दूसरा स्कन्द प्रारम्भ।। भगवान के विराट रुप का वर्णन ।।
श्री शुकदेवजी कहते हैं - हे राजन् ! जिन गृहस्थों को आत्मा का ज्ञान नहीं है उनको बहुत से विषय सुनने चाहिए। क्योंकि वह दिन रात गृहस्थी के झगड़े में ही फँसे रहे तो कुछ भी नहीं जान सकते। उनकी आयु गृहस्थी में बीत जाती है।
हे राजन् ! जो शास्त्र की विधि अथवा निषेध को ग्रहण नहीं करते हैं तथा जो ब्रह्म में लय हो गए वे ही भगवान श्रीहरि के गुणनुवादों को श्रवण करके प्रसन्न हुआ करते हैं। मैं जिस पुराण का वर्णन कर रहा हूँ वह श्रीमद् भागवत के नाम से प्रसिद्ध है। जो इसको सुना करता है, उसको निष्काम भक्ति प्राप्त होती है।
जब दीर्घकाल तक जीवित रहने पर भी उसके जान लेने में समर्थ नहीं होते तब उस दीर्घ जीवन को निष्फल जानना चाहिए। यदि जीवन का मुहूर्त भी इस ज्ञान का लाभ कर ले तो उस जीवन को ही उत्तम कहा गया है।
हे राजन् ! देवासुर संग्राम में देवताओं ने राजा खटवांग को वर देना चाहा। राजा ने पूछा जीवन कितना शेष है ? उन्होंने केवल चार घड़ी शेष बताया। राजा तुरन्त विमान द्वारा बैकुण्ठ से अयोध्या आया और दो घड़ी में सारी कामनाओं को छोड़ भगवान वासुदेव का सहारा ले मुक्त हो गया। आपकी आयु में तो अभी सात दिन बाकी है। अतएव आपको परलोक के हितकर कामों को करना चाहिए। मनुष्य को यही उचित है कि अन्त समय पर विषय कामना छोड़कर वैराग्य का अवलम्बन करे। पण्डित को जल में स्नान कर निर्जन स्थान में आसन पर विराजित हो ॐ कार का अभ्यास करना चाहिए। धारणा के सिद्ध होते ही योग की सिद्धि हो जाती है।
परीक्षित बोले- हे ब्रह्मन् ! उस धारणा को किस तरह किया जाता है। श्री शुकदेवजी ने कहा- हे राजन् ! मैं भगवान के विराट स्वरूप का वर्णन करता हूँ सो आप एकाग्रचित्त होकर सुनिये । भगवान वासुदेव के सारे रूपों में विराट रूप यह है जहाँ भूत भविष्य वर्तमान सब विश्व रूप ईश्वर में ही दिखाई दिया करता है।
भूमि, जल, अग्नि, पवन, आकाश, अहंकार, महत्तत्व, यह सात आवरण समेत देह में विराट पुरुष विद्यमान है । सो इन धारणाओं का आश्रय भगवान से ही है। सर्वव्यापी भगवान के चरणामूल से पाताल और एड़ी में रसातल जानना। एड़ी के ऊपर गांठों के हिस्सों में महातल, उसकी जांघ में तलातल है। सुतल-लोक दोनों उरू हैं, जंघा में महातल विद्यमान है, नाभि में नभस्थल है, हृदय में स्वर्ग है। महालोक ग्रीवा में, जनलोक बदन में और तन लोक उनके ललाट में है। बाहु में तेजोमय इन्द्र इत्यादि, कानों में सारी दिशायें, श्रोत में शब्द, नासिका में अश्विनीकुमार, घ्राणेन्द्रिय में गन्ध, और मुख में प्रकाशन अग्नि अवस्थान करते हैं। नेत्र गोलक अन्तरिक्ष, सूर्य उनकी आँख है, दिन-रात भगवान के दोनों पलक हैं, ब्रह्मपद भोहों का चलना है, तालु इनका जल है, जीभ रस है, शिर अनन्त वेद है, दाढ़ यमराज है, स्नेह दांत, माया हँसी, विश्व की रचना उनका कटाक्ष है। ऊपर का ओठ लज्जा, निचला ओठ लोभ, हृदय धर्म, पीठ अधर्म का मार्ग और उपस्थ प्रजापति हैं। अण्डकोष मित्रा वरुण, और सातों समुद्र उस विराट पुरुष की कोख हैं। उनके हाड़ सारे पहाड़ हैं, उनकी नाड़ी सारी नदियाँ हैं, देह के रोऐं सारे पेड़ हैं।
हे परीक्षित! भगवान श्रीहरि विश्व रूप हैं। पवन को उनका सांस जानना चाहिए। गति, अवस्था, गुण, प्रवाह और संसार को उस ईश्वर का कर्म समझना चाहिए। उनके मस्तक के केश घटा हैं, संध्या उनके कपड़े हैं, छाती प्रातःकाल है और चन्द्रमा उनका मन कहा गया है। महत्तत्व विज्ञान शक्ति है। श्री महादेव को उनका अन्तःकरण जानना चाहिए। उनके नाखून हाथी, घोड़े, ऊँट और खच्चर हैं, नितम्ब मृग व पशु हैं। सारे पक्षी परमेश्वर के शब्द शास्त्र हैं। सारे मनुष्यों के मन परमेश्वर के शब्द शास्त्र हैं। सारे मनुष्यों के मन परमेश्वर की बुद्धि हैं। गन्धर्व विद्याधर और चारण इत्यादि अप्सरा हैं और उनका पराक्रम असुरों की सेना है। मुख ब्राह्मण, भुजा क्षत्रिय, ऊरू वैश्य, उनके पैर शूद्र हैं। देवताओं सहित यज्ञ को विराट पुरुष का वीर्य जानना चाहिए। मोक्ष की चाहना करने वाले इस स्थूल देह में मन को अपनी बुद्धि से धारण करते हैं। इसके परे कुछ विद्यमान नहीं है। जो केवल आत्मा का बुद्धि द्वारा अनुभव करके दर्शन किया करते हैं और चित्त लगाकर परमेश्वर को भजते हैं उनकी मुक्ति होती है।
।। योगी पुरुष का विवरण ।।
श्रीशुकदेवजी ने कहा- हे परीक्षित ! प्रलय के अन्त में श्री ब्रह्माजी प्रथम सृष्टि को भूल गये थे। श्रीहरि ने उन्हें धारणा शक्ति दी जिससे वे फिर उसकी रचना कर सके । स्वर्ग इत्यादि के मिल जाने पर आदमी असत्य सुख कदापि नहीं भोग सकता। इसी कारण बुद्धिमान् केवल प्राण धारण के उपयुक्त विषयों का ही भोग करते हैं। यदि भूमि है तो पलंग की क्या आवश्यकता ? बाहु हैं तो तकिये का क्या प्रयोजन ? अँजली है तो गिलास का क्या ? पेड़ों की छाल है तो कपड़ों की क्या आवश्यकता ? भोजन ही पेड़ों में फल लगा करते हैं। नदियों में जीवों के लिए ही पानी बहता है। कन्दराओं में निवास करने को कौन मना करता है।
