सूत शौनकादिक सम्वाद


श्रीमद् भागवत की रचना करते समय सर्वप्रथम व्यास जी ने परब्रह्म की विनय की है। उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय करने वाले, स्वयं वेदों को प्रकाशित करने वाले परमपिता परमात्मा को हम नमस्कार करके श्रीमद् भागवत में परम हंसो के कल्याण कारी परम तत्व का वर्णन करते हैं । श्रीमद् भागवत के पठन-पाठन से भगवान प्रसन्न होकर अन्तः करण में निवास करते हैं । श्रीमद् भागवत कल्प वृक्ष रूपी वेद का फल है, जिसे शुकदेव जी ने मनुष्य मात्र के कल्याण के लिए पृथ्वी पर अपने मुख से प्रकट किया है । विद्वान चतुरजनों से प्रार्थना है कि इसका हर हृदय में संचार करें ।


एक समय भगवान को शौनकादिक अट्ठासी हजार ऋषि नैमिषारण्य क्षेत्र में भगवान को प्राप्त करने की कामना से सहस्त्र वर्ष का यज्ञ कर रहे थे, उस समय सूतजी वहाँ पधारे, ऋषियों ने सम्मान पूर्वक सूतजी को उच्चासन पर बिठाया और विनय पूर्वक कहने लगे — आपने सब पुराणों तथा शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त करके शिष्यों को शिक्षा दी है । आप कृपा करके भगवान श्रीकृष्ण के लीला अवतार की कथा सुनायें जो कि सब प्रकार से सुख देने वाली है । हम कलियुग में इसी कथा को सुनने तथा हरिचर्चा को एकत्र हुए हैं । अब आपके पधारने से हमारी सब आशायें पूर्ण हो जायेंगे । जब धर्म की रक्षा करने वाले भगवान श्रीकृष्ण परमधाम को चले गये उसके पश्चात धर्म की क्या दशा हुई आप इन सब बातों का वर्णन करें ।

सूतजी ने जब इस प्रकार शौनकादिक ऋषियों के वचन सुने तो अति प्रसन्न होकर प्रेम पूर्वक बोले — आपलोग धन्य है जो ऐसा प्रश्न किया है, हम प्रथम उन शुकदेव जी को प्रणाम करते हैं जो बिना यज्ञोपवीत संस्कार के ही बालक रूप में घर से वन को चले गये और व्यास जी मोहित होकर उनके पीछे भागे , उस समय उन्होंने वृक्षों में विलीन हो व्यास जी को उपदेश दिया कि यह संसार झूठा है । न कोई किसी का पुत्र है और न माता । इससे व्यास जी का मोह दूर हुआ । जिन्होंने अमृत रूपी कल्याणकारिणी मोक्षदायिनी श्रीमद् भागवत कथा सुनाकर मनुष्य मात्र का बड़ा कल्याण किया हम उन महात्मा शुकदेव जी को प्रणाम करते हैं ।

।। भगवान के २४ अवतारों का वर्णन ।।

सूत जी कहने लगे कि जब परब्रह्म परमात्मा ने सर्वप्रथम सृष्टि रचने की इच्छा की तो महतत्त्व अहंकार ( पाँच महाभूत और ग्यारह इन्द्रियों ) से पुरुष रूप धारण किया । जब प्रलय में जल ही जल हो जाता है तब वह भगवान योगनिद्रा से शेष शय्या पर सो जाते हैं । तदनन्तर उनकी नाभि से कमल और कमल से ब्रह्मा उत्पन्न होते हैं । ब्रह्मा से मरिच आदि ऋषि तथा उनसे देवता, मनुष्य, पशु-पक्षी आदि उत्पन्न होते हैं । भगवान के मुख्यतः २४ अवतार माने गए हैं ।


पहला अवतार ' सनकादि ' ऋषियों का हुआ जिन्होंने ५ वर्ष की आयु में ही तप धारण किया । दूसरे अवतार में ' वाराह ' जी बनकर पाताल से पृथ्वी को लाए । तीसरा अवतार ' नारद जी ' का धारण कर पञ्च तत्त्व की रचना की। चौथे अवतार ' नारायण ' का रूप धारण कर तपस्या का मार्ग प्रशस्त किया । पाँचवाँ अवतार ' कपिल ' मुनि का धारण कर सांख्य शास्त्र द्वारा परमात्मा का ज्ञान कहा । छठे अवतार ने ' दत्तात्रेय ' बनकर प्रह्लाद आदि को आत्मविद्या का ज्ञान दिया । सातवें अवतार में ' यज्ञ ' बनकर यज्ञ का मार्ग दिखाया । आठवें अवतार में ' ऋषभ देव ' बन परमहंसों‌ का मार्ग प्रशस्त किया । नवें अवतार में ' प्रथुवन ' बनकर पृथ्वी का दोहन किया । दसवें अवतार में ' मत्स्य ' का रूप धारण कर वैवस्वत मनु की रक्षा की । ग्यारहवें अवतार में ' कच्छप ' का रूप धारण कर सिन्धु मंथन के समाय मंदराचल का भार अपनी पीठ पर धारण किया । बारहवाँ अवतार ' धनवन्तरि ' का धारण कर अमृत पात्र ले सिन्धु से प्रकट हुए । तेरहवें अवतार में ' मोहिनी ' रूप धारण कर देवताओं को अमृत पिलाकर दानवों से रक्षा की । चौदहवाँ अवतार ' नृसिंह ' का धारण कर हिरनाकुश को मारकर धर्म की रक्षा की। पन्द्रहवाँ अवतार ' वामन ' तथा सोलहवाँ ' परशुराम ' का धारण कर भूमि का भार उतारा । सत्रहवाँ अवतार ' व्यास जी ' का धारण किया । अठारहवाँ अवतार ' श्रीराम ' तथा उन्नीसवाँ ' श्रीकृष्ण ' का रूप धारण कर भूमि का भार उतारा । इक्कीसवाँ ' बुद्ध ' बाईसवाँ ' हयग्रीव ' तथा तेईसवाँ ' हंस ' अवतार धारण किया । चौबीसबाँ अवतार कलियुग में ' कल्कि ' अवतार के नाम से होगा । 

