।। ॐ तीसरा स्कन्द प्रारम्भ ॐ ।।

।। परीक्षित जी द्वारा भगवान मैत्रेय और विदुर जी का सत्संग वर्णन ।।


परीक्षित कहते हैं — हे प्रभो ! भगवान मैत्रेय और विदुरजी का सत्संग कहाँ हुआ, और किस समय सम्वाद हुआ, सो हमसे कहिये । शुकदेवजी बोले — हे राजन् ! जिस समय राज्य माँगने पर भी धृतराष्ट्र ने भाग नहीं दिया और जिस श्रीकृष्ण के सभा के बीच कहे वचनों को राजा धृतराष्ट्र ने नहीं माना। जिस समय धृतराष्ट्र ने अपने घर विदुरजी को सम्मति पूछने को बुलाया, तब जो सम्मति विदुरजी ने प्रकट की उन वाक्यों को आज कल 'विदुर नीति' नाम से जानते हैं। 

विदुरजी ने कहा कि युधिष्ठिर के भाग को तुम दे दो। पाण्डवों के पक्षधर श्रीकृष्ण भगवान हैं। विदुरजी के नीति वचन सुनकर दुर्योधन के होठ फड़कने लगे और कर्ण, दुःशासन, शकुनी सहित दुर्योधन ने विदुरजी का अनादर करके कहा— "इस कपटी को यहाँ किसने बुलाया है ? यह दासी पुत्र हमारे टुकड़े से पला हुआ हमारे विरुद्ध होकर हमारे शत्रुओं की कुशल चाहता है। इस अमंगलीय को हस्तिनापुर से बाहर निकाल दो, ये पास रखने योग्य नहीं है।" दुर्योधनादि के ऐसे कठोर वचनों से बाधित होकर विदुरजी ने उनके कहे को सुनकर मन में किंचित भी व्यथा नहीं मानी। अपने धनुष को द्वार पर रखकर, घर पर छोड़ तीर्थ-यात्रा को चल दिये। 

जहाँ-जहाँ ब्रह्मा, शिव आदि अनेक रूप धरके पृथ्वी पर अनेक स्थानों में सहस्त्रमूर्ति भगवान विराजमान है तहाँ तीर्थ नाम से प्रसिद्ध जो स्थान हैं उन सबों में महात्मा विदुरजी विचरने लगे। इस प्रकार घूमते हुए विदुरजी प्रभास क्षेत्र में पहुँचे। प्रभास क्षेत्र में सरस्वती के समीप ग्यारह तीर्थ हैं। 

ब्रह्मा, विष्णु, शुक्राचार्य मन्दिर, मनु स्थान, पृथु भवन, अग्नि-कुण्ड तथा असित देवल ऋषि का स्थान, वायु-स्थान, सुदास का तीर्थ, गौशाला, स्वामीकार्तिक का मन्दिर, श्रद्धादेव, मनुसभा, इन सब स्थानों में विदुरजी कुछ दिन रहे। अनन्तर यमुनाजी के समीप आये तहाँ श्रीकृष्ण का बैकुण्ठ-गमन देखकर उद्धव जी आये थे। सो दोनों का समागम हुआ। उद्धवजी को विदुर बड़े प्रेम से हृदय लगाकर मिले और श्रीकृष्ण के कुटुम्ब व अपने बन्धु-जनों की कुशलता पूछी। 

विदुरजी ने पूछा - ब्रह्मा की सेवा से प्रसन्न हो जिसने अवतार लिया ऐसे श्रीकृष्ण तथा बलराम पृथ्वी के भार का हरण करके कुशलपूर्वक हैं ? हमारे परम- मित्र पूजनीय श्री वासुदेवजी, प्रद्युम्नजी, सात्यकी, श्री अक्रूरजी, देवकी, अनिरुद्ध जी, सत्यभामा के पुत्र चारुदेष्ण, गण आदि तो कुशल हैं ? क्या धर्म की रक्षा धर्मावतार युधिष्ठिरजी करते हैं ? जिसके चरण की धमक रण-भूमि नहीं सह सकती ऐसे भीमसेन तो कुशल हैं ? गाण्डीव धनुषधारी अर्जुन जी प्रसन्न हैं और माद्री के पुत्र सुखी तो हैं ? अहो कुन्ती की कुशल तो क्या पूछें ? जो अपने प्राणपति राजर्षि पांडु के बिना केवल पुत्रों की रक्षा की निमित्त जीती है। 

हे उद्धव ! धृतराष्ट्र का हमको बड़ा शोक है कि वह नरक में गिरेगा। जिसने मरे हुए अपने भाई पांडु से द्रोह किया और अपने पुत्रों के अधीन होकर मुझको भी नरक से निकाल दिया। मैं तो हरि की कृपा से अपने रूप को छिपाकर पृथ्वी पर विचर रहा हूँ। हे सखे ! शरणागत आये हुए सम्पूर्ण लोकपालों व अपकी आज्ञा में स्थितजनों के अर्थात् यदुवंश में जन्म लिये और तीर्थरूप पवित्र कीर्ति है जिनकी, ऐसे श्रीकृष्णचन्द्र भगवान की कृपाकर वार्ता कहो ।

।। उद्धव द्वारा भगवान का बाल चरित्र वर्णन ।।

श्रीशुकदेवजी कहने लगे - श्रीकृष्ण के विरह का स्मरण करके गद् -गद् कण्ठ हो जाने से उद्धवजी कुछ उत्तर न दे सके। नेत्रों को पोंछकर उद्धवजी बोले- कृष्णरूप सूर्य अस्त होने पर कालरूप अजगर से ग्रसे हुए शोभाहीन यादवों के गृहों की मैं क्या कुशल कहूँ ? यह लोग मन्दभाग्य हैं और यादव तो बड़े ही भाग्यहीन हैं। खेद की बात है कि जिस पूतना ने विष समान दूध पिलाया उस दुष्टा को भी यशोदा मैया के समान जान उत्तम गति दी। 

मैं बैर भाव से श्रीकृष्ण में अपना मन लगाने वाले असुरों को भी परम भागवत मानता हूँ, जो संग्राम में गरुड़ पर चढ़े हुए सुदर्शन-चक्रधारी भगवान का दर्शन करते हुए परमधाम को गये। कंस के भेजे हुए राक्षसों को लीलामात्र से ऐसे नष्ट कर दिया जैसे मिट्टी के खिलौने को बालक तोड़ देते हैं। 

विषपान से मरे हुए गोप और गौओं को जिवाया, कालीदह में जाकर कालिया नाग को नाथकर यमुना जल को निर्मल किया। प्रभु जी ने नन्दजी से गौओं की पूजा के अर्थ अनेक सामग्री सहित गोवर्धन पर्वत पुजवाया। इन्द्र से ब्रज की रक्षा की। शरद् पूर्णिमा की सुन्दर रात्रियों में गोपियों के साथ रासलीला की।

।। श्रीकृष्ण द्वारा कंस वध और माता पिता का उद्धार ।।

उद्धवजी ने कहा- श्रीकृष्ण ने बलदेव सहित मथुरा में आकर अपने पिता को छुड़ाने की इच्छा से रंग-भूमि में जा कंस को संहारा। राजा भीष्मक की कन्या रुक्मिणी जी का हरण किया। सात बैलों को एक साथ नथ कर नग्नजित की सत्या नामक कन्या को विवाहा। सत्यभामा को प्रसन्न करने के लिए मूल सहित कल्प वृक्ष उखाड़ लाये । भौमासुर को मार डाला और हरण करके लाई हुई सोलह हजार एक सौ राजकन्याओं का पाणिग्रहण किया। 

अपनी माया से अपने स्वरूप को अनेक करने की इच्छा से एक- एक रानी में अपने समान गुण वाले दस-दस पुत्रों को उत्पन्न किया। कालयवन, जरासन्ध, शाल्व आदि को भीमसेन, मुचकुन्दादिकों के द्वारा नाश कराया। फिर शम्बर, द्विविद, बाणासुर, मुर, बल्वल और अन्य दन्तवक्र आदि असुरों में से किसी को स्वयं मारा किसी को प्रद्युम्न, बलराम आदि द्वारा वध कराया। 

तुम्हारे भाई धृतराष्ट्र और पाण्डु के पक्षपाती राजाओं की सेनाओं को कुरुक्षेत्र की भूमि में दुर्योधन सहित नाश किया। श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से अश्वमेध यज्ञ कराये। साँख्य शास्त्र में चित्त लगाया। आसक्ति रहित होकर, विषयों के धर्म-कर्म का सेवन किया। सुन्दर स्नेहयुक्त और अमृतमय वाणी से, इस लोक तथा उस लोक को आनन्दित करके, यादवों को अतिशय रमण कराते आपने आप को भी सहस्त्रों स्त्रियों के साथ आनन्दपूर्वक विहार करते रहे। 

बहुत वर्षों तक रमण करते हुए भगवान को गृहस्थाश्रम में वैराग्य उत्पन्न हुआ। एक समय भगवान की इच्छा से यदुवंशियों के बालकों ने खेल करते - करते मुनि की हंसी करी। तब दुर्वासादि मुनियों ने कोप करके शाप दिया। कुछ महीने व्यतीत होने पर यादव दैव से विमोहित हो प्रभास-क्षेत्र गये। वहाँ स्नान करके उसी के जल से पितर देव और ऋषियों का तर्पण किया, तदनन्तर ब्राह्मणों को बहुत दान दिये।

।। विदुर का मैत्रेय के पास जाना ।।

उद्धवजी कहने लगे-यादव ब्राह्मणों से आज्ञा ले भोजन कर और आरुणी पीकर आपस में गाली देने लगे। सूर्योस्त के समय परस्पर युद्ध होने लगा। मुनि की शापग्नि से वे यादव परस्पर लड़कर नष्ट हो गए। 

श्रीकृष्ण अपनी योगमाया की गति को देखकर सरस्वती नदी में आचमन करके एक पीपल के वृक्ष की जड़ में विराजमान हुए और हमसे कहा कि तुम बदरिकाश्रम जाओ । उस समय परम भगवत मैत्रेयजी लोक में विचरते-विचरते वहाँ आ पहुँचे। तब मैत्रेय को आया हुआ देखकर श्रीकृष्ण मुझसे बोले-हे साधो ! हमारी कृपा से यह तुम्हारा अन्तिम जन्म है, अब आगे पुनर्जन्म नहीं होगा। फिर अपनी भक्ति का उपदेश किया। तब मुझे आत्म-तत्व का ज्ञान हुआ।

इस प्रकार उद्धव जी के मुख से अपने सृहृद, बान्धवों का दुःसह वध सुनकर विदुरजी शोक से संतप्त हो गये, पीछे अपने ज्ञान से उस शोक को शांत किया। श्रीकृष्ण के परिवार का विध्वंस सुनकर विदुरजी उद्धव को बदरिकाश्रम को जाता देख उनसे बोले- हे उद्धव ! परमज्ञान जो योगेश्वर कृष्ण ने तुमसे कहा वह ज्ञान तुम हमसे कहो । 

यह सुन उद्धवजी बोले- हे विदुर! यदि तुम उस तत्व को जानना चाहते हो तो मैत्रेय की ही आराधना करो वही तुमको उपदेश करेंगे और मेरे समक्ष तुम्हारे लिए ज्ञानोपदेश करने को भगवान ने मैत्रेय को आज्ञा भी दी थी। 

श्री शुकदेवजी बोले- उद्धवजी ने उस रात्रि यमुना जी के किनारे निवास किया। प्रातःकाल वहाँ से उद्धवजी बदरिकाश्रम को चले गए। इतनी कथा सुनकर परीक्षित बोले— जब ब्रह्मशाप से यदुवंशियों में मुख्य सब नष्ट हो गये और तीनों लोक से स्वामी हरि भगवान ने भी इसी शाप के कारण से शरीर छोड़ दिया तो फिर उद्धवजी कैसे बचे रहे ? यह सुन श्री शुकदेवजी बोले – श्रीकृष्ण ने अपने कुल का संहार करा, तन त्यागने के समय विचार किया कि जब मैं इस लोक से चला जाऊँगा, तो उद्धवजी ही इस ज्ञान को धारण कर सकता है, 

क्योंकि उद्धव सब प्रकार से हमारे ही समान हैं। इसलिए उद्धव ज्ञान का उपदेश करता हुआ यहीं रहेगा। हे कुरुश्रेष्ठ ! विदुरजी ने जब विचारा कि प्रभु ने निज - धाम पधारते समय मन से मेरा स्मरण किया तब प्रेम से विह्वल होकर वे रोने लगे। हे राजन् ! उद्धवजी के जाने के पश्चात् विदुरजी गंगाजी के तट पर पहुँचे जहाँ मैत्रेय मुनि विराजमान थे।

।।मैत्रेयजी द्वारा भगवान की लीला का वर्णन।।

श्रीशुकदेवजी कहने लगे - हे राजन् ! विदुरजी ने हरिद्वार में जाकर श्रीमैत्रेय को प्रणाम कर उनसे पूछा- सम्पूर्ण लोक सुख के लिए अनेक कर्म करता है, परन्तु उन कर्मों से न तो सुख मिलता है और न दुःख की निवृत्ति होती है। इसलिए जो करने योग्य उपाय हैं सो आप हमसे कहिये । भगवान अवतार धारण करके जिन कर्मों को करते हैं, वे मुझसे कहिये। 

तब मैत्रेयजी बोले- हे विदुर ! संसार के जीवों पर अनुग्रह कर तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया। माण्डव मुनि के शाप से तुम यम भुजिष्या दासी में व्यासजी के वीर्य से उत्पन्न हुए हो। हे विदुर ! अब मैं उत्पत्ति, स्थति और संहार का वर्णन तुम्हारे आगे करता हूँ। इस जगत की रचना के पूर्व भगवान एक ही था। द्रष्टा या दृश्य जो कुछ था सो वही था। जब भगवान ने कुछ नहीं देखा तब इच्छा हुई कि अनेक रूप होकर अपने को देखें। 

परमात्मा की जो कारणरूपिणी महाशक्ति है उसी का नाम माया कहा है। उस माया से परमात्मा ने सृष्टि को रचा। माया में अपना वंश धारण करके परमात्मा ने चिदाभास रूप वीर्य धारण किया। उस माया से महत्तत्व उत्पन्न हुआ, वो महत्तत्व अज्ञान का नाश करने वाला और विज्ञान स्वरूप आत्मा है। 

