अरण्यकाण्ड

दंडकारण्य में, सीता, राम और लक्ष्मण ने आस-पास बनी कुटियों का एक सुंदर समूह देखा जिनमें ऋषि रहते थे। इसके आस-पास का परिवेश फलों और फूलों के वृक्षों से भरा हुआ था और वहाँ मधुर स्वर में बोलते पक्षी थे और वैदिक मंत्रों का जाप गूंज रहा था जिससे इस आश्रम को देखने वाले किसी भी व्यक्ति का मन पवित्र हो जाता था। वहाँ आस-पास हिरण और अन्य जीव-जंतु निर्भय होकर विचरण कर रहे थे। राम और लक्ष्मण ने अपने धनुषों की प्रत्यंचा खोल ली और वे आश्रम के अंदर गये।



ऋषियों ने अत्यन्त प्रसन्नता के साथ उनका स्वागत किया और उन्हें रहने के लिए घास से बनी एक कुटिया दी। वहाँ पर रात व्यतीत करने के बाद, सुबह के समय राम ने ऋषियों से विदा ली और वे जंगल के और अधिक अंदर चले गये। सीता बीच में थी और लक्ष्मण उनके पीछे-पीछे चल रहे थे।


अचानक, एक भीमकाय और भयानक राक्षस प्रकट हुआ। उसने बाघ की रक्त-रंजित खाल पहनी हुई थी और उसकी आँखें कोटरों में धंसी हुई थीं, लंबे- लंबे तीखे दाँत थे, आड़ा-तिरछा जबड़ा और बाहर को उभरी हुई गोल तोंद थी। उस राक्षस के हाथ में एक भाला था जिससे तीन शेरों, चार बाघों, दो भेड़ियों, दस चित्तीदार हिरणों और एक हाथी के खून टपकते सिर लटक रहे थे। वह स्वयं मृत्यु जैसा भयावह दिख रहा था। डरावनी गर्जना करता हुआ वह राक्षस सीता को पकड़ने के लिए क्रोध से आगे की ओर झपटा।


शीघ्र ही थोड़ा पीछे हटकर, राक्षस ने फिर से हुंकार भरी और बोला, "मैं इस स्त्री को अपनी पत्नी बनाऊँगा और तुम दोनों का रक्तपान करूँगा।"


राम तेज स्वर में बोले, "कोई अन्य व्यक्ति सीता का स्पर्श करे, यह मेरे लिए अपने पिता की मृत्यु से भी अधिक कष्टदायी है।"


लक्ष्मण तिरस्कारपूर्वक बोले, "आप मात्र खड़े रहकर विलाप कैसे कर सकते हैं? अब आप मुझे देखो, क्योंकि मैं इस राक्षस का वध करके भरत के विरुद्ध अपने अंदर भरे उस क्रोध को शांत करूँगा जिसे मैं इतने लंबे समय से मन में दबाए हुए हूँ ! "


तभी उस राक्षस ने पूछा, "मेरे वन में प्रवेश करने वाले तुम कौन हो ?" राम बोले, "हम दो क्षत्रिय हैं। तुमने हमारा मार्ग रोकने और मेरी पत्नी को छीनने की धमकी देने का दुस्साहस कैसे किया ? 


राक्षस बोला, "मैं जव और उनकी पत्नी शतहृत का पुत्र विराध हूँ। मेरी घोर तपस्या से प्रसन्न होकर, ब्रह्माजी ने मुझे वरदान दिया कि किसी भी अस्त्र-शस्त्र से मेरा वध नहीं किया जा सकेगा। इसलिए मैं तुम्हें तत्काल यहाँ से भाग जाने की सलाह देता हूँ। यदि तुम इस सुंदर स्त्री को मेरे लिए छोड़कर यहाँ से भाग जाते हो, तो मैं तुम्हें हानि नहीं पहुंचाऊँगा।"


यह सुनकर क्रुद्ध हो उठे राम ने अपने धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाई और पल भर में सुनहरे पंखों से सज्जित सात बाण चला दिए जिनसे छलनी होकर विराध जमीन पर गिर पड़ा और उसके शरीर से रक्त की धाराएँ बह निकलीं। सीता को अपनी पकड़ से छोड़ने के बाद, विराध ने अपनी बरछी निकाली और वह द्रुत वेग से राम और लक्ष्मण की ओर दौड़ा। दोनों भाइयों ने उस राक्षस पर अनगिनत बाण चलाए परंतु इनके उत्तर में वह भयानक स्वर में हँसता रहा। विराध ने कुछ बाण तो खा भी लिए, जबकि ब्रह्माजी के वरदान के परिणामस्वरूप शेष बाण उसके शरीर पर लगकर नीचे गिर गये। हँसते हुए विराध ने अपना बरछा फेंका, परंतु राम ने अपने बाणों से इसके टुकड़े-टुकड़े कर दिए।


राम और लक्ष्मण अपनी तलवारें लेकर विराध पर टूट पड़े। परंतु उसकी देह पर आक्रमण करने पर भी, राक्षस ने राम और लक्ष्मण को अपने हाथों में उठा लिया और उन्हें अपने कंधों पर उठाकर जंगल में ले जाने लगा। यह देखकर, सीता करुण स्वर में चीत्कार कर उठी, "दया करके इन्हें छोड़ दो और इनके बदले मुझे ले जाओ।"


यह सुनकर, राम और लक्ष्मण ने विराध का तत्काल वध करने का निश्चय कर लिया। अपनी अतिमानवीय शक्ति का प्रदर्शन करते हुए, राम ने राक्षस की दाहिनी भुजा उखाड़ फेंकी जबकि लक्ष्मण ने उसकी बायीं भुजा उखाड़ दी। इसके कारण, विराध अचेत होकर जमीन पर गिर गया, जबकि राम और लक्ष्मण उसे मुक्कों से मारने लगे। लगातार पड़ते मुक्कों और लातों के प्रहार के बावजूद वह राक्षस नहीं मरा।


राम बोले, "प्रिय लक्ष्मण, इस राक्षस को युद्ध में नहीं मारा जा सकता, इसलिए इसे जिंदा ही गाड़ देते हैं। जल्दी से एक बड़ा गड्ढा खोदो, इस बीच मैं नौ इस पर नजर रखता हूँ।"


जिस समय लक्ष्मण गड्ढा खोद रहे थे, उसी समय विराध को होश आ गया और वह राम से बोला, "अब मैं आपको पहचान गया। असल में, मैं गंधर्व तुंबुरु और रम्भा नामक एक अप्सरा के प्रति अपनी वासना के कारण मुझे कुबेर ने राक्षस बन जाने का शाप दे दिया और कहा कि आप एक दिन मेरा उद्धार करेंगे। कृपा करके मुझे इस गड्ढे में गाड़ दें, क्योंकि इसी तरह से मैं इस शाप से मुक्ति पाऊँगा। इसके बाद, आप शरभंग नामक एक महान ऋषि से मिलें, जो यहाँ से लगभग बीस किलोमीटर दूर रहते हैं और वह आपको कुछ अत्यन्त लाभकारी सलाह देंगे।"


लक्ष्मण निरंतर गड्ढा खोद रहे थे, जबकि राम ने अपना पैर उस राक्षस की गर्दन पर रखा हुआ था। आखिरकार राम ने चीत्कार करते राक्षस को उस गहरे गड्ढे में गिरा दिया और फिर बड़ी-बड़ी चट्टानों से उस गड्ढे को भरकर उसे गाड़ दिया। इस प्रकार, तुंबुरु ने अपनी राक्षस देह का त्याग किया और कुबेर के शाप से मुक्त होकर स्वर्ग को चला गया।


उसकी सलाह के मुताबिक, सीता, राम और लक्ष्मण महान ऋषि शरभंग से मिलने चल पड़े। ऋषि के आश्रम पर पहुँचकर उन्हें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि राजा इंद्र अपने दिव्य रथ पर बैठे हुए थे, परंतु इस रथ के पहिए जमीन का स्पर्श नहीं कर रहे थे। अगणित देवताओं से घिरे इंद्र शरभंग ऋषि के साथ मंत्रणा कर रहे थे और ठीक उसी समय एक दिव्य रथ ऊपर आसमान पर प्रतीक्षा कर रहा था। राम को आते देखकर, इंद्र शीघ्र ही आकाश मार्ग को चले गये और एक हजार घोड़ों वाले अपने रथ पर बैठकर वहाँ से चले गये क्योंकि वह भगवान् से रावण की मृत्यु के पश्चात् ही मिलना चाहते थे।


सीता, राम और लक्ष्मण शीघ्र ही वहाँ गये और उन्होंने शरभंग ऋषि के चरण स्पर्श किए। ऋषि द्वारा उनका स्वागत किए जाने के बाद, राम ने पूछा, "हे ऋषिश्रेष्ठ, क्या आप कृपा करके हमें यह बताएँगे कि इंद्र यहाँ किस उद्देश्य से आये थे।"


शरभंग बोले, "इंद्र यहाँ मुझे ब्रह्मलोक ले जाने आये थे क्योंकि मैंने अपने तपोबल से ब्रह्मलोक में वास करने का सौभाग्य अर्जित किया है, परंतु मैंने स्वर्गाधिपति इंद्र से कहा कि इस संसार को छोड़कर जाने से पहले मैं आपके दर्शन करना चाहता हूँ क्योंकि मैं यह जानता था कि आप यहाँ आने वाले हैं।"


इसके बाद, राम ने शरभंग ऋषि से अनुरोध किया कि वे उन्हें वनवास की अवधि व्यतीत करने के लिए कोई उपयुक्त स्थान बताएँ, तो ऋषि ने उनसे महर्षि सुतीक्ष्ण के पास जाने की सलाह दी। इसके बाद शरभंग ऋषि बोले, "प्रिय राम, मेरी विनती है कि आप मेरा एक अनुरोध पूरा करें। मेरे लिए अपने भौतिक देह को त्याग करने का समय आ गया है और मेरी इच्छा है कि मैं आपकी उपस्थिति में यह कार्य संपन्न करूँ।"


शरभंग ने अग्नि प्रज्ज्वलित की और घी डालकर इसे बहुत अधिक भड़का दिया। इसके बाद, मंत्रोच्चार करते हुए, वह ऋषि अग्नि में प्रवेश कर गये और उन्होंने अपनी देह को जलाकर भस्म कर दिया। तत्काल ही, शरभंग ऋषि ज्वाला से ऊपर आसमान में उठते दिखाई दिए। वह एक युवा व तेजोमय दिव्य शरीर के साथ ऊपर उठते हुए ब्रह्मलोक को चल पड़े, जहाँ ब्रह्मलोक के वासियों ने उनका स्वागत किया।



इसके बाद, कुछ ऋषिगण राम के पास आकर बोले, "राक्षसों ने यहाँ रहने वाले हमारे बहुत-से ऋषियों का क्रूरतापूर्वक वध कर दिया। आप हमारे साथ चलकर देखें, उनके मृत शरीर अब भी इधर-उधर पड़े हुए हैं। हे राम, हमारी विनम्र प्रार्थना है कि आप हमें संरक्षण दें।"


राम ने यह कहकर ऋषियों को आश्वासन दिया कि " एक क्षत्रिय के रूप में, मैं आपका सेवक हूँ और इसलिए आपकी खातिर मैं राक्षसों का संहार करूँगा।" इसके बाद, उन ऋषियों के साथ राम सुतीक्ष्ण के आश्रम की ओर बढ़ चले। सुतीक्ष्ण ने उनका स्वागत करते हुए कहा, "हे रघु के वंशज, मैं आपके यहाँ आने की प्रतीक्षा कर रहा था। ब्रह्मलोक को वापस लौटने से पहले, इंद्र ने यहाँ आकर मुझे आपके आसन्न आगमन की सूचना दी थी।"


बाद में, राम ने सुतीक्ष्ण से कहा कि वह उन्हें रहने के लिए कोई उपयुक्त स्थान बताएँ, तो ऋषि ने उन्हें अपनी ही कुटिया में रहने का निमंत्रण दिया। परंतु, राम ने ऐसा करने से मना करते हुए कहा, "यदि हम यहाँ पर रहे, तो हमारे द्वारा किसी हिरण का वध करने से निश्चित ही आपको अप्रसन्नता होगी।"


सीता, राम और लक्ष्मण उस रात सुतीक्ष्ण के आश्रम में ही रुके। अगली सुबह जब राम ने उनसे जाने की अनुमति माँगी, तो सुतीक्ष्ण ऋषि ने उन्हें गले से लगाया और दंडकारण्य के सभी आश्रमों का भ्रमण कर लेने के बाद, पुनः यहाँ रहने के लिए आमंत्रित किया।


इसके बाद, दिन के समय, जब वे जंगल से होकर जा रहे थे, तो सीता बोली, "मेरे स्वामी, भौतिक पदार्थों की प्रकृति का हम पर गहरा प्रभाव पड़ता है, इसलिए यह संभव हैं कि कोई महान और उदार - हृदय व्यक्ति भी इनके प्रभाव से पतित हो जाये इसलिए, प्रत्येक व्यक्ति के लिए अपने मन इंद्रियों पर सावधानीपूर्वक नियंत्रण रखना बहुत महत्वपूर्ण होता है ताकि ये भौतिक कामनाओं के व्यसनी न हो जायें। ऐसे तीन पाप कार्य हैं जिनसे खास तौर पर बचा जाना चाहिए और ये हैं असत्य बोलना, दूसरे व्यक्ति की पत्नी में शारीरिक संबंध बनाना और जो लोग आपके शत्रु नहीं हैं उनके प्रति क्रूर व्यवहार करना।


आपके चरित्र में पहली दो त्रुटियों का लेश मात्र भी नहीं है, क्योंकि आप कभी भी असत्य नहीं बोलते और किसी दूसरे व्यक्ति की पत्नी को वासनामय दृष्टि से देखने की बात तो सोच तक नहीं सकते। परंतु प्रिय राम, मैं देखती हूँ कि आप अनेक भोले-भाले जीवों का वध करते हैं। इसके कारण, मेरी समझ से आपमें शत्रुता का प्रदूषित भाव मौजूद हो सकता है। मूक, अबोध जानवरों का अनावश्यक वध होते देखकर मुझे बहुत दुख होता है।


मेरे प्यारे राम, जिस प्रकार आग के बहुत पास में ईंधन रखने पर भी आग भड़कती है, उसी प्रकार अपने हाथ में धनुष लेकर चलने भर से भी आपमें वध करने की सहज प्रवृत्ति बढ़ती है।


इस बारे में, मैं आपको एक कहानी सुनाती हूँ, कृपा करके इसे सुनें। बहुत समय पहले, एक ऋषि हुआ करते थे जो इतनी निष्ठापूर्वक तप करते थे कि उसे देखकर इंद्र भयभीत हो गये कि कहीं इस प्रकार वह स्वर्ग के अधिपति ही न बन जायें। ऋषि के तपोबल को बढ़ने से रोकने की इच्छा से, इंद्र एक दिन उनके पास एक योद्धा का वेश धरकर पहुँचे। इंद्र ने उन्हें एक तलवार देकर कहा, 'कृपया इस तलवार को तब तक अपने पास रख लें जब तक कि मैं वापस आकर इसे आपसे वापस न ले लूँ।'


ऋषि इस पर राजी हो गये और अपना वचन निभाने के लिए वह उस तलवार को सदैव अपने पास रखने लगे। यहाँ तक कि जब वह जंगल में फल- फूल एकत्रित करने जाते, तब भी तलवार को अपने पास में ही रखते। परंतु इसके परिणामस्वरूप, ऋषि के मन में धीरे-धीरे हिंसा की भावना जन्म लेने लगी। अंततः, उन्होंने तप करना छोड़कर, हिंसा का पथ अपना लिया। इस प्रकार वह ऋषि इतने पापी हो गये कि मृत्यु के बाद अपने पापों का दंड भुगतने के लिए उन्हें नरक जाना पड़ा।


मेरे प्रिय स्वामी, वह ब्राह्मण इंद्र की तलवार को अपने पास रखने मात्र से पतित हो गये, इसलिए मेरी आपसे विनती है कि आप धनुष को अपने हाथ में मात्र इसलिए रखें ताकि इसका उपयोग आप ऋषियों को उत्पीड़ित करने वाले राक्षसों का वध कर सके। मूक-अबोध जीवों का तो कहना ही क्या, कृपा करके भोले-भाले राक्षसों तक का वध न करें। निश्चित ही मैं अज्ञानी स्त्री हूं और इसलिए मैं आपको धार्मिक सिद्धांतों के बारे में बताने का साहस नहीं कर सकती। परंतु फिर भी यदि आपको लगे कि मेरी बात ठीक है, तो कृपा कर मुझे बताएँ कि इस संबंध में आपके क्या विचार हैं और आपके विचार से क्या करना सर्वोत्तम रहता है। 


राम ने उत्तर दिया, प्यारी सीता, तुम्हारी बातें अत्यन्त प्रशंसनीय है क्योंकि निश्चित ही इनमें अपार ज्ञान है। मैं जानता हूँ कि मेरे प्रति अपने प्रेम के कारण मेरे कल्याण की इच्छा से तुमने मुझे यह सलाह दी है। यदि कोई व्यक्ति आपको प्रिय न हो, तो आप ऐसी स्पष्ट सलाह नहीं दे सकते, हे जानकी, ये सभी ऋषिगण आसानी से राक्षसों का वध कर सकते हैं, परंतु वे ऐसा नहीं करते क्योंकि ऐसा करने से उनके द्वारा अर्जित पुण्य में कमी आती है। इस कारण से मैंने दंडकारण्य में मौजूद सभी राक्षसों का वध करने का वचन दिया है। मैं तुम्हें या लक्ष्मण तक का त्याग कर सकता है, परंतु मैं ब्राह्मणों को दिए गये वचन की अवहेलना नहीं कर सकता।


