पांचवां स्कन्द प्रारम्भ
॥ प्रियव्रत का राज्य भोग और फिर ज्ञान निष्ठा ॥
परीक्षित कहने लगे - हे मुनि ! प्रियव्रत भक्त थे परन्तु जगत् में लिप्त रहकर भी सिद्धि पाई इसमें मुझको बड़ा सन्देह है। श्रीशुकदेवजी ने कहा- हे राजन् ! वह भगवान की कथा को ही परमपद समझते हैं। स्वायम्भुवमनु का पुत्र प्रियव्रत परम वैष्णव अद्वितीय भक्त था। नारदजी की आराधना कर उसने आत्मतत्व को जान लिया था, तब स्वायम्भुवमनु ने उसको राजनीति प्रधान गुणों का आश्रय जान, भूमि पालन करने में नियुक्त करना चाहा।
यद्यपि पिता की आज्ञा का उल्लंघन करना अनुचित था तथापि राज्य अधिकार के प्रपंच से अपने तिरस्कार को सोच राजपुत्र ने राज्य- भार ग्रहण नहीं किया और गृह त्याग कर चला गया।
तदनन्तर ब्रह्माजी वेद और मरीचि आदि को साथ ले प्रियव्रत को शिक्षा देने को उतरे। अपने पिता ब्रह्माजी को देख प्रियव्रत भी हाथ जोड़ ब्रह्माजी की स्तुति करने लगे। हे परीक्षित! पूजा को अंगीकार कर ब्रह्माजी प्रियव्रत से बोले- हम, महादेव, तथा नारदजी सब जिस परमेश्वर की आज्ञा पालन करते हैं, उसकी आज्ञा पालन से तुमको विमुख नहीं होना चाहिए।
हे वत्स! जिस परमेश्वर की वाणीरूप डोरी में बंधे हुए हम मनुष्यों की इच्छा से उनके लिए कर्म करते हैं वैसे ही परमेश्वर की इच्छा से उसी की आज्ञानुसार कर्म करते हैं। हे प्रियव्रत ! परमेश्वर हमारा प्रभु है, वह हमारे गुण एवं कर्म के अनुसार जो योनि देता है हम उसको अंगीकार कर अपने सुख दुःख को भोगा करते हैं।
तुम भगवान के आश्रित हो, परमेश्वर के दिये हुए भोगों को भोगो और आत्मस्वरूप परमात्मा का भजन करो। हे राजन् ! ब्रह्माजी के उपदेश से सन्तुष्ट हो प्रियव्रत ने मस्तक नवाया और 'जो आज्ञा' कहकर ब्रह्माजी का गौरव रखा। प्रियव्रत के आचरण से ब्रह्माजी प्रसन्न हुए और मनु की पूजा से सम्मानित हो नारदजी के साथ सत्य लोक को चले गये।
स्वायम्भुवमनु ने नारद की सम्प्रति से प्रियव्रत को राज्य भार सौंपकर संसार को त्याग शान्ति प्राप्त की। प्रियव्रत ने विश्वकर्मा प्रजापति की बर्हिष्मती कन्या से विवाह किया। उसने दस पुत्र उत्पन्न किए और एक कन्या ऊर्जस्वता नाम वाली उत्पन्न की। १.आग्नीघ्र, २. इष्मजिहल, ३. यज्ञबाहु, ४. महावीर, ५. हिरण्रेता, ६. धृतपृष्ठ, ७. सवन, ८. मेधातिथि, ९. वीतिहोत्र, १०. कवि ।
यह उसके पुत्र अग्नि के अवतार थे। इनमें से कवि, महावीर, सवन ये तीन नैष्ठिक ब्रह्मचारी हुए। उन्होंने बाल्यावस्था से ही आत्म विद्या में परिश्रम कर परमहंस आश्रम को धारण किया। वे राजपुत्र परमहंसाश्रम में ही शान्त स्वभाव हो भगवान का स्मरण करने से अपने अन्तःकरण में विष्णु भगवान होने से भगवद्भक्ति को प्राप्त हुए। प्रियव्रत की दूसरी स्त्री से उत्तम, तामस, स्वेत तीन पुत्र हुए थे। तीनों मन्वन्तरों के अधिकारी हुए। आत्मज्ञानी प्रियव्रत ने ११ करोड़ वर्ष तक राज्य कर प्रजा की रक्षा की।
सूर्यनारायण पृथ्वी तल को प्रकाशित करते समय आधे भाग को अन्धकार से ढकते हैं, एक ही साथ सबको प्रकाशित नहीं करते हैं, यह देख राजा प्रियव्रत ने प्रतिज्ञा की कि हम अपने प्रभाव से रात्रि को भी दिन करेंगे। यह विचार कर अपने ज्योतिर्मय रथ पर आरूढ़ हो सूर्य की सात परिक्रमा की।
प्रियव्रत के लिए यह आश्चर्य की बात नहीं थी क्योंकि भक्ति से प्रियव्रत अलौकिक हो गया था। प्रियव्रत के रथ के पहियों से जो सात गड्ढे पड़ गये, वही सात समुद्र कहलाये और उन्हीं से जम्बू, प्लक्ष, शाल्मलि, कुश, क्रोंच, शाक, पुष्कर नाम सात द्वीप हुए। क्षीरोद्र, इक्षुरसीद, क्षरोद घृतोद, क्षीरोद, दधिमण्डोद, शुद्धोद से सात समुद्र सातों द्वीपों की खाई के समान हैं।
इनमें प्रियव्रत ने अपने पुत्रों को एक-एक द्वीप का राजा बना दिया। राजा ने ऊर्जस्वता नाम अपनी कन्या शुक्राचार्य को विवाह दी जिससे देवयानी हुई। विष्णु भगवान की कृपा से जिन्होंने इन्द्रियाँ जीत लीं ऐसे प्रियव्रत का ऐसा पुरुषार्थ होना कुछ आश्चर्य नहीं।
नारद जी की सेवा करने के समय राज्य का भार जो आ पड़ा, इससे अपनी आत्मा को अकृतार्थ सा मानकर प्रियव्रत वैराग्य को प्राप्त हो कहने लगा-अहो मैं इन्द्रियों के विषयरूप अन्धकूप में गिर पड़ा, यह अच्छा नहीं हुआ।
हे राजन् ! इस प्रकार अपने को धिक्कराते हुए प्रियव्रत पुत्रों के मध्य पृथ्वी का विभाग कर, स्त्री को मृतक शरीर के समान त्याग, नारदजी के उपदेश किये मार्ग पर चलने लगा।
॥ आग्नीघ्र का चरित्र वर्णन ॥
श्री शुकदेवजी कहते हैं - जब राजा प्रियव्रत वन को चला गया तब उनका आग्नीघ्र नाम पुत्र धर्म दृष्टि रख जम्बूदीप में रहने अपनी वाली प्रजा का सुत के समान पालन करने लगा। वह एक समय पुत्र द्वारा पितृलोक प्राप्ति की कामना करके मंदराचल पर्वत की गुफा में तपस्वी हो ब्रह्माजी की अराधना करने लगा।
तब ब्रह्माजी ने पूर्वाचित अप्सरा को राजा के पास भेजा। वह आग्नीघ्र के निकट बन में घूमने लगी, उसकी पायलों की झनकार से आग्नीघ्र ने नवयौवना अप्सरा को सामने देखा । कामातुर हो आग्नीघ्र नारी से बोले- हे सुमुखी! तुम कौन हो, तुमने यह रूप किससे पाया है। मुझे जान पड़ता है कि ब्रह्मा ने तुमको मेरी स्त्री होने के लिए भेजा है।
तब अप्सरा भी राजा पर मोहित हो गई और दोनों दस करोड़ वर्ष पर्यन्त सुख भोगते रहे। कुछ समय बाद उस अप्सरा के गर्भ से राजा आग्नीघ्र के नव पुत्र हुए। इस प्रकार वह अप्सरा एक वर्ष में एक पुत्र को उत्पन्न कर घर को छोड़कर ब्रह्माजी के पास चली गई।
पिता आग्नीघ्र ने नव खण्ड कल्पना कर जम्बूद्वीप को विभाग कर बराबर- बराबर बाँट दिया, तब वे सब पुत्र राज्य का भोग करने लगे। परन्तु आग्नीघ्र विषय भोग से तृप्त नहीं हुआ।
अतएव उसी अप्सरा को विषय सुख साधन के अर्थ बड़ा मानता हुआ वेदोक्त कर्म कर अप्सरा लोक में गया। उन नौ भाईयों ने मेरु की नव कन्याओं को विवाहा।
॥ आग्नीघ्र के पुत्र नाभि का चरित्र वर्णन ॥
श्री शुकदेवजी ने कहा- हे राजा परीक्षित ! जब आग्नीघ्र के ज्येष्ठ पुत्र नाभि के कोई पुत्र नहीं हुआ तब वह सन्तान की इच्छा से अपनी स्त्री मेरुदेवी के साथ यज्ञ-अनुष्ठान द्वारा यज्ञ पुरुष की आराधना करने लगा। नाभि के शुद्ध भाव से द्रवीभूत भगवान ने यज्ञ में प्रकट होकर अपना दर्शन दिया।
नाभि ने भगवान के सुन्दर रूप को देख मस्तक नवाया और ऋत्विजों सहित सप्रेम पूजा की - हे पूज्यतम ! आपके स्वरूप को जानना कठिन है। हे नाथ, आप सदा स्वतंत्र स्वम्भू प्रकट हुए हो और सब आनन्दरूप हो, परन्तु जो हम सकाम भक्त हैं, उनको आपकी आराधना करना ही योग्य है।
हम अज्ञानी हैं, अपनी आत्मा के कल्याण मार्ग को नहीं जानते इसलिए आपने हम पर अनुग्रह कर सामान्य देवता की तरह स्वयमेव ही दर्शन दिया है। हे नाथ ! हमारा मनोरथ पूर्ण कीजिये कि हम आपके मंगलकारी स्वरूप का कभी विस्मरण न करें।
हे शरणागत रक्षक ! दूसरी इच्छा यह है कि यह राजा आपके समान पुत्र की कामना से आराधना करता है । हे पूज्यतम ! आप राजा की इच्छा को अपनी कृपा से पूर्ण कीजिए। प्रार्थना से सन्तुष्ट हो भगवान बोले- मेरे समान तुम्हें पुत्र प्राप्त हो, यह तुमने बड़ा कठिन वरदान मांगा है।
मेरे समान तो मैं ही हूँ अस्तु मैं स्वयं राजा नाभि के यहाँ अंशावतार लूँगा । हे परीक्षित ! यह कहकर भगवान अन्तर्ध्यान हो गये। हे राजन्! तब कालान्तर में भगवान मेरु देवी से उत्पन्न होकर अवतार लेकर प्रकट हुए। यह अवतार ऋषभ अवतार के नाम से प्रसिद्ध है।
॥ नाभि के पुत्र ऋषभ देव का वर्णन ॥
श्रीशुकदेवजी कहने लगे - इसके अनन्तर जन्म से ही जिनके भगवान के लक्षण, दिन प्रति दिन जिनका प्रताप बढ़ रहा हो, ऐसे ऋषभ देवजी का पालन करने को सब प्रजा, देवता, मन्त्रीगण, वन्दना करने लगे । पिता नाभि ने उनका नाम ऋषभ (श्रेष्ठ) रखा। एक समय इन्द्र ने उनकी उन्नति देख ईर्षा से उनके राज्य में जल नहीं वर्षाया।
यह देख ऋषभदेव ने आत्मयोग से वर्षा कर ली। राजा नाभि ने जान लिया कि नगर के सब लोग मेरे पुत्र पर अत्यन्त स्नेह रखते हैं। अतः राजा मर्यादा के रक्षणार्थ पुत्र ऋषभदेवजी को राज दे अपनी स्त्री मेरुवती को साथ ले बदरिकाश्रम को चला गया।
वहाँ तप के प्रभाव से मन को एकाग्र कर भगवान की उपासना करते-करते योग की समाधि के द्वारा जीवन मुक्त हो गया। हे राजन् ! ऋषभदेवजी ने विद्या पढ़ने को कुछ दिन गुरुकुल में वास किया, अनन्तर वह गुरुजनों की आज्ञा लेकर घर आये ।
