श्रीमद् देवी भागवत कथा


पहला स्कन्ध


त्रिविध साहित्य तथा त्रिविध श्रवणका विवेचन करते हुए पुराण की श्रेष्ठता का प्रतिपादन, मधु कैटभ को देवी का वरदान भगवान् विष्णु का योग निद्रा के अधीन होना ब्रह्माजी के द्वारा देवी की स्तुति और भगवान् विष्णु का योग निद्रा से जागरण 


ऋषियोंने पूछा- सौम्य ! अभी आपके मुखारविन्दसे निकल चुका है कि जब सर्वत्र जल-ही-जल था, उस समय मधु और कैटभके साथ भगवान् विष्णुकी लड़ाई ठन गयी, पाँच हजार वर्षोंतक युद्ध चलता रहा। अब प्रश्न होता है कि अत्यन्त पराक्रमी, किसी प्रकार हार न खानेवाले तथा देवता भी जिन्हें न जीत सके, ऐसे वे दानव उस एकार्णव- जलमें उत्पन्न ही कैसे हो गये ? 


महाप्राज्ञ! वे दानव क्यों उत्पन्न हुए और किस कारण भगवान्ने उनकी जीवन लीला समाप्त कर दी, यह बतानेकी कृपा कीजिये। यह प्रसंग बड़ा ही विलक्षण जान पड़ता है। हम सभीको सुननेकी बड़ी उत्कट इच्छा है और आप प्रसिद्ध वक्ता यहाँ पधारे ही हैं। पाँच इन्द्रियोंमें आँख और कान - ये सबसे अधिक कल्याण करनेवाली मानी जाती हैं; क्योंकि सुननेसे वस्तुका विज्ञान होता है और देखनेसे चित्तमें प्रसन्नता होती है। महाभाग ! सुनना भी तीन प्रकारका होता है- सात्त्विक, राजस और तामस । विज्ञ पुरुष इस विषयका वास्तविक विवेचन कर चुके हैं। उन्होंने वेद-शास्त्र आदिके श्रवणको सात्त्विक, साहित्य-श्रवणको राजस और युद्धसम्बन्धी तथा दूसरोंके दोष प्रकट करनेवाली बातोंके सुननेको तामस माना है। प्रकाण्ड विद्वानोंने सात्त्विक श्रवणमें भी तीन प्रकारका भेद बतलाया है- उत्तम, मध्यम और निकृष्ट ।


मोक्ष प्रदान करनेवाले श्रवणको उत्तम, स्वर्ग देनेवालेको मध्यम तथा भोग देनेवालेको अधम कहा है। विद्वानोंके निर्णय करनेपर यह बात स्पष्ट हुई है। साहित्य भी तीन प्रकारके होते हैं- जिसमें अपनी नायिकाके शृंगारका वर्णन है, वह उत्तम है। जो वेश्याओंके श्रृंगार- वर्णनसे सम्बन्ध रखता है, वह मध्यम तथा परस्त्रीके श्रृंगारका वर्णन करनेवाला साहित्य अधम माना गया है। तामस श्रवणके तीन भेद समझने चाहिये। शास्त्रका अवलोकन करनेवाले विद्वानोंने आततायीके साथ युद्धके प्रसंगको सुनना उत्तम कहा है। वैर ठन जानेपर शत्रुओंके साथ जो लड़ाई छिड़ जाती है-जैसे पाण्डवोंके साथ हुआ था, वह मध्यम है। बिना कारण विवाद खड़ाकर लड़नेका जो प्रसंग है, वह अधम है। अतएव महामते ! पुराणश्रवण सबसे श्रेष्ठ सिद्ध है। इस पावन प्रसंगके सुनने से बुद्धि बढ़ती है तथा पाप-ताप सदाके लिये शान्त हो जाते हैं। इसलिये महाबुद्धे ! अब वही पुराणविषयक पवित्र कथा सुनानेकी कृपा कीजिये!
सूतजी कहते हैं—महानुभावो ! तुम्हारे अंदर जो यह प्रसंग सुननेकी इच्छा जाग्रत हो उठी और मैं कहनेके लिये तत्पर हो गया- इससे जगत् में मैं और तुमलोग सभी कृतार्थ हो गये। प्राचीन समयकी बात है, त्रिलोकी जलमग्न हो गयी थी। केवल भगवान् विष्णु शेषनागकी शय्यापर मधु सोये हुए थे। उनके कानकी मैलसे मधु और कैटभ नामक दो दानव उत्पन्न हुए। समयानुसार उस समुद्रमें ही वे प्रतापी दैत्य तरुण हो गये। अब इधर-उधर जाकर उनका खेलना-कूदना आरम्भ हो गया। एक समयकी बात है, वे स्थूलकाय दानव समुद्रमें खेल रहे। थे। इतनेमें ही वे दोनों भाई मन-ही-मन सोचने लगे-बिना कारण कार्यका होना असम्भव है । सब जगह यही नियम लागू है। आधारके बिना आधेय किसी प्रकार ठहर नहीं सकता। हमें तो यही जँचता है कि आधाराधेयभाव सर्वथा सिद्ध है। तब 'यह सुखदायी अगाध जल किसपर ठहरा है? किसने इसकी उत्पत्ति की और क्यों की? इस जलमें हम कैसे आ गये ? अथवा हम क्यों उत्पन्न हुए और कौन हमारे जन्मदाता हैं? वे जन्मदाता पिता कहाँ हैं ?' – इत्यादि प्रश्न उनके मनमें उत्पन्न हुए और उन्होंने निश्चय किया कि हमें यह बात अवश्य जान लेनी चाहिये।


