एक समय की बात है कि नैमिषारण्य क्षेत्र में शौनकादि ऋषि श्री सूतजी से हरि चर्चा करने के लिए एकत्र हुए ।

शौनकादि ऋषि बोले — हे सूतजा ! कृपा करके कोई ऐसा उपाय बतलाइये जिसके करने से मनुष्य आवागमन से छुटकारा पाकर मोक्ष को प्राप्त कर सके । शौनक जी के इस प्रकार के लोक हितकारी वचनों को सुनकर सूतजी कहने लगे ।


हे ऋषि ! आज तुमने मनुष्य मात्र के उद्धार की बड़ी अच्छी बात पूछी है । कलयुग में श्रीमद् भागवत की कथा ही मोक्ष को देने वाली है जिसका वर्णन शुकदेव जी ने राजा परीक्षित से किया था और राजा परीक्षित उसके श्रवण मात्र से मोक्ष को प्राप्त हुये थे ।

जिस समय श्री शुकदेव जी राजा परीक्षित को श्रीमद् भागवत की कथा सुनाने को बैठे, उस समय देवता अमृत का घड़ा लेकर आए और शुकदेव जी से कहने लगे, — भगवान् ! ये अमृत पिलाकर राजा परीक्षित को अमर कर दीजिए और श्रीमद् भागवत की कथा लोगों को सुनाईये, देवताओं के वचन सुनकर शुकदेव जी कहने लगे कि अमृत काँच के समान है और श्रीमद् भागवत की कथा मणि के समान है । यह कथा देवताओं को भी दुर्लभ है क्योंकि इसे सात दिन श्रवण करने से ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है , यह कथा ब्रह्मा जी ने नारदजी को सुनाई थी परन्तु सप्ताह का विधान सनत्कुमार ने नारद जी को बताया था । वही प्रसंग मैं आप लोगों से कहता हूँ ।

एक समय सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार ऋषि सत्संग के हेतु बद्रिकाश्रम आए, उस समय वहाँ उन्होंने नारदजी को आते देखा, वह ऋषि नारद से बोले - हे नारद ! तुम उदास दिखाई दे रहे हो इसका क्या कारण है ? नारदजी कहने लगे — हे प्रभु ! मैं मृत्यु लोक का विचरण करके आया हूँ वहाँ मैंने सबको रोग, शोक तथा धन आदि से दुःखी देखा, अधर्मी बढ़ रहे हैं, धर्मधारी बहुत दुःखी हैं । जब मैं भ्रमण करता हुआ मथुरा में जमुना तट पर आया तो वहाँ मैंने देखा कि एक सुन्दर युवा स्त्री बहुत दुःखी बैठी हुई हैं, अनेकों स्त्रियाँ उसे घेर कर बैठी हैं और दो वृद्ध पुरुष वहाँ मूर्छित पड़े हुए हैं , मैंने उस स्त्री से जाकर पूछा कि तुम सब कौन हो ? और किस कारण दुःखी हो ? तो वह स्त्री रोकर कहने लगी , ये अचेत पड़े हुए दोनों मेरे पुत्र हैं इनका नाम ज्ञान और वैराग्य है, मैं इनकी माता भक्ति हूँ और पास में बैठी हुई ये स्त्रियाँ गंगा आदि पवित्र नदियाँ हैं जो मेरी सेवा करने को साथ रहती हैं, मैं द्रविड़ देश में उत्पन्न होकर कर्नाटक में बड़ी हुई, युवावस्था में दक्षिण में रही तथा महाराष्ट्र और गुजरात में आते आते वृद्ध हो गई । अब मैं यहाँ आकर पुनः युवा हो गई हूँ परन्तु मेरे ये पुत्र वृद्ध तथा अचेत पड़े हुए हैं, मैं इन्हीं के दुःख से इतनी दुखी हो रही हूँ क्योंकि माता युवा और पुत्र वृद्ध, यह तो संसार में उल्टा काम है ।

नारद जी ने भक्ति से कहा कि इस समय कलयुग के प्रभाव से सब स्वार्थी हो गये हैं, ज्ञान और वैराग्य में अब कोई श्रद्धा नहीं रखता इसी कारण तुम्हारे पुत्रों की यह दशा हुई है, परन्तु यह ब्रज है यहाँ भगवान सदैव वास करते हैं , इस कारण यहाँ भक्ति भी है जो तुम्हारा सम्मान करते हैं, इसी कारण तुम यहाँ आकर वृद्ध से तरुण हो गई हो, अब अपने हृदय की चिन्ता को त्यागो, इस क्षेत्र के निवासी कलयुग में भक्ति का त्याग नहीं करेंगे ।