ऋषभदेवजी इन्द्र की दी गई जयंती नाम स्त्री से सौ पुत्र उत्पन्न किये। उन सबमें सबसे बड़ा भारत उत्तम गुणों से युक्त था। ऋषभदेवजी के अन्य जो सुत थे उनमें कुशावर्त, इलावर्त, मलय, केतु, भद्रसेन, इंद्र, पृथ, विदर्भ, कीकट ये नव पुत्र बड़े थे। उनके छोटे कवि, हरि, अन्ततारि, क्षप्रबुद्ध, पिपलायन, अविर्होत्र, द्रामिल, चमस, करभाजन नाम के ये नव पुत्र, परम वैष्णव हुए।
तदनन्तर इससे छोटे इक्यासी पुत्र वेद के ज्ञाता विशुद्ध पवित्र ब्राह्मण हो गये। प्रषभदेव यथाराजा तथाप्रजा वाले सिद्धान्त की पुष्टि के लिए प्रजा को पथ-भ्रष्ट होने से बचाते थे। एक समय ऋषभदेव विचारते-विचारते ब्रह्मावर्त में चले गये। वहां ब्रह्मर्षिजनों की सभा में अपने पुत्रों को उपदेश करने लगे।
ऋषभदेवजी बोले कि - हे पुत्रो ! मनुष्यों को भोगों में नहीं फँसना चाहिए। यह भोग तो वाराह आदि को भी मिल जाता है। यह शरीर तप करने योग्य है, क्योंकि तप द्वारा ब्रह्मानन्द की प्राप्ति होती है। विद्वान कहते हैं कि संसार में महान् पुरुषों की सेवा मुक्ति का द्वार है और स्त्री तथा कामी पुरुषों को नरक का द्वार है।
जो सदाचारी शान्त वृत्ति हैं, वह साधु कहलाते हैं। परमेश्वर में मित्रभाव रखने वाले महापुरुष हैं। मनुष्य जब तक आत्मविद्या से आच्छादित रहता है, तब तक पूर्वकर्म मन को अपने वश में रखता है। जब तक मुझमें प्रीति नहीं होती तब तक जीव बन्धन से नहीं छूटता और जब मनुष्य के हृदय में कर्मग्रन्थि शिथिल हो जाती है, तब यह मिथुनी भाव से निवृत्त हो जाता है। तदन्तर अहंकार को त्याग परमपद में प्राप्त होता है। मेरा ही कीर्तन करना, किसी से वैर नहीं करना, समदृष्टि रखना, इन्द्रियों को रोकना, अहंकार ममता को त्यागना, वेदान्त का अभ्यास, एकान्त निवास, ब्रह्मचर्य से रहना, वाणी को वश में रखना, सर्वत्र मुझमें भावनायुक्त ज्ञान रखना, योगाभ्यास, समाधि, इन पच्चीस साधनों से युक्त हुआ पुरुष लिंग उपाधि को दूर कर सकता है।
ऋषभदेवजी कहते हैं कि यह मेरा मनुष्य शरीर मैंने इच्छा से धारण किया है। मैंने अधर्म को पीठ पीछे रखा, इसलिए मुझको ऋषभदेव कहते हैं। तुम मेरे हृदय से उत्पन्न हुए पुत्र हो इसलिए ईर्षा त्याग तुम अपने बड़े भाई भरत की सेवा करो, ऐसी मेरी आज्ञा है। हे वत्सगण ! सब प्राणियों का सम्मान करना ही हमारी पूजा है।
श्री शुकदेवजी बोले - हे राजन् ! भगवान् ऋषभदेव जी अपने पुत्रों को इस प्रकार शिक्षा दे, ज्येष्ठ पुत्र भरत को राज दे, माया मोह त्याग दिगम्बर वेश, खुले केशों से ब्रह्मावर्त को चल दिये । ऋषभदेवजी धूल लगाये अवधूत, मौन हो, नगर, गाँव, खान, गौशाला मुनियों के आश्रम इत्यादि स्थानों में विचरते थे। मार्ग में नीच पुरुष उनको कष्ट देते परन्तु ऋषभदेव दुष्टों के कामों पर मौन रहते, वे अपने में ब्रह्म का अनुभव करके परमानन्द प्राप्त करते हुए पृथ्वी पर विचरने लगे।
ऋषभदेवजी को अनुभव हुआ यह संसार योगाभ्यास में विघ्न करता है इसलिए ऐसी वृत्ति धारण की जिससे लोग पीछा छोड़ दें। वे एकान्त स्थान में रह शयन, भोजन, जलपान, चर्वण, मल मूत्र इत्यादि क्रियायें करने लगे। इस प्रकार अनेक योगचर्या के आचरण वाले ऋषभदेवजी परमानन्द के साक्षात् अनुभव रूप थे। इस कारण आकाश-गमन, अन्तर्ध्यान, दूसरे के शरीर में प्रवेश, दूर की वस्तु को जान लेना ये योग की सिद्धियाँ हैं, सो यह इच्छा से प्राप्त हो गई थीं। परन्तु हे राजन् ! आप ही प्राप्त हुई सिद्धियों का ऋषभदेवजी ने सत्कार नहीं किया।
राजा परीक्षित कहने लगे - श्रीशुकदेवजी ! ऋषभदेव ने योग सिद्धियों को अंगीकार क्यों नहीं किया ? श्रीशुकदेवजी बोले - हे राजन् ! बहुत से मनुष्य मन का विश्वास नहीं करते। मन का विश्वास करने से महादेव जी का तप क्षणमात्र में क्षीण हो गया था। मन पर भरोसा न करने वाले योगी का मन उनके शत्रु कामदेव व क्रोधादिकों को नष्ट कर देता है।
ऋषभदेवजी ने योगियों को सिखाने के अर्थ शरीर को त्याग करने की इच्छा की। एक समय ऋषभदेव कुटुम्ब नाम पर्वत के उद्यान में पत्थर मुख में डालकर, बावलों के समान जटा खोल, नंगे विचरने लगे। वहाँ दावानल उत्पन्न हो वन को भस्म करने लगा, तब उस वन के साथ ही ऋषभदेव का शरीर भस्म करने लगा, वहाँ उस वन के साथ ही ऋषभदेव का शरीर भस्म हो गया। यह ऋषभदेव अवतार रजोगुणी लोगों को मोक्ष उपदेश करने को हुआ था।
ऋषभदेव चरित्र मनुष्य के पापों का नाश करने वाला और मंगल का स्थान है, इसको जो श्रद्धा से सुने अथवा सुनावे उन दोनों को एकान्त भक्ति भगवान में सदा प्रवृत्त रखा करती है।
॥ राजा भरत का चरित्र वर्णन ॥
श्रीशुकदेवजी ने कहा - हे परीक्षित ! ऋषभदेवजी के ज्येष्ठ पुत्र भरतजी ने अपने पिता की आज्ञानुसार विश्वरूप की कन्या पंचजनी से विवाह किया। इनकी स्त्री के गर्भ से पाँच पुत्रों की उत्पत्ति हुई, वह पाँचों अपने पिता के समान तेजस्वी और ईश्वर में प्रीति रखने वाले हुए। जब से इस खण्ड का राजा भरत हुआ तब से इस खण्ड का नाम भारत प्रसिद्ध हुआ । भरत यज्ञों द्वारा भगवान का पूजन करते थे। अपने ऐश्वर्य की आहुति दे राजर्षि भरत विष्णु का पूजन करने लगे।
जब भरत जी का हजारों वर्ष का समय हरिभजन में व्यतीत हो गया, तब अन्त समय आया जान उन्होंने पुत्रों को यथायोग्य विभाग करके सब सम्पदाओं से परिपूर्ण भवन का त्याग कर सन्यास लेकर पुलस्त्य, पुलह मुनि के आश्रम में तपस्या करने चले गये। वे तपस्वी एवं भक्त की तरह अपने जीवन को व्यतीत करते थे, कभी-कभी वे भगवद् प्रेम में निमग्न हो ब्रह्मानन्द की अनुभूति करते थे, तदन्तर समाधि योग की क्रिया करते अखण्ड ज्योति का ध्यान करने लगे।
श्रीशुकदेवजी कहने लगे - एक समय भरत जी गंडक में स्नान कर नैमित्तिक कर्म करके 'ओंकार' का नदी तट पर जप कर रहे थे। हे राजन् ! उसी समय एक हिरणी जलपान करने को उसी नदी के समीप आई। अधिक प्यास के कारण वह जल पी रही थी कि इतने में एक सिंह ने गर्जना की। उसको सुन हिरणी का कलेजा फटने लगा। उसने भय से नदी को पार करने को छलाँग मारी, उससे उसका गर्भ नदी में गिर पड़ा। उसके गिरने से हिरणी बहुत व्याकुल होकर पर्वत की गुफा में जा गिर कर मर गई। भरत जी नदी में गिरे हुए शिशु को मातृ-हीन जानकर दयापूर्वक आश्रम में उठा लाये।
भरत जी ने शयन, भ्रमण भोजनादि सब कार्यों में उस मृगछौने को अपने साथ रखा और जब कुशा, फूल समिधादि लेने को जाते तब भी भेड़िया आदि के भय से उसे अपने साथ ही ले जाया करते। पाठ करते हुए भी उठकर भरत जी इस बच्चे को देखते और आशीर्वाद दिया करते कि वत्स! तुम्हारा मंगल हो। एक दिवस बच्चा अपने सजातियों को चौकड़ी लगाते देख उनके साथ चला गया तो भरत जी अति उदास हो गये और मृग के वियोग से विकल हो गये कि कोई भेड़िया या व्याघ्र उसको अकेला जानकर उसको खा तो नहीं गये। सूर्य भी अब अस्त होना चाहते हैं परन्तु वह अब तक नहीं आया। जब कभी मैं झूठी समाधि लगा बैठ जाता, तब मृगछौना मेरे पास आ अपने सींग की नौक से मेरा स्पर्श किया करता था। जब कभी भगवत्पूजा की सामग्री को बिगाड़ देता, तब मेरे झिड़कने से शीघ्र ही ऋषि बालक की नांई चुपचाप बैठ जाता था। रात्रि में चन्द्रमा को देख उसमें मृग चिह्न देख भरत अपना मृग बालक समझ कहने लगे - अहो ! हमारा मृगछौना जब भूल से चला गया होगा, तब चन्द्रमा ने यह समझ कर कि कहीं सिंह इसको भक्षण न कर जाय दयापूर्वक अपने समीप रख लिया है।
इस प्रकार मोह में प्राप्त होकर भरत का सब सत्कर्म छूट गया। जब भरत का काल आया उस मरण काल में भी वे ध्यान योग में देख रहे थे मानो वह मृग शावक पुत्र की नांई मेरी बगल में बैठकर शोक करता है। इस कारण हिरणी में अनुरागी आसक्तचित्त होने से, पामर मनुष्य की भाँति उनको हिरण के जन्म में भरत को पूर्वजन्म की स्मरण शक्ति रही। पूर्वजन्म को स्मरण कर भरत जी मन में कहने लगे-अहो! ज्ञानीजनों के मार्ग से मैं भ्रष्ट हो गया, सब परित्याग, एकान्त वन में योग मार्ग द्वारा भगवान का भजन करता था, सो अपने अज्ञानपन से मृगशावक की संगति के भय से हिरणस्वरूप में अकेले विचरते थे, और सूखे पत्ते तथा घास, लता आदि का आहार कर जीवन धारण करते रहे। कुछ समय व्यतीत होने पर जब काल आया तब इन्होंने गण्डकी के बीच खड़े होकर अपने हिरण शरीर को त्याग दिया।