सूतजी कहते हैं-स्थिति जाननेके लिये इस प्रकारकी चेष्टा करनेपर भी मधु-कैटभ किसी निर्णयपर नहीं पहुँच सके। उस समय मधु अपने भाई कैटभके पास ही उपस्थित था। उससे वह कहने लगा।


कैटभने कहा- भैया मधु ! इस जलमें हमारी सत्ता कायम रखनेवाली भगवती शक्ति हैं। उनमें अपार बल है। वे शक्ति कभी नष्ट नहीं होतीं। मेरी समझसे वे ही इस कार्यकी कारण हैं। उन्होंने इस विस्तृत जलकी रचना की है और उन्हींके आधारपर यह जल ठहरा भी है। वे ही परम आराध्या शक्ति हमारी उत्पत्तिमें कारण हैं।


इस प्रकार वास्तविक रहस्य जाननेके लिये मधु और कैटभका मन व्यस्त था। अभी बुद्धि किसी निर्णयतक न पहुँच सकी थी, इतनेमें ही आकाशमें गूँजता हुआ सुन्दर' वाग्बीज' सुनायी पड़ा। सुनकर वे दोनों उसका अभ्यास करनेमें तत्पर हो गये। तब उस वाग्बीजकी आकृति आकाशमें इस प्रकार चमक उठी, मानो बिजली कौंध रही हो। फिर तो उन्होंने विचार किया कि यही मन्त्र है, इसमें कुछ भी संदेह करनेकी बात नहीं है। ध्यान लगाया तो उसी सगुण मन्त्रकी झाँकी उपलब्ध हुई। अब तो वे उसी मन्त्रका ध्यान और जप करनेमें लग गये। अन्न-जल छोड़ दिया। मन और इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त कर ली। यो एक हजार वर्षतक उन्होंने बड़ी कठिन तपस्या की। फिर तो वह परम आराध्या शक्ति मधु और कैटभपर प्रसन्न हो गयी। उस समय वे निश्चिन्त होकर तप कर रहे थे। उनकी स्थिति देखकर शक्तिका मन कृपासे ओतप्रोत हो गया; अतः आकाशवाणी होने लगी- 'दैत्यो! तुम्हारी तपस्यासे मैं प्रसन्न हूँ; स्वेच्छानुसार वर माँगो, उसे मैं पूर्ण कर दूँ।" 