नारद जी के वचनों को सुनकर भक्ति बोली कि राजा परीक्षित तो बहुत बलवान थे उन्होंने इस दुष्ट कलयुग का संहार क्यों नहीं किया ? यह सुनकर नारदजी बोले — हे भक्ति सुनो ! जब गौ रूप पृथ्वी और वृषभ रूप धर्म को, कलियुग मारता हुआ आ रहा था तो उसे देखकर क्रोधित हो राजा ने कलियुग को ललकारा तो कलियुग राजा परीक्षित की शरण में आ गया, शरणागत को मारना पाप समझकर राजा ने उसे नहीं मारा । दूसरी बात यह है कि कलियुग में बुराइयाँ होते हुए भी एक बात सबसे अच्छी है कि अन्य युगों में जप, तप और समाधियों द्वारा भी जो फल प्राप्त नहीं होता वह कलियुग में भक्ति से भगवान का नाम लेने से ही प्राप्त हो जाता है, परन्तु कलियुग के प्रभाव से पीड़ित आदि लोभी होकर भक्ति का प्रचार न कर अपने स्वार्थ से कथा कीर्तन का धन्धा बनाकर बैठे हैं, इसी कारण सब दुःख भोग रहे हैं, इसी कारण किसी पर विश्वास न करने से जप, तप, यज्ञ तथा तीर्थों का सार समाप्त हो गया, जब सब लोग भक्ति पूर्वक भगवान का स्मरण करेंगे तब सब दुःख दूर हो जायेंगे ।

नारद जी के वचनों को सुनकर भक्ति बोली - आपका दर्शन ही सब सुखों को देने वाला है, आप हमारे पुत्रों को स्वस्थ करने की कृपा कीजिए ।

नारदजी कहने लगे — भगवान् श्री कृष्ण के चरण कमलों का ध्यान करने से तुम्हारा सब दुःख दूर हो जायेगा, तुम भगवान को बहुत प्रिय हो, तुम्हारे कारण तो भगवान नीच जनों के भी अनुकूल होकर उन्हें दर्शन देते हैं , सत्युग में ज्ञान और वैराग्य से मुक्ति प्राप्त होती थी परन्तु कलियुग में भक्ति ही मुक्ति को देने वाली है ।जब भगवान ने तुम्हें बनाया था और तुमने उनसे आज्ञा माँगी थी कि मैं क्या करूँ , तो भगवान ने भक्तों को शुद्ध करने की आज्ञा दी थी , तुम्हारे स्वीकार करने पर भगवान ने तुम्हें ज्ञान, वैराग्य नाम के सेवक और मुक्ति सेविका के रूप में प्रदान की थी ।

तुम्हारा निवास स्थान तो बैकुण्ठ है परन्तु भक्तों का पोषण करने के लिए तुम ज्ञान एवं वैराग्य और मुक्ति के सहित पृथ्वी पर रहती हो, कलयुग में मुक्ति तुम्हारा साथ छोड़ कर बैकुण्ठ को चली गई अब तुम्हारे याद करने पर वह तुम्हारे सामने उपस्थित होती है, ज्ञान और वैराग्य होने पर वह तुम्हारे सामने उपस्थित होती है, ज्ञान वैराग्य के साथ तुम पृथ्वी पर रह रही हो, जब दुराचारों ने तुम्हें त्याग दिया तभी तुम्हारे यह दोनों पुत्र ज्ञान एवं वैराग्य वृद्ध और तुम अचेत हो जाओगी, नारद जी का उपदेश सुन भक्ति पुष्ट हो गई और नारद जी से विनय पूर्वक बोली — आपने मुझे पुष्ट कर दिया अब मेरे पुत्रों को सचेत करने की कृपा कीजिए ।

