॥ सुद्युम्न का स्त्रीत्व प्राप्ति वृत्तान्त ॥ 

परीक्षित अवलोकन लगे - मुनिवर! सब मन्वन्तर और उनमें हरि के किये चरित्र सुने । सत्यव्रत राजर्षि ने मत्स्यरूप की आराधना कर उनसे पहले कल्प में ज्ञान प्राप्त किया। वही इस कल्प में विवस्वान का पुत्र हो वैवस्वतमनु हुआ और उसके इश्वाकु आदि पुत्र हुये, उनका सब वर्णन सुना। 


हे ब्रह्मन् ! अब उनके वंश के राजाओं के चरित्रों का वर्णन कीजिये । श्रीशुकदेवजी बोले- हे परंतप ! परम पुरुष कल्पान्त में विश्व रूप हुआ था और उसकी नाभि से हिरण्यमय कमल हुआ और उसमें चतुर्मुख ब्रह्मा हुआ। ब्रह्मा से मरीचि हुआ, मरीचि से कश्यप तथा कश्यप से दक्ष की अदिति नामक पुत्री से सूर्य हुआ। सूर्य श्राद्धदेव की श्रद्धारानी से इक्ष्वाकु, नृग, शर्याति, दिष्ट, घष्ठ, कुरुष्क, नरिष्यन्त पृषघ्र, नभग और कवि ये वंश पुत्र हुए। 

मनु से पहिले सन्तान निमित्त वशिष्ठजी ने मित्रावरण को यज्ञ कराया था। पयोव्रत धारे मनु की श्रद्धा पत्नी ने होता के पास आ पुत्र के लिए प्रार्थना की। तब अध्वर्यु के कहने से होता ने पुत्री का ध्यान कर आहुति दी। होता के इस अपराध से इला नाम की कन्या हुई उसको देख मनु दुखी हो गुरु से बोले - हे ब्रह्मन् ! यह क्या हुआ! ब्रह्मा वादियों का यह कर्म अन्यथा कैसे हो गया ? वशिष्ठजी बोले संकल्प में यह विषमता होता के अपराध  से हुई है तथापि तेजोबल से इस कन्या को पुत्र बना देंगे। 

हे राजन्! ऐसा विचार करके वशिष्ठ जी ने इला को पुरुष बनाने की इच्छा से भगवान् की स्तुति की। भगवान् ने प्रसन्न होकर वर दिया और इला सुद्युम्न नामक पुरुष बन गई। एक दिन सुद्युम्न सिन्धुदेश के घोड़े पर बैठ मित्रों के साथ बन में विचरता हुआ मृगों को बेधता उत्तर की ओर चला गया। सुमेरु की तलहटी के वन में पहुँचा जहाँ महादेवजी पार्वती के साथ विहार करते थे। हे राजन् ! उस स्थान में प्रवेश करते ही मुद्युम्न स्त्री हो गया और घोड़ा घोड़ी हो गया। उसके सब साथी भी स्त्री बन गये । परीक्षित ने पूछा- हे भगवान् ! इस देश में ऐसा वह क्या गुण है? 

शुकदेवजी बोले- एक समय ऋषि महादेव के दर्शन को गये। उनको देख पार्वती नग्न होने के कारण लज्जित हुई और पति की गोद से उठ झटपट अधोवस्त्र धारण करने लगीं और शाप दिया कि जो इस स्थान में आयेगा वह स्त्री हो जायेगा। इसी कारण स्त्री रूप सुद्युम्न वन-वन घूमने लगी। 

आश्रम के समीप ही सखियों के साथ उस स्त्री को विचरती देख चन्द्रपुत्र बुध के मन में उसकी अभिलाषा हुई। वह भी बुध को पति के लिये इच्छा करने लगी और दोनों के संयोग से पुरूरवा हुआ। स्त्री होने पर भी सुद्युम्न वशिष्ठजी का स्मरण करता रहा। वशिष्ठजी उसकी दशा देखकर उसको फिर पुरुष बनाने की इच्छा से शंकर की आराधना करने लगे। 

शिवजी ने प्रसन्न हो कहा कि तुम्हारा शिष्य एक महीने स्त्री और एक महीने पुरुष रहा करेगा। इस प्रकार कुलगुरु के अनुग्रह से पुरुष हो राज्य करने लगा। इसके उत्कल, गय और विमल तीन पुत्र हुए, ये दक्षिण में राज्य करने लगे। सुद्युम्न वृद्धावस्था में पुरूरवा को राज्य देकर वन में चला गया।

॥ करुषादिक पंचपुत्र का वंश वृत्तान्त ॥

श्री शुकदेवजी बोले - सुद्युम्न के वन जाने पर वैवस्वत मनु ने पुत्र की इच्छा से यमुना तट पर सौ वर्ष तक तप किया। तप से इसके आत्मदृश्य इश्वाकु आदि दस पुत्र हुए। गुरु ने मनु के पुत्र को पृषघ्र की गौओं की रक्षा को नियत किया। एक दिन रात्रि में मेह बरस रहा था इतने में एक व्याध खिड़की में घुसा, उसके डर से गायें इधर-उधर भागने लगीं। उनमें से एक गौ को बाघ ने पकड़ लिया वह डकारने लगी तो उसकी ध्वनि सुन पृषघ्र दौडा । रात्रि के अंधकार में बाघ की शंका से गौ का सिर काट डाला, बाघ भी कानों के कट जाने पर भाग गया। 

पृषघ्र ने विचारा कि बाघ मर गया परन्तु दिन में जब गौ मरी देखी तब बड़ा दुखी हुआ। वशिष्ठजी ने पृषघ्र को शाप दिया 'तू शूद्र होगा।' पृषघ्र गुरु के शाप को अंगीकार कर ब्रह्मचर्य व्रत से मुनि धर्म पालने लगा। इस नियम से वन में दावाग्नि से मर गया और ब्रह्मा से जा मिला। मनु के पुत्रों में छोटा कवि बचपन में ही विषय- वासनाओं को त्याग, ब्रह्मा को हृदय में रख वन में जाकर परमात्मा से मिल गया। करूष के करुष नाम के क्षत्रियों की जाति हुई और उत्तर दिशा में राज्य करने लगे। धृष्ट से आर्ष्ट नाम के क्षत्री हुए जो पृथ्वी में ब्राह्मण बन गये। 

नृग के वंश में सुमति हुआ इसका पुत्र भूतज्योति का वसु, वसु का प्रत्रीक, प्रत्रीक का ओधवान्, ओधवान् का औधवान और औधवती कन्या भी जो सुदर्शन को ब्याही गई। मनु के पुत्र नरिष्यन्त के चित्रसेन, इसके ऋक्ष, ऋक्ष के मीढ़वान्, मीढ़वान के कूर्च, कूर्च के इन्द्रसेन के वीतिहोत्र, इसके सत्वश्रवा, इसके उरूश्रवा, इसके देवदत्त, देवदत्त के अग्निवेश्य हुए। इन्हीं को जातूकर्ण्य और कानीन भी कहते हैं। 

हे राजन् ! इन्हीं ब्रह्मकुल को अग्नि वैशम्पायन कहते हैं यह नरिष्यन्त का वंश हुआ। अब दिष्ट के वंश का वर्णन करते हैं। दिष्ट के पुत्र का नाम नाभाग था वह कर्म से वैश्य हो गया, फिर नाभाग का भलनन्दन, इसके वत्सप्रीति इसके प्रान्शु, इसके प्रमति, प्रमति के चाक्षुष और इसका विर्विशति हुआ। विर्विशति का रम्भ, रम्भ का खनिनेत्र, इसका करन्धम हुआ। करन्धम के अवीक्षित और अवीक्षित के मरुत हुआ। फिर मरुत के दम और दम के राज्यवर्धन, इसके सुधृति और सुधृति के नर हुआ। नर का केवल, केवल का वन्धुमान और इसका बेगमान हुआ, बेगमान का बन्धु और बन्धु का तृणविन्दु और तृणविन्दु से सेलम्बुषा अप्सरा ने विवाह किया इससे कई पुत्र हुए और इडविडा नाम की कन्या हुई। 

इससे विश्रवा के कुबेर हुआ इसने अपने पिता से अन्तर्ध्यान होने की विद्या प्राप्त की थी। तृगाविन्दु के विणाल, भून्यबन्धु और धूम्रकेत तीन पुत्र हुए, इनसे विशाल वंश चला और इसने बैशाली नामक पुरी बसाई थी। विशाल का हेम चन्द्र, इसका धूम्राक्ष, उसका समय हुआ इसके कृशाश्व और सहदेव दो हुए। कृशाश्व का सोमदत्त हुआ जिसने अश्वमेध कर भगवान को संतुष्ट किया। सोमदत्त का सुमति और सुमति का जनमेजय हुआ इस तरह ये विशाल वंश के राजा हुए।

॥ मनु तनय शर्याति का वंश वर्णन ॥

श्रीशुकदेवजी कहने लगे - मनु के शर्याति ब्रह्मनिष्ठ पुत्र हुआ जिसने अंगिराओं को यज्ञ के द्वितीय दिवस का कर्त्तव्य कर्म सुनाया था। इसको लेकर वे वन में च्यवन के आश्रम में गये। कन्या सखियों के साथ वृक्षों को देखती थी कि इतने में उसने एक बांबी से दो ज्योति चमकती हुई देखीं। कन्या ने एक काँटा दोनों ज्योतियों को बिना जाने छेद दिया जिससे उसमें से रुधिर बह आया तथा सेना के लोगों का मलमूत्र बन्द हो गया। 

यह देखकर राजा ने पूछा कि तुममें से किसी ने च्यवन ऋषि का तो अपराध नहीं किया है ? हमको विदित होता है कि किसी ने आश्रम दूषित किया है। सुकन्या पिता से कहने लगे कि एक बांबी में दो तारे चमक रहे थे उनको मैंने छेद दिया। बेटी की बात सुनकर शर्याति भयभीत हो ऋषि को धीरे-धीरे प्रसन्न करने लगा। फिर उनके अभिप्राय को समझ कन्या उसको अर्पण कर दी और आप निर्मुक्त हो चला आया। सुकन्या च्यवन ऋषि को पति पा उनकी इच्छानुकूल सेवा कर प्रसन्न रखने लगी। 

एक दिन अश्विनी कुमार आश्रम में आये उनका सत्कार कर च्यवन ऋषि ने कहा कि आपको यज्ञ में भाग नहीं मिलता है, उसका मैं यत्न करूँगा। आप मेरी अवस्था और रूप ऐसा कर दो कि स्त्रियाँ रीझने लगें। यह सुन उन्होंने कहा- ऐसा ही होगा, आप इस सिद्ध सरोवर में स्नान कीजिए। यह कहकर उन्होंने देह सरोवर में प्रविष्ट कर दी। उसमें से रूप और अवस्था में समान तीन पुरुष निकले। उन तीनों को रूपवान देख सुकन्या न पहचान सकी कि मेरा पति कौन-सा है, अतः इस हेतु अश्विनी कुमारों से प्रार्थना करने लगी। तब उसके पतिव्रत धर्म से प्रसन्न हो उन्होंने पति बता दिया और आपने विदा हो स्वर्ग को गए। 

इसी अवसर में यज्ञ की इच्छा से शर्याति च्यवन ऋषि के आश्रम में आया और अपनी बेटी के पास एक सूर्य समान पुरुष को बैठा देखा। बेटी ने प्रणाम किया परन्तु वह बिना आशीर्वाद दिए ही उससे बोला- यह तूने क्या किया कि तू मुनि का तिरस्कार कर और पुरुष का सेवन करती है ? हे सत्कुल सम्भवे ! तेरी मति कैसी हो गई यह बात कुल कलंक की है। पुत्री बोली- हे तात! ये आपके जमाता भृगुनन्दन ही हैं। जिस तरह उनको यह अवस्था मिली वह पिता से कह दिया। पिता ने प्रसन्नता से बेटी को हृदय से लगाया। तदन्तर च्यवन ने राजा से सोमयज्ञ कराकर जाति बहिष्कृत करा अश्विनी कुमारों को सोमपान कराया। इस पर इन्द्र ने ऋषि को मारने को वज्र उठाया। च्यवन ने इन्द्र की वज्रसहित भुजा को वहाँ ही स्तम्भित कर दिया। तब इन्द्र की भुजा छूटने के निमित्त, जो अश्विनी कुमार वैद्य होने के कारण सोम की आहुति से बाहर निकाल दिये गये थे उन्हीं को सब देवगण सोम का पात्र समझने लगे।

शर्याति के उत्तानवर्हि, आनर्त और भूरिषेण तीन पुत्र हुए और आनर्त के रेवत हुआ। रेवत के ककुमी आदि सौ पुत्र हुए और ककुमी रेवती को लेकर वर पूछने को ब्रह्मा के पास गया। ब्रह्मा बोले- हे राजन् ! जिन राजाओं को आपने कन्या देने का विचार किया था सब काल ने नष्ट कर दिए अब उनके पुत्र-पौत्र, नाती और गोत्रादि का पता नहीं है। अब भगवान् के अंश से महाबली बलदेव पैदा हुए हैं। बलदेव को यह कन्या रत्न दीजिए, यह आज्ञा पाकर ककुमी अपने नगर आया तो क्या देखता है कि उसके भाई यक्षों के डर से अन्य दिशाओं में भाग गये हैं यह देख कन्या का विवाह कर, आपने तप करने बद्रिकाश्रम चला गया।