सीता, राम और लक्ष्मण एक विशाल, मनोहारी झील पर पहुँचे। बहुत आश्चर्य की बात थी कि झील के पानी में से पक्षियों के चहचहाने की मधुर आवाज आ रही थी परंतु वहाँ पर कोई पक्षी दिख नहीं रहे थे।


वहीं पास में धर्मभृत नामक एक ऋषि थे और राम के अनुरोध पर उन्होंने बताया, "इस झील को पंचप्सरा कहा जाता है और मूलतः मंदकर्णी ऋषि ने अपनी योग-शक्ति के बल पर इसकी रचना की थी। इसके बाद, उन्होंने दस हजार वर्ष तक सिर्फ वायु ग्रहण करके इस झील के तट पर तपस्या की। इस कारण देवतागण अत्यन्त भयभीत हो गये क्योंकि वे सोचने लगे कि यह ऋषि कहीं उनका पद न ले लें। 


मंदकर्णी ऋषि का ध्यान भटकाने के लिए, देवगणों ने पाँच अप्सराएँ भेजीं और ऋषि उनके स्त्रीत्व के आकर्षण के वशीभूत हो गये। ऋषि ने उन सभी से विवाह कर लिया और वे उनके साथ जल के अंदर निर्मित किए गये एक गुप्त घर में रहने लगे। आपको जो आवाजें सुनाई दे रही हैं वह उन्हीं अप्सराओं की हैं। ये अप्सराएँ आज तक इन महान ऋषि की निरंतर सेवा कर रही हैं और ऋषि ने अपने तपोबल से अपना यौवन पुनः प्राप्त कर लिया है।


इसके बाद सीता, राम और लक्ष्मण दंडकारण्य में स्थित सभी आश्रमों में एक-एक करके जाने लगे। कभी वे किसी आश्रम में दो सप्ताह तक रहते, तो कभी एक माह तक और कई बार किसी आश्रम में इससे भी अधिक समय तक रहते, यहाँ तक कि एक वर्ष तक इस प्रकार, राम के वनवास के दस वर्ष अत्यन्त आराम और संतोषजनक ढंग से व्यतीत हो गये। दंडकारण्य के आश्रमों का भ्रमण कर लेने के बाद, सीता, राम और लक्ष्मण एक बार फिर सुतीक्ष्ण ऋषि के आश्रम में आ गये। और उन्होंने वहीं रहना आरंभ कर दिया।


एक दिन, सुतीक्ष्ण मुनि से बात करते हुए राम बोले, "मैंने सुना है कि महान ऋषि अगस्त्य भी दंडकारण्य में ही कहीं रहते हैं, परंतु इस विशाल वन में मैं उन्हें तलाश नहीं कर पाया। मैं उनके पास जाकर उनके चरण स्पर्श करना और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करना चाहता हूँ। कृपा करके मुझे उनका पता बताएँ।


सुतीक्ष्ण बोले, "मेरे विचार से अगस्त्य मुनि से मिलने का आपका विचार अत्यन्त उत्तम है। मैं कहूँगा कि आप आज ही वहाँ के लिए निकल पड़े


सुतीक्ष्ण मुनि से उनका पता पूछकर, सीता और लक्ष्मण के साथ राम वहाँ को चल पड़े। जब वे तीनों अगस्त्य मुनि के आश्रम के निकट पहुँच गये, तो राम ने बताया कि अगस्त्य ऋषि ने किस प्रकार वातापि और इल्वल नामक दो राक्षस भाइयों का संहार किया था।


संध्या वेला तक वे लोग अगस्त्य मुनि के भाई के आश्रम पर पहुँच गये और उन्होंने वहीं पर रात्रि विश्राम करने का निर्णय किया। अगले दिन वे अगस्त्य मुनि के आश्रम पहुँचे जो राक्षसों से मुक्त क्षेत्र था क्योंकि राक्षस उनसे भयभीत रहते थे। राम ने लक्ष्मण को अपने आगमन की सूचना देने के लिए भेजा। अगस्त्य मुनि को उनके एक शिष्य ने जब यह सूचना दी, तो वह बोले, "राम को तत्काल यहाँ आमंत्रित करो क्योंकि मैं बहुत लंबे समय से उनकी प्रतीक्षा कर रहा हूँ।


आश्रम के अंदर पहुँचकर राम ने देखा कि देवताओं के आगमन के लिए आसन बिछाकर तैयार रखे गये थे। अगस्त्य मुनि राम का स्वागत करने आये और भगवान् ने अत्यन्त श्रद्धापूर्वक ऋषि के चरण स्पर्श किए। अगस्त्य ने राम को बैठने के लिए आसन दिया। एक-दूसरे से कुशलक्षेम पूछने के बाद, उन्होंने अपने अतिथियों को बहुत स्वादिष्ट भोजन दिया। भोजन हो जाने पर अगस्त्य ऋषि ने राम को बहुत प्रसन्न मन से विश्वकर्मा द्वारा निर्मित भगवान विष्णु का धनुष और दो तरकश दिए जिनके बाण कभी भी समाप्त नहीं होते थे और ये तरकश उन्हें इंद्र ने उपहार में दिये थे। इसके अतिरिक्त, उन्होंने राम को ब्रह्माजी द्वारा दिया गया एक अमोघ बाण और सोने से मढ़ी हुई एक तलवार दी।


इसके बाद सीता की ओर मुड़कर अगस्त्य बोले, "अपने पति की खातिर स्वेच्छा से वनवास की अत्यन्त कठिन स्थितियों को सहन करने का निर्णय करके, तुमने अनंत काल तक के लिए यश अर्जित किया है। तुमने जो किया है वह इसलिए भी विशेष है क्योंकि सृष्टि की रचना के समय से ही स्त्री का यह स्वभाव रहा है कि वह एक ही पुरुष से सिर्फ तभी तक प्रेम करती है जब तक कि वह धनी-समृद्ध रहता है।


राम ने ऋषि से जब यह पूछा कि उन्हें किस स्थान पर निवास करना चाहिए, तो ऋषि ने एक पल सोचकर कहा कि वे गोदावरी नदी के निकट स्थित पंचवटी नामक स्थान पर जाकर रहें जो यहाँ से बीस किलोमीटर दूर था। राम के जाने से पहले, अगस्त्य मुनि ने उनसे एकांत में कहा, "मैं अपने योगबल से आपके सम्पूर्ण जीवन के बारे में पहले से ही जानता हूँ और इस कारण आपके लिए मेरा स्नेह और अधिक बढ़ गया है।


पंचवटी जाने के मार्ग पर, सीता, राम और लक्ष्मण की भेंट विशाल देह वाले जटायु से हुई जो गिद्धों के राजा थे। उन्हें राक्षस समझकर, राम ने उनसे अपनी पहचान बताने को कहा।


जटायु ने मृदुल स्वर में उत्तर दिया, "मेरे प्यारे पुत्र, मैं तुम्हारे पिता का एक अच्छा मित्र हूँ। बहुत समय पहले, कश्यप ने प्रजापति दक्ष की आठ कन्याओं से विवाह किया था। विनता से अरुण और तामस से श्येनी का जन्म हुआ। मैं अरुण और उनकी पत्नी श्येनी का पुत्र हूँ। मेरा नाम जटायु है। मेरे प्रिय राम, मैं स्वयं को आपके एक तुच्छ सेवक के रूप में प्रस्तुत करता हूँ। इस वन में अनेक भयानक राक्षस निवास करते हैं, इसलिए जब भी कभी आप और लक्ष्मण अपनी कुटिया से बाहर जायेंगे, तो मैं सीता का ध्यान रखूंगा।


जटायु का अपने पिता से संबंध होने की बात सुनकर, राम ने आदरपूर्वक उन्हें प्रणाम किया। इसके बाद जटायु राम, सीता और लक्ष्मण को पंचवटी की ओर ले चले और पूरे रास्ते पर सावधानी से चारों तरफ नजर रखे रहे।


पंचवटी पहुँचकर राम ने लक्ष्मण से कहा, "प्यारे भाई, हमारी कुटिया के लिए एक स्थान का चुनाव कर लो। यह स्थान झील या नदी के पास होना चाहिए क्योंकि वहाँ जल और हरियाली एक साथ रहती है जिससे स्थान की सुंदरता को चार चांद लग जाते हैं।



लक्ष्मण बोले, "प्रिय राम, आप स्वयं ही अपनी पसंद का स्थान चुन लें और तब मैं वहाँ पर कुटिया बना दूँगा।


राम ने गोदावरी नदी के तट पर एक स्थान का चुनाव किया जहाँ एक झील में गुलाबी और नीले रंग वाले कमल के फूल खिले हुए थे। जमीन समतल थी, इसलिए यहाँ से बिना किसी बाधा के आस-पास के क्षेत्र का मनोरम दृश्य दिखता था। वहाँ पर हंसों और चक्रवाक पक्षियों के साथ ही मोरों के बोलने की आवाज भी सुनाई देती थी, जो आस-पास की पहाड़ियों से टकराकर कर्णप्रिय गूंज पैदा करती थी। लक्ष्मण ने वहाँ पर एक सुंदर-सी कुटिया बनाई और फिर इस पर फूल अर्पित करने के बाद राम कुटिया के अंदर गये और इतनी सुंदर कुटिया देखकर बहुत प्रसन्न हुए।


धीरे-धीरे सर्दियों का मौसम शुरू हो गया और उन दिनों सुबह की धूप का स्पर्श अत्यन्त सुहावना होता है। एक सुबह, राम और लक्ष्मण नदी में स्नान करके अपनी कुटिया में लौटे और प्रातः कालीन धार्मिक अनुष्ठान की तैयारी करते हुए एक-दूसरे से बातचीत करने लगे।


उसी समय एक राक्षसी वहाँ आई और राम को देखते ही उसका हृदय राम के प्रति प्रेम से आसक्त हो गया। सावले वर्ण वाले कमलनयन राम प्रेम के देवता कंदर्प का मानव अवतार प्रतीत हो रहे थे। इसके विपरीत, राक्षसी अत्यन्त कुरूप थी, उसकी तोंद बाहर निकली हुई थी, आँखें विकृत थीं और केश ताम्रवर्णी थे। राम का युवा शरीर सुगठित, सबल मांसपेशियों-युक्त था और उनकी देह व चाल-ढाल से समस्त राजसी गुण प्रकट होते थे, जबकि राक्षसी अत्यन्त कुरूप और अधेड़ आयु की थी।


परंतु, कामदेव के बाणों से घायल होकर, वह राम के पास जाकर बोली, हे मेरे सुंदरतम प्रिय, कृपा करके मुझे बताएँ कि आप कौन हैं और ऋषि के समान वेश धारण करके इस वन में किस उद्देश्य से आये हैं।


राम ने संक्षेप में अपने वनवास की कथा सुना दी और फिर राक्षसी से अपना परिचय देने को कहा। वह बोली, "मेरा नाम शूर्पणखा है और मैं रावण, कुंभकर्ण, विभीषण, खर और दूषण की बहन हूँ मैं इसी वन में रहती हूँ और सभी जीव- जंतुओं के हृदयों को भयभीत करती हूँ।


हे राम, सच कहूँ तो मुझे तुमसे बहुत प्यार हो गया है और इसलिए मैं तुम्हें अपना पति बनाना चाहती हूँ। अपनी कुरूप और विकृत पत्नी का त्याग कर दो। वह तुम्हारे समान सुंदर पुरुष के योग्य नहीं है। मैं अत्यन्त शक्तिशाली हूँ और अपनी इच्छा से कहीं भी तत्क्षण पहुँच सकती हूँ, इसलिए मैं ही तुम्हारे लिए उपयुक्त संगिनी हूँ। पहले मैं, बिना तोंद वाली सीता को और तुम्हारे भाई लक्ष्मण को खा जाऊँगी। इसके बाद हम स्वतंत्र होकर इस सुंदर दंडकारण्य के पर्वतों और घाटियों में आनन्द भोग करेंगे।


यह कहकर शूर्पणखा वासनापूर्ण दृष्टि से राम को निहारने लगी, तो राम जोर- जोर से हँसने लगे और उन्होंने व्यंग्य किया, "मैं विवाहित पुरुष हूँ और विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि तुम्हारे समान युवा और रूपवान युवती किसी सौत को सहन नहीं कर पाएगी। दूसरी तरफ, मेरे भाई की पत्नी नहीं है और वह मुझसे भी अधिक बलशाली और सुदर्शन युवक है, इसलिए मैं तुम्हें सलाह दूँगा कि तुम उससे विवाह कर लो।


शूर्पणखा ने राम के मजाक को सच समझा। वह राम को छोड़कर, लक्ष्मण की ओर मुड़ गई। काम-वासना के वशीभूत होकर, वह बोली, "हे मेरे सुंदर पुरुष तुम अपने भाई से भी अधिक बलवान और रूपवान प्रतीत होते हो। इसलिए, तुम हो मेरे लिए सबसे उपयुक्त पति हो। आओ और मुझे अपनी पत्नी बना लो और फिर हम दोनों साथ-साथ वन में विचरण करेंगे और अपने प्रेम का आनन्द उपभोग करेंगे।


लक्ष्मण ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, "कोमल त्वचा व सुंदर अंगों वाली है स्त्री, तुम्हें यह जानना चाहिए कि मैं अपने बड़े भाई का दास मात्र हूँ। यदि तुम मुझसे विवाह करोगी, तो तुम भी दासी बन जाओगी। मेरे विचार से, राम की दूसरी पत्नी बन जाना ही तुम्हारे लिए बेहतर रहेगा। कुछ समय बाद, निश्चित ही वह अपनी बुढ़िया और कुरूप पत्नी सीता का त्याग कर देंगे और सिर्फ तुम्हारे ही साथ रहेंगे। तुम्हारा मुख इतना सुंदर है और इस पर तुम्हारी मुस्कान और तुम्हारे भरपूर स्तन तुम्हारे रूप को और अधिक मनोहारी बना देते हैं। इसके अतिरिक्त तुम्हारी नाजुक कमर और विशाल नितंब देखकर तो मनुष्य अन्य सभी स्त्रियों की और से मुँह फेर लेगा। भला तुम्हें कोई मना कैसे कर सकता है? राम से विवाह कर लो और देखना, शीघ्र ही वह अपनी कुरूप पत्नी का त्याग कर देंगे।


शूर्पणखा अत्यन्त मूर्ख थी और वह राम व लक्ष्मण के व्यंग्य को नहीं समझ पाईं। वह फिर से राम की ओर मुड़कर बोली, "तुम नाहक ही कुरूप सीता के प्रति इतने स्नेहासक्त हो, इसलिए मैं उसे अभी खा जाती हूँ और फिर तुम्हें बलपूर्वक अपना पति बना लूँगी ।


यह कहकर शूर्पणखा सीता की ओर दौड़ी। राम ने लक्ष्मण से उसे रोकने को कहा. "तुम्हें इस राक्षसी से ऐसा मजाक नहीं करना चाहिए था जिससे सीता खतरे में पड़ जाये। अब उसका चेहरा विकृत कर दो तभी उसे सही सबक मिलेगा!