भगवान श्रीहरि अन्तःकरण में स्वयं सिद्ध हैं, वे आत्म हैं, इस कारण उनका भजन करना चाहिए, उनका भजन करने पर माया मिट जाया करती है । मनुष्य के हृदय में जो एक अंगुष्ठ के बराबर पुरुष निवास करता है वह चार भुजा वाला है। चरण, पंख, शंख और चक्र के चिन्हों से युक्त है। हाथ में गदा लिये प्रसन्नमुख, खुली हुई आँखें, वस्त्र पीतवर्ण, हृदय में लक्ष्मी विराजित और गले में कौस्तुभ-मणि शोभा पा रही है। गले में बनमाला पड़ी हुई है। मेखला, अँगूठी, पाजेब और कंकण इत्यादि गहनों से शोभित है। देह चिकनी, बाल घुँघराले, मुस्कान मधुर और मन को हरने वाली है। वे ईश्वर चिन्तन करने पर प्रकट हो जाते हैं। दर्शन होने पर बुद्धि निर्मल हो जाती है।
जिस समय भक्ति उत्पन्न न हो, तब आबाल क्रिया का अनुष्ठान कर उसके स्थूल रूप का चिन्तन करना चाहिए। जब योगी शरीर छोड़ने की कामना करता है, तब एकाग्रचित से सुखासीन हो प्राण-वायु को लय करता है। फिर मन बुद्धि को अपने द्रष्टा में, उस द्रष्टा को विशुद्ध आत्मा और आत्मा को परब्रह्म में लीनकर विश्राम पा लेता है। देवता भी उस आत्मा पर अपनी प्रभुता नहीं दिखा सकते। उस दशा में सत्व, रज, तम, अहंकार तत्त्व और महत्त्व यह सब दूसरी बार उनकी सृष्टि करने को समर्थ नहीं हुआ करते। वे योगीजन आत्मा के सिवाय श्रीहरि के चरण कमलों का चिंतन करते हैं। इस कारण उस विष्णुपद को सारे पदों से उत्तम समझना चाहिए।
इस प्रकार शास्त्र के ज्ञान-बल से ब्रह्मनिष्ठ मुनि उपराम को प्राप्त हो जाये। मन को स्थिर करके एड़ी से गुदा-द्वार को रोककर पवन को नाभि आदि छः चक्रों में चढ़ाये । नाभि में स्थित पवन को हृदय में लाकर वहाँ उदान-वायु द्वारा छाती में ले जाये, फिर धीरे-धीरे अपने तालु में उस पवन को ले जाये। तालु में से दोनों भृकुटियों के मध्य भाग में ले आये। किसी वस्तु की चाहना न करे। आधा मुहूर्त आज्ञाचक्र में ठहर कर ब्रह्मरूप को प्राप्त हो । ब्रह्मरन्ध्र का भेदन कर शुद्ध दृष्टि से देह और इन्द्रियों को त्याग दे। यह सद्योमुक्ति है।
अब क्रममुक्ति वर्णन करते हैं - हे राजेन्द्र ! मृत्यु समय जो वासना प्राणी की होती है कि सब लोकों के भोग भोगता ही जाऊँ तो मन इन्द्रियों सहित जीव जाता है। विद्या, तप, योग, समाधि वालों को यह गति प्राप्त होती है। योगीजन ब्रह्मलोक मार्ग से तेजोमय सुषुम्ना नाड़ी द्वारा अग्नि देवता को प्राप्त होता है। पश्चात ऊपर शिशुमार चक्र को प्राप्त होता है। शिशुमार चक्र का उल्लंघन करके रजोगुण रहित अति सूक्ष्म शरीर करके अकेला योगी महर्षि लोक को प्राप्त होता है।
इसके अनन्तर कल्पान्त में श्रीशेष जी के मुख की अग्नि से जगत को दग्ध हुआ देखकर ब्रह्म-लोक को जाना जाता है। गति तीन प्रकार की होती है। जो बहुत पुण्यदान करने से मिलते हैं कल्पान्तर में पुण्य की न्यूनाधिकता के अधिकारी होते हैं। जो हिरण्यगर्भ आदि के उपासना बल से जाते हैं वे ब्रह्म के संग मुक्ति पाते हैं।
जो भागवत के उपासक हैं वे अपनी इच्छा से ब्रह्माण्ड को भेदकर विष्णुलोक को जाते हैं। यह योग प्रथम लिंगदेह से पृथ्वीरूप होकर जलरूप हो जाता है। फिर शनैः शनैः ज्योतिर्मय अग्निरूप हो जाता है। समय पाकर तेजरूप से पवनरूप को प्राप्त होकर व्यापकता से परमात्मा को प्रकाश करने वाले आकाश को प्राप्त किया जाता है।
तामस, राजस, सात्विक तीन प्रकार का अहंकार होता है। जड़, भूत, सूक्ष्म, तामस से, बहिर्मुख दस इन्द्रियाँ राजस से, मन इन्द्रियाँ और देवता सात्विक से उत्पन्न होते हैं। जिससे जिसकी उत्पत्ति है उसी से उसका लय होता है। योगी भूत सूक्ष्म इन्द्रियों से लय, मनोमय देवमय अहंकार की गति से प्राप्त होकर महतत्त्व को प्राप्त होता है।
हे राजन! अनन्तर यह योगी प्रधान रूप से शान्त आनन्दमय परमात्मा को प्राप्त हो जाता है, जो मनुष्य इस भगवद् गति को प्राप्त हो जाता है फिर वह संसार में आसक्त नहीं होता।
श्री शुकदेजी कहते हैं कि - हे राजन् ! जो तुमने वेद में गाए हुए सनातन मार्ग पूछे सो हमने तुम्हारे आगे कहे। भगवान ब्रह्मा ने अपनी बुद्धि से सम्पूर्ण वेदों को तीन बार विचार कर यही निश्चय किया कि जिस मार्ग से भगवान में भक्ति हो वही मार्ग श्रेष्ठ है।
हे राजन् ! इस कारण सबकी आत्मा हरि भगवान, सर्वत्र सब काल में श्रवण और कीर्तन करने योग्य है। यही भगवान मनुष्यों के स्मरण करने योग्य हैं। जो भक्तजन हरि भगवान के अमृत को पान करते हैं, वे अन्तःकरण को पवित्र करते हैं और नारायण के चरणारविन्दों के समीप जाते हैं।
।। अभीष्ट फल के लाभ का उपाय वर्णन ।।
श्रीशुकदेवजी परीक्षित से बोले- हे राजन्! जो मरण हार मनुष्य हैं उनको हरि भगवान की कीर्ति का श्रवण कीर्तन करना श्रेष्ठ है। परन्तु अनेक कार्यों की फल प्राप्ति के निमित्त अन्य देवताओं का भी पूजन करें। ब्रह्मतेज को बढ़ाने की कामना हो तो ब्रह्मा का पूजन करें। इन्द्रियों की तुष्टता चाहे तो इन्द्र का पूजन करें। सन्तान की वृद्धि चाहे तो प्रजापतियों का पूजन करें। लक्ष्मी की इच्छा हो तो अग्निदेव का पूजन करें। धन की कामना हो तो वसुओं का पूजन करें। वीर्य बढ़ाने की इच्छा हो तो ग्यारह रुद्रों का पूजन करें।
