नारायनं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ।।



देवी भागवत के माहात्म्य प्रसंगमें जाम्बवान् के यहाँ से श्रीकृष्ण के मणि प्राप्त करने तथा जाम्बवती से विवाह करके द्वारका लौटने की कथा ।



ऋषियोंने पूछा- महाबुद्धिमान् सूतजी! महाभाग वसुदेवने कैसे पुत्र प्राप्त किया ? भगवान् श्रीकृष्णने परिभ्रमण करके प्रसेनको कहाँ खोजा और क्यों खोजा ? श्रीमद्देवी- भागवतकी यह कथा वसुदेवजीने किस विधिसे सुनी और इसके कौन वक्ता हुए ? यह बतानेकी कृपा कीजिये ।


सूतजी बोले- भोजवंशी राजा सत्राजित् द्वारकामें सुखपूर्वक रहते थे। उनके द्वारा सदा सूर्यका आराधन हुआ करता था। भगवान् सूर्यने सत्राजित्की भक्तिसे परम प्रसन्न होकर उन्हें अपने लोकका दर्शन कराया। साथ ही उन्हें एक 'स्यमन्तक' नामक मणि दी। सत्राजित् उस मणिको गलेमें धारणकर द्वारका आये।


वह मणि की चमक थी। उसे देखकर पूर्ववासियों ने समझा कि सूर्यनारायण हैं। इसलिए सुधर्म सभामें बैठे हुए श्रीकृष्णके पास जाकर  वे उनसे कहने लगे-'जगत्प्रभो! ये सूर्यनारायण आ रहे हैं।' उनकी बातें सुनकर भगवान श्रीकृष्ण के मुखपर मुसकान छा गई। बोले-'अरे बालको! ये सूर्य नहीं हैं। ये तो स्यमन्तकमणि धारणकर सत्राजित् आ रहे हैं। मणिके कारण उनकी ज्योति फैल रही है। सूर्यने इन्हें यह मणि दी है।'


तदनन्तर सत्राजित्ने ब्राह्मणोंको बुलाकर उनसे स्वस्तिवाचन कराया, मणिकी मणि पूजा की और उस मणिको अपने भवनमें स्थापित कर दिया। प्रतिदिन आठ भार सुवर्ण देनेवाली वह मणि जहाँ रहती थी, वहाँ महामारी, दुर्भिक्ष एवं अन्य उत्पातसम्बन्धी भय कभी नहीं ठहर सकते थे। सत्राजित्के एक भाई थे। उनका नाम प्रसेन था। एक बार वे उस मणिको गलेमें धारणकर घोड़ेपर सवार हुए और शिकार खेलनेके लिये वनको चल पड़े। 


उन्हें सिंहने देखा और घोड़ेसहित मारकर मणि ले ली। ऋक्षराज जाम्बवान् बड़ा बली था। उसने देखा, सिंह मणि लिये हुए है। अतः बिलके द्वारपर ही सिंहको मारकर उसने मणि छीन ली और उसे अपने पुत्रको खेलनेके लिये दे दिया। बच्चा भी उस चमकीली मणिको लेकर खेलने लगा। 


कुछ समय बाद जब प्रसेन नहीं लौटे तब सत्राजित्को महान् दुःख हुआ कहा- 'पता नहीं किसे मणि पानेकी इच्छा हो गयी, जिसके हाथों प्रसेन कालका ग्रास बन गया।' फिर तो जनसमाजके मुखसे द्वारकामें इस प्रकार किंवदन्ती फैल गयी कि हो न हो श्रीकृष्णाने प्रसेन को मार डाला है ।


क्योंकि मणि में उनकी आसक्ति हो गयी थी। यह बात भगवान् श्रीकृष्ण के कानों में भी पड़ी तब अपने ऊपर लगे हुए इस कलंक को दूर करने के लिये उन्होंने कुछ पुरवासियों को साथ लेकर यात्रा आरम्भ कर दी । वे वनमें पहुँच । सिंहद्वारा मारे हुए प्रसेन को देखा रक्त से चिह्नित मार्गको पकड़कर सिंहको खोजते हुए वे आगे बढ़े ।


एक बिलके द्वारपर मरा हुआ सिंह दिखायी पड़ा तब कृपा पर वश हो वे पुरवासियों से कहने लगे तुम लोग मेरे लौटने तक यहीं रहना मणि लेनेवाले का पता लगाने के लिये मैं इस बिलके अंदर जा रहा हूँ  ।


बहुत अच्छा कहकर पुरवासी वहीं ठहर गये भगवान श्रीकृष्ण बिलके भीतर वहाँ गये जहाँ जाम्बवान का स्थान था देखा ऋक्षराज का बालक मणि हाथ में लिये हुआ था । इन्होंने मणि छीनने की चेष्टा की । इतने में धायने भयंकर शब्दों में गर्जना आरम्भ कर दिया । धायकी चिल्लाहट सुनकर वहाँ तुरंत जाम्बवान् आ पहुँचा । उसका भगवान् श्रीकृष्ण के साथ युद्ध आरम्भ हो गया । रात दिन लगातार लड़ाई होती रही ।