॥ नाभाग और अम्बरीष का वृत्तान्त ॥

श्रीशुकदेवजी बोले - नभ का बेटा नाभाग विद्या पढ़ने गुरु के घर गया था। उसके जाने पर बाकी भाइयों ने पिता का धन आपस में बाँट लिया और सोचा कि वह सदा ब्रह्मचारी ही रहेगा। जब नाभाग आया तब उसने अपना भाग माँगा। वे कहने लगे कि तुम्हारे भाग में पिता आया है। यह सुन पिता से बोला- आप मेरे भाग में आये हैं ? पिता ने कहा कि यद्यपि उन्होंने तुझे यह धोखा देने को कहा है क्योंकि मैं द्रव्य के समान नहीं हूँ तथापि उन्होंने मुझे दिया है तो मैं तुझे जीवन निर्वाह का उपाय बताता हूँ। 

अंगिरा के गोत्रज द्वादशाह नामक यज्ञ करते हैं, ये छठे दिन के कर्तव्य कर्म भूल जाते हैं। तू वहाँ जा उनको दो सूक्त पढ़ा दो। जब वे स्वर्ग जायेंगे तब शेष धन दे जायेंगे। यह सुन उसने वैसा ही किया और वे यज्ञ का शेष धन उसे दे गये। जब वह धन इकट्ठा कर रहा था तब एक कृष्ण वर्ण मनुष्य उत्तर दिशा से आकर कहने लगा, यह धन मेरा है। नाभाग बोला कि मेरा है। 

वह मनुष्य बोला- हमारे झगड़े का निबटारा तेरा पिता करेगा, नाभाग ने पिता से पूछा। तब पिता ने कहा यज्ञ में शेष रहा धन रुद्र का है। ऐसा ऋषियों ने निर्णय दिया है। तब नाभाग कहने लगा- हे प्रभो! यह द्रव्य आपका है, ऐसा मेरे पिता ने कहा है। यह सुन वह बोला तू सत्य बोलता है इसलिए तुझे ब्रह्म का साक्षात्कार होगा। यह द्रव्य भी तुझको देता हूँ। यह कहकर रुद्र अन्तर्ध्यान हो गए। तदनन्तर नाभाग का पुत्र अम्बरीष हुआ। 

परीक्षित ने पूछा- हे मुनिवर! मैं उस राजर्षि का चारित्र सुनना चाहता हूँ। शुकदेवजी बोले - हे महाभाग ! अम्बरीष को सातों द्वीप, अक्षय लक्ष्मी और वैभव मिला था उसने भगवान् की भक्ति के अतिरिक्त कुछ नहीं किया। उसकी सेवा दास्यभाव की थी। इसकी शक्ति से प्रसन्न होकर भगवान् ने रक्षा को सुदर्शन नियत कर दिया। अपने तुल्य रानी के साथ इसने एक वर्ष के एकादशी व्रतों का संकल्प किया। तत्पश्चात् साठ करोड़ ब्राह्मणों की आज्ञा से राजा पारायण खोलने ही को था कि दुर्वाषा ऋषि आ गये। 

राजा ने उठकर अर्घ्य पाद्य देकर आसन दिया और भोजन के लिए प्रार्थना की। राजा की प्रार्थना स्वीकार कर ऋषि मध्याह्न सध्या करने के लिए गए और पारायण खोलने को घड़ी भर रही थी, इससे राजा धर्म संकट में पड़ गया और विचार करने लगा। हे ब्राह्मणों! ब्राह्मण अतिक्रमण में दोष है अथवा द्वादशी में पारायण न खोलने में दोष है। इन दोनों में से यह बतलाइये, जिससे अधर्म स्पर्श न करे, मेरी समझ से जल से पारायण खोलना आता है क्योंकि जल भोजन में नहीं है इस तरह राजर्षि जल से पारायण खोल दुर्वासा की प्रतीक्षा करने लगा। इतने में दुर्वासा नित्यकर्म से निश्चिन्त होकर आए। 

उसी समय क्रोध से दुर्वासा ने कहा - देखो इस वैभव उन्मत्त राजा ने अतिथि निमन्त्रण देकर बिना मुझे भोजर कराए भोजन कर लिया। यह कहकर एक बाल उखाड़कर उसने एक कृत्या उत्पन्न की। परन्तु भगवान् ने भक्त की रक्षा की हेतु सुदर्शन पहले ही नियत कर लिया था, इसने कृत्या को जला दिया। अपने प्रयोग को निष्फल और चक्र को पीछे आता देख दुर्वासा भागे, चक्र भी उनके पीछे चला। ब्रह्मा तथा शिव किसी ने शरण नहीं दी और कहा कि जिनका यह अस्त्र है उन्हीं की शरण में जाओ। 

महादेव कहने लगे- तब दुर्वासा बैकुण्ठ में गए। उस शस्त्र की ज्वाला से जलते हुए उनके चरण पड़कर कहने लगे - हे भगवान्! मैं अपराधी हूँ मेरी रक्षा करो। भगवान् बोले- हे द्विज! मैं भक्तों के अधीन हूँ। हे विप्र ! मैं उपाय बताता हूँ वही करो, जिसका तूने अपराध किया है उसी के पास जाओ। तप और विद्या ये दोनों ब्राह्मणों के लिए श्रेयस्कर हैं परन्तु दुर्विनीत के लिए अमंगल स्वरूप हैं।

॥ दुर्वासा की प्राण रक्षा ॥

शुकदेवजी कहने लगे - चक्र की पीड़ा से दुर्वासा भगवान् की आज्ञानुसार अम्बरीष के पास गए और उसके पाँव पकड़ लिए। उनके कष्ट को देखकर राजा चक्र की प्रार्थना करने लगा - हे चक्र ! आप ही अग्नि हो, आपको नमस्कार है। आप इस ब्राह्मण की रक्षा करो, नहीं तो ब्रह्महत्या से हमारी अपकीर्ति और कुल का नाश होगा।

हे राजन्! जब राजा ने प्रार्थना की तब सुदर्शन शान्त हो गया। जब दुर्वासा शाप से छूट गए तब आशीर्वाद दे राजा की प्रशंसा करने लगे। तुम करुणावान् हो, तुमने मेरे पाप को पीठ पीछे करके प्राणों की रक्षा की है। राजा ने उनके आने की आकांक्षा से भोजन नहीं किया था इसलिए उनके चरणों को पकड़ प्रसन्न कर भोजन कराया। आदरपूर्वक आतिथ्य सत्कार से भोजन कर दुर्वासा राजा से कहने लगे - तुम भी भोजन करो। तुम्हारे दर्शन, स्पर्श, सम्भाषण और अतिथ्य-सत्कार से मैं बड़ा प्रसन्न हुआ। दुर्वासा राजा की प्रशंसा कर ब्रह्मलोक को चले गए। 

चक्र के डर से भागे हुए मुनि एक वर्ष में आए थे और राजा ने उनके दर्शन की अभिलाषा में केवल जलपान कर समय व्यतीत किया था। दुर्वासा के चले जाने पर भोजन कर अम्बरीष प्रसन्न हुए। ऐसे अनेक गुणों से युक्त राजा अम्बरीष वासुदेव के भक्त थे। फिर अपने ही समान गुणयुक्त पुत्रों को राज्य देकर वन को चले गए और संसार से मुक्त हो गए। 

॥ अम्बरीष का वंश वर्णन ॥

शुकदेवजी बोले- विरूप, केतुमान और शम्भु ये अम्बरीष के पुत्र थे। विरूप का पृषदश्व और इसका पुत्र रथीतर था। रथीतर के कोई सन्तान नहीं थी। अंगिरा की प्रार्थना से उसके तीन पुत्र उत्पन्न हुए ये उनको अंगिरास कहने लगे। ये रथकारों में मुख्य हुए। छींक लेते समय नासिका से इक्ष्वाकु उत्पन्न हुआ, इसके सौ पुत्र थे। इनमें से विकुक्षि, निमि और दण्डक बड़े थे। 

एक दिन इक्ष्वाकु ने अष्टका श्राद्ध करने को पुत्र को आज्ञा दी कि हे विकुक्षे! तुम मांस ले आओ। वह वन में श्राद्ध के योग्य मृगों को मारते मारते थक गया और थकावट से बेसुध हो गया और एक ग्रास को स्वयं खा गया। शेष लाकर पिता को दिया। जब श्राद्ध करने बैठे तो आचार्य ने कहा कि माँस अपवित्र है। गुरुमुख से पुत्र के कर्म सुन इक्ष्वाकु ने उसको अपने देश से निकाल दिया। 

तदन्तर इक्ष्वाकु ने वशिष्ठ से संभाषण कर योगी हो प्राण त्याग दिया। पिता के मरणे पर विकुक्षी वन में आ राज करने लगा और यज्ञों द्वारा हरि का पूजन कर शशाद नाम से विख्यात हो गया। विकुक्षी के एक पुत्र हुआ उसको कर्मों के अनुसार पुरंजय, इंद्रवाहन और ककुत्स्य इन नामों से पुकारने लगे। इंद्र से इसने युद्ध में सहायता माँगी गई थी।

इसने कहा कि इन्द्र मेरा वाहन होगा तो मैं दैत्यों से लडूँगा। इन्द्र ने यह स्वीकार किया परन्तु भगवान् के कहने से बैल का रूप धारण कर लिया जब राजा बैल के कन्धे पर चढ़ बैठा। विष्णु के तेज से पश्चिम दिशा में जा राजा ने दैत्यों की पुरी को घेर लिया तब उनका घोर संग्राम हुआ, उसमें राजा ने दैत्यों को मारकर सदेह यमलोक पहुँचा दिया। सम्पूर्ण धन और पुरी जीतकर इन्द्र को दी, इसने दैत्यपुरी जीती थी इसलिए पुरंजय, इन्द्र पर चढ़ा था इसीलिए इन्द्रवाहन और बैल के कन्धे पर बैठा था इसलिए ककुत्स्थ नाम हुआ। पुरंजय के अनेमा, इसके पृथु, इसके विश्रधी व इसके इन्द्र और इसके युवनाश्व हुआ। युवनाश्व के शावस्त, इसने शावस्तापुरी बनाई इसके बृहदाश्व और बृहदाश्व के कुवलयाश्व हुआ। 

इसने उतंग ऋषि का हित करने को इक्कीस हजार बेटों को साथ ले धुन्धुमार को मार गिराया। इसलिए इसका नाम धुन्धुमार हो गया परन्तु मरते समय इस राक्षस के मुख से ऐसी ज्वाला निकली कि इसके सब पुत्र जल गये। केवल तीन दृढ़ाश्व, कपिलाश्व और भद्राश्व बचे थे। दृढ़ाश्व के हयश्व, इसके निकुम्भ हुआ। निकुम्भ के बर्हणाश्व इसके कृशाश्व और इसके सेनजित हुआ। सेनजित के यौवनाश्व हुआ यौवनाश्व पुत्रहीन था। इसलिए वह अपनी सौ रानियों को संग लेकर वन चला गया वहाँ ऋषि ने प्रसन्न हो पुत्रोत्पत्ति को इन्द्र यज्ञ किया। 

राजा को रात्रि में प्यास ने सताया तो चुपचाप उठ ब्राह्मणों को सोते देख अभिमन्त्रित जल को पीकर गया। जब ऋषियों ने देखा तो घड़े में जल नहीं, तब पूछने लगे कि पुत्र उत्पत्ति करने वाला जल किसने पी लिया है ? जब उनको विदित हुआ कि जल राजा ने पिया है तब बोले कि ईश्वर की माया प्रबल है। फिर समय पूरा होने पर यौवनाश्व की दोहिनी कोख फाड़कर चक्रवर्ती पुत्र हुआ। 

तब यह सन्देह हुआ कि यह बालक किसके स्तन पान करेगा। तब इन्द्र बोला इसे दूध मैं पिलाऊँगा और तर्जनी अँगुली उसके मुख में दे दी। विप्रदेवों की कृपा से पिता भी न मरा और उसी जगह तप कर परमपद को प्राप्त हो गया। 

हे राजन् ! इन्द्र ने इसका नाम त्रसदस्यु रखा क्योंकि इसके भय से दस्यु काँपते थे। यह युवनाश्व का बेटा मान्धाता चक्रवर्ती हुआ। शशबिन्दु की बेटी बिन्दुमती से इस राजा के पुरूकुस, अम्बरीष और मुचुकुन्द तीन पुत्र हुए थे। इसकी पचास बहिन सौभरि ऋषि को ब्याही गई थीं, यह ऋषि यमुना जल में बैठ तप करते थे कि एक दिन मच्छ-मच्छियों को मैथुन करते देखा तब इनको विवाह की उत्कण्ठा हुई और राजा से कन्या माँगी। 

यह सुन राजा ने कहा हे ब्रह्मन् ! जो कन्या स्वयंवर में आपको वर ले, उसी को ले लीजिए। राजा ने ऐसा इसलिए कहा कि वृद्ध को देख मेरी कन्या न वरेगी। सौभरि ऋषि ने विचारा कि मैं अपना रूप ऐसा बनाऊँगा जिसको देख देवांगना भी मोहित हो जायें। जब उस रूप को धर ऋषि अन्तःपुर में गये तब सब कन्या बोल उठीं हम वरेंगी। जब उनमें झगड़ा होने लगा तब सौभरि बोले-लड़ो मत, सब चली आओ। वे ऋषि उन कन्याओं को ले जाकर ऐसे स्थान में रमण करने लगे जिसमें उनके तपोबल से प्रत्येक वस्तु संचित थी। 