।। वेद व्यास जी का ' भागवत ' बनाना ।।

पराशर के पुत्र श्री व्यास जी ने कलियुग को आया देखकर, सर्वकल्याण की भावना से वेद को चार भागों में विभक्त किया और उनसे पाँचवाँ वेद इतिहास पुराण बनाया । पैल ऋषि ऋग्वेद के, जैमिनी सामवेद के, वैश्म्पायण यजुर्वेद के तथा सुमन्त मुनि अथर्ववेद के ज्ञाता हुए । मेरे पिता लोमहर्षण इतिहास पुराणों के ज्ञाता हुए । सबने अपने शिष्यों को वेदों पुराणों की शिक्षा दी जिससे इनका प्रचार हुआ फिर व्यास जी ने महाभारत बनाया परन्तु उससे भी सन्तुष्ट न होने पर एक दिन विचारमग्न बैठे हुए थे ।उस समय नारद जी वीणा बजाते हुए हरिगुण गान करते वहाँ आये  । 

व्यास जी को विचार मग्न देखकर नारद जी ने उनके दुःख का कारण पूछा । व्यास जी बोले — मैंने इतिहास, पुराण महाभारत की रचना की परन्तु मेरा चित्त सुखी नहीं हुआ । आप मेरे दुःख को दूर करने का उपाय बतावें ।

नारद जी बोले — आपने पुराणों तथा महाभारत में धर्म का निरूपण किया है परन्तु मनुष्य मात्र को सच्चा सुख भगवान की भक्ति के द्वारा ही प्राप्त हो सकता हैं । मैं पहले एक दासी का पुत्र था महात्माओं की सेवा करता था । महात्मा चातुर्मास मेरे यहाँ विश्राम करते थे । मैंने उनसे भगवान के साकार अवतार की महिमा सुनी जिससे मेरे हृदय में भगवान की भक्ति उत्पन्न हुआ । फिर सन्तों ने मुझे उसका पात्र समझकर भगवान की भक्ति का उपदेश दिया । 

भगवान की प्रीति होने भगवान ने भक्ति से प्रसन्न होकर मुझे बुद्धि दी जिससे मुझे ज्ञान उत्पन्न हुआ । भगवान की भक्ति ही अंतःकरण शुद्ध करने वाली तथा मोक्ष देने वाली है । इस कारण अब तुम दुःखी लोगों के दुःखों को दूर करने के लिये भगवान की सगुण लीलाओं का वर्णन करो । जिससे सब में भगवान की भक्ति उत्पन्न हो और उनका कल्याण हो ।

।। नारद जी के पूर्व जन्म की कथा ।।

जब व्यास जी ने नारद जी से हरि भक्त की महिमा सुनी तो कहने लगे की जब आपको महात्मागन उपदेश देकर चले गये उसके बाद में आपने जीवन को किस प्रकार व्यतीत किया तथा आपको पूर्व जन्म की बातें किस प्रकार याद रहीं ? यह बताने की कृपा करें ।

नारद जी बोले— जब महात्मा लोग चले गए उसके बाद एक दिन मेरी माता गाय को दोहन करने गई, उसे समय वह सांप के काटने से मर गई , मैं उनका बिना मुँह देख उत्तर दिशा को चला गया, बहुत दूर जा कर एक नदी में स्नान करने पर मेरे हृदय का दुःख दूर हो गया । वहाँ एक पीपल के नीचे ध्यान लगाकर बैठ गया तो भगवान ने दर्शन दिए, जब पुणः भगवान का रूप दिखाई नहीं दिया तो मैंने दुःखी होकर फिर ध्यान को स्थिर किया । तब आकाशवाणी हुई मैंने तुम्हें अपना रूप अपने में लगाने को दिखाया था अब तुम संतजनों की सेवा करो, इस शरीर को त्याग कर पार्षद बनोगे, मेरे वरदान से तुम्हें अपनी बातें याद रहेंगी । यह आकाशवाणी सुनकर मैं संतों में विचरण करता रहा और मेरा वह शरीर छूट गया । कल्पान्तर में जब नारायण शयन कर रहे थे तो उनकी सांस के साथ मैं उनके उधर में प्रवेश कर गया । योगनिद्रा से जागकर जब भगवान ने मरिचादि ऋषियों को उत्पन्न किया तो मैं उनके प्राणों से उत्पन्न हुआ और संसार में विचरण करने लगा । भगवान की कृपा से मुझे हर स्थान पर जाने की शक्ति प्राप्त है । मैं हर स्थान पर विचरण करता हुआ हरि गुणगान करता हूँ । संसार सिंधु से पर जाने को हरि गुणगान ही एक नौका है । अब मैं जहाँ भी भगवान को याद करता हूँ । वही मुझको दर्शन देते हैं ।


हे व्यास जी — भगवान के गुणगान और भक्ति से चित्त शांत होता है, काम, क्रोधादि पास नहीं आते, इस कारण अब तुम भी मन में ऐसा ही निश्चय करो जिससे चित्त को शान्ति प्राप्त हो, नारद जी इस प्रकार व्यास जी से कहकर वीणा बजाते हरिगुण गाते हुए वहाँ से प्रस्थान कर गये ।

।। परीक्षित के जन्म की कथा ।।

शौनक जी ने पूछा, हे सूत जी ! जब नारद जी व्यास जी से बातचीत कर चले गये तो व्यास जी ने क्या किया ? सूतजी कहने लगे — ब्रह्म नदी के तट पर आश्रम में शय्या पर विराजमान होकर व्यास जी ने भगवान का ध्यान लगाकर उनका दर्शन किया और इसके बाद उन्होंने श्रीमद् भागवत को बनाया जो कि सब सुख तथा मोक्ष की देने वाली है । व्यास जी ने शुकदेव जी को श्रीमद् भागवत को पढ़ाया । यहाँ अब पहले परीक्षित के जन्म की कथा का वर्णन करते हैं ।