दोनों में सत्ताईस दिनोंतक घोर संग्राम चलता रहा उधर द्वारकावासी भगवान् श्रीकृष्ण की प्रतीक्षा में बिलके द्वारपर रुके थे । बारह दिनोंतक उन्होंने प्रतीक्षा की । तत्पश्चात डरकर वे अपने अपने घर लौट गये । पहुँचनेपर आरम्भ से अन्त तक सारा समाचार कह सुनाया। सुनकर सबको महान् कष्ट हुआ अब वे सत्राजित् की निन्दा करने लगे । अपने पुत्रकी यह कष्टकहानी महाभाग वसुदेव के कानों में भी पड़ी । परिवारसहित वे शोकसागर में डूबने उतराने लगे  ।


अब मेरा 'कल्याण कैसे होगा' इस प्रकारकी अनेकों चिन्ताएँ उनके मनमें उठने लगीं। इतनेमें देवर्षि नारदजी ब्रह्मलोकसे वहाँ पधारे। वसुदेवजी उठकर खड़े हो गये। मुनिको प्रणाम किया। उनकी यथोचित पूजा की। नारदजीने बुद्धिमान् वसुदेवजीसे कुशल- समाचार पूछा। फिर कहा-' आप चिन्तित क्यों हैं? इसका कारण बतलाइये।'


वसुदेवजीने कहा- मेरा प्रिय पुत्र श्रीकृष्ण प्रसेनको खोजनेके लिये पुरवासियोंके साथ वनमें गया था। मरे हुए प्रसेनपर उसकी दृष्टि पड़ी। बिलके द्वारपर देखा कि प्रसेनको मारनेवाला सिंह भी मरा पड़ा है। तब पुरवासियोंको द्वारपर ही ठहराकर वह स्वयं अंदर घुस गया। मुने! बहुत दिन व्यतीत हो गये, अबतक मेरा वह प्राणप्रिय पुत्र नहीं लौटा। इसीसे मैं चिन्तित हूँ। कोई ऐसा उपाय बतानेकी कृपा कीजिये, जिससे मेरा लड़का शीघ्र वापस आ जाय ।


नारदजी बोले - यदुश्रेष्ठ! तुम पुत्रप्राप्तिके लिये अम्बिका देवीकी आराधना करो। उनके आराधनसे ही तुम्हारा शीघ्र कल्याण होगा।


वसुदेवजीने पूछा- देवर्षे! वे अम्बिका देवी कौन हैं, उनकी क्या महिमा है और कैसे उनका पूजन होता है? भगवन्! यह बतानेकी कृपा कीजिये ।


नारदजी बोले -महाभाग वसुदेव! अम्बिका देवी के संपूर्ण महात्म्यको विशदरूपसे कौन कह सकता है। मैं संक्षेपसे कुछ कहता हूँ, सुनो। भगवती अम्बिका नित्यस्वरूपिणी हैं। सत्, चित् और आनन्दमय उनका श्रीविग्रह है। वे सर्वोपरि हैं। यह चराचर जगत् उनसे ओतप्रोत है ।


उन्हींकी आराधनाके प्रभावसे ब्रह्माजी इस चराचर जगत् की रचना करते हैं। मधु और कैटभसे भयभीत होनेपर पितामहने देवीकी स्तुति की और वे उस भयसे मुक्त हुए। उन्हींकी कृपासे भगवान् विष्णु इस जगत्‌का संरक्षण करते हैं। 


भगवान् रुद्रपर उनकी कृपादृष्टि पड़ी, तभी संसारके संहारमें वे सफल हो सके। वे ही संसारबन्धनमें हेतु हैं। मुक्त कर देना भी उन्हींका काम है। वे देवी परमा विद्यास्वरूपिणी हैं। 


सम्पूर्ण शक्तिशालियोंपर भी उनका शासन रहता है। तुम नवरात्रविधिसे उन भगवती जगदम्बिकाका पूजन करके नौ दिनों में श्रीमद्देवीभागवत पुराण सुनो। उस पुराणके श्रवण करनेसे शीघ्र ही तुम्हारा पुत्र लौट आयेगा। इस पुराणके पढ़ने और सुननेवालेसे भुक्ति- मुक्ति दूर नहीं रह सकतीं।


इस प्रकार मुनिवर नारदजीके कहनेपर वसुदेवजीने उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया और अपार प्रसन्नता प्रकट करते हुए वे कहने लगे।