सूतजी कहते हैं-इस प्रकारकी आकाशवाणी सुननेके पश्चात् मधु और कैटभने कहा- 'सुन्दर व्रतका पालन करनेवाली देवी! तुम हमें स्वेच्छा मरणका वर देनेकी कृपा करो।' 
आकाशवाणी हुई- 'दैत्यो! मेरी कृपासे इच्छा करनेपर ही मौत तुम्हें मार सकेगी। यह निश्चित है, देवता और दानव किसीसे भी तुम दोनों भाई पराजित न हो सकोगे।'


सूतजी कहते हैं- देवीके यों वर देनेपर मधु और कैटभको अत्यन्त अभिमान हो गया। अब वे समुद्रमें जलचर जीवोंके साथ क्रीड़ा करने लगे। द्विजवरो! कुछ समयके पश्चात् एक दिन अनायास ही प्रजापति ब्रह्माजीपर उनकी दृष्टि पड़ी। ब्रह्माजी कमलके आसनपर विराजमान थे। मधु और कैटभमें अपार बल था। ब्रह्माजीको देखकर उन्हें अपार हर्ष हुआ। युद्ध करनेके लिये इच्छा प्रकट करते हुए वे पितामहसे कहने लगे-'सुव्रत! तुम हमारे साथ युद्ध करो। यदि लड़ना नहीं चाहते तो इसी क्षण जहाँ इच्छा हो, चले जाओ; क्योंकि जब तुम्हारे अंदर शक्ति ही नहीं है, तब इस उत्तम आसनपर बैठनेका अधिकार ही कहाँ रहा।' मधु और कैटभकी यह बात सुनकर ब्रह्माजीको बड़ी चिन्ता हुई। उनका सारा समय तपमें ही बीता था। अतः अत्यन्त शूरवीर मधु और कैटभको देखकर उन्होंने सोचा, 'अब मैं क्या करूँ ?' उनके मनमें चिन्ताकी लहरें उठने लगीं। वे स्वयं किसी निश्चयपर न पहुँच सके।


सूतजी कहते हैं- मधु और कैटभ बड़े बलवान् थे । उन्हें देखकर ब्रह्माजी उपाय सोचने लगे। सभी शास्त्रोंके वे पूर्ण जानकार थे। युद्ध- सम्बन्धी साम, दान, दण्ड और भेद आदि अनेकों उपाय उनके सामने आये। सोचा, इन राक्षसोंमें वास्तविक कितना बल है—यह मैं बिलकुल नहीं जानता। शत्रुका बल जाने बिना युद्धमें प्रवृत्त हो जाना ठीक नहीं समझा जाता। ये बड़े दुष्ट और अभिमानी हैं। यदि मैं इनसे विनती करूँ तो यह निश्चित है, मैंने स्वयं ही अपनी दुर्बलता प्रमाणित कर दी। फिर, निर्बल सिद्ध हो जानेपर तो इनमेंसे कोई एक ही मुझे मार डालेगा ! इस अवसरपर कुछ देकर भी काम चलाना ठीक नहीं जँचता और भेद तो किया ही जाय किस प्रकार। अतः अब शेषनागकी शय्यापर सोये हुए जो भगवान् विष्णु हैं, इन्हें जगाऊँ। इनके चार भुजाएँ हैं और असीम बल है। ये ही मेरा दुःख दूर कर सकेंगे।


इस प्रकार मन ही मन सोचकर ब्रह्माजी कमलकी डंडी पकड़े हुए संतापहारी श्रीहरिके पास पहुँचे और उनके शरणापन्न हो गये। उस समय जगत्प्रभु श्रीविष्णु गाढ़ी नींदमें सोये हुए थे। अनेक सुन्दर शब्दोंसे सम्बोधित करके ब्रह्माजीने उन्हें जगानेके लिये स्तवन आरम्भ कर दिया।


