हैं। सुमंत्र रथ को इस प्रकार ले जायेंगे कि लोगों की समझ में ही नहीं आ सके कि हम किस रास्ते गये हैं।'


नदी पार करने के बाद, राम ने सुमंत्र से रथ को एक स्पष्ट दिखते पथ पर ले जाने और फिर वापस लौट आने को कहा ताकि नागरिकों को भ्रमित किया जा सके। इस प्रकार, सुमंत्र अकेले ही रथ पर निकल पड़े और कुछ समय बाद जब वह वापस लौटे तो सीता, राम और लक्ष्मण रथ पर बैठ गये और वे जंगल की दूसरी दिशा में बढ़ चले। 


जागने के बाद जब लोगों ने देखा कि राम जा चुके हैं, तो उन्होंने आत्म- भर्त्सना करते हुए कहा, "राम के बिना हम अयोध्या वापस कैसे लौट सकते हैं ? यदि हम उन्हें अपने साथ वापस ले जाने में असफल रहे, तो स्त्रियाँ और बच्चे क्या कहेंगे ?"


रथ के छोड़े हुए निशान का अनुसरण करते हुए लोग चल पड़े, परंतु राम की भ्रमित करने की युक्ति के कारण शीघ्र ही वे भ्रमित हो गये और रथ के पहियों की लकीर नहीं ढूंढ पाए। अंततः, कोई भी विकल्प नहीं रहने के कारण वे अत्यन्त उदास होकर घरों को वापस लौट गये। जब स्त्रियों ने देखा कि पुरुष राम के बिना ही लौट आये हैं, तो उन्होंने पुरुषों को निष्ठुर और क्रूर शब्दों से फटकार लगाई। सभी ने कैकेयी की भर्त्सना की और कहा कि वे लोग उसके शासन में नहीं रहेंगे।


इस प्रकार, अयोध्या में जीवन का कार्य-व्यापार थम गया और अयोध्या नगरी किसी सूखे हुए समुद्र की भाँति प्रतीत होने लगी। ब्राह्मणों ने यज्ञ व पूजा-अर्चना का कार्य कम कर दिया और व्यापारियों ने व्यापार छोड़ दिया। गृहस्थों ने भोजन तैयार करने की चिंता छोड़ दी और पालतू पशुओं के मुख से घास ऐसे छूटने लगी मानो वे स्तंभित रह गये हों। गायों ने बछड़ों को दूध पिलाना बंद कर दिया और माताओं को अपने पुत्रों का अभिनंदन करने में आनन्द अनुभव होना बंद हो गया। यहाँ तक कि आसमान के तारों ने भी मानो अपना मुँह फेर लिया हो। पूरी तरह से अवसादग्रस्त होकर, लोगों ने खाना-पीना या किसी प्रकार का मनोरंजन करने में रुचि लेना बंद कर दिया। प्रत्येक वस्तु और प्रत्येक व्यक्ति पत्थरों की भांति निर्जीव दिखने लगा क्योंकि वे सदैव राम से अपने बिछोह के बारे में ही चिंतित रहा करते।


विभिन्न प्रांतों, गाँवों और वनों के रास्ते राम जहाँ कहीं भी गये, वहाँ उन्होंने लोगों को दशरथ और कैकेयी की निंदा करते ही पाया। अंततः, वेदश्रुति और गोमती नदी को पार करके, राम स्यंदिका नदी के तट पर पहुँचे जो कौशल प्रांत को दक्षिणी सीमा थी।


वहाँ पहुँचकर, राम रथ से उतर पड़े। उन्होंने अयोध्या की दिशा में मुख करके अपने दोनों हाथ जोड़े और अपने जन्मस्थान से विदा ली। वहाँ के अनेक स्थानीय निवासी राम के पीछे चलने लगे और जब राम ने उन्हें घर लौटने को कहा, बिछुड़ने में असमर्थ होकर वे जोर-जोर से रोने लगे। फिर भी, राम रथ पर तेजी से आगे बढ़ते रहे और इस तरह आगे चलते हुए उन्होंने सुमंत्र के साथ चर्चा करके समय व्यतीत किया। अंततः वे विशाल गंगा नदी के तट पर पहुँचे और वहाँ एक विशाल इंगुड वृक्ष के नीचे रुके।