राम का आदेश पाकर, लक्ष्मण ने अपनी तलवार निकाली और जल्दी ही शुर्पणखा की नाक और कान काट दिए। राक्षसी दर्द से बिलबिलाकर चीख उठी। उसके चेहरे से खून की तेज धाराएँ बह निकलीं और इसी अवस्था में वह साथ के वन की ओर भागी जिसका नाम जनस्थान था और वहाँ उसका भाई खर अनेक राक्षसों के साथ रहता था। रक्त से लथपथ अवस्था में बेहद डरी हुई शूर्पणखा अपने भाई के पैरों पर जाकर गिर पड़ी और फूट-फूटकर रोने लगी। खर हक्का-बक्का उसे देखता रहा और वह अनर्गल शब्दों में उसे सारी कथा सुनाने लगी जिसे सुनकर खर का हृदय आतंक से दहल उठा और अपनी बहन के कुरूप चेहरे को देखकर उसका हृदय क्रोध से भर उठा।


किसी कुचले हुए नाग की तरह फुफकारते हुए, खर आखिरकर बोला, "मेरी प्यारी बहना, उठो और स्वयं को शांत करो! मुझे साफ-साफ बताओ कि हुआ क्या, तुम्हारा यह हाल करने का साहस किसने किया? क्या उसे यह नहीं पता कि ऐसा करके उसने स्वयं अपनी मृत्यु का आलिंगन किया है? तुम्हें हानि पहुँचाने वाला कोई भी देव या असुर, गंधर्व या ऋषि जीवित नहीं बच सकता है। तुम सिर्फ उसकी तरफ इशारा कर दो और मैं अपने तीखे बाणों से उसका सारा रक्त निचोड़ दूंगा।


बेतहाशा सुबुकते हुए, शूर्पणखा किसी तरह बोली, "पास के दंडकारण्य में राम और लक्ष्मण नामक दो भाई रह रहे हैं। मैं नहीं जानती कि वे देवता हैं या असुर हैं, परंतु उन्होंने मेरा रूप बिगाड़ा है इसलिए मुझे तब तक शान्ति नहीं मिलेगी जबकि मैं उनका खून न पी लूँ ।


खर ने अत्यन्त बलशाली चौदह राक्षसों को बुलाया और उन्हें शूर्पणखा के साथ राम, लक्ष्मण और सीता का वध करने भेज दिया। राम अपनी कुटिया में सीता के साथ बैठे हुए थे जबकि लक्ष्मण द्वार पर पहरा दे रहे थे कि तभी शूर्पणखा ने उनकी ओर इशारा करके राक्षसों को उनकी पहचान कराई। उन खूंखार नरभक्षियों को देखकर, राम ने लक्ष्मण को आदेश दिया, तुम यहाँ सीता के साथ रुको और मैं जाकर इनसे युद्ध करता हूँ। 


राम बाहर निकले और चिल्लाकर राक्षसों से बोले, "हम इस वन में ऋषियों के अनुरोध पर आये हैं और उन्होंने हमसे तुम्हारे अत्याचारों से बचाने का अनुरोध किया है। हम यहाँ तपस्यापूर्ण जीवन बिता रहे हैं और सिर्फ फल और कंद-मूल खाते हैं। तुम यहाँ गड़बड़ी फैलाने क्यों आये हो? यदि तुम्हें अपने प्राणों का तनिक भी मोह है, तो बेहतर यही है कि तुम लोग अभी यहाँ से चले जाओ।


इतने साहसपूर्ण ढंग से चुनौती दिए जाने से राक्षस भौंचक्के होकर राम को अपने लाल-लाल, रक्तपिपासु नेत्रों से घूरने लगे और बोले, "हमारे स्वामी, खर तुम पर क्रोधित हैं और इसीलिए उन्होंने हमें आदेश दिया है कि हम तुम्हें मार डालें। तुम हम इतने सारों से लड़ने का साहस भला कैसे कर सकते हो? हम क्षण भर में ही तुम्हें तुम्हारे अस्त्र-शस्त्रों सहित कुचलकर मार डालेंगे ।


यह कहकर, राक्षस अपने अस्त्र-शस्त्र लहराते हुए राम की ओर दौड़ पड़े, परंतु राम ने चौदह बाणों से उनके अस्त्र-शस्त्र काट डाले और फिर अगले चौदह बाणों को उनके हृदय के आर-पार कर दिया। रक्तरंजित राक्षस कटे हुए वृक्षों की तरह जमीन पर मृत होकर गिर पड़े।


डर से थर-थर कांपती शूर्पणखा वापस अपने भाई के पास भागी और उसे राक्षसों के संहार की सूचना दी। वह बोली, "तुमने मुझे दिलासा दी थी कि वे राक्षस राम और लक्ष्मण को मार डालेंगे, परंतु इसके उलट तुम्हारे भेजे राक्षस मारे गये। अब तुम्हें स्वयं चलना होगा और स्वयं ही राम और लक्ष्मण का वध करना होगा। यदि तुमने ऐसा नहीं किया तो मैं अपमान से लज्जित होकर अपने प्राण त्याग दूंगी ।


यह कहकर, शूर्पणखा दुख और पीड़ा से अभिभूत होकर जमीन पर गिर पड़ी। वह छाती पीट-पीटकर रोने लगी। अपनी बहन के कटु शब्दों को सुनकर खर क्रोध से भर उठा और उसने प्रतिज्ञा की, तुम दुखी न होओ! मैं वचन देता हूँ कि मैं आज ही राम और लक्ष्मण का वध कर दूंगा ताकि तुम उनका खून पीकर शांत हो जाओ।


यह सुनकर, शूर्पणखा थोड़ी शांत हुई। खर ने अपने भाई दूषण को अपन रथ और अस्त्र-शस्त्र लेकर आने और सभी 24,000 राक्षसों को एकत्रित करने का आदेश दिया। जिस समय खर अपनी राक्षसों की सेना के साथ दंडक वन से जा रहा था, तभी आसमान में काले बादल छा गये और उनसे रक्त मिश्रित वर्षा होने लगी। खर के घोड़ों के पैर फिसल गये और वे जमीन पर गिर पड़े। एक गिद्ध उड़कर आया और खर के रथ पर लगे ध्वज पर बैठ गया, जबकि सियार अत्यन्त डरावनी आवाज में हुंकार भरने लगे और सूर्यग्रहण हो जाने के कारण चारों ओर अंधकार छा गया, हालांकि यह सूर्यग्रहण का समय नहीं था। इस सबके  बीच, खर की वायीं भुजा फड़कने लगी और उसकी आवाज भारी और डरी हुई निकलने लगी।


परंतु इन सभी अपशकुनकारी लक्षणों को देखकर भी, खर मुस्कुरा दिया और बोला, मैं अपनी असीम शक्ति के कारण इन तथाकथित अपशकुनों में से किसी को भी नहीं मानता!


इसी बीच, सभी देवतागण और दिव्यऋषि  इस आसन्न युद्ध को देखने के लिए आकाश में जमा हो गये। राक्षसों के वहाँ पहुँचते समय, राम ने लक्ष्मण को उन शुभ संकेतों के बारे में बताया जो उन्हें दिखे थे। वह बोले, मेरे बाण अत्यन्त प्रसन्न दिख रहे हैं, मेरे धनुष की प्रत्यंचा हर्षित है और मेरा दाहिना हाथ: फड़क रहा है। मेरे प्यारे भाई, तुम सीता को तत्काल पर्वत की गुफा में ले जाओ और वहाँ सावधानी से उसका ध्यान रखना, तब तक में इन राक्षसों का संहार करता हूँ।


सीता और लक्ष्मण के चले जाने के बाद, राम ने अपना चमचमाता हुआ सोने का कवच पहना। भयानक गर्जना करते हुए जब राक्षस आगे बढ़े, तो राम ने अपने सर्वग्रासी क्रोध का आह्वान करके ऐसा भयानक रूप धारण किया जिसे देखकर भय से प्राण निकल सकते थे। खर की सेना ने राम को चारों ओर से घेर लिया और वे उन पर अपने गदा, बरहों, तलवारों और कुल्हाड़ियों की बौछार करने लगे, जबकि खर ने एक हजार बाण छोड़ दिए। राम ने इन सभी अस्त्र-शस्त्रों को काटकर इनके टुकड़े-टुकड़े कर दिए। राम को अनेक जगहों पर जख्म लगे और उनके शरीर से खून बह रहा था, परंतु उन्हें देखकर ऐसा प्रतीत नहीं होता था कि उन्हें कोई दर्द हो रहा है।


राम ने राक्षसों पर हजारों बाणों की वर्षा कर दी और उनके धनुषों, ध्वजों, ढालों, कवयों और अंगों को काटकर टुकड़े-टुकड़े कर दिया। अगणित राक्षस 'मरकर जमीन पर गिर पड़े और उनके घोड़े व हाथी भी मारे गये और अनेक रथ टूटकर चूर-चूर हो गये। राक्षसों ने और अधिक क्रुद्ध होकर, ज्यादा शक्ति के साथ राम पर अपने अस्त्र-शस्त्रों की बौछार कर दी। राम ने सहजता से इन अस्त्र-शस्त्रों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए और साथ ही अनेक राक्षसों के सीनों को बाणों से छलनी कर डाला। अगणित राक्षसी सिर अपने विशाल धड़ों से कटकर जमीन पर गिर पड़े, जबकि बचे हुए राक्षस खर के पास शरण लेने भाग गये। 


अचानक दूषण अत्यधिक क्रोध से राम की ओर दौड़ा और उसके पराक्रम से उत्साहित होकर दूसरे राक्षस भी उसके पीछे-पीछे राम की ओर दौड़े। राम ने सर्वश्रेष्ठ गंधर्व अस्त्रों का आह्वान किया और उनके धनुष से हजारों बाणों को धारा प्रवाहित होने लगी जिनसे सूर्य ढंक गया और चारों और अंधकार छा गया। हजारों राक्षस टुकड़े-टुकड़े होकर कटकर जमीन पर गिरने लगे और उनकी लाशों से जमीन पट गई।


इसके बाद, दूषण ने राम पर आक्रमण करने के लिए 5000 राक्षसों को बुलाकर सेना बनाई। इसके बाद दूषण ने अत्यन्त पराक्रम दिखाते हुए युद्ध किया और जब राम ने देखा कि उनके बाणों को वह काट दे रहा है, तो वह क्रोध में आग-बबूला हो उठे। एक दैदीप्यमान बाण चलाकर, राम ने दूषण के धनुष के दो टुकड़े कर दिए। इसके बाद, उन्होंने चार बाण चलाए जिनसे उन्होंने उस राक्षम के घोड़ों को मार डाला एक और बाण से राम ने दूषण के सारथी का वध कर दिया और फिर तीन बाणों से उन्होंने उसके सीने को छलनी छलनी कर दिया।


दर्द से कराहते दूषण ने एक काँटेदार गदा उठाई और अपने रथ से कूदकर उसने उग्रतापूर्वक राम पर धावा बोल दिया। परंतु, राम ने अपने दो बाणों से उसके दोनों हाथ काट डाले और फिर एक और वाण चलाकर उन्होंने उस राक्षस का अंत कर दिया।


दूषण की बची-खुची सेना राम से बदला लेने के लिए उनकी ओर लपकी। परंतु अत्यन्त बुद्धिमानी से युद्ध करते हुए, राम ने 5000 बाणों की झड़ी लगा दी और धूमकेतु के समान चमकते हुए इन बाणों के कारण शीघ्र ही 5000 राक्षस धूल में मिल गये। यह देखकर, खर ने अपने बचे हुए सैनिकों को आक्रमण करने का आदेश दिया, परंतु राम ने शीघ्र ही उनकी भी इहलीला समाप्त कर दी। इस प्रकार, दंडकारण्य की मिट्टी 24000 राक्षसों के खून के कारण लाल कीचड़ का समुद्र बन गई।


सिर्फ खर, त्रिशिर और कुछ अन्य राक्षस ही जीवित रह गये थे। खर ने आक्रमण की तैयारी की, तो उसके सेनापति त्रिशिर ने उससे कहा कि वह उसे पहले युद्ध करने की अनुमति दे। खर से अनुमति मिल जाने पर, तीन सिरों वाले उस राक्षस ने राम की ओर बढ़कर बाणों की झड़ी लगा दी। उसके कुछ तीरों से राम के माथे पर थोड़ी चोट आई जिससे राम अत्यधिक कुपित हो उठे और उन्होंने त्रिशिर के घोड़ों और सारथी को मार डाला और उसके रथ पर लगी ध्वजा को काटकर गिरा दिया। इसके बाद, त्रिशिर ने अपने टूटे रथ से छलाँग लगाने का प्रयास किया, परंतु राम ने एक तीक्ष्ण बाण से उसका हृदय वेध दिया और तीन अन्य बाणों से उसके तीनों सिर काट गिराए।


खर ने बचे-खुचे राक्षसों को बटोरकर, राम पर भयंकर हमला बोल दिया। इसके बाद जो घमासान मचा, उसमें बाणों की घमासान वर्षा से सूर्य दृष्टि-ओझल हो गया और समूचा आसमान बाणों से ढंक गया। खर अपने रथ को राम के पास ले गया और बड़ी चतुराई से उसने राम के धनुष के दो टुकड़े कर दिए। इसके बाद, खर ने 1000 बाण चलाए जिनसे राम का कवच चूर-चूर होकर जमीन पर गिर गया।


यद्यपि राम के अंगों में गहरे घाव हो गये थे, परंतु राम ने शान्ति के साथ भगवान विष्णु के धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाई और खर के राज्य-चिह्न वाले ध्वज को काट गिराया। इसके जवाब में उस राक्षस ने उन्हें गंभीर रूप से घायल कर दिया। अत्यधिक क्रोध से कुपित होकर, राम ने फुर्ती से छह बाण चलाए जिन्होंने खार के सिर, बाँहों और सीने को वेध दिया। इसके बाद, तेरह बाणों से राम ने उसके घोड़े मार गिराए, उसके सारथी का सिर काट दिया, उसका धनुष तोड़ डाला और उसके रथ को चकनाचूर कर दिया। इनमें से अंतिम बाण ने, जो सूर्य के समान चमक रहा था, खर के सीने को आर-पार वेध दिया जिसके कारण वह अचेत होकर दूर जा गिरा।


खर को शीघ्र ही होश आ गया और वह अपने टूटे रथ से छलाँग लगाकर, हाथ में गदा लिए राम के सामने जाकर खड़ा हो गया। राम ने खर को फटकारते हुए कहा, अरे दुष्ट पापी राक्षस, तूने जीवन भर दूसरों को दुख और कष्ट दिए हैं, इसलिए तू घोर अधम पापी है। मैं इसी क्षण तेरा सिर काटकर तुझे इसका दंड दूंगा !


इस पर क्रुद्ध खर बोला, "अरे नीच, अभागे असली पराक्रमी अपनी शक्ति की डींग नहीं हाँका करते ! यह कहकर, खर ने अपनी विशालकाय गदा राम की ओर फेंक दी। उस चमकदार गदा से निकलते अंगारों ने अपने पथ में आने वाले सभी वृक्षों और झाड़ियों को जलाकर राख कर दिया, परंतु राम के बाणों ने इसे हवा में ही तोड़कर धूल बना दिया। एक बार फिर, राम और खर ने एक-दूसरे से कटु शब्द कहे और फिर उस राक्षस ने साल का एक वृक्ष उखाड़ लिया और उसे घुमाकर राम की और प्रबल वेग से उछाल दिया और चिल्लाकर बोला, "अब तू मरा!" परंतु राम ने उस विशाल वृक्ष को काटकर टुकड़े-टुकड़े कर दिया।


इसके बाद, अपने शत्रु का अंत करने की इच्छा से, राम ने 1000 बाणों की वृष्टि कर दी। खर के शरीर के प्रत्येक अंग-प्रत्यंग से रक्त की भीषण भार वह निकली, परंतु इसके बावजूद एक अंतिम प्रयास करते हुए वह राक्षस प्रबल वेग से राम पर झपटा। राम ने एक दैदीप्यमान बाण निकाला और जब इस बाण ने खर के सीने को वेधकर उसके शरीर को जला डाला, तो वह मृत होकर जमीन पर गिर पड़ा।


राम की विजय देखकर, देवतागण प्रसन्नता से अभिभूत हो उठे और आकाश मंडल में वाद्य यंत्र बज उठे और पुष्प वृष्टि होने लगी। मात्र डेढ़ घंटे में समस्त राक्षसों का संहार कर देने के, राम के अति पराक्रमी कृत्य को देखकर सभी ने प्रभु की महिमा का गुणगान किया।


इसके बाद अगस्त्य ऋषि की अगुवाई में महान ऋषिगण राम के पास पहुँचे और उनसे बोले, "इंद्र ने शरभंग से भेंट इसलिए की थी ताकि आप यहाँ आयें और इन राक्षसों का संहार करें। यही कारण है कि ऋषि ने आपको यहाँ आकर रहने की सलाह दी थी।"


सीता और लक्ष्मण अपनी गुफा से बाहर निकल आये। राम को सुरक्षित और स्वस्थ देखकर, सीता अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक उनके पास दौड़ी और उन्हें आलिंगनबद्ध कर लिया। इसी बीच, अकंपन नामक एक राक्षस इस भीषण संहार से बचकर भाग निकला और उसने लंका जाकर रावण को उसके दोनों भाइयों व अनुयायियों के मारे जाने की सूचना दी।


यह समाचार सुनकर, रावण क्रोध से आग-बबूला हो उठा। वह अत्यन्त आवेश से भरकर चिल्लाया, "किसने मुझ पर इस प्रकार आक्रमण करने की धृष्टता की? क्या उसे अपने प्राणों का मोह नहीं रह गया है? अब उसे कोई भी नहीं बचा सकता है-न इंद्र, न यम और न ही विष्णु। मुझे तत्काल बताओ कि वह कौन है जिसने मुझे इस तरह क्रोध दिलाने की धृष्टता की है ?"


रावण के क्रोध को देखकर डर के मारे अकंपन की घिग्घी बंध गई और वह गिड़गिड़ाते हुए बोला, "हे राक्षसराज, मैं आपके सभी प्रश्नों के उत्तर दूंगा, परंतु आप वचन दें कि आप मेरे सत्य बोलने के कारण मुझे दंडित नहीं करेंगे।"


रावण से वचन मिल जाने पर, अकंपन बोला, "आपके दोनों भाइयों के साथ 24000 राक्षसों का वध राम नामक एक मनुष्य ने किया है जो राजा दशरथ का पुत्र है।"


रावण ने पूछा, "क्या सभी देवताओं ने राम की तरफ से युद्ध किया था?" अकंपन बोला, "अरे नहीं, राक्षसराज राम ने सभी राक्षसों का वध अकेले ही किया और यहाँ तक कि अपने छोटे भाई लक्ष्मण की सहायता भी नहीं ली। राम का पराक्रम और शक्ति इतनी अजेय है कि उन्होंने सभी राक्षसों को थोड़े ही समय में मार डाला। कोई भी उनके सामने नहीं टिक सका और जब वह क्रुद्ध होकर खड़े हुए, तो ऐसा जान पड़ा मानो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड नष्ट हो जायेगा!"


रावण ने क्रोध से घोषणा की, मैं इसी क्षण जनस्थान जाऊँगा और इस राम व लक्ष्मण का वध कर दूँगा। तब हम देखेंगे कि वे दोनों कितने पराक्रमी और शक्तिशाली हैं!