सौभरि ऋषि के गार्हस्थ्य भोगविलास को देख मान्धाता अपने सातों द्वीप के राज्यों को तुच्छ समझने लगा। यद्यपि घर में अनुरक्त सौभरि अनेक प्रकार के भोगों को भोगता था परन्तु उसकी तृप्ति नहीं हुई। एक दिन बैठे-बैठे सौभरि को ज्ञान हुआ जो ब्रह्मस्वरूप था, वह विस्मृत हो गया। एक समय था कि मैं अकेला ही जल में जप करता था, अब मेरे पचास स्त्री हुईं और इनके ५००० सन्तान हुईं तथापि मेरे इस मनोरथों का अन्त नहीं आता है। 

माया के गुणों से मेरी बुद्धि नष्ट हो गई है। इस तरह गृहस्थ के सुखों को भोगते हुए विरक्त हो सौभरि ऋषि वन चले गए। तब उनकी पतिव्रता स्त्रियाँ उनके पीछे चली गईं। ऋषि ने जितेन्द्रिय हो शरीर को सुखा देने वाला घोर तप किया और आत्मा को परमात्मा में मिला दिया। हे राजन् ! वे स्त्रियाँ अपने पति की अध्यात्म गति देखकर उसके प्रभाव से आपने भी उसके पीछे चली गईं।

॥ हरिश्चन्द्र का उपाख्यान ॥

शुकदेवजी कहने लगे - हे राजन् ! मांधाता के पुत्र अम्बरीष को उसके बाबा युवनाथ ने गोद लिया था। अम्बरीष का बेटा हारीत हुआ, यह अम्बरीष और यौवनाश्व मान्धाता के कुटुम्ब में प्रवर था। सर्पों ने पुरुकुत्स को अपनी बहिन नर्मदा विवाह दी। वासुकी के कहने से नर्मदा पति को रसातल ले गई, वहाँ पुरकुत्स ने बध के योग्य गन्धर्वों को मारा। इस पर प्रसन्न हो सर्पों ने वर दिया कि जो इस चरित्र को पढ़ेगा। उसको सर्पों से भय न होगा। 

इसके त्रसदस्यु हुआ और इसके अनरण्य हुआ। इस अनरण्य के हर्यश्व हुआ इसके अरुण और अरुण के निबन्धन हुआ, इसके सत्यव्रत हुआ जिसको त्रिशंकु कहने लग गये थे। इसने ब्राह्मण को विवाह होते समय हर लिया था इसलिये क्रुद्ध हुए वशिष्ठ के शाप से चांडाल हो गया था और विश्वामित्र के तेजोबल से सदेह स्वर्ग गया। 

वहाँ से देवताओं ने उसे औंधा फेंका परन्तु विश्वामित्र ने वहीं रोक दिया। इसी त्रिशंकु का पुत्र हरिश्चन्द्र हुआ, हरिश्चन्द्र के पुत्र नहीं हुआ इससे वह खिन्न हो नारद के कहने से वरुण की शरण में गया और कहने लगा- हे प्रभो! पुत्र हो, ऐसा उद्योग करो। यदि मेरे पुत्र होगा तो इसी पुत्र द्वारा मैं आपका पूजन करूँगा, जब राजा ने ऐसा प्रण किया तब वरुण के कहने से रोहित नाम पुत्र हुआ। 

तब वरुण ने कहा- हे राजन्! पुत्र हो गया, तू मेरा पूजन कर। हरिश्चन्द्र ने कहा यह दस दिवस में शुद्ध होगा। ग्यारहवें दिन वरुण ने फिर कहा, अब पूजन करो तब राजा ने कहा- ये दाँत निकलने पर पवित्र होगा। दाँत निकलने पर वरुण ने फिर कहा- अब पूजन करो। तब राजा ने कहा- दाँत गिरने पर पवित्र होगा। दाँतों के गिरने पर, फिर कहा पूजन करो। राजा ने कहा- जब नये दाँत आ जायेंगे तब पवित्र होगा। 

इस तरह स्नेह से राजा धोखा देकर काल को बिताता रहा और वरुण भी प्रतीक्षा करता रहा। जब रोहित को मालूम हुआ कि मुझ ही से वरुण यज्ञ होगा तब प्राण बचाने के लिए धनुष बाण लेकर वन चला गया। तब यज्ञ होने में निराश वरुण ने हरिश्चन्द्र के पेट में जलोदर रोग उत्पन्न किया। जब रोहित ने सुना तब वह नगर को आने लगा परन्तु इन्द्र ने रोक दिया। इन्द्र के कहने पर रोहित एक वर्ष वन में रहा। इसी तरह हर साल जब रोहित घर आने लगता तब ही इन्द्र आकर समक्षाता रहा। इस तरह छठा वर्ष व्यतीत कर अजागर्त के बिचले पुत्र शुनशेफ को मोल ले पुरी में आया और अपने बदले शुनशेफ नाम पशु पिता को दे नमस्कार किया। तब हरिश्चन्द्र के पुरुषमेध करके वरुणादिक देवताओं का पूजन किया और उदर रोग से छूट गया । 

इस यज्ञ में विश्वामित्र होता थे, जमदग्नि अध्वर्यु थे, वशिष्ठ ब्रह्मा हुए और अगस्त्य मुनि उद्गाता थे। इस यज्ञ से इन्द्र प्रसन्न होकर हरिश्चन्द्र को सुवर्ण रथ दे गया । राजा रानी दोनों को सत्यवक्ता और धैर्यवान देख विश्वामित्र ने ज्ञान उपदेश किया जिससे राजा को मोक्ष प्राप्त हुआ।

॥ सगर वंश का वर्णन ॥

शुकदेव कहने लगे - रोहित के हरित, हरित के चंप हुआ जिसने चंपापुरी बसाई। उससे सुदेव और सुदेव से विजय हुआ, विजय के भरुक, भरुक के बृक, बृक के बाहुक हुआ इनकी भूमि शत्रुओं ने छीन ली इसलिए स्त्री को साथ लेकर वन चला गया । जब वृद्ध होकर मरा तब इसकी रानी सती होने लगी किन्तु उसको गर्भवती समझ अन्य रानियों ने विष दे दिया, तब वह बालक विष सहित उत्पन्न हुआ ।

इसी से उसका नाम सगर पड़ा, यह सगर चक्रवर्ती हुआ। इसके पत्रों ने सागर बनाया। इसने गुरु की आज्ञा से तालजंघ, यवन, शक, हैहय और बर्बरों का वध किया। और्व ऋषि ने कहने से अश्वमेध यज्ञों से हरि का पूजन किया। यज्ञ के लिए जो घोड़ा छोड़ा उसको इन्द्र हर ले गया। पिता के आज्ञाकारी साठ हजार पुत्र अश्व ढूंढ़ने को निकले और पृथ्वी खोदने लगे। खोदते- खोदते पूर्वोत्तर दिशाओं में कपिल देव के पास घोड़े को बँधा देखा और कहने लगे कि यह चोर है और मारो-मारो कहते हुए दौड़े। तब मुनि ने आँखें खोलीं । 

कपिल मुनि की दृष्टि पड़ते ही वे तत्क्षण भस्म हो गये। सगर की केशिनी नामक दूसरी रानी थी। इसके असमंजस हुआ और इसके अंशुमान हुआ। अंशुमान अपने बाबा का आज्ञाकारी हुआ। असमंजस पूर्वजन्म में योगी था जो कुसंग से योगभ्रष्ट हो इस जन्म में ऐसे निन्दित कर्म करता था। इन कुलक्षणों के कारण पिता ने निकाल दिया। 

अपने बाबा के कहने से अंशुमान घोड़े को ढूँढ़ने निकला और उसी मार्ग में गया जो उसके पुरुखों ने खोदा था। वहाँ भस्म की ढेरी के पास उसने घोड़े को बँधा देख, वहाँ कपिल मुनि को बैठा देख हाथ जोड़कर स्तुति करने लगा - हे परमात्मन् ! आपको ब्रह्मा भी नहीं देख सकता है। आप सत् और असत् दोनों से पृथक हैं, केवल ज्ञानोपदेश के लिये ही आपने यह देह धारण की है। हे पुराण पुरुष! मैं नमस्कार करता हूँ। आपने माया से यह लोक रचा है, सर्व भूतान्तार्यामिन ! आपके दर्शन से आज हमारे सब बन्धन कट गये। 

शुकदेव जी कहने लगे कि कपिल भगवान् इस प्रार्थना को सुन अंशुमान से बोले- हे पुत्र! तू अपने बाबा के घोड़े को ले जा और ये तेरे पुरुखों की भस्म है, यह गंगाजल से तरेंगे। तब अंशुमान कपिलदेव की परिक्रमा दे सिर नवाकर घोड़े को ले आया और सगर ने यज्ञ समाप्त किया। तदन्तर राजा सगर अंशुमान को राजगद्दी देकर और्व ऋषि के उपदेश के अनुसार परमगति को प्राप्त हो गया।

॥ भगीरथ द्वारा गंगा अवतरण ॥

श्री शुकदेवजी कहने लगे - अंशुमान ने गंगा पृथ्वी पर लाने के लिए तप किया पर कोई फल न हुआ और अन्त में उसे काल के ग्रस लिया। इसी तरह इसका पुत्र दिलीप बहुत दिन तक तप करने के पश्चात् गंगा के लाने में असमर्थ हो कालग्रस्त हो गया। तब उसका पुत्र भगीरथ घोर तप करने लगा तब गंगा ने प्रसन्न हो दर्शन दिया और कहने लगी 'वर माँग', तब इसने प्रणाम कर अपना अभिप्राय प्रकट किया। 

गंगाजी बोलीं- हे राजन्! मैं जब नीचे उतरूंगी तो मुझे धारण करने की शक्ति शिव में है। इसलिए उन्हें प्रसन्न करो। भगीरथ ने शिव का तप किया। थोड़े ही काल में शिवजी प्रसन्न हो गये और शिव ने राजा के कहे हुए को अंगीकार कर गंगाजल को सिर पर धारण कर लिया। तब भगीरथ गंगा की धार को वहाँ ले गया जहाँ पितरों की भस्म के ढेर लग रहे थे। ब्रह्मशाप से मरे हुए सगर के पुत्र गंगाजल से अपनी देह की भस्म का केवल स्पर्श हो जाने से स्वर्ग चले गये। 

भगीरथ के श्रुतमान पुत्र हुआ, श्रुतेमान का सिंधुद्वीप, सिंधुद्वीप का अयुतायु, इसके ऋतुपर्ण, ऋतुपर्ण के पुत्र का नाम सर्वकाम था। सर्वकाम के सुदास और सुदास के सौदास हुआ यह मदयन्ती का पति था कोई इसे मित्रशह कोई कल्माषांघ्र भी कहते थे। 

इसको वशिष्ठजी ने शाप दिया था, इससे राक्षस हो गया और निःसन्तान मर गया था। परीक्षित ने पूछा- सौदास को गुरु के शाप का क्या कारण था ? शुकदेवजी बोले - सौदास ने एक दिन शिकार में एक राक्षस को मार डाला और उसके भाई को छोड़ दिया, ये राजा से बदला लेने का प्रयत्न करने लगा और रसोइया का रूप धारकर राज भवन में रहने लगा। 

एक दिन वशिष्ठजी को भोजन कराने के लिए मनुष्य का माँस पकाकर ले आया। वशिष्ठ ने उस अभक्ष्य माँस को देखकर कुद्ध होकर शाप दिया- हे राजा! तू राक्षस हो जाएगा। जब वशिष्ठजी को मालूम हुआ कि यह कर्म राक्षस का किया हुआ है. राजा ने नहीं किया, तब अपना वाक्य असत्य न होने को शाप बारह वर्ष पर्यन्त रहेगा, ऐसा कह दिया। राजा ने राक्षस रूप में घूमते हुए एक दिन वनवासी ब्राह्मण-ब्राह्मणी को मैथुन करते देखा। 

यह भूख से व्याकुल था सो खाने को ब्राह्मण को पकड़ लिया। ब्राह्मणी गिड़गिड़ा कर कहने लगी- आप राक्षस नहीं, आप तो इक्ष्वाकु कुल के महारथी हैं। ब्राह्मणी का कहना न मान सौदास ने ब्राह्मण को खा लिया। तब उस पतिव्रता ने क्रोधित होकर राजा को शाप दिया- तुमने मुझ काम पीड़ित का पति खा लिया है, इससे हे नीच! तेरी भी मृत्यु स्त्री के समागम काल में होगी। इस तरह सौदास को शाप दे, ब्राह्मणी पति की हड्डियों को इकट्ठा कर चिता पर रख भस्म होकर पतिलोक चली गई। 

बारह वर्ष पीछे शाप से छूट राजा मैथुन करने को उद्यत हुआ, तब ब्राह्मणी के शाप के कारण रानी ने रोक दिया। तब से राजा स्त्री सुख परित्याग निःसन्तान रह गया। तब राजा की आज्ञा से वशिष्ठ ने मदयन्ती में गर्भ रखा। परन्तु सात वर्ष तक बालक ने जन्म न लिया। 

तब वशिष्ठजी ने रानी के उदर में पत्थर मारा तब पुत्र हुआ इससे उसका नाम अश्मक पड़ा। अश्मक के पुत्र को स्त्रियों ने छिपाया था इससे इसका नाम नारीकवच हो गया। यह क्षत्रीहीन भूमि में क्षत्रियों के वंश का मूल हुआ इससे उसे मूलक कहने लगे। इसके दशरथ, दशरथ के ऐडविड, ऐडविड के विश्वसह इसके खटवांग हुआ। देवताओं ने इस राजा से प्रार्थना की तब इसने दैत्यों को मार भगाया और जब इसे मालूम हुआ, मेरी आयु की दो घड़ी रह गई हैं, तब अपने पुर में आ परमेश्वर में मन लगा दिया और कहने लगा मुझे ब्राह्मणों के वंश से अधिक न प्राण, न पुत्र, न लक्ष्मी, न पृथ्वी, न राज्य, न रानी प्यारी है। 