॥ भरत का जड़ विप्र रुप में जन्म ग्रहण करना ॥
श्रीशुकदेवजी कहने लगे - हे राजन् ! इसके अनन्तर एक ब्राह्मण की बड़ी स्त्री से नौ पुत्र उत्पन्न हुए और छोटी से एक पुत्र और कन्या का जोड़ा प्रकट हुआ। वहाँ उस जोड़े में का पुत्र राजा भरत था जो हिरण का जन्म पा चुका था।
हे परीक्षित! भरतजी ने ब्राह्मण कुल में जन्म पाने पर यह विचार किया कि संगति के दोष से फिर कहीं बन्धन न हो जाय, इस कारण भगवान का स्मरण करते हुए गृह-विरक्त रहना चाहिए। इस प्रकार विचार करते हुए भरत सबको, अपने को मूर्ख, पागल अन्धा और बहरा सा दिखाते थे। ब्राह्मण ने पुत्र के सब संस्कार कर दिये और यज्ञोपवीत कराकर सन्ध्या वन्दनादि की शिक्षा देने लगा परन्तु 'जड़' ध्यान न देते हुए प्रयुक्त शिक्षा के प्रतिकूल आचरण करते। परन्तु पुत्र को पढ़ाना ही चाहिए ऐसा स्नेह रखने से वह ब्राह्मण परिश्रम करता था।
किन्तु जिसका मनोरथ पूरा नहीं हुआ, ऐसा वह ब्राह्मण मृत्यु को प्राप्त हो गया। तब उसकी छोटी स्त्री इस कन्या- पुत्र को सपत्नी को सौंप सती हो गई। पिता की मृत्यु के बाद भरत के नव भ्राताओं ने उसको मूर्ख समझ पढ़ाने का उद्योग छोड़ दिया, वह बावलों के समान घूमने लगे। वह दृढ़ व पुष्ट थे। जैसे धूल में भरी हुई महामणि नहीं दीख पड़ती, इसी प्रकार जड़ भरत जी का ब्रह्मतेज नहीं दीखता था। कटि पर पड़ा हुआ लंगोटा और यज्ञोपवीत बहुत मलीन हो रहा था, इस कारण उनकी महिमा कोई नहीं जानता था। यह ब्राह्मणों में नीच है, ऐसा कह लोग निरादर करते थे।
जब-जब भरत लोगों से काम की मजदूरी ले भोजन करने लगा तब भाइयों ने भरत जी को धमकाया कि हम तुमको राज से निकाल देंगे। जब उसके भाइयों ने खाना रखा तो खाने से उसका पेट न भरे। यदि ढाई सेर खाने को धरें तो खा जाये। तब स्त्री ने कहा कि ये आफत नहीं भोगी जायेगी। तब उसके भाइयों ने भोजन का लोभ देकर धानों में क्यारी बनाने में लगा दिया। एक समय चोरों के शूद्र राजा ने सन्तान होने की इच्छा से मनुष्य की बलि भद्रकाली के निमित्त करनी चाही। उसने एक मनुष्य पाला, देवयोग से वह छूट गया।
तब राजा के दूत उसको ढूंढ़ते फिरते से जड़भरत खेती की रक्षा करता हुआ दृष्टि में आया। वह इसको दोषरहित जान रस्सी से बाँध भद्रकाली के मन्दिर में लाये। चोरों ने जड़भरत को स्नान कराकर नवीन वस्त्र और आभूषण पहनाये, सुगन्धि लगाई, मोतियों की माला पहनाई और तिलक आदि लगाकर सजाया। फिर भोजन कराके धूप, दीप, फल, हार, अक्षत और फल आदि भेंट रखकर पूजन किया।
बड़े-बड़े बाजों के साथ उसको भद्रकाली के निकट लाकर सिर झुकाकर बिठाया। तदनन्तर पुरोहित ने इस पुरुष पशु के रक्त से भद्रकाली को तृप्त करने के लिए खड्ग हाथ में लिया, तो भरत जी के तेज से देवी का शरीर जलने लगा।
तब देवी मूर्ति त्याग उसमें से बाहर निकली। देवी जी के शरीर में अधिक दाह होने से क्रोध था, देवी ने पुरोहित से तलवार छीन उन सब पापात्मा चोरों का सिर काटकर फेंक दिया।
हे राजन् ! जो मनुष्य महात्मा पुरुष के साथ अत्याचार करना चाहे उसका सब प्रकार से बुरा हो जाया करता है। जो सब जीवों के मित्ररूप व बैर रहित होते हैं और जिनकी रक्षा भगवान ने चण्डिका रूप धर कर की ऐसे जो परमहंस भरत जी के समान हैं, उनके लिये ऐसा होना आश्चर्य नहीं है।
॥ जड़ भरत और राजा रहूगण का ज्ञान सम्वाद ॥
श्रीशुकदेवजी ने कहा- हे राजा परीक्षित ! एक समय राजा रहूगण कपिलदेव के आश्रम पर जा रहा था, मार्ग में कहारों का स्वामी एक कहार बेगार में पकड़ना चाहता था, उसके सामने भरत आ गया। तब उसने विचार किया कि यह मनुष्य युवा व हृष्ट-पुष्ट है, ऐसा विचार कर उसने इनको पकड़ लिया और जड़ भरत जी पालकी उठा ले चले। तब इन कहारों की गति से उनकी गति मिली नहीं और पालकी टेढ़ी होने लगी यह देखकर रहूगण कहने लगा कि यह पालकी टेढ़ी-मेढ़ी क्यों हुई जाती है ? कहार लोग डरकर रहूगण से निवेदन करने लगे - महाराज ! हमारी असावधानता नहीं हैं यह मनुष्य जो अभी लाया गया हैं, ये शीघ्र नहीं चलता।
राजा क्रोधयुक्त हो जड़ भरत जी से उपहास करता हुआ बोला- हे भाई! तुम बहुत थक गए हो, अकेले दूर से पालकी उठाकर लाये हो, तुम पुष्ट नहीं हो और बुढ़ापे ने तुमको घेर लिया है। जब फिर पालकी टेढ़ी हुई, तब राजा क्रोध से कहने लगा - अरे यह क्या ! तू जीता ही मरा हुआ है, मैं तुझे अभी यम के पास भेजता हूँ। तब जड़ भरत जी मुस्कराकर रहूगण से बोले - हे वीर ! तुमने जो कहा सो ठीक है, इसमें हमारा तिरस्कार नहीं हुआ, क्योंकि देह से मेरा सम्बन्ध होवे तो मैं समझूँ ।
यह बोझ क्या है और यह देह क्या है ? मार्ग कोई वस्तु हो और उनके साथ मेरा सम्बन्ध हो तो तुम्हारे वचनों से अपना तिरस्कार समझें। तुमने कहा, तुम पुष्ट हो, ऐसा तो मूर्ख ही कह सकता है। क्योंकि आत्मा को पुष्ट कहना सम्भव नहीं। तुमने कहा, 'तू जीता हुआ मुर्दा है' तो सब संसार ही जीता हुआ मुर्दा है, क्योंकि यह संसार आदि-अन्त वाला है।
यह विकार शरीर का है, मेरा नहीं है। हे राजन् ! जो तुमने कहा कि 'आज्ञा उल्लंघन करता है' सो केवल व्यवहार मात्र के बिना यह राजा है और यह दास है, ऐसी भेद-बुद्धि का अवकाश थोड़ा भी देखने में नहीं आता।
इसलिए व्यवहार दृष्टि जो देखा जाए तो कौन राजा है और कौन दास है? यह नहीं दीख पड़ता है। तो भी कहिए क्या करें? बावले तथा मूढ़ की नाईं आचरण करके आत्मस्वरूप को प्राप्त हुए मुझे शिक्षा देने से क्या होता है ? जैसे पिसे हुए चून को पीसना वृथा है, ऐसे ही मुझको दण्ड व शिक्षा देना व्यर्थ है।
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - हे राजा परीक्षित ! स्वभाव से शान्त मुनिवर जड़ भरत जी जब राजा रहूगण के वचनों का उत्तर दे पालकी को उठाने लगे तो सिन्धु और सौबीर देश का राजा रहूगण भरत जी के वचन सुनकर पालकी से उतर पड़ा और अभिमान त्याग, जड़ भरत जी के चरणों में सिर रखकर अपराध क्षमा कराकर कहने लगा - हे ब्रह्मन ! गुप्त रूप से परिभ्रमण करने वाले आप कौन हो ? जो मूढ़ की नांई रहते हो। हे साधु! आपने जो वचन कहे, सो मैं उन वाक्यों का अर्थ करने को समर्थ नहीं हूँ।
मैं आत्मतत्व के जानने वाले, आपको गुरु करके इस जगत में सत्य शरण लेने योग्य अथवा इस संसार का निस्तार क्या है, यह पूछने को प्रमत्त होता हूँ। हे प्रभो ! इस घर में फँसे हुए मन्द बुद्धि लोग किस प्रकार आप योगेश्वर की गति को जान सकते हैं ? हे स्वामी ! आपके वचनों को मैं ठीक प्रकार नहीं समझा।
हे दीनबन्धो ! राजापन के अभिमान से महात्माओं को तुच्छ समझने वाला जो मैं हूँ सो मुझ पर आप कृपा दृष्टि कीजिए कि जिससे पाप से मेरा निस्तार हो जावे। जड़ भरत कहने लगे- रहूगण तुम पण्डितों की सी बातें बनाते हो; इस कारण विद्वानों की मण्डली में तुम श्रेष्ठ नहीं हो । जिस प्रकार स्वप्न सुख, अदृश्य और अनित्य होने से त्याज्य है ।
रजोगुण, सत्वगुण, तमोगुण, इनसे बिंधा हुआ पुरुष जब तक इनके वश में रहता है तब तक यह निरंकुश रहकर पाप पुण्य किया करता है। यह मन ही पाप पुण्य की वासना से युक्त हुआ पृथक-पृथक देह और पृथक-पृथक नाम से उसी देह के हेतु ऊँची व नीची योनि में जाता है।
काल से प्राप्त हुए दुःख, सुख, मोह आदि फलों को मन ही देता है। यह मन ही जीव की मायारचित उपाधि है, इसलिए यह अपने विषे जीव का अभ्यास कराकर, ये मन जीव को छल संसार में घुमाता है। हे राजन् ! जब तक यह देहधारी जीव सबको त्याग, ज्ञान के उदय से इन्द्रियों को जीव अविद्या से दूर कर, आत्मतत्व को नहीं जानता है, तब तक इस संसार में घूमता है। इसलिए तुम अपने मन को भगवानरूप गुरु के चरणों की उपासनारूप शस्त्र से नाश करो।
श्रीशुकदेवजी बोले - हे राजन् ! जब जड़ भरत ने ऐसा उपदेश किया तब राजा रहूंगण बोले- हे अवधूत ! अपने परमानन्द के शरीर को तुच्छ किये हुए मलीन भेष में विचरते हुए आपको बारम्बार नमस्कार है। जो आपने ज्ञानयोग से गुथे हुए वचन कहे हैं उनको मैं समझ नहीं सका, कृपाकर सरल शब्दों में उपदेश दें।
जड़ भरतजी बोले- हे राजन् ! पृथ्वीतत्व आदि से बना हुआ जो कुछ है उसको तुम कहार आदि वर्ण भेद से जानते हो और जैसे पृथ्वी से बना हुआ पत्थर, वैसा ही कहार। क्योंकि किसी हेतु से वो ही पृथ्वी का विकार चलने लगा उसका नाम 'आदमी' कहते हैं। फिर उसी पृथ्वीतत्व की बनावट भी ऐसी है कि पाँव, पिंडली, सांथल, (जंघा ) कटि, छाती, ग्रीवा, कन्धे पर पालकी, पालकी में राजा छुपा हुआ देखता हूँ।