उसने अपने शरीर में विश्व को प्रकट किया, सो महत्तत्व भी चिदाभास, गुणकाल के आधीन होकर भगवान के सम्मुख होकर अपनी आत्मा का रूपान्तर करने लगा। जब महत्तत्व विकार को प्राप्त हुआ तब उसमें अहंकार उत्पन्न हुआ। जो कार्य, कारण, कर्त्ता, पंचभूत, इन्द्रिय, मनोमय रूप हुआ। 

अहंकार, वैकारिक, तैजस, तामस भेदों से तीन प्रकार का हुआ। वैकारिक अहंकार से ज्ञानेन्द्रिय उत्पन्न हुई और तामस अहंकार से शब्द उत्पन्न हुआ। शब्द से आकाश उत्पन्न हुआ। आकाश को ब्रह्मा का स्वरूप कहते हैं। आकाश से स्पर्श उत्पन्न हुआ, स्पर्श के विकार से वायु उत्पन्न हुआ। जब वायु विकार को प्राप्त हुआ तब रूप तन्मात्रा का प्रादुर्भाव हुआ, जो ज्योति की नेत्र रूप हैं। 

पवन सहित ज्योति जब विकार को प्राप्त हुई, तब रसमय जल उत्पन्न हुआ। जल ने विकार को प्राप्त होकर गंधगुण वाली पृथ्वी को उत्पन्न किया। 

हे विदुर! आकाश आदि पंचमहाभूतों में जो प्रवर-अधर हैं उनके गुणों को जानो। आकाश का गुण शब्द, उनके गुण स्पर्श, रूप, रस और गन्ध पाँचों गुण निश्चय किए जाते हैं। जब तत्वाभिमानी देवता इस ब्रह्माण्ड की रचना करने में समर्थ न हुए तब हाथ जोड़कर परमात्मा की स्तुति करने लगे। 

देवता बोले- हे देव! तुम्हारे चरण कमलों को हम नमस्कार करते हैं, जिन चरणों से श्रीगंगाजी निकलीं, जिनका जल पापों का नाश करने वाला है, जो नदियों में श्रेष्ठ हैं, उन श्री भागीरथी के स्थान आपके चरण कमल की हम शरणागत हैं। वेद आप से उत्पन्न होकर सर्वत्र विचरते हुए आप ही में प्रवेश करते हैं। 

हे जगन्नाथ! सामग्री सहित इस अनित्य शरीर और घर में यह मैं हूँ, यह मेरा है, ऐसा है दुराग्रह जिनका, ऐसे कुटिल और कुमति वाले मनुष्यों के हृदय में बसते हुए भी तुम्हारे चरणकमल दुर्लभ हैं, उन चरणारविंदों का हम भजन करते हैं। हे अनादि पुरुष! लोकों की रचना के अर्थ आपने सत्वादि गुणों से हम लोगों को रचा है, सो हम सब पृथक होने के कारण ब्रह्माण्ड रचने में समर्थ नहीं है। आप हमको अपनी शक्ति और ज्ञान दीजिए जिससे हम संसार रचने में समर्थ हों।

।। विराट मूर्ति की सृष्टि ।।

मैत्रेय ऋषि कहने लगे - इस प्रकार पृथक रूप से स्थिर होने वाली उन अपनी शक्तियों को जानकर भगवान कालसंज्ञा, शक्ति को धारण करके तेईस तत्वों के समूह में अन्तर्यामी रूप से एक साथ प्रविष्ट हुए। तत्वात्मक गुण में प्रवेश कर भगवान ने भिन्न- भिन्न तत्वों के गुणों को मिला दिया। तेईस तत्वों वाले गुणों से परमेश्वर ने विराट शरीर को प्रकट किया। 

तब विश्व को रचने वाला यह तत्व गुण परस्पर एकत्र होकर शोभित हुआ, जिसमें ये सब लोक स्थित थे। यह विराट सम्पूर्ण जीवों का आत्मा और परमात्मा का अंश है। यह विराट अध्यात्म, अधिदेव, अधिभूत इन भेदों से तीन प्रकार, और प्राण भेद से इस प्रकार का, हृदयस्थित जीव भेद से एक प्रकार का है। 

तब ईश्वर ने तत्वों के विविध वृत्ति, लोभ के अर्थ अपने तेज से महत्तत्वादिकों को तापयुक्त किया। उस विराट के मुख से कितने ही स्थान विभिन्न देवताओं के प्रकट हुए। विराट का मुख उत्पन्न हुआ, उसमें अग्नि ने प्रवेश किया। अपनी वाणी के अंश से यह विराट देह कहने के योग्य हुआ। मुख अधिष्ठान हैं, अग्नि इन्द्रिय है, वाणी इन्द्रिय है, वचन विषय है। 

फिर विराट भगवान के तालु हुआ उसमें जिह्वा सहित वरुण ने प्रवेश किया जिससे स्वाद प्राप्त होता है। तदनन्तर नासिका उत्पन्न हुई उसमें घ्राण सहित अश्विनीकुमार ने प्रवेश किया। घ्राण से सुगन्धि की सिद्धि हुई। फिर नेत्र उत्पन्न हुए उनमें चक्षुइन्द्रिय सहित सूर्य प्रविष्ट हुए। चक्षु के ज्ञान से स्वरूपों की पहचान होती है। फिर शरीर का चर्म उत्पन्न हुआ उसमें प्राणइन्द्रिय सहित पवन ने प्रवेश किया। 

तब प्राण के अंश से इसका स्पर्श होने लगा। फिर कर्ण उत्पन्न हुए, तब दिशाओं ने उसमें प्रवेश किया तो श्रोत इन्द्रिय के अंश से शब्द की सिद्धि प्राप्त हुई। फिर त्वचा उत्पन्न हुई, उसमें इन्द्रिय ने साथ औषधि देवता ने प्रवेश किया। अनन्तर लिंग उत्पन्न हुआ, जहाँ वीर्य इन्द्रिय सहित प्रजापति ने प्रवेश किया। वीर्य के अंश से जीवात्मा आनन्द को प्राप्त होता है। फिर गुदा प्रकट हुई, उसमें वायु इन्द्रिय सहित मित्र ने प्रवेश किया। वायु के अंश से जीवात्मा मल त्याग करता है। फिर हाथ उत्पन्न हुए, उनमें इन्द्र ने क्रय विक्रय आदि इन्द्रियों के साथ प्रवेश किया। क्रय-विक्रय से जीवात्मा आजीविका को प्राप्त होता है। अनन्तर चरण उत्पन्न हुए, उनमें गति इन्द्रिय सहित विष्णु ने प्रवेश किया। फिर बुद्धि उत्पन्न हुई उसमें बोध सहित सरस्वती ने प्रवेश किया। 

बोधक अंश से संकल्प-विकल्प आदि क्रियाओं की प्राप्ति हुई। फिर हृदय उत्पन्न हुआ उसमें मन इन्द्रिय सहित चन्द्रमा प्रविष्ट हुआ। मन में जीवात्मा संकल्प-विकल्प को प्राप्त होता है। फिर अहंकार उत्पन्न हुआ, उसमें अहंवृत्ति इन्द्रियों सहित शिव ने प्रवेश किया। कर्मरूप अहंवृत्ति से जीवात्मा कर्त्तव्य कर्म को प्राप्त होता है। फिर सत्व उत्पन्न हुआ उसमें चित्त इन्द्रिय ब्रह्मा ने प्रवेश किया। चित्त के अंश से जीवात्मा विज्ञान को प्राप्त होता है। 

फिर विराट-भगवान के शिर से स्वर्ग, चरणों से पृथ्वी और नाभि से आकाश उत्पन्न हुआ। रजोगुण प्रभाव से व्यवहार करने वाले मनुष्य और गौ आदि पृथ्वी पर रहने लगे। तमोगुण स्वभाव वाले रुद्र के पार्षद, भूत, प्रेतगण अन्तरिक्ष में बस गये। हे राजन् ! भगवान के मुख से वेद उत्पन्न हुआ और भुजाओं से कर्म उत्पन्न हुआ।

।। विदुर के प्रश्न ।।

विदुर ने कहा- हे ब्रह्मन् ! चैतन्यस्वरूप भगवान की क्रियाओं और निर्गुण भगवान के गुणों का कैसे सम्बन्ध हो सकता है ? क्योंकि क्रीड़ा में उद्यम करना और क्रीड़ा करने की इच्छा करनी ये दोनों बात किसी दूसरे के होने से होती हैं। जो स्वयं और सदैव अन्य से निवृत्त है, उस ईश्वर को काम अर्थात् क्रीड़ा करने की कामना और इच्छा कैसे हुई ? भगवान ने अपनी माया से जगत को रचा है, उसी से पालन करते हैं फिर उसी से संहार करते हैं। 

जो परमात्मा नष्टज्ञान वाला नहीं होता, वह माया के साथ कैसे संयुक्त हो सकता है? एक भगवान सर्वव्यापकत्व भाव से सम्पूर्ण पूर्व से स्थित कैसे सम्भव हो सकता है ? हे विद्वान! इस अज्ञान में मेरा मन खेद को प्राप्त हो रहा है सो हमारे इस मोह को आप दूर करो। 

श्रीशुकदेवजी बोले- तत्व जानने की इच्छा से बोले विदुरजी ने यह बात मैत्रेय ऋषि से पूछी तब भगवद् भक्त मैत्रेय मुनि बोले- यही भगवान की माया है। जैसे स्वप्न में शिर कटे बिना ही स्वप्न देखने वाले को शिर कटना प्रतीत होता है पर जागने पर शिरच्छेदनादि मिथ्या जान लेता है इसी तरह आत्म स्वरूप ज्ञान से देहादि के बन्धनादि धर्म आत्मा में जो अनात्म का धर्म प्रेरित होता है सो निवृत्ति मार्ग के सेवन से धीरे-धीरे नष्ट हो जाता है। 

जब इन्द्रियों का दृष्टा आत्मा हरि में प्रवृत्त होता है तब सम्पूर्ण क्लेश लीन हो जाते हैं। जब भगवान के गुणानुवादों का सुनना सम्पूर्ण क्लेशों को नाश कर देता है, तो फिर भगवान के चरणारविन्दों की सेवा की प्रीति सब क्लेशों का नाश क्यों नहीं करते ? 

विदुर जी बोले- हे प्रभो ! आपके सुन्दर वचनों से हमारा संशय मिट गया। परन्तु हे भगवान ! अब हमारा मन बन्धन और मोक्ष में दौड़ता है। जीवात्मा बन्धन में हैं, और परमात्मा मोक्ष है, इसका समाधान कहो । विकार सहित महदादि तत्वों को क्रमपूर्वक रचकर उनसे विराट देह उत्पन्न करके उसमें परमात्मा को आदि पुरुष कहते हैं। 

जिसमें चार वर्ण हैं। उस विराट भगवान की विभूति हम से कहिये। जिन विभूतियों में अनेक प्रकार की आकृति वाली प्रजा उत्पन्न हुई। भगवान ने किन प्रजापतियों को रचा और सर्ग, अनुसर्ग, मनु और मन्वन्तर के अधिपति कौन-कौन रचे ? हे मुनि ! इनके वंश और वंश में होने वालों के चरित्र और पृथ्वी के ऊपर तथा नीचे जो लोक हैं उनको कहिये । उनकी रचना और परिमाण कहिये ।

।। ब्रह्मा का विष्णु दर्शन ।।

मैत्रेयजी बोले- हे विदुर! आपने जो लोकहित आकांक्षा से प्रश्न किए हैं उनके उत्तर में, मैं इसी भागवत कथा का वर्णन करता हूँ। जिस समय यह जगत महाप्रलय के जल में डूब गया उस समय शेषशय्या पर श्रीनारायण अकेले ही विराजमान थे। 

हजारों वर्ष जल में शयन करके भगवान अपनी कालरूपी शक्ति से सम्पूर्ण लोकों को अपने देह में लीन होते देखते, लोक रचना के लिए भगवान के अन्तर्गत जो अति सूक्ष्म रूप से स्थित था वह रजोगुण से विद्ध होकर नारायण की नाभिस्थान को भेदन करता हुआ कमल रूप में उत्पन्न हुआ, जो अपनी कान्ति से उस जल में सूर्य के समान प्रकाश करता था। 

वो श्रीनारायण की नाभि से उत्पन्न हुआ था इससे उस कमल को आत्मयोनि कहते हैं। उस लोकात्मक कमल में भगवान ने प्रवेश किया, तब उस कमल से ब्रह्मा उत्पन्न हुए, जिनको स्वयं ब्रह्म कहते हैं। ब्रह्माजी ने जब लोकों को नहीं देखा तब आकाश में नेत्र घुमाये। चारों दिशाओं की ओर देखने के लिए ब्रह्मा के चार मुख उत्पन्न हो गये। कमल पर विराजमान आदिदेव ब्रह्माजी ने न तो लोक तत्वरूप कमल को जाना, न अपने आपको जाना कि मैं कौन हूँ? तब ब्रह्माजी ने विचार किया कि यह कमल कहाँ से उत्पन्न हो गया ? नीचे तक है अथवा यहीं से उत्पन्न हुआ है? ब्रह्माजी इस प्रकार विचार करके कमल की नाल के भीतर प्रविष्ट हो गये। मगर ब्रह्माजी ने कमल की जड़ का ठिकाना नहीं पाया। तब ब्रह्माजी अपना मनोरथ पूर्ण न जानकर उलटे लौटकर अपने स्थान पर आकर समाधि लगा के योग में स्थित हो गये । सौ वर्ष योग करने से ब्रह्माजी को ज्ञान उत्पन्न हुआ और अपने हृदय के मध्य में उस प्रकाशित स्वरूप को देखा जिसको उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था। शेषशय्या पर शयन कर रहे भगवान का ब्रह्माजी ने दर्शन किया।

।। ब्रह्मा द्वारा भगवान का स्तवन ।।

ब्रह्माजी ने विनय की - हे भगवान् ! बहुत काल तप करने से मैंने आपको जाना है। हे भगवान् ! आपके स्वरूप से पृथक कुछ नहीं है और जो कुछ है सो शुद्ध नहीं है। हे परम ! मैं इस आपके स्वरूप की शरण हूँ । हे सम्पूर्ण संसार के सुहृद ! आप एक आत्म-तत्व, सत्व-गुण-रूप ईश्वर के द्वारा सब संसार को सुख देते हो वही दिव्य दृष्टि मुझको मिले, जो पूर्व की तरह इस जगत को रचूँ। 