अन्न आदि पदार्थों की कामना करने वाला मनुष्य अदिति को पूजे । स्वर्ग प्राप्त करने की इच्छा हो तो बारह आदित्यों की पूजा करे। राज्य की कामना हो तो विश्वदेवों का पूजन करें। देश देशान्तर की प्रजा को वश में करना चाहे तो साध्य देवताओं का पूजन करें। आयु बढ़ाने की इच्छा हो तो अश्वनी कुमारों की पूजा करे।
पुष्टि की कामना हो तो पृथ्वी का पूजन करे। जो प्रतिष्ठा बढ़ाने की कामना हो तो पृथ्वी स्वर्ग की उपासना करे। रूप की इच्छा हो तो गन्धर्वों का पूजन करें। स्त्री की कामना हो तो उर्वशी अप्सरा का पूजन करें।
सबका स्वामी होना चाहे तो परमेष्ठिनाम ईश्वर की उपासना करे। यश की इच्छा हो तो यज्ञ भगवान को पूजे । धन इकट्ठा करने की कामना हो तो वरुण अथवा कुबेर का पूजन करे। विद्या की कामना वाला श्रीमहादेव का पूजन करे। परमप्रीति की इच्छा हो तो पार्वती का पूजन करे। धर्म की वृद्धि चाहे तो उत्तम श्लोक से भगवान का पूजन करे। सन्तान की वृद्धि चाहे तो पितरों का पूजन करे। रक्षा चाहे तो यक्षों का पूजन करे। बल चाहे तो मरुद्गणों का पूजन करें। राज्य की कामना हो तो मनुष्यों का पूजन करे। शत्रु का नाश करने की इच्छा हो तो पुरुष निऋति और मृत्यु की पूजा करे। सम्भोग की कामना हो तो चन्द्रमा का पूजन करे।
वैराग्य की कामना हो तो परम पुरुष भगवान की उपासना करे। जिसको किसी वस्तु की कामना न हो, अथवा सम्पूर्ण वस्तुओं की कामना हो और मोक्ष की इच्छा हो तो विष्णु भगवान का पूजन करे।
जिस कथा के सुनने से राग और द्वेष से रहित ज्ञान उत्पन्न होता है, वैराग्य हो जाता है और मोक्ष से सत् मार्ग में भक्तियोग को प्राप्त होता है, तो ऐसा कौन पुरुष है जो भगवान की कथा में प्रीति नहीं करे।
शौनकजी बोले- हे सूतजी ! राजा परीक्षित ने यह कथा सुनकर शुकदेवजी से फिर अन्य क्या पूछा सो कहिए। जहाँ राजा परीक्षित से श्रोता, शुकदेवजी सरीखे वक्ता हो तो ऐसे सन्तों के समाज में श्रीभगवान की पवित्र कथा हो वह निश्चय अनन्त फल देने वाली है। वृक्ष क्या नहीं खाते हैं ? धौंकनी क्या श्वास नहीं लेती है ? ग्राम के पशु क्या नहीं खाते हैं या विषय नहीं करते हैं ? तैसे ही भगवान से विमुख भी जीते हैं सांस लेते हैं, विषयादि में रत रहते हैं। लेकिन जिसके कानों के द्वारा भगवान का यश कभी नहीं पहुँचा, वे कान साँप के बिल के समान हैं। जिसकी जीभ से परमेश्वर का नाम नहीं निकलता वह मेंढ़क के समान है। जो भगवान को नहीं झुकाया जाता वह मस्तक केवल भार रूप है। जिन हाथों से हरि पूजन नहीं किया, वे हाथ मुर्दा के समान हैं। जिन नेत्रों से भगवान की झाँकी न निहारी और महात्माओं का दर्शन नहीं किया वह आँख मोरपंख के समान हैं। वह हृदय पत्थर से भी अधिक कठोर है जो भगवान का नाम सुनकर द्रवीभूत न हो । हे सूतजी ! आप हमारे मन के अनुकूल कहते हो इसलिए श्रीशुकदेवजी ने जो कहा सो आप वर्णन कीजिए ।
।। शुकदेवजी का मंगलाचरण ।।
सूतजी ने कहा - आत्मतत्व को निश्चय करने वाले शुकदेवजी के वचन सुनकर परीक्षित ने श्रीकृष्ण भगवान के चरणों में अपना चित्त लगा दिया और देह, स्त्री, पुत्र, घर, बन्धु, राज्य में लगी हुई ममता को त्याग दिया।
राजा परीक्षित बोले- हे ब्रह्मन् ! आपके वचनों से हमारे हृदय का अन्धकार नाश हो जाता है। अब मैं यह जानना चाहता हूँ कि भगवान अपनी माया से किस प्रकार विश्व की रचना करते हैं किस प्रकार इस जगत का पालन करके संहार करते हैं ? एक ही भगवान ब्रह्मादि अनेक जन्मों को धारण कर लीला करते हुए माया के गुणों को एक ही काल में कैसे धारण करते हैं ? इसका उत्तर आप यथार्थ कहिए।
श्री शुकदेवजी बोले- परम पुरुष परमात्मा को हमारा नमस्कार है जो साधुओं के दुःख को काटने वाले, अधर्मियों का नाश करने वाले, सम्पूर्ण सत्वगुण वालों में मूर्तिमान और परमहंस गति आश्रम वालों में स्थित मनुष्य को आत्मतत्व को देने वाले भगवान को हमारा नमस्कार है।
जिस परमेश्वर का कीर्तन, स्मरण, दर्शन, वन्दन, कथा, श्रवण, पूजन, मनुष्यों के पाप को नाश करता है, उस परमात्मा को बारम्बार नमस्कार है। किरात, भील, हूण, आँध्र, पुलिन्द, पुल्कस, आभीर, कक, यवन, खस आदि अधम भी जिस परमेश्वर के आश्रय से पवित्र हो जाते हैं उसे नमस्कार है।
जिसके चरणों की समाधि से निर्मल हुई बुद्धि करके ज्ञानीजन आत्मतत्त्व को देखते हैं, और कविजन यथारुचि प्रकट वर्णन करते हैं सो मुकुन्द भगवान मुझ पर प्रसन्न हों। उस व्याप्त रूप भगवान वासुदेव को हमारा प्रणाम है कि जिनके मुख कमलों से निकले हुए ज्ञानमय मक रन्द को भक्तजन पान करते हैं।
हे राजन् ! यही प्रश्न नारदजी ने ब्रह्माजी से किया। साक्षात् नारायण ने ब्रह्माजी से जो कहा, आगे वर्णन किया है।
।। सृष्टि वर्णन ।।
श्रीशुकदेवजी ने कहा - राजन् ! ब्रह्माजी नारदजी से बोले - हे पुत्र ! तेरा यह सन्देह ठीक है, जो तुमने मुझको भागवत लीला वर्णन करने की प्रेरणा दी। हे नारद ! जो तू हमको ईश्वर कहता है, यह तेरा वचन मिथ्या नहीं है। क्योंकि जिससे यह मेरा प्रभाव है, मुझसे परे उस परमात्मा को न जानकर तू ऐसा कहता है। मैं भगवान के प्रकाश से विश्व में प्रकाश करता हूँ ।