ब्रह्माजीके स्तुति करनेपर भी भगवान् विष्णुकी नींद नहीं टूटी। उनपर योगनिद्राका पूरा अधिकार जम चुका था। तब ब्रह्माजी सोचने लगे- 'अब श्रीहरि शक्तिके प्रभावसे पूर्ण प्रभावित होकर खूब गाढ़ी नींदमें मग्न हो गये हैं। अतएव ये जाग न सके। इस स्थितिमें मुझ दुःखी जनका क्या कर्तव्य होता है? अभिमानमें चूर रहनेवाले ये दानव मुझे मारनेके लिये समीप आ गये। अब मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, कहीं कोई मेरा रक्षक नहीं दीखता । ब्रह्माजी मन-ही-मन सोचनेके पश्चात् एक निर्णयपर पहुँचे। फिर तो चित्तको एकाग्र करके उन्होंने योगनिद्राकी स्तुति आरम्भ कर दी। उनके मनमें ऐसा विचार स्थिर हुआ कि अब केवल भगवती शक्ति ही मेरी रक्षा करनेमें समर्थ हैं, जिनके प्रभावसे भगवान् विष्णु अचेत से हो गये हैं- हिल-डुलतक नहीं सकते। जिस प्रकार मरा हुआ प्राणी शाब्दिक गुणोंको समझने में असमर्थ हो जाता है, इस समय ठीक वही दशा इन भगवान् श्रीविष्णुकी हो गयी है। नींदसे आँखें बंद हैं। ये कुछ जानते ही नहीं इनकी मैंने निरन्तर इतनी स्तुति की; फिर भी ये निद्राको दूर न कर सके। समझ गया- इनके वशमें निद्रा नहीं है, किंतु ये ही निद्राके अधीन होकर रहते हैं। जो जिसके वशमें रहता है, वह उसका अनुचर है- यह बिलकुल निश्चित बात है। 
इससे सिद्ध हो गया, ये भगवती योगनिद्रा इन लक्ष्मीकान्त भगवान् विष्णुकी भी अधिष्ठात्री हैं। लक्ष्मीजी भी इन्हींके अधीन हो गय; क्योंकि पतिदेव विष्णु ही जब अधीन हो गये, तब उनकी अलग सत्ता कहाँ। इससे निश्चित होता है कि यह अखिल ब्रह्माण्ड भगवती योगनिद्राके अधीन है। मैं, विष्णु, शंकर, सावित्री, लक्ष्मी और उमा सभी इन्हीं योगनिद्राके शासनसूत्रमें बँधे हैं। इस विषयमें अब सोचने-विचारनेका तो कोई अवसर ही नहीं रहा। जब साधारण मनुष्योंकी भाँति स्वयं भगवान् विष्णु ही इसके प्रभावसे प्रभावित होकर नींदमें अचेत-से हो गये हैं, तब अन्य महात्मा पुरुषोंपर इनका अधिकार है या नहीं, यह तो विचार ही नहीं उठ सकता। इसलिये अब मैं इन भगवती योगनिद्राकी स्तुति करूँ, जिनकी कृपासे जगकर भगवान् विष्णु युद्धमें मेरी सहायता करनेमें तत्पर हो सकेंगे। उस समय ब्रह्माजी कमलपर विराजमान थे। वे अपने मनमें उपर्युक्त विचार निश्चित करके भगवान् विष्णुके अंगोंमें शोभा पानेवाली उन भगवती योगनिद्राकी स्तुति करने
लगे।