जब भी ने गदा से दुर्योधन की जाँघें तोड़ दीं उसके बाद में अश्वत्थामा ने होते हुए द्रोपदी के पाँचों पुत्रों को मार डाला जिसे सुनकर द्रोपदी बहुत दुःखी हुई और कहने लगी कि जब तक मैं अश्वत्थामा को जीवित या मृतक रूप में नहीं देख लूँगी तब तक मेरे चित्त का दुःख दूर न होगा । द्रोपदी के दुःख को देख भीम अश्वत्थामा के मारने की प्रतिज्ञा कर चले गये और अश्वत्थामा को ढूँढ लिया । अर्जुन भी रथ में सवार हो भीम के साथ थे । श्रीकृष्ण भी अर्जुन के साथ थे । अश्वत्थामा ने भयभीत हो ब्रह्मस्त्र छोड़कर अर्जुन के ब्रह्मास्त्र को रोका । दोनों ब्रह्मस्त्र टकराने से एक आग प्रज्वलित हुई । तब नारद और व्यास ने आकर उनको समझाया तो अर्जुन ने अपना ब्रह्मस्त्र वापस लौटा लिया । अश्वत्थामा अपना ब्रह्मस्त्र नहीं लौटा सका पर उसने व्यास जी के कहने से पांडवों पर गिरने से रोक दिया और कहा कि यह ब्रह्मास्त्र अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ पर पड़ेगा , भीम व अर्जुन अश्वत्थामा को द्रोपदी के पास पकड़ कर लाये फिर द्रोपदी के कहने पर अश्वत्थामा को छोड़ दिया ।

।। श्रीकृष्ण द्वारा उत्तरा के गर्भ की रक्षा ।।

सूतजी कहते हैं कि जब पांडव मृतकों को जलांजलि दे चुके तब भगवान श्रीकृष्ण ने उपदेश देकर सबको शान्त किया। उस समय उत्तरा रूदन मचाती हुई बोली कि रक्षा करो, रक्षा करो। भगवान श्रीकृष्ण समझ गये कि अश्वत्थामा का ब्रह्मास्त्र उत्तरा के गर्भ को खंडित करने आ रहा है इसलिये उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र द्वारा उस गर्भ की रक्षा की। इसके बाद जब श्रीकृष्ण द्वारका जाने का विचार करने लगे तो कुन्ती प्रेम विभोर हो गई और उसने और कुछ समय तक श्रीकृष्ण से रुकने का आग्रह किया, जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने स्वीकार कर लिया। कुछ दिन रुकने के पश्चात जब जाने का विचार किया तो युधिष्ठिर ने रोक लिया। उस समय युधिष्ठिर को वैराग्य प्राप्त हुआ और कहने लगे कि मैंने राज्य लोभ से सुहृदयों का संहार कराया है। अब मुझे कुछ अच्छा नहीं लगता। मैं राज्य नहीं करूँगा। तब भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को समझाकर भीष्म पितामह के पास ज्ञान शिक्षा के लिये गये ।

शौनक जी कहने लगे हे — सूतजी ! जब अश्वत्थामा के छोड़े हुए ब्रह्म अस्त्र से उत्तरा के गर्भ की भगवान श्रीकृष्ण ने रक्षा की तो वह किस प्रकार उत्पन्न हुए तथा उनके जीवन चरित्र के विषय में बताइये और उनके मृत्यु का कारण भी बतायें ।

शौनकादि ऋषियों की बात सुनकर सूत जी कहने लगे — हे ऋषियों ! भगवान श्रीकृष्ण के चरण कमल हृदय में धारण कर उनकी कृपा कटाक्ष से धर्मराज युधिष्ठिर शासन का कार्य चलाने लगे और परन्तु उन्हें श्रीकृष्ण जी की याद आती थी और उनका चित्त राज काज में नहीं लगता था । उस समय अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा गर्भवती थी । जब उसका गर्भ अश्वत्थामा के ब्रह्मस्त्र द्वारा खंडित होने लगा तो उत्तरा को दिखाई दिया कि कोई श्यामल शरीर वाला, स्वर्ण मुकुट तथा कुण्डलों से सुशोभित, बिजली के समान चमकते हुए पीत वसन धारण किये हुए, लम्बी भुजाओं वाला, जिसके नेत्र लाल वर्ण के थे तथा अंगूठे के बराबर उसका आकार था, अग्नि के समान प्रज्ज्वलित गदा धारण किये हुए, गदा को घुमाकर ब्रह्म तेज को नष्ट कर रहा है । 

जब ब्रह्मस्त्र का तेज नष्ट हो गया तो गर्भ का बालक विचार करने लगा कि यह तेजवान पुरुष कौन है जिसने इस ब्रह्म तेज को नष्ट किया है ? दस महीने निरन्तर वह बालक उस तेजवान पुरुष का गर्भ में दर्शन करता रहा। उसके बाद वह अन्तर्ध्यान हो गया और गर्भ से एक सुन्दर तथा बलवान पुत्र का जन्म हुआ। धर्मराज युधिष्ठिर ने बहुत खुशी मनाई और गऊ, स्वर्ण, हाथी, घोड़े, धन आदि ब्राह्मणों को दान दिये। नामकरण संस्कार के समय ब्राह्मणों ने बताया कि यह कुरुवंश में बहुत शक्तिशाली तथा उत्तम राजा होगा।

स्वयं भगवान ने इसके गर्भ की रक्षा की है तो ये गऊ, द्विज, देव तथा विष्णु का बड़ा भक्त, धनुर्धर, पराक्रमी, दानी, क्षमाशील, उदार, यशस्वी तथा सबका शुभचिन्तक और प्रजापालक होगा। अश्वमेध यज्ञ करेगा, कलियुग को दंड देने वाला होगा तथा वृद्धजनों का बहुत सम्मान करने वाला होगा। एक ऋषि पुत्र इसे तक्षक नाग द्वारा डसने का श्राप देगा जिससे भयभीत हो यह गंगाजी पर हरि स्मरण करने जायेगा। वहाँ श्री शुकदेव जी आकर श्रीमद् भागवत सप्ताह की कथा सुनावेंगे जिससे यह मोक्ष को प्राप्त होगा।

यह जीवन भर गर्भ में देखे हुए उस पुरुष की प्रतीक्षा करेगा कि मुझे गर्भ में दर्शन देने वाला कौन पुरुष है ? इसी कारण इसका नाम परीक्षित होगा। धीरे धीरे परीक्षित बड़ा होने लगा । पंडितों के कहने के अनुसार वह बड़ा बलवान, उदार और धैर्यवान तथा धर्म का रक्षक हुआ। युधिष्ठिर को लोगों ने बताया कि तुमने बहुत बड़ा संहार किया है । इस से बड़ा पाप लगा है इसे दूर करने के लिए अश्वमेघ यज्ञ करना आवश्यक है ।