मैं राजा हूँ, इसी अहंकार से तुम अन्धे हो गये हो। यह सब बोझ उठाने वाले कष्ट पाकर तन क्षीण हो रहे, जिनको देख चित्त दुःखी होता है, इस कारण तुम महानिर्दयी हो और निर्लज्ज होकर कहते हो कि मैं सबकी रक्षा करता हूँ, इसलिए तुम झूठे हो ।
हे राजन्! जब हम जानते हैं कि इस जगत की उत्पत्ति और लय भूमि में ही है फिर केवल नाम के सिवाय कौन सदा रहने वाला है। पृथ्वी सत्य नहीं है क्योंकि यह अपने कारण रूप में लीन हो जाती है।
अब सत्य वस्तु कहते हैं कि एक परब्रह्म ही सत्य है, जो परब्रह्म, शुद्ध, स्वयं, परिपूर्ण, निर्विकार प्रत्यक्ष रूप है और उसी का नाम भगवान वासुदेव है। हे राजा ! इस परब्रह्म की प्राप्ति न तप से होती है, न वेद विहित कर्म से, न अन्नादिक बांटने से और न गृहस्थाश्रम में परोपकार करने से होती है, किन्तु महात्माओं के चरण रज सेवन करने से ब्रह्म की प्राप्ति होती है।
विषयों से संयोग नाश होता है। मैं पहले जन्म में राजा था। मैंने राज्य आदि त्याग दिया था और भगवान की ही आराधना किया करता था, किन्तु एक हिरण के बच्चे का संग होने से सब प्रयोजन नष्ट हो गया और मुझे मृग योनि में पूर्व स्मृति बनी रही।
फिर अब भी भय करता हुआ मनुष्यों के संग से गुप्त रूप हो विचरता हूँ। इस कारण मनुष्य को चाहिये कि संग रहित हो महात्माजनों की संगति कर ज्ञान से मोह का छेदन करें। भगवान की लीला का मंथन और स्मरण करने से ज्ञान हो जाता है, उस ज्ञान से मनुष्य संसार से पार हो जाता है।
॥ भरतवंश का वर्णन ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं कि भरत का सुमति नामक पुत्र हुआ। जिसने ऋषभदेवजी के मार्ग का अनुसरण किया। वह सुमति के वृद्धसेना स्त्री से देवजीत पुर हुआ। देवजीत के आसुरी नामक स्त्री से देवद्युम्न नाम पुत्र हुआ। देवद्युम्न के धेनुमति से परमेष्ठी हुई। परमेष्ठी के सुवर्चला से प्रतिह नाम पुत्र हुआ, प्रतिह ने आत्मविद्या पढ़ कर भगवान का साक्षात् दर्शन किया।
प्रतिह के सुवर्चला नाम स्त्री से प्रतिहर्ष, प्रस्तोता उद्गाता तीन पुत्र हुए। प्रतिहर्ष की स्तुति से अज, भूमा ये दो पुत्र हुए। भूमा के ऋषि कन्या नामी स्त्री से उद्गीथ हुआ, उनके देवकुल्या से प्रस्ताव हुआ। प्रस्ताव के नियुत्सा से विभु के रतिनामा से पृथुशेन। पृथुषेण से अकृति से नक्त से द्रति नाम पत्नी से नाम पुत्र हुआ। गयराज यशस्वी और राजऋषियों में परमोत्तम था। भगवान के अंश से होने के कारण यह राजा लक्षणों से महापुरुष भाव प्राप्त हुआ था।
हे राजन ! उस राजा गय के चरित्र की प्रशंसा प्राचीन इतिहास जानने वाले लोग गण द्वारा करते हैं। राजा गय की उर्णा नाम पत्नी से सम्राट हुआ। सम्राट को उत्कला से मरीचि और मरीचि को विन्दुमती से विन्दुरमान। विंदुरमान को सरधासे मधु हुआ, मधु से सुमना से वीरब्रत हुआ, मन्थु के सत्त्व से यौवन हुआ उसके दूषणा और ऐत्वष्टा के विरोचना से शतजित् आदि सौ पुत्र हुए और एक कन्या प्रकट हुई। प्रशंसा में यह श्लोक है कि जिस प्रकार भगवान अपनी कीर्ति से देवताओं को सुशोभित करते हैं उसी प्रकार राजा विरज ने महाराज प्रियव्रत के वंश को कीर्ति से सुशोभित कर दिया।
॥ भुवनकोश वर्णन ॥
राजा परीक्षित ने पूछा- हे मुने ! सम्पूर्ण पृथ्वी मण्डल का विस्तार आपने वर्णन किया। भूमण्डल के बीच प्रियव्रत के रथ के पहियों से सात समुद्र बने, फिर समुद्रों की मर्यादा से सात द्वीपों की रचना हुई है, ऐसा आपसे सुन चुका हूँ। परन्तु आपने संक्षेप से कहा। कृपया विस्तार से कहिए।
श्री शुकदेवजी बोले- कोई मनुष्य यदि देवआयु को प्राप्त होवे तो भी ब्रह्माण्ड रचना के नाम और भगवान की माया का अन्त जानने को समर्थ नहीं हो सकता। इसलिए इस भूगोल को नाम रूप और लक्षण द्वारा वर्णन करेंगे। यह भू- मण्डल कमलकोश है, इसके बीच में जम्बूद्वीप एक लाख योजन विस्तार वाला है। इस जम्बूद्वीप में नौ हजार योजन विस्तार वाले नौ खण्ड हैं और आठ पर्वतों से इनका विभाग किया हुआ है। इन नौ-खण्डों के बीच में सुवर्ण से बना सुमेरु पर्वत है जो एक लाख योजन ऊँचा है। इलाब्रत के उत्तर में नीलगिरि, श्वेतगिरि और श्रृंगवान हैं। ये तीनों पर्वत हैं। यह पर्वत दो हजार योजन चौड़े हैं।
इसी प्रकार इलाव्रत से दक्षिण की ओर निषद, हेमकूट, हिमालय यह तीन पर्वत हैं ये भी हरिवर्ष, किम्पुरुष, भरतखण्ड इन तीनों के मर्यादा पर्वत हैं। उनकी ऊँचाई दस हजार योजन और दो हजार योजन की मोटाई है। इलाब्रत से पश्चिम को माल्यवान, पूर्व को गन्धमादन पर्वत हैं, जो नील और निषज पर्यन्त दो हजार योजन चौड़े हैं। इनकी ऊँचाई हिमालय के समान है। ये पर्वत केतुमाल, भद्राश्व खण्डों की मर्यादा हैं।
इसी तरह मन्दर, मेरुमंदर, सुपार्श्व, मुकुन्द यह चार पर्वत दस-दस हजार योजन विस्तार वाले हैं, इस पर वृक्ष ग्यारह-ग्यारह सौ योजन ऊँचे और शाखाओं के सौ योजन मोटी जटा हैं। इन पर्वतों पर दूध, शहद, ईख का रस और मधुर जल से भरे हुए चार तालाब हैं, उनके सेवन करने वाले उपदेवगण, सिद्धियों को प्राप्त होते हैं।
इन पर्वतों पर नन्दन, चैत्ररथ, बैभ्रजिक, सर्वतोभद्र ये चार बगीचे हैं, जहाँ देवांगनायें विहार किया करती हैं। मन्दर नाम पर्वत के ऊपर ग्यारह सौ योजन ऊँचा देवताओं का एक आम्र वृक्ष है, उसकी टहनियों से बड़े-बड़े अमृत समान मीठे फल गिरा करते हैं।
जब उनका रस बहने लगता है तब उससे सुगन्धि युक्त लाल रस वाली अरुणोदा नदी, इलाब्रत खण्ड के पूर्व दिशा में बहा करती है और जम्बू नाम नदी दक्षिण दिशा की ओर बह रही है।
इसी नदी से किनारों की मिट्टी रस से भीगती है, फिर सूख जाती है, तब उसी का नाम जम्बनद से सुवर्ण बन जाता है और सुपार्श्व पर कदम्ब का वृक्ष है, उसके कोटरों में से पाँच मधु की धारा पश्चिम की ओर इलाब्रत को आनन्दित करती हैं। मुकुन्द नाम पर्वत पर शतवल्य नाम वटवृक्ष है उसमें से दूध, दही, घी, शहद, गुड़, अन्न आदि, शय्या, आसन, आभरण आदि की नदी बहती हैं।
सुमेरु पर्वत के पूर्व में जठर, देवकूट पर्वत हैं, ये और ऊँचे हैं फिर दक्षिण की ओर कैलाश और कवीर ये दो पर्वत हैं। इन आठ पर्वतों से घिरा हुआ सुवर्ण का सुमेरु पर्वत चारों ओर से प्रकाशमान होता है। सुमेरु के मध्य में ब्रह्माजी की नगरी है, इस पुरी के चारों ओर आठों लोकपालों की आठ पुरी हैं।
॥ गंगाजी का विस्तार तथा रुद्र द्वारा संकर्षण देव का स्तवन ॥
श्रीशुकदेवजी ने कहा- हे राजा परीक्षित! इस अध्याय में श्रीगंगाजी का महात्म्य वर्णन करते हैं। वामनावतार भगवान ने राजा बलि के यज्ञ में जाकर तीनों लोकों को नापते समय अपने दाहिने चरण से पृथ्वी को दबाया तो अंगूठे के नख से ऊपर का भाग फूट गया, उस छिद्र में से श्री गंगाजी की धारा ब्रह्माण्ड के भीतर बैठी थी। यह धारा स्वर्ग के मस्तक पर उतरी है। भगवान वामनजी के चरणों से उत्पन्न हुई, इससे भगवद् पदी नाम हुआ।
हे राजन् ! गंगाजी यद्यपि बलि के यज्ञ के समय ब्रह्माण्ड छिद्र में प्रवेशित हुई थीं तथापि सहसा पृथ्वी पर नहीं उतरीं, हजार चौकड़ी युग के उपरान्त ये पद है। जहाँ श्रीध्रुवजी गंगाजी को देख भगवान के चरण का जल मान अब तक अपने मस्तक पर धारण कर रहे हैं। तदनन्तर दो धारा जब नीचे गिरीं, तब सप्तऋषि धारण करते हैं। तब चन्द्र मण्डल को सेवन करती हुई सुमेरु पर स्थित वम्रपुरी में बहती हुई चार धारा होकर चारों दिशाओं में बहती हुई समुद्र में मिलती हैं।
सीता, नन्द, चक्षु, भद्रा ये चार नाम हैं। सीता पूर्व दिशा के क्षीर-समुद्र में जा मिलती है, चक्षु धारा माल्यवान पर्वत से मिलकर पश्चिम दिशा के क्षीर-समुद्र में जा मिलती है, चक्षु धारा माल्यवान पर्वत से मिलकर पश्चिम दिशा में सुमेरु पर्वत से नीलगिरि पर आई, वहाँ से श्रृंगवान पर्वत पर से नीचे गिरती उत्तर दिशा के समुद्र में जा मिलती है।
इस प्रकार अलकनन्दा गंगा ब्रह्मलोक से दक्षिण की ओर गिरती हुई अनेक पर्वतों का उल्लंघन कर भरतखंड में ही दक्षिण दिशा के समुद्र में जा मिलती है। इन खण्डों में भरतखण्ड ही किये हुए कर्म का फल देने बाला है। शेष आठ स्वर्गवासियों के पुण्य भोगने के स्थान हैं, उनमें रहने वाले की आयु दस हजार वर्ष की होती है।