ब्रह्माजी बोले- देवी! मैं जान गया, तुम निश्चय ही इस जगत् की कारणस्वरूपा हो । सम्पूर्ण वेद-वचन इसे प्रमाणित कर रहे हैं। यही कारण है कि चराचर जगत्‌को प्रबुद्ध करनेवाले परमपुरुष भगवान् विष्णु आज गाढ़ी नींदमें मग्न हैं। माता ! तुम समस्त प्राणियोंके अन्तःकरणमें निवास करती हो। भवानी! तुम सगुणरूप धारण करके अपनी लीला प्रकट करती हो। तुम्हारे इस कार्य कौशलको कोई नहीं जान पाता। मुनिगण 'संध्या' नामसे तुम्हारे गुणोंकी कल्पना करके प्रातः, सायं और मध्याहन - तीनों समय निश्चितरूपसे तुम्हारे ध्यानमें लगे रहते हैं। माता! प्राणियोंको सत्- असत्का ज्ञान करानेवाली बुद्धि तुम्हीं हो। देवी! देवता जिससे निरन्तर सुखका अनुभव करते हैं, वह श्री तुम्हारा ही रूप है। अखिल जगत् में तुम कीर्ति, धृति, कान्ति, मति, रति और श्रद्धारूपसे विराजती हो। तुम अखिल जगत्की जननी हो ! मैं दुःखी होकर इसका प्रमाण खोजनेमें प्रयत्नशील था - इतनेमें भगवान् विष्णु तुम्हारे अधीन हो नींद ले रहे हैं- यही मुझे प्रत्यक्ष प्रमाण मिल गया। इससे अधिक अब सैकड़ों प्रमाणोंकी आवश्यकता ही क्या रही। देवी! वेदज्ञ पुरुष भी तुम्हें नहीं जान पाते। वेद भी तुम्हारे अखिल अभिप्रायसे अनभिज्ञ ही रहता है; क्योंकि इस वेदकी उत्पत्ति भी तुम्हींसे हुई है! फिर तुम्हारे रहस्यको कैसे जान सकता। तुमसे उत्पन्न हुआ यह अखिल जगत् ही इसमें प्रत्यक्ष प्रमाण है। देवी! यज्ञमें हवन करते समय भी वेदन पुरुष तुम्हारे 'स्वाहा' इस नामका उच्चारण करते हैं। यदि वे स्वाहा न कहें तो देवतालोग यज्ञभागसे वंचित ही रह जायें। इससे देवताओंको वृत्ति देनेवाली भी तुम्हीं सिद्ध हुई। देवी! तुम पहले भी मेरी रक्षा। कर चुकी हो। वैसे ही अब इस देवशत्रु कैटभसे भी मुझे बचाओ वर देनेवाली देवी! मैं मधु और कैटभको अत्यन्त भयंकर देखकर भयभीत हो तुम्हारी शरणमें आया हूँ। महानुभावे! इस समय भगवान् विष्णु मेरे इस दुःखको नहीं जानते - ऐसी मेरी समझ है; क्योंकि वे तुम्हारी मायासे अचेत होकर जडवत् पड़े हैं। ऐसी स्थितिमें या तो तुम भगवान् विष्णुपरसे अपना प्रभाव खींच लो अथवा इन दानवराज मधु और कैटभका स्वयं संहार करो। इन दोनोंमें जो तुम्हारी रुचि हो, वही करो। भगवती लक्ष्मी भी तुम्हारे अधीन हैं। अतः वे भी अपने पतिदेव श्रीहरिको नहीं जगा सकती। जान पड़ता है उन्हें भी तुम्हारे प्रभावसे अकस्मात् नींद आ गयी, जिससे ये परवशकी भांति सो गयी हैं-जगती ही नहीं। देवी! तुम सम्पूर्ण जगत्की माता हो। सभी मनोरथ पूर्ण करना तुम्हारा स्वभाव है। जो लोग अन्य देवताओंकी उपासना छोड़कर तुम्हारे परायण हो चरण-कमलोंमें उत्तम भक्ति स्थापित करते हैं, वे बड़भागी जन धरातलपर धन्य हैं। भगवती थी, कान्ति, कीर्ति आदि मंगलमय वृत्तियाँ तुम्हारे गुण हैं। तुम दिव्यस्वरूपिणी हो। तुम्हारी शक्ति जो निद्रा है, उसके अधीन होकर वे विष्णु बंदीकी भाँति असमर्थ से हो गये हैं। तुम्हीं भगवती शक्ति हो। अखिल जगत्में तुम्हारा ही प्रभाव व्याप्त। है। चराचर जगत् तुम्हींसे उत्पन्न हुआ है। अपने ही बनाये हुए जगत्-प्रपंचमें तुम वैसे ही क्रीड़ा करती हो, जैसे नट अपने फैलाये हुए इन्द्रजालमें सुखका अनुभव कर रहा हो। माता! तुम्हींने युगके आरम्भमें विष्णुको जगत्‌का पालन करनेके लिये उत्तम शक्ति प्रदान की। वे समस्त संसारकी रक्षामें सफल भी हुए। किंतु आज वे पराधीन-से पड़े हैं। यह निश्चय है। तुम्हारी जो इच्छा होती है, वही तुम करती हो। भगवती ! मुझे उत्पन्नकर यदि मेरी स्थिति कायम रखना चाहती हो तो मौनभावका परित्याग करके दया करनेकी कृपा करो। ये दानव कालस्वरूप हैं, इन्हें तुमने बनाया ही क्यों ? अथवा मेरा उपहास करानेकी इच्छासे ही इन्हें प्रकट कर दिया ? भवानी! मैंने तुम्हारी अद्भुत चेष्टा जान ली। सम्पूर्ण संसारकी सृष्टि करके तुम स्वतन्त्ररूपसे आनन्दका अनुभव किया करती हो। फिर चराचर जगत्को अपनेमें लीन भी कर लेती हो। तुम मुझे पहले जगत्स्रष्टा बना चुकी हो। वही मैं यदि दैत्यके हाथसे मारा गया तो मेरी बड़ी अपकीर्ति होगी।