बाल्यावस्था में मेरी रुचि कभी अधर्म में नहीं लगी, मैं भगवान् के सिवाय किसी वस्तु को नहीं देखता हूँ। देवता ने मुझको अभीष्ट देने के लिए कहा परन्तु मैंने परमेश्वर का निवास मन में होने से वर न मांगा। अब भगवान् की कृपा से व्रत तोड़कर शरण जाता हूँ। इस प्रकार खटवांग देहादि में मिथ्या अभिप्राय का परित्याग कर आत्मभाव में लीन हो गया।

॥ श्री रामचन्द्र का चरित्र वर्णन ॥

श्री शुकदेवजी कहने लगे - खटवांग का पुत्र दीर्घबाहु,दीर्घबाहु का रघु और पऋथउश्रव,रघु का अज और अज का पुत्र दशरथ हुआ। दशरथ के घर भगवान् अपने अंशांश के चार रूपों में प्रकट हुए। इन चारों के नाम राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न हुए। उनका चरित्र बाल्मीकादि मुनीश्वरों ने वर्णन किया है। उन्होंने विश्वामित्र के यज्ञ में मारीचादि राक्षसों को मार गिराया। उन्हीं ने सीता के स्वयंवर की यज्ञ भूमि में रखे हुए धनुष को, जो तीन सौ आदमियों से उठता था, खींचकर तोड़ डाला। 

इस तरह सीता को जो लक्ष्मी का अवतार है, विवाह कर ले चले। तब मार्ग में परशुरामजी का गर्व खण्डित कर दिया, जिन्होंने इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रियों से हीन कर दिया था। स्त्री के वशीभूत सत्यपाश से बँधे पिता की आज्ञा से राम, राज्य को छोड़, सीता को साथ ले वन में चले गये। मार्ग में रावण की बहिन शूपर्णखा ने आ घेरा। 

तब उसके नाक, कान काटकर कुरूप कर दिया। उसने अपनी कथा भाइयों से कही। तब खर, त्रिशिरा और दूषणादि चौदह सहस्त्र राक्षस चढ़ आये, उन सबको मार भगाया। सीता की प्रशंसा सुन रावण ने मारीच को भेजा। वह कपट का रूप धर राम को दूर ले गया, वहाँ राम ने उसको मार गिराया। 

इस अवसर पर रावण सीता को अकेली देख उसे हरकर ले गया। राम अपनी प्यारी के वियोग में विकल हो, भाई को साथ ले उसे वन में ढूँढने लगे। रावण से सीता को बचाने के लिए जिस जटायु ने अपने प्राण दिये, उसका दाहसंस्कार किया फिर कबन्ध को मारकर आगे बढ़े और बन्दरों से मित्रता कर बालि को मार बन्दरों द्वारा सीता की खोज कराई और समुद्र तट पर आ गये। राम ने तीन दिन निराहार व्रत धारकर समुद्र के बुलाने को तप किया परन्तु समुद्र न आया तब भृकुटी चढ़ा लीं। 

उस समय भय के मारे जन्तुओं के श्वास रुक गये, समुद्र का शब्द बन्द हो गया तब भयभीत हो समुद्र भगवान् के चरणों में गिर कहने लगा- हे भूमन्! हमारी जड़ बुद्धि है, आप आदिपुरुष ईश्वर हैं, आपको नहीं जान सका, आप इच्छा अनुकूल हो जाइये और रावण को मारकर सीता को ले आइये, मेरे जल पर पुल बाँधिए इससे आपका यश विपुल हो जाएगा। 

यह कहकर समुद्र चला गया और राम की आज्ञा से बड़े-बड़े बन्दरों ने समुद्र में पर्वतों के शिखर डाल दिए। इस तरह पुल बाँधकर सुग्रीव, नील, हनुमानादि सेनापतियों के साथ विभीषण की बुद्धि अनुसार बन्दरों की सेना लंका में घुस गई, लंका को हनुमानजी पहले जला गए थे। जब रावण ने यह दशा देखी तब उसने कुम्भकरण को युद्ध स्थल में भेजा। 

जब यह दुर्जय सेना चली तब सुग्रीव, लक्ष्मण, हनुमान, अंगद, जामवन्त आदि शूरवीरों को लेकर राम भी जा पहुँचे। राम की सेना के यूथपाल रावण के सैन्यजनों को वृक्ष, पर्वत, गदा और बाणों से मारने लगे। जब रावण ने सेना को नष्ट होते देखा तब क्रुद्ध हो पुष्पक विमान में बैठ रामचन्द्र के सम्मुख आया। इधर इन्द्र ने अपने सारथी मातलि के साथ अपना रथ रामचन्द्र के लिए भेज दिया था, इस पर राम बैठ गए। 

रावण बड़े पैने तीरों का प्रहार करने लगा। राम उससे बोले - हे राक्षस! तू अभ्यागत की तरह शून्य स्थान में घुस पिछे से सीता को हर ले गया उस निन्दित कर्म का फल मैं अभी देता हूँ। तदनन्तर धनुष पर वायु तुल्य बाण चढ़ाकर रावण के मारा जिससे उसका हृदय फट गया और दशों मुखों से रुधिर वमन करता हुआ विमान से गिरकर मर गया। उसके मरने पर सहस्त्रों राक्षसियाँ मन्दोदरी के साथ रूदन करती हुई युद्ध स्थल में आईं और लक्ष्मण के बाणों से मरे हुए अपने-अपने कुटम्बियों को देखकर रोने लगीं। 

हे रावण! आपके भय से सम्पूर्ण लोक रोते थे। हे नाथ! अब हमारा बड़ा अनर्थ हो गया है। अब यह लंका आपके बिना किसकी शरण जायेगी ? शुकदेवजी बोले - रामचन्द्र जी आज्ञा से विभीषण ने राक्षसों की पारलौकिक क्रिया की। फिर राम ने अपने दर्शन से सीताजी के मुरझाये मुख को खोल दिया और पुष्पक विमान में सीता तथा लक्ष्मण, सुग्रीव और हनुमानादि को बैठकर विभीषण को लंका का राज्य दे वनवास की अवधि पूर्ण होने पर अयोध्या को आये। 

उस समय ब्रह्मादि देवता गुणगान कर रहे थे परन्तु राम ने सुना कि भाई भरत गोमूत्र में रांधकर जौ खाता है, वृक्षों की छाल पहनता है, जटा धारण किये हुए है और पृथ्वी पर सोता है तो बहुत दुःखी हुए और जब भरत ने सुना कि राम आ रहे हैं तब भाई से मिलने के लिए पुरजन, मन्त्री, पुरोहित को साथ लेकर सिर पर राम की पादुकाओं को धरकर वह नंदिग्राम से राम के सम्मुख आये। 

भरतजी श्रीराम के पैरों पर जा गिर पड़े। फिर पादुकाओं को आगे रखकर हाथ जोड़ नेत्रों में आँसू भर खड़े हो गये। तब राम ने भरत को छाती से लगा लिया उस समय राम के नेत्रों से जल की वर्षा हुई। तदनन्तर बड़ों को नमस्कार किया, सब प्रजा ने उनको नमस्कार किया। 

बहुत दिनों में आये हुए अपने स्वामी को देखकर सब आनन्द में मग्न हो गए। लोग फूलों की वर्षा करते हुए नाचने लगे, भरत ने पादुका ली, विभीषण ने चमर, सुग्रीव ने बीजना, हनुमान ने छत्र, शत्रुघ्न ने धनुष और तरकस तथा सीता ने कमण्डल लिया। अंगद ने धनुष व जामवंत ने ढाल ली। उस समय स्त्रियों सहित बन्दीगण प्रशंसा कर रहे थे। 

पुष्पक विमान में बैठे रामचन्द्र की अपूर्व शोभा हो रही थी। इस तरह भाइयों के सम्मान के साथ राजभवन में जा कैकेयी से मिले और सीता और लक्ष्मण भी यथायोग्य सबसे मिले। फिर माता अपने-अपने पुत्रों से मिलने लगीं तदनन्तर वशिष्ठजी ने कुलवृद्धों के साथ श्रीराम का विधिवत् अभिषेक किया। 

भरत के प्रणाम करने से राम ने प्रसन्न हो राज्य ग्रहण किया। राम पिता की तरह सबका पालन करने लगे। धर्मनिष्ठ राम के राज्य में सब प्राणी सुखी हो गये। राम गृहस्थ के धर्मों को स्वयं करने लगे तथा औरों को देखने लगे और सीता ने प्रेम, सेवा, शीलता, नम्रता, लज्जा, बुद्धि आदि से अपने पति का भाव जानकर उनको अपने वश कर लिया।

॥ श्रीरामचन्द्रजी का यज्ञादि अनुष्ठान ॥

श्री शुकदेवजी कहने लगे - रामचन्द्रजी ने उत्तम सामग्रियों से युक्त यज्ञ का प्रारम्भ करने का विचार किया। तब होता को पूर्व दिशा, ब्रह्मा को दक्षिण दिशा, अर्ध्वयु को पश्चिम दिशा और उद्‌गाता को उत्तर दिशा दे दी। दिशाओं के मध्य की सब भूमि आचार्य को दी दी। इसी तरह सीता ने भी सौभाग्यसूचक वस्त्राभरणों के अतिरिक्त कुछ न रखा। वे सब ब्राह्मण राम का अपने ऊपर वात्सल्य भाव देखकर बड़े प्रसन्न हुए और लिया हुआ राज्य श्री रामचन्द्र को देकर कहने लगे - हे भगवान्! ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो आपने न दी हो। 

एक दिन अन्धेरी रात में राम भेष बदले प्रजा की दशा देखते फिरते थे। उस समय कोई अपनी स्त्री से अप्रसन्न हो कह रहा था, कि तू दुष्टा और असती है, मेरी आज्ञा बिना तू पराये घर चली गई, मैं तुझे अब कदापि नहीं रखूँगा, स्त्री का लोभी राम है, वह सीता को भले ही रख ले परन्तु मैं तुमको नहीं रख सकता। लोगों के मुख से इस दुरापवाद को सुनकर रामचन्द्र ने सीता को त्याग दिया और वह वाल्मीकि के आश्रम में चली गई। 

सीता गर्भवती थी, समय पर दो पुत्र हुए। ये लव और कुश के नाम से विख्यात हुए, इनके नामकरणादि सब वाल्मीकि ने स्वयं किये थे। लक्ष्मण के पुत्रों का नाम अंगद और चित्रकेतु, भरत के पुत्रों के नाम लक्ष और पुष्कल, शत्रुघ्न के पुत्र सुबाहु और श्रुतसेन हुए। 

भरत की दिग्विजय ने करोड़ों गन्धर्वों को मार गिराया। उनका धन लाकर रामचन्द्र को दिया, शत्रुघ्न ने लवणासुर को मारकर मथुरापुरी बसाई। रामचन्द्रजी द्वारा निकाली हुई सीता वाल्मीकि को दोनों पुत्र दे पति के चरणों में ध्यान लगाकर पृथ्वी में समा गई, रामचन्द्र ने यह समाचार सुन अपनी बुद्धि से शोक को रोका। 

परन्तु जब उसके गुणों की याद आई तब शोक न रोक सके। सीता के पृथ्वी में प्रवेश होने के पश्चात् रामचन्द्रजी ने ब्रह्मचर्य व्रत धारण कर लिया। तेरह सहस्त्र वर्ष अग्निहोत्र जपते रहे। फिर आत्मज्योति में लीन हो गए। जिन श्री रामचन्द्र ने अवतार धारण किया उनका प्रभाव सामान्य नहीं था। जो मनुष्य रामचन्द्र के यश को सुनता है वह कर्मबन्धनों से छूट जाता है।

परीक्षित ने पूछा - हे प्रभो! रामचन्द्र ने भाइयों के साथ कैसा बर्ताव किया ? श्रीशुकदेवजी बोले- राम ने भाइयों को दिग्विजय की आज्ञा दी। स्वयं भी लोगों से मिलने भेंटने पुरी देखने जाया करते थे। जहाँ-जहाँ रामचन्द्र जाते थे वहाँ-वहाँ पुरवासी भेंट ले जाते और आशीर्वाद देते थे। 

अपने स्वामी को बहुत दिन पीछे आया जानकर स्त्री पुरुष घर छोड़कर छज्जों पर चढ़कर फूलों की वर्षा कर नेत्रों की तृष्णा बुझाते । तदुपरान्त अपने पूर्वजों के साथ राजभवन में आते। ये महल ऐसे बने हुए थे कि इनमें मूँगों की देहली थी, वैदूर्यमणि के स्तम्भ थे, मरकतमणि के स्वच्छ स्थल, स्फटिक मणियों की भीति थी। इस तरह धर्म का पालन करते हुए रामचन्द्र बहुत दिनों तक भाइयों सहित राज्य के अनेक भोगों को भोगते रहे और सब प्रजाजन उनके चरणों का ध्यान करती रही।