उस भगवान वासुदेव को नमस्कार पूर्वक हम ध्यान करते हैं कि जिसकी दुर्जयमाया से मुझको सब जीव जगत का गुरु कहते हैं। हे नारद ! सम्पूर्ण वेद, सब देवता, सम्पूर्ण लोक तथा सब यज्ञ, नारायण का रूप हैं। योग, तप, ज्ञान, ये नारायण ही की प्राप्ति के साधन हैं और इनका फल भी नारायण के ही आश्रित है। परमात्मा के रचे गये पदार्थों को मैं रचता हूँ, मुझको भी उसी ने रचा है, उसी की कृपा कटाक्ष से मैं प्रेरित हूँ और निर्गुण प्रभु के सत्व, रज, तम यह तीनों गुण जगत की उत्पत्ति, पालन, संहार के लिए माया करके अंगीकार किये हैं।
ये पंच महाभूत, देवता और इन्द्रियों के रूप गुण अध्यात्म अधिभूत इनमें ममता उत्पन्न कराकर वस्तु से नित्यमुक्त आत्मा को जन्म-मरण रूप बन्धन में फँसाते हैं। रजोगुण से जब महतत्त्व विकार को प्राप्त हुआ तब तीन प्रकार का हुआ। उसके भेद ये हैं-सात्विक, राजस, तामस ।
तामस अहंकार से पंचमहाभूत उत्पन्न करने की शक्ति हुई। सात्विक अहंकार से देवता उत्पन्न करने की शक्ति हुई। जब सब भूतों को आदि तमाम अहंकार विकार को प्राप्त हुआ तब उससे आकाश हुआ। उसका सूक्ष्म रूप और असाधारण गुण शब्द है, जो शब्द द्रष्टा और अदृश्य का बोधक है।
जब आकाश विकार को प्राप्त हुआ तक उससे स्पर्श गुण वाला वायु प्रकट हुआ। उस वायु का गुण भी शब्द है। जब वायु विकार को प्राप्त हुआ तब उससे स्पर्श रूप शब्द गुण वाला तेज उत्पन्न हुआ। जब तेज विकार को प्राप्त हुआ तब उसमें रसात्मक जल उत्पन्न हुआ।
रूप, स्पर्श, शब्द, गुण भी जल में हैं। विकार को प्राप्त हुए जल से गन्ध गुण वाली पृथ्वी उत्पन्न हुई सो पृथ्वी पूर्वतत्वों के सम्बन्ध में रस, स्पर्श, शब्द, इन गुणों से युक्त हुई। सात्विक अहंकार जब विकार को प्राप्त हुआ तब उससे मन, चन्द्रमा, दिशा, वायु, वरुण, अश्विनी कुमार, अग्नि, इन्द्र, उपेन्द्र, मित्रब्रह्म यह दश वैकारिक देवता प्रकट हुए। राजस अहंकार जब विकार को प्राप्त हुआ तब दस इन्द्रियाँ अर्थात् कर्ण, त्वचा, नासिका, नेत्र, जिह्वा ये पाँच ज्ञान इन्द्रियाँ और वाणी, लिंग, हाथ, चरण, गुदा ये पाँच कर्म इन्द्रियाँ उत्पन्न हुईं।
जब यह पंच महाभूत इन्द्रिय मन गुण न मिलने के कारण शरीर रचने में समर्थ नहीं हुए तब भगवान की शक्ति से प्रेरित सबने परस्पर मिलकर सत असत को ले दोनों प्रकार की स्थूल सृष्टि की रचना की। सहस्त्रविधवर्ष पर्यन्त यह अण्ड जल में पड़ा रहा तब परमात्मा ने जीव को चेतन किया। जो पुरुष उस अण्ड को भेदन करके निकले वह असंख्य ऊरु, चरण, भुजा, नेत्र और असंख्य मुख तथा शिर वाले हुए।
बुद्धिमान जन नीचे के सात अंगों से तल अतल आदि सात लोक की कल्पना करते हैं। परमेश्वर के मुख से ब्राह्मण, क्षत्रिय भुजा से, वैश्य जंघा से, शूद्र चरण से उत्पन्न हुए। चरणों से भूलोक, उनकी नाभि से भुव लोक, हृदय से स्वर्ग लोक व उर से महलोक है।
ग्रीवा से जनलोक, स्तनों से तपोलोक, सिर से सत्य-लोक है। ब्रह्म-लोक बैकुण्ठ सनातन है इसकी सृष्टि में अतल-लोक, उरू में वितल-लोक, जानु में सुतल-लोक, जंघा में तलातल लोक, गुल्फों में महातल-लोक हैं। इस प्रकार लोकमय पुरुष 'परमेश्वर' है।
चरणों में भू-लोक, नाभि में भुवलोक, मस्तक में स्वर्ग लोक है। इस प्रकार लोकों की रचना है।
।। पुरुषों की विभूति का वर्णन ।।
ब्रह्माजी कहने लगे - वाणी और अग्नि की उत्पत्ति स्थान भगवान का मुख है। गायत्री आदि छन्दों के उत्पत्ति स्थान भगवान के सातों धातु हैं। हव्य देवताओं का अन्न, कव्य पितरों का अन्न, मनुष्यों के अन्न की उत्पत्ति स्थान भगवान की नासिका है। अश्वनी कुमार, औषधि मोद प्रमोद का उत्पत्ति स्थान भी भगवान की नासिका है ।
रूप और तेज के उत्पत्ति-स्थान नेत्र हैं। वर्ग और सूर्य का स्थान परमेश्वर के नेत्र गोलक हैं। दिशा और तीर्थ का स्थान भगवान के कान हैं। आकाश और शब्द का उत्पत्ति स्थान कर्ण गोलक है। वस्तु के सारांशों और सौभाग्य का उत्पत्ति स्थान भगवान का शरीर है। स्पर्श गुण वाले वायु और यज्ञ का उत्पत्ति स्थान भगवान की त्वचा है।
वृक्षों का स्थान रोम है। मेघों का उत्पत्ति स्थान भगवान के केश हैं। बिजली का उत्पत्ति स्थान दाढ़ी है। पत्थर और लोहे का उत्पत्ति स्थान क्रम से भगवान के हाथ पाँव के नख हैं। लोकपालों का उत्पत्ति स्थान भगवान की भुजा है, और भू-भुव स्वर्ग लोकों का स्थान भगवान का विक्रम है। क्षेत्र, शरण कामना, वरदान का उत्पत्ति स्थान विराट भगवान का चरण है। जल, वीर्य, सृष्टि, मेघ, प्रजापति का उत्पत्ति स्थान उसका लिंग है जिससे संतानार्थ भोग करते हैं।
हे नारद ! यम, मित्र का स्थान वायु इन्द्रिय है। हिंसा, मृत्यु, निर्ऋति का उत्पत्ति स्थान गुदा है। तिरस्कार, अधर्म, अज्ञान का स्थान भगवान की पीठ है। सरोवर नदी का स्थान नाड़ी है, पर्वत भगवान के अस्थि स्थान हैं। समु और जीवों की मृत्यु का स्थान भगवान का उदर है और भगवान का हृदय अस्मदादि के लिंग शरीर का स्थान है। धर्म हमारा, तुम्हारा, सनकादि शिव ज्ञान सतोगुण इन सबों का भगवान का चित्त उत्पत्ति स्थान है।