दस सहस्त्र हाथी के समान बल होता है। इन खण्डों में भगवान मनुष्यों पर अनुग्रह करने को आज तक विराजमान हैं। इलाब्रत खण्ड में तो महादेवजी ही विराजमान हैं, वे पार्वती सहित क्रीड़ा करते हैं, वहाँ कोई पुरुष नहीं जाता, यदि कोई इस खण्ड में दैवयोग से चला जावे तो स्त्री भाव को प्राप्त हो जाता है।
उस खण्ड में पार्वतीजी की हजारों दासियाँ महादेव की सेवा करती हैं। महादेवजी भगवान श्रीशेषजी की मूर्ति का ध्यान करके आगे कहे हुए मन्त्र का जप करते हैं। संकर्षण मन्त्र "ॐ नमो भगवते महापुरुषाय सर्वगुण संख्या नारायणनन्ताय व्यक्ताय नमः ।"
॥ पृथ्वी खण्डों का वर्णन ॥
श्रीशुकदेवजी कहने लगे- ऐसे ही भद्राश्वखंड में भद्रश्रव का पुत्र स्वामी है। उनके सेवक भगवान की हयग्रीव अवतार की मूर्ति को हृदय में स्थित करके इस मंत्र को "ॐ नमो भगवते धर्मयारत्माविशोधनाय नमः" जपते हैं। प्रलय काल में तमोगुण वेद को चुरा लिया गया, तब तो हयग्रीव अवतार धारण कर पाताल से वेद लाये, और ब्रह्माजी को दिये।
हरिवर्ष खण्ड में नृसिंह भगवान् विराजमान हैं। प्रहलादजी उस खण्डों के पुरुषों के साथ भक्ति से नृसिंह की उपासना करते हैं। तुमाल खण्ड में भगवान कामदेव रूप से विराजमान हैं, संवत्सर की पुत्री व पुत्र, स्त्री पुरुष रूप से निवास करते हैं। रम्यक खण्ड में भगवान मत्स्यावतार रूप से विराजमान हैं, वहाँ मनु अब तक भाव-भक्ति से इस स्वरूप का आराधन करते हैं।
हिरण्यमय खण्ड में कूर्म शरीर धारण कर भगवान विराजमान हैं, जहाँ अर्यमा देवता उस खण्ड के पुरुषों के साथ भगवान की मूर्ति की सेवा करता है। उत्तर कुरु खण्ड में भगवान वाराह रूप धारण करके विराजमान हैं। पृथ्वी देवी उस वाराह भगवान को भक्तियोग से भजती है और उपनिषद के मंत्र का उच्चारण करती है।
श्रीशुकदेवजी बोले- हे राजन् ! इसी प्रकार किम्पुरुष खंड में सीतापति भगवान श्रीरामचन्द्रजी विराजमान हैं, उनकी सेवा हनुमानजी करते हैं। इसी प्रकार भरत खंड में नर नारायण भगवान बद्रिकाश्रम में विराजमान हैं, नारदजी इनकी उपासना करते हैं।
श्री शुकदेवजी बोले- हे राजन् ! इस जम्बूद्वीप के आठ उपद्वीप हुए। उनके नाम ये हैं - १. स्वर्णप्रस्थ, २. चन्द्रप्रस्थ, ३. आवर्तन, ४. रमणक, ५. मंदहरिण, ६. पांचजन्य, ७. सिंहल और ८. लंका हैं। इस प्रकार यह जम्बूद्वीप के खंडों का विभाग मैंने तुमसे कहा।
॥ लोकालोक पर्वत का वर्णन ॥
श्रीशुकदेवजी ने कहा- इसके उपरान्त प्लक्ष आदि द्वीपों के विभाग वर्णन किये जाते हैं, प्रथम जम्बूद्वीप का विस्तार एक लाख योजन है और यह क्षीर समुद्र से यह घिरा है और प्लक्षद्वीप दो लाख योजन है। उस पर प्लक्ष का वृक्ष है, यह वृक्ष सुवर्ण कान्ति वाला ग्यारह हजार योजन ऊँचा है, इसी के नाम से वह प्रसिद्ध है। इसमें अग्नि रहती है। शिव, यवश, समुद्र, शान्त, मोक्ष, अमृत, अभय ये सात वर्ष हैं और अरुणा, नृम्णा, आंगिरसी, सावित्री, सुप्रभाता, ऋतुम्भरा, सत्यम्भरा ये नदियाँ हैं।
इनके जल से मनुष का रजोगुण व तमोगुण दूर हो जाता है। वहाँ हंस, पतंग, उर्ध्वायन सत्यांग चार वर्ण हैं इनकी आयु हजार वर्ष की है। ये सब सूर्य नारायण की स्तुति करते हैं। "प्रयत्नस्य विष्णोरूप यत्सत्यस्यार्तस्य ब्रह्मणः । अमृतस्य च मृत्योश्च सूर्यमान धीमहि ।" इस मंत्र का जप करते हैं। इन पाँच द्वीपों में पुरुषों की आयु, इन्द्रिय, सामर्थ्य, साहस, बल, बुद्धि, स्वभाव की सिद्धि सबमें समान भाव से वर्तमान रहती है। प्लक्षद्वीप ईख रस के समुद्र से घिरा हुआ है।
शाल्मलिद्वीप जो प्लक्षद्वीप से दुगुना बड़ा है वह भी मदिरा के समुद्र से घिरा हुआ है, शाल्मलिद्वीप चार लाख योजन चौड़ा है। समुद्र भी चार लाख योजन चौड़ा है। इस द्वीप में शाल्मली का वृक्ष है उसमें गरुड़ का घोंसला है। ये गरुड़ वेद द्वारा भगवान की स्तुति किया करते हैं। इस द्वीप के अधिपति प्रियव्रत के पुत्र यज्ञबाहु ने इसको अपने सात पुत्रों को उन्हीं के नाम के अनुसार बांट दिये, उनके १. सुरोचन, २. सोमनस्य, ३. रमणक, ४. देववर्ष, ५. पारिभद्र, ६. आप्यायन, ७. अविज्ञात, ये सात खण्ड पुत्रों के नाम से प्रसिद्ध हैं।
इन सात खण्डों में १. स्वरस, २. शतश्रृंग, ३. वामदेव, ४. कुन्द, ५. रजनी, ६. नन्दा, ७. राका ये सात नदियाँ हैं। इन खण्डों में श्रीतिधर, वीर्यश्वर, वसुन्धर, इषधर चार वर्ण हैं। ये लोग चन्द्र भगवान का वेद मन्त्रों से पूजन करते हैं। इसी प्रकार आठ लाख योजन का कुशद्वीप है और घृत समुद्र इसके चारों ओर है।
इस द्वीप में देवताओं का बनाया हुआ एक कुश का स्तम्भ है। यह कुश स्तम्भ अग्नि के समान प्रकाशवान है और दसों दिशाओं को सर्वदा प्रकाशित करता है। हे राजन् ! इस द्वीप का अधिपति प्रियव्रत हिरण्यरेता हुआ।
उसने द्वीप सातों पुत्रों को बांट दिया और आपने तप करने चला गया। १. वसु, २. वसुदार, ३. दृढ़रुचि, ४. नाभिगुप्त, ५. स्तुत्यव्रत, ६. विबक्त, ७. वामदेव इन सातों के सात पुत्र थे इन्हीं के नाम से सातों खण्ड हैं तथा इन सातों खण्डों में सात पर्वत और सात नदियाँ हैं तथा इन सातों खण्डों सात पर्वत और सात नदियाँ हैं, उनमें से १. चक्र, १२. चतुश्रृंग, ३. मित्रावदा, ४. श्रुतिविन्द, ५. देवगर्भ, ६. धृतच्युता, ७. मन्त्रमाला ये सात नदियाँ हैं।
१. कुशल, २. कोविद, ३. अभियुक्त, ४. कुलक, ये चारों वर्ण रहते हैं और अग्नि का पूजन इस मंत्र से करते हैं, कि हे अग्नि ! भगवान को आप हव्य पहुँचाते हैं, इस कारण इस पूजा को भगवान को पहुँचाओ। कुशद्वीप के बाहरी भाग में क्रौंचद्वीप है, यह सोलह लाख योजन चौड़ा है।
यह क्षीर समुद्र से घिरा है, इसमें क्रौंच नाम एक पर्वत है, इसके किनारे और कुंज स्वामिकार्तिक ने तोड़ दिये तथापि क्षीर सागर से सीचें जाने के कारण यह सदैव निर्भय रहता है। उसका अधिष्ठाता प्रियव्रत धृतपृष्ठ था उसने सात खण्ड कर अपने पुत्रों के नाम रख विभाग कर दिया।
१. आम, २. मेधुरुह, ३. मघपृष्ठ, ४. सुयामा, ५. भ्राजिष्ठ, ६. लोहितार्ण, ७. वनस्पति ये सातों पुत्र व खण्डों के नाम हैं। इनमें सात पर्वत और सात नदियाँ है - १. शुक्ल, २. वर्धमान, ३. भोजन, ४. उपवहण, ५. नन्द, ६. नन्दन, ७. सर्वतोभद्र ये पर्वत हैं और १. अभया, २. अमृतपौधा, ३. आर्यका, ४. तीर्थवती ५. रूपवती, ६. पवित्रवती, ७. शुक्ला ये नदियाँ हैं और पुरुष, ऋषध, द्रविण, देवक चारों वर्ण का पूजन करते हैं और इस मन्त्र को जपते हैं -
हे जलदेव! तुमको परमेश्वर से सामर्थ्य प्राप्त हुई, अतएव आप भू- लोक, भुव-लोक, स्वर्ग-लोक को पवित्र करते हो, सो आप हमारे शरीर को पवित्र करो। इससे आगे सातद्वीप हैं, उसका विस्तार बत्तीस लाख योजन हैं, यह दधिरस समुद्र से घिरा है, इसमें शाक वृक्ष हैं। उसमें प्रियव्रत पुत्र मेधातिथि था, उसने इसको अपने पुत्रों के नाम से सात खण्ड करके उन सबमें यथाक्रम परोजब, मनोजब, पवमान, धूभ्रानीक, चित्ररेफ, बहुरूप, विश्वाधर सात पुत्रों को अधिपति किया।
तदनन्तर वह राजा भगवान में मन को प्रवेश करने को वन चला गया। इसमें पर्वत १. ईशान, २. अरुश्रृंग, ३. बलभद्र, ४. शतकेशर, ५. सहस्त्रस्त्रोत, ६. देवपाल, ७. निजधूति ये सात हैं, और १. अनघ, २. आयुदा, ३. उभयस्पृष्टि, ४. अपराजिता, ५. पञ्चपदी, ६. सहस्त्रश्रुति, ७. निजधृति ये नदियाँ हैं। इसमें रहने वाले ऋतुव्रत, सत्यव्रत, दानव्रत, अनुब्रत वर्णधारी प्राणायाम से रज-तम को दूर करते हुए समाधि योग से वायु की उपासना इस मंत्र से जाप करते हैं-
जो बायुरूप भगवान प्राणियों में प्रवेश हो अपनी प्राण वृत्तियों से सबका पालन करता है, वह अन्तर्यामी हमारी रक्षा करे। दधिजल सागर से आगे पुष्कर द्वीप चौंसठ लाख योजन है यह चारों ओर जल समुद्र से घिरा हुआ है। इस खंड में ब्रह्माजी का आसनरूप एक कमल है। मानसोत्तर नामक पर्वत इस द्वीप के मध्य में है, इसका विस्तार व ऊँचाई दस हजार योजन है इसी के ऊपर पन्द्रह आदिक लोकपालों की चार पुरी हैं और इसी पर्वत पर सूर्य के रथ का उत्तरायण और दक्षिणायन पर नियत काल में भ्रमण करता है।
इसका अधिपति प्रियव्रत पुत्र वीतिहोत्र हुआ। उसके दो पुत्र रमणक और धातिकि नाम के थे। इन्हीं नामों से दो खण्डों में इसका विभाग कर दोनों को स्वामी बना राजा वीतिहोत्र भगवान की आराधना में लग गया। उसके रहने वाले भगवान को आगे कहे हुए मन्त्र से जपते हैं- 'जो कर्म के रूप एक परमेश्वर अद्वितीय शान्त स्वरूप हैं उनको हमारा नमस्कार है।'