हे स्वामिन् ! हमको इस जगत के रचने में प्रवृत्त करो। तदनन्तर भगवान गम्भीर वाणी से बोले - हे वेदगर्भ ब्रह्मन् ! आलस्य मत करो और जगत के रचने के लिए उद्योग करो। जिस वस्तु की प्रार्थना तुम हमसे करते हो वह मैंने पहले ही तुमको दे दी है। हे ब्रह्मन् ! तुम फिर तप करो और मेरे आश्रित हुई विद्या को धारण करो। अब तुम मेरी विद्या से फैले हुए सब लोकों में व्याप्त मुझको देखोगे और मुझमें स्थित लोकों को और सब जीवों को देखोगे । 

रजोगुण तुमको नहीं व्यापेगा । तुमने मुझको जान लिया, क्योंकि तुमने पंचभूत इन्द्रिय, गुण, अहंकार, इनसे पृथक मुझको माना है। कमल की नाल के मार्ग से तुम्हें सन्देह हुआ कि इसके नीचे कुछ अवश्य होगा, तब हमने अपना स्वरूप तुम्हारे हृदय में प्रकट किया। हे ब्रह्मन् ! तुमने जो हमारी स्तुति की है और जो तप में तुम्हारी निष्ठा हुई यह सब मेरी ही कृपा है। यह कहकर परमेश्वर ब्रह्मा को स्वरूप दिखाकर अन्तर्धान हो गये।

।। दशा विधि सृष्टि ।।

मैत्रेय जी कहने लगे - हे विदुर ! ब्रह्मा ने भगवान में मन लगाकर सौ वर्ष तप किया। ब्रह्मा ने जल सहित वायु पान कर लिया। फिर जिस कमल पर ब्रह्माजी स्थित थे इसको आकाश तक व्याप्त देखकर विचार किया कि इसी कमल ने प्रथम सब लोकों को लय किया था उन्हीं लोकों की रचना करूँगा। ब्रह्मा ने उस कमल पर स्थित होकर एक कमलनाल का बहुत प्रकार से विभाग किया। 

विदुरजी बोले- हे प्रभो ! हरि का कालरूप नामक जो आपने कहा उस काल का लक्षण हमसे कहो । मैत्रेयजी बोले- हे विदुर ! यह काल जो सत्व, रज, तम, गुणों का व्यतिकार होना अर्थात् महादिकों के परिणाम से जो किया जाता है वो काल कहलाता है, वो काल विशेषों से रहित है। यहाँ विश्व ब्रह्मस्वरूप है, उसी माया से संहृत है और ईश्वर से ही प्रकाशित है। यह विश्व जैसा अब है वैसा ही पीछे था और आगे भी ऐसा ही रहेगा। 

इस विश्व के नौ प्रकार के सर्ग हैं। दो प्रकार हैं- प्राकृत तथा वैकृत। इनमें जो वैकृत है वो दसवाँ सर्ग है। काल, द्रव्य तथा गुण तीन प्रकार के नाम हैं। केवल काल से जो प्रलय होता है उसको नित्य प्रलय कहते हैं। संकषर्ण की अग्नि से जो प्रलय होता है उसको नैमित्तिक प्रलय कहते हैं। 

अपने-अपने कार्यों को ग्रसने वाले गुणों से प्राकृतिक प्रलय है, उन्हें दस सर्ग कहते हैं। जो महत्तत्व है वो प्रथम सर्ग है। श्रीहरि के प्रभाव से गुणों के विषय भाव होने को महत्तत्व कहते हैं। दूसरा अहंकार सर्ग है। द्रव्य ज्ञान क्रिया का रूप है। तीसरा भूत सर्ग है जिसमें पंचमहाभूत अपनी तन्मात्रा सहित उत्पन्न होता है। चौथा इन्द्रियों का सर्ग है जहाँ ज्ञानन्द्रिय, कर्मइन्द्रिय, अहंकार वाला मन तथा इन्द्रियाधिष्ठाता होते हैं। छठा तमोगुण का सर्ग है। जहाँ पंचपर्वा अविद्या जीवों को द्विक्षेप करने वाली उत्पन्न हुई है। ये छः प्राकृत सर्ग कहते हैं। अब वैकृतिक सर्ग कहते हैं। सातवाँ सर्ग यह है कि जो बिना फूल के फले सो वनस्पति, जिनका फल पके से नाश हो वह औषधि है। 

आठवाँ सर्ग पशु-पक्षियों का है वह अट्ठाईस प्रकार का है। पशुओं का सर्ग अविद है अर्थात् शाम सवेरे के विचार से रहित है। अहारादि का ज्ञानमार्ग है, जो बहुत तमोगुण वाला है। नासिका के सूँघने से ही सब ज्ञान लेते हैं परन्तु ये दीर्घानुसन्धान रहित है। हे विदुर ! उन अट्ठाईस भेदों को सुनो - गौ, बकरा आदि दो खुरों वाले पशु हैं। गर्दभ, घोड़ा आदि एक खुर वाले पशु हैं। पाँच नख वाले-कुत्ता, सियार आदि हैं। कौआ, गीध आदि पक्षी हैं। 

हे विदुर ! जिनका आहार नीचे को जाता है ऐसा नवाँ सर्ग मनुष्यों का कहा है। मनुष्य अधिक रजोगुण वाले हैं और कर्म में तत्पर और दुःख में सुख मानने वाले हैं। हे विदुर ! तीनों ये सर्ग और देव सर्ग वैकारिक सर्ग कहे हैं। सनत्कुमारों का सर्ग प्राकृत और वैकृत दोनों प्रकार का कहा है। देव सर्ग आठ प्रकार का है। सिद्ध, यक्ष, राक्षस, ब्रह्मा के रचे हुए ये दस हैं। इस प्रकार भगवान का प्रकृत कल्प के आदि में अपने आप अपनी आत्मा को रचता है।

।। मन्वन्तरादि के समय के परिणाम ।।

मैत्रेयजी बोले- जिससे सूक्ष्म अन्य कोई वस्तु नहीं सो परिमाण जानना, मनुष्य को ऐक्य भ्रम होता है। जिसके अन्त का विभाग परमाणु है, जो सत स्वरूप स्थित हो उसका जो ऐक्य है उसे परम महान् कहते हैं। 

हे विदुर ! इसी प्रकार सूक्ष्म रूप से काल का अनुमान किया है। वह अव्यक्त रूप वाला भगवान अपनी परमाणु अवस्थाओं के भोग से व्यक्त प्रत्यक्ष को भोगता है। जो परमाणुता को भोगे उस काल को परमाणु कहते हैं और जो अपनी सम्पूर्ण अवस्था को भोगता है उसको परम महान् कहते हैं। दो परमाणुओं का एक अणु कहलाता है और तीन अणुओं का एक त्रसरेणु । तीन त्रसरेणु की एक त्रुटि को एक वेध कहते हैं। तीन वेधों का एक लव कहलाता है। तीन लव का एक निमेष और तीन निमेष का एक क्षण कहलाता है। पाँच क्षण का एक काष्ठा, पन्द्रह काष्ठा की एक लघुता कही है। पन्द्रह लघु की एक घड़ी और दो घड़ियों का एक मुहूर्त और छः घड़ी का एक पहर होता है। सौ पहर दिन का चौथा भाग होता है, उसी को याम कहते हैं। जो छः घड़ी का याम कहा और उसी को दिन या रात्रि का चौथा भाग कहा है इसमें उभय सन्ध्याओं को दो-दो घड़ी छोड़कर समझना क्योंकि सन्ध्या को दिन में तथा रात्रि में कोई नहीं गिनते हैं। 

घड़ी यन्त्र बनाने की विधि - चौबीस तोला ताँबा की कटोरी इस परिमाण से बनावे कि जो चौंसठ तोला जल से भर जावे, उस कटोरी में चार माशे सुवर्ण की चार अँगुल लम्बी सलाई से छिद्र करे। उस छिद्र से जितने समय में जल प्रवेश होने पर वह पात्र डूब जावे उतने समय को घड़ी कहते हैं। चार-चार पहर के दिन रात होते हैं। पन्द्रह दिन का शुक्लपक्ष और पन्द्रह दिन का कृष्णपक्ष होता है। दो पक्षों का एक मास होता है जो पितरों का एक दिन-रात्रि कहलाता है। दो महीनों की एक ऋतु होती है और छः महीनों का एक अयन होता है जो दक्षिणायन, उत्तरायण भेद से दो प्रकार का है। उन दोनों अयनों का देवता का एक दिन-रात होता है, उसे मनुष्य का एक वर्ष कहते हैं। सौ वर्षों की मनुष्य की परमायु कही है। बारह महीनों में बारह राशि रूप भुवन आकाश में परिभ्रमण करता है। यह वर्ष सम्वत्सर, परिवत्सर, इडावत्सर, वत्सर इस प्रकार से पाँच प्रकार का कहलाता है।

विदुरजी बोले- पितर, देवता, मनुष्य इनकी तो परमायु आपने कही। अब कल्प से बाहर रहने वालों की गति को वर्णन कीजिए। मैत्रेयजी बोले- हे विदुर! सत्युग, त्रेता, द्वापर और कलियुग, सन्ध्या और सन्ध्यांश सहित देवताओं के दिव्य बारह हजार वर्षों के कल्पना किये हैं। चार हजार आठ सौ वर्ष का सतयुग और तीन हजार छः सौ वर्ष का सतयुग और तीन हजार छः सौ वर्ष का त्रेतायुग, दो हजार चार सौ वर्ष का द्वापर, एक हजार दो सौ वर्ष का कलियुग होता है। युग के प्रारम्भ में वर्षों के जो सैकड़े हैं उनकी सन्ध्या और युग के अन्त में उतने ही वर्षों का सन्ध्यांश कहते हैं। जो हजार संख्या वाला काल है उसको युग कहते हैं जिसमें यज्ञादिक धर्म का विधान प्रवृत्त रहता है। सतयुग में धर्म चारों चरणों से, त्रेता में तीन चरणों से, द्वापर में दो तथा कलियुग में एक चरण से रहता है। 

हे विदुर ! त्रिलोकी से बाहर ब्रह्मलोक पर्यन्त चार हजार युगों का एक दिन होता है, उतनी ही रात्रि होती है जिस रात्रि में जगत के रचने वाला ब्रह्मा शयन करता है। रात्रि के अन्त में फिर लोकों की रचना आरम्भ होती है। जो भगवान ब्रह्मा का दिन होता है, उसी को कल्प कहते हैं। ब्रह्मा के एक दिन में चौदह मनु होते हैं। इकहत्तर चतुर्युगों से कुछ अधिक काल तक एक- एक मनु अपना-अपना समय भोगता है। और मन्वन्तरों में मनु और मनु वंश के राजऋर्षि देवता, इन्द्र और इनके पीछे होने वाले गन्धर्व आदि सब एक संग होते हैं। ये ब्रह्मा का एक दिन कहलाता है। हर मन्वन्तर में भगवान सत्वगुण को धारण करते हैं और अपने पराक्रम के द्वारा विश्व की रक्षा करते हैं। 

जब रात्रि आती है तब सृष्टि को अपने में लयकर मौन साध लेते हैं। रात्रि में सूर्य चन्द्रमा के न होने से तीन लोक अन्तर्ध्यान हो जाते हैं और फिर शेष जी की मुखाग्नि से जब तीनों लोक जलने लगते हैं तब उस अग्नि की लपट से पीड़ित हो भृगु आदि महर्षि जल-लोक को चले जाते हैं। इतने में समुद्र का जल बढ़कर प्रचण्ड लहरों से त्रिलोकी को डुबा देता है और जल ही जल दीख पड़ता है। जल में शेषशय्या पर भगवान नेत्र मूंदकर शयन करते हैं। उस समय भृगु आदि मुनि उसकी स्तुति करते हैं। 

इस प्रकार काल गति से ब्रह्मा की आयु पूरी हो जाती है। उस ब्रह्मा की आयु को जो आधा भाग है उसका परार्ध हो चुका, अब दूसरा परार्ध प्रवृत्त हुआ है, प्रथम परार्ध को ब्रह्मा कहते हैं। अन्त में जो कल्प हुआ उसको पाद्म कहते हैं। हे भारत ! यह दूसरे पर्राध का पहला श्वेत वाराह नामक प्रसिद्ध कल्प है। जिसमें हरि भगवान ने वाराह स्वरूप धारण किया है। यह द्विपरार्ध संज्ञा वाला काल भगवान का निमेष गिना जाता है। परमाणु से लेकर द्विपार्ध पर्यन्त यह काल प्रभु की आयु की गिनती नहीं कर सकता क्योंकि एक ब्रह्माण्ड जो भीतर से पचास कोटि योजन विस्तृत है और बाहर से एक से एक दस गुण सात पृथिव्यादिक आवरणों से लिपटा हुआ है, इस प्रकार के सहस्त्र ब्रह्माण्डु जिस ईश्वर के एक-एक रोम में गूलर के भुगनों की तरह उड़ते हैं, उस ईश्वर की आयु की कोई किस प्रकार गिनती कर सकता है। उसको अक्षर ब्रह्म कहते हैं। जो सब कारणों का कारण है, तथा विष्णु भगवान का परमधाम है।

।। ब्रह्मा सृष्टि वर्णन ।।

मैत्रेयजी ने कहा- हे विदुर ! अब जिस प्रकार ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना करी वह कहता हूँ। ब्रह्माजी ने प्रथम अन्ध तामिस्त्र-तामिस्त्र, महा-मोह, तम, इस पंचपर्वा अविद्या को रचा। अनन्तर सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार को ब्रह्माजी ने मन से उत्पन्न किया । इन्होंने क्रिया को त्याग वीर्य को ऊर्ध्व में चढ़ा लिया, जिससे नैष्ठिक ब्रह्मचारी हो गए। तब ब्रह्माजी ने क्रोध को रोकने का उपाय किया। परन्तु बुद्धि से रोकने पर भी वह क्रोध भृकुटी के मध्य से नील लोहित वर्ण वाला बालस्वरूप उत्पन्न हुआ। उस समय देवताओं के पूर्वज महादेव ने रूदन करके कहा हे विधाता ! मेरा नामकरण करो और मेरे रहने का स्थान बताओ । 