यह सम्पूर्ण विश्व इस विराट स्वरूप के समान है। जैसे सूर्य बाहर विश्व को प्रकाशित करता है तैसे ही भगवान ब्रह्माण्ड को बाहर भीतर से प्रकाशित करता है। हे ब्रह्मन् ! भगवान की महिमा जानी नहीं जाती। उस भगवान के प्रकाशमान चरणों में सब जीवों की स्थिति है। क्षेम और अभव देने वाला भूभुर्वः स्वः इन तीनों लोकों के ऊपर महलोक है। उसके ऊपर जनलोक, सत्यलोक हैं। उसमें ईश्वर सम्बन्धी नित्य सुख, पीड़ारहित सुख, मोक्ष, यह क्रम से रहते हैं।
नैष्ठिक ब्रह्मचारी जनलोक में, वानप्रस्थ तपोलोक में, संन्यासी सत्यलोक में जाते हैं ये तीनों लोक त्रिलोकी के भीतर ही हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य इनकी घर में ही मोक्ष हो सकती है । भोग और मोक्ष का साधनरूप कर्म और उपासना दोनों दक्षिणायण उत्तरायण मार्ग हैं।
क्षेत्रज्ञ जीव इन दोनों मार्गों से चलते हैं। एक ही जीव अवस्था भेद से दोनों मार्गों से चलते हैं। एक ही जीव अवस्था भेद से दोनों मार्गों का अधिकारी है और विद्या, अविद्या, यह दो उपासना मार्ग हैं । पुरुष इन दोनों के आश्रित है। वह स्वयं उत्पन्न हुआ विराट ईश्वर अपने आपको प्रकाशित कर बाहर जगत को भी प्रकाशित करता है । जिस विराट भगवान के नाभिकमल से मैं उत्पन्न हुआ, उस समय विराट पुरुष के अंगों के बिना यज्ञ की कुछ सामग्री नहीं देखता था। तब यज्ञ सामग्रियों में यज्ञ के पशु, वनस्पति, कुशा, यज्ञ-भूमि बहुगुण वाला काल, वस्तु, औषधि, धृतादि रस, लोहा सुवर्णादि धातु, मृतिका, जल, ऋग, यजु, साम, अथर्व ये चार वेद, सब ब्राह्मण और चातुर्होत्र कर्म, मन्त्र, दक्षिणा, व्रत देवताओं के नाम सबके निमित्त, बौधायनादि कर्म पद्धति, अनुष्ठान संकल्प की क्रिया, तन्त्रगति, मति, प्रायश्चित, समर्पण यह सम्पूर्ण यज्ञ सामग्री मैंने भगवान के अवयवों से रचना करी।
इस प्रकार विराट पुरुष के अंगों से यज्ञ सामग्री से पूजन किया। तद्न्तर राजा, तुम्हारे नवभ्राता इन्द्रादि रूप से व्यक्त और अव्यक्त रूप पुरुष भगवान का पूजन करने लगे। अनन्तर अपने-अपने समय में मुनि, ऋषि पितृ देवता, दैत्यगण, मनुष्य यज्ञ द्वारा प्रभु का पूजन करने लगे। हे नारद ! उन चौबीस अवतारों की कथा को हम संक्षेप में तुम्हारे आगे वर्णन करेंगे।
।। भगवान का लीलावतार वर्णन ।।
ब्रह्माजी ने कहा- हे नारद ! जब हिरण्याक्ष पृथ्वी को पाताल ले गया तब भगवान ने 'वाराह अवतार' ले समुद्र में आ अपनी दाढ़ों से हिरण्याक्ष का पेट फाड़ डाला और पृथ्वी को दाढ़ पर रख यथास्थान रख दिया। 'यज्ञावतार' में रुचि प्रजापति को आकूती स्त्री से सुयज्ञ पुत्र उत्पन्न हुआ।
'कपिलावतार' में कर्दम ऋषि के घर देवहूती स्त्री में नौ भगिनियों सहित कपिलदेवजी ने अवतार लिया और अपनी माता को सांख्य शास्त्र का उपदेश दिया जिससे देवहूती मोक्ष को प्राप्त हुई। 'दत्तात्रेय अवतार' में अत्रि ऋषि ने जब पुत्र की इच्छा की तब भगवान ने प्रसन्न होकर कहा कि मैं स्वयं तुम्हारा पुत्र हूँगा।
इस कारण दत्तात्रेय नाम से भगवान ने अवतार लिया। 'सनकादि अवतार' में लोक रचने की इच्छा से मैंने बहुत तप किया उस तप के प्रभाव से भगवान ने सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार चार रूप धारण किये। 'नर नारायण' अवतार में दक्ष की कन्या धर्म की स्त्री मूर्ति में नर नारायण उत्पन्न किए। 'ध्रुव अवतार' में उत्तादपाद के दो पुत्र हुए।
पिता की गोद में बैठने का ध्रुव ने मन किया जब सुरुचि विमाता के दुर्वचनों सो बाधित होकर बालक को ध्रुवपद दिया, जिस पद की भृगु आदि ऊपर से, सप्तऋषि नीचे से स्तुति करते हैं। 'पृथु अवतार' में जब राजा वेन कुमार्ग में चले। ब्राह्मणों के शाप से राजा का पौरुष और ऐश्वर्य नष्ट हो गया और वह नरकगामी हुआ।
उस समय भगवान ने वेन के घर पृथु नाम से अवतार लेकर नरक से रक्षा की। पृथु राजा ने जगत के अर्थ पृथ्वी को दुहकर सम्पूर्ण अन्नादि द्रव्य उत्पन्न किया। अब 'ऋषभ-देव का अवतार' कहते हैं, आग्नीघ्र राजा की सुदेवी स्त्री से ऋषभ-देव जी उत्पन्न हुए जो समदर्शी, जड़ की नाई योग करते हुए विचरने लगे उनसे जैन मत प्रकट हुआ।
'हयग्रीवावतार' में हमारे यज्ञ में भगवान हयग्रीव उत्पन्न हुए। जिनके श्वांस लेते हुए नासिका से सुन्दर वेदमयी वाणी प्रकटी । 'मत्स्यावतार' में प्रलय के समय पृथ्वी के आश्रय रूप मत्स्य मनु ने देखा । मत्स्य ने जल में मेरे मुख से गिरे हुए वेदों को लाकर जल में जल में विहार किया। 'कच्छप अवतार' में अमृत प्राप्ति के लिए देवता और दानव जब समुद्र को मथने लगे और मदराचल पर्वत डूबने लगा। तब भगवान ने कच्छप रूप धारण कर पर्वत को अपनी पीठ पर धर लिया।
'नृसिंहावतार' में नृसिंह रूप को धारण करके भगवान ने गदा लेकर अपने सम्मुख आये हुए हिरण्यकश्यप के हृदय को संथालों पर डालकर विदारण कर दिया। 'हरिअवतार' में ग्राह ने जब गजेन्द्र का पाँव पकड़ लिया तब गजराज व्याकुल हो कहने लगा- हे लोकों के नाथ! रक्षा करो तब भगवान गजेन्द्र की पुकार पर गरुड़ पर चढ़ आये और ग्राह के मुख से गजेन्द्र का उद्धार किया।