वसुदेवजी बोले- भगवन्! आपके कहनेपर भगवती जगदम्बिकाके कृपा-प्रसादसे सिद्ध होनेवाला अपना पूर्वप्रसंग मुझे याद आ गया; उसे मैं कहता हूँ, सुनिये। पहले की बात है, आकाशवाणीसे यह जानकर कि 'देवकीके आठवें गर्भसे कंसका निधन होगा' पापी कंसने भयके कारण मुझे सभामें ही घेर लिया। 


अपनी स्त्री देवकीके साथ मुझे कारागारकी हवा खानी पड़ी। ज्यों ही बच्चे पैदा होते, दुरात्मा कंस उन्हें मार डालता था। कंसके हाथों मेरे छः बालकोंकी मृत्यु हो जानेपर देवकीके अन्तःकरणमें शोकका सागर उमड़ पड़ा। अब वह कल्याणी रात-दिन चिन्ता करने लगी। 


तब मैंने मुनिवर गर्गजीको बुलाकर उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया, पूजा की, अनुनय-विनय किया और पुत्रकी इच्छा प्रकट करते हुए देवकीकी कष्टकथा उन्हें कह सुनायी। मैंने कहा- 'भगवन्! आप करुणाके सागर हैं। यादवोंने आपसे दीक्षा पायी है। मुने! आप दीर्घजीवी पुत्र प्राप्त होनेका साधन बतलानेकी 'कृपा करें।' तब दयानिधि गर्गजी प्रसन्न होकर मुझसे कहने लगे।












गर्गजी बोले-  महाभाग वसुदेव! दीर्घजीवी पुत्र प्राप्त होनेका उपाय बताता हूँ, सुनो। भगवती दुर्गा भक्तोंका दुःख दूर करनेवाली और कल्याणस्वरूपिणी हैं। तुम उन्हींकी आराधना करो। उनकी कृपासे तुम्हारा तुरंत कल्याण हो। जायगा; क्योंकि उनकी उपासनासे अखिल जनोंके समस्त मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। भगवती दुर्गामें भक्ति रखनेवाले मनुष्योंको जगत्में कुछ भी दुर्लभ नहीं है।


मुनिके यों कहनेपर हम पति-पत्नी दोनोंके हृदयमें अपार हर्ष छा गया। मैंने अत्यन्त भक्ति- पूर्वक उनको प्रणाम किया और हाथ जोड़कर कहा- 'भगवन्! आप परम दयालु हैं। यदि मुझपर आपकी कृपा हो तो मथुरापुरीमें रहकर ही आप मेरे लिये भगवती जगदम्बिकाकी आराधना आरम्भ कर दीजिये। 


महामते! मैं कंसके यहाँ बंदी बना हूँ। इस समय मुझसे कुछ भी होनेकी सम्भावना नहीं दीखती। अतः आप ही इस दुःखरूपी दुस्तर सागरसे उद्धार । करनेकी कृपा कीजिये।' इस प्रकार मेरे कहनेपर मुनिवर गर्गजी प्रसन्न होकर बोले- 'वसुदेव! तुम मेरे अति प्रेमपात्र हो, अतएव तुम्हारे कल्याणार्थ मैं अवश्य यत्न करूँगा।


फिर तो, मेरे प्रेमपूर्वक प्रार्थना करनेपर मुनिवर गर्गजी भगवती जगदम्बिकाकी आराधना करनेके लिये कुछ ब्राह्मणोंको साथ लेकर विन्ध्यपर्वतपर 'चले गये। वहाँ पहुँचकर वे भक्तोंके मनोरथ पूर्ण करनेवाली जगन्माताके जप और पाठ में संलग्न होकर उनकी आराधना करने लगे। 


अनुष्ठान समाप्त होनेपर आकाशवाणी हुई- 'मुने! मैं प्रसन्न हूँ, तुम्हारा कार्य अवश्य सिद्ध होगा। पृथ्वीका भार दूर करनेके लिये मैंने। श्रीविष्णुको आदेश दिया है। वसुदेवके यहाँ देवकीके गर्भसे वे अपना अंशावतार ग्रहण करेंगे। 


उनके प्रकट होते ही वसुदेवजी कंसके डरसे उन्हें लेकर गोकुलमें नन्दजीके घर पहुँचा देंगे। साथ ही यशोदाजीकी कन्याको ले जाकर अपने यहाँ आये हुए कंसको दे देंगे और कंस उस कन्याको जमीनपर दे मारेगा। इतनेमें ही वह कन्या कंसके हाथसे छूट जायगी। 


उसका अत्यन्त मनोहर रूप हो जायगा। मेरा ही अंशरूप विग्रह धारण करके वह विन्ध्यगिरिपर जाकर जगत् के कल्याणमें संलग्न हो जायगी।'


