श्रीपरमात्मने नमः

श्रीगणेशाय नमः

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

श्रीनारदमहापुराण 

ॐ वेदव्यासाय नमः 

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत् ।।


भगवान् नारायण नरश्रेष्ठ नर तथा सरस्वती देवी को नमस्कार करके भगवदीय उत्कर्ष का प्रतिपादन करने वाले इतिहास पुराण का पाठ करें ।

वन्दे वृन्दावनासीन मिन्दिरा नन्द मन्दिरम् ।
उपेन्द्रं सान्द्र कारुण्यं परानन्दं परात्परम् ।।


जो लक्ष्मी के आनंद निकेतन भगवान विष्णु के अवतार स्वरूप है उसे स्न्नेहयुक्त करुणा की निधि परात्पर परमानन्द स्वरूप पुरुषोत्तम विन्दावनवासी श्रीकृष्ण को मैं प्रणाम करता हूं ।

ब्रह्म विष्णु महेशाख्यं यस्यांशा लोकसाधका: ।
तमादि   देवं   चिद्रूपं   विशुद्धं    परमं   भजे ।।


ब्रह्मा विष्णु तथा शिव इसके स्वरूप हैं तथा लोकपाल जिनके अंश हैं, उस विशुद्ध ज्ञानस्वरूप आदि देव परमात्मा की मैं आराधना करता हूँ । नैमिषारण्य नमक विशाल वन में महात्मा शौनक आदि ब्रह्मवादी मुनि मुक्ति की इच्छा से तपस्या में संलग्न थे । उन्होंने इंद्रियों को वश में कर लिया था । उनका भोजन नियमित था । वे सच्चे संत थे और सत्यस्वरूप परमात्मा की प्राप्ति के लिए पुरुषार्थ करते थे । आदिपुरुष सनातन भगवान् विष्णु का वे बड़ी भक्ति से यजन पूजन करते रहते थे । उनमें ईर्ष्याका नाम नहीं था । वे सम्पूर्ण धर्मों के ज्ञाता और समस्त लोकोंपर अनुग्रह करने वाले थे। ममता और अहङ्कार उन्हें छू भी नहीं सके थे ।

उनका चित्त निरन्तर परमात्मा के चिन्तन में तत्पर रहता था। वे समस्त कामनाओं का त्याग करके सर्वथा निष्पाप हो गये थे। उनमें शम, दम आदि सद्गुणों का सहज विकास था । काले मृगचर्म की चादर ओढ़े, सिरपर जटा बढ़ाये तथा निरन्तर ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए वे महर्षिगण सदा परब्रह्म परमात्मा का जप एवं कीर्तन करते थे। सूर्य के समान प्रतापी, धर्मशास्त्रों का यथार्थ तत्त्व जानने वाले वे महात्मा नैमिषारण्य में तप करते थे। उनमें से कुछ लोग यज्ञों द्वारा यज्ञपति भगवान् विष्णु का यजन करते थे। कुछ लोग ज्ञानयोगके साधनों द्वारा ज्ञान स्वरूप श्रीहरि की उपासना करते थे और कुछ लोग भक्ति के मार्गपर चलते हुए परा–भक्तिके द्वारा भगवान् नारायण की पूजा करते थे ।

एक समय धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का उपाय जानने की इच्छा से उन श्रेष्ठ महात्माओं ने एक बड़ी भारी सभा की। उसमें छब्बीस हजार ऊर्ध्वरेता ( नैष्ठिक ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले ) मुनि सम्मिलित हुए थे । उनके शिष्य–प्रशिष्यों की संख्या तो बतायी ही नहीं जा सकती । पवित्र अन्तःकरणवाले वे महातेजस्वी महर्षि लोकोंपर अनुग्रह करने के लिये ही एकत्र हुए थे । उनमें राग और मात्सर्य का सर्वथा अभाव था । वे शौनक जी से यह पूछना चाहते थे कि इस पृथ्वी पर कौन कौन से पुण्य क्षेत्र एवं पवित्र तीर्थ हैं ।