इस क्षेत्र के राजा का नाम गुहा था जो जन्म से निषाद जाति का था और राम का घनिष्ठ मित्र था। गुहा को जब राम के आगमन की सूचना मिली, तो वह प्रसन्न होकर उनका अभिनंदन करने के लिए आया। दशरथ के दोनों पुत्र निषाद राजा के आते ही अपने आसनों से उठ खड़े हुए और निषाद राजा ने राम को गले से लगा लिया। वनवास के वेश में राम को देखकर उसके हृदय में अत्यन्त दुख हुआ ।


गुहा बोला, "मेरे प्रिय राम, मेरा राज्य श्रृंगवेरपुर जितना मेरा है उतना ही आपका भी है। कृपया यहाँ जो भी चाहें ले लें और ऐसा समझें कि मानो आप अयोध्या में लौट आये हैं। अपने अतिथि के रूप में आपका स्वागत करके मेरा सम्मान बढ़ा है।"


गुहा राम के लिए अत्यन्त सुस्वादु भोजन, आरामदेह बिस्तर और पूजा-अर्चना की सामग्री लाया ताकि वह राम का राजसी सत्कार कर सके। यह सब देखकर राम अत्यन्त प्रसन्न हुए और गुहा का आलिंगन करते हुए वह बोले, "आपने मुझे जितनी भी वस्तुएँ अर्पित की हैं उन्हें मैं हृदय से स्वीकार करता हूँ, परंतु कुश घास, वृक्षों की छाल और हिरण की खाल के वस्त्र के अतिरिक्त अन्य कोई वस्त्र न पहनने और फल और कंद-मूल के अतिरिक्त अन्य कुछ न खाने की अपनी प्रतिज्ञा के कारण, मैं इन उपहारों का प्रयोग नहीं कर सकता। कृपया ये सारी वस्तुएँ ले जायें, परंतु कुछ भोजन यहीं रहने दें जिसे मैं अपने पिता के प्रिय अश्वों को दे सकूँ।"


गुहा वहाँ से घोड़ों को भोजन कराने चले गये, तब राम ने लक्ष्मण का लाया हुआ थोड़ा-सा पानी पिया, क्योंकि उस दिन उन्होंने गंगा के सम्मान में उपवास रखा था। उस रात सीता और राम इंगुड वृक्ष के नीचे सोए जबकि लक्ष्मण और गुहा उनकी चौकसी करने के लिए सारी रात जागे रहे। गुहा ने लक्ष्मण से भी विश्राम करने का अनुरोध किया, परंतु लक्ष्मण ने विश्राम करने से इंकार कर दिया क्योंकि राम और सीता सो रहे थे। लक्ष्मण सारी रात अपने पिता और माताओं के बारे में बताते हुए विलाप करते रहे, जबकि यह सब सुनते हुए गुहा की आँखें भर आई


अगली सुबह राम गंगा नदी पार करना चाहते थे इसलिए गुहा ने उन्हें गंगा पार करने के लिए एक सुंदर नौका दी जाने से पहले, राम ने सुमंत्र से कहा, "कृपा करके आप अयोध्या लौट जायँ और मेरे पिता की सेवा करें। सदैव शांत रहें ताकि आप दूसरे लोगों को भी शांत कर सकें। आपने मेरी बहुत सहायता की है, परंतु यहाँ से आगे हम पैदल ही जायेंगे।"


सुमंत्र ने राम से याचना की कि वह उन्हें भी अपने साथ आने दें। किंतु राम अपनी बात पर अड़े रहे और बोले, "इतने उदास न हों, हम चौदह वर्ष बाद लौट आयेंगे। मेरे माता-पिता को मेरी कुशलता के संबंध में आश्वस्त करें और बिना देर किए भरत का राज्याभिषेक करने का आग्रह करें। साथ ही, मेरी ओर से भरत से यह अनुरोध करें कि वह सभी माताओं के साथ एकसमान व्यवहार करे।"