अपने स्वामी के कल्याण की कामना से, अकंपन ने उसे चेताया, दया करके जल्दबाजी में, राम की शक्ति और पराक्रम को कम करके न आँके। वह इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का विनाश करके इसकी पुनः रचना करने में सक्षम हैं। मेरे विचार से, यदि समस्त देवता और असुर एक साथ मिल जायें, तब भी वे राम का वध नहीं कर सकते। इसलिए, उन पर बल से आक्रमण करने का विचार त्याग दें। मेरे पास एक और विचार है जिसके माध्यम से आप राम की मृत्यु के बारे में सुनिश्चित हो सकते हैं। उसकी पत्नी, सीता अतुलनीय रूपसी है और उसका मुखमंडल हजार चंद्रमाओं से भी अधिक सुंदर है। वह समस्त स्त्री-सुलभ गुणों की मूर्त रूप है और इसके अतिरिक्त वह मन, कर्म और वचन से आदर्श पतिव्रता नारी है। मेरे विचार से, सीता के बिना राम अधिक समय तक जीवित नहीं रह पायेंगे। इसलिए मेरी सलाह है कि आप वहाँ जाकर उसका अपहरण कर लें। 


रावण को यह विचार तत्क्षण ही पसंद आ गया। कुछ समय तक इस पर विचार करने के बाद, वह बोला, "तुम्हारी योजना बहुत शानदार है। मैं कल ही अपने रथ पर बैठकर पंचवटी जाऊँगा और अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक सीता का बलात् अपहरण कर लूँगा।"


इसके बाद रावण ने अकंपन को जाने का आदेश दिया और वह ताड़का के पुत्र, मारीच के आश्रम को चला गया। रावण का सम्मान सहित स्वागत करने और उसके पैर धोने के बाद, मारीच बोले, "हे राक्षस-राज, आपके अचानक यहाँ पर आने से मेरे मन में आश्चर्य और सन्देह हो रहा है। मैं जानता हूँ कि किसी गंभीर समस्या के बिना आप स्वयं यहाँ पर नहीं आये होते।"


रावण बोला, "तुम सत्य कह रहे हो। राम नाम के एक मनुष्य ,ने जनस्थान पर तैनात मेरी सेना का पूर्णतः संहार कर दिया है। उसके भाई लक्ष्मण ने जब शूर्पणखा का रूप बिगाड़ दिया, तो खर और दूषण ने उनसे इसका बदला लेने का प्रयास किया। मैं अपने दोनों भाइयों को अजेय मानता था, परंतु अपने सभी सैनिकों के साथ वे भी मारे गये। मेरे प्रिय मारीच, मुझे राम की पत्नी सोता का अपहरण करने में तुम्हारी सहायता चाहिए।"


यह सुनकर मारीच स्तब्ध रह गया और भय से बोला, "जिसने भी आपको यह सुझाव दिया है, असल में वह मित्र के वेश में आपका शत्रु है। है रावण, यदि आप इस मूर्खतापूर्ण योजना को पूरा करने का प्रयास करेंगे तो इसका परिणाम सिर्फ आपका विनाश ही होगा क्योंकि राम के पास भगवान विष्णु के समान असीमित शक्तियाँ हैं। राम एक अथाह समुद्र के समान हैं। उनका धनुष इस समुद्र के घड़ियाल के समान और उनके अस्त्र-शस्त्र इस समुद्र में उठने वाले चक्रवातों के समान पराक्रमी हैं। वह समुद्र की निरंतर प्रवाहित होती लहरों के समान बाणों की वृष्टि करते हैं और समुद्र के दो छोरों के बीच का विशाल विस्तार वह युद्धभूमि है जिसमें उनके शत्रु डूबकर मर जाते हैं।


हे राक्षस-राज, आपके लिए सर्वोत्तम यही है कि आप अपने क्रोध को वश में करें और लंका वापस लौट जायें। वहाँ जाकर अपनी पत्नियों के साथ आनन्द- भोग करें और राम को दंडकारण्य अपनी पत्नी के साथ आनन्द-मग्न रहने दें। अन्यथा, आप अनावश्यक ही अपने सिर पर विपत्ति मोल ले लेंगे ।


मारीच की सलाह मानकर, रावण लंका में स्थित अपने अनुपम राजमहल को लौट गया।


इसी बीच, राक्षसों का भारी संख्या में संहार देखने के बाद, शूर्पणखा अपने भाई से मिलने गई। रावण के दस सिर और बीस भुजाएँ थीं और उसके शरीर पर पिछले युद्धों में लगे अनेक जख्मों के निशान थे जिनमें भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र द्वारा बने घावों के निशान भी शामिल थे।


एक बार, रावण ने भोगवती पर आक्रमण करके वासुकि और तक्षक को हराया था और तक्षक की पत्नी को बलपूर्वक उठा ले गया था। कुबेर पर विजय प्राप्त करके, रावण ने पुष्पक रथ पर अधिकार किया था। द्वेष के कारण, उसने नंदन वन जैसे स्वर्ग के कुछ उद्यानों को भी नष्ट कर दिया था।


रावण ने बहुत समय पहले कठोर तपस्या की थी और 10000 वर्ष तक तपस्या करने के बाद उसने भगवान् ब्रह्मा को अपने दस सिर काटकर अर्पित कर दिए। रावण से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने उसे मनुष्यों के अतिरिक्त अन्य सभी जीवधारियों से नहीं मारे जाने का वरदान दिया था। यह वरदान पाकर, अहंकार से उन्मत्त होकर रावण ने ब्राह्मणों का वध करना और उनके यज्ञों को नष्ट करना शुरू कर दिया। इस प्रकार वह देवताओं की आँखों की किरकिरी बन गया, इसीलिए देवताओं ने अत्यन्त उद्विग्न होकर भगवान् विष्णु से उसका संहार करने की प्रार्थना की।


शूर्पणखा ने रावण के पास पहुँचकर उसे अपना क्षत-विक्षत चेहरा दिखाया। उस समय रावण अपने सात-मंजिला राजमहल में सोने के सिंहासन पर बैठा हुआ था।


शूर्पणखा ने रोते- कलपते हुए रावण से कहा, "मेरे प्यारे भैया, क्या आप इंद्रियभोग में इतना अधिक डूब गये हो कि आपको अपने सामने मुँह बाए खड़ा इतना गंभीर संकट नहीं दिख रहा है? जब कोई राजा केवल अपने तुच्छ आनन्द- भोग में ही रमा रहता है और राज-काज के मामलों पर ध्यान नहीं देता, तो सभी लोग उससे घृणा करने लगते हैं। क्या आपके गुप्तचरों ने आपको सूचित नहीं किया कि किस प्रकार राम ने अकेले ही जनस्थान में 24000 राक्षसों सहित आपके दोनों भाइयों का वध कर दिया? आप एक अकर्मण्य राजा हो, इसलिए मैं भविष्यवाणी करती हूँ कि आप बहुत लंबे समय तक राज-सिंहासन पर नहीं बैठ पायेंगे ।


रावण अपने मंत्रियों के सामने अपनी बहन की इन भड़काने वाली बातों को सुनकर क्रोध से पागल हो उठा। परंतु अपने क्रोध को नियंत्रित करके और कुछ देर तक सोच-विचार करने के बाद, उसने पूछा, यह राम कौन है और वह कितना बलशाली है? क्या उसने ही इस प्रकार से तुम्हारा रूप बिगाड़ा है? मुझे सब बताओं, क्योंकि मैं सारी बात जानना चाहता हूँ।


शूर्पणखा बोली, लंबे व बलिष्ठ भुजाओं वाले और कमल की पंखुड़ियों के समान विशाल नेत्रों वाले राम स्वयं प्रेम के देवता का अवतार जान पड़ते हैं। यद्यपि वह सभी क्षत्रियों में सबसे अधिक पराक्रमी हैं, परंतु वह मृगाम्बर और वृक्ष की छाल के वस्त्र पहनते हैं और सिर पर जटा धारण किए रहते हैं। राम का छोटा भाई लक्ष्मण है और उसी ने अपने भाई के आदेश से मेरी नाक और कान काटे हैं।


राम की पत्नी का नाम सीता है और वह हू-ब-हू सौभाग्य की देवी के समान दिखती है। उसकी आँखें बड़ी-बड़ी और काली है और उसका रूप अनेक चंद्रमाओं को भी मात करता है। उसकी चिकनी त्वचा पिघले हुए सोने के समान है और उसकी पतली कमर, पुष्ट नितंब और भरपूर स्तन उसे अतुलनीय सुंदरी बनाते हैं।


हे रावण, सीता के समान सुंदर स्त्री कोई भी नहीं है। मुझे पता है कि यदि आप उसे एक बार देख लें, तो आप उसके प्रेम में पागल हो जायेंगे। वह आपके लिए एक आदर्श पत्नी है। मैं सीता को पकड़कर आपके पास लाना चाहती थी. परंतु जैसे ही मैंने ऐसा करने का प्रयास किया, लक्ष्मण ने मेरा रूप बिगाड़ दिया। मेरे प्यारे भैया, यदि आप स्वयं को उतना ही पराक्रमी और शूरवीर समझते हैं, जितना कि आप अपने बारे में बखान करते हैं, तो आप वहाँ जाकर सीता का अपहरण कर लाओ ।


यह सुनकर, रावण ने सीता को पाने का दृढ़ संकल्प कर लिया। वह एक बार फिर अपने रथ पर बैठा और समुद्र पार करके मारीच के आश्रम पहुँच गया। ऋषि के समान वेश धारण करके, तपस्या करने में लगे मारीच ने रावण का आदरपूर्वक स्वागत किया और उससे पूछा, "हे राजन, मेरी तुच्छ कुटिया में आपके इतनी जल्दी वापस लौट आने का क्या कारण है ?"


रावण बोला, "राम द्वारा जनस्थान में राक्षसों का संहार किए जाने की घटना सुनने के बाद से, मुझे एक क्षण के लिए भी शान्ति नहीं मिली है। मैंने सीता का अपहरण करने का निश्चय किया है और मैं तुम्हारी सहायता चाहता हूँ।  


इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए, मैंने एक बहुत चतुराई भरी योजना बनाई है। मैं चाहता हूँ कि तुम चांदी जैसे धब्बे वाले सोने के एक हिरण का रूप धारण करो और फिर सीता के सामने जाकर खेलो-कूदो। इतने सुंदर और प्यारे जीव को देखकर निश्चित ही उसका मन मंत्रमुग्ध हो जायेगा और वह उसे पालना चाहेगी।


इसके बाद तुम राम को वन में भटका देना, तभी मैं वहाँ जाकर अकेली रह गई सीता का अपहरण करके उसे लंका ले जाऊँगा। इसके बाद, राम दुख से पागल हो जायेगा और अपनी प्रिय पत्नी से बिछुड़ने के शोक में दुर्बल हो जायेगा और तब मैं आसानी से उसका वध कर दूँगा।"


राम का नाम सुनकर और रावण की योजना पर विचार करके, मारीच अत्यन्त भयभीत हो उठा और डर से उसका गला सूख गया। रावण को अपलक घूरते हुए, मारीच ने दोनों हाथ जोड़कर रावण से कहा, “हे स्वामी, यदि आप अपनी योजना पर अमल करेंगे, तो यह लंका सहित सभी राक्षसों के विनाश का कारण बन जायेगी। अपनी वासना के वशीभूत होकर और राम की शक्तियों से अनजान होने के कारण, आप बिना सोचे-विचारे अनर्थ के मार्ग पर बढ़ रहे हैं। इससे पहले कि आप आँख मूंदकर स्वयं अपने विनाश को निमंत्रित करें, कृपा करके राम की असीमित शक्तियों के बारे में मेरी बात ध्यान से सुनें।


राम को देखने से पहले, मैं अपने हाथ में गदा लिए और अपनी अतिमानवीय शक्ति पर दंभ भरते हुए, पृथ्वी पर विचरण करता था। मैं दंडकारण्य के ऋषियों का मांस खाकर जीवित रहता था। भय के कारण, विश्वामित्र ने महाराज दशरथ के पास जाकर अपने यज्ञ अनुष्ठानों की सुरक्षा के लिए उनसे राम को भेजकर सहायता करने का अनुरोध किया।


इसके बाद, जब मैं यज्ञ में विघ्न डालने पहुँचा, तो राम ने अपने एक ही बाण से मुझे समुद्र में फेंक दिया। राम से बच जाने पर, मैं लंका लौट आया, परंतु तब भी मेरा अहंकार समाप्त नहीं हुआ था। मैं आग सी दहकती जीभ वाले एक विशाल, नरभक्षी बारहसिंघा का रूप धारण करके दंडकारण्य में विचरण करने और ऋषियों का खून पीने के लिए वापस चला गया।


तब, एक बार फिर से, सीता और लक्ष्मण के साथ वन में विचरण करते राम से मेरा सामना हुआ। मेरे मन में यह विचार उठा कि भला किस कारण से उन्होंने संन्यास ग्रहण किया है, परंतु मैंने उनसे बदला लेने का निश्चय किया। परंतु जैसे ही मैं उन पर आक्रमण करने के लिए झपटा, तो राम ने तत्काल तीन बाण चलाकर मेरे दोनों साथियों का वध कर डाला। मैं अपनी जान बचाकर वहाँ से भागा और मैंने सोचा कि संभवतः मेरे प्राण इसलिए बच गये क्योंकि शायद राम के बाण युद्ध-क्षेत्र से भागने वाले के प्राण नहीं लेते।


उस समय से, मैं राम का नाम सुनते ही भयभीत हो जाता हूँ और इसी के परिणामस्वरूप हिंसा करने और युद्ध करने की मेरी इच्छा समाप्त हो गई है। मैंने दूसरों का अमंगल करना छोड़कर, योग अभ्यास का एक तपस्वी जीवन जीना आरंभ कर दिया। परंतु, अब तक मुझे मानसिक शान्ति नहीं मिल पाई है, क्योंकि जब भी मेरी दृष्टि किसी वृक्ष पर पड़ती है, तो मुझे लगता है कि यह वृक्ष की छाल पहने राम हैं। इस प्रकार, सम्पूर्ण वनक्षेत्र हो अगणित रामों में बदल गया है और इस कारण से मैं किसी भी दिशा में देखते ही भयभीत हो जाता हूँ।


कभी-कभी मुझे अपने स्वप्न में भी राम दिखाई पड़ते हैं और ऐसा होते हो डर के मारे मेरी नींद टूट जाती है और डर से मेरा हृदय जोर-जोर से धड़कने लगता है। राम के नाम तक से मुझे इतना डर लगने लगा है कि 'र' अक्षर से शुरू होने वाले रथ या रत्न जैसे किसी शब्द तक को सुनकर मेरा हृदय काँपने लगता है। 


हे राजन, मैं आपको स्वयं आपके और अपने कल्याण के लिए सीता का अपहरण करने की बात भूल जाने की सलाह देता हूँ। राम से डरने की बात छोड़ दी जाये, तो भी आप ऐसा पाप क्यों करना चाहते हैं? दूसरे व्यक्ति की पत्नी का अपहरण करने से अधिक दंडनीय कुछ भी नहीं है। आप अपनी हजारों पत्नियों से संतुष्ट रहें और अपनी गरिमा, सौभाग्य, राज्य और अपने प्राणों की रक्षा करें।


मारीच की बात बहुत ध्यान से सुनने के बाद, रावण बोला, ऐ मारीच, मैंन तुमसे तुम्हारी सलाह नहीं माँगी है, वरन सीता का अपहरण करने में सहायता मांगी है। मेरे मंत्री होने के कारण, तुम्हारा दायित्व है कि तुम मुझे केवल तभी सलाह दो, जब तुमसे सलाह माँगी जाये और बिना कोई प्रश्न किए मेरी आज्ञा का पालन करो। मैं निश्चय कर चुका हूँ और अब कोई भी चीज मुझे पीछे नहीं हटा सकती। मैं चाहता हूँ कि तुम एक हिरण का रूप धरकर सीता का मन मोह लो ।


इसके बाद, जब वह राम से तुम्हें पकड़कर लाने का अनुरोध करेगी, तो तुम राम को घने वन की ओर ले जाना और 'हे सीता! हे लक्ष्मण!' कहकर चीखना। अपने भाई को मुसीबत में जानकर, लक्ष्मण सीता को अकेली छोड़कर राम की सहायता करने चला जायेगा। मेरी बस इतनी-सी सेवा करो और बदले में, मैं तुम्हें अपना आधा राज्य दे दूंगा। परंतु यदि तुम ऐसा करने से मना करते हो, तो मैं आज ही तुम्हारा वध कर दूँगा ! अब चुनाव तुम्हारा है, मारीच, या तो मेरे हाथ से तुम्हारी मृत्यु निश्चित है या फिर राम के हाथों मृत्यु होने की आशंका भर है। सोच लो !