'वामानावतार' में अदिति के पुत्रों में सबसे छोटे वामन जी हुए जिन्होंने दोनों चरणों से तीन लोकों को नाप लिया। धर्म मार्ग में चलते हुए पुरुषों की याचना के बिना समर्थजन भी स्थान से भ्रष्ट नहीं कर सकते हैं।
हे नारद ! राजा बलि ने तीसरा पग पूरा करने को अपना शरीर भगवान को समर्पण किया। 'हंसावतार' में हे नारद ! तुम्हारे बढ़े हुए भक्तियोग, ज्ञान, साधन और आत्मतत्व प्रकाशक भागवत तुम्हारे आगे वर्णन की। 'मन्वन्तर अवतार' में मन्वन्तरों में मनुवेषधारी भगवान ने अखण्डित तेज को धारण किया।
'धन्वन्तरी अवतार' में भगवान ने अपनी कीर्ति और नाम ही से महारोगी मनुष्यों के रोगों का नाश किया। यज्ञ में अमृत लाये तथा वैद्यक शास्त्र' आयुर्वेद' को प्रवृत्त किया।
'परशुरामावतार' में दैव से बढ़े ब्रह्मद्रोही वेदमार्ग त्यागी, नर्क भोगी, पृथ्वी पर कंटक रूप, ऐसे क्षत्रियों के नाशक भगवान ने अवतार धारण कर इक्कीस बार क्षत्रियों का संहार किया।
'श्रीराम चन्द्रावतार' में इक्ष्वाकु के श्रेष्ठ वंश में उत्पन्न हो राम ने रावण का नाश किया।' श्रीकृष्ण अवतार' में पूतना, शकटासुर को मारा, कागासुर का वध किया, यमलार्जुन वृक्षों को जड़ से उखाड़ डाला, यमुना जल की शुद्धि के अर्थ कालिया नाग को मथा। ब्रजवासियों को दावाग्नि से बचाया। जंभाई लेते में श्रीकृष्ण के मुख में सब लोकों को देखकर शंकित यशोदा बोधयुक्त हुई।
भगवान नन्दजी को वरुण की फाँसी से छुड़ा लाये और रात्रि में सोये हुए गोकुल- वासीजनों को बैकुण्ठ लोक दिखाया। इन्द्रदेव ने महावृष्टि करी तब सात वर्ष के श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को बायें हाथ ही छोटी अँगुली पर धारण किया। रासलीला करते हुए श्रीकृष्ण ने गोपियों के कामदेव को बढ़ाया। ब्रज युवतियों को हरने वाले शंखचूड़ के शिर को काटा।
'व्यासावतार' में संकुचित बुद्धि वालों को और थोड़ी आयु वाले मनुष्यों के अर्थ सत्यवती में अवतार लेकर वेदरूप वृक्ष की शाखा भेद करके वेदों का विस्तार किया। 'बौद्धावतार' में वेद मार्ग में निष्ठा वाले मय दानव की रची हुई अदृश्य पुरियों से लोकों का नाश करने वाले, सबकी बुद्धि को मोह कराने वाले, और लोभ बढ़ाने वाले पाखण्ड धर्म को दूर किया।
'कल्कि अवतार' में जिस समय भगवान 'कल्कि अवतार' को धारण कर शिक्षा देंगे। यह अवतारी कथा संक्षेप में हमने कही। ऐसा कौन है जो भगवान के पराक्रम गिन सके। जिस पर वे कृपा करते हैं वही निष्कपट होकर सर्वात्मा-भाव से भगवान का आश्रय ले माया से तर जाते हैं। हे नारदजी ! यह कार्य कारणरूप प्रपंच हरिरूप ही है सो सम्पूर्ण विभूतियों का संग्रह है; तुम इसको विस्तार से प्रकट करो।
।। राजा परीक्षित द्वारा प्रश्न करना ।।
राजा परीक्षित कहते हैं - हे ब्रह्मन् ! नारदजी ने जिस-जिसको जैसा उपदेश दिया सो कहिए। हे ब्रह्मन् ! ईश्वर की पंचमहाभूत देह धारण करना, विराट-भगवान का अवयव और स्वरूप और लौकिक पुरुष का अवयव स्वरूप जो समान ही है तो लौकिक पुरुष में और विराट पुरुष की जो अवयव स्थिति कही गई है सो हमारी समझ में नहीं आती है।
ब्रह्मा जिस परमात्मा की कृपा से प्राणियों की रचना करते हैं और जिस परमात्मा के स्वरूप को देखते हैं, सो कहिय। वह ईश्वर विश्व की उत्पत्ति पालन संहार करते है। माया के स्वामी अपनी माया को त्याग कर जहाँ सोते रहते हैं,
सो कहिये । लोकपालों सहित यह लोक विराट भगवान के अंगों में रचे गये हैं और इनसे उनके अवयवों की कल्पना हुई है यह हमने आपके मुख से सुना है, सो भी विस्तार पूर्वक कहिये। महाकल्प और अवान्तर कल्प कितना है ?
भविष्य, वर्तमान का वाचक काल कैसे अनुमान किया जा सकता है ? स्थूल देहाभिमानी मनुष्यादि की आयु का कितना प्रमाण है ? काल की सूक्ष्म और स्थूल प्रवृत्ति कैसे जानी जाती है ? कर्मों से उत्पन्न होने वाले स्थान कितने और कैसे हैं ? सत्य, रज, तमोगुण के परिणामरूप देवता आदि देही की इच्छा करते हुए जीव कैसे कर्मों के समुदाय से कैसे- कैसे शरीर को प्राप्त होते हैं ? पृथ्वी, पाताल, दिशा, आकाश, ग्रह, नक्षत्र, पर्वत, नदी, समुद्र, द्वीप इनकी और इनमें रहने वाले प्राणियों की उत्पत्ति किस-किस प्रकार होती है ? ब्रह्माण्ड का परिमाण कितना है ? महानुभावों के चरित्र, वर्णाश्रम धर्म और अवतारों की लीला युगों का परिमाण तथा युग-युग में जो धर्म प्रवृत्त हुए हैं वे सब कहिये ।
मनुष्यों का साधारण व्यवहारिक धर्म कहिये तथा प्रजाजनों, अधिकारियों, राजऋषियों के धर्म व उपधर्म वर्णन कीजिये। तत्वों की संख्या और उसके लक्षण, परमेश्वर का पूजन प्रकार, अष्टांग योग, अध्यात्म योग, योगेश्वरों की गति, अणिमादि द्वारा अर्चिराद मार्ग से गमन, योगीजनों के लिंगदेह का नाश, ऋगादि वेद, आयुर्वेदादि धर्मशास्त्र, इतिहास पुराणों का सार यह सब कहिये ।
सम्पूर्ण जीवों की उत्पत्ति, स्थिति, भण्डार, वैदिक और स्मार्त कर्म की विधि, धर्म-अर्थ-काम की विधि कहिये। जीवों के धर्म, प्राणियों की रचना, पाखण्ड, आत्मा के बन्धन, मोक्ष तथा अपने स्वरूप में आत्मा की स्थिति कहिये।