राम को छोड़कर जाने का विचार सुमंत्र के लिए असा था, इसलिए वह बोले, "यदि मैं अकेला अयोध्या लौटूंगा, तो प्रजा अत्यन्त दुखी होगी। राम, कृपा करके मुझे अपने साथ ले चलें। यदि आप मुझे इस तरह से छोड़ देंगे, तो जीवन असह्य हो जायेगा। मैं या तो पानी में डूब मरूंगा या फिर अग्नि में जलकर प्राण त्याग दूंगा।"


राम बोले, "मैं आपको अयोध्या वापस इसलिए भेज रहा है ताकि कैकेयी को विश्वास हो जाये कि मैं जंगल में प्रवेश कर चुका हूँ। यदि आप इस रथ पर 'बैठकर वापस नहीं लौटते, तो उसे सदैव यह भय रहेगा कि मैं किसी भी समय लौट सकता हूँ।"


फिर गुहा की ओर मुड़कर, राम बोले, "मैं मित्रों और संबंधियों से घिरे बन में नहीं रहना चाहता। मैं किसी निर्जन स्थान पर जाऊँगा और किसी ऋषि के समान जीवन व्यतीत करूँगा। कृपा करके, मेरे लिए बरगद के वृक्ष का दूध जैसा द्रव ला दें ताकि मैं अपने केशों की जटा बना सकूँ।"


गुहा यह द्रव ले आया तो राम और लक्ष्मण ने इसके प्रयोग से अपने केशों की जटा बना ली ताकि वे वन में रहने वाले ऋषियों के समान दिख सकें। गुहा से विदा लेकर, सीता, राम और लक्ष्मण नाव पर बैठ गये। गंगा के जल से आचमन करने के बाद, वे वहाँ से प्रस्थान कर गये।


नदी के बीच में पहुँचकर सीता ने माँ गंगा की आराधना की और सुरक्षित अयोध्या वापस लौटने का आशीष माँगा। गंगा के दूसरे हिस्से के तट पर उतरकर, उन तीनों ने आगे की यात्रा जारी रखी। राम ने सीता की सुरक्षा के लिए लक्ष्मण से सावधानीपूर्वक सबसे आगे चलने को कहा जबकि वह सीता के पीछे चलने लगे। रात हो जाने पर, इन तीनों ने एक विशाल वृक्ष की शरण ली। सीता सो गयी,


परंतु राम और लक्ष्मण सारी रात जागते रहे। जब वे आपस में बात कर रहे थे, तो राम ने एक बार फिर लक्ष्मण से अनुरोध किया कि वह घर लौट जायें ताकि वह कैकेयी के कोप से अपनी माताओं की रक्षा कर सकें। अपनी माता के बारे में सोचकर राम इतने भाव विह्वल हो उठे कि उनकी आँखों में आँसू भर आये लक्ष्मण ने राम को ढांढस बंधाते हुए यह विश्वास दिलाया कि वह राम के बिना सचमुच जीवित नहीं रह सकते हैं और इसलिए राम ने अंततः उन्हें अपने साथ रहने की अनुमति दे दी।


अगली सुबह सीता, राम और लक्ष्मण आगे चल पड़े और बहुत समय तक निरंतर चलते रहने के बाद वे गंगा और यमुना नदी के संगम पर पहुँचे। पास ही में रहने वाले महान ऋषि भरद्वाज से मिलने की इच्छा से, राम उनके आश्रम की और बढ़े और प्रवेश द्वार पर प्रतीक्षा करने लगे। शीघ्र ही ऋषि भरद्वाज का एक शिष्य उनका स्वागत करने के लिए आया।