॥ कुश का वंश विवरण ॥

श्रीशुकदेवजी ने कहा-कुश के पुत्र का नाम अतिथि था, इनके निषध और निषध के नभ हुआ, नभ के पुण्डरीक और पुण्डरीक के क्षेमधन्वा हुआ। क्षेमधन्वा के देयनीक, इसके अनीह के पुत्र का नाम पारियात्र, इसके बल, इसके स्थल, स्थल के वज्रनाभ हुआ। वज्रनाभ के सुगण, सुगण के विधृति, इसके हिरण्याभ हुआ। हिरण्याभ के पुष्प और इसके ध्रुवसंधि, ध्रुवसंधि के सुदर्शन, सुदर्शन के अग्निवर्ण, अग्निवर्ण के शीघ्र, शीघ्र के मरु हुआ। 

यह योग द्वारा सिद्ध हो कलापगाँव में है और कलयुग के अन्त में सूर्यवंश को फिर उत्पन्न करेगा। मरु के प्रसुश्रुत, इसके संधि, संधि के अमर्षण, अमर्षण के सहस्वान्, सहस्वान् के विश्वबाहु, विश्वबाहु के प्रसेनजित् और प्रसेनजित् के तक्षक हुआ। तक्षक के वृहद्वल हुआ जिसे तेरे पिता अभिमन्यु ने मारा था। ।। ये इक्ष्वाकु वंश के राजा हैं, जो हो गये हैं, अब होने वालों के नाम सुनिये । वृहद्वल का पुत्र बृहद्रण होगा, इसके उरुक्रम और उरुक्रम के वत्सबृद्ध होंगा। इसी तरह प्रतिव्योम, भानु, दिवाकर, वाहिनी पति, सहदेव, वीर, बृहदश्व, भानुमानु, प्रतिकाश्व, सुप्रतीक, मेरुदेव, सुनक्षत्र, पुष्कर, अंतरिक्ष, सुतषा, अतित्रजित, बृहद्भानु, बर्हि, कृतंजय, रणंजय, संजय, शाक्य, शुद्धोद, लांगल, प्रसेनजित्, क्षुद्र, कारण, सुरथ, सुमित्र ये सब राजा उत्तरोत्तर एक दूसरे के पुत्र वृहद्वल के वंश में होंगे । इक्ष्वाकु वंश सुमित्र राजा के संग नष्ट हो जाएगा, उनके आगे इस वंश में कोई राजा नहीं होगा।

॥ इक्ष्वाकु पुत्र निमि का वंश विवरण ॥

श्रीशुकदेवजी बोले- हे राजन् ! इक्ष्वाकु के पुत्र निमि ने यज्ञ आरम्भ कर वशिष्ठ को ऋत्विज बनने को कहा। वशिष्ठ बोले- मुझे पहले इन्द्र ने वरण किया है, इसलिए जब तक उस यज्ञ को पूर्ण न कर आऊँ तब तक उस समय की प्रतीक्षा करो। यह सुनकर निमि चुप हो गया और वशिष्ठ चले गये। निमि ने गुरु की प्रतीक्षा न कर अन्य ऋत्विजों को बुलाकर यज्ञ प्रारम्भ कर दिया। इन्द्र के यज्ञ को करा जब वशिष्ठ आये तब शिष्य का अन्याय देख शाप दिया कि तू बड़ा अभिमानी है, तेरा देहपात हो जायेगा। 

निमि ने भी अधर्म रत गुरु को शाप दिया, तू लोभ से धर्म को नहीं जानता है, इससे तेरा भी देह नष्ट हो जायेगा। इस तरह अध्यात्म ज्ञानी निमि ने अपना देह त्याग दिया और वशिष्ठ ने देह त्याग कर मित्राबरुणी द्वारा उर्वशी में जन्म लिया। उन मुनि लोगों ने निमि की देह को सुगन्धित वस्तुओं में रखकर यज्ञ समाप्त कर दिया और देवताओं से कहने लगे - प्रभु वर्ग ! जो आप प्रसन्न हों तो राजा का देह जिला दीजिए। 

देवताओं ने कहा 'तथास्तु' तब निमि बोला कि मुझे देह बन्धन में मत डालो। देव बोले- 'हे विदेह!' तुम शरीर धारियों के नेत्र में वास करो। किसी राजा के न रहने से मनुष्यों को भय होने लगा। तब सब मिलकर निमि के देह को मथने लगे, मथने से एक कुमार उत्पन्न हुआ। जिसे जनक कहने लगे। मृत देह से उत्पन्न होने के कारण इसका विदेह नाम पड़ा, मथने से मिथिला कहलाया। 

इसने अपने नाम से मिथिलापुरी बसाई । हे राजन्! जनक के उदावसु, उदावसु के नन्दिवर्धन, नन्दिवर्धन के सुकेतु, सुकेतु के देवरात, देवरात के बृहद्रथ, बृहद्रथ के महावीर्य, महावीर्य के सुवृति, सुवृति के धृष्टकेतु, धृष्टकेतु के हर्यश्व, हर्यश्व के देवमीढ़, देवमीढ़ के विश्रुत, विश्रुत के महाधृति, महाधृति के कृतिरात, कृतिरात के महारोमा, महारोमा के स्वर्णरोमा, स्वर्णरोमा के हस्वरोमा, इसके सिरध्वज हुआ। 

इसने यज्ञ के लिए पथ्वी में हल चलाया था तब हल के अग्रभाग से सीता उत्पन्न हुई इसी से इसको सिरध्वर कहने लगे। इसके कृतध्वज और मितध्वज दो पुत्र हुए। इनमें से कृतध्वज के केशिध्वज और मितध्वन के खाण्डिय हुआ। केशिध्वज के भानुमान् और भानुमान् के शतद्युम्न पुत्र हुआ। शतद्युम्न के शुचि इसके सनद्वाज, सनद्वाज के अर्ध्वकेतु, अर्ध्वकेतु के पुरुजित हुआ। पुरुजित् के अरिष्टनेमि, अरिष्टनेमि के श्रुतायु इसके सुपार्श्वक, सुपार्श्वक के चित्ररथ और इसके क्षेमधी हुआ । क्षेमधी के समरथ, इसके उपगुरु और इसके उपगुप्त हुआ। उपगुप्त के वस्वनत, वस्वनत के युयुधान, युयुधान के सुभाषण, सुभाषण के जय, जय के विजय और विजय के ऋतु हुआ। ऋतु के शुनक, शुनक के वीतहव्य, वीतहव्य के दृति, दृति के बहुलाश्व, बहुलाश्व के कृति हुआ। यह मिथिलावंशी राजाओं का वर्णन है।

॥ सोम वंश का विवरण ॥

श्री शुकदेवजी कहने लगे - हे राजन् ! अब चन्द्रवंश का वर्णन करते हैं। सहस्त्रशीर्ष नारायण की नाभि से कमल हुआ। उससे ब्रह्मा ने जन्म लिया, ब्रह्मा के अत्रि हुआ। इसी अत्रि के नेत्रों से चन्द्रमा हुआ। फिर इसने तीनों लोकों को जीतकर राजसूय यज्ञ किया और बृहस्पति की स्त्री तारा को ले आया। बृहस्पति ने कितनी बार तारा को माँगा पर उसने न दी। इसी बात पर देव-दानवों में संग्राम हुआ। बृहस्पति से बैर होने के कारण शुक्राचार्य ने दैत्यों को साथ ले चन्द्रमा का पक्ष लिया और महादेव ने बृहस्पति के पिता से विद्या पढ़ी थी इससे उसका पक्ष ले सब भूतगणों को साथ ले आये। 

इन्द्र भी गुरु की ओर हो गया। तारा के निमित्त होने वाले युद्ध में देव और दानवों का बहुत नाश हुआ तथापि तारा को चन्द्रमा ने नहीं दिया। तब बृहस्पति ने ब्रह्मा से कहा तुम बीच बचाव कराओ । तब ब्रह्मा ने चन्द्रमा को धमकाकर तारा बृहस्पति को दिला दी परन्तु वह गर्भवती थी। यह देख बृहस्पति ने कहा- हे दुर्बुद्धि ! तू अन्य से वीर्य ले आई है, इसको त्याग दे। मैं दूसरी सन्तान उत्पन्न करना चाहता हूँ, इससे तुझे नहीं मारूँगा। 

इस बात पर तारा ने लज्जित हो गर्भ को त्याग दिया परन्तु वह बालक स्वर्ण के समान कीर्तिमान था। इससे बृहस्पति और चन्द्रमा दोनों उसको लेने की इच्छा करने लगे। इसके लिए वाद- विवाद होने लगा। ऋषि और देवताओं ने तारा से पूछा कि यह किससे उत्पन्न हुआ ? परन्तु लाज से तारा ने उत्तर न दिया। तब कुपित हो बालक ने कहा- दराचारिणी ! स्पष्ट क्यों नहीं कहती ? ब्रह्मा ने तारा को एकान्त में समझाकर पूछा, तब उसने कह दिया यह चन्द्रमा से है। यह सुन चन्द्रमा ने बालक ले लिया। उस बालक की बुद्धि गम्भीर थी इससे ब्रह्मा ने इसका नाम बुध रखा। बुध से इला के उदर में पुरूरवा उत्पन्न हुआ। इसकी प्रशंसा नारद ने इन्द्रलोक में की। उसको सुन उर्वशी पुरूरवा के पास आई। मित्रवरण के शाप से उर्वशी मनुष्य लोक में उस पुरुषोत्तम को कामदेव के समान रूपवान सुनकर गई, राजा भी उसके सौन्दर्य को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ। 

उर्वशी ने शर्त रखी कि मैं घी का भोजन करूँगी और मैथुन के सिवाय आपको कभी नग्न न देखूँगी, देखूँगी तो चली जाऊँगी। उर्वशी ने ये भी कहा - तुम्हें मेरे दो भेड़ के बच्चों की रक्षा करनी होगी। राजा ने उन सबकी प्रतिज्ञा कर ली। फिर उर्वशी को ले पुरूरवा देवताओं के विहार करने के चैत्ररथाति स्थानों में विहार करने लगा। 

गन्धों ने एक दिन अन्धेरी रात में दोनों मेंढ़े चुरा लिये। जब गन्धर्व उनको चुराकर लिये जाते थे तब उनका चिल्लाना सुन उर्वशी कहने लगी कि इस कुनाथ वीरभानी नपुंसक ने मेरा सर्वनाश कर दिया। मैं इसके विश्वास में आकर नष्ट हो गई, मेरे पुत्रों को गन्धर्व ले गये। इसके कटु बचनों से विद्ध हो राजा रात्रि ही में कृपाण लेकर नंगा दौड़ा चला गया। इसको आते देख गन्धर्वों ने मेंढ़े तो छोड़ दिये परन्तु प्रकाश कर दिया। जब वह मेंढ़ों को ला रहा था तब उर्वशी ने नग्न देखा, इससे वह राजा को त्याग चली गई। 

राजा उर्वशी के बिना दुःखित होकर उन्मत्त की तरह पृथ्वी पर घूमने लगा। एक बार कुरुक्षेत्र में उर्वशी सरस्वती पर स्नान करने आई तब उसने उसे देखकर कहा- हे प्रिये ! ठहर, तू मुझको अधर में छोड़ के मत जा, हे देवी! तू मुझ पर कृपा न करेगी तो यह देह यहीं गिर जावेगी और सियार व गिद्ध इसे खा जायेंगे। यह सुन उर्वशी कहने लगी - राजा तू देहत्याग मत कर। तू पुरुष है, स्त्री किसी की मीत नहीं होती। कुछ दिन पीछे एक रात मेरा सहवास होगा। जिससे आपके और भी पुत्र होंगे। 

इससे यह सूचित किया था कि मैं गर्भिणी हूँ। तदनन्तर उर्वशी को गर्भवती देख राजा घर चला आया और कुछ दिन पीछे वहाँ जाकर उर्वशी से मिला और प्रसन्न होकर रात्रिभर उसके पास रहा। जब इसको विरह से व्याकुल देखा तब उर्वशी बोली तू इन गन्धर्वों से प्रार्थना कर ये मुझे दे जायेंगे। राजा की स्तुति से प्रसन्न हो गन्धर्वों ने उसे एक अग्निस्थली दी, इसको पुरुरवा उर्वशी समझ विचरने लगा। फिर स्थली को वन में छोड़ घर आकर उसका ध्यान करता रहा। तदनन्तर त्रेतायुग के आरम्भ में उनके मन में वेदत्रयी उत्पन्न हई। 

तब फिर उस स्थान पर गया जहाँ स्थली छोडी थी। वहाँ जाकर देखा कि इसमें तो छीकर के भीतर पीपल लगा हुआ है और तब उसमें दो अरणी बनाकर उर्वशी के लोक में जाने की इच्छा से मथने लगा। नीचे की अरणी में उर्वशी का ध्यान ऊपर की में अपना और मध्य में पुत्र का ध्यान करके मथने लगा। 

इस मंथन से अग्नि उत्पन्न हुई, यह अग्नि आह्वाहनीय, गार्हपत्य और दक्षिणाग्नि इन तीन प्रकार की हुई। इसको पुरूरवा ने अपना पुत्र ठहराया। इससे उर्वशी के लोक में जाने की इच्छा से अधोक्षज भगवान् का भजन किया। 

प्रथम एक ही वेद था, सर्ववाणियों से युक्त एक ही ॐकार मंत्र था, एक ही नारायण देव था, एक ही अग्नि और एक ही वर्ण था । त्रेता के आरम्भ में इसी पुरूरवा से वेदत्रयी हुई है और पुरूरवा इस ही को अपना पुत्र समझता था। उसी के द्वारा वह गन्धर्व लोक चला गया।