राजा युधिष्ठिर ने विद्वानों की सलाह मानकर यज्ञ करने का विचार किया और उसके लिये बहुत से स्वर्ण और धन की आवश्यकता थी । लोगों ने युधिष्ठिर को बताया कि प्राचीन समय में उत्तर दिशा में राजा मरु ने यज्ञ किया था उसका बहुत स्वर्ण और धन वहाँ पड़ा है उसे मंगाने से सब काम सरल हो जायेगा ।

युधिष्ठिर ने अर्जुन और भीम को उसे लाने की आज्ञा दी । भीम और अर्जुन वहाँ से बहुत सा सोना और धन ले आये, उसके बाद में धर्मराज युधिष्ठिर ने बहुत बड़ा अश्वमेध यज्ञ किया और याचकों तथा ब्राह्मणों को मनमाना दान देकर उन्हें सन्तुष्ट किया और हरि पूजन किया जिससे उन्होंने बहुत सम्मान पाया ।

।। विदुर गाँधारी और धृतराष्ट्र का हिमालय गमन ।।

सूतजी बोले कि जब विदुर तीर्थ यात्रा के लिए चले गये थे तो उन्होंने बहुत से तीर्थ स्थानों में विचरण किया। सन्तों का सत्संग किया, उसके बाद मैत्रेयजी के आश्रम पर गये। विदुर जी के हृदय में जो शंकायें थीं वह सब उन्होंने प्रकट कीं। मैत्रेयजी ने अपने उपदेशों द्वारा ऐसा उत्तर दिया जिससे विदुर जी की सब शंकायें दूर हो गयीं और उन्हें ज्ञान हो गया। विदुरजी विचरण करते हुए हस्तिनापुर आये। धर्मराज ने विदुरजी का आगमन सुनकर स्वजनों सहित उनका स्वागत किया और सम्मान पूर्वक अपने साथ ले आये।

युधिष्ठिर विदुरजी से कहने लगे कि आपने हमारा पालन-पोषण किया। माता और भाइयों सहित हमें बहुत से संकटों से बचाया। जब आप हमें छोड़ करके चले गये थे। हमें आपकी बहुत याद आती थी। आज आपके दर्शन कर हमें बहुत सुख हुआ। अब बताओ कि आप कौन-कौन से तीर्थों को गये। हमारे परम हितैषी यदुवंशियों का समाचार भी सुनाओ कि वह कुशलपूर्वक तो हैं।

विदुरजी ने प्रेमपूर्वक युधिष्ठिर को अपनी सारी तीर्थ यात्रा का हाल सुनाया परन्तु यदुवंशियों का कोई भी समाचार नहीं सुनाया क्योंकि जब कोई अपने हितैषी का अप्रिय समाचार सुनता है तो वह बहुत दुःखी होता है। विदुर जी ने धृतराष्ट्र का हित करने के लिए अब वहीं निवास किया। 

विदुर जी धर्मराज के अवतार थे । उन्हें एक बार एक ऋषि ने शाप दे दिया था कि तुम सौ वर्ष तक शूद्र की योनि में जीवन बिताओगे इसी कारण यहाँ धर्मराज ने विदुर के रूप में अवतार धारण किया था ।

अब १०० वर्ष पूरे होने वाले थे । विदुर जी ने विचार किया कि अब कलियुग आने वाला है और पांडवों का भी काल आने वाला है । इसलिए वह धृतराष्ट्र को समझा कर कहने लगे । हे भ्राता ! देखो अब तुम्हारा अन्त समय ही हैं । तुम ने पांडवों को बहुत दुःख दिया । लाख के भवन में जलाने का प्रबंध किया । द्रोपदी का सभा में अपमान किया । अतः अब तुम्हें उन पांडवों के आश्रित जीवन व्यतीत करना उचित नहीं । तुम्हारे तो सब पुत्र समाप्त हो गये हैं , तुम हिमालय पर चलकर तप द्वारा परमात्मा को प्राप्त करो । विदुर जी की बात धृतराष्ट्र की समझ में आ गई और वह गाँधारी सहित रात में घर से निकाल कर विदुर के साथ वन को चले गये ।

अगले दिन जब धृतराष्ट्र, गाँधारी तथा विदुर जी दिखाई न पड़े तो उन्होंने संजय से पूछा । हे संजय ! हमारे ताऊ धृतराष्ट्र, माता गाँधारी और चाचा विदुर जी कहाँ गये । मुझे विदुर ने धोखा दिया । संजय के वचन सुनकर युधिष्ठिर बहुत दुःखी हुए और उन्होंने अपने अनेक दूत उनका पता लगाने को भेजे परन्तु कहीं पता नहीं चला।

युधिष्ठिर, विदुर, गाँधारी और धृतराष्ट्र की याद करके बहुत दुःखी होते थे कि एक समय नारद जी आये। युधिष्ठिर ने उनकी सेवा की और विनयपूर्वक कहने लगे - हे देवर्षि ! आप तीनों लोकों का सब कुछ देखने वाले हैं। आप कृपा करके मुझको इतना बतायें कि मेरे ताऊ धृतराष्ट्र, गाँधारी और विदुर कहाँ हैं। मैं उनके बिना बहुत चिन्तित और व्याकुल हूँ, न जाने वह अपना समय किन संकटों से व्यतीत करते होंगे ?

युधिष्ठिर के वचनों को सुनकर नारदजी कहने लगे। हे कुरुनन्दन ! अपने हृदय से शोक को निकाल दो। माया मोह में लिप्त होना ठीक नहीं। ज्ञानी पुरुष को यह मानना चाहिए कि संसार का कर्त्ता एक ही परब्रह्म परमात्मा है। वही प्राणी में आत्मा रूप में विराजमान रहता है। अनेक रूप देखने के हैं, वास्तव में वह एक ही परमात्मा सब में है। आत्म, आत्मा में भेद नहीं मानना चाहिए और न उसे कुछ सुख दुःख ही प्राप्त होता है वह परमात्मा ही जगत का पालक है।