नारद जी जब उन्हें हाथ से स्पर्श कर उठाने लगे परन्तु तब वह नहीं उठे तो नारद जी ने उनके कान पर मुख रखकर जोर से आवाज दी, तब भी न उठने पर वेद वेदान्त के शब्दों से जगाया, तब वह सचेत हुए और बलपूर्वक उठाने से उठकर खड़े होकर फिर गिर पड़े । यह देखकर नारद जी विस्मित हो भगवान विष्णु का स्मरण करने लगे, उस समय आकाशवाणी हुई कि हे मुनिवर ! साहस के साथ परिश्रम करो । जब तुम्हें सन्त जन मिलेंगे और उपदेश करेंगे तब ज्ञान वैराग्य मुक्ति सहित पुष्ट होंगे, आकाशवाणी सुनकर नारदजी भक्ति को धीरज बंधाकर सन्तजनो की खोज में निकले , बहुत खोजने पर भी उन्हें ऐसे सन्त न मिले, जो इच्छा पूर्ण कर सकें । तब नारद बद्रिकाश्रम गए, वहीं पर कोटिभानु समप्रकाशित सनकादि ऋषियों ने नारद जी को दर्शन दिया । तब नारद जी उनसे विनय पूर्वक कहने लगे — आप सर्वशक्तिमान तथा सर्वज्ञ हैं, कृपा करके ऐसा उपाय बतलावें जिस से भक्ति, ज्ञान और वैराग्य को सुख प्राप्त हो और उनका स्थापन हो सके ।


नारद जी के वचनों को सुनकर सनत्कुमार कहने लगे — हे नारद ! तुम सर्व हितकारी हो, इस कारण तुम यह काम अवश्य कर सकते हो, मैं तुम्हें उपाय बताता हूँ । जिस श्रीमद् भागवत को शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को सुनाया था अब उसी भागवत के सुनने से भक्ति एवं ज्ञान और वैराग्य को शक्ति प्राप्त होगी । कलियुग में सर्व दुःखो का नाश करने वाला श्रीमद् भागवत कथा ही हैं ।

नारद जी कहने लगे कि जब वेद वेदान्त के द्वारा ज्ञान एवं वैराग्य पुष्ट नहीं हो सके तो श्रीमद् भागवत में ऐसी क्या विशेषता है ?

इतना सुनकर सनत्कुमार कहने लगे कि व्यास जी मोहित हुए थे तब तुमने उन्हें ब्रह्मा जी द्वारा सुनी हुई चतुःश्लोकी भागवत सुनाई जिससे उनका मोह दूर हुआ था और व्यास जी ने वेद, वेदान्त, शास्त्र और गीता आदि का सार लेकर श्रीमद् भागवत की रचना की थी । इस कारण श्रीमद् भागवत सबसे उत्तम है और उसी के द्वारा भक्ति, ज्ञान और वैराग्य अवश्य सचेत हो जायेंगे आप ऐसा ही करें ।

सनत्कुमार बोले — गंगा के तट पर हरिहर के निकट भागवत कहना उचित है, वहीं भक्ति एवं वैराग्य और ज्ञान को बुला लीजिए । मुनियों की आज्ञा पाकर नारद जी आनन्दित हो मुनियों सहित नियत स्थान पर पधारे । श्रीमद् भागवत रूपी अमृत कथा को पान करने के लिए ऋषि, मुनि, तीर्थ, नदी, भक्तजन आदि पधारे ।

नारद जी ने इस ज्ञान यज्ञ की दीक्षा ले सनत्कुमार को आसन देकर ज्ञान यज्ञ आरम्भ कर दिया । सनत्कुमार जी ने शुकदेव एवं परीक्षित सम्वाद रूपी श्रीमद् भागवत के बारह स्कन्धों के अठारह सहस्त्र श्लोक सबको सुनाये, देवता विमान पर बैठकर अम्बर से फूलों की वर्षा करने लगे, यह श्रीमद् भागवत कथा सात दिन में पूर्ण रूप से सुनी जाती है ।

अन्य युगों में जो फल जप एवं तप एवं यज्ञों द्वारा प्राप्त होता था कलियुग में वह फल श्रीमद् भागवत की सात दिन की कथा से प्राप्त होता है । श्रीमद् भागवत में सब दुःख, सब पापों को दूर करके सब प्रकार के सुखों को प्रदान करने वाली शक्ति है । जो श्रीमद् भागवत को श्रवण करता है, भक्ति उसके हृदय में निवास करती हैं । धनी तथा निर्धन सब इसका एक समान लाभ प्राप्त कर सकते हैं । जहाँ भक्ति होती है वहाँ भगवान् भी होते हैं । श्रीमद् भागवत की कथा सब प्रकार के दुःखों को दूर कर नव संचार करने वाली तथा मुक्ति को देने वाली है ।