मैं आपके शरण हूँ आपका कहना हमको प्रमाण है। अन्य मनुष्य तो अन्ध-परम्परा से चलने वाले हैं। हे ब्रह्मन् ! ब्राह्मण के शाप के सिवाय मुझको कुछ भी व्याकुलता नहीं है। भूख प्यास से मेरे प्राण नहीं निकलेंगे क्योंकि हरि कथारूप अमृत का पान कर रहा हूँ। राजा ने भगवान की कथा के अर्थ इस प्रकार प्रार्थना की तब श्रीशुकदेवजी अत्यन्त प्रसन्न हुए। जो पूछा था सो क्रमपूर्वक कहना प्रारम्भ किये।
।। शुकदेवजी का उत्तर देना ।।
भगवान ने ब्रह्मा को अपना रूप दिखाया और आत्मतत्व शुद्धि के अर्थ सत्य उपदेश किया सो मैं कहता हूँ। ब्रह्माजी अपने आसन पर बैठकर जगत के रचने का विचार करने लगे परन्तु रचने के योग्य दृष्टि प्राप्त नहीं हुई। ब्रह्मा जी जब विचार कर रहे थे तब जल में से दो शब्द निकले, तप करो।
तब, तप शब्द के कहने वाले को देखने की इच्छा से ब्रह्माजी ने सब दिशाओं की ओर देखा। परन्तु वहाँ कुछ भी नहीं देखा। तब अपने आसन पर बैठ तप को हितकारी समझकर और उपदेष्टा के उपदेश को मानकर तप करने में मन लगाया। प्राणवायु को रोक और ज्ञान इन्द्रियों व कर्म इन्द्रियों को जीत कर ब्रह्मा ने सावधान मन से दिव्य हजार वर्ष पर्यन्त सम्पूर्ण लोकों को प्रकाशित करने वाला तप किया।
तब ब्रह्मा के तप से प्रसन्न हुए भगवान ने बैकुण्ठलोक दिखाया जिससे उत्तम अन्य लोक नहीं है। जहाँ रजोगुण और तमोगुण नहीं, शुभ सत्व स्थित है। काल का पराक्रम जहाँ नहीं चलता है और जहाँ माया का नाम नहीं है। श्याम, उज्जवल स्वरूप, पीताम्बर धारण किए, चतुर्भुजाधारी, सुन्दर तेज वाले, मालाओं से विभूषित पार्षद हैं। उस बैकुण्ठ में सम्पूर्ण भक्तों के पति लक्ष्मीपति, जगतपति, सुनन्द, नन्द, प्रबल, अर्हण आदि अपने मुख्य पार्षदों करके सेवित भगवान का ब्रह्मा जी ने दर्शन किया। भक्तों को वर देने में तत्पर, कमल समान नेत्रों से शोभायमान मुकुट और कुण्डल तथा चार भुजाओं को धारण किये, प्रकृति पुरुष, महतत्त्व, अहंकार और ग्यारह इन्द्रियों, पंचतन्मात्रा पच्चीस शक्तियों से युक्त तथा अपने सब ऐश्वर्यों से युक्त और अपनी अणिमादि सिद्धियों से युक्त अपने ही धाम से सर्वदा रमण करने वाले भगवान का ब्रह्माजी ने दर्शन किया।
उनके दर्शन से मग्न ब्रह्मा जी ने भगवान के चरण कमलों को प्रणाम किया। ब्रह्मा को अपने सम्मुख उपस्थित देखकर मन्द मुस्कान भरी प्रिय वाणी से प्रसन्न मन वाले भगवान बोले - हे वेदगर्भ ! तुमने विश्व को रचने की इच्छा से हमको बहुत प्रसन्न किया। दिव्य सहस्त्र वर्ष तप किया। यह हमारी इच्छा का प्रभाव है। हमारी ही कही हुई 'तप-तप' वाणी को सुनकर तुमने परम तप किया है।
तप मेरा हृदय है। तप साक्षात् मेरी देह है। तप मेरी आत्मशक्ति है। तप से ही मैं इस विश्व को रचता हूँ और फिर तप ही से पालन करता हूँ। तप से विश्व का संहार करता हूँ और परमतप से मेरा पराक्रम है।
यह सुन ब्रह्माजी बोले- हे भगवन् ! आप सबमें स्थित हो। सबके कर्त्तव्य को जानते हो। हे नाथ ! मैं जैसे आपके निर्गुण सूक्ष्म-स्थूल रूप को जानूँ, सो कहिये । भगवान कहते हैं - हे ब्रह्मन् ! हमारा गुप्त शास्त्रोक्त ज्ञान जो अनुभव भक्ति सम्पूर्ण साधन सहित है, वर्णन करता हूँ। स्वरूप से जैसे मैं हूँ, मेरा स्वभाव है, जो रूप गुण, कर्म है वैसा ही तत्व विज्ञान तुमको हो। इस जगत में मैं ही रहता हूँ, जो विश्व है, सो मैं ही हूँ।
प्रलय उपरान्त शेष मैं ही हूँ। वास्तव में अर्थ बिना जो प्रतीत होता है और आत्मा में प्रतीत नहीं होता है उसी माया को जानो। मेरी माया कार्य द्वारा प्रतीत होती है। जैसे पंच-महाभूत सब उत्तम, मध्यम, प्राणियों में प्रविष्ट, अप्रविष्ट के समान विदित होते हैं तैसे ही मैं उनमें हूँ और नहीं हूँ, ऐसा विदित होता है। यही मेरी सत्ता है।
सब ठौर, सब काल में जो प्रतीत होता है सो आत्मा ही प्रतीत होता है। हे ब्रह्मा ! जो तुम इस मत में अच्छे प्रकार स्थित रहोगे, तो तुम कल्पों में कभी मोह को प्राप्त नहीं होगे।
श्रीशुकदेवजी बोले - इस प्रकार ब्रह्मा जी को उपदेश करके भगवान अन्तर्ध्यान हो गये। श्री ब्रह्मा जी ने सम्पूर्ण भूतमय इस विश्व को पहले के समान रचा। ब्रह्माजी प्रजा के कल्याण की इच्छा करते हुए अपने स्वार्थ की कामना से यम नियमादि को रच, यम और नियमों में स्थित हुए। ब्रह्मा के पुत्रों में नारदजी शील, नम्रता, दम्भ आदि गुणों से पिता की सेवा करने लगे।
हे राजन् ! भगवान की माया को जानने की इच्छा कर नारद ने ब्रह्मा को प्रसन्न किया। ब्रह्मा को प्रसन्न जानकर नारदजी ने पूछा, जो आपने पूछा है। उसे ब्रह्माजी ने नारायण का कहा हुआ यह दस लक्ष्णों वाला भागवत पुराण सुनाया। हे राजन् ! नारदजी ने व्यास मुनि को यह भागवत सुनाया। जो तुमने पूछा कि विराट पुरुष से यह जगत कैसे होता है ? जो जैसे यह जगत हुआ और अन्य सम्पूर्ण तुम्हारे प्रश्नों का यथार्थ उत्तर वर्णन करूँगा।
।। श्रीशुकदेवजी का भागवत आरम्भ ।।
श्रीशुकदेवजी कहने लगे - श्रीमद् भागवत महापुराण में सर्ग, विसर्ग, स्थान, पोषण, ऊति, मन्वतर, ईशानुकथा, निरोध, मुक्ति और आश्रय ये दस लक्षण हैं। दसवें 'आश्रय' लक्षण की विशेष शुद्धि के अर्थ महात्मा वेदों के द्वारा और तात्पर्य द्वारा नवों लक्षणों का स्वरूप यहाँ वर्णन करते हैं।