इस समय धृतराष्ट्र, गाँधारी और विदुर सहित हिमालय के दक्षिण भाग में आश्रम पर रह रहे हैं । वह अब परमात्मा के चिन्तन में रहते हैं । उनके रजोगुण तथा तमोगुण अब समाप्त हो गया हैं । काम क्रोधादि सब उनसे दूर रहते हैं, उन्हें अब भूख प्यास किसी वस्तु की इच्छा नहीं सताती । इस प्रकार वह विदुर की कृपा से परमात्मा को प्राप्त कर चुके हैं । उनकी तुम किसी प्रकार की चिन्ता मत करो ।

आज से पाँचवें दिन धृतराष्ट्र का शरीरान्त हो जाएगा, वह परमात्मा को प्राप्त हो जायेंगे । यदि तुम चाहो तो मैं उनके शरीर को यहाँ ला दूँ , परन्तु उस से लाभ क्या ? विचार करो कि उसके लाने से कोई लाभ न होगा । वह साध्वी पतिव्रता अपने पति के साथ अपना जीवन समाप्त कर देगी । आपकी इच्छा हो तो मैं विदुर जी को भी यहाँ ला सकता हूँ परन्तु लाभ इस में भी कुछ नहीं होगा । विदुर जी भी गाँधारी और धृतराष्ट्र के वियोग में दुःखी होकर तीर्थ यात्रा करने के लिए तीर्थ स्थानों को चले जायेंगे । यह सब कुछ देखकर तुम्हें फिर भी दुःख ही होगा । इस कारण तुम्हें अपने हृदय में उनका किसी भी प्रकार का सोच नहीं करना चाहिए । नारद मुनि के उपदेश से धर्मराज युधिष्ठिर के हृदय का सब दुःख और संदेह दूर हो गया और उनका चित्त शांत हो गया । उपदेश देकर नारद जी अपने लोक को चले गये ।

।। युधिष्ठिर का दुःखद स्वप्न देखना और अर्जुन का द्वारका से आना ।।

सूतजी बोले- युधिष्ठिर ने अर्जुन को भगवान कृष्ण का समाचार लाने के लिए द्वारका भेजा था। उनको गये हुए सात मास व्यतीत हो गये थे परन्तु वह लौटकर वापस नहीं आये थे। इन दिनों युधिष्ठिर ने नये-नये उत्पात देखे, उन्हें खराब स्वप्न दिखाई देते थे। युधिष्ठिर ने देखा कि अब समय की गति बदलने लगी है। ऋतुओं ने अपना धर्म बदल दिया है। मनुष्यों में पापाचार बढ़ गया है। कपट बढ़ गया है। मनुष्य लोभ के वशीभूत हो अनुचित काम करने लगे हैं। यह सब कुछ देखकर धर्मराज युधिष्ठिर दुःखी हुए और भीम से कहने लगे - हे भैया भीम! सात महीने व्यतीत हो चुके, अर्जुन अभी द्वारका से नहीं आये। मुझे बहुत अपशकुन दिखाई पड़ते हैं।

बायीं भुजा, बायीं आँख तथा बायीं जांघ फड़की रही हैं। हृदय भी काँपता है। ऐसा प्रतीत होता है कि शीघ्र ही कोई अशुभ फल प्राप्त होने वाला है। हे भीम! कुत्ते रो रहे हैं। गऊ आदि श्रेष्ठ पशु मेरे बायीं तरफ होकर जाते हैं। गधा आदि दाहिनी ओर होकर निकलते हैं, दिशाओं में धूल छाई हुई है। उल्लू कर्कष स्वर से भयावनी आवाज में बोल रहे हैं। जिसको सुनकर हृदय कंपायमान होता है। घोड़ों की आँखों से आँस निकल रहे हैं। पृथ्वी पर्वतों सहित हिलाती है। आकाश में आग सी लगी हुई दिखाई पड़ रही है। बिना बादलों के ही भयंकर मेघों जैसी गर्जन सुनाई देती है। वज्रपात भी हो रहे हैं। इन सब अपशकुनों को देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि अब भगवान के चरण पृथ्वी से उठ गये। 

युधिष्ठिर इस प्रकार भीम से बाचतीत कर रहे थे उसी समय वहाँ पर अर्जुन भी आ गये। अर्जुन ने आँखों से आँसू बहाते हुए युधिष्ठिर के चरणों पर गिरकर प्रणाम किया। उस समय युधिष्ठिर ने अर्जुन को देखा कि उनका मुख कान्तिहीन है, उनका शरीर काँप रहा है आँखों से आँसू बरस रहे हैं। ऐसी दशा अर्जुन की देखकर युधिष्ठिर का हृदय कांप गया और दुःखी होकर कहने लगे - हे भैया अर्जुन, मौन क्यों हो ? तुम्हारा यह हाल कैसे हुआ है ? क्या किसी ने तुम्हारा अपमान किया है जो इतने व्याकुल दिखाई दे रहे हो ?

मुझे श्रीकृष्ण की कुशलता बताओ। हमारे नाना सूरसेन और मामा वासुदेव आनन्दपूर्वक हैं तथा उनके भाई तो सुखी हैं ? हमारी देवकी तथा अन्य मामियाँ सकुशल तो हैं। अपने भाइयों सहित राजा उग्रसेन तो प्रसन्न हैं ? भैया बलराम तथा अनिरुद्ध आदि सभी यदुवंशियों की कुशलता सुनाकर कहो ।


 ।। श्रीकृष्ण का गौलोक गमन ।।


सूतजी बोले- युधिष्ठिर के वचनों को सुनकर अर्जुन दुःखी होकर कहने लगे - हे भ्राता ! आज मैं भगवान से वंचित हो गया। मुझे अब कुछ भी अच्छा नहीं लगता है। आज उनके बिना मैं तेजहीन हो गया हूँ। उन्हीं की कृपा से मैंने स्वयंवर में अनेकों नरेशों का मान मर्दन करके द्रोपदी से विवाह किया था। उन्हीं की कृपा से मैंने इन्द्रादिक देवताओं को विजय कर खाण्डव वन में अग्नि को संतुष्ट किया था। उन्हीं की कृपा से मय दानव द्वारा आपको यह सभा प्राप्त हुई थी। उन्हीं की कृपा से राजा बलि जैसों में सम्मान प्राप्त हुआ था, उन्हीं की कृपा से भीम ने जरासन्ध को मारा था, उन्हीं ने द्रोपदी की लाज बचा कर वन में बुनीस्त्र के कोप से रक्षा की थी, उन्हीं की कृपा से मैंने शंकर से युद्ध कर पाशुपत अस्त्र प्राप्त किया था, उन्हीं की कृपा से मैंने इन्द्रलोक में सम्मान पाया तथा निवात कवचों को मार कर गांडीव धनुष की प्राप्ति की व उन्हीं की कृपा से महाभारत में अनेकों महारथी संहारे । 