श्री शुकदेवजी बोले- पूर्वोक्त द्वीप से आगे लोकालोक नाम पर्वत है, जहाँ सूर्य प्रकाश नहीं रहता उसको अलोक कहते हैं। इन देशों के विभाग कर परमात्मा ने इनके चारों ओर घेरा बनाया है जो डेढ़ करोड़ सात लाख योजन है।
एक दूसरी भूमि है, वह आठ करोड़ उनतालिस लाख योजन है, और दर्पण के समान प्रकाशित है, उसमें यदि कुछ भी रखा जाये तो फिर हाथ नहीं आता। इसके आगे लोकालोक पर्वत हैं। यह तीनों लोकों के अन्त में त्रिलोकी की मर्यादा रूप परमेश्वर ने रचा है। त्रिलोकी का प्रकाश पीछे की ओर न पहुँच सके, इतनी इस पर्वत की ऊँचाई और चौड़ाई है।
यह पर्वत पचास करोड़ योजन है, मेरु से चारों ओर साढ़े बारह करोड़ योजन दूर है। इस पर्वत के ब्रह्माजी ने १. ऋषभ, २. पुष्करचूड़, ३. बामन, ४. अपराजित, ये चार दिग्गज स्थित किये हैं। इन दिग्गजों की रक्षा भगवान् अपने पार्षदों सहित लोकालोक पर्वत पर विराजकर करते हैं।
इस लोक से परे योगेश्वरों के बिना गति नहीं है। जो इस ब्रह्मांड के परिमाण का निरूपण करते हैं। पूर्वोत्तर कपालों के मध्य भाग से जब सूर्य आता है तब पच्चीस करोड़ के परिमाण से इस गोले में अवकाश करता है। पहले ब्रह्मांड अचेतन था उस समय सूर्य ने वैराजरूप से इसमें प्रवेश किया, इस कारण मार्तण्ड कहते हैं।
ब्रह्मांड इनमें से उत्पन्न हुआ, इसलिए हिरण्यगर्भ नाम प्रसिद्ध है। दिशा, आकाश, स्वर्गादिलोक, पृथ्वी, दूसरे लोक, स्वर्ग, अपवर्ग, नरक, पाताल ये सब सूर्य ही से विभक्त हैं।
देवता, पशु, पक्षी, आदि मनुष्य, सर्प, बिच्छू, आदि, लता, तृण आदि सब प्राणियों के आत्मा, और तेज के अधिष्ठाता, सूर्य ही हैं। इस कारण सूर्य की उपासना करना योग्य है।
॥ राशि संचार और उनके द्वारा लोक यात्रा निरुपण ॥
श्रीशुकदेवजी कहने लगे - हे राजन् ! इस प्रकार प्रमाण और लक्षण से भूमंडल की स्थिति कही है। इसी प्रकार खगोल का परिमाण है, इसी परिमाण से नभोमंडल को समझना। जैसे मटर, चना, अरहर, उड़द आदि की दाल अलग की जाय, तो उसके दोनों दल समान होंगे इसी प्रकार भूगोल और खगोल हैं, इन दोनों के बीच आकाश है।
इस अन्तरिक्ष के बीच में सूर्य त्रिलोकी को तपाते हैं, और यही सूर्य उत्तरायण, दक्षिणायन विषुवत गतियों से ऊँचे चढ़ना, नीचे उतरता व समान स्थान पर चलने के हेतु मकर आदि राशियों में आकर रात-दिन को बड़ा छोटा और समान कर देता है।
जब मेष और तुला राशि में सूर्य आते हैं तब रात-दिन समान होते हैं। जब वृष आदि पाँच राशियों में सूर्य आते हैं तब दिन बड़े, रात्रियाँ एक महीने में एक-एक घड़ी कम होती जाती है। वृश्चिक आदि पाँच राशियों में सूर्य, दिन छोटा और रात बड़ी करते हैं। जब सूर्य दक्षिणायन आते हैं, तब दिन बढ़ते हैं और जब उत्तरायण आते हैं तो रात्रियाँ बढ़ती हैं।
इस प्रकार सूर्य का मानसोत्तर और सुमेरु के बीच भ्रमण करने का मार्ग नव करोड़ इक्यावन लाख योजन है और इन पर्वतों से पूर्व इन्द्रपुरी है। दक्षिण की ओर में धर्मराजपुरी है। इनसे पश्चिम की ओर वरुणपुरी है। उत्तर में चन्द्रमा की पुरी है। इन पुरियों में जब सूर्य पहुँचता है तब उदय, मध्याह्न, अस्त और अर्धरात्रि हुआ करते हैं, जो प्राण प्रवृत्ति के कारण हैं।
सुमेरु के चारों तरफ सूर्य इतनी ही दूर रहता है। जिससे सुमेरु मध्य पर सदा मध्याह्न ही रहे। जहाँ सूर्य उदय होता है उससे समान सूत्र पर आधी रात होती है। जब सूर्य इन्द्रपुरी से चलते हैं तब पन्द्रह घड़ी पीछे यमपुरी पहुँचते हैं। यमपुरी से पीछे वरुणपुरी, फिर सौमपुरी, इन्द्रपुरी में सूर्य पहुँचते हैं। ठीक ५ घड़ी में एक पुर्यन्तर पर सूर्य भ्रमते हैं।
अन्य चन्द्र आदि ग्रह ज्योतिष-चक्र में नक्षत्रों के साथ उदय होते हैं और नक्षत्रों के साथ ही अस्त होते हैं। सूर्य रथ का संवत्सर रूप एक पहिया है, और उसके बारह मास, बारह अरे हैं। छः ऋतु छः पुट्टी हैं और सर्दी, गर्मी बरसात तीन नाभी हैं और सुमेरु का मस्तक धुरी, एक भाग है दूसरा मानसोत्तर पर स्थापित है, जिससे पिरोया हुआ पहिया कोल्हू के समान मानसोत्तर पर घूमा करता है।
रथ का प्रथम धुरा समरु और मानसोत्तर तक फैला एक करोड़ सत्तावन लाख पचास हजार योजन का है और दूसरा इससे चौथाई है। इसका ऊपरी भाग ध्रुवलोक में बंधा हुआ है। उसमें बैठने का स्थान छत्तीस लाख योजन लम्बा और इससे चतुर्थांश चौड़ा है।
गायत्री आदि छन्दों के नाम के सात घोड़े अरुण नामक सारथी सूर्य के आगे बैठता है, परन्तु उसका मुख सूर्य के सम्मुख रहता है। अंगूठे के पोरे के समान साठ हजार बालखिल्य नामक ऋषि अनेक सूक्तों से स्तुति किया करते हैं। साढ़े नव करोड़ एक लाख योजन परिमाण परिभ्रमण करते हुए सूर्य प्रत्येक क्षण में दो योजन और दो कोस चलते हैं।
॥ ग्रह की गति का वर्णन ॥
राजा परीक्षित कहते हैं - हे ब्रह्मन् ! आपने कहा सूर्य सुमेरु और ध्रुव की परिक्रमा करके सब राशियों के सम्मुख बिना प्रदक्षिणा किये सुमेरु को वास करके चलते हैं सो यह बात विरुद्ध प्रतीत होती है, इसको समझाकर कहिये।
श्रीशुकदेवजी बोले-जैसे चाक घूमता है, उस चाक के साथ उसके ऊपर चींटी आदि जीव दूसरी और चलते हों तो भी उसे चक्र की गति के अनुसार ही दीख पड़ते हैं। वे जीव चाक के भाग को छोड़ दूसरे भाग में आ जाते हैं। यदि सूर्य भी सीधी गति से चलते हों तो एक राशि पर ही नक्षत्र पर सूर्य का रहना है।
जैसे कोई मनुष्य किसी ग्राम की प्रदक्षिणा को गया हो तो दूसरा पुरुष ढूंढ़ने को सीधे मार्ग से चलेगा तो पूर्वगत को नहीं पावेगा और उल्टा चलेगा तो उसको पावेगा, इससे सूर्य के उलटने का परिमाण है। मेषादिक राशियों के नाम ही महीनों के नाम हैं। यह सब मास संवत्सर के अंग हैं।
सब महीने पृथक भाँति के होते हैं जैसे चन्द्रमा की गति से दो पक्ष का महीना होता है, सूर्य के सवा दो नक्षत्र भोग करने के समय को एक मास कहते हैं। वह पितरों का एक दिन-रात है। सूर्य जितने समय में दो राशियों को भोग ले वह समय ऋतु नाम से प्रसिद्ध है।
सूर्य अपनी गति से आकाश से अर्धभाग में परिभ्रमण करे उतने समय को अयन कहते हैं। इसी प्रकार सम्पूर्ण आकाश में सूर्य परिभ्रमण करें तो उतने समय को संवत्सर कहते हैं और एक वर्ष में मन्द, शीघ्र व समान गति के भेद से संवत्सर के परिवत्सर, इडावत्सर, अनुत्वसर, वत्सर ये भेद होते हैं।
सौरमास गणना से छः दिन बढ़ते हैं, और चन्द्रमास गणना में छः दिन घटने से ११ दिन का अन्तर पड़ता है इस प्रकार के अन्तर से सौरमास और चन्द्रमास आगे पीछे हो जाते हैं।
परन्तु पाँच वर्ष में दो अधिक मास हो जाने से हिसाब छटे वर्ष के बराबर हो जाता है। फिर प्रतिपदा के दिन संक्रान्ति से छठा वर्ष संवत्सर संज्ञक होता है। दूसरा परिवत्सर, तीसरा इदावत्सर, चौथा अनुवत्सर, पांचवाँ वत्सर। इन्हीं के नाम क्रम से सौर, चन्द्र, नक्षत्र, बृहस्पति और सावन हैं। इनमें सौर के 365, चंद्र वर्ष 354, नक्षत्र, बार्हस्पत्य और सावन हैं ।
इनमें सौर वर्ष के ३६५ ,चान्द्र वर्ष ३५४, नक्षत्र बार्हस्पत्य के ३९० और सावन वर्ष के पूरे ३६० दिन होते हैं। सूर्य की किरणों से एक लाख की योजना ऊपर चन्द्रमा है। बारह राशियों को चन्द्रमा दो पक्षों में भोगता है। जब चन्द्रमा की कला बढ़ती है तब शुक्लपक्ष, और कला क्षीण होने से कृष्ण पक्ष कहा जाता है। पितरों की अहोरात्र को बनाता हुआ अन्नमय, प्राणियों का प्राण यह चन्द्रमा साठ घड़ी में एक नक्षत्र को भोगता है।
पितर, भूत, पक्षी, सर्प, लता, झाड़ इन सबको तृप्त करते हैं, इनसे चन्द्र को सर्वमय कहा जाता है। चन्द्रमा से तीन लाख योजन ऊपर अश्विन्यादि नक्षत्र हैं, ये अभिजीत सहित अट्ठाईसों नक्षत्र मेरु की दाहिनी प्रदक्षिणा करते हैं। इनसे दो लाख योजना पर शुक्र है यह शुक्र, सूर्य के समान चलता है।
यह सबको शुभ फल देने वाला है। वर्षा रोकने वाले को यह शान्त कर देता है। शुक्र से दो लाख योजन ऊपर बुध है, यह चन्द्रपुत्र सबको शुभ फल देता है। जब यह सूर्य से पृथक दूसरी राशि पर हो जाता है तब शून्यमेघ और अनावृष्टि आदि होने की सूचना करता है। इससे दो- दो लाख योजन ऊपर मंगल है। यह वक्री न हो तो डेढ़ महीने में एक राशि को भोगता हुआ, बारहों राशियों को भोगता है।