ब्रह्मा जी ने कहा कि तुम बालक के समान रोए, इससे प्रजा तुम्हें रुद्र कहेगी। हृदय, इन्द्रियाँ, प्राण, आकाश, पवन, अग्नि, जल, पृथ्वी, सूर्य, चन्द्रमा, तप ये ग्यारह स्थान तुम्हारे निवास को हैं। मन्तु, मनु, महिसन, महान्, शिव, ऋतुध्वज, उग्रेता, भव, काल, वामदेव, धृतव्रत ये ग्यारह तुम्हारे नाम हैं। हे रुद्र ! घी, वृत्ति, उशना, उमा, नियुत, सर्पि, इला, अम्बिका, इरावती, सुधा, दीक्षा, नियुत, रुद्राणी स्त्रीयां हैं। 

अपनी स्त्रियों सहित प्रजा सहित रचो। तब शिव जी ने अपनी आकृति और स्वभाव के समान भयंकर प्रजा राची। शिवजी के रचे हुए भूत प्रेतादी जगत का संहार करने लगे। ब्रह्मा जी यह देखकर कहने लगे - हे महादेव ! तुम तप करो, तपस्या के प्रभाव से जैसी प्रजा थी वैसी ही सृष्टि रचोगे। 

मैत्रेयजी बोले- हे विदुर ! ब्रह्मा जी की आज्ञा मान शिवजी ने तप किया। अनन्तर ब्रह्माजी की गोद से नारदजी, अंगूठे से दक्ष, प्राण से वशिष्ठ जी, त्वचा से भृगु, हाथ से ऋतु, नाभि से पुलह, कानों से पुलस्त्य, मुख से अंगिरा, नेत्रों से अत्रि, मन से मेरीचि उत्पन्न हुआ। 

अधर्म से मृत्यु उत्पन्न हुई। हृदय से कामदेव, भृकुटि से क्रोध, नीचे के होठ से लोभ, मुख से वाणी, लिंग से समुद्र, गुदा से मृत्यु हुई। मुख से सरस्वती प्रगट हुईं । यद्यपि यह सुन्दरी अकामा थी तथापि ब्रह्माजी इसे देखकर कामातुर हो गये । अपने पिता ब्रह्माजी की मति को अधर्म में लगी देख कर ब्रह्मा के पुत्र मरीचि आदि ने समझाया - हे पिता ! आज तक ऐसा काम न तो पूर्व के ब्रह्मादिकों ने किया है और न आगे वे करेंगे, आप काम को जीतो, आप समर्थ हो । 

ब्रह्माजी अति लज्जित हुए और उसी समय अपना शरीर छोड़ दिया। उस शरीर को दिशाओं ने ग्रहण किया, जो कुहरा और अन्धकार नाम से प्रसिद्ध हुआ। ब्रह्माजी ने दूसरा शरीर धारण कर लिया। उस समय ब्रह्माजी विचार करने लगे कि पूर्व यह जगत जैसा था वैसा ही अब मैं कैसे रच सकूँगा ? उसी समय पूर्व मुख से ऋग्वेद, दक्षिण मुख से यजुर्वेद, पश्चिम मुख से सामवेद, उत्तर मुख से अथर्ववेद उत्पन्न हुए। 

आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्व वेद, उपवेद ब्रह्माजी ने पूर्वादि चारों मुखों से क्रम पूर्वक उत्पन्न किये। फिर इतिहास - पुराण वाले पंचम वेद को अपने सब मुखों से उत्पन्न किया। षोडशी पूर्व वाले मुख से रची, पुरीष्य तथा अग्निष्टोम यज्ञ ग्रह, दक्षिण वाले मुख से, आप्तोर्याम तथा अत्रिरात्रि दोनों पश्चिम वाले मुख से और वाजपेय यज्ञ व गोमेध, उत्तर वाले मुख से प्रकट किये। 

विद्या दान, तप और सत्य धर्म के चारों चरण तथा ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास ये चार आश्रम और इन चारों की वृत्तियाँ पूर्वादि मुखों से रचीं। गायत्री की उपासना करने वालों को सावित्री कहते हैं। सावित्री व्रत केवल तीन दिन का होता है और व्रतों का आचरण करते एक वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचर्य को धारण करने को प्रजापत्य कहते हैं। 

वेद ग्रहण करने तक ब्रह्मचर्य धारण को ब्राह्मण ब्रह्मचर्य कहते हैं। नैष्टिक ब्रह्मचर्य को बृहद्व्रत कहते हैं। यह चार प्रकार के ब्रह्मचर्य हैं। जिसका कोई निषेध न करे उस कृत्यादि को वार्ता वृत्ति कहते हैं। अयाचित को शालीन वृत्ति कहते हैं। खेत में तथा दुकानों के नीचे गिरा हुआ अन्न बीनकर निर्वाह करने को सिलाँछ वृत्ति कहते हैं और चौथी संचय। इन चार प्रकार की वृत्तियों को गृहस्थ वृत्ति कहते हैं। 

वैखानस से निर्वाह करने वाले तथा नवीन अन्न मिलने पर पूर्व संचित अन्न को त्याग करने वाले, प्रभात में उठकर जिस दशा को प्रथम देखें उसी दिशा में आये हुए फल आदि से निर्वाह करने वाले, अपने आप पड़े हुए फल आदि से जीविका करने वाले, यह चार प्रकार के वानप्रस्थ हैं। 

अपने आश्रम के कर्म में प्रधान रहने वाले कुटीचक्र हैं, जो कुछ काम करके जीविका करते हुए ज्ञान सीखते हैं, वे हंस हैं और तत्वज्ञान को अच्छे प्रकार जानने वाले परमहंस हैं, यह चार प्रकार के संन्यासी हैं। इनमें उत्तरोत्तर श्रेष्ठ हैं। 

वेद-विद्या, धर्म-विद्या, दण्ड विद्या, नीति-विद्या, ये चारों तथा भूर्भुवः स्वः और महः ये चार व्याहृतियाँ पूर्वादि मुखों से क्रम से प्रकटीं। ओंकार ब्रह्मा के हृदय से उत्पन्न हुआ। रोमावली से उष्णिक, गायत्री त्वचा से, त्रुष्टुपमांस से, अनुष्टुप स्नायु से, जीभ से 'क' से 'म' पर्यन्त अक्षर तथा अ, इ, उ आदि स्वर देह से हुए। उष्मा वर्ण श ष स ह इन्द्रियों से, अन्तः स्थवर्ण 'य र ल व' बल से। निषाद, ऋषभ, गान्धार, षडज, मध्यम, धैवत, पञ्चम, सात स्वर ब्रह्माजी के विहार से हुए। 

ऋषियों की सन्तान को भी जब वृद्धि को नहीं प्राप्त हुई, तब ब्रह्माजी चिन्ता करने लगे कि बड़ा आश्चर्य है कि मैं नित्य उद्यम कर रहा हूँ परन्तु वृद्धि नहीं होती ? निश्चित इसमें दैव प्रतिबन्धक है जो प्रजा को बढ़ने नहीं देता। जब ब्रह्मा ने दैव को दोष दिया, तब उनके शरीर में दो स्वरूप हो गये, जिसको काय कहते हैं । 

एक शतरूप दूसरा स्वायम्भुव मनु। उन दोनों ने मैथुन किया। मैथुन से प्रजा बढ़ने लगी। इनके प्रियव्रत, उत्तानपाद दो पुत्र और देवहूति, आकूति, प्रसूति ये तीन कन्याएं हुईं । स्वायम्भुव मनु ने आकूति रुचि को दी, देवहूति कर्दमजी को और प्रसूति नामक कन्या दक्ष को दी। जिनकी सन्तानों से यह जगत भर गया।

।। भगवान द्वारा वाराहरुप की जल में उत्पत्ति ।।

मैत्रेयजी ने कहा- जब अपनी स्त्री सहित स्वायम्भुव मनु उत्पन्न हुए तब उन्होंने हाथ जोड़कर ब्रह्माजी से कहा- हे पिता! मैं आपको को नमस्कार करता हूँ। हमारी शक्ति के अनुसार कर्म करने की आज्ञा करो, मेरा निवास स्थान और प्रजा के रहने को ठौर बताइये। 

ब्रह्माजी की नासिका के छिद्र से अकस्मात् अंगूठे के अग्रभाग के समान वाराह का एक बच्चा उत्पन्न हो गया। देखते-देखते वह वाराह एक क्षण में ही हाथी के समान बड़ा हो गया। मरीच आदि ब्राह्मण, सनत्कुमार आदि मुनि व मनु सहित ब्रह्माजी उस शूकर को देखकर अनेक प्रकार के विचार करने लगे। वाराह के शरीर के समान यह दिव्य जन्तु कौन आकर खड़ा हो गया ? कदाचित यज्ञ भगवान तो नहीं प्रकटे । 

श्री ब्रह्माजी अपने पुत्रों सहित यह विचार कर रहे थे कि इतने में वाराहजी गर्जने लगे। उस समय घर्घार शब्द सुनकर जनलोक, महर्लोक, सत्यलोक में रहने वाले मुनिगण परम पवित्र वेदत्रयी मंत्र पढ़-पढ़कर स्तुति करने लगे। वेद वाणी को सुनकर वाराह भगवान ने फिर गर्जन किया और गजेन्द्र के समान जल में प्रवेश किया। 

वाराह भगवान स्वयं यज्ञ मूर्ति होने पर भी पशु के समान घ्राण से पृथ्वी को सूंघते, जल में प्रवेश कर गए और पृथ्वी को अपनी दाढ़ से उठाकर रसातल से ऊपर को लाये । हाथ में प्रज्वलित गदा को लिये हुए अपनी ओर आते हुए असह्य पराक्रमी हिरण्याक्ष दैत्य को भगवान ने जल में ऐसे मार डाला कि जैसे गजराज का मृगराज संहार करे। 

हे राजन् ! श्याम वर्ण वाले वाराहजी को श्वेत दाढ़ों के अग्रभाग से पृथ्वी को उँचा उठाकर लाते देखकर ब्रह्मादिक देवता तथा ऋषि हाथ जोड़ वेद मन्त्रों से स्तुति करने लगे - हे भगवान ! हमारा नमस्कार है। हे भूधर ! दाढ़ के अग्रभाग पर अपने धारण की गई यह पृथ्वी शोभा को प्राप्त हो रही है। पृथ्वी की लोगों के वास के निमित्त स्थापना करो। आप स्थावर-जंगम सबके पिता हो इस कारण आपकी स्त्री पृथ्वी है। हम आपके साथ इस अचला देवी को नमस्कार करते हैं। तब वाराह भगवान ने पृथ्वी को जल पर अचल कर दिया। इस प्रकार वाराह भगवान पृथ्वी को जल पर स्थापित करके अपने स्थान को चले गये।

।। दिति की गर्भोत्पत्ति ।।

विदुरजी कहले लगे - हे मुनि उत्तम ! पृथ्वी का उद्धार करते हुए भगवान का और हिरण्याक्ष का किस कारण युद्ध हुआ ? यह प्रश्न सुनकर मैत्रेयजी ने कहा - प्रथम हिरण्याक्ष और हिरण्यक कश्यप की उत्पत्ति सुनो। हे विदुर ! एक समय संध्या काल में दक्ष की कन्या दिति ने कामातुर हो इच्छा से कश्यप ऋषि से भोग की याचना की। कश्यपजी सूर्यास्त के समय अग्निहोत्र शाला में विराजमान थे। 

दिति ने कहा- हे विद्वान् ! कामदेव मुझ अबला को दुःख देता है। सन्तान वाली सपत्नियों की समृद्धि से दग्ध होती हुई जो मैं दासी हूँ सो हमारे पुत्र न हो यह बड़ा आश्चर्य है। दिति के वचन सुनकर कश्यपजी कहने लगे - हे भीरु ! दो घड़ी पर्यन्त धैर्य धारण करो जिससे संसारी मनुष्य हमारी निन्दा न करें। इस संध्या समय में महादेवजी के गण भूत, प्रेत, वेतालादि विचरते हैं। 

महादेव अपने तीनों नेत्रों से आठों पहर देखते रहते हैं सो वे अवश्य हमारे विहार का अवलोकन करेंगे, तनिक इनकी लज्जा करो। कश्यपजी ने दिति को समझाया, परन्तु मदन के मद से अचेत इन्द्रियों वाली दिति ने वेश्या के समान लाज छोड़ कर कश्यपजी का वस्त्र पकड़ लिया । तब वे अपनी पत्नी की हठ जानकर भगवान को प्रणाम करके उस हठीली स्त्री के साथ विहार करने लगे। भोग से निश्चिन्त होकर स्नान करके प्राणायाम किया और ध्यान मग्न हो जप करने लगे। उस निन्दित कर्म से लज्जित हुई दिति नीचा सिर किये कश्यपजी के समीप आकर बोली- हे ब्रह्मन् ! महादेव हमारे इस गर्भ का विध्वंस न करें, उनकी लज्जा मैंने नहीं की, यह अपराध मुझसे हुआ है। वे सतीजी के पति हमारे बहनोई हैं वो हम पर पसन्न हों। 

मैत्रेयजी बोले- अपनी संतति का शुभ चाहने वाली दिति से कश्यपजी संध्या-बंदन से निवृत्त होकर बोले- प्रिये !तुम्हारा चित्त शुद्ध न होने से, मौहूर्तिक दोष से, हमारी आज्ञा नहीं मानने से, देवताओं का अनादार करने से तुम्हारे उदर से अत्यन्त दो अधर्मी पुत्र उत्पन्न होंगे।

देवताओं को जीतकर सबको दुःख पहुँचायेंगे। भगवान अवतार धारण कर उन दोनों का नाश करेंगे। यह सुनकर दिति बोली- हे स्वामिन् ! भगवान के हाथ से मैं अपने पुत्रों का मरना चाहती हूँ परंतु ब्राह्मण के क्रोध से मेरे पुत्रों का मरण न हो। दिति का वचन सुनकर कश्यप मुनि बोले, तुमने अपने अपराध का पछतावा किया और विष्णु, महादेव और मैंने इन तीनों का बहुत मान और आदर किया इसके प्रभाव से तुम्हारे पुत्र के जो पुत्र होंगे उनमें से प्रहलाद परम भगवद् भक्त तथा सन्तापहारी होगा।

।। बैकुण्ठ के दो विष्णु भक्तों के प्रति ब्राह्मणों का शाप ।।

मैत्रेयजी ने कहा- कश्यपजी के वीर्य को देवताओं को पीड़ा होने की शंका से दिति ने सौ वर्ष गर्भ धारण किया। उस गर्भ के तेज से निस्तेज हुए सब लोकों को देखकर सब लोकपालों ने ब्रह्माजी से जाकर निवेदन किया। 