सूतजी कहते हैं-जब इस प्रकार ब्रह्माजीने भगवतीकी स्तुति की, तब तामसी निद्रा देवी भगवान् विष्णुके श्रीविग्रहसे निकलकर बगलमें खड़ी हो गयीं। अब अमितपराक्रमी भगवान् श्रीहरिके सभी अंगोंसे निद्रा देवीका अधिकार उठ गया। मधु और कैटभके संहारके लिये ही भगवती योगनिद्राने ऐसी कृपा की थी। फिर तो भगवान् श्रीविष्णु जब अपने शरीरको हिलाने-डुलाने लगे, तब उनके दर्शन करके ब्रह्माजी आनन्दविभोर हो उठे। साथ ही उन्होंने श्रीहरिकी परिक्रमा आरम्भ कर दी।
ऋषियोंने पूछा- महाभाग सूतजी ! इस कथाप्रसंगको जानकर तो हमें बड़ा ही आश्चर्य हो रहा है; क्योंकि वेद, शास्त्र, पुराण और विज्ञजनोंने सदा यही निर्णय किया है कि ब्रह्मा, विष्णु और शंकर-ये ही तीनों सनातन देवता हैं। इनसे बढ़कर इस ब्रह्माण्डमें दूसरा कोई देवता है ही नहीं। ब्रह्माजी सारे संसारकी सृष्टि करते हैं। जगत्का संरक्षण भगवान् विष्णुके अधीन रहता है। प्रलयके अवसरपर शंकरजी उसका संहार किया करते हैं। इस जगत्प्रपंचके ये ही तीनों देवता कारण हैं। ये वास्तवमें एक ही हैं, किंतु कार्यवश सत्त्व, रज और तम आदि गुणोंको स्वीकार करके ब्रह्मा, विष्णु एवं शंकर नामसे विख्यात होते हैं। इन तीनोंमें परमपुरुष भगवान् विष्णु सबसे श्रेष्ठ हैं। वे जगत्के स्वामी और आदिदेव कहलाते हैं। उनमें सब कुछ करनेकी योग्यता है। दूसरा कोई भी देवता उन अतुल तेजस्वी श्रीविष्णुके समान शक्तिशाली नहीं है। फिर ऐसे सर्वसमर्थ परमप्रभु भगवान् श्रीविष्णु योगमायाके अधीन होकर कैसे सो गये ? महाभाग ! हमें यह महान् संदेह हो रहा है ! इस मंगलमय प्रसंगको सुनानेकी कृपा कीजिये। सुव्रत! आप पहले जिसकी चर्चा कर चुके हैं तथा जिसने परमप्रभु विष्णुपर भी अधिकार जमा लिया, वह कौन-सी शक्ति है ? कहाँसे उसकी सृष्टि हुई, उसमें कैसे इतना पराक्रम हो गया और क्या उसका परिचय है-सब बतानेकी कृपा करें। जो सबके स्वामी हैं, जगत्के गुरु हैं, सर्वोत्तम आत्मा हैं, परम आनन्दस्वरूप हैं, सच्चिदानन्दमय विग्रह हैं, सबकी सृष्टि करते हैं, सबका संरक्षण करते हैं, रजोगुणसे रहित हैं, सर्वत्र विचर सकते एवं परम पवित्र परात्पर हैं, ऐसे सर्वगुणसम्पन्न भगवान् श्रीविष्णु विवश होकर कैसे नींदमें अचेत हो गये ? आपमें अप्रतिम ज्ञान भरा है। हमें यह जो महान् संदेह हो रहा है, इसे आप अपनी ज्ञानमयी तलवारसे काटनेकी कृपा करें। 