मारीच निडर होकर बोला, "चापलूस आसानी से मिल जाते हैं, परंतु व्यक्तिः के कल्याण के लिए कटु शब्द बोलने वाला व्यक्ति विरले ही मिलता है। एक मंत्री को हमेशा अच्छी सलाह देनी चाहिए, भले ही उसे ऐसा करने को न कहा जाये और खास तौर पर तब जबकि राजा भ्रमित हो गया हो। दुर्भाग्यवश, अपरिहार्य रूप से ऐसा ही होता है कि जब भी किसी व्यक्ति के सिर पर मौत मंडरा रही हो, तब वह अच्छी सलाह नहीं मानता है।


हे राजन, यदि हम आपकी योजना पर अमल करते हैं, तो हम दोनों की ही मृत्यु निश्चित है। फिर भी, यहाँ पर तुम्हारे हाथों मारे जाने से बेहतर है कि मैं युद्ध-क्षेत्र में एक पुण्यात्मा शत्रु के हाथों मरूँ, इसलिए चलो, अभी तत्काल यहाँ से चलते हैं।


मारीच के सहयोग देने पर राजी हो जाने से अत्यन्त प्रसन्न होकर रावण ने उसे गले से लगाया। इसके बाद, वे दोनों, रावण के हवा में उड़ने वाले रथ पर बैठकर चल पड़े। अगणित जंगलों, नदियों, कस्बों और खेतों को पार करने के बाद, वै दंडकारण्य में सोता, राम और लक्ष्मण के निवास-स्थल के पास उतरे।


रथ से उतरने के बाद, मारीच ने स्वयं को एक सुंदर हिरण में बदल लिया और वह राम की कुटिया के पास बहुत मोहक ढंग से आगे-पीछे उछल-कूद करने लगा। उस सुनहरे हिरण के शरीर पर ढेरों रत्न- समान चांदी जैसे धब्बे थे और उसके सॉंगों के सिरे नीलम मणि के समान थे। उसका मुँह गुलाबी रंग के कमल के फूल जैसा दिखता था और उसकी पूंछ इंद्रधनुष के समान रंग-बिरंगी थी जबकि उसके कान चटख नीले रंग के थे। कुल मिलाकर कहें, तो उसे देखकर ऐसा प्रतीत होता था मानो बहुमूल्य रत्नों और मणियों से एक चमत्कारी हिरण निर्मित कर दिया गया हो। चमचमाते हुए उस हिरण ने कुटिया के आस-पास की सारी जगह को जगमगा दिया था। कभी वह घास चरता, तो कभी वृक्षों के बीच उछल-कूद करने लगता।


सीता आम के कुंज में अशोक और कर्णिकार के वृक्षों से फूल इकट्ठा कर रही थी कि तभी हिरण का रूप धारण किए हुए मारोच कूड़ते दौड़ते और दुबककर बैठते हुए सीता का ध्यान अपनी ओर खींचने में लग गया। वेश बदलकर आये राक्षस की गंध पाते ही, दूसरे हिरण तितर-बितर होकर जल्दी से जंगल में भाग गये। जब चमत्कारी हिरण अचानक बहुत पास आ गया, तो सीता आश्चर्यचकित होकर, मंत्रमुग्ध-सी उसे देखती रह गई।


सीता ने कभी भी ऐसा चमत्कारी हिरण नहीं देखा था और वह आँखें फाड़कर उसे देखती हुई चिल्ला उठी, "राम, लक्ष्मण, तत्काल यहाँ आओ!


जब लक्ष्मण ने वहाँ पहुंचकर हिरण को देखा, तो वह बोले, यह छल है! निश्चित ही हिरण के वेश में बदला लेने को आतुर, यह मारीच नाम का राक्षस है। वह जंगल में शिकार करने आने वाले राजाओं को रास्ता भटकाने की ताक में रहने के लिए, ऐसे रूप बदलने में माहिर है।


हिरण की सुंदरता देखकर सीता की बुद्धि भ्रमित हो गई थी, इसलिए वह लक्ष्मण को टोककर बोली, "हे राम, कृपा करके जल्दी जायें और इस हिरण को पकड़ें क्योंकि इसने मुझे मोहित कर लिया है। मैं इसे पालना चाहती हूँ ताकि यह इस उबाऊ वनवास से मेरा ध्यान भटकाकर मुझे प्रसन्न करे। यदि आप इस हिरण को जीवित पकड़ लेते हैं, तो वनवास की अवधि समाप्त होने के बाद मैं इसे अपने साथ अयोध्या लेकर जाऊँगी क्योंकि इसे देखकर भरत और हमारी माताओं को बहुत खुशी होगी। हे राम, दया करके, मुझे यह हिरण ला दें ताकि मैं इसके साथ खेलकर मन बहला सकूं। यह कितना प्यारा है और इसकी त्वचा चंद्रमा के समान दमकती है। 


हे स्वामी, यदि आप इस हिरण को जीवित न पकड़ सकें, तो इसे मार दें ताकि मैं इसकी रत्न- समान जगमगाती खाल का आसन बना सकूं। आप सोचते होंगे कि मैं कितनी मूर्ख हूँ, परंतु मुझे यह हिरण किसी भी मूल्य पर चाहिए क्योंकि मैं इसकी सुंदरता देखकर मुग्ध रह गई हूँ।


सीता की इच्छा पूरी करने का मौका देखकर राम प्रसन्न हुए और वह भी हिरण की रहस्यमय सुंदरता को देखकर मुग्ध हो गये थे। वह लक्ष्मण से बोले, "सीता बहुत रोमांचित है, इसलिए मैं उसके लिए यह हिरण अवश्य लेकर आऊँगा। इसकी जीभ देखो, ऐसा लगता है मानो आग की लपट हो या फिर जैसे बादलों के बीच बिजली की चमक हो। ऐसा हिरण तो कहीं भी नहीं मिल सकता है, यहाँ तक कि स्वर्ग के नंदन वन या चैत्ररथ वन में भी नहीं मिल सकता। निश्चित ही, इस हिरण की सुंदरता इसके प्राण ले लेगी। मैं इसकी चित्तीदार सुनहरी खाल का आसन बनाऊँगा ताकि सीता और मैं उस पर एक साथ बैठकर आनंदित हो सकें और यदि तुम्हारी बात सत्य हुई कि यह हिरण वास्तव में मारीच निकला, तो इसका वध करना वन में रहने वाले ऋषियों के लिए हितकारी होगा। हे लक्ष्मण, मेरे वापस लौटने तक, अपने हाथ में धनुष लेकर यहीं रहो और ध्यान से सीता की रखवाली करो।


यह कहकर, राम ने एक तलवार, धनुष और दो तरकश उठाए और तभी मारीच अचानक ही दृष्टि से ओझल हो गया। राम ने जैसे ही वन में प्रवेश किया, तो हिरण फिर से दिखाई देने लगा। वह बीच-बीच में पीछे देखता हुआ तेजी से भाग रहा था। इसके बाद, हिरण राम के बहुत पास आ गया मानो उन्हें उकसा रहा हो कि वह उसे पकड़ लें। परंतु, जैसे ही राम उस हिरण की तरफ दौड़े, वह एक बार फिर ओझल हो गया। इस प्रकार, वह कभी दिखने लगता और कभी ओझल हो जाता और यही क्रम दोहराते हुए मारीच राम को ललचाकर उन्हें उनकी कुटिया से दूर ले आया। हिरण की उलझाने वाली चाल से भ्रमित होकर, राम असहायता और क्रोध का अनुभव करने लगे।


अंततः, हिरण का पीछा करते-करते थककर, राम एक पल विश्राम करने के लिए एक वृक्ष के नीचे रुके। तभी वह हिरण फिर से बहुत पास में दिखाई दिया, 


परंतु जैसे ही राम ने उठकर उसे पकड़ने का प्रयास किया, तो वह रहस्यमय ढंग से ओझल हो गया। हताश होकर, राम ने हिरण को जीवित पकड़ने की आशा त्याग दी। फिर जैसे ही हिरण कुछ दूरी पर दिखाई दिया, तो राम ने उसे मारने के लिए ब्रह्माजी का एक जगमगाता हुआ बाण उस पर चला दिया। राम के बाण से बचने के लिए मारीच ने हवा में ऊँची छलाँग लगाई, परंतु राम के बाण ने उसका हृदय वेध दिया। प्राणांतक रूप से घायल मारीच, जमीन पर गिरते ही अपने असली राक्षस रूप में आ गया। तभी उसे रावण का आदेश याद आया और मारीच ने राम की आवाज की नकल करके बहुत निराश स्वर में पुकारा, हे सीता! हे लक्ष्मण!


मारीच ने प्राण त्याग दिए और उसके इन शब्दों को सुनकर राम बहुत उद्विग्न हो गये और सोचने लगे, "भला इसे सुनकर सीता और लक्ष्मण क्या सोचेंगे ?" राम को सहसा अपने हृदय में भय की अनुभूति हुई और वह तत्काल अपनी कुटिया की ओर लौट पड़े।


इसी बीच, सीता ने मारीच की पुकार सुनी, तो उसने सोचा कि निश्चित ही राम सहायता के लिए पुकार रहे हैं। भय से आतंकित होकर वह लक्ष्मण के पास गई और उनसे आग्रह करके बोली, "जल्दी जाकर पता लगाओ कि क्या हुआ है! राम सहायता के लिए पुकार रहे थे। उन्हें तुम्हारी सहायता की आवश्यकता है! हे लक्ष्मण, मेरा हृदय बहुत जोर से धड़क रहा है और मेरी तो सांस ही रुक गई है। निश्चित ही राक्षसों ने राम को घेर लिया है।


परंतु, लक्ष्मण को केवल सीता की रखवाली करने के लिए राम का दिया आदेश याद था इसलिए वह अपनी जगह से हिले तक नहीं लक्ष्मण की यह उदासीनता देखकर, सीता और अधिक घबड़ाई और लक्ष्मण को अत्यन्त कटु शब्दों में धिक्कारती हुई बोली, तुम अब भी यहाँ पर खड़े क्यों हो? क्या तुम राम की मृत्यु चाहते हो? अब मैं समझी कि असल में तुम मित्र के वेश में अपने ही बड़े भाई के शत्रु हो। मेरे विचार से तुम यही चाहते हो कि राम मर जायें ताकि तुम मनचाहे ढंग से स्वतंत्र होकर मेरा उपभोग कर सको! अन्यथा तुम शीघ्र ही उनकी सहायता के लिए दौड़ पड़ते। शीघ्र ही जाओ, लक्ष्मण! जब मेरे पति के ही प्राणों पर संकट हो, तो भला मेरे जीवित और सुरक्षित रहने का क्या लाभ है ?


रोती हुई और भय से थर-थर काँपती सोता से लक्ष्मण बोले, "स्वयं पर नियंत्रण रखने का प्रयास करें! राम को कोई भी नुकसान नहीं पहुँचा सकता चाहे वह राक्षस हो या यहाँ तक कि स्वयं इंद्र और सभी देवतागण ही क्यों न हों। इस प्रकार की बातें नहीं करें। जो आवाज आपने सुनी वह हमें डराने के लिए उस कपटी मारीच का ही एक छल है। राम ने मुझे आपकी रक्षा करने का आदेश दिया हैं, इसलिए मैं यहाँ रहकर उनकी आज्ञा का पालन करूँगा।


डर के मारे, सचमुच ही सीता का विवेक नष्ट हो गया था। लक्ष्मण द्वारा उसे शांत करने के लिए कहे गये शब्दों ने, सीता के हृदय में घृणा और क्रोध को भड़का दिया। उसकी आँखें क्रोध से लाल हो गई।


सीता कुपित होकर चिल्लाई, "अरे निर्लज्ज, पापी! मेरा विचार है कि तू राम के दुर्भाग्य पर प्रसन्न हो रहा है। अन्यथा, तू इतने शांत ढंग से भला कैसे बात कर सकता है? अब मैं समझी कि बाकियों के साथ तू भी अपने बड़े भाई का विनम्र सेवक दिखने का ढोंग कर रहा है। राम के साथ आने के पीछे तेरा असली इरादा यह था कि मौका मिलते ही तू राम का वध कर दे और फिर मुझे अपनी वासना का शिकार बनाए।


शायद तू भरत का जासूस है। चाहे जो भी हो, परंतु तेरी पापपूर्ण लालसाएँ कभी पूरी नहीं होंगी! क्या तू सचमुच यह सोचता है कि कमलनयन राम की पत्नी बनने के बाद, मैं तुझे स्वीकार करूंगी? ऐसा होने से पहले मैं मर जाऊँगी। राम के बिना तो मैं एक पल के लिए भी जीवित नहीं रह सकती!


सीता के शब्द रूपी बाणों से लक्ष्मण का हृदय छलनी छलनी हो गया और दुख व क्रोध से काँपते हुए वह दोनों हाथ जोड़कर बोले, "हे मिथिला की राजकुमारी, आप मेरे लिए देवी समान हैं और इस कारण से मैं आपको कटु शब्द नहीं कह सकता। मैं जानता हूँ कि दो मित्रों के बीच मनमुटाव पैदा करना ही स्त्री का स्वभाव है। निश्चित हो स्त्रियाँ इतनी अस्थिर स्वभाव की और क्रूर - हृदय होती हैं कि जब उन्हें किसी वस्तु को लालसा हो, तो वे नैतिकता की समस्त सीमाओं का उल्लंघन कर बैठती हैं।


हे जनकपुत्री, आपने अपने जहर बुझे शब्दों से मुझे छलनी छलनी किया है, इसलिए मैं आपकी इच्छानुसार राम के पास जाऊँगा, परंतु मुझे भयानक अपशकुन दिखाई दे रहे हैं जो कह रहे हैं कि कुछ अनर्थकारी घटना घटने वाली है और मुझे भय है कि जब मैं राम के साथ वापस लौटूंगा, तो संभवतः आप हमें यहाँ नहीं मिलेंगी।


सीता ने अत्यधिक उत्तेजित होकर कहा, "यदि राम की मृत्यु हो गई, तो मैं पहाड़ से कूदकर पानी में डूबकर या विषपान करके अपने प्राणों का अंत कर दूंगी क्योंकि कोई अन्य व्यक्ति मेरा स्पर्श करे इससे बेहतर यह होगा कि मैं मर जाऊँ!


सीता की कटु और निष्ठुर बातें सुनकर लक्ष्मण अत्यन्त क्रोधित हो उठे। लक्ष्मण ने कर्तव्यपूर्वक उन्हें शांत करने का प्रयत्न किया, परंतु वास्तव में लक्ष्मण भी राम को देखने के लिए अत्यन्त व्यग्र थे और सीता बार-बार उन पर लांछन लगा रही थी, इसलिए अंततः लक्ष्मण वहाँ से चल पड़े और रावण को वह सुनहरा अवसर मिल गया जिसकी उसे उत्सुकता से प्रतीक्षा थी।


गेरुए वस्त्र धारण किए, अपने सिर के ऊपर केशों का जूड़ा बनाए, लकड़ी के खड़ाऊ पहने और दाहिने कंधे पर छाता टाँगे और बाएँ कंधे पर एक दंड व कमण्डल लिए हुए, रावण सीता के सामने एक घुमंतू साधु का वेश धारण करके आया। सीता कुटिया के अंदर बैठकर दुख से रोती-विलाप करती हुई बैठी थी कि तभी रावण उसके द्वार पर पहुँच गया।


डर के मारे, हवा चलनी बंद हो गई और पेड़ों के पत्तों तक ने हिलना-डुलना बंद कर दिया और गोदावरी नदी का जल मानो स्थिर और शांत हो गया। वैदिक मंत्रों का जाप करते हुए, रावण सीता के पास गया और सीता को निहारते हुए उसका हृदय कामदेव के बाणों से घायल हो गया।


रूपवती सीता को पाने की आशा से रावण बोला, "हे सुंदरी, इस भयानक वन में अकेली रहने वाली तुम कौन हो ? क्या तुम शील की देवी ही हो, या फिर यश की देवी कीर्ति हो, अथवा मायावी शक्तियों की देवी भूति हो, या कहीं तुम प्रेम की देवी रति हो ? कहीं तुम अपने कमल फूल के बिना बैठी स्वयं लक्ष्मी तो नहीं हो ?


तुम्हारी उज्ज्वल, श्वेत, सम दंत-पंक्ति चमेली की कलियों की भाँति हैं और तुम्हारी काली काली आँखें तुम्हारे कमल सदृश मुख पर मंडराते दो भौरों के समान हैं। तुम्हारी जंघाएँ लंबी, पतली और अत्यन्त सुंदर हैं जो बाल हाथियों की सूढ़ के समान प्रतीत होती हैं और तुम्हारे नितंब गोल और पुष्ट हैं। तुम्हारे कठोर और भरे हुए स्तन एक-दूसरे का स्पर्श करते हुए प्रतीत होते हैं और उनके चुचुक उभरे और तने हुए हैं। उनके नीचे इतनी पतली कमर है जिसे अंगूठे और तर्जनी से ही आसानी से मापा जा सकता है।


कोई भी मानवीय या यहाँ तक कि अप्सरा या देवी तक तुम्हारे रूप के सामने नहीं ठहर सकती और तुम्हारे इसी रूप ने मेरे हृदय को इस प्रकार विचलित कर दिया है जिस प्रकार कोई उफनती हुई नदी अपने किनारों को तोड़ने पर आमादा हो जाये। तुम यहाँ क्यों रह रही हो, जबकि किसी भी अन्य स्थान पर तुम आमान से ऐशो-आराम भोग सकती हो? तुम्हें किसी राजमहल में होना चाहिए, सर्वोत्तम वस्त्र और बहुमूल्य आभूषण धारण करने चाहिए और अगणित दासियों की सेवा प्राप्त करनी चाहिए। हे मधुर मुस्कान वाली देवी, अपने लिए एक योग्य पति चुनो और भयानक जीव-जंतुओं से भरे इस वन को त्याग दो।


इतने दुस्साहसपूर्ण ढंग से बोलने पर भी सीता ने अपने अतिथि का अच्छा स्वागत-सत्कार किया क्योंकि वह ब्राह्मण को रुष्ट नहीं करना चाहती थी। रावण को बैठने के लिए आसन देने और उसके पैर धोने के बाद, सीता ने उसे कुछ भोजन दिया और बोली, "हे ब्राह्मण, मेरा नाम सीता है और में मिथिला के उदार हृदय नरेश राजा जनक की पुत्री हूँ। नौ वर्ष की आयु में मेरा विवाह मेरे प्रिय पति राम से हो गया था। बाद में, मेरे ससुर महाराज दशरथ ने अपनी पत्नी कैकेयी के कहने पर उसके पुत्र भरत को राज-सिंहासन दे दिया और राम को चौदह वर्ष का वनवास दे दिया। 


अब आप कृपा करके मुझे अपना नाम बताएँ और वंश परिचय दें। हे ब्राह्मण, आप इस दंडकारण्य में क्यों पधारे हैं ?"