हे प्रभु ! आप जानते हो जिससे हम सब भयभीत हो रहे हैं। अन्धकार से लुप्त कर्म वाले हम लोगों को आप सुखी करो। यह दितिगर्भ सम्पूर्ण दिशाओं में अन्धकार बढ़ाता है। स्तुति सुनकर ब्रह्माजी ने कहा - हमारे मन से उत्पन्न सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार चारों भाई सर्वदा सम्पूर्ण लोकों में विचरते रहते हैं। वे एक समय बैकुण्ठलोक को गये। उस बैकुण्ठ में सनकादिक मुनि छः द्वारों तक बिना रोक-टोक चले गये। 

जब सातवें द्वार पर पहुँचे, तो सुन्दर वेष वाले जय विजय नामक दो पार्षद देखे । सर्वत्र समदृष्टि होने से, सम्पूर्ण जगत् में विचरने वाले, वृद्ध होने पर भी पाँच वर्ष की अवस्था वाले और आत्मतत्व के जानने वाले, उन कुमारों को सातवें द्वार में नग्न घुसते देखकर दोनों द्वारपाल रोकने लगे। 

भगवान के दर्शन की इच्छा भंग होने से मन में दुःख मानकर क्रोध से बोले - बैकुण्ठ लोक में समदर्शी भगवान विराजमान हैं लेकिन तुमको विषम बुद्धि कैसे हुई । तुम दोनों उस लोक में आओ जहाँ भेद दृष्टि से काम, क्रोध, लोभ से ग्रसित पापी रहते हैं। वह मुनियों के चरणों में गिर पड़े और कहने लगे - अपराध करने वालों को जो दण्ड चाहिए वही दण्ड आपने दिया है, परन्तु आप की कृपा से भगवान के स्मरण का नाश करने वाला मोह हमको न हो। 

भगवान अपने पार्षदों के अपराध को जानकर नंगे पाँवों से भागते वहीं आ पहुँचे । श्यामवर्ण, विशाल वक्ष-स्थल, पीताम्बर धारण किये, वनमाला से सुशोभित हाथ गरुड़ पर धरे, दूसरे हाथ से कमल को घुमा रहे, कुण्डलों से सुशोभित कपोल, मनोहर मुखारविन्द, मणिमय मुकुट धारण किए, अमूल्य हार और कंठ में कौस्तुभ मणि धारे, हरिस्वरूप के दर्शन कर सनकादिक ने भगवान के चरणारविंदों में प्रणाम किया।

।। दोनों द्वारपालोंका बैकुण्ठ से अधोपतन ।।

ब्रह्मा जी कहने लगे - सनकादिक मुनियों की प्रशंसा करके भगवान बोले- ये जय विजय मेरे पार्षद हैं इन्होंने मेरी आज्ञा उल्लंघन करके आपका अपराध किया है, हे मुनियो ! आपने दण्ड दिया सो अच्छा किया है। मेरे पार्षदों ने आपका अनादर किया सौ मैं यह मानता हूँ कि मैंने ही किया है। ये मेरे पार्षद दैत्य योनि को प्राप्त होकर फिर मेरे पास आ जायेंगे, आपने जो कोप किया है वह हमारे ही निमित्त समझो। इसके अनन्तर वे भगवान की परिक्रमा कर और आज्ञा लेकर चले गये। 

भगवान जय विजय पार्षदों से बोले - तुम जाओ और भय नहीं करो, तुम्हारा भला होगा। मैं ब्रह्मशाप का निवारण कर सकता हूँ पर हमारे मन में भी लीला करने की इच्छा है। जब हम योगनिद्रा को प्राप्त हुए तब क्रोध से लक्ष्मीजी ने कहा था कि सनकादिक मुनि द्वार पर आवेंगे और उनको जय विजय रोकेंगे। अतः हे पार्षदो ! मुझसे बैर भाव करके थोड़े ही समय में तुम हमारे समीप फिर आ जाओगे। इस प्रकार दोनों पार्षदों को समझाया। 

लक्ष्मी जी को साथ लिये बैकुण्ठधाम में भगवान ने प्रवेश किया। वह दोनों द्वारपाल शाप से हतश्री होकर भगवान के लोक से नीचे गिरे और उनका गर्व जाता रहा। जिस समय वह दोनों बैकुण्ठ से गिरने लगे तब हाहाकार शब्द हुआ। वही दोनों भगवान के पार्षद दिति के उदर में प्रवेश कर कश्यपजी के तेज में प्रविष्ट हुए। उन असुरों के तेज से तुम लोगों का तेज मन्द हो गया है। भगवान असुरों का नाश कर तुम्हारे तेज को बढ़ावेंगे।

।। दिति का पुत्र जन्म ।।

मैत्रेयजी बोले - सौ वर्ष पूर्ण हो जाने पर दिति के दो पुत्र एक बार उत्पन्न हुए। उनके जन्म लेते समय आकाश, पृथ्वी और अन्तरिक्ष में अनेक अपशकुन होने लगे। बिना बादल गर्जने का शब्द होने लगा, कुत्ते ऊपर को मुख उठाकर अनेक प्रकार की बोलियाँ बोलने लगे। इधर दिति के दोनों पुत्र गिरिराज की भाँति बढ़ने लगे। जिनके मुकुट का अग्रभाग आकाश को स्पर्श करता, भुजाओं से दिशाओं को रोकते, चरणों से पृथ्वी कंपाते, जब वह दोनों खड़े होते तब सूर्य इनकी कमर की कौंधनी से नीचे रहता था। 

कश्यपजी ने उन दोनों का नामकरण किया। जो प्रथम उत्पन्न हुआ था उसका नाम हिरण्यकशिपु रखा। उसने अपनी भुजाओं के बल से व ब्रह्मा जी के वरदान से त्रिलोकी को अपने वश में कर लिया। उसका छोटा भाई हिरण्याक्ष गदा हाथ में लेकर युद्ध करने की इच्छा से स्वर्ग को गया। उस समय असुर के भय से देवता पर्वतों की कन्दराओं में जा छिपे । 

तब दैत्यराज ने इन्द्रादि देवताओं को डराने की महाघोर गर्जना की। हे तात् ! वह महाबली दैत्य अनेक वर्ष तक सागर को लोहे की गदा से मारता हुआ समुद्र में क्रीड़ा करने लगा। जल उछल-उछल आकाश को जाने लगा, फिर घूमता-घूमता वह वरुण की पुरी में आया। वरुण के निकट जाकर दैत्य ने हंसकर कहा- हे अधिराज ! मुझको युद्ध दान दीजिए। तुम लोकपालों के स्वामी हो। पूर्व समय आपने दैत्य दानवों को जीत कर राजसूय यज्ञ किया था। 

तब वरुण बोले- हे दैत्यराज ! अब हमने युद्ध करना छोड़ दिया है, तुमको भगवान के बिना कोई प्रसन्न करे, ऐसा दूसरा मुझको नहीं दीख पड़ता । भगवान युद्ध करने में प्रवीण हैं, वही तुम्हारा मनोरथ पूर्ण करेंगे, आप उनके पास जाइये।

।। वाराहदेव के साथ हिरण्याक्ष का युद्ध ।।

मैत्रेयजी कहने लगे - हे विदुर ! वरुण के वचन सुनकर महा अभिमानी हिरण्याक्ष, वरुण लोक से निकला तभी सामने से नारदजी को आते देखा। वह नारदजी से बोला - तुमने कहीं विष्णु को भी देखा है। नारदजी ने कहा- भगवान वाराह का रूप धारण कर पाताल लोक को गए हैं। यह सुनकर वह शीघ्र पाताल लोक को गया। पृथ्वी को दाढ़ के अग्रभाग पर धरकर ऊपर को उठाकर लाते हुए वाराह भगवान को देख कर हिरण्याक्ष हँसकर कहने लगा जल में विचरने वाले वाराह को मैंने आज ही देखा है। 

हे अज्ञ ! मेरे सम्मुख आ और यह पृथ्वी छोड़ दे, क्योंकि यह भूमि ब्रह्माजी ने पातालवासियों को समर्पण की है। हे शूकर ! तू मेरे देखते पृथ्वी को लेकर कभी नहीं जा सकेगा । तू हमें मारने को उत्पन्न हुआ है और माया से दैत्यों का संहार करता है। 

हे मूर्ख ! तेरा बल योगमाया ही है, सो तुझको मारकर मैं अपने बान्धवों का शोक दूर करूँगा। शत्रु के दुर्वचनों से व्यथित हुए वाराह जी पृथ्वी को भयभीत देखकर जल से बाहर निकले। तब वाराहजी ने जल पर पृथ्वी को अपनी आधाररूप शक्ति से स्थित किया जिससे वह फिर जल में डूब न जावे। 

भगवान बोले - हिरण्याक्ष ! तू सत्य कहता है, बनवासी वाराह हम ही हैं, परन्तु तुझ सरीखे कुत्तों को ढूंढते फिरते हैं। जब वाराह भगवान ने उसका अनादर किया और बहुत ठट्ठा किया, तब हिरण्याक्ष क्रोध में भर गया। वह गदा लेकर वाराहजी पर दौड़ा और भगवान उसके सम्मुख दौड़े। प्रभु ने शत्रु की दाहिनी भौंह पर अपनी गदा फेंककर मारी। वे दोनों गदाओं से घोर युद्ध करते थे। दोनों के घाव हो गए, उन घावों में से रुधिर की धारा निकलती थी, उसकी गन्ध से क्रोध बढ़ता जाता था। उन द्वेषभाव वाले योद्धाओं का युद्ध देखने को ऋषियों को साथ लिए श्री ब्रह्माजी आये । दैत्य को देखकर और उसको महापराक्रमी जानकर ब्रह्माजी ने नारायण से कहा- हे सुरोत्तम ! इस मायावी दैत्य से खेल मत करो। यह असुर जब सन्ध्या समय को पाकर बढ़ जाये उससे पहले ही इसका नाश हो जावे तो अच्छा है, इस कारण इसे शीघ्र मारो। अभिजित योग इसके नाश करने वाला एक मुहूर्त भर को आ गया है, यह बहुत अच्छा हुआ। 

जिसके वध को आपने वाराह का शरीर धारण किया, सो यह पापी आप ही आपके सम्मुख युद्ध करने आ गया है। अब पराक्रम करके इस दैत्य को युद्ध में मारकर लोकों को सुखी करो। ब्रह्माजी का वचन सुनकर वाराह भगवान ने अपने शत्रु को निर्भय विचरते देखकर उसके समीप जाकर उसकी ठोड़ी में एक गदा मारी। दैत्य ने भगवान की गदा पर प्रहार किया जिसके कारण भगवान की गदा गिर गई। हिरण्याक्ष को प्रहार करने का अवकाश भी मिल गया था, परन्तु भगवान को शस्त्ररहित देख संग्राम को धर्म मानकर शस्त्र नहीं चलाया। 

प्रभु ने दैत्य के धर्म को प्रमाण करके सुदर्शनचक्र का स्मरण किया। भगवान् को चक्र लिये हुए अपने सम्मुख खड़े देखकर दैत्य अपने होठों को चबाने लगा। फिर जलती हुई तीन शिखा वाले त्रिशूल को उस दैत्य ने वाराह भगवान के मारने के लिए हाथ में लिया। त्रिशूल को आता देखकर भगवान ने सुदर्शन चक्र से उसे खण्ड-खण्ड कर दिया। तब उसने भगवान के वक्षस्थल में मुष्टिका प्रहार किया और वह असुर अन्तर्ध्यान हो गया। मुक्का लगने से भगवान का शरीर किंचित भी कम्पायमान नहीं हुआ। 

भगवान के ऊपर उस असुर ने अनेक प्रकार की माया प्रकट की। कभी रुधिर की, कभी मूत्र की, कभी हाड़ों की वर्षा करने लगा। माया का नाश करने को वाराह भगवान ने सुदर्शन चक्र का प्रयोग किया। जब उस दैत्य की आसुरी माया नष्ट हो गई, तब भगवान के पास आकर उनको अपनी दोनों भुजाओं में लेकर मोड़ने लगा। 

भगवान ने ऐसी माया की कि वे बाहर ही स्थित दीख पड़े। फिर वह दैत्य भगवान के हृदय में घूंसों से ताड़ना करने लगा। यह देखकर भगवान ने ऐसे थप्पड़ मारे जिसके लगते ही दैत्य चक्कर खाने लगा। तब वह दैत्य ऐसे गिरा, मानो वायु किसी वृक्षराज को उखाड़ गिराता है।

।। देवहूति के साथ कर्दम ऋषि का सम्बन्ध ।।

विदुर जी ने कहा- हे भगवान् ! स्वायम्भुव मनु का वंश हमसे कहो। स्वायम्भुव मनु के पुत्र प्रियव्रत और उत्तानपाद ने जैसे धर्म और पृथ्वी की पालना की सो कहिये। स्वायम्भुव मनु की कन्या देवहूति आपने कर्दम की स्त्री कही थी। उस देवहूति से कर्दमजी ने कितने पुत्र उत्पन्न किये। रुचि और दक्ष ने मनु की कन्याएँ आकृति और प्रसूति से किस प्रकार से सृष्टि उत्पन्न की, सो कहिए।

मैत्रेयजी कहने लगे - जब ब्रह्माजी ने कर्दमजी से कहा कि तुम सृष्टि रचो तब कर्दमजी ने दस हजार वर्ष तक तपस्या किया। हे विदुर ! तब भगवान ने प्रसन्न होकर कर्दमजी को अपना स्वरूप दिखाया। भगवान के स्वरूप को देखकर कर्दमजी ने साष्टांग प्रणाम किया, फिर प्रेम से स्तुति करने लगे। ऋषि बोले- हे ईश्वर ! विवाह की मुझको इच्छा है, परन्तु स्त्री शीलवती, बुद्धिमती, ज्ञान वाली हो क्योंकि स्त्री से धर्म, अर्थ, काम की सिद्धि होती है। 

तब विष्णु भगवान कहने लगे - जिस कारण हमारा भजन तुमने किया है सो तुम्हारे लिये सब उचित प्रबन्ध कर दिया है। स्वायम्भुव मनु अपनी शतरूपा स्त्री सहित परसों आपको देखने यहाँ आवेगा। अपनी कन्या आपके अनुरूप जानकर देवेगा जिसमें तुम्हारा मन इतने वर्ष से लग रहा था, वह राजकन्या तुम्हारे मनोरथ को शीघ्र ही पूर्ण करेगी और नौ कन्याएँ उत्पन्न करेगी। तुम्हारी कन्याओं में ऋषि लोग अनायास अपनी पुत्र सन्तान उत्पन्न करेंगे। 