त्रिविध ताप से पीड़ित चित्तवाले मनुष्यों को मुक्ति कैसे प्राप्त हो सकती है । लोगों को भगवान् विष्णु की अविचल भक्ति कैसे प्राप्त होगी तथा सात्त्विक, राजस और तामस – भेदसे तीन प्रकार के कर्मों का फल किस के द्वारा प्राप्त होता है । उन मुनियों को अपने से इस प्रकार प्रश्न करने के लिये उद्यत देखकर उत्तम बुद्धि वाले शौनक जी विनय से झुक गये और हाथ जोड़कर बोले ।

शौनक जी ने कहा – महर्षियों ! पवित्र सिद्धाश्रम-तीर्थमें पौराणिकों में श्रेष्ठ सूतजी रहते हैं । वे वहाँ अनेक प्रकार के यज्ञों द्वारा विश्वरूप भगवान् विष्णु का यजन किया करते हैं । महामुनि सूतजी व्यासजी के शिष्य हैं। वे यह सब विषय अच्छी तरह जानते हैं । उनका नाम रोमहर्षण है। वे बड़े शान्त स्वाभावके हैं और पुराणसंहिता के वक्ता हैं । भगवान् मधुसूदन प्रत्येक युग में धर्मों का ह्रास देखकर वेदव्यास रूप से प्रकट होते और एक ही वेद के अनेक विभाग करते हैं । विप्रगण ! हमने सब शास्त्रों में यह सुना है कि वेदव्यास मुनि साक्षात् भगवान् नारायण ही हैं । उन्हीं भगवान् व्यासने सूतजी को पुराणों का उपदेश दिया हैं । परम बुद्धिमान् वेदव्यास जी के द्वारा भलीभाँति उपदेश पाकर सूतजी सब धर्मों के ज्ञाता हो गये हैं ।

संसार में उनसे बढ़कर दूसरा कोई पुराणों का ज्ञाता नहीं है; क्योंकि इस लोक में सूतजी ही पुराणों के तात्त्विक अर्थको जानने वाले, सर्वज्ञ और बुद्धिमान हैं ‌‌। उनका स्वभाव शान्त हैं । वे मोक्ष धर्म के ज्ञाता तो हैं ही, कर्म और भक्ति के विविध साधनों को भी जानते हैं । मुनीश्वरो ! वेद, वेदाङ्ग और शास्त्रों का जो सारभूत तत्त्व है, वह सब मुनिवर व्यासने जगत् के हित के लिये पुराणों में बता दिया है और ज्ञानसागर सूतजी उन सबका यथार्थ तत्त्व जानने में कुशल हैं, इसलिये हमलोग उन्हीं से सब बातें पूछें ।

इस प्रकार शौनक जी ने मुनियों से जब अपना अभिप्राय निवेदन किया, तब वे सब महर्षि विद्वानों में श्रेष्ठ शौनक जी को आलिङ्गन करके बहुत प्रसन्न हुए और उन्हें साधुवाद देने लगे । 

तदनन्तर सब मुनि वनके भीतर पवित्र सिद्धाश्रम तीर्थ में गये और वहाँ उन्होंने देखा कि सूतजी अग्निष्टोम यज्ञ के द्वारा अनन्त अपराजित भगवान् नारायण का यजन कर रहे हैं । सूतजी ने उन विख्यात तेजस्वी महात्माओं का यथोचित स्वागत - सत्कार किया । तत्पश्चात उनसे नैमिषारण्य निवासी मुनियों ने इस प्रकार पूछा —