अंदर जाने पर राम ने भरद्वाज ऋषि को ध्यान करते हुए पाया और उनके शिष्य उन्हें घेरकर बैठे हुए थे। राम ने अपना परिचय दिया और अपने वहाँ आगमन में संबंधित घटनाओं का संक्षिप्त विवरण कह सुनाया। भरद्वाज ऋषि ने सीता, राम और लक्ष्मण का बहुत अच्छा स्वागत किया और उन्हें फलों और कंद-मूल से बनाए गये नाना प्रकार के व्यंजन खिलाए।


अंततः, उन लोगों को विश्राम के लिए उनके कक्षों में ले जाते हुए, भारद्वाज बोले, "प्रिय राम, तुम्हारे वनवास का समाचार मिलने के समय से ही मैं तुम्हारे यहाँ आने की प्रतीक्षा कर रहा था। मैं चाहता हूँ कि तुम वनवास के चौदह वर्ष यही रहो। मेरे शिष्य तुम्हारी सेवा में रहेंगे और मुझे विश्वास है कि तुम्हें, तुम्हारी पत्नी को और तुम्हारे भाई को यहाँ तनिक भी असुविधा नहीं होगी।"


राम ने उत्तर दिया, "हे ऋषिश्रेष्ठ, आपका प्रस्ताव अत्यन्त कृपापूर्ण है, परंतु आपका आश्रम अयोध्या के निकट है, इसलिए यदि मैं यहाँ रहता हूँ तो बहुत सारे लोग यहाँ पर मुझसे मिलने आया करेंगे। कृपया मुझे किसी ऐसे निर्जन स्थान के बारे में बताएँ जहाँ हम प्रसन्नतापूर्वक वनवास की अवधि व्यतीत कर सकें।"


भरद्वाज बोले, "तुम यहाँ से सौ किलोमीटर दूर चित्रकूट पर्वत पर जा सकते हो। यमुना नदी पार करने के बाद, तुम्हें श्याम नामक बरगद का एक महाकाय विशाल वृक्ष दिख जाये, तो समझना कि तुम सही मार्ग पर बढ़ रहे हो। समूचा चित्रकूट क्षेत्र अत्यन्त सुंदर है। वहाँ पानी के झरने हैं और जलधाराएँ हैं। मोर और कोयल पक्षियों की मधुर आवाज तुम्हारे कानों को सुख देगी और वहाँ सब जगह प्रचुर मात्रा में फल और शहद है। स्वर्ग के गंधमादन की भाँति, यह साधु और सज्जन व्यक्ति की तरह जीवन व्यतीत करने के लिए एक अत्यन्त उपयुक्त स्थान है ।"


सीता, राम और लक्ष्मण ने वह रात भरद्वाज मुनि के आश्रम में बिताई। अगली सुबह, ऋषि की अनुमति लेकर वे वहाँ से चल पड़े। कुछ समय बाद वे यमुना नदी के तट पर पहुँचे और राम व लक्ष्मण ने नदी पार करने के लिए एक बड़ी नौका तैयार की।


नदी के बीच में पहुँचकर सीता ने कालिंदी देवी की आराधना की नदी के दूसरे तट पर उतरने के कुछ ही समय बाद, वे श्याम नामक एक विशाल बरगद के वृक्ष के पास पहुँचे। सीता ने इस पवित्र वृक्ष को प्रणाम करके, अयोध्या को सुरक्षित वापस लौटने के लिए प्रार्थना की। इसके बाद कुछ घंटे चलने के बाद ये तीनों यात्री रात्रि विश्राम करने के लिए नदी के तट पर रुक गये।


अगले दिन, भोर में ही उन्होंने आगे की यात्रा आरंभ कर दी और सीता ने राम से बार-बार जंगल के रास्तों पर देखे हुए पेड़-पौधों के बारे में पूछा। लक्ष्मण अपने हाथ में धनुष लिए आगे चल रहे थे, इसलिए राम ने सीता को अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक प्रकृति के उन चमत्कारों के बारे में बताया जो उन्हें अपने मार्ग पर देखने को मिल रहे थे।