हे महामुने ! आपके वीर्य से मैं तुम्हारी स्त्री देवहूति में कपिलदेव का अवतार लेकर सांख्य शास्त्र वर्णन करूँगा। ऐसे कहकर भगवान बैकुण्ठ लोक चले गये। इसके अनन्तर कर्दम ऋषि बिन्दु सरोवर में बैठे स्वायम्भुव मनु के आने की प्रतीक्षा करने लगे। स्वायम्भुव मनु, स्त्री शतरूपा को साथ लिये, अपनी पुत्री देवहूति को रथ पर बैठाकर, पृथ्वी पर पर्यटन करने निकले। 

विचरते-विचरते स्वायम्भुव मनु कर्दमजी के आश्रम पर आये। जिस सरोवर में भगवान ने कर्दमजी पर प्रसन्न अपने नेत्रों से आँसुओं की बिन्दु गिराये हैं उसी दिन से उसका नाम बिन्दु सरोवर हुआ। 

अमृत समान मीठा जल उसमें भरा है। उस बिन्दु सरोवर तीर्थ में प्रवेश करके स्वायम्भुव मनु ने अपनी स्त्री और कन्या सहित वहाँ होम करते हुए कर्दम मुनि को देखा। मनुजी ने नमस्कार की, कर्दमजी ने यथायोग्य आशीर्वाद दिया और राजाओं के योग्य सत्कार किया। फिर कहा- हे राजन् ! आपका विचरना, सज्जनों की रक्षा और दुष्टों के संहार के अर्थ है, क्योंकि आप भगवान की शक्ति रूप हो । जो तुम कठोर धनुष को लेके दुष्टों को त्रास देते हुए, अपनी सेना को साथ लिये हुए जगत् में न विचरो, तो भगवान की बांधी हुई सम्पूर्ण मर्यादा दुष्टों द्वारा नाश हो जावे। हे वीर ! आपका पधारना यहाँ किस कारण से हुआ सो आप कहिए ?

।। महर्षि कर्दम के साथ देवहूति का विवाह ।।

मैत्रेयजी ने कहा - जब कर्दमजी ने मनु के गुण और कर्मों की प्रशंसा की, तब मनु लज्जा करके बोले - श्रीब्रह्मा जी ने आत्मा रूप देव की रक्षा के अर्थ, तप, विद्या, योग से युक्त, आप सरीखे ब्राह्मणों को अपने मुख से उत्पन्न किया है। भगवान ब्रह्मा के हृदय ब्राह्मण हैं, इस कारण ब्राह्मण क्षत्रिय परस्पर एक दूसरे की रक्षा करते हैं सो आप सत् रूप होकर सबकी रक्षा करते हैं। 

आपके दर्शन से हमारे सम्पूर्ण सन्देह दूर हो गये। हे मुने ! मैं इस कन्या के प्रेमवश अति क्लिष्ट चित्त और दीन हूँ। यह प्रियव्रत और उत्तानपाद की बहिन हमारी कन्या देवहूति पति की अभिलाषा करती है। हे प्रियवर ! मैं आपको यह कन्या समर्पण करता हूँ। निर्मुक्त मनुष्य को स्वयं प्राप्त वस्तु का अनादर करना उचित नहीं होता। हे विद्वान् ! आप विवाह का उद्योग कर रहे हो। इस कारण मेरी इस कन्या को ग्रहण कीजिए। 

कर्दम ऋषि बोले- मैंने आपका कहा अंगीकार किया। हमारी इच्छा विवाह करने की है और आपकी कन्या की कान्ति ही साक्षात् लक्ष्मी का विस्तार करती है, ऐसी आपकी कन्या का आदर कौन नहीं करेगा ? परन्तु मैं आपकी कन्या का इस शर्त पर विवाह करना स्वीकार करूंगा कि जब तक हमारी सन्तान न होगी तब तक मैं गृहस्थाश्रम का सेवन करूँगा। इसके अनन्तर परमहंसों में मुख्य भगवद् धर्मों का अनुष्ठान करूँगा। उनकी मुखारविन्द की शोभा से देवहूति का मन लोभ में आ गया। स्वायम्भुव मनु ने अपनी रानी शतरूपा और पुत्री देवहूति का अभिप्राय जानकर कर्दमजी को अपनी कन्या समर्पण की। 

शतरूपा ने उन दोनों को दहेज में बहुत धन, आभूषण, वस्त्र गृहस्थी में काम आने योग्य अनेक वस्तुएं दीं। तदनन्तर विदा होने के समय महाराज ने मोहयुक्त हो दोनों भुजाओं से उठा कन्या को हृदय से लगाया। फिर राजा-रानी कर्दमजी से आज्ञा लेकर, वहाँ से विदा हो अपने नगर को पधारे। स्वायम्भुव मनु को देश में आया हुआ जानकर सम्पूर्ण प्रजा आनन्द युक्त हो राजा को लिवाने आई। राजा ने अपनी राजधानी में प्रवेश करके अपने राज-भवन में निवास किया। मनु महाराजा ने मनुष्यों के वर्ण आश्रम के अनेक प्रकार के उत्तम धर्म वर्णन किये हैं, जिसको मनुस्मृति कहते हैं।

।। विमान में कर्दम और देवहूति की रति लीला ।।

माता-पिता के चले जाने पर पतिव्रता देवहूति नित्य प्रति प्रीतिपूर्वक पति की सेवा करने लगी। कर्दमजी भी सेवा से दुर्बल देह वाली देवहूति से प्रेममय वाणी में बोले- हे मानवि! आज मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हो गया हूँ, सुख भोगने के योग्य जो यह शरीर है वो तुमने मेरी सेवा के अर्थ दुर्बल कर दिया। अपने में रत होकर तप, समाधि, उपासना और आत्मयोग से जीते भगवत के दिव्य प्रसाद हैं जो कि भय से तथा शोक से रहित हैं उन ऐश्वर्यों को भी मैं तुमको जो दिव्य दृष्टि देता हूँ, उससे देखो। 

योगमाया अविद्या में अपने पति को अति प्रवीण देखकर देवहूति की सब पीड़ा और चिन्ता दूर हो गई। फिर कुछ लज्जा सहित हँसती हुई कहन लगी - द्विज श्रेष्ठ ! आप अबोध व्यक्तियों के स्वामी हो यह मैं भली भाँति जानती हूँ। पतिव्रता स्त्रियों को गुणवान पति विषे एक बार भी जो अंग-संग हो जाता है उससे अत्यन्त गुणवान सन्तान उत्पन्न होती है। चो पुत्र प्राप्त होना ही पतिव्रताओं को बड़ा लाभ होता है। इनसे उस अंग संग के विषय में जो कृत्य हैं उनसे मुझे शास्त्र के अनुसार शिक्षा दीजिए। जिससे यह देह आपके साथ रमण करने योग्य हो जावे। मैं आपसे उद्दीप्त किए हुए कामदेव से प्रभाव पा रही हूँ उसको शान्त करने के निमित्त एक उत्तम पति बनाना योग्य है। 

मैत्रेयजी बोले- हे विदुर! तब प्रिया का प्रिय चाहते हुए कर्दमजी ने अपने योग बल से उसी समय इच्छानुसार चलने वाला एक विमान बनाकर प्रकट किया। सब इच्छा पूर्ण करने वाला अलौकिक, रत्नों से जड़ा हुआ, सब सिद्धियों से संचित, सब ऋतुओं में सुख देने वाला, अनेक प्रकार के वस्त्रों से पूर्ण, पृथक- पृथक बिछी शय्या और चमर, पंखे आसनों से मनोहर, शोभायमान चित्रकारी, हीरों से जड़े किवाड़, भीतों के भीतर माणिक, पद्मराग, जहाँ तहाँ चित्र विचित्र चमक रहे विहार मन्दिर, शयन भवन, उपभोग स्थान आंगन सुखदायक बनाये गये थे। ऐसे विमान को देखती हुई भी देवहूति अधिक प्रसन्न नहीं हुई। तब सम्पूर्ण जीवों के अन्तःकरण की बात को जानने वाले कर्दमजी बोले- हे भीरु ! इस बिन्दु-सरोवर में स्नान करके इस विमान पर चढ़ो। भगवान ने अपने नेत्रों से आनन्द का बिन्दु डालकर यह तीर्थ उत्पन्न किया है। तब देवहूति पति का वचन मान बिन्दु सरोवर में प्रविष्ट हुई। देवहूति को सरोवर के भीतर एक हजार कन्यायें ( सब किशोर अवस्था वाली ) कमल समान सुगंधि वाली दीख पड़ीं। देवहूती को देखकर सब कन्यायें उठ खड़ी हुई और हाथ जोड़कर बोलीं कि हम सब आपकी दासी हैं। 

यह कहकर उन्होंने देवहूति को उबटन लगाकर अच्छी प्रकार स्नान कराकर रेशमी वस्त्र पहनाये । अति स्वादिष्ट भोजन कराया, मधुर और मादक पीने का पदार्थ दिया। इसके अनन्तर देवहूती ने फूलों की माला पहन, मांगलिक पदार्थ धारण कर अपने अंग को आरसी में देखा। देवहूती ने जब अपनी मनोहर छवि को देखा तब अपने प्राण प्रीतम कर्दम जी के पास अपने आपको देखा। कर्दम जी उनका कोमल हाथ पकड़कर विमान पर ऐसे शोभित हुए जैसे तारागणों के बीच में पूर्ण चन्द्रमा आकाश में होता है। उस विमान पर बैठकर कर्दम जी सुमेरु की कन्दराओं में जहाँ शीतल मन्द सुगन्ध पवन बह रहा था और गंगा जी के प्रवाह का सुन्दर शब्द पवन बह रहा था, वहाँ बहुत काल तक देवहूति को साथ लिए रमण करने लगे। फिर कर्दम जी प्रसन्न होकर वैश्रम्भक-नन्दन, सूरसेन, पुष्पभद्रक, मानस, चैत्ररथ, इन देवताओं के उद्यानों में रमणी के साथ रमण करने लगे। फिर महायोगी कर्दम जी सब पृथ्वी को अपने विमान पर से अपनी पत्नी को दिखाते हुए सर्वत्र विचर कर अपने स्थान को लौट आए। विषय सुख की इच्छा वाली देवहूती के साथ कर्दम मुनि ने अपना नव शरीर धारण करके अनेक वर्षों तक रमण किया। उस विमान में रतिकारी परमोत्तम शय्या में विराजी हुई को समय की कुछ भी सुधि न रही। सौ वर्ष व्यतीत हो गए तब भी काम लालसा पूर्ण न हुई। देवहूति के बहुत सन्तान होने के संकल्प को जानकर कर्दम जी ने अपने स्वरूप को नव प्रकार से विभाग करके उसमें वीर्य धारण किया। जिससे देवहूति ने एक साथ नौ कन्याओं को उत्पन्न किया। 

तदनन्तर कर्दम जी ने अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार वन जाने की इच्छा प्रकट की तो पतिव्रता देवहूति व्याकुल हृदय से नीचे को मुख किये आँसुओं की धारा को रोककर मधुर वचन से बोली - हे स्वामिन् ! आपने हमारा मनोरथ पूर्ण किया। अब आप मुझको अभयदान दीजिए। हे ब्रह्मन् ! प्रथम कन्याओं के विवाह करो और आप वन को जाना चाहते हो तो मुझको ज्ञान देने वाला एक पुत्र दे दो। हे स्वामिन् ! मैंने परब्रह्म को त्यागकर इन्द्रियों के संग इतना समय व्यतीत कर दिया वही बहुत है। मैं निश्चय आपकी माया से ठगी गई हूँ जो मोक्ष के देने वाले आपको पाकर संसार बन्धन की इच्छा करती हूँ।

।। कपिल का देव जन्म ।।

मैत्रेयजी कहने लगे - देवहूति के ज्ञान वैराग्य युक्त वचन सुनकर कर्दमजी ऋषि बोले- हे अनिदिते! तुम अपनी आत्मा की निन्दा मत करो, क्योंकि अविनाशी भगवान तेरे गर्भ से आकर उत्पन्न होंगे। देवहूति कर्दमजी के वचन सुनकर निर्विकार भगवान का भजन करने लगी। जब बहुत काल व्यतीत हो गया तब भगवान प्रसन्न हुए उस समय आकाश में बाजे बजने लगे, गन्धर्व गाने लगे और अप्सरायें नाचने लगीं। आकाश से देवता फूल बरसाने लगे। दसों दिशाओं में आनन्द छा गया। तब मरीचि आदि मुनियों सहित ब्रह्मा जी आये और कहने लगे - हे पुत्री ! तुमने निष्कपट हृदय से हमारी पूजा की है। 

तुम्हारी सुन्दर स्वरूप वाली कन्यायें सृष्टि को अनेक प्रकार से बढ़ायेंगी। इसलिए इनके शील से आज इन्हें समर्पण करो, विवाह करके संसार में अपना यश बढ़ाओ । हे देवहूति ! तुम्हारे गर्भ से विष्णु भगवान ने अवतार लिया है, यह सांख्य शास्त्र के आचार्यों के परममान्य संसार में कपिल देव के नाम से विख्यात होकर तुम्हारी कीर्ति को बढ़ावेंगे। 

मैत्रेयजी बोले - ब्रह्माजी उन दोनों को आश्वासन देकर मुनियों सहित सत्यलोक को सिधारे। कर्दमजी ने अपनी नौ कन्यायें मरीचि आदि मुनियों को विवाह दीं। कला मरीचि को, अनुसुइया अत्रि को, श्रद्धा अंगिरा को, हविर्भू पुलस्त्य को, मति पुलह को, क्रिया ऋतु को, ख्याति भृगु को, अरुन्धती वशिष्ट को, शान्ति अथर्व को, ब्याही। 