सूतजी कहते हैं- मुनिवरो! चराचरसहित इस त्रिलोकीमें कौन ऐसा है, जो इस संदेहको दूर कर सके । ब्रह्माजीके पुत्र नारद, कपिल आदि दिव्य महापुरुष भी इस प्रश्नका समाधान करनेमें निरुपाय हो जाते हैं। महानुभावो! यह प्रश्न बड़ा ही गहन और विचारणीय है। इसके सम्बन्धमें मैं क्या कह सकता हूँ। जिनसे यह इतना विशाल चराचर जगत् उत्पन्न हुआ है, उन भगवान् विष्णुको ही वेदोंमें सर्वान्तर्यामी और सबका रक्षक बतलाया गया है। अतएव वैदिक सिद्धान्तको माननेवाले सभी लोग उन परमप्रभु भगवान् नारायणके चरणोंमें मस्तक झुकाकर उन्हींकी उपासना करते हैं। ऐसे ही कुछ लोग शंकरके उपासक हैं। महादेव, शंकर, शशिशेखर, त्रिनेत्र, पंचवक्त्र, शूलपाणि, वृषभध्वज, त्र्यम्बक, कपर्दी और गौरीदेहार्द्धधारी आदि नामोंसे भगवान् शिव वेदोंमें विख्यात हैं। वे सदा कैलासपर्वतपर रहते हैं। उनमें सारी शक्तियाँ निहित हैं। भूतगण उन्हें चारों ओरसे घेरे रहते हैं। उन्होंने दक्षका यज्ञ विध्वंस कर दिया था। महानुभावो ! इसी तरह अनेकों वेदज्ञ पुरुष प्रतिदिन प्रातः, सायं और मध्याह्न कालमें भांति-भांतिके स्तोत्रोंका पाठ करके उनके द्वारा सूर्यकी उपासना करते हैं। वे मानते हैं कि सम्पूर्ण वेदोंमें सूर्यकी उपासनाको ही उत्तम माना गया है। उन्हीं महाभागका नाम परमात्मा भी है। वैसे ही कुछ वेदज्ञ पुरुषोंका कथन है कि वेदोंमें सब जगह अग्निकी उपासना की गयी है। इनके सिवा दूसरे लोग इन्द्र और वरुणको भी पूज्य मानते हैं। जिस प्रकार गंगा एक ही हैं, किंतु धाराओंके रूपमें पृथक्-पृथक् बहती हैं, वैसे ही महर्षियोंका कथन है कि एक ही भगवान् विष्णु सम्पूर्ण देवताओंमें विराजमान हैं।