जब श्रीमद् भागवत की कथा आरम्भ हुई उस समय सबके हृदय शुद्ध हो गए और स्वयं भगवान ने सबके हृदय में आकर प्रवेश किया, उस समय नारद जी बोले — हे मुनीश्वरों ! सप्ताह यज्ञ से कौन - कौन से लोग पवित्र होते हैं यह बताइये । 

इतना सुनकर सनत्कुमार कहने लगे — हे नारद ! पाखंडी, घमंडी, पापी, दुराचारी, माता, पिता के दोषी, कामी, क्रोधी सभी प्रकार के पापी जब श्रीमद् भागवत को सुनकर पवित्र हो जाया करते हैं । मैं एक पुरातन इतिहास वर्णन करता हूँ, सो सुनो। तुंगभद्रा नदी के तट पर सर्वोत्तम नगर में आत्मदेव नाम का एक विद्वान ब्राह्मण रहता था उसकी पत्नी का नाम धुंधली था जो कलह करने वाली तथा दुष्ट स्वभाव की थी । उनके कोई संतान नहीं थी । आत्मदेव इस कारण रात दिन दुःखी रहता था । एक दिन वह इसी दुःख में घर त्याग कर वन को चला गया । प्यास से दुःखी होकर एक तालाब पर जल पीने के लिए बैठ गया । वहाँ एक संन्यासी ने भी आकर जल पान किया । आत्मदेव दुःखी होकर उस के चरणों पर गिरकर विनय करने लगा कि हे प्रभु ! मेरे कोई संतान नहीं है, इस कारण मुझे समाज में अपमानित होना पड़ता है, मैं बहुत दुःखी हूँ मेरे ऊपर आप कृपा करें ।

संन्यासी ने ध्यान लगाकर कहा —पुत्र तो तुम्हारे भाग्य में है नहीं । यह सुन आत्मदेव आत्म - हत्या को तैयार हो गया, यह देख संन्यासी को दया आई और उसने एक फल देकर कहा कि इसे अपनी पत्नी को खिला देना । जिससे उसके सन्तान हो जायेगी । इतना कहकर संन्यासी चला गया । वह ब्राह्मण फल लेकर प्रसन्न होता हुआ अपने घर आया और अपनी पत्नी धुंधली को फल देकर कहने लगा कि यह मुझे एक संन्यासी से प्राप्त हुआ है, इस के खाने से पुत्र सुख होगा, फल देकर आत्मदेव कहीं बाहर चला गया, उसकी पत्नी ने फल ले तो लिया परन्तु खाया नहीं, वह अपनी सहेली से कहने लगी कि गर्भ धारण करने की परेशानियों से तो मेरा बाँझ रहना ही अच्छा है । यह सोचकर उसने फल नहीं खाया और गाय को खिला दिया और अपने पति से कह दिया कि मैंने खा लिया ।

कुछ दिन में उसकी बहन आई तो उसने उसे सब हाल सुनाया, बहन कहने लगी कि मेरे जो पुत्र होगा वह मैं तुम्हें दे दूँगी, बदले में तुम मुझे कुछ धन दे देना, मैं तुम्हारे बालक का पोषण भी कर जाया करूँगी , कुछ दिन बाद उसकी बहन के पुत्र उत्पन्न हुआ तो वह उसने धुंधली को दिया, धुंधली ने अपने पति से कहा कि मेरे पुत्र उत्पन्न हुआ है , यह सुनकर आत्मदेव प्रसन्न हुआ तो उसकी पत्नी कहने लगी । मेरे दूध की कमी है, मेरी बहन का पुत्र मर चुका है उसे बुला लें । वह दूध पिलाकर पालन पोषण करेगी । ब्राह्मण ने यह बात मान ली, धुंधली ने अपनी बहन को बुला लिया और वह उस पुत्र का पालन पोषण करने लगी। पुत्र का नाम संस्कार करके उसका नाम धुंधकारी रखा गया ।

धुंधकारी बड़े दुष्ट स्वभाव का था, वह वेश्यागामी हुआ, उसने सब धन वेश्याओं को दे दिया , यह देखकर आत्मदेव बहुत दुःखी हुआ और आत्मघात को तैयार हुआ, गौकर्ण ने उन्हें समझाया कि मोह त्याग भगवान का भजन करो । 