हे विदुर! विवाह हो जाने पर वे ब्राह्मण कर्दम मुनि से आज्ञा लेकर अपने-अपने आश्रमों को चले गये। भगवान का अवतार हुआ जानकर एकान्त में आ, प्रणाम करके कर्दम मुनि कपिल भगवान से यह बोले - अहो भगवान ! सांख्य-ज्ञान की शिक्षा करने को भगवान हमारे घर अवतरे हो। भक्तों को जिस-जिस स्वरूप में दर्शन की आकांक्षा होती है, आप उसी-उसी स्वरूप को धारण करके उनको प्रसन्न करते हो। आपका अवतार होने से मैं पितृ ऋण से उऋण हो गया, और मेरा मनोरथ सफल हो गया। 

कपिल भगवान बोले - हे मुने ! हमने जो तुमको वचन दिया था, उसे पूरा करने को आपके यहाँ हमने अवतार धारण किया है। सूक्ष्म अनादि आत्म सम्बन्धी ज्ञान- मार्ग बहुत काल से नष्ट हो गया था, उसका प्रचार करने के अर्थ मैंने यह शरीर धारण किया है। जहाँ इच्छा हो वहाँ जाओ, जो कुछ करो, मेरे समर्पण करो, यही पूर्ण सन्यास है। आप मोक्ष को प्राप्त होंगे। मैं माता देवहूति को भी सब कर्मों को शान्त करने वाली आत्म विद्या का उपदेश करूँगा कि जिससे यह मोक्ष को प्राप्त होगी। 

मैत्रेयजी बोले - कर्दमजी कपिलदेवजी की प्रदक्षिणा करके वन को चले गये। निर्गुण ब्रह्म में लवलीन होकर शान्तबुद्धि कर्दमजी वासुदेव भगवान में अपने चित्त को लगाकर बन्धन से छूट गये।

।। कपिल देव द्वारा उत्कृष्ट भक्ति के लक्षणों का वर्णन ।।

कर्दमजी जब वन को चले गये तब देवहूति को प्रसन्न रखने की इच्छा से कपिलदेव जी बिन्दु सरोवर में वास करने लगे। एक समय देवहूति ने कहा - हे प्रभो ! विषयों से अब मुझको वैराग्य हो गया है। हे देव ! आप सम्मोह को नाश करने योग्य हो । मैं प्रकृति पुरुष के जानने की इच्छा करके आपकी शरण आई हूँ। 

मैत्रेयजी बोले- हे माता ! योगीजनों का योग मैं तुमसे कहता हूँ। मन से ही बन्धन का कारण है। ईश्वर में अनुरक्त हुआ मन मुक्ति का हेतु है । अभिमान से उत्पन्न हुए काम लोभादिक दोषों से रहित हो समता में आने से शुद्ध हो जाता है, उस समय पुरुष प्रकृति से परे शुद्ध ब्रह्म को, ज्ञान, वैराग्य और भक्ति से युक्त ब्रह्म स्वरूप को तथा क्षीणबल वाली प्रकृति को देखता है। भगवान ही भक्ति भाव के समान ब्रह्म प्राप्ति के अर्थ दूसरा कोई कल्याण करने वाले, सबके प्यारे, जिनका कोई शत्रु नहीं, शान्त स्वभाव साधु सब साधुओं के आभूषण रूप हैं। जो पुरुष मुझमें दृढ़ भक्ति करते हैं और सब कर्मों, स्वजनों और बन्धुजनों को भी त्याग देते हैं और अपना मन मुझमें लगाकर मेरी ही कथा को सुनते और कहते हैं वे मनुष्य अध्यात्मादि से व्यथित नहीं होते। 

हे साध्वि ! साधु लोग, सब विषयादिक संगों से रहित रहते हैं, उन महात्माओं का संग करना चाहिए। जब मनुष्य मेरी सृष्टि आदि लीलाओं का निरन्तर चिन्तन करता है, उसे इन्द्रिय विषयों से वैराग्य हो जाता है। तब वह सुगम योग मार्गों से यत्न करता है। प्राकृतिक गुणों की सेवा न करने से, वैराग्य से बढ़े हुए ज्ञान से, योग साधन से और भक्ति करनी उचित है। 

वह कैसी भक्ति है ? जिससे मैं मोक्षपद को अनायास प्राप्त हो जाऊँ। भगवान में जाकर मन लग जाता है, ऐसा ही मोक्ष-स्वरूप योग आपने वर्णन किया है, वह योग कैसा है और कितने अंग वाला है ? 

कपिल भगवान कहने लगे - शुद्ध सत्ववृत्ति वाले इन्द्रियों की वृत्ति का सत्वमूर्ति वाले भगवान में भक्ति हो तो वह मुक्ति से भी बड़ी कहलाती है। वह भक्ति निष्काम होनी चाहिए। जिनकी चेष्टा हमारे चरणों की सेवा में रहती है वे साधुजन मोक्ष की भी इच्छा नहीं करते। हे अम्ब ! उनको मोक्ष की इच्छा न होने पर भी मेरी भक्ति उन्हें मुक्त कर देती है। 

अज्ञान नष्ट होने पर भी मेरे भक्त भोग, सम्पत्ति, अणिमादिक सिद्धियों और बैकुण्ठ लोक की परमोत्तम सम्पत्ति को भी नहीं चाहते हैं तो भी वे बैकुण्ठ में ये सब पदार्थ पाते हैं। जिनको मैं आत्मा के समान प्यारा, पुत्र के समान स्नेहपात्र, सखा से समान विश्वासी, गुरु के सदृश उपदेशक, भाई के तुल्य हितकारी और इष्टदेव के समान पूज्य हूँ, वो मेरे भक्त कदापि भाग्यहीन नहीं होते और काल भी उनको नहीं मार सकता। प्रधान पुरुष का ईश्वर और सम्पूर्ण भूतों की आत्मा मैं हूँ।

।। सांख्य-योग कधन ।।

कपिल भगवान कहने लगे - हे माताजी ! अब मैं तत्वों के लक्षणों को वर्णन करता हूँ। यह आत्मा ही पुरुष है, जो अनादि है, त्रिगुण है, माया से परे है, अन्तर्यामी है, आप ही प्रकाशवान है, जिससे युक्त होने से यह जगत प्रकाशित है। सो यह जीवात्मा दैवी अप्रकट रूप और त्रिगुणमयी माया को जो आप ही प्रकट हुई, उसको अपनी लीला करके प्राप्त हुआ। 

ज्ञान छिपाने वाली, गुणों से अनेक प्रकार की विचित्र, प्रजा को रचने वाली माया को देखकर वह पुरुष ज्ञानचेष्टा से मोहित हो अपने स्वरूप को भूल गया। पुरुष साक्षी मात्र है, इसी से अकर्त्ता है, कर्त्ता आनन्दघन तथा ईश्वर ही है। 

इसके उसी कर्तृत्वाभिमान से कर्म बन्धन होता है और उसी को भोगों में पराधीनता होती है। पुरुष को कार्य, कारण, कर्त्ता इनका रूप हो जाने में कारण प्रकृति है और प्रकृति से परे जो पुरुष है उसी को कारण माना है। 

यह सुनकर देवहूति ने कहा - हे पुरुषोत्तम ! प्रकृति और पुरुष का भी लक्षण कहो। यह सुनकर भगवान कहने लगे - जिसको प्रधानतत्व कहते हैं उसको प्रकृति जानो। प्रकृति सत्वादि तीन गुणों से सम्पन्न रहती है और अव्यक्त है। चौबीस तत्वों का समूह प्राधानिक ब्रह्म कहलाता है। भूमि, जल, अग्नि, वायु, आकाश, पंच महाभूत और गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, पंचतन्मात्रा, श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, जिह्वा, नासिका, वाणी, हाथ, पाँव, लिंग, गुदा दस इन्द्रियाँ और मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार चार सगुण ब्रह्म हैं। 

जो काल है वह माया की अवस्था पच्चीसवाँ तत्व है। कितने ही परमेश्वर के प्रभाव को काल कहते हैं, जिसका भय माया के वश हुए पुरुषों को प्राप्त होता है। हे माता ! जिसमें सत्वादि तीन गुण समानता से रहते हैं और जो आप निर्विशेष है, वह भगवान कहलाता है। भगवान सबसे भीतर विराजमान है। जो बाहर विराजमान है वही भगवान काल कहलाता है। जब भगवान ने विकार को प्राप्त हुए धर्म की अभिव्यक्ति स्थान रूप प्रकृति में अपना चिदाभास वीर्य स्थापित किया तब उस माया से हिरण्यमय महतत्त्व उत्पन्न हुआ। 

तब उस महतत्व ने अपने तेज घोरतम को पान कर लिया। तब काल, धर्म, गुण के साथ जगदादि परमात्मा ने तत्वों में प्रवेश किया। परमेश्वर के प्रवेश होने से तत्वों का समूह क्षोभ को प्राप्त होकर इकट्ठा हुआ। तब इनसे अचेतन अण्ड उत्पन्न हो गया। उस हिरण्यमय अण्डकोष में परमेश्वर ने प्रविष्ट होकर अपनी शक्ति के अनेक छिद्र प्रकट किये। पुरुष क्षेत्रज्ञ परमात्मा के योग से उत्पन्न हुई बुद्धि से तथा भक्ति और वैराग्य से ज्ञान द्वारा ध्यान करें।

।। मोक्ष विधि का वर्णन ।।

कपिल भगवान कहने लगे - यह आत्मा देह में स्थित है, परन्तु देह के धर्मों से लिप्त नहीं होता। परन्तु जब पुरुष प्रकृति के सत्वादि गुणों में आसक्त हो जाता है, तब अपने स्वरूप को भूलकर अहंकार से आसक्त हो जाता है। इसी कृतत्व को मानने के अभिमान से पराधीन होकर प्रकृति के संग किये हुए कर्मों के दोषों से नाना योनियों में प्राप्त होता हुआ, कभी मरता है, कभी जन्मता है। 

जीवात्मा को चाहिए कि मन को तीव्रभक्ति, योग, वैराग्य से अपने वश में करे। यम नियम आदि योग मार्गों का अभ्यास करता हुआ चित्त को एकाग्र करता रहे, मेरे साथ निष्कपट प्रीति रखे और मेरी कथा सुने । सम भाव रखने से, बैर भाव न करने से, कुसंग को छोड़ देने से, ब्रह्मचर्य धारण करने से, मौन-व्रत से, अपने धर्म का आचरण करने से, दैव इच्छा से जो कुछ मिल जाये उसी से सन्तुष्ट रहे। थोड़ा भोजन करे, मन्नशील हो, एकांत वास करे, शान्त वृत्ति रखे, सबसे मित्रता रखे, दयालु स्वभाव रहे और मन को स्वाधीन रखे, कलत्र पुत्र आदि में दुराग्रह नहीं करे। 

साधक अहंकारवांछित आत्मा से शुद्ध आत्मा को प्राप्त होकर उसका दर्शन करे। देवहूति बोली- हे प्रभो! माया पुरुष को कभी नहीं त्यागती है और पुरुष प्रकृति को कभी नहीं त्यागता है। दोनों का परस्पर सम्बन्ध प्रतीत होता है। तब इसमें दोष आता है कि अकर्त्ता पुरुष को जिस प्रकृति के आश्रय से कर्मों का बन्धन माना है फिर उसका प्रकृति के गुणों के विद्यमान होने पर प्रकृति से वैकल्प कैसे हो सकता है ? ये मुझको सन्देह है सो आप कहिए। 

कपिलदेव जी कहने लगे-हे माता ! निष्काम धर्म करने से, निर्मल चित्त से, एकाग्रता से, पुरुष फिर उसके अतिरिक्त अन्य वस्तु देखने की इच्छा नहीं करता है। शनैः-शनैः भगवान के अंग से मन को नियुक्त करके धैर्य के ध्यान से शिथिलप्रयत्न हो जाता है। जब मन शांत हो जाये तब इस प्रकार विषय रहित हो के वैराग्य को प्राप्त मन भगवान में लीन हो जाता है। मन अकस्मात् ब्रह्म आकार हो जाता है। मैं ध्यान करने वाला हूँ ये मेरा उपास्य ध्येय है। सुख-दुःख का देखना फिर कहाँ होता है। 

क्योंकि यह योगी देहाभिमान को त्यागकर साक्षात् अपने आत्म स्वरूप को प्राप्त हो जाता है। आसन पर रहे या चला जाय, अर्थात् देववश से वहाँ आ जाय परन्तु उसे उसकी कुछ भी परवाह नहीं होती। जब तक देह के आरम्भ कर्म विद्यमान रहते हैं तब तक यह शरीर भी इन्द्रियों सहित प्रारब्ध के अधीन हुआ जीता रहता है। 

परन्तु यह योगी उस शरीर में अहंकार, अभिमान नहीं करता, क्योंकि यह समाधि पर्यन्त पूर्ण योग को प्राप्त होकर आत्मतत्व को साक्षात अनुभव कर चुका है। सब जीवमात्र आत्मा में व्याप्त है, अनन्य भाव करके ऐसा देखे वह सिद्ध कहलाता है। 

जैसे अनेक प्रकार के लम्बे चौड़े कष्टों में ज्ञान रूप होकर प्रतीत होता है, ऐसे ही माया स्थित हुआ आत्मा पृथक-पृथक योनियों के गुण भेद से अलग-अलग प्रतीत होता है। इसलिये जीतने में जिन्हें बड़ी कठिनता है ऐसी दैवी विष्णु शक्ति और सत असत् रूपा इस प्रकृति माया को भगवान की कृपा से जीतकर यह जीवात्मा ब्रह्म स्वरूप होकर स्थित रहता है।

।। भक्ति योग एवं योगाभ्यास का वर्णन ।।

देवहूति ने कहा- हे भगवान् ! महतत्व आदि को तथा प्रकृति और पुरुष लक्षण और इन सबका असली स्वरूप कैसे जाना जाये ? हे प्रभो ! इन सबका मूल क्या है ? मैत्रेयजी बोले-कपिल देव अपनी माता के वचनों को सुनकर सराहना कर कहने लगे - हे भामिनी ! भक्ति-योग का मार्ग अनेक प्रकार का है। क्योंकि मनुष्यों की प्रकृति सत, रज, तम गुणों वाली होने से यह भेदभाव को प्राप्त हो जाता है। 

नवधा भक्ति फल से सत्ताईस प्रकार की हो जाती है, और फिर वही नवधा भक्ति इक्यासी प्रकार की हो जाती है। प्रथम भक्ति संतों की संगति, दूसरी श्रवण हिंसा, दम्भ मत्सरता इन तीन में से किसी भाव से मेरी भक्ति करे वह तामसी है। जो विषय भोग यश, ऐश्वर्य वृद्धि को हमारी भक्ति करे तो वह राजसी है। जो कर्मों को परमेश्वर के समर्पण करता हुआ मेरा भजन करे वह सतोगुणी है। जो अन्तर्यामी में मन की गति लगावे यह भलानुसन्धान की इच्छा रहित और विच्छेद रहित भक्ति होती है। 