वह नकली ब्राह्मण बोला, "मैं राक्षस राज रावण हूँ और देवता तक मेरा नाम सुनकर भय से थर-थर काँपते हैं। हे परम सुंदरी, तुम्हें देखने के बाद, अब मैं अपनी अनगिनत रानियों के साथ आनन्द-भोग नहीं कर पाऊँगा। हे सीता, तुम मेरी पटरानी बन जाओ। मैं 5000 दासियों को तुम्हारे एक-एक इशारे का पालन करने के लिए तुम्हारे हवाले कर दूंगा। इस वन को छोड़कर, मेरे साथ लंका के मनोरम उद्यानों में आनन्द-भोग करो। "


रावण की बातें सुनकर सीता अत्यन्त क्रोधित हो उठी। अत्यधिक आवेश में आकर वह बोली, "मैं पूरी तरह से राम के प्रति समर्पित हूँ जो चट्टान की भाँति अडिग और समुद्र के समान अथाह और वट-वृक्ष के समान सबको शरण देने वाले हैं। मैं राम के प्रति एकनिष्ठ हूँ, जिनकी बाँहें पराक्रमी हैं, सीना अत्यन्त चौड़ा है, जिनका मुख पूर्णिमा के चंद्रमा के समान है, जो संयमी और सर्वगुण- संपन्न हैं।


राम समस्त पुरुषों में सिंह के समान शूरवीर हैं और तुम जो कि भेड़िए के समान कपटी हो, मुझ जैसी सिंहनी को पाना चाहते हो। क्या तुममें सूर्य को छूने या महेंद्र पर्वत को उठाने का साहस है? क्या तुम अपनी आँखों को सुई से वेध सकते हो या अपने वस्त्रों में लपलपाती अग्नि को रख सकते हो ? क्या तुम अपनी गर्दन में एक चट्टान बांधकर समुद्र के आर-पार तैर सकते हो ? तब भला तुम राम को पत्नी को भगाकर ले जाने का साहस कैसे कर सकते हो ?


राम यदि गरुड़ हैं, तो तुम कौए। राम यदि समुद्र हैं, तो तुम एक छोटा-सा नाला, राम यदि चंदन हैं, तो तुम कीचड़। यदि वह सोने के समान हैं, तो तुम लोहे जैसे, राम एक हंस की भाँति हैं, परंतु तुम गीदड़ से भी गये-बीते हो। तुम मेरा अपहरण कर सकते हो, परंतु जिस प्रकार मक्खी घी में तड़पते हुए मर जाती है उसी प्रकार तुम मेरा अपहरण करके स्वयं को नष्ट कर डालोगे।


सीता डर से थर-थर काँप रही थी, परंतु उसने दो टूक शब्दों में रावण को फटकार लगाई। सीता को और अधिक डराने के इरादे से रावण बोला, हे सुंदरी, मेरी बात सुनो। मैं धन-संपत्ति के देवता कुबेर का सौतेला भाई हूँ। उसे हराने के बाद, मैंने उसका पुष्पक विमान छीन लिया और अब वह मुझसे छुपकर कैलाश पर्वत के पास कहीं दुबका हुआ है। सभी देवी-देवता मुझसे डरते हैं और मैं जहाँ कहीं भी जाता हूँ वहाँ सूर्य की रोशनी भी चंद्रमा के समान मद्धम पड़ जाती है, हवा रुक जाती है और नदी बहना छोड़ देती है। राम की बिसात ही क्या है वह तो एक दुर्बल मनुष्य मात्र है और शीघ्र ही उसका अंत हो जावेगा। मेरे साथ आओ क्योंकि मेरे साथ तुम्हें स्वर्ग के आनन्द प्राप्त होंगे। मैं पूरे हृदय से तुम्हारी चाह करता हूँ इसलिए कृपा करके मुझे मत ठुकराओ।


सीता बोली, "यदि तुम सचमुच कुबेर के भाई हो, तो तुम ऐसी पापपूर्ण इच्छा कैसे रख सकते हो ? इंद्र की पत्नी का मान-हरण करने वाला भी जीवित बच सकता है, परंतु मुझे भ्रष्ट करने का प्रयास करने वाले का विनाश निश्चित है।"


अंततः, रावण सब्र का बाँध टूट गया। क्रोधित होकर उसने दस सिरों, बीस भुजाओं और पैने दाँतों वाला अपना महाकाय राक्षसी रूप प्रकट किया। इसके बाद वह बोला, यदि तुम तीनों लोकों में यशस्वी पति की कामना रखती हो, तो फिर तुम मुझे स्वीकार कर लो। मेरी सेवा करोगी, तो मैं कभी भी तुम्हें कोई कष्ट नहीं होने दूँगा। तुम भला एक ऐसे व्यक्ति को कैसे चाह सकती हो जिसे वनवास मिला है?


एक पल चुप रहने के बाद, रावण ने जल्दी से अपना बाँया हाथ बढ़ाकर सीता के बाल पकड़ लिए। रावण के आह्वान पर उसका सोने का रथ वहाँ आ गया। अपने दाहिने हाथ से सीता की हाथ पकड़कर रावण ने उनकी बाँहें धाम और रथ पर चढ़कर आकाश मार्ग से जाने लगा। किसी चोट खाए व्यक्ति की भाँति या फिर किसी पागल स्त्री की भाँति विलाप करती हुई सीता चिल्ला उठीं, "राम! राम। आप यहाँ आकर मेरी रक्षा क्यों नहीं करते ? आपको इस दुष्ट रावण को अवश्य दंडित करना होगा!


इसके बाद सीता ने घोर हताशा से वृक्षों, नदियों और पशु-पक्षियों को पुकारना आरंभ किया और उनसे राम को अपने अपहरण के बारे में सूचित करने को कहा। इसके बाद, सीता ने एक वृक्ष पर सो रहे जटायु को देखा। वह चिल्ला उठी, हे जटायु मैं जानती हूँ कि तुम रावण को परास्त नहीं कर सकते, परंतु दया करके राम को बताना कि रावण ने मेरा अपहरण कर लिया है।


सीता की चीख-पुकार सुनकर, जटायु जाग पड़े। जब उन्होंने देखा कि रावण किस प्रकार सीता को बलपूर्वक अपने साथ लेकर जा रहा है, तो उन्होंने राक्षस-राज को चुनौती देकर कहा, "अरे रावण, में गिद्धों का राजा जटायु हूँ, तूने किसी दूसरे व्यक्ति की पत्नी को हाथ लगाने का दुस्साहस भी कैसे किया ? सावधान! तू अपने हाथ में जहरीला साँप ले जा रहा है। मैं बूढ़ा हो गया हूँ जबकि तू जवान है और तेरे पास अस्त्र-शस्त्र हैं। परंतु, मैं तुझे सीता को इतनी आसानी से नहीं ले जाने दूँगा। मैं तुझे चेतावनी देता हूँ! अपने दुष्ट इरादों को त्याग दे, वरना मैं तुझे तेरे रथ से ऐसे फेंक दूंगा जैसे कि पका हुआ फल पेड़ से टपक पड़ता है।


यह चुनौती सुनकर, रावण क्रोध से जटायु की ओर बढ़ा। रावण और जटायु के बीच ऐसा घनघोर युद्ध छिड़ गया मानो दो पहाड़ एक-दूसरे पर टूट पड़े हों। रावण ने अनेक अस्त्र-शस्त्रों से जटायु पर प्रहार किए, जबकि महाकाय गिद्ध ने अपने धारदार नाखूनों और पंजों से राक्षस को घायल किया। हालांकि जटायु का शरीर अनगिनत बाणों से छलनी हो गया था, परंतु सीता को रावण के रथ पर बलपूर्वक ले जाया जाते देखकर, जटायु सारी पीड़ा सहन कर गये।


रावण पर हमला करते हुए जटायु ने उसके बाणों की वर्षा को अपने पंखों से तितर-बितर कर दिया और फिर अपने पैरों से रावण के धनुष के दो टुकड़े कर दिए। यह बढ़त पाकर, जटायु ने रावण का कवच तोड़ दिया और फिर उसके रथ में जुते घोड़ों को मार डाला। पराक्रमी जटायु ने रावण के रथ के टुकड़े करना जारी रखा और सारथी के सिर पर अपनी चोंच से प्रहार किया। इसके परिणामस्वरूप, रावण सीता को अपनी बाँहों में कसकर पकड़े हुए जमीन पर गिर गया। पराक्रम के इस अद्भुत प्रदर्शन को देखने वाले सभी जीवों और देवों ने जटायु की भूरि भूरि प्रशंसा की।


परंतु, वृद्धावस्था के कारण, जटायु थक गये थे। रावण अपनी शक्ति के बल पर एक बार फिर आकाश में उड़ने लगा। उसने अपने एक हाथ से सीता को जकड़ रखा था और दूसरे हाथ से तलवार चला रहा था। जटायु अचानक ही रावण के पीछे की तरफ झपटे और रावण के केशों को इतनी शक्ति के साथ पीछे खींचने लगे कि दर्द और पीड़ा से रावण ने अपने होंठ भींच लिए। सीता को अपनी बाँधी जाँच से चिपटाए हुए, रावण ने अपनी हथेली से जटायु पर पीछे की तरफ वार किया। जटायु इस वार से बच निकले और उन्होंने अपनी शक्तिशाली चोंच से रावण की बीसों भुजाओं को एक-एक करके नोंचकर उखाड़ना शुरू किया। रावण के उखड़ने वाले हाथ के स्थान पर तुरंत ही नए हाथ प्रकट हो जाते और फिर सीता को एक तरफ रखकर उसने जटायु पर मुक्के और लात बरसाना शुरू कर दिया।


यह युद्ध इसी प्रकार से लगभग एक घंटे चला। अंततः, हताशा से, रावण ने अपनी तलवार निकाली और तेज प्रहार करते हुए जटायु के पंख और पैर काट डाले जिससे गंभीर, मरणांतक घाव खाए जटायु जमीन पर गिर पड़े। अत्यधिक निराश होकर, सीता उस ओर भागीं जहाँ पर जटायु गिरे पड़े थे और फिर सीता ने जटायु को गले से लगा लिया और उनकी आँखों से आँसू वह निकले। रावण दौड़कर सीता के पास गया और उसके बाल पकड़कर उस पर अपना अधिकार जमा लिया।


जब सीता "राम ! राम" कहकर चिल्लाई तो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में ऐसी उथल-पुथल मची कि चारों ओर घना अंधकार छा गया। सीता की पीड़ा से सहानुभूति दर्शाते हुए, हवा रुक गई और सूर्य कांतिहीन हो गया। परंतु अपने दिव्य नेत्रों से सम्पूर्ण घटना को देख और समझ रहे भगवान् ब्रह्माजी बोले, हमारा उद्देश्य पूरा हो गया है।


रावण जिस समय सीता को आकाश मार्ग से लेकर उड़ा, तब सीता के आभूषण टूट गये और उनमें जड़े रत्न जमीन पर गिरने लगे। जब उनके सीने पर सुशोभित मोतियों की माला के दाने आकाश से गिरते शुद्ध गंगा जल की भाँति नीचे गिरने लगे। सीता भय और दुख से जकड़ गई थीं और रावण के चंगुल से छूटने के लिए लगातार संघर्ष करते हुए सीता ने रावण के इस अधम और कायरतापूर्ण कार्य के लिए उसे बार-बार फटकार लगाई। जिस समय रावण तेजी से अपनी लंका नगरी को भाग रहा था, उस समय मानो सभी जीवधारी शोकाकुल होकर विलाप करने लगे, "संसार से धर्म का, सत्य का और भद्रता का लोप हो गया है।"


सीता के खुले हुए बाल हवा से उड़ रहे थे, उनके माथे पर लगा तिलक मिट गया था और उनके मुख से मुस्कान विदा हो गई थी। इस दशा में, सीता आह भरकर बोली, "हे राम, हे लक्ष्मण।" उसी समय सीता ने एक पर्वत के शिखर पर पाँच वानर प्रमुखों को बैठे देखा। रावण से नजर बचाकर उन्होंने अपनी रेशमी ओढ़नी और कुछ आभूषण उतारकर उन वानरों के बीच इस आशा के साथ फेंक दिए कि वे ये वस्तुएँ राम को दे देंगे।


रावण अपने साथ सीता को लिए लंका की ओर बढ़ता रहा और वे वानर अपलक उसे सीता को ले जाते हुए देखते रहे।


समुद्र पार करने के बाद, राक्षस राज सीता को अपने राजमहल के अंदर के कक्षों में ले गया। वहाँ पहुँचकर उसने भयानक राक्षसी दासियों को आदेश दिया; "मैं चाहता हूँ कि तुम लोग इस स्त्री पर सावधानी से नजर रखो और मेरी अनुमति के बिना किसी को भी उससे मिलने मत देना। इसे सर्वोतम वस्त्र, आभूषण और भोजन दो और इसके अतिरिक्त यह सोना, मोती आदि जो कुछ भी चाहे इसे दे दो। परंतु एक बात कान खोलकर सुन लो अगर किसी ने भी सीता से एक भी कटु बात कहीं, तो मैं उसके प्राण ले लूँगा।


रावण ने आठ अत्यन्त शक्तिशाली राक्षसों को बुलाकर कहा, "राम ने जब से जनस्थान पर मेरे भाइयों और उनको सेना का संहार किया है, तब से ही वह मेरा घोर शत्रु बन गया है। जब तक राम की मृत्यु नहीं हो जाती, तब तक मैं किसी भी रात को शान्ति से नहीं सो पाऊँगा। अब जाओ और राम पर नजर रखो और तुम्हे जो भी सूचना मिले, मुझ तक पहुंचाओ।"


स्त्रियों के साथ अपने पिछले अनुभवों के कारण, रावण मूर्खतापूर्ण ढंग से यह सोचकर प्रसन्न हुआ कि अब सीता उसकी है। राक्षसों को भेजने के बाद, वह सीता को पाने की लालसा से उसके पास गया। रावण ने अनगिनत राक्षसियों से घिरी सीता को अत्यन्त दुखी स्थिति में देखा। आँसुओं से नहाई हुई सीता को देखकर लगता था मानो कोई नौका समुद्री तूफान से घिरी हुई हो या फिर अपने झुंड से बिछुड़े किसी मृग शावक के पोछे खूंखार कुत्ते पड़े हों। सीता को इच्छा के विरुद्ध रावण सीता को अपने राजमहल का दर्शन कराने ले गया।


सीता ने राजमहल के विशाल और अनुपम ढंग से सुसज्जित कक्षों को देखा जिनमें हजारों स्त्रियां थीं। सीता जिस समय यह सब देख रही थी, तब रावण बोला "लंका में बूढ़ों और बच्चों को छोड़कर बत्तीस करोड़ राक्षस रहते हैं, जिनमें से 1000 मेरे निजी सेवक हैं। हे अनुपम सुंदरी, सीता, यदि तुम बुद्धिमान हो, तो तुम अवश्य ही मेरी पटरानी बनने की मेरी उत्कट अभिलाषा पूरी करोगी। मेरी देवी बनकर, यहाँ दिख रहे समस्त ऐश्वर्य का भोग करो। मैं तुम्हारा प्रेम पाने की लालसा से पीड़ित हूँ और मैं सिर्फ तुम्हारा ही बनकर रहूँगा। मुझ पर अपनी दया दृष्टि करो और मुझ पर स्नेहपूर्ण दृष्टि डालो। युवावस्था का सौंदर्य अधिक समय तक नहीं रहता। तुम्हें मेरे साथ जीवन का आनन्द-भोग करना चाहिए और तुच्छ राम को भूल जाओ।


सीता अपना चंद्रमा समान मुख हाथों से ढंककर चुपचाप आँसू बहाने लगी। रावण बोलता रहा, "यह सोचकर भयभीत न हो कि हमारा मिलन धार्मिक सिद्धांतों के विरुद्ध है। मैं तुमसे अपने प्राणों से भी अधिक प्रेम करता हूँ। मैं तुम्हारे पैर पड़ता हूँ और विनती करता हूँ कि मुझ पर अपनी दया दृष्टि डालो। प्रेम की पीड़ा से उपजी मेरी इस याचना को न ठुकराओ। इस से पहले यह रावण कभी भी किसी स्त्री के सामने नहीं झुका है।