ऋषि बोले — उत्तम व्रत का पालन करने वाले सूतजी ! हम आपके यहाँ अतिथि रूप में आये हैं, अतः आपसे आतिथ्य - सत्कार पाने के अधिकारी हैं । आप ज्ञान दानरूपी पूजन-सामग्री के द्वारा हमारा पूजन कीजिये । मुने ! देवता लोग चन्द्रमा की किरणों से निकला हुआ अमृत पीकर जीवन धारण करते हैं; परंतु इस पृथ्वी के देवता ब्रह्मण आपके मुखसे निकले हुए ज्ञान रूपी अमृत को पीकर तृप्त होते हैं। तात ! हम यह जानना चाहते हैं कि यह सम्पूर्ण जगत् किससे उत्पन्न हुआ ? इसका आधार और स्वरूप क्या है ? यह किसमें स्थित है और किसमें इसका लय होगा ? भगवान् विष्णु किस साधन से प्रसन्न होते हैं ? मनुष्यों द्वारा उनकी पूजा कैसे की जाती है ? भिन्न भिन्न वर्णों और आश्रमों का आचार क्या है ! अतिथि की पूजा कैसे की जाती है, जिससे सब कर्म सफल हो जाते हैं ? वह मोक्षका उपाय मनुष्यों को कैसे सुलभ है, पुरुषों को भक्ति से कौन सा फल प्राप्त होता है और भक्ति का स्वरूप क्या है ? मुनिश्रेष्ठ सूतजी ! ये सब बातें आप हमें इस प्रकार समक्षाकर बतावें कि फिर इनके विषय में कोई संदेह न रह जाये, आप के अमृत के समान वचनों को सुनने के लिये किस के मन में श्रद्धा नहीं होगी ? 

सूतजी ने कहा — महर्षियो ! आप सब लोग सुनें । आपलोगों को जो अभीष्ट है, वह मैं बतलाता हूँ । सनकादि मुनीश्वरों ने महात्मा नारद जी से जिसका वर्णन किया था, वह नारद पुराण आप सुनें । यह वेदार्थ से परिपूर्ण है - इसमें वेदके सिद्धान्तों का ही प्रतिपादन किया गया है । यह समस्त पापों की शान्ति तथा दुष्ट ग्रहों की बाधा का निवारण करने वाला है । दुःख स्वप्नोका नाश करने वाला, धर्मसम्मत तथा भोग एवं मोक्ष को देनेवाला है । इसमें भगवान् नारायण की पवित्र कथाका वर्णन है । इसमें भगवान् नारायण की पवित्र कथा का वर्णन है । यह नारद पुराण सब प्रकार के कल्याण की प्राप्ति का हेतु है। धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष का भी कारण है ।

इसके द्वारा महान् फलोंकी भी प्राप्ति होती है, यह अपूर्व पुण्यफल प्रदान करने वाला है। आप सब लोग एकाग्रचित्त होकर इस महापुराण को सुनें । महापातकों तथा उपपातकों से युक्त मनुष्य भी महर्षि व्यास प्रोक्त इस दिव्य पुराण का श्रवण करके शुद्धि को प्राप्त होते हैं । इसके एक अध्यय का पाठ करने से अश्वमेघ यज्ञ का और दो अध्यायों के पाठ से राजसूय यज्ञ का फल मिलता है ।

ब्राह्मणो ! ज्येष्ठ के महीने में पूर्णिमा तिथि को मूल नक्षत्र का योग होने पर मनुष्य इन्द्रिय-संयमपूर्वक मथुरापुरी की यमुना के जल में स्नान करके निराहार व्रत रहे और विधिपूर्वक भगवान् श्रीकृष्ण का पूजन करे तो इससे उसे जिस फलकी प्राप्ति होती है, उसी को वह इस पुराण के तीन अध्यायों का पाठ करके प्राप्त कर लेता है ।

इस के दस अध्यायों का भक्ति भाव से श्रवण करके मनुष्य निर्वाण मोक्ष प्राप्त कर लेता है । यह पुराण कल्याण - प्राप्ति के साधनों में सबसे श्रेष्ठ है। पवित्र ग्रन्थों में इसका स्थान सर्वोत्तम है । यह बुरे स्वप्नोका नाशक और परम पवित्र है ।