अंततः, चित्रकूट की सीमा में प्रवेश करने के बाद, उन्हें वहाँ प्रचुर मात्रा में फल, कंद-मूल, पीने योग्य पानी और शहद देखकर बहुत खुशी हुई। वहाँ उन्हें वाल्मीकि ऋषि का आश्रम दिखा। ऋषि को कुछ समय पहले ही सीता, राम और लक्ष्मण के वहाँ आने का भान हो गया था, इसलिए उन्होंने अत्यन्त प्रसन्न मन से अपने अतिथियों का स्वागत किया।


बातचीत के दौरान, वाल्मीकि ने राम को वहीं रहने का आमंत्रण दिया। राम के अनुरोध पर, लक्ष्मण सभी आवश्यक सामग्रियाँ ले आये और शीघ्र ही उन्होंने एक छोटी, सुंदर-सी कुटिया बना दी जिसकी दीवारें लकड़ी की तख्तियों से बनी थी और छत की जगह छप्पर डाला गया था। नए आवास में गृह प्रवेश का अनुष्ठान संपन्न करके, जब राम ने अपनी कुटिया में प्रवेश किया तो उन्हें अत्यन्त खुशी का अनुभव हुआ, मानो वह कैकेयी के षड्यंत्र के कारण पहुँचे दुख को भूल गये हों। इसी बीच, राम के जाने के बाद, गुहा ने राम का पीछा करने के लिए गुप्त रूप से कुछ जासूस भेजे। जब उन्हें राम के चित्रकूट पहुँचने का समाचार मिला तो सुमंत्र अपने रथ पर चढ़कर दुखी मन से अयोध्या को चल पड़े। सुमंत्र दूसरे दिन शाम को अयोध्या पहुँचे और तत्काल ही उनका ध्यान इस बात पर गया कि अयोध्या में जन-जीवन एकदम ठप पड़ गया है।


सुमंत्र के आने का समाचार मिलते ही हजारों लोग उनके पास पहुँच गये और उन्हें घेरकर खड़े हो गये। उनके प्रश्नों की झड़ी रोकते हुए, सुमंत्र ने सीधे-सरल ढंग से उन्हें बताया कि किस प्रकार वह राम को गंगा के तट पर छोड़कर वापस लौट आये।


इसके बाद, सुमंत्र महाराज दशरथ का दर्शन करने गये, परंतु जैसे ही उन्होंने महाराज को राम के संदेश सुनाए वैसे ही बिछोह की प्रबल और पीड़ादायी भावनाओं के आधिक्य से दशरथ मूर्च्छित हो गये। सुमंत्र और कौशल्या ने तत्काल उन्हें उठाया, परंतु तब तक कौशल्या भी रोती हुई मूच्छिंत हो गई। अंततः, महाराज दशरथ जब थोड़ा सामान्य हुए, तो बोले, "प्रिय सुमंत्र, राम ने जाने से पहले जो भी कहा, वह मुझे विस्तार से बताओ।"


सुमंत्र जानते थे कि महाराज का जीवन राम की कुशलता जानकर ही बच सकता है, इसलिए वह बोले, "जाते समय राम ने मुझे यहाँ वापस लौटकर आपकी सेवा करने का निर्देश दिया। आपके कल्याण के लिए ही राम कैकेयी को दिए हुए आपके वचन को निभाने के लिए संकल्पबद्ध हैं। इसी कारण से राम चाहते हैं आप तत्काल भरत का राज्याभिषेक कर दें।


"राम के जाने के बाद जब मैंने घोड़ों की लगाम खींची, तो आँसू भरे हुए नेत्रों से घोड़ों ने वापस लौटने से इंकार कर दिया, इसलिए कुछ समय तक मैं गुहा के साथ ही रहा और व्यर्थ ही यह आशा करता रहा कि संभवतः राम का मन बदल जाये और वह मुझे पुकारें अंततः, जब सारी आशाएँ झूठी साबित हुई, तो मैं यहाँ लौट आया। सारे रास्ते भर मैंने देखा कि कौशल प्रांत के सभी चल अचल जीव राम से बिछुड़ने के कारण दुख से जड़ हो गये हैं।"