॥परशुराम द्वारा कार्तवीर्य अर्जुन वध॥

शुकदेवजी कहने लगे - हे राजन् ! उर्वशी के गर्भ पुरूरवा के आयु, श्रुतायु, सत्ययु, रथ, विजय और जय छः पुत्र हुए थे। श्रुतायु के वासुनान और सत्यायु के श्रुतंजय था। रथ के पुत्र का नाम अमिता था। विजय के भीम, भीम के कांचन इसके होत्रक और होत्रक के जन्हु हुआ। यह जन्हु गंगा को एक चुल्लु में पी गया फिर वह जंघा में से निकली इसलिए गंगा को जाह्नवी कहते हैं। फिर जान्हु के पुरु, पुरु के बलाहक, और बलाहक के अज, अज के कुश, कुश के कुशाम्बु, मूर्त्तय, वसु और कुशनाभ हुए तथा कुशाम्बु के गाधि हुआ इस गाधि की पुत्री सत्यवती थी। उसको ऋचीक ने माँगा। 

परन्तु गाधि ने वर कन्या अनुरूप न देख ऋचीक से कहा कि यदि तुम कन्या से विवाह चाहते हो तो श्वेत रंग के और जिनके कान काले हैं ऐसे एक सहस्त्र घोड़े दो। राजा का भाव समझ वह वरुण के पास गया और एक सहस्त्र घोड़े लाकर राजा को दे कन्या से विवाह कर लिया। फिर इस ऋषि से सत्यवती और इसकी माता ने पुत्र की इच्छा की इसलिये वह ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों मन्त्रों से चरु को अभिमंत्रित कर स्नान करने चले गए। 

मुनि को आने में देर हो गयी तब माता ने सत्यवती का चरु उत्तम समझ पुत्री से माँगकर खा लिया। मुनि ने जब यह वृतान्त सुना तब स्त्री से बोले - तूने बड़ा दुष्कर्म किया है, तेरे दण्डधारी पुत्र होगा और माता के ऐसा पुत्र होगा जो ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ होगा। इस पर सत्यवती ने हाथ जोड़कर ऋषि को प्रसन्न कर लिया। 

ऋषि बोले-अच्छा तेरा पुत्र दण्डधारी न होगा तो नाती अवश्य होगा। तब सत्यवती के जमदग्नि हुआ और सत्यवती कौशिकी नदी हो गई और जमदग्नि ने रेणुका से विवाह किया। इसके वसुमनादि पुत्र हुए इनमें सबसे छोटे का नाम राम था जो परसा धारण करने से परशुराम कहलाए। इनको भगवान् का अंश कहते हैं। 

परशुराम क्षत्रियों को ब्राह्मणों का अभक्त, अधर्मी और पृथ्वी का भार समझते थे इसलिए थोड़े से अपराध पर क्षत्रिय कुल का नाश कर दिया। परीक्षित ने पूछा कि राजाओं का ऐसा क्या अपराध था ? श्रीशुकदेवजी बोले- कार्तवीर्यार्जुन नाम का राजा बड़ा पराक्रमी था जिसने रावण को भी बाँध लिया था। एक दिन वह शिकार खेलता हुआ जमदग्नि के आश्रम पर पहुँचा, ऋषि ने राजा की सेना का कामधेनु द्वारा सत्कार किया। 

अपने से भी अधिक ऋषि के प्रभाव को देखकर राजा कामधेनु की इच्छा करने लगा तथा बलपूर्वक कामधेनु ले गया। राजा के जाने पर राम आश्रम में आए और राज की दुष्टता सुनकर क्रोध में फुंकार मारने लगे और सहस्त्रबाहु पर दौड़े। जब राजा ने देखा कि धनुष बाण, परसा आदि शस्त्रों के लिए भृगुकुलदीपक नगर में घुस आए हैं, तब उसने अस्त्रों से सुसज्जित कर सत्रह अक्षौहिणी सेना भेजी, वह अकेले ही परशुरामजी ने काट गिराई। परशुरामजी के परसे और बाणों से मरी हुई सेना के रुधिर से कींच हो गई। 

तब राज क्रोध कर स्वयं रणभूमि में आया और पाँच सौ धनुषों से बाण परशुराम पर चलाने लगा। परशुराम अपने एक ही बाण से सबको काट-काट गिराने लगे। फिर राजा हाथों से पर्वत और वृक्ष ले लेकर परशुराम पर डालने लगा तब परशुरामजी ने परसे से उसके हाथ काट डाले। जब उसके बाहु कट गए तब उसका सिर काट लिया। डर के मारे उसके दस सहस्त्र पुत्र भाग गए। 

परशुराम ने शत्रु के खेंचने के कारण दुःखित हुई बछड़े सहित कामधेनु लाकर पिता को दे दी और अपने पिता और भाइयों के सामने अपने किए हुए कर्म का वर्णन कर दिया। उसे सुनकर जमदग्नि कहने लगा- हे राम ! तुमने अधर्म किया कि तुमने राजा को वृथा ही मार डाला। राजा का वध करना ब्रह्महत्या से भी अधिक है। इसलिये किसी तीर्थ का सेवन कर इस पाप को दूर कर दो।

॥विश्वामित्र का वंश वर्णन॥

शुकदेवजी कहने लगे - हे राजन् ! पिता के उपदेश से परशुरामजी एक वर्ष तक तीर्थ सेवन कर, फिर अपने आश्रम में आए। एक समय परशुराम की माता रेणुका गंगा पर जल लेने को गई, वहाँ उसने गन्धर्वों के राजा चित्ररथ को अप्सराओं के साथ क्रीड़ा करते देखा। उसके देखने में वह ऐसी तत्पर हुई कि होम के समय को भूल गई। चित्ररथ की ओर रुचि भी फिर गई। तब विलम्ब देखकर मुनि के शाप से डरने लगी और जल का कलश रख हाथ जोड़ खड़ी हो गई। 

मुनि इसका मानसिक व्यभिचार देख कुपित हो पुत्रों से कहने लगे कि इसे मार डालो परन्तु उन्होंने न मारा। तब परशुराम ने पिता की आज्ञा से भाइयों समेत माता को मार डाला। इससे प्रसन्न हो जमदग्नि ने कहा- 'वर माँगो', तब इसने यह वर माँगा कि सब मरे हुए जी पड़ें। तब ऋषि के अनुग्रह से वे सब जीवित हो गए। उधर भागे हुए सहस्त्रबाहु के पुत्र परशुराम से पराजित हो पिता के वध को नहीं भूले थे। 

एक दिन परशुराम अपने भाइयों के ले वन गये, अपना बैर साधने की इच्छा से सहस्त्रबाहु के पुत्रों ने ध्यानावस्थित मुनि का सिर काट डाला। परशुराम की माता ने सिर माँगा भी परन्तु वे नीच सिर को ले गये। रेणुका दुःख से छाती पीटने लगी और हे राम ! हे तात! कहकर चिल्लाने लगी। 

इस आर्तनाद को सुन परशुराम आश्रम में आए तो क्या देखते हैं कि पिता मरा पड़ा है। यह देख शोक से मोहित हो कहने लगे, हे पिता! तुम हमें त्याग चले गये। इस तरह विलाप कर पिता के देह को भाइयों के पास रख क्षत्रियों के नाश का संकल्प किया। परशुराम ने महिष्मती में जा उन क्षत्रियों के शिर काटकर चिन दिये और उनके रक्त से भयंकर उनी उत्पन्न की। 

हे राजन्! जब क्षत्रिय अन्याय करने लगे तब पिता के वध को निमित्त कर परशुरामजी ने इक्कीस बार ऋत्रियों को मार स्यमंत पंचकनाम देश में रुधिर के नौ तालाब बनाये। फिर पिता का सिर धड़ से जोड़कर यज्ञ द्वारा भगवान् की पूजा में प्रवृत्त हुए और होता को पूर्व दिशा, ब्रह्मा को दक्षिण दिशा, अर्ध्वयु को पश्चिम दिशा और उद्गाता को उत्तर दिशा दे दी। अन्य ऋषियों को कोण की दिशा दी। कश्यप को मध्य प्रदेश दिया, उद्रष्टा को आर्यवर्त और उससे आगे की भूमि सभासदों को दी। 

फिर यज्ञांत में स्नान से पापों को दूर करने को सरस्वती में स्नान किया। जमदग्नि देह पाकर सप्त-ऋषियों के मण्डल में विराजने लगे और परशुराम ने उनकी पूजा की। आगामी मन्वन्तर में जमदग्नि के पुत्र परशुराम भी सप्तऋषियों के मण्डल में विराजेंगे। अब भी परशुरामजी दण्ड त्याग महेन्द्राचल पर निवास करते हैं। 

इस तरह भगवान् ने भृगुवंश में जन्म ले असंख्य ऋत्रियों को मार पृथ्वी का भार दूर कर दिया। गाधि से विश्वामित्र का जन्म हुआ। ये अपने तपोबल से क्षत्रीत्व को छोड़ ब्रह्मर्षि हो गये। इनके एक सौ पुत्र हुए, बीच के पुत्र का नाम मधुच्छन्द था। भृगुकुल में उत्पन्न हुए अजीगर्त के देवरात इस दूसरे नाम से प्रसिद्ध शुनः शेष नाम वाले पुत्र को अपना बेटा बनाकर विश्वामित्र अपने सब पुत्रों से कहने लगे इसको तुम बड़ा भाई मानो । हरिश्चन्द्र को यज्ञ में क्रय किया गया, इसको पुरुष पशु बना बलि देनें का विचार था तब यह अपने जीवित छूटने के निमित्त विश्वामित्र की शरण गया और उनके उपदेश के अनुसार ब्रह्मादिकों की स्तुति की जिससे बन्धन से छूट गया। 

इस भृगुवंशी पुनःशेष ने देवताओं की स्तुति की थी, इससे वह गाधि वंश में देवरात नाम से विख्यात हो गया। मधुच्छन्द आदि से लेकर विश्वामित्र के उन्नचास पुत्र उसको बड़ा नहीं मानते थे इसलिए विश्वामित्र ने उनको शाप दिया कि मलेच्छ हो जाओ। छोटे पचासों को ले मधुच्छन्द ने कहा- हे पिता ! जैसा आप कहते हो वैसा ही करेंगे। यह कहकर मन्त्रद्रष्टा देवरात को उसने बड़ा भाई मान लिया तब विश्वामित्र कहने लगे हे कुशिक वंशियों! इस देवरात को कुशिक वंश ही समझो, इसकी आज्ञा में चलो इसके पीछे अष्टक, हारीत्, जय, क्रतुमान आदि और पुत्र विश्वामित्र के हुए। 

इस तरह विश्वामित्र के पुत्रों ने कौशिक वंश के अनेक भेद कर दिये, इस सब में देवरात बड़ा माना गया। यह भृगुवंशी था तो भी इससे कौशिक गोत्र को ही प्रवर भेद माना गया है।

॥क्षत्रबृद्धादि का वंश वर्णन॥

शुकदेवजी बोले - पुरूरवा का जो आयु नाम पुत्र था उसके नहुष, क्षत्रबृद्ध, रजी, रम्भ और अनेमा हुए। क्षत्रवृद्ध के सुहोत्र, सुहोत्र के काश्व, कुश और गृत्समद हुए, गृत्समद के शुनक के शौनक हुआ, कश्य, काशि, काशि के राष्ट्र, राष्ट्र के दीर्घतम के धन्वन्तरि हुआ। धन्वन्तरि के केतुमान और केतुमान के भीमरथ हुआ। भीमरथ के देवोदास, देवोदास के द्युमन था, इसको प्रदन शत्रुजित, वत्स ऋतध्वज, कुवलयाश्व नामों से पुकारते थे फिर इसके अर्लादिक पुत्र हुये। 

अलर्क के संतति, संतति के सुनीथ, सुनीथ के सुकेतन, सुकेतन के धर्मकेतु, धर्मकेतु के सुकुमार, सुकुमार के वीतिहोत्र, वीतिहोत्र के मार्गभूमि हुआ। । ये सब काशिराज की सन्तान थे। ये क्षत्रबृद्ध के वंश का वर्णन है। रम्भ के रभस, रभस के गम्भीर और गम्भीर के अक्रिय हुआ। इसके वंश में ब्राह्मण हुए। अब अनेमा के वंश का वर्णन करते हैं। अनेमा के शुद्ध, शुद्ध के शुचि, शुचि के त्रिककुद् हुआ जो धर्मसारधि नाम से प्रसिद्ध हुआ। धर्मसारथि के शान्तरथ हुआ, रज के पाँच सौ पुत्र हुए। देवताओं ने रज से प्रार्थना की तब रज ने दैत्यों को मार स्वर्ग इन्द्र को दे दिया, इन्द्र ने रज के चरण पकड़ स्वर्ग का राज्य किया। 

प्रहलाद आदि बैरियों के डर से आप भी उसकी शरण में रहने लगा, रज के मरने पर उसके पुत्रों से स्वर्ग माँगा परन इन पुत्रों ने नहीं दिया और यज्ञ का भाग माँगने लगे। तब उनकी बुद्धि विचलित करने को बृहस्पति से यज्ञ करा उनका नाश कर दिया। एक भी जीवित न रहा। क्षत्रबृद्ध का पोता कुश, इसके प्रति हुआ, प्रति के संजय और संजय के जय हुआ। जय के कृत, कृत के हर्यवन, हर्यवन के सहदेव, सहदेव के अहीन और अहीन के जयसेन हुआ। जयसेन के संस्कृति, संस्कृति के जय, जय के धर्मक्षेत्र, धर्मक्षेत्र के महारथ हुआ। अब आगे नहुष वंश कहते हैं।