ब्रह्मर्षियों ! इसका यत्नपूर्वक श्रवण करना चाहिये। यदि मनुष्य श्रद्धापूर्वक इसके एक श्लोक या आधे श्लोक का भी पाठ कर ले तो वह महापातकों के समूह से तत्काल मुक्त हो जाता है ।

साधु पुरुषों के समक्ष ही इस पुराण का वर्णन करना चाहिये; क्योंकि यह गोपनीय से भी अत्यंत गोपनीय है । भगवान् विष्णु के समक्ष, किसी पुण्य क्षेत्र तथा ब्राह्मण आदि द्विजातियों के निकट इस पुराण की कथा बाँचनी चाहिए ।

जिन्होंने काम-कोध आदि दोषों को त्याग दिया है, जिनका मन भगवान् विष्णु की भक्ति लगा है तथा जो सदाचार परायण हैं, उन्हीं को यह मोक्ष साधक पुराण सुनाना चाहिये। भगवान् विष्णु सर्वदेवमय हैं । वे अपना स्मरण करने वालों भक्तों की समस्त पीड़ाओं का नाश कर देते हैं । श्रेष्ठ भक्तोपर उनकी स्न्नेह-धारा सदा प्रवाहित होती रहती है ।

ब्राह्मणो ! भगवान् विष्णु केवल भक्ति से ही संतुष्ट होते हैं, दूसरे किसी उपाय से नहीं । उनके नामका बिना श्रद्धा के भी कीर्तन अथवा श्रवण कर लेनेपर मनुष्य सब पापों से मुक्त हो अविनाशी वैकुण्ठ नामको प्राप्त कर लेता है ।

भगवान् मधुसूदन संसार रूपी भयंकर एवं दुर्गम वनको दग्ध करने के लिये दावानलरूप हैं । महर्षियों ! भगवान् श्रीहरि अपना स्मरण करने वाले पुरुषों के सब पापों का उसी क्षण नाश कर देते हैं । उनके तत्त्वका प्रकाश करने वाले इस उत्तम पुराण का श्रवण अवश्य करना चाहिए । सुनने अथवा पाठ करने से भी यह पुराण सब पापों का नाश करने वाला है ।

ब्राह्मणो ! जिसकी बुद्धि भक्ति पूर्वक इस पुराण के सुनने में लग जाती है, वही कृतकृत्य है । वही सम्पूर्ण शास्त्रों का मर्मज्ञ पण्डित है तथा उसी के द्वारा किये हुए तप और पुण्य को मैं सफल मानता हूँ; क्योंकि बिना तप और पुण्य के इस पुराण को सुनने में प्रेम नहीं हो सकता । जो संसार का हित करने वाले साधु पुरुष हैं, वे ही उत्तम कथाओं के कहने एवं सुनने में प्रवृत्त होते हैं ।

पाप परायण दुष्ट पुरुष तो सदा दूसरों की निन्दा और दूसरोंके साथ कलह करने में ही लगे रहते हैं ।

द्विजवरो ! जो नराधम पुराणों में अर्थवाद होने की शंका करते हैं, उनके किये हुए समस्त पुण्य नष्ट हो जाते हैं । विप्रवरो ! महोग्रस्त मानव दूसरे - दूसरे कार्यों के साधन में लगे रहते हैं, परंतु पुराण श्रवण रूप पुण्यकर्मका अनुष्ठान नहीं करते हैं । श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! जो मनुष्य बिना किसी परिश्रम के यहाँ अनन्त पुण्य प्राप्त करना चाहता हो, उसको भक्ति भाव से निश्चित ही पुराणों का श्रवण करना चाहिये । जिस पुरुष की चित्तवृत्ति पुराण सुनने में लग जाती है, उसके पूर्वजन्मो उपार्जित समस्त पाप निस्संदेह नष्ट हो जाते हैं ।

