भगवती विषयक विशिष्ट तन्त्रग्रन्थ 'स्वतन्त्रतन्त्र' भगवती के आविर्भाव को वात क्षोभजन्य मानता है जबकि देवी भागवत पुराण इसे सती के क्रोध का परिणाम मानता है । भगवान् शिव को भयाक्रान्त होकर भागते देखकर भगवती सती ने उन्हें रोकने के लिए दस रूप धारण करके दसों दिशाओं के मार्ग रोक दिये —
सर्वासु दिक्षु क्षणमग्रतः स्थिता तदा च भूत्वा दश मूर्तयः पराः।।
सन्धावमानो गिरिशो अतिवेगतः प्राप्नोति यां दिशमेव तत्र ताम् ।
भयानकां वीक्ष्य भयेन विद्रुतो दिशं तथा ऽन्यं प्रति चाप्यधावत् ।।
इन्हीं दश महाविद्यात्मक स्वरूपों के विषय में भगवती सती ने कहा था –
काली तारा च लोकेशी कमला बगलामुखी ।
छिन्नमस्ता षोडशी च सुन्दरी बगलामुखी ।
धूमावती च मातङ्गी नामान्यासामि यानि वै ।।
प्रजापति दक्ष के यज्ञ में अनाहूता सती को जाने से रोकने पर योगमाया सती ने क्रोधावेश में दशों दिशाओं को अवरुद्ध करने वाले दश रूप धारण करके शिव को अत्यन्त भयभीत कर डाला था, सती के इन्हीं दश रूपों में एक रूप भगवती बगलामुखी का भी था पूरा वृत्तान्त इस प्रकार है
भगवती सती ने शिव के मना करने पर भगवान् शिव से कहा आप आज्ञा दीजिए या न दीजिए मैं यज्ञ में अवश्य जाऊँगी और वहाँ या तो आपके लिए यज्ञभाग करूँगी अथवा यज्ञ का नाश कर डालूँगी
ततोऽहं तत्र यास्यामि तदाज्ञापय वा न वा ।
प्राप्स्यामि यज्ञभागं वा नाशयिष्यामि वा माम् ।।
भगवान् शिव ने कहा कि हे दक्षपुत्री ! अब मैंने जान लिया कि तुम मेरे कहने में नहीं रह गई हो, अतः अपनी रुचि के अनुसार तुम कुछ भी करो, मेरी आज्ञा की प्रतीक्षा क्यों कर रही हो ?
जानामि वाग्बहिर्भतां त्वामहं दक्षकन्य के ।
यथा रुचि त्वां च ममाज्ञां किं प्रतीक्षते ।।
यह सुनकर क्रोधावेश में लाल - लाल आँखों वाली सती सोचने लगी कि इन शंकर ने पहले तो मुझे पत्नी रूप में प्राप्त करने हेतु प्रार्थाना की थी और फिर मुझे प्राप्त कर लेने के अनन्तर अब ये मेरा अपमान कर रहे हैं, अतः अब मैं इन्हें अपना प्रभाव दिखाती हूँ –
चिन्तया मास सा क्रुद्धा क्षणमारक्त लोचना ।
सम्प्रार्थ्य मामनु प्राप्य पत्नी भावेन शङ्करः ।।
अधिक्षि पत्यद्य तस्मात्प्रभावं दर्शया म्यहम् ।
भगवान् शिव ने क्रोध से फड़कते ओठों वाली एवं कालाग्नि के समान नेत्रों वाली उन भगवती सती को देखकर अपने नेत्र बन्द कर लिये
शम्भुः समीक्ष्य तां देवीं क्रोध विस्फुरिता धराम् ।
कालाग्नि तुल्य नयनां मीलिताक्ष स्तदाभवत् ।।
भयानक दाढों से युक्त मुखवाली भगवती ने सहसा अट्टहास किया जिसे सुनकर महादेव विमूढ़वत् भयाक्रान्त हो उठे उन्होंने बड़ी कठिनाई से आँखों को खोलकर भगवती के भयानक स्वरूप को देखा , सती ने स्वर्णिम वस्त्रों का परित्याग करके वृद्धा के समान कान्ति धारण कर ली थी, वे दिगम्बरा थीं उनकी जिह्वा लपलपा रही थी उनकी चार भुजाएँ थीं उनके शरीर से कालाग्नि के समान ज्योति निकल रही थी उनके रोम -रोम से स्वेद निकल रहा था, वे अत्यन्त भयानक स्वरूपवाली भगवती सती भयानक शब्द कर रही थीं , उन्होंने मुण्डमाला धारण कर रखी थी , करोड़ों सूर्यों के समान तेजोमयी सती के मस्तक पर चन्द्रमा अवस्थित था , उदीयमान सूर्य के समान दीप्तिमान किरीट से उनका ललाट देदीप्यमान था इस प्रकार अपने तेज से देदीप्यमान एवं भयानक रूप धारण करके देवी सती घोर गर्जना के साथ अट्टाहास करती हुई शम्भु के सामने खड़ी हुईं ।
एवं समादाय वपुर्भया नकं जाज्वल्यमानं निज तेजसा सती ।
कृत्वाट्टहासं सहसा महास्वनं हो ऽतिष्ठमाना विरराज ततपुरः
सति को इस प्रकार का कार्य करती देखकर शिव ने अपना धैर्य खोकर भय के कारण भागने का निश्चय किया और विमूढवत् सभी दिशाओं में इधर उधर भागने लगे
यथा विधां कार्यवतीं निरीक्ष्य यां विहाय धैर्यं सह चेतसा तदा ।
चकार बुद्धिं स पलायने भयात् समभ्यधावच्च दिशो विमुग्धवत्
भगवान् शिव को दौड़ते हुए देखकर दक्षपुत्री उन्हें रोकने के लिए ऊँचे स्वरों में ' डरो मत, डरो मत ' इन शब्दों का बार बार उच्चारण करती हुई अत्यन्त भयानक अट्टहास कर रही थीं उस शब्द को सुनकर शिव अत्यधिक डर के मारे वहाँ एक क्षण भी नहीं रुके, वे उस समय भय से व्याकुल होकर दिशाओं में दूर तक पहुँच जाने के लिए बड़ी तेजी से भागे जा रहे थे ।
दिगन्तमागन्तुमतीव वेगतः समभ्यधावद्भयविह्वलस्तदा ।।
इस प्रकार अपने स्वामी को भयाक्रान्त देखकर वे दयामयी भगवती सती उन्हें रोकने की इच्छा से क्षणभर में अपना दश श्रेष्ठ विग्रह धारण करके सभी दिशाओं में उनके समक्ष स्थित हो गईं , अत्यन्त वेग से भागते हुए वे शिव जी जिस जिस दिशा में जाते थे उस उस दिशा में उन्हीं भयानक भगवती को देखते थे और फिर भय से व्याकुल होकर अन्य दिशा में भागने लगते थे
सन्धावमानो गिरिशो ऽतिवेगतः प्राप्नोति यां यां दिशमेव तत्र ताम्
भयानकं वीक्ष्य भयेन विद्रुतो दिशं तथा अन्यां प्रति चाप्यधावत् ।।
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