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प्रत्यक्ष', 'अनुमान' और तीसरा 'शब्द'- इन तीन प्रमाणोंको ही प्रकाण्ड विद्वानोंने सिद्ध किया है। नैयायिकोंके सिद्धान्तमें 'उपमान' को लेकर चार प्रमाण कहे गये हैं। मीमांसकोंने 'अर्थापत्ति' सहित पाँच प्रमाण माने हैं। पुराणवेत्ता विज्ञ पुरुष सात प्रमाण मानते हैं। जो इन सभी प्रमाणोंसे नहीं जाना जा सकता, वही परब्रह्म परमात्मा है। इस विषयमें शास्त्र, बुद्धि एवं निश्चयात्मिका युक्तिसे बारम्बार विचार करके। अनुमान कर लेना चाहिये। विज्ञ पुरुषोंको चाहिये कि जिसका प्रत्यक्ष ज्ञान हो रहा है, उसे भी अनुमानसे विचार कर लें। शिष्ट मार्गका अनुसरण करनेवाला भी निरन्तर दृष्टान्तसे काम लिया करता है। विद्वान् पुरुष ऐसा कहते हैं और पुराणोंने भी घोषणा की है कि ब्रह्मामें सृष्टि करनेकी शक्ति है और विष्णु पालन करनेमें समर्थ हैं तथा शंकर संहार करनेमें कुशल हैं। सूर्य जगत्को प्रकाश देते हैं। शेष और कच्छप पृथ्वी धारण किये रहते हैं। अग्निमें जलानेकी और पवनमें हिलाने-डुलाने की शक्ति है। सबमें जो शक्ति विराजमान है, वहीं आद्याशक्ति है। उसीके प्रभावसे शिव भी शिवताको प्राप्त होते हैं। जिसपर उस शक्तिकी कृपा न हुई, वह कोई भी हो, शक्तिहीन हो जाता है। बुधजन उसे असमर्थ कहते हैं। सबमें व्यापक रहनेवाली जो आद्याशक्ति है, उसीका '' इस नामसे निरूपण किया गया है। अतएव विद्वान् पुरुषोंको चाहिये कि भलीभाँति विचार करके सदा उसी शक्तिकी उपासना करे। विष्णुमें सात्त्विकी शक्ति व्याप्त है। यदि वह उनसे अलग हो जाय तो विष्णु कुछ भी न कर सकें। ब्रह्मामें जो राजसी शक्ति है, उसके बिना वे सृष्टि कार्यमें अयोग्य हैं। शिवमें जो तामसी शक्ति है, उसीके प्रभावसे वे संहारलीला करते हैं। मनोयोगपूर्वक इस प्रकार बार-बार विचार करके सारी बात समझ लेनी चाहिये। वही आद्याशक्ति इस अखिल ब्रह्माण्डको उत्पन्न करती और उसका पालन भी करती है। वही इच्छा होनेपर इस चराचर जगत्का संहार भी करनेमें संलग्न हो जाती है। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर, इन्द्र, अग्नि और पवन- ये सभी किसी प्रकार भी स्वतन्त्ररूपसे अपने- अपने कार्यका सम्पादन नहीं कर सकते; किंतु जब वह आद्याशक्ति इन्हें सहयोग देती है, तभी ये अपने कार्यमें सफल होते हैं। अतः इन कार्य कारणोंसे यही प्रत्यक्ष सिद्ध होता है कि वह शक्ति ही सर्वोपरि है। विद्वान् पुरुष उस शक्तिके विषयमें दो प्रकारकी कल्पना करते हैं- सगुणा और निर्गुणा! भोगकी इच्छा करनेवाले सगुणाकी उपासना करते हैं।


विरागियोंके यहाँ निर्गुणाकी उपासना होती है। वह शान्तस्वरूपा धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी स्वामिनी है। विधिपूर्वक उसकी उपासना करनेपर सभी मनोरथ सुलभ हो जाते हैं। वह आद्याशक्ति परब्रह्मस्वरूपा एवं सनातनी है। कभी उसका अवसान नहीं होता। अतएव मुनिवरो! विवेकी पुरुष संदेहरहित होकर उस शक्तिकी ही उपासना करें। सम्पूर्ण शास्त्रोंसे यही बात निश्चित होती है । शक्तिहीन पुरुष चेष्टारहित हो जाता है- यह तो प्रत्यक्ष ही दिखायी पड़ रहा है। अतएव सम्पूर्ण जगत्में शक्तिको ही सर्वोपरि समझना चाहिये। 


अध्याय 6 से 8