आज वही भगवान कृष्ण मुझे छोड़कर चले गये। उन्होंने सदा हमारी रक्षा की और हम पर दयालु रहे। यह समस्त वैभव और सम्मान मुझे सब उन्हीं ने दिलाया। आज अकेले उनके बिना मैं तेजहीन हो गया। मेरी शक्ति सामर्थ्य सब समाप्त हो गई। मैं अब किसी योग्य नहीं रहा। मैं जब श्रीकृष्ण की रानियों को लेकर आ रहा था उस समय भील लोगों ने आकर घेर लिया। मैंने उनसे संग्राम करना चाहा। मेरे पास गाण्डीव धनुष, वो ही तरकश और वही बाण थे परन्तु बिना भगवान श्रीकृष्ण के मैं कुछ नहीं कर सका। मेरे धनुष-बाण शक्ति सामर्थ्य कुछ भी काम नहीं आई। भीलों ने रानियों को लूट लिया और मैं खड़ा-खड़ा असहायों की भाँति देखता ही रह गया।

हे भ्रातृवर! यह सब ईश्वर की लीला है। ब्राह्मण, ऋषि वंशज सब यदुवंशी परस्पर प्रभास क्षेत्र में लड़कर मर गये। इस प्रकार यदुवंशी के भार को भूमि से उतार कर भगवान कृष्ण भी अपने लोक को पलायन कर गए। अब यदुवंशी में नाम को दो चार ही शेष रहे होंगे। मैं अनिरुद्ध के पुत्र वज्र को लेकर यहाँ आपके पास आया हूँ।

इस प्रकार यदुवंश का संहार और श्रीकृष्ण का परमधाम पलायन सुनकर युधिष्ठिर बहुत दुःखी हुए और उन्होंने समझ लिया अब कलियुग आ गया है। अपने स्वजनों के दुःख की कथा सुनकर कुन्ती ने अपना शरीर त्याग दिया।

युधिष्ठिर ने अपने सब भाइयों से विचार कर अभिमन्यु सुत परीक्षित को ज्ञान उपदेश तथा राजनीति की शिक्षा देकर उसे हस्तिनापुर के राजसिंहासन पर बिठाया और उसको राजा बनाकर उसका राज-तिलक कर दिया।

मथुरा का राज वज्र को दिया फिर इसके बाद में संसार से मोह तोड़कर पाँचों भाई द्रोपदी सहित हिमालय पर तप करने चले गये। द्रोपदी, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव तो तप करते हुए हिमालय में गलकर स्वर्ग चले गये और राजा युधिष्ठिर सदेह स्वर्ग चले गये। पांडवो के स्वर्ग गमन का वृत्तान्त जो पढ़ता है और सुनता है वह मंगल प्राप्त करता है।

।। परीक्षित की दिग्विजय ।।

सूतजी बोले - राजा होने के बाद परीक्षित ने ब्राह्मणों की शिक्षानुसार राज्य किया। राजा ने उत्तर की पुत्री इरावती से विवाह कर जनमेजय आदि चार पुत्र उत्पन्न किये। उसने कृपाचार्य को अपना गुरु बनाया और तीन अश्वमेध यज्ञ किये जिनमें ब्राह्मणों को बहुत दान और दक्षिणा से सम्मानित किया। जब राजा परीक्षित दिग्विजय को गया हुआ था तो उसने भद्राश्व, केतुमाल, भारतवर्ष, कुरु, किम्पुरुष आदि राजाओं का परास्त किया। राजाओं से भेंट स्वीकार कर उन्होंने अश्वत्थामा और श्रीकृष्ण के चरित्र सुने और प्रसन्न होकर हरि चरणों से प्रीति करने लगा। इसके बाद में परीक्षित ने कुरुक्षेत्र को पलयान किया।

।। परीक्षित द्वारा भूमि और धर्म को आश्वासन और कलियुग के वास स्थान का निरुपण ।।

सूतजी बोले- एक दिन सरस्वती के तट पर परीक्षित ने देखा कि शूद्र जो राजाओं का सा वेष धारण किये था वह एक बैल और एक गऊ को मार रहा था। ताड़ना के भय से कांपता हुआ बैल एक पाँव से घिसटता था। यह दशा देखकर राजा बाण चढ़ाकर ललकार कर बोला- हे अधर्मी तू कौन है ! मेरे होते हुए अन्याय से इन निर्बलों को मारता है! तू शूद्र मालूम होता है। रे अधम ! तू वध के योग्य है। यह कह राजा ने बैल से पूछा कि तुम कौन हो ? तुम्हारी तीन टाँगें कैसे टूट गयीं ! पाण्डवों से रक्षित भूतल में तू ही एक ऐसा है जिसके शोक से आँसू टपकते हैं। 

हे गौ माता ! अब तू भी रुदन मत कर। जब दुष्टों को दण्ड देने वाला मैं मौजूद हूँ तब तुमको कुछ भय नहीं है। हे सौरभेय ! तू अपने विरूप करने वाले को बता मैं उसको यथार्थ दण्ड दूँगा। बैल ने कहा- हे श्रेष्ठपुरुष ! हम उस मनुष्य को नहीं जानते हैं जिससे क्लेश उत्पन्न होता है। अनेक शास्त्रों के अनेक मत हैं कि आत्मा को सुख दुःख का कारण दैव को मानते हैं। हे राजर्षि! कितने ही कहते हैं कि परमेश्वर सुख दुःख का कारण है। इसलिए आप ही अपनी बुद्धि से विचार लीजिए कि सुख दुःख का देने वाला कौन है ? धर्म के वचन सुनकर राजा का विषाद जाता रहा और उससे बोला - हे धर्मज्ञ ! तुम तो धर्म दिखाई देते हो, क्योंकि तुम धर्म ही की चर्चा करते हो। अधर्मी और अधर्म की सूचना करने वाला एक ही जगह है। तुमने कलियुग का नाम इसलिए नहीं लिया कि तुम्हें पाप लगेगा। धर्म के तप, शौच, दया और सत्य आपके ये चार पाँव हैं। 