॥ययाति का विवरण॥

श्रीशुकदेवजी बोले - राजा नहुष के यति, ययाति संयाति, आयुति, व्यूति और कृति हुए थे। ये सब नहुष के आधीन थे। यति ने राज्य ग्रहण नहीं किया क्योंकि वह जानता था कि राज्य में प्रविष्ट होने पर आत्मज्ञान नहीं होता। जब इन्द्राणी के अपराध करने से अगस्तयादि ने नहुष को स्वर्गभ्रष्ट कर दिया और अजगर हो गया तब ययाति राजा हुआ। इसने अपने छोटे भाइयों को चारों दिशाओं का स्वामी बना दिया और आप शुक्राचार्य और वृषपर्वा की पुत्री से विवाह कर पृथ्वी के पालन में तत्पर हुआ। 

राजा परीक्षित ने पूछा- महाराज! शुक्राचार्य तो ब्राह्मण थे और ययाति क्षत्रिय था तो यह सम्बन्ध कैसे हुआ ? तब शुकदेवजी बोले- एक दिन वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा अपनी सहस्त्र सखी और गुरुपुत्री देवयानी के साथ पुरी सरोवर की वाटिका में वस्त्र उतारकर स्नान कर रही थी। इतने में महादेव पार्वती उधर आ निकले। उनको देख वे झटपट जल से निकल लज्जित होकर कपड़े पहनने लगीं। जल्दी के मारे बिना जाने शर्मिष्ठा ने गुरुपुत्री देवयानी के वस्त्र पहन लिये। 

तब देवयानी कुपित को कहने लगी- देखो दासी की बात, हमारे पहनने के वस्त्रों को पहनती है। तब शर्मिष्ठा क्रोध में गाली देती हुई गुरुपुत्री से बोली- 'हे भिक्षुकी! तू हम लोगों के घरो में श्वान व कौवे की तरह फिरा करती है।' ऐसे वचनों से गुरु पुत्री का तिरस्कार कर वस्त्र छीन उसे कुएँ में ढकेल दिया। 

जब वह घर चली गई तब ययाति शिकार खेलता हुआ प्यास का मारा कुएँ पर चला आया, उसने उसमें देवयानी को देखा। तब वस्त्रहीन देवयानी को अपना दुपट्टा देकर राजा ने उसका हाथ पकड़कर कुएँ से खींच लिया। तब वह प्रेम भरी वाणी से कहने लगी - हे शत्रु निपूदन! आपने मेरा हाथ पकड़ लिया है। इसी से मैं अब तुम्हारे सिवा दूसरे से पाणिग्रहण करना नहीं चाहती। 

ययाति की इच्छा न थी परन्तु दैव की प्रेरणा से उसका मन उसमें लगा और देवयानी का वचन स्वीकार कर लिया। राजा के जाने पर रोते हुए देवयानी पिता के पास आई और जो शर्मिष्ठा ने कहा इस पर शुक्राचार्य खिन्न होकर पुरोहिताई की निन्दा कर बेटी को लेकर चले गये। जब वृषपर्वा ने यह सुना तब वह उनके चरणों पर जा गिरा। 

तब शुक्राचार्य बोले- हे राजन् ! जो देवयानी कहे सो ही करो। वृषपर्वा ने स्वीकार कर लिया, तब देवयानी कहने लगी कि मैं यही चाहती हूँ कि पिता की दी हुई जहाँ मैं जाऊँ वहीं शर्मिष्ठा अपनी सखियों के संग मेरी दासी बनकर चले। तब शर्मिष्ठा सहेलियों के साथ देवयानी की सेवा टहल करने लगी। शुक्राचार्य ने देवयानी के संग शर्मिष्ठा ययाति को देकर उससे कहा- हे राजन्! तू अपनी सेज पर शर्मिष्ठा को मत रखना। देवयानी को सन्तान समेत देख शर्मिष्ठा राजा की इच्छा किया करती थी। 

एक समय स्त्री धर्म अनुसार एकान्त में बोली- जब राजपुत्री ने संतान की प्रार्थना की तब राजा ने शुक्र के वचन स्मरण कर उचित काल में उससे सहवास किया। देवयानी के यदु और तुर्वसु हुए और शर्मिष्ठा के द्रह्यु, अनु और पुरु हुए। जब देवयानी को मालूम हुआ कि मेरे पति से शर्मिष्ठा के गर्भ की स्थिति है तब वह क्रुद्ध होकर पिता के घर चली गई। राजा भी प्रार्थना करता हुआ उसके पीछे गया और चरण पकड़ लिए। 

शुक्राचार्य ने क्रुद्ध होकर कहा- हे स्त्री लोलुप ! बुढ़ापा तुझमें प्रवेश करे। ययाति बोले- हे ब्रह्मन् ! मैं अभी आपकी बेटी के सहवास से तृप्त नहीं हुआ। तब शुक्र बोले जो तेरे बुढ़ापे को लेकर तरुणाई दे दे, उससे बदला कर ले। ययाति ने अपने पुत्र यदु, तुर्वसु, द्रह्मु तथा अनु आदि से यौवन माँगा लेकिन किसी ने न दिया। किन्तु पुरु ने पिता का बुढ़ापा ले लिया तब पिता ने पुत्र की तरुणावस्था से विषय भोगना प्रारम्भ किया। ययाति प्रजा को पालने लगा और भोगों को भोगता रहा। देवयानी भी अपने प्यारे को आनन्द देने लगी। राजा ने यज्ञों में दक्षिणा देकर यज्ञ पुरुष का पूजन किया। इस तरह सहस्त्र वर्ष ययाति भोगों को भोगता रहा परन्तु उसकी तृप्ति न हुई।

॥ययाति को आत्मज्ञान॥

शुकदेवजी कहने लगे - ययाति बहुत दिवस तक स्त्री में आसक्त रहकर भोगों को भोगता रहा। जब इसने देखा कि इन भोगों से मेरी आत्मा नष्ट हो गयी है। तब वैराग्ययुक्त हो अपनी प्यारी से कहने लगा, हे प्राण प्रिये ! तुझ सरीखे आचरण वालों की कथा सुन। किसी वन में एक बकरा अपने प्रिय पात्र को ढूँढ़ता था। कर्मवश उसने कुएँ में एक बकरी को देखा। वह कामी उसे चाहने लगा। बकरी ने भी निकलकर उसी से स्नेह किया तब और बकरियाँ उससे मोह करने लगीं। वह एक ही साथ बहुत-सी बकरियों से रमण करने लगा और काम में आत्मा को भूल गया। जब उस कुएँ वाली बकरी ने औरों के साथ रमण करते देखा तब उसे बुरा लगा। वह उस बकरे को छोड़ स्वामी के पास चलो गई, तब बकरा उसके पीछे गया परन्तु उसे प्रसन्न न कर सका। 

वहाँ किसी ब्राह्मण ने क्रोध से उसके अण्डकोश काट डाले परन्तु उसी ने। फिर जोड़ दिए। अण्डकोशों के जुड़ने से वह कुएँ वाली बकरी से रमण करता रहा, परन्तु तृप्ति न हुई। हे सुभ्र! ऐसे ही मैं तेरे प्रेम में बंधा हूँ और आत्मा को भूल गया हूँ। मैंने सहस्त्र वर्ष विषय का सेवन किया है तथापि चाहना बढ़ती ही जाती है। इसलिए मैं सब त्यागकर ब्रह्म में चित्त लगा निर्द्वन्द्व हो विचरूँगा। 

इस प्रकार ययाति ने स्त्री को समझा, पुरु को उसकी तरुणावस्था दे और वृद्धावस्था ले निःस्पृह हो गया। पूर्व में द्रुह्य, दक्षिण में यदु, शेष भूमण्डल का राज्य पुरु को दे बड़े भाइयों को उसके अधीन कर वन को चला गया। 

वन में राजा आत्मा के अनुभव से त्रिगुणात्मक देह को त्याग ब्रह्म में चित्त लगाये भगवद् गति को प्राप्त हो गया। देवयानी ने समझा कि यह बात हँसी की है, परन्तु पीछे उसे भी ज्ञान हो गया और सोचने लगी कि पथिक जनों की तरह संसार को स्वप्नवत् समझकर सब कुछ त्यागकर श्री कृष्ण में मन लगाकर देवयानी ने भी देह त्याग दी।

॥पुरु वंश का विवरण॥

शुकदेवजी ने कहा- अब हम तुम्हें पुरु के वंश का वर्णन करते हैं जिससे तुम हुए। पुरु के जन्मेय, जन्मेय के प्रचिन्वन्, प्रचिन्वन् के प्रवीर, प्रवीर के नामस्यु, नामस्यु के चारुपाढ हुआ। चारुपाढ के सुद्युम्न, सुद्युम्न के बहुगब, बहुगब के यंयाति, यंयाति के अहंयाति, अहंयाति के रौद्रश्व हुआ। 

इस प्रकार रौद्रश्व के क्षतेयु, कुक्षेयु, स्थिण्डिलेयु, कृतेयु, जलेयु, संततेयु, धर्मेयु, सत्येयु, ब्रतेयु और सब में छोटे वनेयु ये दस पुत्र घृताचा अप्सरा से हुए। इसमें से क्षतुयु के रान्तिभार, रान्तिभार के सुमति, ध्रुव और अप्रतिरथ तीन पुत्र हुए इसमें अप्रतिरथ के कण्व, कण्व के मेधातिथि, मेधातिथि के प्रस्कण्वादि हुआ। सुमति के रैभ्य, रैभ्य के दुष्यन्त हुआ। 

यह दुष्यन्त एक दिन खेलता हुआ कण्व के आश्रम में गया वहाँ एक स्त्री को बैठा देखकर राजा मोहित हो गया। राजा उससे बोले- हे कमलाक्षी! तू किसकी पुत्री है ? तब वह शकुन्तला बोली- मैं विश्वामित्र की पुत्री हूँ, मेरी माँ मेनका है और मेरा नाम शकुन्तला है। शकुन्तला के स्वीकृति देने पर दुष्यन्त ने गन्धर्व रीति से शकुन्तला का पाणिग्रहण कर लिया। 

उस शकुन्तला से दुष्यन्त के भरत नाम का पुत्र हुआ। पिता के मरने पर भरत चक्रवर्ती हुआ। इसके दाहिने हाथ का चक्र और चरणों में कमल चिह्न थे। इसने महाभिषेक द्वारा भगवान् का पूजन किया और महाराजाधिराज हो गया। इसने यज्ञ करने को गंगातीर पर महातेज को पुरोहित बना पचपन यज्ञ किये तथा यमुना किनारे अठहत्तर अश्वमेध यज्ञ किये। एक स्थान में अग्निचयनकर्म किया, इसमें सहस्त्र ब्राह्मण लगाये थे। इस कर्म में इतनी गौ बाँटी गईं की प्रत्येक ब्राह्मण पर १३०४८ गौ आईं। एक सौ तेंतीस अश्वमेधों को देखकर सब आश्चर्य करने लगे।

भरत ने कर्म ऐसे किये कि भूत भविष्यत् का कोई राजा इसको नहीं कर सकता। इसने दिग्विजय में किरात, हूण, यवन, अन्ध, अंक, खश, शक अबह्रण्य राजा और म्लेच्छों को विजय किया था। पहले असुर देव स्त्रियों को रसातल ले गये थे, उनको जीतकर उनकी स्त्रियाँ फिर ला दीं। उसके राज्य में प्रजा सुख से रहती थी और पृथ्वी में सम्पूर्ण रस उत्पन्न होते थे। 

वह सत्ताईस सहस्त्र वर्ष राज्य करते रहे। फिर चक्रवर्ती राजा सबको झूठा समझ वैराग्य में निरत हो गया। इसके विदर्भ की तीन रानियाँ थीं। राजा ने कहा, जो तुम्हारे पुत्र हुए हैं, वे मेरे अनुरूप नहीं है। तब रानियों ने भयातुर होकर सोचा कि राजा हमको त्याग न दे इससे अपने पुत्र मार डाले। 

जब राजा का वंश नष्ट हो गया तब वंश वृद्धि के लिए इसने मरुत्स्तोम यज्ञ किया तब मरुत ने भरद्वाज पुत्र दिया। बृहस्पति ने अपने भाई की गर्भवति स्त्री से मैथुन करना चाहा था तब गर्भस्थ बालक ने कहा- ऐसा मत करो यहाँ जगह नहीं है। बृहस्पति ने उसे शाप दिया कि अन्धा हो जा और अपना वीर्य डाल दिया। बालक ने एड़ी मारकर उसे निकाल दिया परन्तु वीर्य गिरते ही वह बालक बन गया। स्त्री को भय हुआ मेरा पति मुझे त्याग देगा इसलिये उसको छोड़ जाने लगी तब बृहस्पति बोले- हे मूढ़! यह मेरे-तेरे दोनों के संयोग से हुआ है, तो तू ही पोषण कर। जब दोनों भरद्वाज भरद्वाज कहते छोड़ गये तो इसका नाम भरद्वाज हो गया। तब मरुतों ने बालक उठा लिया और बालक बड़ा किया जब भरत वंश का नाम होने लगा तब वही बालक भरत को दे दिया।

श्रीशुकदेवजी ने कहा- यह बालक वंश नष्ट होने पर दिया गया था इससे उसे वितथ कहते थे। इस वितथ के मन्यु हुआ और मन्यु के बहुत्क्षेत्र, जय, महावीर्य, नर और गर्ग पाँच पुत्र हुए। नर के संकृति, संकृति के गुरु और रन्ति दो पुत्र हुए थे। यह रन्तिदेव ऐसा हुआ कि बिना परिश्रम जो धन मिल जाता था उसी में निर्वाह करता। 