प्रायः प्राणियों को दुःख देता है। मंगल से दो लाख योजन दूर बृहस्पति हैं, यह वक्री न हों तो राशि को एक वर्ष तक भोगते हैं। बृहस्पति जी ब्राह्मणों के अनुकूल रहते हैं। बृहस्पति दो लाख योजन पर शनैश्चर प्रकाश करते हैं, एक राशि पर घूमने में शनैश्चर जी को तीस महीने लगते हैं, यह प्राणियों को अशान्ति देने वाले है। शनैश्चर से ग्यारह लाख योजन दूर सप्त ऋषि हैं, यह ऋषि लोकों को शान्ति देते हुए विष्णु के ध्रुव स्थान की प्रदिक्षणा किया करते हैं।
॥ शिशुमार चक्र वर्णन ॥
श्रीशुकदेवजी बोले - हे राजन् ! उससे तेरह लाख योजन पर विष्णु पद है जहाँ ध्रुवजी स्थित हैं। जिनकी चाल कभी रुकती नहीं, वेग वाले सब ग्रह नक्षत्र तारागणों को बांधने वाले एक-एक थम्भ रूप यह ध्रुवजी सदा प्रकाशमान रहते हैं। यह ग्रह आदि नक्षत्र भीतर और बाहर जुड़े हुए इस ध्रुव का ही अवलम्बन किये हुए हैं।
यह ग्रह आदि नक्षत्र भीतर और बाहर जुड़े हुए हैं और कल्प पर्यन्त चारों ओर घूमते रहते हैं। परन्तु वह उन परम पुरुष के अनुग्रह से आकाश में भ्रमण करते हैं। सिर को नीचे की ओर कर कुंडली बनाकर बैठे हुए इस ज्योतिष स्वरूप शिशुमार की पूँछ के अग्रभाग में ध्रुवजी हैं। उनसे निकट लांगूल पर ब्रह्मा, अग्नि, इन्द्र, धर्म से स्थित हैं और पूँछ की मूल मैं धाता, विधाता स्थित हैं।
इस शिशुमार चक्र की दाहिनी कुक्षि हैं तथा चौदह बांई में समान संख्या वाले हैं। इसकी पीठ पर अजवीथी है जो आकाश गंगा है। चक्र के दाहिने पुनर्वसु नितम्ब पर पुष्य स्थित है। आर्द्र पिछले दाहिने पाँव में हैं। और आश्लेषा पिछले बांये पाँव पर है। अभिजित दाहिनी नासिका पर है, उत्तराषाढ़ा नासिका के वाम है, श्रवण दाहिने नेत्र पर है, पूर्वाषाढ़ा बायें पर है, धनिष्ठा दाहिने कान पर, मूल बायें कान पर है।
मेधा आदि आठ नक्षत्र उसके वाम पार्श्व की अस्थि में है। मृगशिरा आदि उत्तरायणी आठ नक्षत्र उसके दक्षिणी पार्श्व की अस्थियों में उलटे लगे हैं। और शतभिषा दाहिने कन्धे पर, ज्येष्ठा बायें कन्धे पर जानो। ऊपर के ओठ पर अगस्त्य, नीचे के ओठ पर यम, मुख पर मंगल, लिंग पर शनि, पृष्ठ अंग पर बृहस्पति, छाती पर सूर्य, हृदय में नारायण, मन में चन्द्रमा, नाभि पर शुक्र, दोनों स्तनों पर अश्विनी कुमार, प्राण और अपान में बुध, गले पर राहु, सब अंगों में केतु और रोमों में तारागण लगे हुए हैं।
यही शिशुमार चक्र भगवान का देवमय स्वरूप है। सन्ध्या समय मौन रहकर भगवान के इस स्वरूप का दर्शन करना योग्य है। यह नक्षत्र, तारामय, अधिदैव रूप, त्रिकाल में मंत्र जपने वालों के पाप नष्ट करने वाले इस शिशुमारचक्र को जो तीनों समय नमस्कार करता है उसके उस समय के सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं।
॥ पातालादि सप्त अधोलोक का वर्णन ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - हे राजन् ! सूर्य के नीचे दस हजार योजन पर राहु है। असुरों में अधम सिंहपुत्र राहु दैत्य अयोग्य होने पर भी भगवान की कृपा से देव-पद और ग्रह भाव को प्राप्त हो गया है। सूर्य का यह मण्डल हजार योजन है। चन्द्रमा का बारह हजार योजन और राहु का यह मण्डल तेरह हजार का है। अमावस्या तथा पूर्णिमा को सूर्य या चन्द्रमा समसूत्र पर जब राहु को दीखते हैं तभी इनको पकड़ने दौड़ता है।
इसको जान इन दोनों की रक्षा के अर्थ विश्व में सुदर्शन चक्र रख छोड़ा है, तब सुदर्शन चक्र को देख दो घड़ी तक उसके सम्मुख रह काँपता हुआ राहु दूर से ही लौट जाता है। जितने समय तक राहु खड़ा रहता है उतने समय का ग्रहण कहते हैं।
राहु से नीचे सिद्ध, चारण, विद्याधरों के स्थान हैं। उनसे यह राक्षस, पिशाच, प्रेत, भूतगण इनके विहार करने का स्थान है। उसी स्थान तक रहने वाला वायु रहता है। उस यक्षादिकों के स्थान के नीचे सौ योजन पर पृथ्वी के विकार, हंस, गीध, बाज, गरुड़ आदि पक्षी उड़ते रहते हैं उतनी दूर तक इस लोक भूलोक की सीमा है।
पृथ्वी के नीचे सात पाताल हैं। भूमि से दस हजार योजन नीचे अतल, अतल से दस हजार योजन नीचे वितल उससे दस हजार योजन नीचे सतल इसी क्रम से सब लोक स्थित हैं। अतल, वितल, सतल, तलातल, महातल, रसातल, पाताल ये सातों लोक पाताल स्वर्ग कहलाते हैं।
इनमें भी काम, भोग, ऐश्वर्य, आनन्द, विभूति ये वर्तमान हैं। दैत्य, दानव, नाग ये सब वहाँ आनन्दपूर्वक भोग विलास करते हुए रहते हैं। इस सब पातालों में मयदानव की रची हुई अनेक पुरियां प्रकाशमान रहती हैं। इनमें देवलोक की शोभा से भी अधिक वाटिका और उपवन हैं। इन पातालों में सूर्य आदि ग्रहों के न होने से दिन रात्रि का विभाग नहीं है।
इस कारण काल का भय नहीं है। यहाँ बड़े-बड़े नागों के सिर की मणियाँ अन्धकार दूर करती रहती हैं। इनमें रहने वालों की औषधि, रस, रसायन, अन्न, पान व स्थान दिव्य होने के कारण आधि, व्याधि, वृद्धावस्था, श्वेत केश होना, देह की अव्यवस्था और विवर्णता, दुर्गन्धता, पसीना, परिश्रम, ग्लानि इत्यादि विकार नहीं होते।
इन लोगों की मृत्यु भगवान के चक्र के बिना किसी से नहीं होती। अतल लोक में मय का पुत्र बलि रहता है जिसकी उत्पन्न की हुई ९६ मायाओं में से कितनी ही माया अब तक मायावी लोग धारण करते हैं। उसके जंभाई लेने से स्वैरिणी, कामनी और पुश्वली यह तीन प्रकार की स्त्रियाँ उत्पन्न हुई। वे स्त्रियाँ उस लोक में गये हुए पुरुष को हाटक रस पिलाकर अपने साथ मिलाप करने योग्य बनाकर उसके साथ रमण करती हैं।
उस रस के पीने से दस हजार हाथियों का बल आ जाता है। वह 'मैं ईश्वर हूँ' ऐसा अभिमान कर बकता फिरता है। वितल में भूतगणों से मुक्त महादेवजी सृष्टि बढ़ाने को पार्वती सहित मिथुन भाव से विराजमान हैं। इन शिव पार्वती के वीर्य से बनी हुई हाटकी नाम नदी बहती है, वहाँ अग्नि उस वीर्य को पीती है। उसके थूकने से हाटक नाम सुवर्ण उत्पन्न होता है। उसी के स्त्री-पुरुष आभूषण बनाकर धारण करते हैं। सुतल में विरोचन का पुत्र बलि राज करता है। इन्द्र के हित को भगवान् ने वामन अवतार धारण कर त्रिलोकी का राज्य हरण कर बलि को तीसरे पाताल में पहुँचाया।
हे राजन् ! बलि की महिमा हम क्या वर्णन करें! जिसके द्वार पर नारायण गदा लिए अभी तक पहरा देते हैं। सुतल के दस हजार योजन नीचे तलातल है। उसमें मय दानव निवास करता है। महादेवजी ने इसके तीनों पुर भस्म करके इसको यह स्थान दिया है। मय महादेवजी से रक्षित होने के कारण सुदर्शन चक्र का भी भय न रख इस लोक में पूजा जाता है। तलातल से नीचे महातल है उसमें सिर वाले क्रडू के पुत्र सर्पों का गण रहता है।
इनमें कुहकत, क्षक, कालिया और सुषेण आदि मुख्य माने जाते हैं। ये लोग गरुड़जी से निरन्तर उद्विग्न रहा करते हैं। महातल के नीचे रसातल है, उसमें निवातकवच, कालेय, हिरण्यपुर के वासी ये तीन यूथ वाले पणिनाम दैत्य दानव रहते हैं। ये देवताओं के शत्रु हैं, परन्तु भगवान के चक्र से उनका अभिमान खंडन हो जाने से वे सब बिल में सर्प के समान रहते हैं और इन्द्र से भेजी हुई सरमा नाम कुत्ती की कही हुई वाणी को सुन इन्द्र से भय करते रहते हैं।
रसातल के नीचे पाताल है उसमें नाग लोक के पति वासुकी आदि नाग रहते हैं। शंख, कलिक, महाशंख, श्वेत, धनञ्जय, धृतराष्ट्र, शंखचूड़, देवदत्त इत्यादि बड़े भारी शरीर वाले और महान् क्रोध वाले नाग हैं। उनके फणों की मणियां महाकान्ति वाली हैं, ये मणियाँ अपनी ज्योति से उस लोक के अन्धकार को नष्ट कर देती हैं।
॥ शेषनाग नामक भगवान संकर्षण देव का विवरण ॥
श्रीशुकदेवजी ने कहा - पाताल से तीस हजार योजन दूर शेषजी विराजमान हैं। ये द्रष्टा और दृश्य को खींच कर मिला देते हैं। इसी से इनको संकषर्ण कहते हैं। शेषजी के सिर पर पृथ्वी धरी है, जब ये शेष प्रलय काल में जगत के संहार की इच्छा करते हैं तो इनको क्रोध से कुटिल भृकुटियों के मध्य से तीन-तीन नेत्रों से युक्त संकर्षण नाम ग्यारह रुद्र हाथ में त्रिशूल लिये हुए प्रकट होते हैं। अनन्त जिसका वीर्य है और लोगों के हितार्थ लीलामात्र से इस धरणी को धारण कर रहे हैं, आप ही अपने आधार हैं, उन्हीं शेषजी का स्मरण करना उचित है।
श्री शुकदेवजी कहते हैं कि हे परीक्षित! संसार सुख की इच्छा वाले पुरुष को जो-जो गति अपने कर्मों के अनुसार मिलती है वे सब पाताल से लेकर ध्रुवलोक पर्यन्त कर्मफल अन्य मनुष्यों की गति हैं इससे अधिक नहीं। अब आगे क्या वर्णन करूँ ?