इस प्रकार आकाशवाणी सुनकर मुनिवर गर्गजीने भगवती जगदम्बिकाको प्रणाम किया। अत्यन्त प्रसन्न होकर वे मथुरापुरीमें आये। मैंने उनके मुखसे देवीका वरदान सुना। सुनते ही हम पति-पत्नी दोनोंको बड़ी ही प्रसन्नता हुई। 


मेरे हृदयमें आनन्दका समुद्र उमड़ पड़ा। तभी से भगवती जगदम्बिकाका उत्तम माहात्म्य मैं जानता था। देवर्षे ! आज भी आपके मुखारविन्दसे वही माहात्म्य मैं सुन रहा हूँ। अतः प्रभो! आप ही मुझे श्रीमद्देवीभागवत सुनानेकी कृपा कीजिये। देवर्षे! आप दयाके सागर हैं। मेरे सौभाग्यसे ही आपका यहाँ पधारना हुआ है।


वसुदेवजीका कथन सुनकर नारदजी प्रसन्न हो गये। शुभ दिन और शुभ नक्षत्रमें उन्होंने कथा आरम्भ कर दी। कथाकी निर्विघ्न समाप्तिके लिये अनेकों ब्राह्मण नवार्ण-जप करने लगे। 


कुछ ब्राह्मणोंने मार्कण्डेयपुराणोक्त दुर्गासप्तशतीका पाठ प्रारम्भ कर दिया। नारदजीने प्रथम स्कन्धसे कथा आरम्भ की। वसुदेवजी भक्तिपूर्वक सुनते रहे। नवें दिन कथा-प्रसंग समाप्त हुआ। महाभाग वसुदेवजीने प्रसन्न होकर पुस्तक और कथावाचककी यथोचित पूजा की। 


उस समय भगवान् श्रीकृष्णका जाम्बवान्‌के साथ बिलमें युद्ध चल रहा था। पश्चात् भगवान् श्रीकृष्णके मुष्टिप्रहारसे जाम्बवान् घायल हो गया। उसकी देह रक्तसे सन गयी। फिर जब चेत हुआ तब उसने भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंमें मस्तक झुकाया और अपार श्रद्धा प्रकट करता हुआ वह उनसे अपना अपराध क्षमा कराने लगा। 


उसने कहा- 'भगवन्! मैं आपको जान गया। आप ही राघवेन्द्र भगवान् श्रीराम हैं। आपके क्रोधसे समुद्र क्षुब्ध हो उठा था, लंका चौपट हो गयी और सपरिवार रावण कालका ग्रास बन गया। भगवन्! वे ही आप अब श्रीकृष्णरूपसे पधारे हैं। मेरी उद्दण्डता क्षमा करें। 


प्रभो! मैं सब तरहसे आपका सेवक हूँ। उचित आज्ञा देनेकी कृपा करें।' जाम्बवान्‌की बात सुनकर जगत्प्रभु भगवान् श्रीकृष्णने कहा- 'ऋक्षराज! हम मणिके लिये यहाँ बिलमें आये हैं।' फिर तो ऋक्षराज जाम्बवान्ने प्रीतिपूर्वक भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा की। अपनी कन्या जाम्बवतीका उनके साथ विवाह कर दिया। और मणि भी साँप दी। 


तब श्रीकृष्णने जाम्बवतीको पत्नीरूप में स्वीकार करके मणि गले में धारण कर ली और जाम्बवान् से विदा लेकर वे द्वारकाके लिए प्रस्थित हो गए। उसी दिन देवीभागवत की कथा निकली। उदारबुद्धि वसुदेवजीने ब्राह्मणों को भोजन कराकर उन्हें दक्षिणासे प्रसन्न किया। 


विप्रगण आशीर्वाद दे रहे थे कि उसी समय भगवान् श्रीकृष्ण मणि धारण किये हुए पत्नीके साथ वहाँ आ पहुँचे। भार्यासहित श्रीकृष्णचन्द्रको वहाँ पधारे देखकर वसुदेव प्रभृति जितने लोग थे, सबके नेत्र आनन्दके आँसुओंसे डबडबा गये और हृदयमें हर्षकी बाढ़ सी आ गयी। 


तदनन्तर देवर्षि नारदजी भगवान् श्रीकृष्णके आगमनसे हर्षित हो श्रीकृष्णचन्द्र और वसुदेवजीसे आज्ञा लेकर ब्रह्मसभाको चल दिये। भगवान् श्रीहरिका जो यह चरित्र है, उसके प्रभावसे अपयश शान्त हो जाता है। शुद्धचित्त होकर निर्मल भक्तिके साथ जो इसे पढ़ता अथवा सुनता है, वह पूर्ण सुखी हो जाता है। जगत् में उसकी अभिलाषा अधूरी नहीं रह सकती और अन्तमें वह आवागमनसे मुक्त हो जाता है।



 अध्याय 02