रावण ने सोचा कि सीता के प्रति अपने प्रेम के बारे में बात करने से वह आसानी से सीता को जीत सकता है। परंतु सीता ने बिना डरे कहा, "मैं, जो कि अपने साथी के साथ कमल के फूलों से भरी एक झील में क्रीड़ा करती हुई किसी हंसिनी के समान हूँ, भला झील के किनारे चक्कर काटते हुए बत्तख को क्यों पसंद करूँगी ? तुम मेरे साथ जो चाहे वह कर सकते हो, परंतु अपनी दुष्टता और पापमय वासना के कारण निश्चित ही राम के हाथों तुम्हारा शीघ्र विनाश हो जायेगा।


इतने कड़वे शब्दों से फटकारे जाने से रावण क्रोधित हो गया और बोला, "मैं तुम्हें बारह माह का समय देता हूँ कि तुम मुझे स्वीकार कर लो। इसके बाद भी यदि तुमने इंकार किया, तो मेरे रसोइए तुम्हारे टुकड़े-टुकड़े करके मुझे नाश्ते में दे देंगे।"


अपने सेवकों की ओर मुड़कर रावण ने आदेश दिया, "सीता को अशोक वाटिका ले जाओ। उस पर बहुत ध्यान से नजर रखो और उसके हृदय में मेरे लिए स्थान बनाओ भले ही ऐसा करने के लिए कुछ भी क्यों न करना पड़े। उसे डराओ- धमकाओ, प्यार से समझाओ-बुझाओ और जो भी संभव हो वह करो, परंतु उसे पालतू हाथी की तरह राजी करो। 


सीता अशोक वाटिका में रहने चली गई। अशोक वाटिका फलों और फूलों से लदे हुए वृक्षों से आच्छादित बहुत ही सुंदर बगीचा था। सीता पहले ही बहुत अधिक दुखी थी और ऊपर से कुरूप राक्षसियाँ उसे डराने-धमकाने लगीं, तो वह भयभीत होकर मूर्च्छित हो गई।


इसी बीच, ब्रह्माजी ने इंद्र को बुलाया और उनसे बोले, "रावण ने सीता का अपहरण कर लिया है। यह हमारा सौभाग्य है क्योंकि इससे राक्षस-राज रावण का विनाश सुनिश्चित हो गया है। परंतु एक खतरा अब भी मौजूद है कि राम से बिछुड़ने के दुख से कहीं सीता अपने प्राण न त्याग दें, इसलिए मैं चाहता हूँ कि आप वहाँ जायें और उसे यह दिव्य खीर खाने को दें।


इंद्र निद्रा की देवी के साथ अशोक वाटिका में गया। निद्रा देवी ने अपनी माया से सभी राक्षसी पहरेदारों को गहरी नींद में सुला दिया, तब इंद्र एक ब्राह्मण के वेश में सीता के पास पहुँचकर उससे बोले, "मैं स्वर्ग का राजा इंद्र हूँ और में यहाँ भगवान् राम की सहायता करने आया हूँ। कृपा करके यह दिव्य खीर खा लें, क्योंकि इसे खाने के बाद आपको अगले कई वर्ष तक कभी भूख या प्यास नहीं लगेगी और अन्य शारीरिक कष्ट नहीं होंगे। 


सीता को सन्देह हुआ कि वह ब्राह्मण सच में इंद्र है या नहीं, इसलिए उन्होंने उन्हें अपने दिव्य रूप में प्रकट होने को कहा। यह अनुरोध सुनकर, इंद्र अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुए। सीता ने देखा कि उनके पैर जमीन का स्पर्श नहीं कर रहे हैं, उनकी माला के फूल पूरी तरह से ताजा हैं और उनके वस्त्रों पर धूल का एक कण तक नहीं हैं। यह देखकर सीता संतुष्ट हो गई और खीर खाने के लिए तैयार हो गई।


सीता ने सबसे पहले राम और लक्ष्मण को खीर अर्पित करके यह प्रार्थना की कि वे इसे स्वीकार करें। इसके बाद जैसे ही सीता ने यह प्रसादम् खाया, तो वह समस्त प्रकार को शारीरिक व्याधियों से मुक्त हो गई। कार्य पूरा हो जाने पर, इंद्र और निद्रा देवी तत्काल ही वहाँ से अंतर्ध्यान हो गये।


इसी बीच, मारीच का वध करके राम शीघ्रता से अपनी कुटिया की ओर लौट पड़े। उन्होंने सोचा, "मैं जानता हूँ कि जनस्थान पर मेरे द्वारा राक्षसों की सम्पूर्ण सेना का संहार किए जाने के कारण राक्षस निश्चित हो मुझसे बदला लेना चाहते हैं। मारीच का यह छल निश्चित ही ऐसी किसी योजना का अंग होगा जिससे मुझे सीता से दूर करके वे उसे खा सकें। मुझे मात्र यही आशा है कि मेरी आवाज को नकल करके मारीच द्वारा लगाई गई गुहार को सुनकर लक्ष्मण ने सीता को अकेला नहीं छोड़ दिया होगा।


राम के मन में गहरा सन्देह हो रहा था कि तभी उन्हें अपने पीछे से एक भेड़िए की हुंकार सुनाई दी, जिसे सुनकर उनके मन में अपशकुन का और अधिक भय व्याप्त हो गया। पशु-पक्षी डर से चीखते हुए राम के दाहिनी ओर से जाने लगे। उनकी बाँयाँ आँख और बाँयी भुजा बार-बार जोरों से फड़कने लगी और उनके हृदय की धड़कनें तेज हो गई। राम अभी इन सभी अपशकुनों का अनुभव कर ही रहे थे कि तभी उनकी भेंट लक्ष्मण से हो गई जो कुटिया से उनकी तरफ आ रहे थे।


लक्ष्मण का बायाँ हाथ पकड़कर, राम ने उन्हें डाँटते हुए कहा, "तुमने मेरी आज्ञा का उल्लंघन क्यों किया और सीता को असुरक्षित स्थिति में छोड़कर क्यों आ गये ? मुझे जितने अपशकुन दिख रहे हैं, उनके आधार पर मैं कह सकता हूँ कि या तो उसका वध कर दिया गया है अथवा अपहरण कर लिया गया है। आह, लक्ष्मण, तुम सीता को अकेला छोड़कर कैसे आ गये ?


कुटिया की ओर वापस लौटते समय, जंगल के रास्ते पर राम लड़खड़ाए। सीता की सुरक्षा को लेकर बहुत अधिक चिंतित होकर और उसे अकेला छोड़कर चले आने के लिए लक्ष्मण से रुष्ट होकर, राम किसी पागल की भाँति विलाप करने लगे, "यदि सीता की मृत्यु हो गई होगी, तो मैं स्वयं को भी मार डालूँगा! में उसके बिना जीवित रहने की बात तक नहीं सोच सकता! आह, लक्ष्मण, तुम मुझे इस तरह से धोखा कैसे दे सकते हो और मेरी प्रिय सीता को अकेला छोड़कर कैसे चले आये ?"


लक्ष्मण ने सारी घटना बताने का प्रयास करते हुए कहा, "मदद के लिए आपकी पुकार सुनकर, सीता मानो पागल हो गई थीं और उन्होंने मुझसे अत्यन्त कड़वी और लज्जाजनक बातें कहीं। उन्होंने मुझ पर अपने कटु शब्दों के बाण चलाए और आरोप लगाया कि मैं आपको मौत के मुँह में अकेला छोड़ देना चाहता हूँ ताकि आपकी मृत्यु के बाद मैं उनका आनन्द-भोग कर सकूं। इसके बाद उन्होंने मुझ पर भरत का मित्र और छद्म मित्रता के वेश में आपका शत्रु होने का आरोप लगाया। उनके आरोप निराधार हैं यही प्रमाणित करने के लिए मैं आपकी सहायता करने आ गया।"


बहुत अधिक खिन्न होकर और आवेश से भरकर राम ने कठोर शब्दों में कहा, "सीता को अकेला और असहाय छोड़ने के लिए यह कोई उचित स्पष्टीकरण नहीं है। तुम जानते हो कि मैं अपराजेय हैं और राक्षसों से स्वयं की रक्षा करने में पूर्णतः समर्थ हूँ। स्त्री के क्रोध से उत्तेजित होकर, तुम्हें मेरे आदेश की अवहेलना नहीं करनी चाहिए थी। हे लक्ष्मण, तुमने अपने स्वभाव के विपरीत इस प्रकार का मूर्खतापूर्ण आचरण करके भारी भूल कर दी।"


इस प्रकार से वार्तालाप करते हुए, राम व लक्ष्मण अपनी कुटिया को वापस लौटे और वहाँ पहुँचकर देखा कि कुटिया खाली है। उत्तेजित होकर राम ने आस- पास के पूरे क्षेत्र में खोज-पड़ताल करनी शुरू कर दी और जब वह सीता को ढूंढने में असफल रहे, तो उनका चेहरा मुरझा गया और दुख के कारण काला पड़ गया। 


बिछोह के कारण पैदा हुए आध्यात्मिक उन्माद से अभिभूत होकर, राम ने वृक्षों से पूछना आरंभ किया, “हे कदंब, हे बिल्व, हे अर्जुन, क्या आपने मेरी प्रिय सीता को पीली साड़ी पहने और अपने केशों में फूल लगाए हुए, इस रास्ते से जाते देखा है ?


कोई उत्तर न पाकर, राम ने पशु-पक्षियों से पूछना आरंभ किया और जब उन्होंने भी कोई उत्तर नहीं दिया, तो राम का दुख और अधिक गहरा गया। कभी- कभी राम को ऐसा लगता कि मानो उन्हें सीता की एक झलक दिखी है और ऐसा होने पर वह चिल्ला उठते, "हे प्रिये, तुम मुझसे दूर क्यों भाग रही हो और क्यों लुक-छिप रही हो? तुम मुझसे बात क्यों नहीं करती ?


राम के मन में एक बार फिर यह विचार उठा कि राक्षसों ने सीता को खा लिया है और यह विचार आने पर उनके हृदय पटल पर सीता के कोमल अंगों के चित्र उभर आये। राम और लक्ष्मण लगातार आस-पास की पहाड़ियों और जंगलों में सीता को ढूँढ रहे थे क्योंकि उन्हें सीता को खोज लेने की आशा थी। परंतु अच्छी तरह सब जगह खोज लेने पर भी जब सीता नहीं मिली, तो राम निराश हो गये और घोर हताशा में वह जमीन पर बैठ गये। परंतु लक्ष्मण ने राम को सीता की खोज करने के लिए उत्साहित किया और फिर वे कुछ और वनों, पहाड़ियों और मैदानों में भटके।


अंततः राम ने आस छोड़ दी और गहरे दुख में डूबकर सोचने-विचारने में असमर्थ होकर, बेजान मूर्ति की भाँति बन गये गहरी साँसे छोड़ते हुए और आँसू भरे नेत्रों के साथ, राम ने लक्ष्मण के इन आश्वासनों पर ध्यान देना बंद कर दिया कि वे लोग सीता को निश्चित हो खोज निकालेंगे। प्रेम की मार से पीड़ित होकर, राम असहाय स्वर में बार-बार "सीता सीता" की पुकार करने लगे। इसके बाद, पागलपन की सी स्थिति में, राम चिल्लाए, "मेरी प्रिये, क्या तुम मेरे साथ लुका- छूपी खेलने का आनन्द ले रही हो? मैं विनती करता है, दया करके इसी समय मेरे पास आ जाओ ताकि मुझे इस असहनीय पीड़ा से छुटकारा मिल सके।


जब सीता नहीं आई, तो राम और अधिक निराश हो गये और उन्हें विश्वास हो गया कि निश्चित हो राक्षसों ने उसे खा लिया है। राम अत्यन्त क्षुब्ध, दुखों और हताश होकर विलाप करने लगे और यह देखकर लक्ष्मण का हृदय भी दुख से भर गया। राम बोले, "हे लक्ष्मण, कृपा करके गोदावरी नदी के तट पर जाओ। संभवतः सीता वहाँ पर कमल के फूल एकत्रित करने गई होगी।


कुछ समय बाद, जब लक्ष्मण खाली हाथ वापस लौटे, तो राम स्वयं नदी के तट पर गये और वहाँ उन्होंने वृक्षों और पशु-पक्षियों से पूछना आरंभ किया। रावण के भय से किसी ने भी कोई उत्तर नहीं दिया, परंतु तभी राम ने देखा कि एक हिरण उन्हें अर्थपूर्ण नजरों से देख रहा था। राम ने हिरण से पूछा और उसकी आँखों में झांककर उसका उत्तर पढ़ने का प्रयास करने लगे। हिरण ने ऊपर और दक्षिण दिशा की ओर देखकर मानो राम को उत्तर दिया, मानो वह कह रहा हो कि सीता को आकाश मार्ग से दक्षिण दिशा की ओर ले जाया गया है।


लक्ष्मण हिरण के संदेश को समझ गये, इसलिए उन्होंने राम से कहा कि उन्हें दक्षिण दिशा की ओर जाना चाहिए क्योंकि वहाँ सीता का पता मिलने की आशा है। वहाँ से प्रस्थान करने के पश्चात्, वे शीघ्र ही एक स्थान पर पहुँचे जहाँ इधर-उधर फूल बिखरे हुए थे जिन्हें देखते ही राम पहचान गये कि उन्होंने ही ये फल सीता को दिए थे। पास में ही स्थित, प्रश्रवण नामक पर्वत को संबोधित करके, राम ने पूछा, "इस रास्ते से होकर सीता कहाँ गई है ?"


जब राम को कोई उत्तर नहीं मिला, तो वह अत्यन्त क्रोधित हो गये और ललकारते हुए बोले, "हे पर्वत, यदि तुमने उत्तर नहीं दिया तो मैं अपने बाणों से तुम्हें चूर-चूर कर डालूँगा !"


पर्वत के चारों तरफ सन्नाटा छाया रहा और लाल-लाल आँखों से पर्वत को देखते हुए और उसे चूर-चूर कर डालने के लिए राम अपने बाण चलाने ही वाले थे, कि तभी लक्ष्मण ने सीता के और एक विशालकाय राक्षस के दौड़ते हुए जैसे पदचिन्हों की ओर संकेत किया। इन पदचिह्नों का पीछा करते हुए वे उस स्थान तक पहुँचे जहाँ रावण का टूटा हुआ धनुष और तरकश पड़ा था और साथ ही उसके रथ का टूटा हुआ हिस्सा और सीता के आभूषण बिखरे हुए थे। राम ने वहाँ पर रक्त की बूंदें भी देखीं जिन्हें देखकर उन्होंने यही सोचा कि निश्चित ही राक्षसों ने सीता को खा लिया है, क्योंकि वहाँ का दृश्य देखकर ऐसा लग रहा था मानो इस स्थान पर सीता को खाने के लिए दो नरभक्षियों के बीच युद्ध हुआ था।


राम ने वहाँ पर मरे हुए घोड़े, टूटा हुआ रथ और बिखरे हुए अस्त्र-शस्त्र देखें, तो अत्यन्त कुपित होकर उन्होंने प्रतिज्ञा की, "कोई भी राक्षस मेरे क्रोध की ज्याला से नहीं बचेगा, क्योंकि सीता का वध करने के दंडस्वरूप में आज ही उन सबको नष्ट कर डालूंगा। मेरी असहाय पत्नी की रक्षा करने के लिए, इन अकर्मण्य देवी- देवताओं ने क्यों नहीं कुछ किया? यदि देवतागण मेरी सीता मुझे इसी क्षण नहीं लौटाते हैं, तो उनकी इस लापरवाही के लिए और राक्षसों द्वारा सीता को खा लिए। जाने का बदला लेने के लिए, मैं सम्पूर्ण ब्रह्मण्ड को नष्ट कर डालूँगा।"


राम की आँखें क्रोध से लाल हो गई और उनके कसकर भिंचे हुए होंठ गुस्से से काँपने लगे। लक्ष्मण के हाथ से अपना धनुष लेकर, राम ने एक इतने शक्तिशाली बाण को इसकी प्रत्यंचा पर रखा जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का विनाश करने में सक्षम था।


भय से आक्रांत होकर, लक्ष्मण ने प्रार्थना की मुद्रा में दोनों हाथ जोड़ लिए और विनती करने लगे, "मेरे प्रिय राम, आप स्वभाव से सौम्य व आत्म-नियंत्रित हैं और समस्त जीवधारियों का कल्याण चाहने वाले हैं। कृपा करके अपने क्रोध पर नियंत्रण करें और ध्यान से सोच-विचारकर ही कार्य करें। मुझे ऐसा जान पड़ता है कि यहाँ पर हुए युद्ध में सिर्फ एक राक्षस था, क्योंकि यहाँ पर केवल एक ही टूटे हुए रथ का मलबा गिरा हुआ है। आइए, थोड़ा और देखते हैं और फिर भी यदि आपको सीता के बारे में कोई संकेत नहीं मिलता, तब आपको जो उचित लगे वह करें।


मेरे प्रिय भाई, आपको संयम रखना चाहिए। आखिरकार, दुख तो अपरिहार्य है। यदि स्वयं आप ही जीवन के कष्टों को सहन करने में इतने असमर्थ हो जायेंगे, तो भला हम सामान्य लोगों से ऐसा करने की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं? कृपया केवल इस बात पर विचार करें कि आपके शत्रु का संहार कैसे हो सकता है। आपको भला अनावश्यक ही ब्रह्माण्ड का संहार करने की क्या आवश्यकता है?