॥ नरक समूह का विवरण ॥
राजा परीक्षित कहने लगे - हे महर्षे ! इस लोक में पुरुष के सुख दुःख की, देव, मनुष्य, पशु आदि जीव की पृथक-पृथक गति परमेश्वर ने क्यों बनाई ?
श्रीशुकदेवजी बोले- हे राजन् ! यहाँ कर्ता के त्रैविध्य से श्रद्धा भी तीन तरह की होने से कर्म की गति भी पृथक-पृथक होती हैं। जिसका शास्त्र में निषेध किया है उसी को अधर्म कहते हैं। पापी पुरुषों को नरकगति मिलती है, उनमें से मुख्य मुख्य नरकों का वर्णन करते हैं।
राजा परीक्षित ने पूछा, हे भगवान् ! किसको नरक कहते हैं तब श्रीशुकदेवजी कहने लगे- ये नरक त्रिलोकी के अन्तर्गत दक्षिण दिशा में पृथ्वी के नीचे और जल के ऊपर है। जहाँ पितरों का राजा धर्मराज अपने दूतों द्वारा मृतकों को बुलाकर चित्रगुप्त आदि अपने गणों के साथ उनके दोषों को विचारकर, दण्ड देता है, सो श्रवण करो।
तामिस्त्र, अन्धतामिस्त्र, रौरव, महारौरव, कुम्भीपाक, कष्टसूत्र, असिपत्रवन, शूकरमुख, अन्धकूप, कृमिभोजन, वैतरणी, पूयोद, प्राणरोध, विशसन, लालाभक्ष, सारमेयादन, अबीर्चि, अयपान ये इक्कीस नरक हैं, और क्षारकर्दम, रक्षोगण, भोजन, शूलप्रोत, दंदशूक, अवटि निरोधन, पर्यावर्तन, सूचीमुख ये सात पृथक हैं, सब मिलकर अट्ठाईस नरक हैं।
इन अट्ठाईसों की यातना और निमित्त रूप कर्मों का निरूपण कहते हैं। जो पुरुष पराया धन पुत्र, स्त्री हरण करता है उसको यमदूत तामिस्र नरक में पटक देते हैं, इसमें अन्न जल नहीं मिलता और दण्ड ताड़ना होती है।
जो पुरुष छल से किसी की स्त्री से सम्भोग करता है वह अन्धतामिस्त्र नरक में पड़ता है। वहाँ जीव पीड़ा से बुद्धि रहित तथा अन्धा हो जाता है।
जो पुरुष मैं हूँ, मेरा है, ऐसी ममता कर सबसे द्रोह करके अपने ही कुटुम्ब का पालन करता है, वह रौरख नरक में गिरता है। इसी प्रकार महारौरव है, इसमें जो अपने ही शरीर को पालता है वह गिरता है।
वहाँ पर कृब्यादि रुरू उसके मांस को नोंच कर खाते हैं। जो जीते हुए पशु पक्षियों को पकाता है उसको यमदूत कुम्भीपाक में औटाते हुए तेल में भूनते हैं। जो पिता, ब्राह्मण व वेद से द्रोह करता है वह कष्टसूत्र में पड़ता है।
उसकी भूमि ऊपर से धूप और नीचे से अग्नि से तपा करती है। जो बिना विपत्ति आये वेद-मार्ग को त्याग पाखंड में चलता है, उसको असिपत्र नरक में डालकर कोड़ों से पीटते हैं।
जो कोई राजा अथवा कर्मचारी निरपराधी को दंड देता है और ब्राह्मण वध का दंड देता है वह शूकरमुख नरक में गिरता है, उसको कोल्हू में डालकर पीटते हैं। मच्छर व खटमल आदि जीवों को जो मनुष्य भोजन करने योग्य उत्तम पदार्थ को दूसरे लोगों को बाँटकर दिये बिना, अकेला खा लेता है और पञ्चमहायज्ञ नहीं करता है, उस मनुष्य को कृमिभोजन नरक में पटकते हैं।
यहाँ कीड़े के रूप में हुए इस प्राणी को दूसरे कीड़े खाते हैं। जो मनुष्य चोरी से, बलात्कार से, सुवर्ण, रत्न आदि हरण करता है, वह सन्देश नरक में गिरता है वहाँ उसकी खाल को यमदूत लोहे के तपे हुए चिमटे से तोड़ते हैं और जो मनुष्य नहीं रमण करने योग्य स्त्री से रमण करता है, दोनों यमलोक में कोड़ों से पीटे जाते हैं और उस पुरुष को तपाई हुई लोहे की स्त्री से और स्त्री को तपाये हुए लोहे के पुरुष से लिपटाते हैं।
इस नरक का सप्तभूर्मि नाम है। जो पुरुष, पशु आदि के साथ मैथुन करता है उसको बज्रकंटक शाल्मली नरक भोगना पड़ता है, वहाँ यमदूत काँटों वाले शाल्मली के वृक्ष पर चढ़ कर खींचते हैं। जो राजा या कर्मचारी पाखंडी बन मर्यादा को तोड़ते हैं वे वैतरणी नरक में पड़ते हैं, वह सब नरकों की खाई हैं, जहाँ जलजन्तु पापियों को भक्षण करते हैं, परन्तु उनके प्राण नहीं निकलते ।
विष्ठा, मूत्र, राध, रक्त, केश, नख, अस्ति, मेद, मांस, चवीं इनको बहाने वाली उस नदी में पड़े अनेक दुःख पाते हैं। जो मनुष्य इन लोकों में शूद्र के पति होकर शौच, आचार नियम को त्याग कर निर्लज्ज हो वेश्या आदि नीच स्त्रियों से रमण करते हैं, वे पूयोद नरक में गिरते हैं वहाँ राध, विष्ठा और खखार मल से भरे हुए सागर में पड़कर वही पदार्थ खाना पड़ता है।
हे राजन् ! जो उस जगत में ब्राह्मणादि वर्ण होकर कुत्ता, गन्धर्व बकरी पालते हैं और शिकार को खेल मानकर हिंस करते हैं, प्राणरोध नरक में पड़ते हैं। वहाँ उनको यमदूत बाणों से बींधते हैं और जो पाखण्ड से रचे हुए यज्ञों में पशुओं को मारते हैं, उनको दूत विशसन नरक में पटक कर नाना प्रकार की पीड़ा देकर अंगों को छिन्न- भिन्न किया करते हैं।
जो काम से मोहित हो अपने गोत्र की स्त्री से मैथुन करता है, उनको लालाभक्षण नरक में पटककर वीर्य की नदी में उसको वीर्य पिलाते हैं। और जो इस संसार में चोरी करते हैं, गृह में आग लगा देते हैं, दूसरों को विष पिला देते हैं, राजा अथवा राजसेना, ग्राम व मेले को लूट लेते हैं ऐसे मनुष्यों पर सात सौ बीस कुत्तों को यमदूत छोड़ते हैं वे कुत्ते आदमी को फाड़कर अस्थियों सहित चबा जाते हैं।
जो गवाही देते समय, व्यवहार दान में असत्य बोलता है, वह अर्वीचि नरक में पड़ता है। उसको सौ योजन ऊँचे पर्वत से नीचे को सिर करके पटकते हैं। जहाँ पाषाण भूमि, जल के समान जान पड़ता है।
जो पुरुष अहंकार करता है और श्रेष्ठों का आदर नहीं करता वह क्षारकर्दम नरक में नीचे को मुख करके पटका जाता है, वहाँ दुरंत क्लेश भोगने पड़ते हैं। जो किसी पुरुष को मार होम करते हैं वे रक्षोगणभोजन नरक में पड़ते हैं। पूर्वजन्म में मरे हुए मनुष्यों के आकार वाले राक्षस गण प्राणियों को त्रास दिया करते हैं वे दशहूक नरक में पड़ते हैं, वहाँ पाँच मुख अथवा सात मुख वाले सर्प उनको मूसे के समान निगल जाते हैं।
जो पुरुष गढ़े, कोठे और गुहादिकों में प्राणियों को बन्द कर पीड़ा देते हैं वे अवटनिरोधन नरक में जाते हैं वहाँ उनको ऐसे ही बन्द कर विष सहित धूओं से क्लेश प्राप्त कराते हैं। जो मनुष्य गृहस्थ को अतिथि अभ्यागतों पर क्रोध करता है वह पर्यावर्तन नरक में जाता है वहाँ गीध काक, बटेर आदि उसके नेत्रों को निकाल लेते हैं।
जो अभिमानी धन को मद से देखता है, जिसको किसी का विश्वास नहीं होता वह सूचीमुख नरक में पड़ता है। इसके अंगों को दूत छेदन कर डोरी में पोहते है और कहते हैं कि रे दुष्ट ! तुम्ने बहुत-सी थैलियाँ छीन-छीनकर रखीं ये उसका फल है।
इस प्रकार के हजारों नरक धर्मराज की पुरी में हैं, उनमें से कितने एक नारकियों का वृत्तान्त मैंने कह दिया है, और अनेकों का नहीं कहा है।
हे राजन् ! जो धर्म करने वाले हैं वे स्वर्ग आदि लोकों में जाते हैं, और वहाँ वे स्वार्ग नरक में अपने पुण्य पाप फल भोगकर जो कुछ पुण्य पाप शेष रहता है उससे पुनर्जन्म लेकर पृथ्वी पर आते हैं।
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