सर्गादि में प्रत्येक का लक्षण कहते हैं - पंच महाभूत, पंचतन्मात्रा, ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय, अहंकार, महतत्त्व इन गुणों के परिणाम से जो विराट भगवान से उत्पन्न हुआ उसे सर्ग कहते हैं। ब्रह्मा से स्थावर, जंगम सृष्टि हुई उसको विसर्ग कहते हैं। मर्यादाओं के पालन करने को स्थान कहते हैं। श्रेष्ठ धर्म को मन्वन्तर कहते हैं। कर्म वासना को ऊति कहते हैं। अवतारों, चरित्रों और आख्यानों से बड़ी कथाओं को ईशानु कथा कहते हैं।
जीवात्मा का भगवान में लय हो जाने को निरोध कहते हैं। रूप को त्यागकर अपने स्वरूप में स्थित होने का नाम मुक्ति है। जिससे जगत की उत्पत्ति, संहार होता है उसे परमात्मा कहते हैं उसी का नाम आश्रय है।
जो आध्यात्मिक पुरुष है वह आधिदैविक है और जो इन दोनों विभाग है वह आधिभौतिक है। इन तीनों की पस्पर सापेक्ष्य सिद्धि है। एक के अभाव में एक को नहीं प्राप्त होते हैं। इनमें जो तीनों को जानता है कि आत्मा अपने आश्रय है, उसको आश्रय कहते हैं।
अब सृष्टि प्रकार कहते हैं-विराट पुरुष जिस समय अण्ड का भेदन करके निकला और अपने निवास स्थान की इच्छा की तब ईश्वर ने जल को रचा। जल में सहस्त्र वर्ष निवास किये, इस कारण नारायण नाम हुआ। भगवान ने योग से उठकर अनेक रूप होने की इच्छा से अपनी माया हिरण्यमय बीज के तीन भाग किये।
अधिदेव, अध्यात्म, अधिभूत और एक पुरुष वर्यं तीनों मेदा को प्राप्त हुआ । पश्चात् सूत्रात्मा नामक मुख्य प्राण उत्पन्न हुआ। जीवों में ईश्वर प्राणरूप चेष्टा करता है, तब इन्द्रियाँ भी चेष्टा करती हैं। सबों के चलाने वाले प्राण से भूख प्यास उत्पन्न हुई तब मुख उत्पन्न हुआ। मुख से तालु उत्पन्न हुआ । उसमें जिह्वा उत्पन्न हुई। अनेक रस उत्पन्न हुए। कुछ बोलने की इच्छा हुई तब वाणी-इन्द्रिय तथा सुन्दर शब्द उत्पन्न हुए। जब प्राण वायु भीतर धुक-धुकाने लगी तब नासिका उत्पन्न हुई। फिर वायु देवता और सुगन्धदाता घ्राण-इन्द्रिय उत्पन्न हुई, तब नेत्र उत्पन्न हुए और चक्षु इन्द्रिय उत्पन्न हुई।
जब वेदों के सुनने की इच्छा हुई तो श्रोत इन्द्रिय कान उत्पन्न हुए। वस्तुओं की कोमलता, कठिनता, हलकापन, भारीपन, गर्मी-सर्दी के जानने की इच्छा हुई तब त्वचा उत्पन्न हुई। जिसमें रोम, वृक्ष, देवता और स्पर्श विषय प्रकट हुआ । त्वचा के बाहर भीतर रहने वाले वायु करके स्पर्श के गुण का ज्ञान हुआ। उसमें पवन ने प्रवेश किया।
अनन्तर अनेक कर्मों के करने की इच्छा से सम्पूर्ण पदार्थों के धरने उठाने के कर्म योग्य दो हाथ उत्पन्न हुए। सन्तान, मैथुनादि, सुख की इच्छा हुई तब शिश्न इन्द्रिय कामप्रिय लिंग उत्पन्न हुआ। जब भोजनोपरांत मल त्याग करने की इच्छा हुई तब गुदा उत्पन्न हुई। जब विराट भगवान ने एक देह को त्याग कर दूसरा देह ग्रहण करने की इच्छा की, तब नाभि द्वार उत्पन्न हुआ। अपान, इन्द्रिय, मृत्यु देवता, ये प्रकट हुए।
जब अन्न जल ग्रहण करने की इच्छा हुई, तब कुक्षि, आंत, नाड़ियाँ हुईं। नदियाँ, समुद्र, पानी के देवता हुए, तुष्टि-पुष्टि तिनके आश्रय रूप हुईं। चिन्तन करने की इच्छा हुई, तब हृदय हुआ। जब हृदय में संकल्प तथा अभिलाषा प्रकटे तो त्वचा, चर्म, मांस, रुधिर, मेद, मज्जा, अस्थि, सात धातु हुईं।
भूमि, जल, तेजमय ये सातों धातु और सातों प्राण आकाश, जल, वायु से उत्पन्न हुई हैं। शब्दादि गुण अहंकार से होते हैं, मन सम्पूर्ण विकारों का स्वरूप है, बुद्धि विशेष ज्ञान के स्वरूप वाली है। भगवान का स्थूल स्वरूप पृथ्वी आदि आठ आवरणों से लपेटा हुआ है। इससे परे अति सूक्ष्म, अव्यक्त, विशेषण रहित आदि मध्य अन्त- रहित, नित्य वाणी और मन से परे भगवान का सूक्ष्म रूप है। चराचर को भगवान ने रचा है।
उत्तम, अधम, मध्यम, कर्म की गति हैं। जैसे कर्म करे वैसे ही योनि प्राप्त होती है। देवता सात्विक योनि हैं, मनुष्य राजस योनि हैं, तमोगुण से नरक-योनि होती है। सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण इनमें जब एक गुण के साथ दो-दो मिलते हैं तब तीन-तीन प्रकार के भेद को प्राप्त होते हैं।
जब एक अन्य दोनों से मिलता है, तब पूर्व का स्वभाव बदल जाता है और जिसका जैसा स्वभाव होता है उसकी वैसी ही गति होती है। जगत को धारण करने वाले भगवान पशु, मनुष्यादि में अवतार लेकर इस जगत का स्थापन कर पोषण करते हैं। अनन्तर काल, अग्नि, रुद्र रूप धारण करके जगत का संहार करते हैं।
यह ब्रह्म कल्प, विकल्प रहित वर्णन किया, जहाँ साधारण विधि और प्राकृतिक जगत की रचना कही है। काल का परिमाण और कल्प का लक्षण, विग्रह ये मैं तीसरे स्कन्द में वर्णन करूँगा।
शौनकजी बोले- हे सूतजी ! आपने कहा कि विदुरजी, बाँधवों को त्याग कर तीर्थों में विचरते फिरे। मैत्रेयजी और विदुरजी का ब्रह्मज्ञान सम्बन्धी सम्वाद कहाँ हुआ और मैत्रेय ने विदुर से क्या तत्वज्ञान कहा ? सो हमसे कहिये । अपने बन्धुजनों का किस कारण त्याग किया और जिस प्रकार फिर लौट आये सो कारण कहिये । सूतजी बोले-- परीक्षित ने शुकदेव मुनि से जो पूछा और जो शुकदेवजी ने उत्तर दिया सो तुमसे वर्णन करता हूँ।
Social Plugin