इनमें से तप, शौच और दया, इन तीन पाँवों को अधर्म ने तोड़ डाला है। केवल सत्य नाम वाला पाँव शेष रह गया है इसी से तुम अपना निर्वाह करते हो सो इसको भी कलियुग तोड़ना चाहता है। गौरूप धारण किए हुए पृथ्वी है वह इस बात से संतप्त है कि अब्राह्मण शूद्र मुझको भोगेंगे। धर्म और पृथ्वी को इस तरह समझाकर कलियुग के मारने के लिए परीक्षित ने तीव्र खड्ग उठाया। 

कलियुग ने डर के मारे उसके चरणों में गिर पड़ा। राजा बोला- तू शरण आया है इसलिए भय मत कर लेकिन तू अधर्मी का मित्र है इसलिए मेरे राज्य से अभी निकल जा। यहाँ धर्म और सत्य ही रहते हैं। ऋषि, मुनि यहाँ भगवान का पूजन करते हैं। ऐसे वचनों को सुनकर कलियुग काँप कर राजा से बोला - हे नृप! आप समस्त भू-मण्डल के राजा हो वह स्थान कौन सा है जहाँ आपका राज्य न हो ? आप मुझे स्थान बता दो, मैं वहाँ रहकर अपना समय बिताकर आपकी आज्ञा का पालन करूँगा। कलियुग की प्रार्थना सुनकर राजा ने आज्ञा दी कि तुम जुआ, मदिरा की दुकान, वेश्या के घर और कसाई के घर; इन चार स्थानों में रहो। कलियुग ने कहा ये स्थान थोड़े हैं, इनमें मेरा निर्वाह न होगा। तब राजा ने कहा मैंने तुम्हारे रहने का पंचवाँ स्थान सुवर्ण दिया।


इस सुवर्ण के साथ मिथ्या, मद, काम, रजोगुण और बैर ये पाँचों स्थान भी दिये। कलियुग इन पाँच स्थानों में रहने लगा। जो मनुष्य संसार में अपना वैभव बढ़ाना चाहे वो पाँचों स्थानों का सेवन न करे। इस प्रकार कलियुग को दण्ड देकर बैल के जो तप, शौच और दया ये तीन पाँव टूट गए थे इनको बढ़ाकर पृथ्वी को सन्तोष दिया। 

।। परीक्षित का शमीक ऋषि के आश्रम में जाना और मरा हुआ सर्प ऋषि के गले में डालना ।।

सूतजी ने कहा- यद्यपि कलियुग का प्रवेश हो गया था परन्तु जब तक राजा परीक्षित का राज्य रहा तब तक कलि प्रभाव न कर सका। राजा परीक्षित भौंरे की तरह सार वस्तु ग्रहण करने वाला था, इसलिए कलियुग से बैर बाँधना उचित न समझा क्योंकि इस कलियुग में मनसा पुण्य होता है परन्तु मनसा पाप नहीं होता। पाप तो करने से लगता है और पुण्य कर्म मन में विचारने से हो जाता है।

एक दिन राजा परीक्षित शिकार को गए। मृगों के पीछे दौड़ते-दौड़ते भूख प्यास से बहुत व्याकुल होकर शमीक ऋषि के आश्रम में पहुँचे और वहाँ ऋषि को आँखें बन्द किये हुए बैठा देखा। ऋषि ध्यान लगाए थे, उन्हें राजा के आने का कुछ ज्ञान न था। ऋषि से राजा ने जल मांगा, जब राजा को कुछ उत्तर न मिला और न मुनि ने सत्कार किया तब तो राजा बड़ा ही क्रुद्ध हुआ। 

हे ऋषियों ! राजा प्यास से ऐसा पीड़ित था कि उसे ब्राह्मण पर अत्यन्त क्रोध आया। आश्रम से निकल कर राजा ने एक मरा हुआ सर्प उठाकर उस ऋषि के कन्धे पर रखकर अपने नगर की राह ली। शमीक ऋषि का श्रृंगी नामक पुत्र बालकों के साथ खेल रहा था सो उस बालक से किसी ने जाकर कहा कि तेरे पिता के गले में कोई राजा मरा हुआ सर्प डाल गया है। 

यह सुनकर वह बालक कहने लगा- हाय ! आश्चर्य है कि ये राजा कैसे अधर्मी हो गए हैं ! नीच, दुर्बुद्धि, उन्मार्गगामी राजाओं को दण्ड देने वाले श्री कृष्ण भगवान परमधाम को चले गए अब इनको डर किसका है ? इसी से ये धर्म के सेतु को तोड़कर चलने लगे हैं।

इस तरह कहकर क्रोध से लाल आँखें करके कौशिकी नदी का जल हाथ में ले शाप दे दिया कि जिसने धर्म की मर्यादा तोड़कर मेरे पिता के गले में मरा हुआ सर्प डाला है उसे मेरा भेजा हुआ तक्षक आज के सातवें दिन डस लेगा। 

इस तरह शाप देकर वह बालक अपने आश्रम आया और अपने पिता के गले में मरा हुआ सर्प देखकर रोने लगा। तब अपने पुत्र के संतप्त रूदन को सुन शमीक ऋषि ने नेत्र खोले। अपने कन्धों पर मरा हुआ सर्प देखकर उसे फेंक दिया और पुत्र से पूछने लगे - हे पुत्र ! तू क्यों रोता है ? यह सुनकर श्रृंगी ने सब वृत्तान्त कह सुनाया । राजा को अयोग्य शाप दिया हुआ सुनकर ऋषि कहने लगे - रे अज्ञ ! तूने बड़ा गजब किया। ऐसे थोड़े से अपराध पर ऐसा भारी दण्ड तूने दे दिया। राजा मनुष्यों की गिनती में नहीं है, राजा साक्षात् विष्णु का स्वरूप होता है।

राजा परीक्षित तो साक्षात् राजर्षि, अश्वमेध यज्ञ करने वाला, चक्रवर्ती धर्म का प्रतिपालक है सो भूख, प्यास से यहाँ आया, वह तो सत्कार के योग्य था। शमीक ऋषि ने ये सब बातें अपने पुत्र से कहीं, और भगवान से प्रार्थना की हे भगवान ! इस नासमझ बालक ने जो आपके निष्पाप सेवक का अपराध किया है वह आप क्षमा कर दें। इसी प्रकार ऋषि अपने पुत्र के अपराध पर महा दुःखी हुए।