यह बोलते हुए, लक्ष्मण ने अपने भाई के चरण कमलों की स्नेहपूर्वक मालिश की और सौभाग्यवश राम शांत हो गये। अपने धनुष से बाण हटाने के बाद, राम ने पूछा कि अब उन्हें आगे क्या करना चाहिए और तब लक्ष्मण ने सुझाया कि उन्हें सम्पूर्ण जनस्थान क्षेत्र में अच्छी तरह खोजबीन करनी चाहिए।


इसके बाद, वन में भटकते हुए, राम और लक्ष्मण रक्त के सरोवर के बीच जमीन पर गिरे पड़े जटायु के पास पहुँचे। पहले राम ने सोचा कि वह पक्षी के वेश में एक राक्षस है जो सीता का भक्षण करने के बाद थोड़ा विश्राम कर रहा है। परंतु, धनुष में बाण लगाए हुए राम जब उनके पास पहुंचे तो जटायु ने अपनी पहचान बताई और बताया कि कैसे प्राणांतक रूप से घायल होकर उन्होंने सीता को रावण के पंजों से बचाने का भरपूर प्रयास किया। सारी स्थिति समझ में आने पर, राम ने अपना धनुष पास में फेंक दिया। उन्होंने जटायु को गले से लगा लिया। अपने शुभचिंतक की करुण दशा देखकर, राम का दुख दो गुना हो गया।


राम ने बेचैन होकर पूछा, "मेरे प्रिय जटायु, क्या आप मुझे सीता और उसके अपहरणकर्ता के बारे में कुछ अधिक जानकारी दे सकते हैं ?


मरते हुए जटायु ने कहा, "रावण ने दिन की विंद घड़ी में सीता का अपहरण किया। यदि कोई व्यक्ति इस घड़ी में कोई चीज गंवा देता है, तो उसे निश्चित ही यह बहुत जल्दी वापस मिल जाती है। मेरे प्रिय राम, सीता के बारे में अत्यधिक निराश हताश न हों, क्योंकि राक्षसों के राजा को युद्ध में पराजित करके आप निश्चित ही सीता को पुनः प्राप्त कर लेंगे। 


इसके बाद, रावण के उदात्त वंश-वृक्ष का वर्णन करते हुए, बीच में ही अचानक "राम, राम" पुकारते हुए जटायु ने अंतिम साँस ली। 


राम ने लक्ष्मण से कहा, "सीता के अपहरण की घटना से भी अधिक दुख मुझे जटायु की मृत्यु से हुआ है क्योंकि उन्होंने मेरी खातिर अपने प्राण त्याग दिए। जाकर कुछ लकड़ियां लेकर आओ ताकि हम उनका दाह संस्कार कर सकें। सभी को यह ज्ञात हो कि मेरी सेवा करने के पुरस्कारस्वरूप जटायु को सर्वोच्च स्थान प्राप्त होगा।


लक्ष्मण ने चिता तैयार की और राम ने उस पर जटायु का शरीर रख दिया। लक्ष्मण ने अग्नि प्रज्ज्वलित की और फिर दोनों भाइयों ने जटायु की दिवंगत आत्मा के लिए आहुतियाँ दीं, जबकि राम ने वैदिक मंत्रोच्चार किया। इसके बाद राम और लक्ष्मण तर्पण करने के लिए गोदावरी नदी में गये और तर्पण करने के बाद उन्होंने स्नान किया। इस प्रकार, दाह-संस्कार संपन्न करके, राम और लक्ष्मण ने पुनः सीता को ढूंढने पर विचार करना आरंभ किया और इस कारण वे वन में आगे बढ़ते रहे।


दंडकारण्य से बाहर निकलकर, राम और लक्ष्मण दक्षिण-पश्चिम दिशा में आगे बढ़े। कुछ समय बाद, वे एक विशाल गुफा के सामने पहुँचे जिसके द्वार पर एक भयानक राक्षसी खड़ी थी। उस घृणित राक्षसी के तीक्ष्ण दाँत थे, एक बड़ी- सी बाहर को निकली हुई तोंद थी और खुरदुरी-कड़ी त्वचा थी। उसने अचानक लक्ष्मण का हाथ पकड़ लिया और बोली, "हे सुदर्शन पुरुष, इस रमणीय वन में मेरे साथ रंगरलियाँ मनाओ। 


यह कहकर, राक्षसी ने लक्ष्मण को गले से लगा लिया और आगे बोली, "मेरा नाम अयोन्मुखी है और मैं तुम्हारी हूँ। मुझे अपनी प्रियतमा पत्नी के रूप में स्वीकार करो।


लक्ष्मण ने गुस्से से अपनी तलवार निकाली और राक्षसी के कान, नाक और स्तन काट दिए। दर्द से बिलबिलाती हुई वह राक्षसी वहाँ से भाग गई और तब राम व लक्ष्मण ने सघन वन में आगे की यात्रा जारी रखी। तभी राम बोले, "मेरा बायां हाथ फड़क रहा है और मेरा मन अशांत हो रहा है। हे लक्ष्मण, हमें किसी भी आसन्न संकट के लिए तैयार रहना चाहिए।


एक ही क्षण बाद, वंजुलक पक्षी की डरावनी चीख सुनाई दी। लक्ष्मण बोले, 'यह इस बात का संकेत है कि विजय हमारी ही होगी।


कुछ दूर तक चल लेने के बाद, अचानक एक गर्जना सुनाई दी और एक तूफान उठने लगा। राम और लक्ष्मण ने हाथों में तलवार लेकर सावधानी के साथ यात्रा जारी रखी और इस प्रकार आगे बढ़ते हुए वे एक विशाल राक्षस के सामने पहुँच गये जिसके सिर, गर्दन और पैर नहीं थे और उसकी विशाल तोंद के बीच में एक बड़ा मुख था।


वह राक्षस पहाड़ जितना विशाल था और उसकी पूरी देह पर भालों के समान नुकीले बाल खड़े थे। उसके सीने पर दो आग-सी जलती आँखें थीं और उसकी लंबी बाँहें बारह किलोमीटर लंबी थीं जिनकी सहायता से वह आसानी से बड़े-बड़े जानवरों को पकड़कर खा सकता था। राक्षस को देखते ही राम और लक्ष्मण तीन किलोमीटर पीछे हट गये, परंतु उस राक्षस ने उन्हें देख लिया और उन्हें इतनी जोर से भींचा कि वे असहाय से हो गये। 


राम विचलित नहीं हुए, परंतु लक्ष्मण इतने हताश हो गये कि बोले, "मेरे प्यारे भाई, आप अपने प्राणों के बदले मुझे इस राक्षस को सौंप दें, ताकि आप सीता की खोज जारी रख सकें। "


राम ने लक्ष्मण को भयभीत नहीं होने के लिए प्रोत्साहित किया, परंतु तभी वह राक्षस बोला, “मेरा नाम कबंध है। यह मेरा अहोभाग्य है कि तुम लोग इस वन में आये क्योंकि लंबे समय मैं बहुत भूखा हूँ। भाग्य ने तुम दोनों को मेरे भोजन के रूप में यहाँ भेजा है, इसलिए मेरा विचार है कि तुम लोग अपने बहुमूल्य प्राण नहीं बचा सकोगे।"


लक्ष्मण राम से बोले, हमें इस राक्षस की बाहें तलवार से काटकर स्वयं को बचाना चाहिए।


यह सुनकर, कबंध गुस्से से आग-बबूला हो गया और राम व लक्ष्मण को तुरंत निगल जाने के इरादे से उसने अपना पूरा मुँह खोल लिया। परंतु इससे पहले कि वह उन्हें निगल पाता, राम ने उसकी दाहिनी बाँह और लक्ष्मण ने उसकी बाँयों बाँह काट दी और इसके कारण वह राक्षस जमीन पर अपने ही रक्त में गिर पड़ा। पीड़ा और क्रोध से कबंध ने पूछा, तुम कौन हो ?


लक्ष्मण बोले, यह इक्ष्वाकु वंश के क्षत्रिय राम हैं और मैं इनका भाई हूँ। हम यहाँ पर राम की पत्नी, सीता को खोजते हुए आये हैं जिसका राक्षसराज रावण ने अपहरण कर लिया है।


राम का नाम सुनते ही कबंध की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। अपने अतिथियों का तहेदिल से स्वागत करने के बाद, वह बोला, मैं बहुत सौभाग्यशाली हूँ कि आपने यहाँ आकर मुझे मोक्ष प्रदान किया। कृपा करके मेरे इस घृणित रूप को धारण करने की कथा सुनें। पिछले जन्म में, मैं दनु का पुत्र था। मैंने अपनी तपस्या से ब्रह्माजी को संतुष्ट कर दिया और तब ब्रह्माजी ने मुझे अत्यन्त दीर्घजीवी होने का वरदान दिया। यह वरदान पाकर, मुझे इतना घमंड हो गया कि मैं सोचने लगा कि अब मेरा कट्टर शत्रु इंद्र मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा।


इसके बाद, जब मैंने स्वर्ग के अधिपति पर आक्रमण किया, तो उसने मुझ अपने वज्र से प्रहार किया। इसके परिणामस्वरूप, मेरा सिर और मेरे पैर मेरे शरीर के अंदर घुस गये। स्वयं को इतनी घृणित स्थिति में पाकर, मैंने इंद्र से याचना की कि वह मेरा वध कर दे, परंतु उसने ऐसा करने से मना कर दिया क्योंकि ऐसा होने पर ब्रह्माजी का वरदान झूठा हो जाता। फिर मैंने इंद्र से पूछा कि बिना सिर के मैं कैसे जीवित रहूँगा, तो उसने मेरे उदर के बीच में मेरा मुँह लगा दिया और मेरी बाँहें बारह किलोमीटर लंबी बना दीं।


इसके बाद इंद्र ने कहा, 'जब राम और लक्ष्मण तुम्हारे पास आकर, तुम्हारी बाँहें काट देंगे, तो तुम फिर से अपना दिव्य रूप प्राप्त कर लोगे।' 


उसी समय से, मैं सभी प्रकार के प्राणियों को पकड़कर उन्हें निगल जाता रहा और यह आशा करता रहा कि इंद्र की भविष्यवाणी के अनुसार किसी न किसी दिन मैं राम को पकड़ लूँगा। 


एक बार, मैने स्थूलशिर नामक एक महान ऋषि को सताया, तब उन्होंने मुझे चिरंतन काल तक इसी घृणित रूप में रहने का शाप दिया। मैंने रोते हुए उन ऋषि से अपनी विकट करुण दशा पर दया करने की याचना की, तब उन्होंने भी इस बात की पुष्टि की कि राम द्वारा दाह-संस्कार किए जाने के बाद मैं अपना मूल रूप पुनः प्राप्त कर सकूंगा। अंततः, मुझे आप मिल ही गये, अपनी मृत्यु के बदले में आपको एक सशक्त सहयोगी का पता बताऊँगा जिसकी सहायता से आप अपनी पत्नी को वापस पा सकेंगे।


राम बोले, "मेरी पत्नी सीता का अपहरण राक्षसों के राजा रावण ने किया है। दुर्भाग्यवश, मुझे केवल उसका नाम पता है और मैं न तो उसके रूप-रंग के बारे में और न ही उसके रहने की जगह के बारे में कुछ जानता हूँ। मैं तुम्हारे शरीर का दाह-संस्कार कर दूँगा ताकि तुम्हें वांछित रूप मिल सके, परंतु बदले में तुम्हें मुझे रावण के बारे में जानकारी देनी होगी।


कबंध ने उत्तर दिया, "मुझे बहुत खेद है, परंतु में रावण के बारे में कुछ भी नहीं जानता हूँ। फिर भी मेरा दाह-संस्कार हो जाने पर, मैं आपको एक ऐसे प्राणी के बारे में बताऊँगा जिसने तीनों लोकों का भ्रमण किया है और इस कारण वह राक्षस राज का पता लगाने में आपकी सहायता कर सकेगा।


लक्ष्मण ने पहाड़ की एक गुफा में चिता बनाई और राम व लक्ष्मण ने कबंध को उठाकर उस पर रखा। अत्यधिक मोटा शरीर होने के कारण, जब उसे जलाया गया, तो ऐसा जान पड़ा मानो घी का एक विशाल गोला जल रहा हो। उस अग्नि में से कबंध अपने असली दिव्य रूप में प्रकट हुआ। इस दिव्य रूप में उसने सुंदर वस्त्र पहने हुए थे और वह आभूषणों व फूल मालाओं से सुसज्जित था।


हंसों द्वारा खींचे जाने वाले अपने दिव्य रथ पर आरूढ़ होने के बाद, कबंध बोला, "हे राम, राजनीतिक दुर्भाग्य से बचने के छह उपाय हैं शान्ति की स्थापना, युद्ध, संहार, श्रेष्ठतम अस्त्र-शस्त्र और किलेबंदी, मतभेद पैदा करना और सहयोगियों से सहायता प्राप्त करना। अपनी पत्नी गंवा देने के कारण इस समय आप हताशा के गहन गर्त में हैं, परंतु एक दिन इसी स्थिति को भोगने वाले किसी व्यक्ति की सहायता करके आप अपनी पत्नी को पुनः प्राप्त कर सकेंगे। वह व्यक्ति वानर- राज सुग्रीव है जिसे उसके भाई और इंद्र के पुत्र, वालि ने देश निकाला दे दिया है।


मेरे प्रिय राम, आप सुग्रीव के पास जायें और उसे अपना मित्र बना लें। वह सूर्य का पुत्र है और उसे भी एक उद्धारक की आवश्यकता है। इस समय वह चार 



अन्य वानरों के साथ ऋष्यमूक पर्वत पर रह रहा है जो पम्पा सरोवर के पास स्थित है। पहले आप पम्पा सरोवर पर जायें और शबरी नामक एक संन्यासिनी से मिलें। बहुत समय पहले, वहाँ पर मतंग नामक एक महान ऋषि रहते थे और उनकी मृत्यु के बाद शबरी ने उनके शिष्यों की देखभाल की, मतंग ऋषि के ये शिष्य बहुत पहले ही उच्च लोकों को जा चुके हैं, परंतु शबरी अब भी, ब्रह्मलोक जाने से पहले, मतंग के आश्रम में आपके आगमन की प्रतीक्षा कर रही हैं।


पम्पा सरोवर के पास ही ऋष्यमूक पर्वत है जहाँ सुग्रीव अपने भाई वालि के भय से एक विशाल गुफा में छुपकर रहता है। सुग्रीव निष्ठावान, बुद्धिमान, उदार, चहुर, अत्यन्त साहसी और शक्तिशाली है वहाँ जायें और उससे मित्रता कर लें क्योंकि वह राक्षसों के बारे में सब कुछ जानता है और उसके अनुचर संसार भर में घूमकर किसी भी प्रकार सीता का पता लगा लेंगे।


यह कहकर, कबंध ने राम से स्वर्ग को प्रस्थान करने की अनुमति ली। कबंध के कहे अनुसार, राम व लक्ष्मण वहाँ से चल पड़े और दूसरे दिन वे पम्पा सरोवर पर पहुँचे और उन्हें पास ही में आई मतंग ऋषि का आश्रम दिखाई दिया। जैसे ही राम व लक्ष्मण ने आश्रम में प्रवेश किया, शवरी तत्काल उठा और उसने दोनों हाथ जोड़कर उनका अभिनंदन किया। राम व लक्ष्मण के चरण-कमल स्पर्श करने के बाद, शबरी ने उन्हें पैर धोने के लिए पानी दिया और उन्हें भोजन-पानी कराया।


राम ने शबरी से उसके आध्यात्मिक तप के बारे में पूछा, तो आदर्श आत्मा, शवरी बोली, आपको देखने मात्र से ही, मुझे अपनी सारी तपस्या का फल मिल गया है। जिस समय आप चित्रकूट में रहने आये, उस समय जिन ऋषियों की मैं सेवा कर रही थी वे दिव्य रथों में बैठकर स्वर्ग को चले गये। परंतु जाने से पहले, उन्होंने मुझे आश्वस्त किया था कि आप यहाँ आयेंगे और साथ ही यह भी कहा था कि आपका स्वागत करने के पश्चात् मैं भी स्वर्गलोक में स्थान प्राप्त करूँगी।


राम के अनुरोध पर शबरी उन्हें और लक्ष्मण को पम्पा सरोवर झील के आस- पास के रमणीय क्षेत्र के दर्शन कराने ले गई। इसके बाद, उसने राम से अनुमति माँगी कि अब वह इस मरणशील देह का त्याग करके उन ऋषियों के पास जाना चाहती है जिनकी वह अत्यन्त भक्तिभाव से सेवा करती रही है। शबरी से अत्यन्त प्रसन्न होकर, राम ने उसकी कामना पूर्ण की।


चिता तैयार करके, वह वृद्ध तपस्विनी, हिरण की खाल और वृक्ष की छाल के वस्त्र पहने और जटा धारण करके, लपलपाती हुई अग्नि में कूद गई। अगले ही क्षण, शबरी की प्रकाश-समान आत्मा स्वर्गलोक को जाती दिखाई दी। उसने दिव्य आभूषण और फूल-मालाएं पहन रखी थीं।


इस प्रकार, शबरी के आध्यात्मिक शक्ति बल को देखने के बाद, राम और लक्ष्मण सात समुद्रों के जल से निर्मित पम्पा सरोवर में स्नान करने गये। इसके बाद सीता को खोज निकालने की आशा से पुनःप्राणित राम बिना समय गंवाए सुग्रीव मे मिलने को आतुर होकर लक्ष्मण के साथ वहाँ से चल पड़े।