जो मानव सत्संग, देवपूजा, पुराण कथा और हितकारी उपदेश में तत्पर रहता है, वह इस देहका नाश होने पर भगवान् विष्णु के समान तेजस्वी स्वरूप धारण करके उन्हीं के परम धाम में चला जाता है । अतः विप्रवरो ! आपलोग इस परम पवित्र नारद पुराण का श्रवण करें । इसके श्रवण करने से मनुष्य का मन भगवान् विष्णु में संलग्न होता है और वह जन्म मृत्यु तथा जरा आदि के बन्धन से छूट जाता है ।

आदिदेव भगवान् नारायण श्रेष्ठ, वरणीय, वरदाता तथा पुराण पुरुष हैं । उन्होंने अपने प्रभाव से सम्पूर्ण लोकों को व्याप्त कर रखा है । वे भक्तजनों के मनोवांछित पदार्थ को देनेवाले हैं । उनका स्मरण करके मनुष्य मोक्ष पद को प्राप्त कर लेता है । ब्राह्मणो ! जो ब्रह्मा , शिव तथा विष्णु आदि भिन्न - भिन्न रूप धारण करके इस जगत् की सृष्टि, संहार और पालन करते हैं, उन आदिदेव परम पुरुष परमेश्वर को अपने हृदय में स्थापित करके मनुष्य मुक्ति पा लेता है । 

जो नाम और जाति आदि की कल्पनाओं से रहित हैं, सर्वश्रेष्ठ तत्त्वों से भी परम उत्कृष्ट हैं, परात्पर पुरुष हैं, उपनिषदों के द्वारा जिनके तत्त्व का ज्ञान होता है तथा जो अपने प्रेमी भक्तों के समक्ष ही सगुण-साकार रूप में प्रकट होते हैं, उन्हीं परमेश्वर की समस्त पुराणों और वेदों के द्वारा स्तुति की जाती है । अतः जो सम्पूर्ण जगत् के ईश्वर, मोक्ष स्वरूप, उपासना के योग्य, अजन्मा, परम रहस्य रूप तथा समस्त पुरुषार्थों के हेतु हैं, उन भगवान् विष्णु का स्मरण करके मनुष्य भवसागर से पार हो जाता है। धर्मात्मा, श्रद्धालु, मुमुक्षु, यति तथा वीतराग पुरुष ही यह पुराण सुनने के अधिकारी हैं । उन्हीं को इसका उपदेश करना चाहिये। पवित्र देश में, देव मन्दिर के सभामण्डप में, पुण्य क्षेत्र में, पुण्य तीर्थ में, तथा देवताओं और ब्राह्मणों के समीप पुराण का प्रवचन करना चाहिये । जो मनुष्य पुराण - कथा के बीच में दूसरे से बातचीत करता है, वह भयंकर नरक में पड़ता है । जिसका चित्त एकाग्र नहीं है, वह सुनकर भी कुछ नहीं समझता । अतः एकचित्त होकर भगवत् कथा अमृत का पान करना चाहिये ।जिसका मन इधर उधर भटक रहा हो, उसे कथा - रसका आस्वादन कैसे हो सकता हैं ? संसार में चञ्चल चित्तवाले मनुष्य को क्या सुख मिलता है ? अतः दुःख की साधन भूत समस्त कामनाओं का त्याग करके एकाग्रचित्त हो भगवान् विष्णु का चिन्तन करना चाहिये । जिस किसी उपायसे भी यदि अविनाशी भगवान् नारायण का स्मरण किया जाय तो वे पातकी मनुष्यपर भी निस्संदेह प्रसन्न हो जाते हैं । सम्पूर्ण जगत् के स्वामी तथा सर्वत्र व्यापक अविनाशी भगवान् विष्णु में जिसकी भक्ति है, उसका जन्म सफल हो गया और मुक्ति उसके हाथ में है ।

विप्रवरो ! भगवान् विष्णु के भजन में संलग्न रहने वाले पुरुषों को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — चारों पुरुषार्थ प्राप्त होता हैं  ।