यह सब सुनकर महाराज दशरथ बहुत अधिक हताश हो गये। निराशा की झोंक में वह बोले, "तुम या तो राम को तत्काल यहाँ लेकर आओ, या फिर मुझे उसके पास वहाँ ले चलो, अन्यथा मैं मर जाऊँगा, मैं दुख के समुद्र में डूब गया हूँ । कैकेयी को मेरे द्वारा दिए हुए दो वरदान इस दुख-सागर के दो छोर हैं और राम के वनवास की अवधि इसका विस्तार है। मेरी साँसें इस दुख सागर की लहरें हैं और ।



कौशल्या व अन्य लोगों के वह रहे आँसुओं की नदियाँ इस दुख सागर में चक्रवात पैदा कर रही हैं। दुख से छटपटाती बाँहें इस दुख सागर में उछलती मछलियाँ हैं, बिखरे हुए केश समुद्री घास और चीत्कार करके रोने की आवाज इस दुख सागर की गर्जन-ध्वनि है। कैकेयी इस धरती के नीचे भड़कती वह ज्वाला है जो सूखे हुए आँसुओं की बारिश कर रही है और मंथरा के शब्द उन घड़ियालों के समान हैं जो इस दुख सागर को और अधिक कष्ट से मथ रहे हैं।"


यह कहकर महाराज दशरथ अचेत हो गये। जमीन पर पड़ी हुई कौशल्या दुख से छटपटाती हुई विलाप कर उठी, "हे सुमंत्र, यदि तुम मुझे तत्काल राम के पास लेकर नहीं गये, तो निश्चित ही मेरे प्राण पखेरू उड़ जायेंगे!"


यद्यपि, कौशल्या सर्वश्रेष्ठ पतिव्रता नारियों में अग्रणी थी, परंतु वह अपने पति से कटु शब्दों में बोली, "राम के वनवास के लिए आप दोषी हैं। भला आप अपने पुत्र और उसकी इतनी सुकोमल पत्नी के साथ इतना अधिक क्रूर व्यवहार कैसे कर सकते हैं? भला वे किस तरह नंगी जमीन पर लेटते होंगे? क्या वे सिर्फ फल और कंद-मूल खाकर जीवित रह पायेंगे? जंगल के खूंखार, भयानक जानवरों से भला वे अपनी रक्षा कैसे करेंगे और जमा देने वाली ठंड, तूफानी हवाओं और मूसलाधार बारिश को भला वे कैसे बर्दाश्त कर पायेंगे ?


यदि चौदह वर्ष के वनवास को किसी प्रकार काटकर, राम वापस लौट भी आते हैं, तब भी भरत उन्हें कभी भी राज-सिंहासन पर नहीं बैठने देगा। और यदि भरत ने दे भी दिया, तब भी राम अपने छोटे भाई द्वारा उपभोग किए गये राज- सिंहासन को कभी भी स्वीकार नहीं करेंगे। आह, मैं भी कैसी दुर्भाग्यशाली हूँ कि मुझे आप जैसा अधम पति मिला! किसी भी स्त्री का सबसे पहला सहारा उसका पति होता है, परंतु आप कैकेयी के वश में थे और इस कारण से मैं अपना सबसे बड़ा सहारा भी खो बैठी हूँ। एक स्त्री का दूसरा सहारा उसका पुत्र होता है, परंतु राम के यहाँ से चले जाने के कारण अब मैं मरने के लिए पूरी तरह अकेली रह गई हूँ!"


महाराज दशरथ अचेत होकर पड़े थे और जब कौशल्या को भान हुआ कि स्वयं कितने अधिक दुखी हैं, तो उसका हृदय नरम पड़ गया। राजा जब होश में आये, तो वे दोनों लिपट गये और शीघ्र ही महाराज सो गये। परंतु कुछ ही देर में महाराज दशरथ अचानक जाग पड़े, जैसे कि उन्हें अतीत में किए हुए किसी भयानक पाप की याद आ गई हो।



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