यह निर्गुण भक्ति है, जो पुरुषोत्तम की भक्ति के अतिरिक्त और किसी की आशा नहीं करते हैं। जब जीवमात्र में मेरी भावना से हृदय शुद्ध हो जाता है। महात्माओं का सत्कार करने से, दुखियों पर दया करने से, समान वाले से मित्रता करने से, यम नियम साधन करने से, शरीर शुद्ध हो जाता है। 

ब्रह्म-विद्या को श्रवण करने से, मेरे नामों के संकीर्तन करने से, सरल भाव करने से, अहंकार का त्याग कर देने से मन निर्मल हो जाता है। इस प्रकार मेरे धर्मों के आचरण वाले इन गुणों से पुरुष का अन्तःकरण शुद्ध हो जावे, तब वह मुझको प्राप्त होता है। मैं सब जीवों में सदा रहता हूँ, मेरी अवज्ञा करके जो केवल मूर्ति का पूजन करता है, वह विडम्बना मात्र है। सब प्राणियों में विद्यमान सबकी आत्मा (ईश्वर) जो मैं हूँ, सम्पूर्ण में विराजमान मैं हूँ, मुझसे जो द्वेष रखता है, उस पुरुष का मन कभी शान्त नहीं होता। 

हे माता ! जो आपका अपमान करता है, उस पर मैं कभी प्रसन्न नहीं होता। जो प्राणी अपने और दूसरे में भेद करता है उनको मैं मृत्यु रूप होकर कष्ट देता रहता हूँ। इस कारण सब जीवों का अन्तर्यामी मैं हूँ। 

।। काल प्रभाव का वर्णन ।।

कपिलदेव जी कहने लगे - हे माता ! इस सम्पूर्ण चराचर में जीवधारी श्रेष्ठ हैं, उनसे प्राणधारी श्रेष्ठ हैं, उनसे इन्द्रियों के ज्ञान वाले श्रेष्ठ हैं, उनसे स्पर्श ज्ञानी श्रेष्ठ हैं, उनसे रस जानने वाले श्रेष्ठ हैं, रस जानने बालों से गन्ध जानने वाले अच्छे हैं, गन्ध जानने वालों से शब्द जानने वाले श्रेष्ठ हैं, शब्द जानने वालों से स्वरूप जानने वाले श्रेष्ठ हैं, उनसे अधिक चरणों वाले श्रेष्ठ हैं, उनसे चौपाये और चौपाये से मनुष्य श्रेष्ठ है। 

मनुष्यों में चार वर्ण श्रेष्ठ हैं। वेदपाठियों में अर्थ को जानने वालों में सन्देह निवारण करने वाले श्रेष्ठ हैं। उनमें जो वेद विहित कर्म करते हैं, निष्काम कर्म वाले उत्तम हैं। वह उन निष्काम कर्मों को मेरे समर्पण कर देता है। माता ने पूछा -जीव की संसृति तथा काल का स्वरूप कहो। 

भगवान कहते हैं - हे माता ! जो व्यतिरेक भगवद्रूप है, वो ही दैव कहलाता है। इसी विष्णु स्वरूप यज्ञ फलदाता को कालरूप कहते हैं। इस कलात्मक भगवान का न तो कोई प्रिय है, न मित्र है, न बन्धु है। जिसके भय से वनस्पति वृक्ष, लता, औषधि, फूल-फल प्रकट करती हैं नदियाँ बहा करती हैं, समुद्र मर्यादा को नहीं त्यागते। 

जिसके भय से अग्नि जलती रहती है, पृथ्वी नहीं डूबती तथा आकाश श्वास लेने वालों को अवकाश देता है। इसी के भय से महतत्व लोकरूप बनाकर विस्तार करते हैं। जिसके भय से ब्रह्मा, महेश, बारम्बार इस जगत को रचते, पालते और संहार करते हैं। पिता पुत्र से आदि जन को उत्पन्न करता है और मृत्यु से अन्त तक को यही मारता है।

।। तामसी गति का वर्णन ।।

कपिलदेव जी बोले-जीव काल के पराक्रम को नहीं जान सकता। मनुष्य सुख के अर्थ जिस काम को करने लगता है उस काम को काल नष्ट कर देता है। स्त्री पुत्रादि कुटुम्बियों के पालन पोषण की चिन्ता से यह मनुष्य हिंसा आदि पाप कर्मों को करता है। स्त्रियों की माया, बालकों की तोतली बातें आदि जिस घर में हैं उसमें निवास करता हुआ उन दुःखों को ही सुख के समान मानता है। 

हिंसा से जीवों को क्लेश देता हुआ, द्रव्य इकट्ठा करके अपने कुटुम्ब का पोषण करता है, और अन्त समय अकेला नरक में जाकर गिरता है। जब कुटुम्ब के पालन करने की सामर्थ्य नहीं रहती है, तब वे स्त्री पुत्रादि भी उसका आदर नहीं करते। इतने पर भी ज्ञान और वैराग्य उसको नहीं होता । पुत्रवधू के लिए टूकों को कुत्तों की तरह खाता है परन्तु तो भी मनुष्य को वैराग्य नहीं आता। 

इस प्रकार यह कामी पुरुष पीड़ा से अचेत होकर मर जाता है। उस समय लाल नेत्रों वाले यमदूत आते हैं। उनको देखकर पापी काँपने लगता है। नरक का दुःख भोगने के अर्थ उस जीव को गले में फाँसी डालकर ले जाते हैं। उन दूतों के धमकाने से पापी का हृदय फटता है, शरीर काँपने लगता है, उससे अपने पापों का स्मरण करता है। भूख प्यास से पीड़ित सूर्य, दावानल और उष्ण वायु से सन्तप्त होकर, बालू के ऊपर चलता है, जहाँ न कोई ठहरने का स्थान है, न कहीं जल है, यमदूत निर्दयता से चाबुक मारते हैं तो मूर्छा आ जाती है, सचेत होने पर फिर उठकर चलता है। 

इस प्रकार पापी को निर्दयी यमदूत अन्धकार वाले यमलोक में पहुँचाते हैं। कहीं उनके शरीर को जलाते हैं, कहीं उसका मांस काटकर उसी को खिलाते हैं। कहीं उस जीव की आँतें कुत्ते और गीध निकाल लेते हैं, और साँप बिच्छू, डाँस आदि के काटने से क्लेशित हो वह प्राणी अपने पापों का फल भोगा करता है। 

हे माता! यह भी प्रसिद्ध है कि यहाँ ही नरक और यहाँ ही स्वर्ग है। नरक में होने वाली पीड़ा यहाँ भी देखने में आती है और जो धर्म करते हैं उनका स्वर्ग भी यहाँ ही है। प्राणी के कर्म साथ जाते हैं। 

उसको अपने पाप का फल अकेले ही भोगना पड़ता है। जब पाप क्षीण होता है, तब पवित्र होकर उन्हीं पूर्वोक्त कर्मों को करता है फिर उसी गति को पाता है। इस प्रकार यह संसार कभी निवृत्त नहीं होता ।

फिर अपने पूर्व जन्मार्जित कर्मों के प्रभाव से यह जीव वीर्य के आश्रय होकर स्त्री के उदर में पहुँचता है। वीर्य और रज का मेल होकर केवल गदला सा जल होता है। फिर पाँच रात में गोल बबल बनता है। दस दिन में बेर के समान हो जाता है, फिर अण्डे का सा आकार बन जाता है। प्रथम महीने तथा दूसरे महीने में जीव के हाथ पाँव आदि उत्पन्न होते हैं। तीसरे महीनों में नख, रोम, अस्थि, चर्म, लिंग और गुदा के छिद्र उत्पन्न होते हैं। चौथे महीने में सात धातु उत्पन्न होते हैं। पाँचवे महीने में क्षुधा तृषा उत्पन्न होती है। छठे महीने में जरायु से लिपट कर दाहिनी कोख में घूमा करता है और माता के भोजन से उसकी धातु बढ़ती है। इसकी माता जो दुःसह पदार्थ खाती है, उससे इसका शरीर सूज जाता है और पीड़ा होने लगती है। कोई-कोई दुष्ट स्त्रियाँ टिकरे चबाती हैं उससे इस गर्भ को बड़ा दुःख होता है। यह पेट के भीतर जेर से बंधा और बाहर माँ की आँतों से बंधा, नीचे योनि की ओर मुख किए कमान के समान टेढ़ी पीठ झुकाये पड़ा रहता है, हाथ पाँव तक चला नहीं सकता । वहाँ इसको सौं जन्मों के कर्म स्मरण हो आते हैं वह लम्बे-लम्बे श्वांस ले लेकर पछताता है। 

तब वह दुःखी होकर बारम्बार परमेश्वर की स्तुति करता है। जीव कहता है कि परमेश्वर के जो चरण कमल हैं उनकी मैं शरण को प्राप्त होता हूँ, वे भगवान मेरी अवश्य रक्षा करेंगे क्योंकि भगवान की कृपा बिना ज्ञान नहीं और ज्ञान बिना मोक्ष नहीं। 

माता के देह, रक्त, विष्ठा, मूत्र के गर्त में पड़े हुए अत्यन्त दुखी, मुझ जीव को हे नारायण ! कब बाहर निकालेंगे। गर्भ से बाहर निकालकर इस मोहमय संसार में आना नहीं चाहता क्योंकि बाहर निकलते ही तुम्हारी माया घेर लेती है। इसलिए अब मैं यहीं अपनी आत्मा का इस संसार से उद्धार करूँगा और आपके चरणों को हृदय में धारण करूँगा। जिससे फिर कभी गर्भ में निवास का दुःख मुझको भोगना न पड़े। 

कपिल भगवान बोले- हे अम्ब ! इस प्रकार वह जीव परमेश्वर की स्तुति करता है, उसको बाहर निकलने के अर्थ सूतिका वायु उसको तत्काल पृथ्वी पर फेंक देता है। वह बाहर निकलता है तो उसका सब ज्ञान नष्ट हो जाता है। विपरीत गति को प्राप्त होकर सब ज्ञान नष्ट हो जाने से बारम्बार रोने लगता है। यह जीव बालपन के पाँच वर्ष पर्यन्त दुःखों को भोगता है। 

युवा अवस्था में जब मनोरथ सिद्ध नहीं होता तब बड़े क्रोध व शोक में मग्न होकर रहता है। फिर स्त्री भोग करने में ही उद्यम करने वाले पुरुषों की संगति में पड़कर उसी मार्ग में चलने लगता है और कुसंगति के प्रभाव से पहले कहे हुए नरकों में फिर पड़ता है। 

दुष्ट जनों के संग से सत्य, शौच, दया, मौन धारण, बुद्धि, लक्ष्मी, लज्जा, यश, क्षमा, ऐश्वर्य, सब नष्ट हो जाते हैं। स्त्रियों का संग करने से मोह बन्धन होता है, ऐसा मोह बन्धन अन्य किसी प्रसंग से नहीं होता। जिसको मेरी सेवा से आत्म लाभ भी हो गया हो वह यदि योग की सिद्धि चाहे तो वह स्त्रियों का संग कदापि न करे, क्योंकि मुमुक्षु के अर्थ स्त्री नरक का द्वार कहलाती है। इसलिए उस भगवान की माया को दैव से प्राप्त अपनी मृत्यु समझनी चाहिए।

।। देवहूति को ज्ञान प्राप्त होना ।।

मैत्रेयजी बोले- इस प्रकार कपिल भगवान के वचन सुन देवहूति भगवान को प्रणाम कर उनकी स्तुति करने लगी। हे देव ! आपके स्वरूप का ब्रह्मा भी केवल ध्यान ही करते हैं, साक्षात् नहीं करते । सत्य संकल्प और अद्भुत शक्ति वाले आप, मायारूपी बालक बनकर मेरे उदर में कैसे आये ? हे विभो ! आप पापी पुरुषों को दण्ड देने के अर्थ और भक्तजनों के ऐश्वर्य को बढ़ाने के अर्थ अपनी इच्छा से देह धारण करते हो। 

हे भगवान! आपके मन श्रवण, कीर्तन, प्रणाम, स्मरण करने से चाण्डाल भी यज्ञ करने के योग्य हो जाता है। बिना पुण्य भगवद् भजन करना अत्यन्त दुर्लभ है। ब्रह्म स्वरूप, परम पुरुष, वेद गर्भ को मैं बारम्बार प्रणाम करती हूँ। 

कपिल भगवान दयालु हो देवहूति के प्रति कहने लगे- हे माता ! मेरे कहे हुए इस मार्ग में स्थित होने पर तुम जीवन्मुक्ति को प्राप्त हुई हो। क्योंकि मेरे कहे हुए ज्ञान द्वारा मेरे स्वरूप की प्राप्ति होती है। 

मैत्रेयजी बोले-कपिलदेवजी देवहूति को अपनी आत्मागति दिखाकर और आज्ञा लेकर वहाँ से चले गए। तब देवहूति भी अपने पुत्र के कहे हुए मार्ग से योग धारण कर उस बिन्दु-सरोवर पर निवास करने लगी। उग्र तप धारण करती हुई देवहूति वहाँ रहने लगी। पीछे कपिल भगवान के उपदेशों के अनुसार अखण्ड समाधि में स्थित हो गई। इस प्रकार थोड़े ही काल में देवहूति भगवान को प्राप्त हो गई। 

जहाँ पर देवहूति को मुक्ति प्राप्त हुई वह स्थान सिद्ध पद नाम से प्रसिद्ध है और देवहूति का विमल शरीर नदी स्वरूप होकर अब भी विद्यमान है। महायोगी कपिलदेवजी माता की आज्ञा से उत्तर दिशा की ओर चले गए। 

भगवान कपिल देवजी तीनों लोकों की शान्ति के निमित्त सावधान हो योग धारण करके अब तक उसी स्थान पर विराजमान हैं। हे विदुर ! जो कपिल देव भगवान के कहे आत्म प्राप्ति के साधनों में अत्यन्त गुप्त मत को सुनता अथवा सुनाता है वह बैकुण्ठ को प्राप्त होता है।

॥ श्रीमद् भागवत महापुराण तृतीय स्कंद समाप्त ॥