।। परीक्षित का श्राप समाचार सुनकर गंगा तट पर जाना और शुकादि मुनियों का आना ।।

सूतजी बोले - राजा परीक्षित ने घर जाकर सोचा कि मैंने नीच कर्म किया है। वह ऋषि तो निष्पाप है मैंने उनके गले में सांप लपेटा है। इस कर्म से कोई बड़ी विपत्ति मुझ पर आयेगी। मैं चाहता हूँ कि वह विपत्ति मुझ पर शीघ्र आ जाये जिससे मुझे शिक्षा मिल जाये, और मैं फिर कोई ऐसा अपराध न करूँ। राजा शोक सागर में निमग्न था। उधर शमीक ऋषि ने गौरमुख नामक शिष्य राजा के पास भेजा कि मेरे पुत्र के शाप से सातवें दिन तुमको तक्षक डसेगा, उससे तुम्हारी मृत्यु होगी। 

राजा तक्षक की विषाग्नि को बहुत उत्तम समझने लगा, क्योंकि वह विरक्ति का कारण होने से मोक्ष का कारण होगी। तदनन्तर परीक्षित इस लोक और उस लोक दोनों की वासना छोड़कर श्रीकृष्ण के चरणों में चित्त लगाकर, व्रत साधन करने के लिए आधी धोती ओढ़ी और आधी पहने, सर्वस्व त्याग कर गंगा तट पर बैठा सुनकर बहुत से मुनि अपने-अपने शिष्य वर्गों सहित तीर्थ यात्रा के मन से वहाँ आए। राजा ने उन सबका पूजन करके उनका सम्मान किया। 

जब ऋषि-मुनि आनन्दपूर्वक बैठ गए तब राजा ने हाथ जोड़कर अपने मन की बात कही - मैं तो रात दिन विषय वासना में अचेत था। मुझ पापी को भवसागर से बचाने के लिए परब्रह्म ने ही ब्राह्मण के द्वारा श्राप दिया है जिससे मुझको शीघ्र ही चेत हो गया। 

हे ब्राह्मणों ! मैं सब छोड़कर भवच्चरणों में चित्त लगाकर आपकी और गंगा की शरण में आया हूँ। वह तक्षक आकर मुझको भले ही डस ले परन्तु आप विष्णु भगवान का संकीर्तन कीजिए । जिससे अनन्त भगवान में मेरी प्रगाढ़ भक्ति हो और जिस-जिस योनि में मुझे जन्म लेना पड़े तहाँ-तहाँ साधु महात्माओं में मेरा स्नेह बना रहे। इतना कहकर राजा गंगा जी के दाहिने किनारे पर पूर्वाभिमुख कुशा बिछा उत्तर की ओर मुख करके बैठ गया। देवगण राजा की प्रशंसा करके फूलों की वर्षा करने लगे और दुन्दुभी बजाने लगे। सब महात्मा राजा की बुद्धि और धैर्य की प्रशंसा करके उत्तमोत्तम गुणों से युक्त भगवान के गुणों को कहने लगे ।

राजर्षि ! आप श्रीकृष्ण भगवान के परम सेवक हैं। भगवच्चरण के निकट पहुँचने की इच्छा से आपने राज सिंहासन को शीघ्र ही त्याग दिया। जब तक यह देह को त्यागकर बैकुण्ठ को न चले जाओ तब तक हम यहाँ बैठे रहेंगे। तब राजा परीक्षित ऋषि लोगों की सत्यवाणी को सुनकर नमस्कार करके बोले, मुनिवर ! आपको परोपकार के अतिरिक्त और कोई दूसरा काम नहीं है। इसी बात पर विश्वास करके मैं पछता रहा हूँ कि जिस मनुष्य की मृत्यु निकट आ पहुँची है उसको क्या करना चाहिए। 

उस कृत्य को आप सब लोग विचार कर कहिए। इस प्रश्न को सुनकर मुनि आपस में विचार करने लगे। इतने में ही दैवयोग से अपनी आत्मा में सन्तुष्ट व्यास जी के पुत्र शुकदेवजी जिनकी अवस्था केवल सोलह वर्ष की थी, शंख के समान त्रिवलीयुक्त कण्ठ था, वक्षस्थल बहुत ऊँचा और चौड़ा था, नाभि बहुत गम्भीर थी और पीपल के दल समान उदर पर त्रिवली पड़ती थी। शरीर पर कोपीन थी, बाल घूँघर वाले चारों ओर बिखर रहे थे, जानुपर्यन्त लम्बी-लम्बी भुजायें थीं, साक्षात् श्री नारायण के समान कान्तिमान थे, शरीर का श्यामवर्ण अत्यन्त मनोहर था। उनकी युवा अवस्था, शरीर की कान्ति और मन्द मुस्कान देखकर स्त्रियाँ मोहित हो जाती थीं। ऐसे तेजयुक्त शुकदेवजी को आये हुए देखकर मुनि लोग सत्कार के लिए उठ खड़े हुए। तब शुकदेवजी ऐसे शोभायमान हुए जैसे तारागणों के बीच में चन्द्र । 

श्री शुकदेवजी से राजा परीक्षित हाथ जोड़कर कहने लगा - हे महर्षि ! आज आपकी कृपा से मेरा जन्म सफल हो गया आपने यहाँ आकर हम सबको पवित्र कर दिया। आपके निकट आने से बड़े-बड़े पातक नष्ट हो जाते हैं । जिनकी मृत्यु निकट आ गई उनको आप सरीखे सिद्ध और मन वांछित फल देने वालों का दर्शन कदापि सम्भव न था। 

हे योगिराज ! मैं केवल आपसे पूछता हूँ कि जिनकी मृत्यु निकट आ पहुँची है उनको मोक्ष के लिए क्या करना उचित है ? ऐसे मनुष्यों को क्या करना चाहिए सो मुझको कहें । राजा परीक्षित ने मधुर वचनों से इस प्रकार प्रश्न किया, तब भगवान शुकदेवजी कहने लगे ।


॥ श्रीमद् भागवत महापुराण प्रथम स्कन्द समाप्त ॥