एक समय कुछ नहीं रहा इससे कुटुम्ब सहित दुःखी हुआ। उस समय इसे अड़तालीस दिन निराहार हो गये। उन्नचासवें दिन दैवयोग से घृत, खीर और जल आप उपस्थित हुआ। जब भोजन तैयार हुआ और भोग लगाने को तैयार थे कि एक अतिथि आ गया। रन्तिदेव ने उसका आदर कर उसको भोजन करा दिया। जब वह चला गया, फिर शेष सबने आपस में बाँट लिया। इतने में एक शूद्र आ गया। राजा ने अपने भाग का अन्न उसे दे दिया। शूद्र के जाने पर एक अतिथि बहुत से कुत्तों को लेकर आ गया और बोला, हम बड़े भूखे हैं। 

राजा ने सम्मान से शेष अन्न उनको देकर कत्ते और स्वामी को प्रणाम किया। इसके पीछे उनके पास इतना पानी बचा जिसे पी एक मनुष्य की प्यास बुझ जाए। जब पीने लगा तब एक चाण्डाल कहने लगा, महाराज! मैं प्यासा हूँ। राजा ने कहा कि मैं ईश्वर से अणिमादिक अष्ट सिद्धियाँ व मोक्ष नहीं माँगता हूँ परन्तु मैं केवल यही माँगता हूँ कि जीवों के दुःख मैं भोगूँ और उनको मुझसे सुख मिले। इस प्राणी को जल देने से मेरे भूख, प्यास, परिश्रम, दीनता, क्लान्ति, शोक, विशाद और मोह सब दूर हो गये हैं।

 इस तरह राजा ने यह कहकर पानी चाण्डाल को दे दिया। उस समय ब्रह्मा, विष्णु, महेश प्रकट हो राजा के सम्मुख आये। राजा ने उनको नमस्कार कर भक्तिपूर्वक भगवान् में चित्त लगा दिया। हे राजन् ! इसने सबको छोड़ भगवान् ही में चित्त लगा दिया था इससे इसकी माया स्वप्न की तरह नष्ट हो गई। रन्तिदेव के प्रसंग से उनके सब सहवासीगण, नाग वर्णाश्रम योगी हो गये। गर्ग से शिनि, शिनि से गार्ग्य हुआ, इसके ब्रह्मकुल की उत्पत्ति हुई। महावीर्य से दुरितक्षयक, त्रष्यारुणि, कवि और पुष्करारुणि ये तीन पुत्र हुए, ये भी ब्राह्मण हो गये। वृहत्क्षण के हस्ती था इसी ने हस्तिनापुर बनाया। हस्ती से अजमीढ़, द्विमीढ़ और पुरीमीढ़ हुये। 

अजमीढ़ में वृहदिषु वंश में होने बाले प्रियनेधादिक ब्राह्मण हो गये, तब अजमीढ़ में बहदिषु, उसके वृहद्धनु, वृहद्धनु के विशद, विशद के सेनाजित, इसके रुचिराश्व, दृढ़वनु और काश्य तीन पुत्र हुए। रुचिराश्व के पार, पार के पृथुसेन तथा नीप दो पुत्र हुए। इसने शुक्र की कन्या कुन्बी से ब्रह्मदत्त नामक पुत्र उत्पन्न किया । ब्रह्मदत्त ने सरस्वती के विष्वक्सेन, इसने जैगीषव्य योगी के उपदेश से एक योग ग्रन्थ रथा था। विष्वकसेन के उदवस्वन और उदवस्वन के भल्लाद हुआ। द्विमीढ़ से यवीनर, यवीनर से कृतिमान्, कृतिमान से सत्यधृति, सत्यधृति के दृढ़नेमि और उसके सुपार्श्व हुआ। 

सुपार्श्व के सुमति, सुमति के संमतिमान् उसके कृति हुआ। कृति ने हिरण्यनाम से योगविद्या सीखकर अपने शिष्य को प्राच्य सामवेद की छः संहिता विभाग करके पढ़ाई थीं। कृति से नीप, नीप से उग्रायुध, उग्रायुध से क्षेम्य, क्षेम्य से सुवीर, सुवीर से रिपुंजय हुआ। रिपुंजय के नहुरथ हुआ तथा पुरमीढ़ के सन्तान नहीं हुई। अजमीढ़ के नलिनी से नील हुआ, नील से शान्ति हुआ। शान्ति के सुशान्ति हुआ और सुशान्ति के पुरुज, पुरुज के अर्क, अर्क के भर्त्याश्व हुआ। इस भर्त्याश्व के मुद्गलादिक पाँच पुत्र हुए थे। भर्त्याश्व ने अपने पुत्रों से कहा- तुम मेरे देश की रक्षा करने योग्य हो। 

इन पाँचों ने देश के पाँच भागों की रक्षा की इससे उसका नाम पांचाल है। मुद्गल से ब्रह्मकुल प्रवृत्ति हुई और उनका मौद्गल्य गोत्र हुआ। मुद्गल के जुड़वां हुआ इस कन्या के गौतम के संयोग से शतानन्द हुआ। शतानन्द के धनुर्वेदज्ञ सत्यधृति हुआ इसके शरद्वान् हुआ। शरद्वान का वीर्य उर्वशी को देख सरकण्डों में गिर पड़ा, उससे शुभ नाम जोड़ला हुआ। राजा शान्तनु शिकार को गये। वहाँ उन्हें देख दया करके उठा लाए इनमें बालक का नाम कृपाचार्य और कन्या का नाम कृपी था, वह द्रोणाचार्य को ब्याही गई।

॥जरासन्ध युधिष्ठिर और दुर्योधन का विवरण॥

शुकदेवजी बोले-दिवोदास से मित्रेयु, मित्रेयु से च्यवन, च्यवन से सुदास, सुदास का सहदेव, सहदेव का सोमक, सोमक का जन्तु हुआ। इस जन्तु के सौ पुत्र थे जिनमें छोटे का नाम पुषत था, पुषत का द्रुपद, द्रुपद के धृष्टद्युम्नादिक पुत्र हुआ और पुत्री द्रौपदी थी। धृष्टद्युम्नादि के पुत्र का नाम धृष्टकेतु था। ये भर्त्याश्व वंश के राजा पांचाल देश में हुए। अजमीढ़ के दूसरे पुत्र का नाम ऋक्ष था, इस ऋक्ष का संवरण हुआ। 

इस संवरण से सूर्य की पुत्री तपती से कुरुक्षेत्र का स्वामी कुरु हुआ। कुरु के परीक्षित, सुधनु, जन्हु और निषधाश्व हुए, इनमें से सुधनु का सुहोत्र, सुहोत्र का च्यवन, च्यवन का कृति, कृति का उपरिचर, उपरिचर का वसु और वसु के वृहद्रथ, वृहद्रथ का कुशाग्र और कुशाग्र का ऋषभ, ऋषभ का सत्यहित, सत्यहित का पुष्पवान् । 

वृहद्रथ के एक और स्त्री थी उससे ऐसा बालक पैदा हुआ जिसके दो फाँके थीं। माता ने उसे बाहर डाल दिया, तब जरा नाम की राक्षसी ने उसे जोड़ा इससे उसका नाम जरासंध पड़ा। इससे सहदेव, इससे सोमापि, सोमापि से श्रुतश्रवा परीक्षित हुआ। इसके सन्तान नहीं हुई, जन्हु का सुरथ, सुरथ का विदूरथ, विदूरथ का सार्वभौम, सार्वभौम का जयसेन, जयसेन का राधिका और राधिका का अयुतायु, अयुतायु का क्रोधन, क्रोधन का देवातिथि, देवातिथि का ऋष्य, ऋष्य का दिलीप और दिलीप का प्रतीप हुआ। प्रतीप के देवापि, शान्तनु और बाल्हीक तीन पुत्र थे। 

देवापि राज्य छोड़कर वन चला गया। उस समय शान्तनु को राज्य मिला, पूर्वजन्म में शान्तनु का नाम महाभिष था। इसके शासन काल में बारह वर्ष वर्षा न हुई। तब ब्राह्मणों ने शान्तनु से कहा कि तुम बड़े भाई के होते राजा हो यह ठीक नहीं है। यदि राज्य वृद्धि चाहते हो तो राज्य बड़े भाई को दे दो। 

यह सुनकर शान्तनु ने वन में जाकर भाई को समझाया। परन्तु शान्तनु के मन्त्रियों ने ब्राह्मणों द्वारा ऐसा करा दिया कि वह वेद की निन्दा करने लगा। तब शान्तनु को ही राज्य करना पड़ा परन्तु दोष मिट जाने से वर्षा हुई। देवापि योगी हो कलाप ग्राम में बसने लगा। कलियुग में जब चन्द्रवंश नष्ट हो जाएगा तब देवापि वंश का प्रवर्तक होगा। बाल्हीक से सोमदत्त, सोमदत्त से भूरि, भूरिश्रवा और शल हुए तथा शान्तनु के गंगा से भीष्म का जन्म हुआ। 

वीरों में अग्रणी इन्होंने युद्ध में परशुराम को भी पराजित कर दिया था। शान्तनु की कन्या सत्यवती में चित्रांगद और विचित्रवीर्य हुए और चित्रांगद को एक गन्धर्व ने मार डाला। उसी सत्यवती से, जब वह कुमारी थी पाराशर के अंश से भगवान् के अंश व्यास का जन्म हुआ, इन्हीं से मैंने यह भागवत् पढ़ी है। 

विचित्रवीर्य ने काशीराज की बेटियों से विवाह किया। अम्बा, अम्बालिका दोनों बहनें भीष्मजी स्वयंवर से जीतकर लाये थे, इनमें अत्यन्त आसक्त हो जाने से विचित्रवीर्य को राजयक्ष्मा हो गया और वह मर गया। जब भाई के सन्तान न हुई तब सत्यवती की आज्ञा से विचित्रवीर्य की स्त्रियों से व्यासजी ने धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर तीन पुत्र उत्पन्न किये। 

धृतराष्ट्र से गांधारी से विवाह किया इससे १०० पुत्र हुए, इनमें बड़ा दुर्योधन था। एक कन्या हुई उसका नाम दुःशाला था। शाप के कारण पाण्डु ने स्त्री संगम त्याग दिया। इससे धर्म, पवन और इन्द्र से युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन, कुन्ती के पुत्र हुए थे और दूसरी रानी माद्री के अश्विनी कुमार के संयोग से नकुल और सहदेव हुए। इन पाँचों ने द्रौपदी से विवाह किया। द्रौपदी के पाँच पुत्र हुए। युधिष्ठिर से प्रतिविन्धत, भीमसेन से श्रुतसेन, अर्जुन से श्रुतिकीर्ति, नकुल से शतानीक और सहदेव से श्रुतकर्मा हुआ। 

इन पाँचों ने पृथक-पृथक स्त्रियों से भी विवाह किये थे। युधिष्ठिर की पौरवी रानी ने देवकी, भीमसेन की हिडम्बा से घटोत्कच और दूसरी वाली से सर्वगत हुआ। सहदेव के विजया से सुहोत्र, नकुल की करेणुमती से नरमित्र, अर्जुन की उलूपी से इरावन् तथा मणिपुर की राजपुत्री से वधूवाहन हुआ इसको नाना ने गोद लिया इससे मणिपुर का राजा कहलाया। 

अर्जुन की सुभद्रा से तेरा पिता अभिमन्यु हुआ, यह बड़ा पराक्रमी था। उसी से उत्तरा के गर्भ से आपका जन्म है। कौरवों के नष्ट होने पर अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र चलाया उससे तुम्हारी मृत्यु हो जाती परन्तु तुम कृष्ण के प्रभाव से जीवित रहे । 

हे परीक्षित ! तेरे जनमेजय, श्रुतसेन, भीमसेन और उग्रसेन हुए हैं। तुम्हारा पुत्र जनमेजय, तुम्हें तक्षक द्वारा मरा जान क्रोध कर सर्पों का हवन करेगा। यह जनमेजय कावषेय के पुत्र तुर को पुरोहित बनाकर पृथ्वी को जीतकर अश्वमेध यज्ञ करेगा। जनमेजय का शतानीक होगा, यह याज्ञवल्क्य से वेदत्रयी पढ़ेगा और शौनक से अस्त्रज्ञान । 

शतानीक का सहस्त्रानीक, सहस्त्रानीक का अश्मेधज, अश्मेधज का असीम कृष्ण और असीम कृष्ण का नेमिचक्र होगा। जब हस्तिनापुर डूब जाएगा तब नेमिचक्र कौशाम्बी में वास करेगा। नेमिचक्र का चित्ररथ, चित्ररथ का कविरथ, कविरथ का वृष्टिमान्, वृष्टिमान् का सुषेण, सुषेण का सनीथ, सनीथ का पूर्व, पूर्व का तिमि, तिमि का वृहद्रथ, वृहद्रथ का सुदास, सुदास का शतानीक, शतानीक का दुर्दमन, दुर्दमन का बहीनर, बहीनर का दंडपाणि, दंडपाणि का निमि, निमि का क्षेमक होगा। यह ब्रह्मक्षेत्र का वंश है। कलियुग में क्षेमक राजा के होने पर वंश नष्ट हो जाएगा।

॥ श्रीमद् भागवत महापुराण नौवाँ स्कन्द समाप्त ॥