श्रीमद् भागवत के दसवें स्कन्ध का पाठ करो । जिससे आपका परलोक बने, यह सुनकर आत्मदेव वन को चला गया और भक्तिपूर्वक भागवत के दसवें स्कन्ध का पाठ करने लगा और भगवान को प्राप्त हुआ ।

सूतजी कहने लगे — हे ऋषियों ! पिता की मृत्यु के बाद धुंधकारी ने अपनी माता को बहुत कष्ट दिया , मार पीट कर सब धन छीन लिया जिससे दुःखी होकर वह कुएँ में गिरकर मर गई ।

धुंधकारी अपने घर में पाँच वेश्याओं को लाकर रहने लगा, जब सब धन समाप्त हो गया तो वह चोरी करके बहुत धन ले आया, एक दिन वेश्याओं ने सलाह करके धुंधकारी को रस्सियों से बाँधकर उसके मुँह पर आग के अंगारे रखकर उसे जलाकर मार डाला और घर में गड्ढा खोदकर गाड़ दिया और सब धन लेकर भाग गईं । धुंधकारी इस प्रकार मृत्यु को प्राप्त होकर एक बड़ा प्रेत हुआ जो क्षुधा व प्यास से दुःखी होकर वायु भक्षण कर विचरता रहता था ।


जब गौकर्ण एक दिन सो रहे थे कि आधी रात के समय उन्हें एक भयंकर आकृति का प्रेत दिखाई दिया, जब आवाज देने पर भी वह नहीं बोला तो गौकर्ण ने पानी को अभिमंत्रित करके उस पर जल के छींटे मारे तब उस प्रेत की आवाज निकली और बोला ।

मैं तुम्हारा भाई धुंधकारी हूँ , मुझे वेश्याओं ने रस्सियों से बाँध कर जलाकर मारा इस कारण मैं बहुत भयंकर प्रेत हो गया हूँ , मैं बहुत दुखी हूँ , मुझे इस योनि से बचाओ, ये सुनकर गौकर्ण विस्मित होकर कहने लगे कि मैंने गया में तुम्हारे पिण्ड दिए थे , तब भी मुक्ति नहीं हुई, अब धीरज धरो, तुम्हारी मुक्ति का उपाय करूँगा । गौकर्ण ने सूर्य की प्रार्थना की, तब सूर्य नारायण ने कहा कि इसे प्रेत योनि से मुक्त करने के लिए श्रीमद् भागवत का सप्ताह यज्ञ करो ।

गौकर्ण ने सूर्य के वचनों को मानकर सप्ताह यज्ञ आरम्भ किया । उस में बहुत नर नारी आए। धुंधकारी सात गाँठ के बाँस में आकर बैठ गया, पहला दिन पाठ के अन्त में बाँस की एक गाँठ फट गई , दूसरे दिन दूसरी गाँठ , इसी प्रकार सातवें दिन सप्ताह की समाप्ति पर सातवीं गाँठ बाँस की फट गई और उस में से भगवान श्री कृष्ण का रूप धारण किये हुए , वह धुंधकारी प्रकट होकर गौकर्ण को प्रणाम कर कहने लगा कि तुम्हारी कृपा से मैं आज प्रेत योनि से मुक्त हो गया । उस समय भगवान का पार्षद विमान लेकर आया और उस में धुंधकारी को बिठाया ।


गौकर्ण ने पार्षद से कहा कि यहाँ तो भागवत की कथा सुनने वाले बहुत नर नारी थे, विमान अकेले धुंधकारी को क्यों लेने आया ? पार्षद बोले कि सब ने श्रीमद् भागवत को भक्ति पूर्वक नहीं सुना , धुंधकारी ने भक्तिपूर्वक ध्यान लगाकर सुना । इस कारण यह भगवान को प्राप्त हुआ ।

गौकर्ण ने जब दूसरी बार सावन मास में श्रीमद् भागवत यज्ञ किया तब सब नारियों तथा पुरुषों ने प्रेम से कथामृत पान किया , इस कारण भगवान द्वारा अनेकों विमान वहाँ आये और सब नर नारी श्रीमद् भागवत के श्रवण करने से श्रीकृष्ण के रूप को धारण कर के भगवान को प्राप्त हो गए ।